रविवार, 26 अक्टूबर 2025

उपनिवेशवाद

हर देश-काल में ताकतवर लोग अपनी बात को ऐसे व्यक्त करते रहे हैं, जैसे वो पत्थर की लकीर हो. समय के साथ नये ताकतवर आते गये और नयी लकीरें खींचते गये. पहले जब आम जनता को नियम-कानून जैसी चीज़ें पता नहीं थी, तो लोग छल-बल से अपनी बात मनवा लेते थे. कुछ देशों में जहाँ अभी भी तानाशाही या फिरकापरस्ती का बोलबाला है, वहाँ जनता को आज के आधुनिक युग में भी चपड़-चूं करने की इजाज़त नहीं है. वैसे देश-काल कोई भी हो पद-बल और उसमें निहित शक्तियाँ आम और अमरुद आदमी को उसी तरह अलग कर देती हैं, जैसे हंस दूध और पानी को.

राजशाही से आजिज़ आ चुकी जनता ने जब राजशाही का विरोध किया तो उन्होंने जनता को प्रजातन्त्र का झुनझुना पकड़ा दिया. ताकि जनता को लगे कि जनता ने अपनी सरकार का गठन अपने लिये, अपने द्वारा कर लिया है. इस व्यवस्था को प्रजातन्त्र की संज्ञा से नवाज़ा गया. उस समय भी राजनीति में जनता की सेवा के निस्वार्थ उद्देश्य से वो ही लोग कूदे जो साधन-सम्पन्न-समृद्ध लोग थे. जहाँ अधिकान्श जनता, दो जून के निवाले के इंतज़ाम में जुटी हो, वहाँ राजनीति भी एक प्रकार की विलासिता ही थी. और विलासिता पर आम आदमी का हक़ किसी ताक़तवर को भला कब, कैसे और क्यों सुहायेगा. सो ताकत का रूप बदला लेकिन सत्ता वहीं रही जहाँ पहले थी. जब जनता को ये एहसास हुआ कि प्रजातन्त्र तो मूलतः संख्या समीकरण है. जिसकी संख्या ज्यादा होगी, वही शासन के शीर्ष पर होगा. शक्ति के इस परिवर्तन-हस्तान्तरण को समाजवाद के रूप में परिभाषित किया गया. ठेठ भाषा में समाजवाद को इस तरह समझ सकते हैं कि पहले जिसकी लाठी (शक्ति-बल) उसकी भैंस होती थी, आज जिसके पास संख्या अधिक हो वो भैंस हाँक ले जायेगा. शक्ति के कई रूप हुआ करते थे, धन-बल-बुद्धि, लेकिन जब से संख्या बल आया बाकि सभी बल ढक्कन हो गये. जिसके पास संख्या है, वो जब चाहे, जहाँ चाहे, जो भी चाहे, अपनी बात मनवा ले. मनवा न भी पाये तो भी इनमें देश के सामान्य जन-जीवन को अस्त-व्यस्त-ठप्प करने की क्षमता तो है ही. इसमें प्रजातन्त्र बेचारा सा मुँह टापता रह जाता है.

संख्या बल की अवधारणा राजनीति तक ही रहती तो भी गनीमत थी. ये अवधारणा महामारी की तरह हर क्षेत्र में फ़ैल गयी. हर क्षेत्र मतलब हर क्षेत्र. विज्ञान जैसे विषयों का इससे अछूता रह पाना असम्भव था. परिभाषा के अनुसार विज्ञान वह विशिष्ट ज्ञान है, जिसके माध्यम से प्राकृतिक घटनाओं का सुव्यवस्थित और क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है, जिनका अवलोकन, परीक्षण, प्रयोग और तर्क के द्वारा सिद्धान्तों के रूप में प्रतिपादन किया जा सके. यह एक ऐसी विद्या है, जो ब्रह्माण्ड के रहस्यों की व्याख्या करने में सहायता करती है. धरती की समस्त जीवों में सबसे उन्नत प्रजाति, मानव, आरम्भ से ही प्रकृति के रहस्यों को सुलझाने में लग गया. सिर्फ़ धरती पर हो रही प्रक्रियाओं को ही नहीं, मनुष्य ने ब्रह्माण्ड की सभी गतिविधियों, यहाँ तक कि ग्रह-नक्षत्रों-तारों के बारे में ज्ञान अर्जित करने का प्रयास किया. आज भी उसकी जिज्ञासा का अन्त नहीं है. नित नये प्रयोग और शोध हो रहे हैं, नित नयी खोज सामने आ रही है. 

जब तक विज्ञान विषय नहीं बना था, तब तक सारी खोजें मानव मात्र के लिये थीं. तब तक वो साझा ज्ञान था, सबके लिये. पिछला ज्ञान आगे के विज्ञान की आधारशिला बना. भारत में ऋषि परम्परा में ज्ञान-विज्ञान अपने उत्कर्ष पर था. जिसमें व्यक्ति नहीं ज्ञान सर्वोपरि था. इसीलिये हमने नियमों का प्रतिपादन व्यक्ति के नाम से नहीं किया. जब सारी दुनिया संशय में जी रही थी कि धरती चपटी है या चौकोर, हमें धरती का भूगोल मालूम था. जब सेब न्यूटन बाबा के सर पर नहीं गिरा था, हमें गुरु (बृहस्पति) के गुरुत्व का भान था. अणु-परमाणु की परिकल्पना का उद्भव भी 'यथा पिंन्डे तथा ब्रह्मांडे' से हुआ होगा. हमारे ऋषि-मुनि अपने ज्ञान का डंका बजाने में विश्वास नहीं करते थे, इसलिये सबने काम किया और वेदों के रूप में अपनी भाषा संस्कृत में लिपिबद्ध कर के समस्त प्राणी मात्र के उत्थान के लिये बिना किसी कॉपीराईट के उपलब्ध करा दिया. 

