बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

जालिम जमाना

आजकल लोग बाग कुछ ज्यादा सेंटीमेंटल और इमोशनल होते जा रहे हैं. होना भी चाहिये. पे कमीशन्स लगने के बाद सब आत्म निर्भर जो हो गये हैं. और इसीलिये अलग-थलग भी. जब सब प्रैक्टिकल होने की जुगत में लगे हैं, तो कौन किसके अहम का तुष्टिकरण करे. किसी को कोई चुनाव-वुनाव लड़ना हो तो भले गधेे को बाप बना ले. वर्ना किसी को आपके इमोशन में भला क्या दिलचस्पी हो सकती है. हाँ लेखक और कवि ऐसे प्राणी हैं, जिन्हें यहीं से मसाला खोजना होता है. तो भाई साहब, हमने सोशल मीडिया की किसी विधा या किसी ग्रूप को पकड़ा, तो फिर छोड़ा नहीं.

हर समय तरक्की और विकास की बात करने वाले बिज़ी टाइप के लोग अपना रीड रिसिप्ट ऑफ़ रखते हैं ताकि लोगों को गलतफ़हमी बनी रहे कि बन्दा बहुत व्यस्त है. बीच में मुझे लगा कि लोग मुझे एकदम खलिहर समझ रहे हैं, कि जब देखो तब ऑनलाइन रहता है. तो मैने भी इस सुविधा का उपयोग करने का निश्चय किया. अब मुझमें कुछ-कुछ मिस्टर इंडिया वाली शक्तियाँ आ गयीं थीं. मै ऑनलाइन रहता, और लोग पूछते भाई कहाँ व्यस्त हो आजकल वॉट्सएप्प भी नहीं देखते. फ़ेसबुक पर अपना कोई भी सुराग़ नहीं छोड़ता था. न कोई लाइक, न कोई कमेंट. आदमी परेशान हो जाता है. व्यूज़ तो हज़ार के उपर, पर कमेंट और लाइक दो-चार. नाज़ुक मिजाज़ होने के कारण मुझे दूसरों के दर्द का एहसास बहुत आसानी से हो जाता है. बताईये किसी ने इतनी मेहनत-जतन से पोस्ट या स्टेटस लगाया, और किसी ने उसको तवज्जोह नहीं दी. ऐसे में अच्छे भले आदमी के दिल का टूटना लाज़मी है. मुझे अपने उपर गिल्टी कॉन्शस होने लगा. बताओ किसी का दिल दुखाने का भला मेरा क्या अख़्तियार है. आदमी को कम से कम अपनी नज़र में तो सही होना ही चाहिये. 

अपनी नज़रों में गुनाहगार न होते क्यूँ कर

दिल ही दुश्मन है मुखालिफ़ के गवाहों की तरह 

- सुदर्शन फ़ाकिर

सिर्फ़ और सिर्फ़ इसी उद्देश्य से मैने रीड रिसिप्ट को पुन: ऑन कर दिया. 

अब इसमें और भी बड़ा लफड़ा ये है कि किसी ने दर्द भरा स्टेट्स लगाया और आपने पलट के हाल नहीं पूछा तो उसके दिल की तो वो जाने, आपका दिल, आपकी अंतरात्मा, आपको कचोटना शुरू कर देती है. लगता है बन्दे ने कुछ उट-पटांग कर लिया, तो समाज कल्याण या सुधारक होने का जो दम्भ पाले बैठे हैं, उसका क्या होगा. कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि कॉल किया तो बन्दा खुशमिजाज़ मूड में मिला. बोला डायलॉग अच्छा लगा सो चेप दिया. सबसे ज़्यादा दिक़्क़त तब है जब बन्दा वाकई लो फील कर रहा हो. डर रहता है कि यदि आपने फोन पर उसे पैसिफ़ाइ करने का प्रयास किया तो घण्टे दो घण्टे गये. ऐसा नहीं है कि यार-दोस्तों-रिश्तेदारों के लिये मै इतना समय दान नहीं कर सकता, लेकिन अफ़सोस की बात है कि ये इतने नाशुक्रे टाइप के लोग हैं कि बाद में आप ही के लिये कहते घूमते हैं कि खाली आदमी है, इसे कोई काम नहीं है. फोन लगाता है तो दो घण्टे बरबाद कर देता है. कवि और लेखक होने का एक नुकसान ये भी है कि आपके दिल में तो सारे जहाँ का दर्द है लेकिन ये भाई लोग बड़े प्रैक्टिकल हैं. इन्हें ऐसा बन्दा चाहिये जो इनकी व्यथा सुन के इन्हें हल्का तो कर दे, लेकिन इनकी बात पचा जाये, किसी से कुछ ना कहे. 

