रविवार, 21 सितंबर 2014

निज भाषा बनाम राष्ट्र भाषा  


पंडित जी ने हिकारत से अपनी टूटी चप्पल कल्लू मोची की ओर फेंक दी। 'रे कलुआ, जरा दू ठो टाँका मार दे।' कल्लू तन्मयता से कुछ काम कर रहा था। चप्पल धप्प से उसकी निहाई के बगल में  गिरी। उसने सर उठाया और गुस्से को पीते हुए पंडित को तरेरा। बोला कुछ नहीं। फिर घिसी-पिटी चप्पल को देखने लगा। बोला 'पंडित जी दू रुपया लागी।' पंडित जी के आग लग गयी। 'कस में अब हमहू का पैसा देबे के पड़ी।' 'तो फिर खुदै टाँक लो।' कह के कल्लू अपने काम में लग गया।



बिसेसर ने एक झटके से बाल्टी कुएं में डाल दी और पानी खींच रहा था जब किसी ने पीछे से उस पर लाठी का प्रहार किया। 'सरउ तुम्हार ई हिम्मत कि ठकुरन के कुआँ से पानी लेबो।' बिसेसर रस्सी-बाल्टी छोड़ के मारने वाले से भिड़ गया। 'तुम्हार कुल ठकुरई घुसेड़ देबै।' तब तक कुछ और लठैत आ गये। पीट-पीट के भुरकस भर दिया और हाते के बाहर फेंक दिया। लेकिन बिसेसर ने गाँव में चिंगारी सुलगा दी थी।



'लाला मेरे बाप के बाप ने ऐसा कौन सा कर्जा लिया था कि सूद चुकाते-चुकाते मेरा बाप निपट गया। अब भी मूल जस का तस है। मै कुछ नहीं देने वाला।' लाला तैश में आ गया। 'सूद तो तेरे फ़रिश्ते भी चुकायेंगे। जानता नहीं मेरा खाता यमराज का खाता है। मरने पर ही ख़त्म होता है।' घसीटे का हाथ लाला के गिरहबान तक पहुँच गया।'बोल कब पहुंचा दूँ यमराज के पास। काट मेरा नाम अपने खाते से।' युवा खौलता खून देख के लाला की आत्मा काँप गयी।



आज़ादी के अड़सठ वर्ष बाद हम अपनी उस स्वतंत्रता पर गर्व कर सकते हैं जो अंग्रेजों की गुलामी से मिली। लेकिन हज़ारों-लाखों ऐसी छोटी-बड़ी लड़ाईयाँ भी लड़ीं गयीं जिनकी कभी चर्चा तक नहीं हुयी। पर इन्ही लड़ाइयों ने भारतीय समाज को वो स्वरुप दिया जो आज हमारे सामने है। दीन और निर्धन व्यक्ति भी आज अपनी अस्मिता को लेकर जागरूक हो गया है। जो सपना भारत के नीति-नियंताओं ने देखा था उसने कब मूर्त रूप ले लिया पता ही नहीं चला। आज मज़दूर और कामगार के साथ भी लोग न्यूनतम शिष्टाचार का पालन करते हैं।उन्हें इस बात का भान है मात्र पैसे से आदमी को अब क्रय नहीं किया जा सकता। स्वतन्त्रता स्वतः नहीं मिलती। इसके लिये हर देश में हर पीढ़ी को मोल चुकाना होता है। बहुत से लोगों ने समाज में व्याप्त कुरीतियों-असमानता को दूर करने के लिये लम्बी लड़ाई लड़ी है। कहावत रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ था, हर देश-काल में सत्य सिद्ध हुयी है। आज हम जिस भी सामाजिक उन्नति को देख रहे हैं उसके लिए अनेकानेक उच्च-निम्न-निर्धन-धनाढ्य समाज सुधारकों का त्याग और बलिदान शामिल है। ये सूची अंतहीन है और इसी सूची में कल्लू-बिसेसर-घसीटे के नाम मिल जायेंगे। बहुत कुछ हो चुका लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अभी भी सर्वत्र विषमताएं अनायास दीख पड़तीं हैं। किन्तु जिस दिशा में देश बढ़ चुका है, निसंदेह वो दिन अवश्य आएगा जब स्वतन्त्र भारत का प्रत्येक नागरिक वर्षों पुरानी सामाजिक विषमताओं से मुक्त होगा। नयी विषमताएं भी निर्मित हो सकतीं हैं, किन्तु कम से कम पुरानी से तो छुटकारा मिलेगा। 

प्रति वर्ष जब हिंदी पखवाड़े का शुभारम्भ होता है तो भारत की भाषायी स्थिति भी मुझे सामाजिक स्थिति से अलग नहीं दिखती। साल में पन्द्रह दिन तो हिंदी-प्रयोग के प्रोत्साहन हेतु कार्यक्रम होंगे, उसके बाद ठन-ठन गोपाल। विद्वत सभाओं में हिन्दी का मर्सिया पढ़ा जायेगा। कुछ केले और समोसे डकार के लोग फिर अंग्रेजी के गुणगान में लग जायेंगे। वही ढाक के तीन पात वाली बात। वर्षों की पराधीनता ने हिन्दी ही नहीं देश की समस्त भाषाओँ की नीँव को हिला के रख दिया है। हर कोई अंग्रेजी भक्त बना घूम रहा है। अंग्रेज़ी आज भी प्रशासन और राज-काज की भाषा बनी हुयी है। कभी हाथी माने एलिफैंट हुआ करता था अब एलिफैंट माने हाथी बताने पर अभिवावक तीन वर्षीय बालक को दिए अपने अंग्रेजी ज्ञान पर आत्म-विभोर हो जाते हैं। शिक्षा के लिए अभी भी हमारे छात्रों को विदेशी भाषा पर निर्भर रहना पड़ता है। विज्ञान और वैज्ञानिक उपलब्धियाँ अभी भी मान्यता प्राप्त करने के लिये पश्चिम की ओर देखने को विवश हैं। अधिकांश शोध जब विश्व बैंक द्वारा प्रदत्त ऋण पर निर्भर है तो शोधपत्रों का प्रकाशन तथा प्रतिवेदन भी अंग्रेजी भाषा पर ही तो निर्भर रहेगा। भारत उन्नति के जो स्वप्न आज विदेशी निवेश से देखे और दिखाए जा रहे हैं। वो हमारे ज्ञान और क्षमता पर प्रश्न चिन्ह खड़े करते हैं। हम अपने देश में स्वाधीनता के बीज बोना चाहते हैं विदेशी तकनीक और विदेशी ज्ञान के आधार पर। हमारी नयी पौध द्वारा हिन्दी के स्थान पर हिंग्लिश का प्रयोग एक सुखद अहसास तो देता है। परन्तु हम अंग्रेजी में पारंगत न हो सके और अपनी राजभाषा हिन्दी भी हाथ से जाती रही। स्थिति त्रिशंकु जैसी है। न घर के न घाट के। 