आर्थिक रूप से विकसित देश, अपने विचारों और शोध को तत्परता से लिपिबद्ध और प्रकाशित करने का हमेशा से प्रयास करते रहे हैं. भारत अपने कई महापुरुषों को सिर्फ़ इसलिये पहचान पाया क्योंकि उनके कृतित्व विदेशों में लिपिबद्ध हुये, वहाँ उनके कार्यों और विचारों को सराहना मिली. सैकड़ों वर्षों की पराधीनता ने देश की शिक्षा व्यवस्था को इस स्थिति तक समाप्त कर दिया कि हम अपने ही पुरातन ज्ञान-विज्ञान को संशय की दृष्टि से देखते हैं. अपने ही भारतीय विज्ञान पर प्रश्नचिंह खड़ा करने का कोई मौका नहीं चूकते. न हमें अपने चिकित्सकीय ज्ञान, आयुर्वेद पर गर्व है, न ही हम अपने खगोलीय ज्ञान को प्रमाणिक मानते हैं. कारण मात्र इतना है कि हमारे ऋषि-मनीषियों ने खोज को महत्त्व दिया, अपने नाम या योगदान को रेखांकित करने पर नहीं. उनके लिये विज्ञान सर्व सुलभ ज्ञान था, जिसका उपयोग मानव कल्याण और मानवता के लिये किया जाना था. पश्चिम के वैज्ञानिक अपनी खोज को अपना नाम देने के लोभ से बच नहीं सके.  मुगलों ने भारत की धन-सम्पदा को लूटने का लक्ष्य बनाया तो यूरोप के आक्रान्ताओं ने यहाँ की बौद्धिक सम्पदा को बिना श्रेय दिये चोरी करने में सन्कोच नहीं किया. ये बात ध्यान देने वाली है कि पाश्चात्य जगत में अधिकान्श खोज का अंग्रेजों के भारत आने के बाद सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में होना संयोग मात्र नहीं है.

विज्ञान का आरम्भ सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय से ही हुआ होगा. आवश्यकता अविष्कार की जननी है. लोगों ने आवश्यकता के अनुसार अविष्कार किये होंगे, जिनका उपयोग करने के लिये सर्वसाधारण को शिक्षित किया होगा कि सबका जीवन उन्नत और सुखद हो सके. जीवन के लिये आवश्यक मूलभूत खोजों पर किसी महान वैज्ञानिक का नाम नहीं है. किसने आग खोजी, किसने शिकार के लिये हथियार बनाये, किसने पहिये का अविष्कार किया, किसने खेती को जीवन का आधार बनाया. खेती ने ही आगे चल कर मानव समाज की स्थापना की. किसी भी खोज से किसी का नाम नहीं जुड़ा है. विज्ञान का ज्ञान भले सीमित लोगों के द्वारा विकसित किया गया हो लेकिन उसका लाभ सबके लिये था. तब विज्ञान शौक था, रोजगार नहीं. फिर यूनीवर्सिटीज़ में विज्ञान के अलग-अलग विषय बने. शोध का उपयोग व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और लाभ के लिये होने लगा. जहाँ भी ताकत का प्रवेश होगा, वहाँ राजनीति का आना भी तय है. मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने भी अपने सिद्धांतों को प्रतिपादित करने, अपने स्व को प्रोन्नत करने और भिन्न विचारधारा के व्यक्ति को कमतर दिखाने के लिये, संख्या बल की राजनीति का सहारा लिया. समय के साथ विज्ञान में राजनीति का घालमेल बढ़ता गया. दिन प्रति दिन शोध में धन की आवश्यकता बढ़ती गयी. इसके लिये कम्पनी प्रायोजित शोध आरम्भ हो गये. और जो शोध प्रायोजित करेगा तो उसके पीछे उसका अपना कोई न कोई स्वार्थ तो अवश्य सिद्ध हो रहा होगा. कई बार तो लगता है कि समस्याओं को अनायास विस्तारित किया जाता है ताकि वित्तीय प्रावधान को आकृष्ट किया जा सके. एलोपैथी इसका एक सबसे जीवन्त उदाहरण है. दवा कम्पनियाँ विभिन्न बीमारियों को लक्ष्य करके उनके उपचार हेतु दवा या टीकाकरण पर शोध और उनका वृहद् स्तर पर क्लीनिकल परिक्षण करवाती हैं. चूँकि आयुर्वेद और होम्योपैथी, जो सापेक्ष रूप से कम ख़र्चीली चिकित्सा पद्यति है, इसलिये इस में फण्डिंग भी कम है. बीमारियों को जड़ से ठीक करने के इनके बड़े से बड़े दावों की अभी भी पुष्टि नहीं हो पायी है, क्योंकि इस प्रकार के शोध को फण्ड करने में लाभ भी कम है. फण्ड की उपलब्धता प्रतिभाशाली मस्तिष्क को आकृष्ट करती है. जो जितना बड़ा भौकाल बना ले, वो उतना अधिक फण्ड खींच सकता है. यहीं पर वैज्ञानिक का व्यक्तिगत प्रभाव, नेटवर्क और व्यक्तित्व काम आता है. थोड़ी बहुत भी राजनीति कर ली तो मुद्दा देश या विश्वव्यापी बन जाता है. 