बॉस से पीड़ित लोग अक्सर गिरते-पड़ते मुझ नाचीज़ के पास ही आ कर टपकते हैं. उन्हें मालूम है कि कविवर घायल साहब ही उनके उद्गार झेल सकते हैं. उन्हें सांत्वना देने के चक्कर में मुझे भी मजबूरी में संवेदना के दो-चार शब्द कहने पड़ जाते हैं. बॉस को कहे कुछ सम्पुट उनकी घायल आत्मा पर फ़ाहे का काम करते हैं. अब जब रिटायरमेंट की कगार पर हूँ, तब समझ आया कि मेरा अच्छे से अच्छा दोस्त जब मेरा बॉस बनता है तो मुझे ही क्यों सुधारने में लग जाता है. हल्के होने के बाद जब इनका टूटा-फूटा आत्मविश्वास लौट आता है, तो ये ही जा कर बॉस को प्रेषित उन्हीं सम्बोधनों को मेरे नाम से ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर आते हैं. पता नहीं बॉस भी ऐसे लोगों को कैसे टॉलरेट करते हैं. मै तो कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता. उन्हें कमरे से बाहर निकाल दूँ. यदि कभी गलती से मै बॉस बन गया तो ऐसे लोगों की एंट्री ही बैन करवा दूँगा. लेकिन सहृदय लोगों के बॉस बन पाने की सम्भावना नगण्य होती है. उस पर एक दर्द ये भी है कि ऐसे लोग अपने ग़मों से उबरने के बाद पार्टी करते हैं तो हमें ही नहीं बुलाते. कभी-कभी तो लगता है कि इनकी पार्टी में जाने के लिये खाना-पीना शुरू कर दूँ, क्योंकि इनकी शिकायत रहती है कि तुम्हें क्या बुलाना, न खाते हो, न पीते. 

ऐसे लोगों की खासियत ये भी होती है कि इनके पास किसी और के दुखड़े सुनने का न समय है, न जज़्बा. गलती से किसी ने इनके आगे बीन बजानी शुरू कर दी तो यही लोग पॉज़िटिव एटिट्युड पर एक लम्बा लेक्चर पेल देंगे. यदि बन्दा गलती से इनके पास पहुँच जाये, और इनकी सुनने बैठ जाये, तो अपनी शान में इतने कसीदे काढ देंगे कि यकीन मानिये उस बन्दे को डिप्रेशन में जाने से स्वयं ब्रह्मा भी नहीं रोक सकते.

जिन बन्दों के नेटवर्क में मेरे जैसे लोग नहीं हैं, वो जालिम जमाने वाले स्टेटस ऐसे डालते हैं जैसे उन्होंने जमाने के लिये पता नहीं कितना त्याग किया है, लेकिन जमाना उनके किसी काम नहीं आया. बस उन्हें प्रताड़ित करने में लगा है. ऐसे लोगों को मेरी बिना माँगे वाली राय ये है कि पहले आप जमाने के काम आना शुरू कीजिये, फिर स्टेटस भी लगा लीजियेगा. तब वो आपका अधिकार होगा. दूसरा ऑपशन ये है कि मुझ जैसों को अपना दोस्त बनाईये. आपको आपके दर्द का एक साझीदार मिलेगा, और मुझ जैसों को एक कहानी का किरदार. 

- वाणभट्ट

1 टिप्पणी:

  1. सोशल प्लेफ़ॉर्म्स पर लिखने और पढ़नेवाले सज्जनों की सटीक मानसिकता को प्रतिबिंबित किया है। इंटेल्चुअल खोखलेपन के बावजूद कुछ भी लिखना तो है, अस्तित्व का सवाल है।

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