किन्तु हमारी मिटटी में कुछ बात तो अवश्य है कि परिस्थितियां कितनी भी विषम रहीं हों, अनेक प्रयासों के बाद भी कोई हमारी हस्ती को मिटा नहीं पाया। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए भी बहुत संघर्ष हुए हैं। तब जा कर हिन्दी को बहुत पहले सितम्बर १४, १९४९ राजभाषा का अधिकार मिला है। किन्तु तब से ये दिन हिन्दी दिवस के रूप में औपचारिकता बन के रह गया है। इस दिवस की घोषणा के लिए भी काम पापड़ नहीं बेले गए होंगे। जितने लोगों ने स्वतंत्रता के लिए झंडे गाड़े होंगे उतने ही लोग हिंदी के लिए समर्पित हुये होंगे। किसी ने हिंदी में शपथ ली होगी तो किसी ने हिन्दी के प्रोत्साहन के लिये पर्चे बाँटे होंगे। किसी हिन्दी में शोध-प्रतिवेदन लिख डाला तो किसी ने अंग्रेज़ी स्कूलों का बहिष्कार किया। किसी ने अंग्रेजी सभा में अंग्रेजी बोलने से मना कर दिया तो किसी ने हिन्दी भाषा में व्यावसायिक परीक्षा के प्रश्नों के उत्तर लिख डाले। हिंदी के लिए आंदोलन भी हुए और जलसे भी। तब जा कर बात पखवाड़े पर सहमति बनी होगी। हम अपनी बोल-चाल, चाल-ढाल, जाति-धर्म के प्रति इतने संवेदनशील हैं कि उसके लिए हम मरने-मारने-आंदोलन-फतवे-जिहाद सब के लिए तैयार हैं, किन्तु देश के लिये मरने का काम भगत सिंहों और चंद्रशेखर आज़ादों के लिये छोड़ रखा है। जितनी सम्वेदना अपनी भाषा को लेकर है उतनी यदि देश के प्रति होती तो अँगरेज़ कितने दिन यहाँ ठहर सकते थे। किन्तु उन्होंने हमारी विषमताओं को हवा दी। देश को भाषा-धर्म-जाति के आधार इस तरह बाँटा कि स्वतन्त्रता के अड़सठ साल में भी हम उन्हीं विवादों में अटके हुए हैं। अनेकता में एकता यदि है तो क्या देश हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान पर एक नहीं हो सकता। हिन्दू से मेरा अभिप्राय हिंदुस्तान के नागरिकों से है। किन्तु ये सहज बात भी विवाद बन जाती है। और यही बात हमारे देश-प्रेम पर प्रश्नचिन्ह खड़े करतीं है। हिन्दी पखवाड़ा कब हमारे जीवन को रूपांतरित करेगा, हर हिंदी प्रेमी उस दिन की उत्कंठा पूर्वक प्रतीक्षा कर रहा है।



स्थितियाँ कितनी भी विषम क्यों न हों, किन्तु बादलों के उजले किनारे चमक रहे हैं। सभी देशी और विदेशी भाषा साहित्य, और चलचित्र आज अनुवाद और डबिंग के माध्यम से हिन्दी भाषियों को सहज उपलब्ध है। सभी विदेशी कम्पनियाँ अपने उत्पादों का विज्ञापन हिन्दी भाषा में कर रही हैं। विदेशी खेल और समाचार चैनेल हिन्दी में कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं। कारण व्यावसायिक हो सकते हैं किन्तु इन कंपनियों के विपणन सर्वेक्षण इन्हें हिन्दी में प्रचार-प्रसार के लिए बाध्य करते हैं। यह एक शुभ संकेत है। आशा के स्वर और भी मुखर हो जाते हैं जब देश के प्रधानमन्त्री और मन्त्री विदेशी भूमि पर अपनी बात बुलंदी के साथ हिन्दी में रखते हैं। हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी के उत्थान के लिये पखवाड़े मनाना कहाँ तक उचित है यह वाद-विवाद का विषय हो सकता है। किन्तु इन क्षेत्रों में गैर-हिंदी भाषी को प्रोत्साहित करना हिंदी दिवस मनाने का एक प्रयोजन अवश्य होना चाहिये। अहिन्दी-भाषी प्रदेशों में हिन्दी के विकास हेतु इस पखवाड़े का महत्त्व बढ़ जाता है। साल में मात्र पंद्रह दिन एक भाषा का प्रयोग करके हम एक भाषा में निपुण नहीं हो सकते, न ही उस भाषा से प्रेम कर सकते हैं। काश कि हम इन प्रदेशों में हिन्दी-वर्ष मनायें। देश के सभी महान विचारकों ने हिन्दी को भारत को जोड़ने वाली भाषा कहा है। थोड़े सरकारी सहयोग, प्रोत्साहन और जन-अभियान से वो दिन दूर नहीं जब हिन्दी को राष्ट्रभाषा का पद प्राप्त होगा।



सामाजिक सरोकारों के लिये जिस तरह कल्लू, बिसेसर और घसीटे जैसे अज्ञात लोगों ने छोटी-छोटी किन्तु निर्णायक लड़ाइयां लड़ीं। वैसी ही लड़ाईयां हिन्दी के लिए भी लड़ीं जा रहीं हैं। एक प्रश्न मैं सदैव पूछता हूँ कि यदि आज अँग्रेज़ों का राज होता तो हम किस तरफ होते। जिस दिन हम अपनी अस्मिता को भाषा और देश की अस्मिता से जोड़ देंगे हिन्दी विश्व-पटल पर राज करने के लिये सक्षम हो जायेगी। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा बनाने के लिये हमें क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठना होगा। एक राष्ट्र भाषा, जो विश्व-भाषा बनने का सामर्थ्य रखती हो, के लिये सम्पूर्ण देश को एकमत होना होगा। अन्यथा पखवाड़े का अंत भी वही होता रहेगा जैसा हमारे देवी-देवताओं का होता है। कुछ दिनों के लिये प्राण-प्रतिष्ठा फिर विसर्जन। 