शिक्षा और ज्ञान को आर्थिक रूप से लाभ उठाने का विचार पाश्चात्य सभ्यता की देन है. पहले से स्थापित ज्ञान-विज्ञान को अधिसंख्य लोगों द्वारा बोली जाने वाली, अंग्रेजी भाषा में लिख कर, उन्होंने लगभग प्रत्येक विषय में अपने आप को अग्रणी मान लिया. विश्व के अधिकांश देश उनके उपनिवेश रहे इसलिये उनको दुनिया भर पर अपने विचार थोपने में अधिक प्रयास नहीं करना पड़ा. हमारे वेद-पुराणों को पिछड़ा और अप्रमाणिक सिद्ध करके, उसी ज्ञान पर पश्चिम के वैज्ञानिकों ने अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर ली. संख्याबल यहाँ भी अपना काम कर गया. आप लाख प्रयास कीजिये, उद्धरण दीजिये, बहुमत से चलने वाली सभ्यतायें, आप को सक्षम और स्वयं को पिछड़ा मानने को तैयार नहीं हैं. और माने भी क्यों जब उन्होंने हमारी शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करके, अपने विचारों को हमारी जड़ों में इतना गहरे रोप दिया कि हमारा स्वयं पर से विश्वास डगमगा गया. विश्व के स्वतन्त्र और विकसित देशों, यूरोप, अमेरिका, जापान, चीन आदि ने अपनी भाषा और संस्कृति की गरिमा और प्रतिष्ठा का परित्याग नहीं किया. मुगलों और अंग्रेजों की ग़ुलामी ने हमारे भीतर इतनी गहरी पैठ बना ली कि हम आज भी न अपनी भाषा बना पाये, न अपना विज्ञान. जो अंग्रेजी में पढ़ लिया, उसी को सही और सत्य मान लिया. इस कारण हमारा विज्ञान और चिकित्सा पद्यति पश्चिमोन्मुखी हो कर रह गयी. अपने अत्यन्त उन्नत और विकसित पुरातन ज्ञान को नकार कर हम आज अपनी ही वैज्ञानिक अवधारणाओं की स्वीकृति के लिये पश्चिम का मुख देख रहे हैं. अपने चिकित्साशास्त्र, आयुर्वेद को कोई बाहर वाला नहीं, अपने ही आधुनिक भारतीय चिकित्सा जगत के लोग चुनौती दे रहे हैं. जबकि वर्तमान में पाश्चात्य जगत, योग और आयुर्वेद के लाभ को समझ रहा है और उसकी ओर झुकाव महसूस कर रहा है. अपनी भाषा में विज्ञान की पुस्तकों का आज भी नितान्त अभाव है. वैज्ञानिक पत्रिकाओं के न होने से हमारे वैज्ञानिक अपने शोध को अंग्रेजी में छापने-छपवाने को विवश हैं. शोध पत्रों का प्रकाशन एक सर्वकालिक लाभप्रद व्यवसाय बन गया है. कोरोना की विश्वव्यापी महामारी के दौरान जब अन्य उत्पादक क्षेत्र भीषण मंदी के शिकार हो गये थे, छापाखाना ही एक ऐसा व्यवसाय था, जो फूला और फला. 

नवोन्मेषी प्रायोगिक समाधान उन्मुख शोध भले समस्या का निवारण करने में सक्षम हों, किन्तु उन्हें उच्च स्तर की शोध पत्रिकाओं में स्थान नहीं मिलता. आज कल शोध दो धडों में विभक्त दिखायी देता है. अव्यवहारिक, मौलिक शोध और व्यवहारिक, प्रायोगिक शोध. मौलिक शोध जनित शोध पत्रों को उच्च स्तर की शोध पत्रिकाओं में स्थान मिल जाता है, जबकि प्रायोगिक व्यावहारिक शोध, प्रायः तकनीक के रूप में ही सीमित रह जाते हैं. यद्यपि कि इनका उपयोग समस्या के समाधान के लिये किया जा सकता है किन्तु इनको उच्च रेटिंग के शोध पत्र में परिवर्तित करना दुष्कर कार्य है. हाई रेटिंग के कारण आज मौलिक और व्यवहारिक शोध का अन्तर इतना अधिक हो गया है कि मौलिक शोध के वैज्ञानिक मौलिक शोध को ही विज्ञान मानने की भूल कर बैठते हैं, और व्यवहारिक शोध को हेय दृष्टि से देखते हैं. यही कारण है कि व्यवहारिक शोध करने वाले भी मौलिक शोध करने और उनके प्रकाशन की ओर आकृष्ट हो रहे हैं. मौलिक शोध भी एक चूहा दौड़ सिद्ध होती जा रही है क्योंकि मौलिक शोध के लिये मौलिक सोच का होना अत्यंत आवश्यक है. जबकि अधिकांश मौलिक शोध के लिये हम आज भी पश्चिम देशों के शोध की दिशा का अनुसरण कर रहे हैं. जिन संस्थाओं ने मौलिक और व्यवहारिक शोध का समन्वय कर लिया, वे ऐसी लोकोपयोगी तकनीक विकसित करने में सफल हुये, जिनका आधार मौलिक शोध था.

