सोमवार, 2 जनवरी 2023

नया साल

एक साल पहले से मुझे पता था कि ठीक एक साल बाद नया साल आने वाला है. नये साल को आना था, तो आया भी. लेकिन जैसा इस साल आया मेरे विचार से ऐसा कभी न आया होगा. दो साल तक कोरोना की दहशत में रहने के बाद, इस बार जनता ने खुल कर नये साल का जश्न मनाया. और शायद ऐसा मनाया जैसा मेरी याददाश्त में कभी न मनाया गया होगा. ऐसा लग रहा था कि अब न मनाया तो फिर ये मौका मिले न मिले. कोरोना मुहाने पर टहल रहा है. बस सरकार के मोहर लगाने की देर है, फिर चेहरा मास्क के पीछे.

पहली तारीख़ को हर साल की तरह इस बार भी ठंड अपने चरम पर थी. ऊँचे पहाड़ों पर हुयी बर्फ़बारी ने मैदानी इलाकों की गलन को बढ़ा दिया था. 31 दिसम्बर की रात तो ठंड भगाने के जितने इन्तजाम सम्भव थे, सब उपलब्ध थे. मेरा मतलब अलाव, मूँगफली, गज़क, डीजे, डांस और म्यूज़िक से था. आपने कुछ और समझा तो सही ही समझा होगा. वही तो मेन फैक्टर है हर एंजॉयमेंट के पीछे. जब भी जहाँ भी चार यार मिल जायें तो फिर नये साल का इन्तज़ार कैसा. सारे क्लब-होटल-रेस्टोरेंट रौशन हो रखे थे. नया साल एक ऐसा त्योहार है जिसमें किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं है. जिसका मन जैसे करे वैसे मनाये. बल्कि इसे त्योहार कहना भी ठीक नहीं है. ये तो मौका है आज़ादी का, लिबर्टी का. कुछ भी करो घर वालों को जस्टिफाई करने की ज़रूरत नहीं है. सब सही-गलत नये साल के जश्न के नाम.

हमारे देश की एक अच्छाई है कि हमारी अन्तरात्मा सदैव जागृत रहती है. हम लोग नैतिक रूप से कभी भी गलत नहीं करते, न ही करना चाहते हैं. गलती हो भी जाये तो गलती मानने का तो कतई कोई रिवाज़ नहीं है. तभी तो एक ही मुद्दे पर पक्ष जितनी ज़ोरदार दलील देता है, विपक्ष उतने ही दमदार तरीके से उसका विरोध करता है. कई बार तो ये शक़ होता है कि ये पक्ष-विपक्ष की नूरा-कुश्ती सिर्फ़ जनता को दिखाने के लिये है. रात को जितना जश्न मनाया जाता है, उसका हैंगओवर उतारने के लिये उसकी दोगुनी भक्ति हावी हो जाती है, अगले दिन यानि एक जनवरी को. 

उम्र के जिस पड़ाव से गुजर रहे हैं उस में नैतिकता का ठेका अपने आप आपके सर पर थोप दिया जाता है. और बच्चों के सामने आदर्श रखने के इरादे से इस मुलम्मे को हम सहर्ष ओढ़ भी लेते हैं. रात जब पड़ोस में कुछ छड़े म्यूज़िक के फुल वॉल्यूम पर नये साल की मौज कर रहे थे, तो हमको मिर्ची लगना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी. धीरे से कुछ बड़बड़ाया ही था कि कंधे से ऊपर निकल चुके बच्चे ने रिमोट बढ़ा दिया - पापा आप दूरदर्शन लगा लो. मैं जरा दोस्तों से मिल के आता हूँ. दिल्ली के पंजाबियों ने और कुछ किया हो या न किया हो लेकिन हम यूपी वालों की हिन्दी भ्रष्ट कर दी है. बच्चों को 'लीजिये' की तुलना में 'लो' बोलना ज़्यादा सुविधाजनक लगता है. मैने जाना है, आपने खाना है, टाइप की हिन्दी सुनते ही रोम-रोम सुलग जाता है. मै कुछ कह पाता उससे पहले जनाब मुझे रिमोट थमा कर निकल लिये. 