भारतेंदु जी की पीड़ा इन शब्दों में सहज अभिव्यक्त होती है "निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल, बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल।" वो भी सन १८७० के आस-पास। संघर्ष जारी है और रहेगा, हिन्दी के हिन्द की जन-भाषा बनने तक। फिर इसे राष्ट्र-भाषा बनने से कोई रोक नहीं सकता।   



- वाणभट्ट      

सोमवार, 18 अगस्त 2014

कृष्ण चेतना से 

शरशय्या पर लेटे लेटे पितामह मुस्करा रहे थे। दर्द असह्य था। किन्तु अनायास मुस्कराहट का आ जाना अकारण नहीं हो सकता। कृष्ण ने इसे भाँप लिया। बोले पितामह इस कष्ट साध्य स्थिति में कोई विलक्षण व्यक्ति ही आनन्दित हो सकता है। क्या मै आपके आनन्द का कारण पूछ सकता हूँ। 

पितामह ने गम्भीर होने का प्रयास किया किन्तु बरबस हँसी छूट गयी। बोले कृष्ण तुमसे क्या छिपा है। तुम्हारी माया तुम ही जानो। पर एक बात बताओ पाण्डव जिन्होंने सम्पूर्ण जीवन धर्म और धर्म की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया, उनके जीवन में कभी कष्टों का अन्त नहीं हुआ। जबकि तुम सदैव उनके साथ रहे हो। और कौरव जो अन्याय और अधर्म में जीवनपर्यन्त लगे रहे, उनका अधिकांश जीवन सुख और वैभव में बीता। किसे लाभ हुआ और किसे हानि इसी का आँकलन कर के मै मुस्करा रहा था।

कृष्ण अपनी चिरपरिचित शैली में मुस्कराये। पितामह प्रभु ने मनुष्य को धर्म-अधर्म के आँकलन का अधिकार नहीं दिया है। ये अधिकार उसके पास सुरक्षित है। और मनुष्य है कि न्यायधीश बना फिरता है। हर काल में द्वैत रहा है। धर्म की स्थापना के लिये अधर्म आवश्यक है अन्यथा धर्म अपना अर्थ खो देता। दुःख के बिना सुख का अस्तित्व क्या रह जायेगा। और भगवान भी आदमी की तरह ही स्वार्थी होते हैं वो चाहते हैं कि मनुष्य उनकी बनायीं सृष्टि के लिए उन्हें स्मरण करता रहे किन्तु मनुष्य है कि सुख आते ही सबसे पहले प्रभु को भूल जाता है। सफलता का सारा श्रेय तो स्वयं लेने लगता है। और असफलता प्रभु के ऊपर थोप देता है। 

इस सृष्टि का प्रत्येक अवयव प्रभु की एक सर्वोत्कृष्ठ रचना है। यदि मनुष्य को कोई छोटा सा उपहार देता है तो वो धन्यवाद ज्ञापित करना नहीं भूलता। और प्रभु मानव को जितने अमूल्य उपहार सहज रूप से उपलब्ध करा दिए हैं उसके लिए धन्यवाद प्रेषित करने का उसके पास समय नहीं है। इसलिए प्रभु को सुख-दुःख का चक्र चलाना पड़ता है। वैसे भी ई सी जी यन्त्र में कौन सीधी लाइन देखना चाहता है। जब तक रेखा ऊपर-नीचे हो रही है जीवन चल रहा है। पितामह ने कन्फूज़ हो कर पूछा - ये ई सी जी यन्त्र क्या है। पितामह इसे जानने के लिए आपको कलियुग में पुनः धरती पर आना पड़ेगा। आप बस ये समझ लीजिये कि इसके द्वारा आपकी नाड़ी की गतिविधि को चित्रित किया जा सकेगा। इसलिये धर्म-अधर्म दोनों प्रभु की ही रचना है। इसका संतुलन बनाये रखना उनका काम है। जो हो रहा है सही हो रहा है और जो होगा सही ही होगा। इस पूर्णरूपेण आदर्श स्थिति में परिवर्तन की सम्भावना नहीं है।

विपरीत परिस्थियों में भी जो धर्म का साथ न छोड़े, वो सदैव मुझे अपने साथ पायेगा। 

- वाणभट्ट 

रविवार, 10 अगस्त 2014

गंगा सेवा


पण्डित दीना नाथ मिश्र गंगा मइया की ओर गहन चिन्तन में डूबे निहार रहे थे। पीछे से आती जलते माँस की तीक्ष्ण गन्ध उन्हें विचलित कर रही थी। ऐसा नहीं था कि उनका श्मशान आना पहली बार हुआ हो। कई बार वो पहले भी इस भूमि पर आ चुके थे। यहाँ आ कर ही आत्म-ज्ञान मिला जीवन की क्षण-भंगुरता का, संसार की निस्सारता का, शरीर की नश्वरता का। पर आज मन कुछ ज्यादा उद्विग्न था।

पहली बार उनका क्रिया में आना अपने बाबा की मृत्यु के कारण हुआ। अपने पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़े दीना नाथ जी जन्म वाराणसी के असी घाट के पण्डित रामाधार मिश्र के यहाँ हुआ। उनके पिता और बाबा कथा वाचन से जीविकोपार्जन करते। सबसे बड़ा होने के कारण पण्डित दीना नाथ की शिक्षा-दीक्षा बाबा और पिता जी के कठोर नियंत्रण में हुयी। सूर्योदय से पहले उठ कर गंगा स्नान से उनके जीवन की शुरुआत हुआ करती। कर्म-काण्ड और कथा वाचन  के सारे गुर उन्हें सहज उपलब्ध थे। जिसने अनियंत्रित जीवन का एक दिन भी न देखा हो उसे नियंत्रण की कठोरता तनिक भी आभास नहीं होगा। कम उम्र में ही उनकी पंडिताई के चर्चे होने लगे थे। उस समय उनकी स्थिति एक रट्टू तोते से ज्यादा नहीं थी। बाहर से थोपा ज्ञान आजतक कभी किसी के काम नहीं आया। ज्ञान का उद्भव तो अंतर में होता है। धीरे-धीरे उन्हें समझ आ गया ये सारा ताम-झाम जीविका अर्जित करने के साधनों से अधिक नहीं है। इस सारी तपस्या का सार था दो वक़्त की रोटी। उन्होंने जीवन में अपने पिता और बाबा की तरह जब और कुछ नहीं सीखा तो उन्हें भी जीवन-यापन के लिए इसी विधा का सहारा लेना पड़ा। कर्म-काण्ड, वेश-भूषा, आचार-व्यवहार सब नाटक करते-करते कब जीवन का हिस्सा बन गये  दीना नाथ जी को इसका पता ही नहीं चला। गंगा मइया और भगवान में आस्था इतनी गहरे पैठ गयी की पूरा जीवन प्रभु-चरणों में समर्पित हो गया। धैर्य का स्तर इतना बढ़ गया कि हर होनी-अनहोनी में प्रभु की इच्छा ही दिखाई देती।