मौलिक शोध आवश्यक हैं, किन्तु यदि उसकी परिणति प्रायोगिक या व्यवहारिक समाधान में नहीं होती तो उसकी उपयोगिता व्यक्तिगत प्रोन्नति के लिये तो उचित हो सकती है, लेकिन देश-समाज के लिये नहीं. वर्तमान समय में शोध को समावेशी बनाने की आवश्यकता है ताकि वित्तीय प्रावधानों और संसाधनों का लक्ष्य समाधान केन्द्रित हो. अपने मौलिक शोध के स्तर पर हमारा स्वयं का विश्वास आवश्यक है, इसके पुष्टिकरण के लिये हमें विदेशी संस्थाओं की स्वीकृति पर निर्भर न रहना पड़े. जब तक व्यवहारिक विज्ञान की अवहेलना होगी, वैज्ञानिक मौलिक शोध करके आत्मुत्थान का प्रयास करते रहेंगे. इन परिस्थितियों में यदि देश को नवोन्मेषी उन्नत तकनीकों के लिये आयातित तकनीकों पर ही निर्भर रहना पड़ता है, तो ये अत्यन्त दुःखद होगा. 

जबसे भारत की अधिकांश शोध संस्थाओं ने शोध पत्रों को वैज्ञानिक प्रोन्नति का आधार बना लिया है, वैज्ञानिकगण भी वैश्विक स्तर पर होने वाली समस्याओं पर शोध और शोध पत्र लेखन को वरीयता दे रहे हैं. मौलिक विषयों पर किये शोध पत्रों को उच्च स्तर की शोध पत्रिकाओं में स्थान मिल जाता है. ये पत्र शोध समस्या के सैद्धान्तिक निवारण की ओर इन्गित तो करते हैं, किन्तु प्रायोगिक और प्रयुक्त किये जा सकने व्यवहारिक समाधानों से प्रायः कोसों दूर होते हैं. उच्च स्तर के शोध के लिये, हम मुख्य रूप से आयातित यन्त्रों पर निर्भर रहते हैं. इनकी आवश्यकता मात्र इसलिये होती है कि इन यंत्रों के परिणाम पर सारा विश्व विश्वास करता है और इनमें अधिकांश उपकरण विकसित देशों द्वारा निर्मित किये गये हैं. परिणामस्वरूप वित्तीय प्रावधान का महत्तम भाग, आयातित उपकरणों की खरीद पर व्यय हो जाता है. इस प्रकार विकसित देश हमारे ऊपर न केवल अपने विचार प्रत्यारोपित कर रहे हैं, बल्कि अपने शोध उपकरणों को खरीदने और शोध पत्रिकाओं में लेख छापने के लिये हमें बाध्य कर रहे हैं. 

स्वतन्त्रता के पचहत्तर साल बाद, हम आज भी बौद्धिक परतन्त्रता में जकड़े हुये हैं. समस्यायें क्षेत्रीय हैं, तो उनका समाधान भी यहीं से निकलेगा. 'थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली' का नारा ही काफ़ी नहीं है. धरातल पर इस विचार को लाना होगा. प्रयोगशाला के लिये अपने उपकरणों, अपने रसायनों पर विश्वास, सम्भवतः इस दिशा में पहला कदम हो. हमारे पुरखों ने आत्मानुभूति और गहन अंतदृष्टि से आयुर्वेद की जड़ी-बूटियों की खोज की वो भी बिना किसी तथाकथित उन्नत यन्त्र-उपकरण के. वे ऐसा इसलिये कर सके क्योंकि ज्ञान-विज्ञान के लिये उनके पास कोई विदेशी पुस्तक या मानक नहीं थे. आज आवश्यकता है कि भारत के पुरातन ज्ञान-विज्ञान को वैश्विक पटल पर स्वीकार्य बनाने की, उन्हें पुनर्स्थापित करने की. किन्तु इसके लिये आवश्यक है कि भारत का विज्ञान भी उपनिवेशवाद से बाहर निकले. अपने ग्रन्थों में लिखे विज्ञान का पठन-पाठन-अध्ययन, उनका परीक्षण और पुष्टिकरण, अपनी ही भाषा में आज की मुख्य आवश्यकता है. इस विषय में एक विज्ञापन की टैग लाइन ध्यान आ रही है - ये एक दिन में नहीं होगा, लेकिन एक दिन ज़रुर होगा. प्रयास तो कीजिये. 

-वाणभट्ट

रविवार, 19 अक्टूबर 2025

गाज

लाईट को जाना था तो वो गयी. जेनरेटर को स्टार्ट होना था पर वो नहीं हुआ. सभा में अँधेरा छा गया. एक कहावत है - थिंग्स गो रॉन्ग ऐट मोस्ट क्रूशिअल आवर्स. मंच सज चुका था. सभी गण्यमान मंचासीन हो चुके थे. विद्वतजनों की पूरी फ़ौज सभागार में मौजूद थी. सबके पास लाईट के पुन: आ जाने का इन्तजार करने के अलावा कोई चारा भी न था. बैकअप के बैकअप की व्यवस्था पर किसी ने इन्जीनियर के कहने पर भी ध्यान नहीं दिया था. जब सब चीजें सुचारुरूप से चल रही हों तो इन्जीनियर की राय का कोई मतलब नहीं होता. मेन्टेनेन्स इन्जीनियर ने पहले ही कहा था कि एक इन्वर्टर या यूपीएस लग जाता तो सप्प्लाई से जेनरेटर पर स्विच होने में जो 15-20 सेकेण्ड का अन्तराल होता है, उसमें भी घुप्प अँधेरा नहीं होगा.  

