रविवार, 9 मार्च 2014

सहअस्तित्व 

जीवन है
किसी भी तरह की
मुक्ति के विरुद्ध

इस काल्पनिक लालसा ने
कर दिया चिंतन 
अवरुद्ध

हर कोई चाहता है मुक्ति
बंधन से मुक्ति
उत्तरदायित्वों से मुक्ति

पर क्या सम्भव है जीवन
बिन
बन्धन

सहअस्तित्व है आधार जीवन का 
सामंजस्य है विपरीत ध्रुवों का

द्वैत
ही तो है
सर्वत्र व्याप्त

तप्त सूर्य और शीतल धरा
चुम्बक का उत्तरी-दक्षिणी सिरा
धनावेश-ऋणावेश
सकारात्मक-नकारात्मक
परमाणु का इलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन
सभी पदार्थ में है अणुओं का बंधन
अलग है फ्री रेडिकल्स की कथा
अल्पायु है,
चिपक लिया यदि कोई खाली मिला

सन्यासी ने जाते हुये 
न देखा मुड़ के
सन्यास भी मिलता है
किसी अज्ञात से जुड़ के

अद्वैत है
तो द्वैत भी है
दो है तभी अलग हैं
तभी जुड़ेंगे
अद्वैत बनेगा   

अकेले को सदैव खोज रहेगी
जो केवल मिल के ही पूरी होगी

विपरीत में है नैसर्गिक सामंजस्य
एक-दूसरे के पूरक
सबकी प्रकृति है पृथक
फिर क्यूँ भटकते हैं मुक्ति के लिए
जो बँट रही है अनायास
और
मिल जाती है बिन प्रयास

दृष्टि न कर सकेगी श्रवण
स्वाद-सुगंध के लिए हैं भिन्न अंग
सहअस्तित्व के लिये नहीं आवश्यक युद्ध-वृत्ति
गढ़ रक्खी है प्रकृति ने,
सहज प्रवृत्ति

सामाजिक विषमताओं 
और 
अधिकार के लिये
तो युद्ध होना चाहिये
पर श्रेष्ठता को मापना
अब बंद होना चाहिये

मुक्ति में नहीं है जीवन
किन्तु
बंधन से ही मुक्ति है सम्भव

दूसरे के बिना पूरक,
आधा और एकाकी है, 
है ना!!! 

- वाणभट्ट
 

18 टिप्‍पणियां:

  1. हर दिन लगता है कि कुछ और खोजना है।

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  2. सहअस्तित्व के लिये नहीं आवश्यक युद्ध-वृति ...बिलकुल सच लिखा है. सुन्दर रचना.

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  3. बहुत सार्थक और गहन अभिव्यक्ति...

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  4. मुक्ति तो सूर्य पृथ्वी को भी नहीं ... इश्वर को भी नहीं ... मनुष्य को भी नहीं ...
    फिर इसकी बात भी तो बंधन है ...

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    1. इसीलिये सहअस्तित्व की बात हो रही है...बन्धन की...मुक्ति की नहीं...

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  5. कितना सुंदर सन्देश है .... शांतिपूर्ण सहअस्तित्व ही आधार हो सकता है ....

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  6. प्रतिदिन है एक नया सवेरा ।
    रात ले गई तमस अन्धेरा ॥

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  7. इस सत्य को जानने के बाद भी किस अहंकार की घोषणा में सब लगे रहते हैं ?

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    1. सत्य वचन...विषमतायें मानव निर्मित हैं...इन्हें तो दूर होना ही चाहिये...सारी लड़ाई अहम् की है...हर कोई लगा है अपने अहम् के पोषण में...

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  8. बंधनों में जीवन है ....और मुक्ति में कुछ नहीं !!

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    1. ये बात गुरुदेव आपने काफ़ी पहले कह दी थी...मेरी ट्यूब अभी जली है...

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  9. मुक्ति और बंधन पर मंथन तो सनातन काल से है... ये चलता रहेगा...
    पोस्ट यकीनन बेहद उम्दा है...

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  10. मुक्ति में नहीं है जीवन किन्तु
    बंधन से ही मुक्ति है सम्भव...!

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  11. बिलकुल सच लिखा है. सुन्दर रचना.

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  12. पर क्या सम्भव है जीवन
    बिन
    बन्धन
    बिलकुल सच लिखा है. सुन्दर रचना.

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यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...