बाबा का शव अंतिम यात्रा करते हुये मणिकर्णिका घाट पर चिता में लगाया जा चुका था। कल तक प्रभु प्रेम से उल्लसित रहने वाले बाबा का मुख अभी भी अनन्त शांति विस्तारित कर रहा था। पिता जी डोम से अग्नि लेने गए हुये थे। रिश्ते-नातेदार को, जो कल तक बाबा के प्रिय और करीबी थे, अंतिम क्रिया की बहुत जल्दी थी। एक ने कहा बेटा देखो पण्डित जी कहाँ रह गये। सीढियाँ चढ़ के जब ऊपर पहुंचे तो देखा पिता जी डोम के आगे गिड़गिड़ा से रहे थे। अग्नि का एक कोयला देने के लिये वो जो मूल्य मांग रहा था उसे देने में उनकी असमर्थता डोम की समझ नहीं आ रही थी। इस तिमाही उसे ठेका तीस हज़ार में मिला था। अगर वो इसी तरह सब पर दया करता रहा तो कमायेगा क्या। यहाँ वैसे भी कोई रोज-रोज तो आता नहीं कि फिर वसूल लें। डोम ने एक दृष्टि सद्यवयस्क दीना नाथ पर डाली और अँगीठी से जलता हुआ एक अंगार कुशा पर रख दिया।

तेरहवीं के बाद पिता जी ने एक दिन समझाया। बेटा पैसा पश्चिम में है। पूरब में तो यजमान अपने ही दारिद्र्य से उबर नहीं पा रहा है। थोड़ा बहुत पुण्य कमाने के लिये हम जैसे पंडितों को दान-दक्षिणा दे देता है। इससे भरण-पोषण तो हो सकता है किन्तु समय-असमय के लिये धन संचय की सम्भावना नहीं के बराबर है। तू अपने काम में निपुण है। गुणग्राही लोग तेरी विद्या का आदर करेंगे। तेरे सामने पूरा जीवन पड़ा है। यहाँ से बाहर निकल। बिठूर में अपने बनारस के एक मित्र हैं तू उनके पास चला जा। गंगा मइया तुम्हारा कल्याण करेंगी।

पिता की आज्ञा को भगवान सन्देश मान दीना नाथ जी बिठूर आ गये। और यहीं के हो कर रह गये। कालांतर में उनका विवाह हुआ और दो पुत्र रत्नों की प्राप्ति भी। गंगा-स्नान, कर्म काण्ड और कथा वाचन उनके जीवन अभिन्न अंग बन चुके थे। किन्तु उन्होंने बच्चों को कर्म-काण्ड से विरत रख समीप के सरकारी विद्यालय में शिक्षा दिलाई। कथा वाचन की उनकी प्रतिभा के कारण उनका नाम कानपुर में काफी प्रसिद्ध हुआ। कुल मिला कर यहाँ उनकी स्थिति पिता जी की तुलना में कुछ बेहतर थी। एक एल आई जी मकान और बच्चों की बंगलौर और पूना में नौकरी इससे ज्यादा उन्होंने ईश्वर से माँगा होता तो शायद वो मना न करता। पर धैर्य के धनी दीना नाथ जी  इतने से ही संतुष्ट थे। उनके लिये सब गंगा मइया का प्रसाद और बाबा-पिता जी के आशीर्वाद से ज्यादा कुछ नहीं था। बच्चों के नौकरी में आ जाने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो चली थी। किन्तु पैसे का आनन्द लेने वाली प्रवृत्ति के लिए उम्र निकल चुकी थी। बीवी और बच्चे कभी-कभी उनकी इस पंडिताई का उपहास भी उड़ाते। पंडित जी के कर्म-काण्ड में रत्ती भर बदलाव की कोई सम्भावना नहीं थी।

आज सुबह-सुबह खबर आई कि एक यजमान नहीं रहे। उम्र कोई चालीस की रही होगी। पण्डित जी अपनी मोपेड ले, लाश के अस्पताल से आने के पहले वहाँ पहुँच चुके थे। यजमान की पत्नी बेसुध पड़ीं थीं। बच्चे छोटे ही थे। नाते-रिश्तेदारों को खबर कर दी गयी थी। कुछ लोग पहुँच भी गए थे। पास-पड़ोस, मोहल्ले के कुछ लोग भी खड़े थे। एम्बुलेंस वाला पैसे माँग रहा था। जो रिश्तेदार आये थे वो दूर के थे और जेब में हाथ डालने को तैयार नहीं। ये थोड़ा कम सोशल व्यक्ति थे। कथा में इनके यहाँ आने वालों की संख्या कम ही रहती, इसलिए पण्डित जी को दक्षिणा भी कम मिलती। पड़ोसियों को भी घर की आर्थिक स्थिति का भान हो रहा था। पण्डित जी ने पड़ोसियों आह्वाहन किया कोई एम्बुलेंस का पैसा दे दे। एक ने कहा हम लोग ऑफिस निकल रहे हैं पण्डित जी आप भी निकल लो। खामख्वाह बड़ी अम्मा बनने की ज़रूरत नहीं है। घर वाले आ ही रहे होंगे। हम सीधे घाट पर पहुँच जायेंगे। रुकेंगे तो एक छुट्टी खराब होगी। ऐसी परिस्थिति में वहां से निकल जाने के विकल्प को उनकी अंतरात्मा ने मना कर दिया। प्रत्यक्ष रूप से उन्होंने कहा आप लोग चलिये। उनके जाने के बाद पण्डित जी ने अपने बटुए से आवश्यक राशि दे कर एम्बुलेन्स वाले को बिदा किया। और तेज कदमों से समीप के एटीएम की ओर बढ़ लिये।