जब से सामाजिक न्याय का मुद्दा उठा है, हिन्दुस्तान में सबने ये मान लिया है कि हर व्यक्ति बराबर है. ज्ञानी हो या अज्ञानी हो, परिश्रमी हो या आलसी हो, सबको धरती पर एक ही स्तर का जीवन जीने का भग्वत प्रदत्त अधिकार है. क्योंकि सब मनुष्य हैं. भगवान ने सबको मनुष्य योनि में जन्म दिया है. मनुष्य और मनुष्य में भेद करना मानवता के विरुद्ध है. समाज में जो वर्ण और वर्ग भेद की विषमता व्याप्त है, उसको दूर करने की प्रक्रिया वोट के द्वारा चयनित लोगों की व्यवस्था द्वारा की जा सकती है. वर्ग सन्घर्ष को दूर करने के लिये भारत भूमि की पावन धरा पर समय-समय पर महान विभूतियों ने जन्म लिया. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इनमें से अधिकान्श आर्थिक या शैक्षणिक या सामाजिक दृष्टि से उन्नत, समृद्ध और सम्पन्न लोग थे. जिनकी बातों का समाज पर व्यापक असर पड़ता था, आज भी पड़ता है. सीधी सी बात है मेरा उत्थान मुझसे अधिक सक्षम व्यक्ति ही तो कर पायेगा. धन-बल, भुज-बल, पद-बल, संख्या-बल, जिनके पास है, उनके विचारों में ताकत आ जाती और बातों में वज़न. इनमें से कई सुधारक अपने-अपने समाज का सामाजिक उन्नयन करते-करते कब धनपशुओं में शुमार हो गये, इनके अपनों को भी ज्ञात नहीं हुआ. अब जब उपरोक्त किसी भी प्रकार की शक्ति में से कोई शक्ति उनके पास है तो उनका अनुसरण करने वालों की संख्या का बढ़ना भी तय है. 

वाणभट्ट की सोच, इस सोच को और व्यापक बनाने की है. सामाजिक बराबरी को वैश्विक स्तर पर लाने की आवश्यकता है. ये अमरीका और जापान वाले क्या आदमी से उपर हैं. कोरिया, चीन और सिंगापुर अगर तरक्की कर रहे हैं तो क्या उनकी समृद्धि पर सम्पूर्ण वसुन्धरा के अन्य लोगों का कोई अधिकार नहीं है. किसी देश में गरीबी-भुखमरी है, तो कहीं तानाशाही ने जनता का जीवन नर्क बना रखा है. कितना अच्छा होता कि देशों के बीच की लकीरें ही हट जातीं और पूरी धरती एक हो जाती. सोच तो इतनी व्यापक होनी चाहिये कि धरती पर जीने का अधिकार सिर्फ़ मानव प्रजाति को नहीं है. बल्कि अन्य जीव-जन्तुओं-वनस्पतियों को भी है. आदमी अन्य प्रजातियों से श्रेष्ठ है, इसलिये सबका साथ और सबका विकास उसी को करना है. लेकिन आदमी है तो उसके साथ उसका स्वार्थ चिपका हुआ है. हर व्यक्ति को जीविकोपार्जन के लिये लाभ के विषय में सोचना और कार्य करना ज़रूरी है. अधिक लाभ यानि अधिक परिश्रम. किन्तु लाभ की अनियन्त्रित चाह कब लोभ में बदल जाती है, व्यक्ति को स्वयं पता नहीं चलता. अधिकार माँगने वाले हमेशा अधिकार देने वालों से संख्या में अधिक रहे हैं. कारण बहुत साफ़ है. जिसने भी बल प्राप्त करने के लिये अधिक श्रम किया, उसके पास हमसे अधिक अधिकार होंगे ही. पुरुषार्थ करके जब वही व्यक्ति अपनी सफलता का आनन्द लेने का प्रयास करता तो अधिकार माँगने वालों की नींद खुल जाती है. और वो बराबरी का हिस्सा बँटवाने को तत्पर हो जाते हैं.   