रोज की तरह मेरा सवेरा सुबह पाँच बजे हो चुका था. चूँकि मैं रोज की तरह समय से सो गया था, तो मेरा सवेरा तो जल्दी होना ही था. कड़कड़ाती ठंड में टहलने सिर्फ़ इस लिये निकल गया कि साल के पहले दिन की शुरुआत हेल्दी होनी चाहिये. सात बजे तक जब लौट के आया तो घर में जागृत अवस्था के कोई लक्षण नहीं थे. पता नहीं माँ-बेटी-बेटा रात में कब सोये. बहरहाल घर में घुसते ही सबको खड़खड़ा दिया. आज पहली तारीख़ है सब जल्दी से नहा-धो कर तैयार हो जाओ मंदिर चलेंगे. जैसी उम्मीद थी रिस्पॉन्स बहुत ठंडा सा मिला लेकिन कभी कभी मैं याद दिलाने की कोशिश करता रहता हूँ कि बाप मै ही हूँ. 

फिर भी ब्रंच करते-करते ढाई-तीन तो बज ही गये थे. इस बार सन्डे होने के कारण घर वालों ने मेरी लम्बी पूजा-ध्यान का भरपूर ख्याल रखा. सब तैयार हो गये थे. निर्णय ये हुआ कि घर से दूर शहर के बाहर हाइवे से कुछ हट के एक मन्दिर है, वही चलते हैं. वहाँ अब तक जाना नहीं हो पाया था. 25-30 किलोमीटर की दूरी तय करके शहर की भीड़-भाड़ से जूझते हुये घण्टे-सवा घण्टे में जब हम हाइवे के उस मोड़ तक पहुँचे जहाँ से मन्दिर के लिये मोड़ था. दृश्य हमारी कल्पना से परे था. कारों की जितनी लम्बी कतार उस सड़क पर घुसने को आमादा थीं, उससे लम्बी लाइन निकलने वाली कारों की दिख रही थी. कोई सहज ही अंदाज लगा सकता था कि मन्दिर प्रांगण में पार्किंग का क्या हाल होगा. कुछ देर कार की लाइन में लगने के बाद हमने निर्णय किया कि आगे हाइवे पर एक और मन्दिर पड़ता है, वहाँ पार्किंग की दिक्कत नहीं होनी चाहिये. सो गाड़ी मेन हाइवे पर आगे बढ़ा दी. वहाँ भी हाइवे के किनारे कारों की लाइन लगी थी. और मन्दिर में भी श्रद्धालुओं की अच्छी-खासी लाइन थी. फाइनली हमने रोड से ही अनन्य श्रद्धा के साथ भगवान को प्रणाम किया और वापस घर के लिये गाड़ी मोड़ दी. 

अब तक शहर का जाम अपने पूरे शबाब पर था. सभी लोग अपनी-अपनी तरह से नये साल के पहले दिन को सेलिब्रेट करने निकले थे. जाम से बचने के लिए किन-किन गलियों और रास्तों से हमें गुजरना पड़ा, राम जाने.  चार घण्टे और अस्सी किलोमीटर की ड्राइव करके हम अपने घर के पास वाले मन्दिर में बाबा के सामने खड़े थे. भीड़ यहाँ भी रोज की अपेक्षा कुछ ज़्यादा थी. लेकिन दर्शन के लिये धक्का-मुक्की नहीं थी. 

-वाणभट्ट 


3 टिप्‍पणियां:

यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...

भला जो देखन मै चला

कबीर दास ने बुरा देखने का प्रयास किया था और उसका अन्त ख़ुद उन्हीं पर हुआ. वो अन्तर्ज्ञान का युग था. आज का युग बहिर्ज्ञान का है. हर कोई दीदे फ...