भैरव घाट का दृश्य विकट था। जनसँख्या विस्फोट के कारण जहाँ जाओ वहीँ भीड़। पाँच -छः चिताएं जल रहीं थीं। उतनी ही की तैयारियाँ चल रहीं थीं। लकड़ी वाले, महाब्राम्हण, जलाने वाले सभी ने पूरे शहर का बटवारा कर रक्खा था। इलाके के अनुसार ही मृतक का क्रिया-कर्म कौन करेगा ये निश्चित होता। किसी को किसी के दुःख से कुछ लेना-देना नहीं। हर तरफ गन्दगी का साम्राज्य। और इसी गन्दगी के बीच महाबाह्मण आत्मा की शांति के लिये विविध विधान रच रहे थे। पार्थिव शरीर के ऊपर से माला-फूल उठा कर किसी वहीँ फेंक दी तो किसी ने गंगा में। कोई मृतक शरीर को गंगा के पावन जल में डुबकी लगवा रहा है। किसी ने चिता की राख नदी की ओर धकेल दी। कुछ श्मशान में रहने वाले बच्चे मखाने और पैसों के चक्कर में लाश के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे थे। कुछ रात में रोटियां सेंकने के लिए अधजली चिताओं से लकड़ियाँ निकाल कर उसे गंगा में बुझा रहे थे। महाबाह्मण और चिता जलाने वाले अपनी धुन में थे। ऐसा मौका बार-बार तो आता नहीं। थर्ड जेंडर यदि पृथ्वी रूपी नरक में पैदा होने पर वसूली कर सकता है तो उनका हक़ तो और भी ज्यादा है। वो तो सारे कार्य-कलाप आत्मा को आवा-गमन से मुक्त करने के लिए कर रहे हैं। एक मंतर गलत पढ़ दिया तो आत्मा कहाँ जायेगी इसकी गारेंटी कौन लेगा। पैसों के लिए चिक-चिक जारी थी। 

पूरब में लोग दहन के पश्चात अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित करके ही घर जाते थे। पर पश्चिम में चिता जलते ही सब सरकना शुरू कर देते। अस्थि एकत्रित करके उसके विसर्जन का कार्य अगले दिन किया जाता। चिता जल चुकी थी। पण्डित जी गंगा के किनारे सीढ़ियों की ओर निकल आये। उनके मन में उथल-पुथल मची थी। क्या हो रहा है हमारे देश को। पड़ोसियों और इष्ट-मित्रों द्वारा कन्धा देने में भी कोताही। मृत्यु के द्वार पर भी कारोबार। श्मशान के लोगों का अमानवीय व्यवहार। कई बार यहाँ आना हुआ पर आजतक वो कभी इतने व्यथित नहीं हुए थे। आज न जाने क्यूँ उन्हें ये लग रहा था कि ये सब उनकी लाश के साथ हो रहा है। 

किसी ने पीछे से आ कर पण्डित जी के कन्धे पर हाथ रखा। आइये पंडित जी आचमन कर लेते हैं, नहाने के लिए कपडे तो लाये न होंगे। उनके साथ पंडित जी कुछ और सीढियाँ उतर के गंगा तट तक पहुंच गये। गंगाजल में अजीब पीलापन था। बिठूर में शहर में घुसने से पहले की गंगा और भैरव घाट की गंगा के रंग में अंतर उनकी आँखों में खटक गया। बायीं ओर शहर का मुख्य नाला धारा-प्रवाह गंगा में गन्दगी विसर्जित कर रहा था। पण्डित जी बिना आचमन किये ही लौट लिये।  

जिस गंगा ने जीवन भर उन्हें इतना कुछ दिया मर के उसे मै गन्दा करूँ ये सवाल उनके जेहन में कौंध रहा था। उन्होंने डायरेक्टरी में देख कर मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को फोन लगा दिया। सर मै देहदान करना चाहता हूँ...उसके लिये क्या करना होगा...क्या ये सम्भव है कि मेरे मृत शरीर का एक भी हिस्सा गंगा में ना जाये...इसे आप मेरी अंतिम इच्छा समझ लीजिये...कल मिलता हूँ।     

- वाणभट्ट 

रविवार, 3 अगस्त 2014

फटा पोस्टर

एक अगस्त का अख़बार हमेशा की तरह बोर ख़बरों से भरा पड़ा था। कानपुर में बिजली कटौती। पेट्रोल-डीज़ल के दामों में बढ़ोत्तरी। सभी चैनलों के बाबा ये कहते रहते हैं कि सुबह-सुबह भगवान को याद करो तो दिन पॉजिटिविटी से भर जाये। पर अख़बार पलट लेने की बीमारी का क्या किया जाये। आम आदमी को तो इसी धरती पर जीना है। इस ग़रज़ से अख़बार पलट लेने में कोई बुराई नहीं है। सो मैंने भी अख़बार पलट लिया। और न पलटता तो अफ़सोस रहता। कोई अगर गलती से पूछ लेता कि आज कोई ख़ास खबर तो मै क्या जवाब देता। आज अख़बार में फिल्म 'पी के' का पहला प्रोमोशनल पोस्टर रिलीज़ हुआ। फिल्म गज़नी से ही आमिर के लक्षण समझ नहीं आ रहे थे। इस बार तो भाई पूरे साफ़ थे, कपड़ों से।

मै अपने एमएसटी ग्रुप के साथ कानपुर-लखनऊ मेमू में ट्रेन में जगह घेरने की जद्दोज़हद में लगा था। सारा ग्रुप एक-दूसरे के लिये जगह का जुगाड़ कर ही लेता। सब साथ-साथ बैठते। ग्रुप के खबरची त्रिवेदी ने अख़बार निकाल लिया। और पूरी तन्मयता से पढने लगा। उसके अगल-बगल बैठे बाजपेयी और लोहानी ने भी अपनी नज़रें अखबार में गड़ा दीं। पन्ने पलटते रहे और मैं 'पी के' के पोस्टर पर इनकी भाव-भंगिमा का इंतज़ार करता रहा। मुझे पूरी उम्मीद थी कि ज़ोर का झटका धीरे से लगने वाला है।