भारत ही क्या पूरी दुनिया में कभी भी बराबरी नहीं रही है. सबसे बड़ा वर्ग विभेद सक्षम और असक्षम का रहा है, समर्थ और असमर्थ का रहा है, धनवान और निर्धन का रहा है. उसके पीछे कई कारण रहे हो सकते हैं. सिर्फ़ भारत में ही हजारों धर्म-सम्प्रदाय-जातियाँ नहीं रही हैं, अन्य देशों में भी कभी एक विचारधारा या धर्म नहीं रहा. किन्तु सभी ने सबको बराबर का मान-सम्मान-आदर दिया हो, ऐसा इतिहास में कहीं नहीं दिखता. जो भी अधिक ताकतवर था, बुद्धि में, धन में, बल में या संख्या में उसने दूसरों को बदलने में, दबाने में, अपना सारा जोर लगा दिया. लेकिन बराबर कभी नहीं होने दिया. अब हम भारत के बाहर इस वर्ग विद्वेष के लिये ब्राह्मण या पण्डित जी को तो कोस नहीं सकते, लेकिन हमें लगता है कि देश के भीतर अपनी दुर्दशा का ठीकरा किसी पर तो फोड़ना ही है, तो पण्डित जी पर क्यों न फोड़ें. जबकि फ़र्क़ सिर्फ़ धन और निर्धन का है. अधिकांश इस दुश्चक्र में फँसे रह जाते हैं. भारत का इतिहास ऐसे महापुरुषों से भरा पड़ा है, जो इस दुश्चक्र को भेद कर बाहर निकल पाये. जिन्होंने अपनी स्थितियों-परिस्थितियों के लिये दूसरों को दोष देना बन्द कर दिया. दूसरों की लकीर छोटी करने के बजाय उन्होंने अपनी इतनी लम्बी लकीर बना दी कि उनकी मिसाल बन गयी. सदियाँ बीत गयीं, कोई उन्हें भुला नहीं सका. उनका नाम इतिहास में दर्ज़ हो गया. लकीर इतनी गहरी भी थी कि बाद में कोई चाह कर भी इसे मिटा न सका. अपनी लकीर बनाने-बढाने में, विशेष रूप से तब जब सब आपके ख़िलाफ़ हों, तो परिश्रम का परिमाण भी बढ़ाना पड़ता है. जो अधिकार माँगने या अधिकारों के लिये लड़ने की अपेक्षा कहीं दुष्कर कार्य है. आज जब कोई सामाजिक समरसता की बात करता है, तो प्रायः अपने समाज, धर्म और जाति विशेष के उत्थान की ही बात करता है. मानव या मानवता की बात नहीं. मानवता की बात तो आज भी धर्मगुरु-ज्ञानी-पण्डित-पुरोहित ही कर रहे हैं. ये वो लोग हैं जिन्होंने अपने ही धर्म के कर्म काण्ड को चुनौती दी और समाज के जीवन स्तर को ऊपर उठाने में तन-मन-धन से प्रयास किया. स्वयं को सही सिद्ध करने की जगह दूसरों को गलत सिद्ध करना हमेशा आसान रहा है. भारत की राजनीति यहीं पर सिमट कर रह गयी. जब भी कोई विकास की बात करता है तो हम उसके धर्म-जाति को घसीट लाते हैं. स्थितियाँ ऐसी हो गयी हैं कि तमाम विकास के बाद भी कोई स्वयं को विकसित मानने को तैयार नहीं है. आज जितना भी विकास देखने को मिल रहा है उसका श्रेय उन सभी भारतवासियों को है जिन्होंने अपने-अपने समय में, अपने-अपने स्तर पर भारत के विकास में अपना योगदान दिया. हमारे महापुरुष साझे हैं. उन्होंने देश के लिये काम किया. वे देश की साझी विरासत हैं. 

अभी सामाजिक न्याय पूरी तरह लागू हो ही नहीं पाया था कि हमने उसे शिक्षा के क्षेत्र में भी लागू कर दिया. आप चाहे संगीत पढ़ो या साँख्यिकी सब बराबर. इतिहास और विज्ञान एक ही श्रेणी में तौल दिये गये. यहाँ भी जिनका विज्ञान पढने में मन नहीं लगता था, उनकी संख्या अधिक थी. अधिकारों की माँग वहीं करता है, जिसमें अधिकार देने की क्षमता नहीं होती. नतीजा ये हुआ कि इतिहास या भूगोल या दर्शन शास्त्र की कोई भी टेक्स्टबुक उठा के देख लीजिये, कला संकाय के किसी भी विषय की किताब उठा कर देख लो, पहला चैप्टर उस विषय को विज्ञान सिद्ध करने में लग जाता है. सिस्टमैटिक स्टडी ऑफ एनी सब्जेक्ट इज़ साइंस. और तो और राजनीति शास्त्र को पॉलिटिकल साइंस ही बता दिया गया. और भाषाओं का तो पता नहीं लेकिन संस्कृत और हिन्दी, और भारत की अनेक भाषायें, जिनका उद्गम संस्कृत से हुआ, वो पूर्ण रूप से वैज्ञानिक हैं. कोई उन्हें भाषा विज्ञान की संज्ञा देता है तो उसे सही माना जा सकता है. अंग्रेज़ी-उर्दू का इतिहास हो सकता है लेकिन उन्हें वैज्ञानिक भाषा कहना सही नहीं होगा. 

