शनिवार, 18 अगस्त 2012

गुलज़ार की छिहत्तरवीं सालगिरह पर

एक लम्हा गली के मुहाने पर ठिठक गया 
एक ने हिम्मत करके अन्दर झाँका 
गली बहुत संकरी थी 
और दूसरे मुहाने पर बंद भी

थोडा ठिठक कर 
थोडा झिझक कर 
एक लम्हा अन्दर घुस पड़ा

अन्दर पूरा लम्हों का कब्रिस्तान था
सड़े - गले लम्हों से बचता बचाता 
वो लम्हा आगे बढ़ता गया 

गली के अंत में 
खुले बालों वाली लड़की मिली 
जिसकी फिराक में कई लम्हों ने दम तोड़ दिया था 
कुछ सिसकियाँ ले रहे थे 
कुछ हिचकियाँ 

अचानक वो लड़की लम्हे में तब्दील हो गई   
इस लम्हे ने कुछ साँसे उसके तैरते बदन पर रख दीं 
सुनहरे परों वाली परी में बदल गयी वो  
साँसों ने साँसों को भर लिया 
और सांसें एक हो गयीं

संकरी बंद गली के भीतर 
एक मैदान मिल गया 

और हर लम्हे को जीने का मकसद 

- वाणभट्ट 

17 टिप्‍पणियां:

  1. खूबसूरत.....एक ही लफ्ज़ काफी है.

    अनु

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  2. ईद मुबारक !
    आप सभी को भाईचारे के त्यौहार की हार्दिक शुभकामनाएँ!
    --
    इस मुबारक मौके पर आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (20-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. ढेर से लम्हे, खराब और खूबसूरत हम सबके !
    आभार आपका !

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  4. ऊफ ... क्या गज़ब के एहसास पिरोये हैं ... लम्हों का ये जंगल बढ़ता रहता है .. उम्र खत्म हो जाती है झटके में ... गुलज़ार साहब को सलाम ...

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  5. very good thoughts.....
    मेरे ब्लॉग

    जीवन विचार
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  6. सांसों को जीने का मकसद मिल गया
    जब लम्हा लम्हे से मिल गया ।

    खूबसूरत प्रस्तुति ।

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  7. आभार - दीपोत्सव की हार्दिक बधाई

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यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...