उस पृष्ठ पर पहुंचते ही तीनों की आँखें अप्रत्याशित दृश्य देख चमक उठीं। भरपूर निगाह मार के त्रिवेदी ने अखबार का वो पन्ना मेरी ओर कर दिया। देख भई ये लोग अपनी फिल्म को हिट कराने के लिये कुछ भी कर सकते हैं। अब मैंने उस पृष्ठ पर गहन दृष्टि डाली। विधु विनोद और हिरानी की फिल्म है 'पी के'। विधु विनोद चोपड़ा की फिल्में मैं 'सजा-ए-मौत' और 'खामोश' के ज़माने से देख रहा हूँ। वो भी हॉल में। तभी से मै इनका मुरीद बन चुका था। 'परिंदा' और '1942 - अ लव स्टोरी' के बाद वे किसी परिचय के मोहताज नहीं रह गये। 'एकलव्य' के अलावा उनकी किसी फिल्म ने मुझे निराश नहीं किया।  यही बात कुछ हद तक आमिर के साथ भी लागू है। उसकी फिल्में हर वर्ग के दर्शक का ध्यान रखतीं हैं। तो जो सबसे ज़्यादा आश्चर्यजनक बात थी कि ये टीम अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिए नहीं जानी जाती। इनका नाम सुन कर लोग ख़ुद-ब-ख़ुद हॉल तक पहुँच जाते हैं। ये शायद पहली बार है जब चोपड़ा को पूरे एक पेज का विज्ञापन देना पड़ा है। आजकल फिल्मों पर दाँव इतने बढ़ते जा रहे हैं कि इस विज्ञापन से मुझे कोई आपत्ति होने से रही। पहले ही दिन में सौ करोड़ का टारगेट रख कर शाहरुख़, सलमान और आमिर को साइन किया जाता है। इसलिये ये अपने कपडे तो उतारेंगे ही और दूसरों के भी।

आमिर-सलमान-शाहरुख़ और मुझमें एक बात कॉमन है। हमारा इयर ऑफ़ बर्थ सेम है। ये बात अलग है कि मैंने बम्बई का रुख नहीं किया नहीं तो शायद खानों के बीच एक भट्ट भी शामिल होता। ये सभी अपनी फिल्मों के बारे में सस्पेंस बना के चलते हैं। चोपड़ा-हिरानी-आमिर की जो टीम आखिर तक अपनी फिल्मों के बारे में कुछ नहीं बताती थी। उसका इस तरह का विज्ञापन थोड़ा अप्रत्याशित है। लोग उनकी फिल्मों का इंतज़ार करते। जो एक सरप्राइज़ ट्रीट की तरह होतीं। हर बार नए कलेवर। हर बार नयी कहानी। हर बार किस्सागोई की नयी मिसाल। पर इस बार दिसम्बर की फिल्म के लिए अगस्त में प्रमोशन चौंकाने वाला काम था। 

मैंने पोस्टर को और गौर से देखा। तो देखा रेलवे ट्रैक के स्लीपर लकड़ी के थे। आमिर ने टू-इन-वन के पीछे अपने शरीर का बाकि हिस्सा छिपा रखा है। मोनो स्पीकर वाला साउंड सिस्टम देखे भी अरसा हो गया। ये दोनों ही बीते ज़माने की चीज़ हैं। सीन देख के कुछ ऐसा लग रहा था जैसे कोई विक्षिप्त व्यक्ति अपने कपडे फाड़ के खड़ा हो गया हो। पर सेंसर बोर्ड के डर से उसे टू-इन-वन पकड़ा दिया गया हो। इस दृश्य में अश्लीलता देख पाना मेरे बस की बात नहीं थी। ऐसा आये दिन दिखता ही रहता है। लोहानी जी बोल उठे देखो ये लोग किस हद तक गिर गए हैं। फिल्म हिट कराने के लिए नंगे होने से भी इन्हें कोई ऐतराज़ नहीं। त्रिवेदी जो पिछले सात सालों से एमएसटी कर रहा था। बोला गुरु ये मामला कुछ अपनी तरह का है। लगता है आमिर कोई एमएसटी वाला बना है। साला रोज ट्रेन लेट। ७२ किलोमीटर के सफ़र में तीन घंटे। अड़ोसी-पडोसी, यहाँ तक कि बच्चे भी पहचानना भूल गए हैं। बीवी को बस तनख्वाह से मतलब है। दस साल होते-होते शायद मेरा हाल भी ऐसा ना हो जाये। लेकिन यार अब टू-इन-वन तो मिलता नहीं आइपॉड से कैसे काम चलेगा।   

अगले दिन नैतिकता के ठेकेदारों ने इस विज्ञापन को कोर्ट में घसीट लिया। उनकी वैचारिक नग्नता  का क्या किया जाये। फिल्म तो हिट होगी ही। और मेरे साथ-साथ वो लोग तो ज़रूर देखेंगे जिन्हें इस दृश्य पर ऐतराज़ होगा। टीम को बधाई एडवान्स में। ये तो बानगी है अभी और हथकण्डे आजमाने बाकी हैं।  



- वाणभट्ट 

सोमवार, 28 जुलाई 2014

खुली चिट्ठी 


ये सरकार क्या बदली, जिसे देखो राय बहादुर बन गया। इसके पहले की सरकारें तो कान में कड़ुआ तेल डाले पड़ीं रहतीं थीं। पर अब तेल के दाम जब बढ़ गए हैं तो लोग एक-एक बूँद तेल खाने के काम में लाना पसंद कर रहे हैं। कान में डालने वालों पर स्विस बैंक में अकाउन्ट होने का शक़ हो सकता है। सी बी आई और आयकर वाले तो छुट्टा सांड की तरह घूम रहे हैं। काले धन की उगाही स्विस बैंक से कर पाना थोड़ी टेंढ़ी खीर है। इसलिये देश के ज़र्रे-ज़र्रे में व्याप्त ब्लैक मनी वालों को मेरी ये राय है कि कोई भी ऐसा काम न कीजिये जिससे किसी को आप पर शक़ हो सके। सरकार के जासूस सब्जी मंडी तक में छाये हुए हैं। कौन प्याज़ और कौन टमाटर खा रहा है इसका ब्यौरा प्रतिदिन सरकार को भेजा जा रहा है। अगर नज़र में चढ़ गए तो ये न कहना कि आगाह नहीं किया। 