जिस तरह समाज में हर व्यक्ति की अपनी भूमिका है, उसी तरह सभी विषयों की अपनी उपादेयता है. देश-समाज के विकास के लिये सबका योगदान होता है. विषयों का सहअस्तित्व तो हो सकता है लेकिन किसी विषय की किसी दूसरे विषय पर श्रेष्ठता का निर्णय हास्यस्पद है. बेवकूफ़ी थोडा अपरिष्कृत शब्द है. जिन्हें दसवीं तक आते-आते ये एहसास हो चुका होता है कि आगे गणित और विज्ञान से उनके सम्बन्ध मधुर नहीं रहने वाला, वही लोग दूसरे विषयों के विषय में सोचना शुरू करते थे. कुछ लोगों के निर्णय उनके पिता जी या अब्बाजान उनके पैदा होने से पहले ही ले लेते कि बेटे या बेटी को प्रशासनिक सेवा में भेजना है या राजनीति में. बच्चे को इंजीनियर या डॉक्टर बनाने के सपने पालने वालों की संख्या में भी कोई कमी नहीं है. बीए-एमए, बीकॉम-एमकॉम कराने के बारे में कोई बाप नहीं सोचता. ये सब करके कोई रगड़-घिस के अधिकारी तो बन सकता है लेकिन इन्जीनियर या डॉक्टर बनाने के लिये जातक की विज्ञान में अभिरुचि होनी परम आवश्यक है. पारम्परिक पीसीएम या पीसीबी क्षेत्र में बीएससी या एमएससी करने वालों को भी ये भली भांति ज्ञात रहता है कि हिस्ट्री-ज्योग्रेफ़ी बड़ी बेवफ़ा, रात को रटी सवेरे सफ़ा. कला संकाय के विषय उन्हें वैसे ही दुरूह लगते हैं जैसे कला संकाय वाले को गणित या बायो. विज्ञान के छात्र को लॉजिकल विषयों को तो समझना सरल-सहज होता है, लेकिन रटन्त विद्या पर उनका भरोसा कम रहता है. इस मामले में गणित के विद्यार्थी, बायो वालों को भी रटन्तू ही मानते हैं. इसीलिये इन्जीनियरिंग के छात्र मेडिकल की ओर नहीं देखते और इन्हीं कारणों से मेडिकल वाले इंजीनियरिंग से परहेज करते हैं. यदि हर किसी नॉन-मैथ्स वाले की जीवनी खंगाली जाये, तो बिरले ही मिलेंगे जिन्होंने दसवीं में गणित के अच्छे मार्क्स होने के बाद भी बायो का चयन किया हो. क्योंकि तब तक छात्र को पता चल चुका होता है कि वो तार्किक है या अतार्किक. विषय को समझ सकता है या रट. उसी के अनुसार वो स्वयं या उसके बुजुर्ग, आगे की पढायी के विषय पर निर्णय लेते थे. 

हमारे समय तक कृषि को विज्ञान का दर्ज़ा मिल चुका था लेकिन ये बहुतों को मालूम ही नहीं था. संभवतः इसके बारे में वो ही लोग जानते थे जिनके चाचे-मामे-ताये कृषि विभाग से सम्बद्ध थे. उनका विचार था कि हर्डल रेस चल रही है. और रेस जीतने के दो ही तरीके हैं. या तो मेहनत करके हर्डल के उपर से निकला जाये या कम मेहनत करके हर्डल के नीचे से रेस के अंतिम सिरे पर पहुँचा जाये. जिस भतीजे में विज्ञान के प्रति रूचि होती थी वो पीसीबी में ग्रेजुएशन करना पसन्द करता था. बाकी को बुजुर्गों की नसीहत पर अधिक भरोसा होता था. क्योंकि उनसे पहले वो खानदान-समाज के कितने ही लोगों को तार चुके होते थे. उस समय तक पैसा दे कर इन्जीनियरिंग/मेडिकल की शिक्षा/डिग्री की दुकानें दक्षिण के कुछ राज्यों तक ही सीमित थीं. लिहाजा कृषि विज्ञान स्नातक में प्रवेश एक किफ़ायती विकल्प था. न कोई हर्डल, न कोई कम्पटीशन. किन्तु जब से ये विषय रोजगार गारेन्टी स्कीम के रूप में उभरा है, तब से यहाँ भी मारा-मारी शुरू हो गयी. कम्पटीशन बढ़ा तो हर्डल भी बढ़ा, नतीजा छात्रों की गुणवत्ता भी बढ़ी. किन्तु अभी भी सामाजिक रूप से इसका दर्ज़ा मेडिकल और इंजीनियरिंग के बाद ही आता है. ज्ञान-विज्ञान व्यक्ति को विनम्र बनाता है जबकि अल्प-ज्ञान की परिणति छद्म दम्भ और अहंकार में होती है. ज्ञान समावेशी है जबकि अज्ञान श्रेष्ठता सिद्ध करने में लग जाती है. और इनके लिये न कोई भाषा की गरिमा है, न कोई बात करने का शालीनता. कृषि शोध की अद्भुत समस्या ये है, कि ये कृषि में आने वाली समस्त समस्याओं का समाधान शोध से करना चाहते हैं. जबकि कृषि में अधिकांश समस्यायें इन्जीनियरिंग या प्रबन्धन सम्बंधित हैं. इनका शमन या अल्पीकरण तो सहज संभाव्य है, लेकिन हमारा सारा प्रयास उनके उन्मूलन में लगा है. वो भी इन्जीनियरों को शामिल किये बिना. आज की स्थिति में बस प्रभु से कामना ही कर सकते हैं कि उच्च पदस्थ लोगों को सद्बुद्धि और विवेक प्रदान करे कि एक ही दिशा में वित्तीय प्रावधान भविष्य में कृषि की अन्य शाखाओं-प्रशाखाओं के विकास को प्रभावित करेगा. 