बात राय बहादुर से शुरू हुयी थी। सब लोग अपने-अपने क्षेत्र के विषय में सरकार को राय दे रहे हैं। वो भी खुली चिट्ठी के रूप में। सरकार को पढ़ने की फुर्सत मिले न मिले। पर अड़ोसी-पड़ोसी को तो ये चिट्ठी दिखाई जा सकती है कि फलां विषय पर उन्होंने सरकार को क्या राय दी है। लोग हड़बड़ी में हैं कि कहीं कोई काम उनकी राय के बिना हो गया तो क्रेडिट सरकार ले जाएगी। इसलिए खुली चिट्ठियां अख़बारों में छपवायी जा रहीं हैं। चाहे उद्योग का मसला हो, चाहे विदेश नीति का, चाहे सुरक्षा का, चाहे कृषि का, चाहे काले धन का। हर कोई क्रेडिट लूट लेना चाहता है। वो गर्व से बताते हैं कि वित्त मंत्री ने उन्हीं के कहने पर रेडीमेड कपडे में टैक्स बढ़ा दिया ताकि लोग कपड़े मोहल्ले के झुम्मन टेलर की दुकान पर ही सिलायें। आजकल ज्ञान टी वी और वीडियो के माध्यम से सहजता से प्राप्त हो सकता है इसलिये एल सी डी के दाम कम कर दिए गये। वाट्सएप से लोग अपना ज्ञान शेयर कर सकते हैं इसलिये मोबाइल सस्ते करना ज़रूरी था। 

पर गुटके-तम्बाखू पर टैक्स बढ़ा कर सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। इसे बिना खाए तो बहुतों की अक्ल का ताला ही नहीं खुलता । गुटखे को मुख में धारण करके बोल पाना कतिपय मुश्किल होता है। जब आदमी चुप होगा तभी तो सोच पायेगा। विचार आयेंगे। बड़े-बड़े खिलाड़ी खेल में ध्यान लगाने के लिये चुइंगम चबाते नज़र आते हैं। कैमरे के सामने चुल्लू भर थूक उगलने में उन्हें शर्म आती होगी। इसलिये तमाम मल्टीनेशनल (मेरी नज़र में एण्टीनेशनल) कम्पनियाँ चुइंगम के निर्माण में रत हैं। जिससे प्रतिवर्ष करोड़ों की देसी मुद्रा विदेशों में जा रही है। गुटका हमारे स्वावलम्बन का प्रतीक है। कम से कम ये एक ऐसा उद्योग है जो स्वदेशी तकनीक और ज्ञान पर पूरी तरह आधारित है। इस उद्योग को लगा के रातों-रात कितने फ़क़ीर धन्ना सेठ बन गये। सोच तो बहुत लोग सकते हैं पर सोच कर के बोल पाना एक कठिन कार्य है। बहुत लोग इसलिए नहीं बोल पाते कि ऊपर वाले को बुरा लग जायेगा। ऊपर वाले को बुरा लगा तो उनका भला तो होने से रहा। तो सोच और बोल वही सकता है जिसका माइंड इज़ विदआउट फियर। गुटका खाने वाले निश्चित रूप से फीयरलेस लोग होत्ते हैं। ये आपके ऊपर थूक दें और लड़ने लग जाएँ कि गलती आपकी है कि आप उनके मुंह और ज़मीन के बीच जानबूझ कर आ गये। अभी चीन को इस शौक़ का पता नहीं है वर्ना हमारा पान, हमारा तम्बाखू, हमारा गुलकन्द हम ही को चाँदी के वर्क में लपेट के बेच दे।  

मुझे पहले भी कोई जल्दी नहीं रही। आपाधापी में कोई भी महान चिंतक काम नहीं कर पाया है। चिंतन अपने आप में एक महान कार्य है। पर इस देश में कर्मण्येवाधिकारस्ते की ऐसी जबरदस्त फीलिंग है कि लोग बिना सोचे समझे काम किये जा रहे हैं। कोई सोचे तो बहुत से काम करने की आवश्यकता ही नहीं पड़े। बहुत से पुनीत कार्य तो लोग सिर्फ इस गरज से कर रहे हैं की सरकार ने बजट एलोकेट कर दिया है। उस बजट को ठिकाने लगाने के लिये काम करना पड़ रहा है। मज़बूरी ये हो गयी है की बजट को हिल्ले लगाना सबसे बड़ा काम हो गया है। ए जी, सी ए जी, चिल्लाते रहें फण्ड के मिसयूज़ हुआ है पर फण्ड को कंज़्यूम करने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, इन्हें क्या मालूम। ये आउटसोर्सिंग न होती तो कितने ही ठेकेदार और बिचौलिये जो आलिशान गाड़ियों में घूमते हैं, आज चाय-पान बेच रहे होते। एक दलाल ने तो अधिकारी को चैलेंज कर दिया कि बिना मेरे सहयोग के आप एक आइटम खरीद के दिखाओ। तीन कोटेशन तो हम ही मुहैया करा सकते हैं। 

फिनलैंड एक छोटा सा देश है। सुना है वहाँ किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले सालों डिस्कशन होता है। विचार विमर्श के वर्षों में यदि उस कार्य की आवश्यकता महसूस नहीं हुयी तो प्रोजेक्ट ड्राप कर दिया जाता है। लेकिन एक बार जब प्रोजेक्ट अप्रूव हो गया तो उसे टाइम से खत्म करने के प्रयास किये जाते हैं ताकि प्रोजेक्ट कॉस्ट न बढ़े। हमारे यहाँ फ्लाईओवर बनाने के विचार आते ही मंत्री जी उसका शिलान्यास करने पर आमादा हो जाते हैं। और प्रोजेक्ट जितना डिले होगा बजट उतनी बार रिवाइज़ होगा। एक बार काम का लोकार्पण हो गया तो मंत्री, अफ़सर, ठेकेदार बेचारों को नया पुल बनाना पड़ेगा इसलिये एक ही पुल जितने साल बनता रहे उतना भला।पब्लिक के लिए गीता का पाठ है कि जो हो रहा है अच्छा है और जो होगा वो और भी अच्छा होगा। सब अच्छा ही अच्छा होगा तो देश के धर्मगुरुओं का क्या होगा। 