जब से शिक्षा में सामाजिक न्याय लागू हुआ, कम मेहनत कर अधिक मार्क्स पाने वाले विषयों के छात्र भी ज्ञानीयों की श्रेणी में आ खड़े हुये. बीए-एमए वाले भी प्रशासन और प्रबन्धन की डिग्री लेकर डॉक्टर-इन्जीनियर के ऊपर प्रतिष्ठित हो गये. कमोबेश ये स्थिति हर जगह देखने को मिलती है. ऑफ़िस-ऑफ़िस खेल कर भ्रष्ट लोगों ने समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर डाली है. जमीन-मकान या फ़्लैट सिर्फ़ इसलिये महँगे हो गये हैं कि संसाधन सीमित हैं और दो रुपये की चीज़ को लोग दस रुपये में ख़रीदने को तैयार हैं. भ्रष्टाचार से सभी त्रस्त हैं लेकिन इसके निराकरण की उम्मीद समाज सरकार से ही करता है. व्यक्तिगत रूप से तो समाज भ्रष्ट लोगों के समर्थन में खड़ा है क्योंकि बहुमत उन्हीं के पक्ष में है. शासन और सरकार के नुमाइन्दे भी उसी समाज से ही आते हैं.  

एक बीकॉम ड्राप आउट फिल्म मेकर ने शिक्षा में सामाजिक समरसता का बीड़ा उठा रखा है. इंजीनियर्स को टारगेट करके बनी उसकी फिल्म को सुपर-डुपर हिट होना ही था. हर उस व्यक्ति को वो फिल्म अच्छी लगनी ही थी, जिसकी इन्जीनियर बनने की तमन्ना अधूरी ही रह गयी थी. अब उन्हें कौन समझाये कि ये जो मल्टीपल साउंड ट्रैक वाली फिल्में बन पा रही हैं, उसमें भी तकनीक का प्रयोग हुआ है. बल्कि ये कहना उचित होगा इस धरा पर प्राकृतिक चीज़ों के अतिरिक्त जो कुछ भी मानव निर्मित वस्तु दिखायी पड़ रही है, सब तकनीकी लोगों की देन है. इसमें कोई शक नहीं है कि समाज को हर वर्ग, हर विषय की आवश्यकता है. यही विविधता मानव जीवन को बहुआयामी बनाते हैं. कवि - लेखक - गीतकार - संगीतकार - फ़िल्मकार - पत्रकार जीवन को जीने योग्य बनाते हैं, अन्यथा पेट भर खाना और मन भर सोना तो धरती के सभी प्राणियों को मयस्सर है. उसके लिये उनके पास न शोध करने की कोई व्यवस्था है, न कोई वित्तीय प्रावधान. न कोई डराने वाला कि भैंसों की पॉपुलेशन बढ़ गयी तो उनका चारा कहाँ से आयेगा. सारी समस्या का विस्तार तो फंड आकृष्ट करने के लिये है, यदि फंड न मिले तो समस्या ख़त्म. कभी-कभी तो ये शक़ होता है कि यदि विज्ञान न होता तो समस्त मानव जाति बीमारी और भूख के मारे कब की समाप्त हो गयी होती. तब विज्ञान से अधिक वैज्ञानिकों की मन्शा पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है. 

जब कोई कलाकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहा हो तो उसे इस बात का भान होना चाहिये कि उसकी प्रतिभा वृहद् रूप में श्रोताओं के समक्ष पहुँच पा रही है तो उसके पीछे तकनीकी लोगों की एक टीम खड़ी है. कोई विचारक अपने विचार पत्र-पत्रिकाओं-अंतरजाल के माध्यम से दूरस्थ लोगों तक पहुँचा पा रहा है तो उसे ये एहसास होना चाहिये कि ये काम तकनीक के बिना सम्भव नहीं है. जब भी किसी मानव निर्मित वस्तु से आपका सामना हो तो उस तह तक जाने का प्रयास कीजियेगा, वहाँ तक जहाँ किसी तकनीकी व्यक्ति को अपना योगदान देते आप विज़ुअलाइज़ कर पायें. आपके नल में पानी आ रहा हो और सर पर पंखा घूम रहा हो, तो किसी अदृश्य इन्जीनियर को धन्यवाद अवश्य ज्ञापित कीजियेगा. इंटरनेट आ रहा है और एसी चल रहा है, तो कोई तो है जो बिना सामने आये, आपके लिये नौ मन तेल का इंतज़ाम कर रहा है ताकि आपके मन की राधायें बिना किसी व्यवधान के नाच सकें. उन्हें धन्यवाद नहीं दे सकते तो भी चलेगा, लेकिन अपमानित करना सही नहीं है. हो सके तो इस प्रयास से बचियेगा. ये बस एक निवेदन है बाकि उसके आगे, हरि इच्छा.

सभा में लाईट गयी थी, तो गाज तो गिरनी ही थी. वाणभट्ट को इस बात में कोई संशय नहीं था कि वो गिरेगी तो किसी न किसी जिम्मेदार व्यक्ति पर, किसी इन्जीनियर पर.

 -वाणभट्ट 

वैदिक संस्कृति में मानवधर्म - एक समीक्षा

मुझे हमेशा से लगता था कि जीवन जीने की भी कोई कुन्जी (मेड ईज़ी या गाइड) पुस्तक होनी चाहिये थी. हर आदमी पैदा होता है, और अन्त तक बस दुविधा और स...