इस मामले में मै आलसी लोगों का कायल हूँ। उनके पास सोचने का समय होता है। सेब तो बहुत गिरे पर गुरुत्वाकर्षण के बारे में कौन सोच पाया। कर्मयोगी उसे कर्मफल समझ के खाने में जुट जाते थे। कर्मयोगी को उबलते पानी की केतली में इंटरेस्ट भला क्यों आयेगा। आलसी सिर्फ उतना ही काम करेगा जितना आवश्यक है। वो ज़िन्दगी में आरामतलबी के सारे साधन के स्वप्न देखेगा। वो ट्रेन खोजेगा, वो प्लेन खोजेगा, वो ए सी डिज़ाइन करेगा, वो कार को आरामदेह बनाने की हर सम्भव कोशिश करेगा। कर्मयोगी खोज की पुनरावृत्ति तो कर सकते हैं पर नयी सोच उनके बस का रोग नहीं है। लेकिन देश के दुर्भाग्य का क्या रोना रोया जाये, यहाँ ऐसे आदमियों की कदर नहीं है। यहाँ हर आदमी यही दम भरने में लगा है कि उसने एक ३० साल के प्रभावी जीवन में कितने महान कर डाले। वस्तुतः उसमें से अधिकांश कार्य करने के लिए उसे पश्चाताप होना चाहिए कि गरीब देश के करोड़ों रुपये उसने सिर्फ अपनी कर्मयोगिता सिद्ध करने में फूंक दिये। ये अलग बात है कि इस बहती गंगा ने उसकी कई पीढ़ियों के भाग्य तार दिये। इसलिए मेरे विचार से सोचना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। इसमें से एक-दो कार्य भी मूर्त रूप ले सके तो देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाये। इसलिए मैंने सोचा कि जब सब भाई लोग सोच-सोच के थक जायें तब हम अपनी मूल्यवान राय देंगे। पर राय का कॉपीराइट तो होता नहीं। इसलिये क्यों न खुली चिट्ठी का सहारा लिया जाये। ताकि सनद रहे और वक़्त आने पर काम आ सके कि इन महान रायों का प्रणेता कौन था।  

इस देश में गहन चिंतकों का सर्वथा आभाव रहा है। दिमाग में राय आई नहीं की झोंक दी। कोई हनीमून मनाने के मूड में है और आप हैं कि राय पे राय दिए जा रहे हैं। किसी को हनीमून में डिस्टर्ब करना कहाँ की सभ्यता है। साठ दिनों में भाई लोगों ने इतनी ढेर सारी राय दे डाली की सरकार को एक पोर्टल बनाना पड़ गया। जिनके माइंड में फियर था वो बेनामी चिट्ठीयाँ भेज रहे थे। दिल्ली के अफसरशाहों को जल्दी समझ में आ गया कि ऐसी चुनिंदा रायें आम आदमी तो दे नहीं सकता। विभाग के छिपे विभीषण ही लंका ढहाने पर आमादा हैं। ऐसे तो अपनी दुकान बंद हो जायेगी। इसलिए पोर्टल पर पूरा नाम-पता देना कम्पलसरी कर दिया गया है। इन परिस्थितियों में कम से कम सरकारी लोग तो मुंह बंद रखेंगे। बाकि लोगों को किसी विभाग के बारे में पूरी जानकारी जुटाने के लिये आरटीआई तक जाना होगा। आंकड़े बताते हैं कि आरटीआई से सूचना निकलवा पाना नाकों चने चबाने के समान है। पूरा विभाग भ्रष्ट लोगों को बचाने की मुहिम में शामिल हो जाता है। जब एक इंजिनियर, एक डॉक्टर, एक अफसर, एक कर्मचारी अपने विभाग में वांछित सुधारों के लिये लिखेगा तो वो एक प्रामाणिक दस्तावेज़ बन सकता है। इसलिये इन पर नकेल ज़रूरी है। 

पर इससे मुझे क्या। मै तो खुली चिट्ठी देश के मेरे जैसे उदीयमान व्यंगकारों के लिए लिख रहा था। यदि देश में सब कुछ वैसा हो गया जैसा होना चाहिये तो तो हमारे जैसे लोग तो भूखे मर जायेंगे। हम किस पर व्यंग लिखेंगे और कार्टूनिस्ट क्या कार्टून बनायेंगे। लोग गुटके नहीं खायेंगे तो देश की सड़कें काली दिखने लगेंगी। पता ही नहीं चलेगा कि इस सड़क से कोई गुजरता भी है या इंजीनियरों ने सिर्फ कमीशन खाने के चक्कर में इस सड़क का निर्माण करा दिया। ट्रेन के सिंक साफ़-सुथरे होंगे तो लोग खामख्वाह मुँह धोते रहेंगे और पानी बहाते। डिब्बे साफ़ रहेंगे तो लोग जमीन में बैठ के यात्रा करने लगेंगे। पहले ही ट्रेन में लोग लदे-फंदे रहते हैं।प्लेटफार्म और टॉयलेट साफ़-सुथरे होंगे तो लोग होटल भला क्यों जायेंगे।इस गन्दगी का मुख्य उद्देश्य लोगों को यातायात से विमुख करना है। जिससे लोग अपने घर-गाँव को छोड़ने से पहले दस बार सोचें। अपने घर में गैया चराना भला है या मुम्बई तक जनरल कोच में भेंड़-बकरी की तरह यात्रा करना।

दरअसल सरकारें समस्या पैदा करने में विश्वास रखतीं थीं। वर्ना काम तो वो सारे यूपी में भी होने हैं जो कर्नाटक में होते हैं। अपने ही घर में काम की कमी नहीं है तो परदेस में जा के धक्के खाने की क्या जरुरत। पर प्रदेश सरकार चाहती है कि पंजाब का पैसा हमारे यहाँ आये। हमारा पैसा पंजाब क्यों जाये। मैंने देखा कानपुर से लखनऊ  के बीच तक़रीबन ३० हज़ार लोग रोज आते-जाते होंगे। पढने के लिये, पढ़ाने के लिये, बैंक के लिये, दफ्तरों के लिये। लखनऊ का आदमी कानपुर आ रहा है और कानपुर का आदमी लखनऊ जा रहा है। अगर कानपुर वाला कानपुर में और लखनऊ वाला लखनऊ में काम करे तो ट्रेन पर भीड़ कम हो जायेगी। ऐसे में रेलवे और उन्नाव के समोसे वालों को होने वाले घाटे का ख्याल सरकार नहीं रखेगी तो और कौन रक्खेगा। ट्रांसफर पर कमीशन नहीं मिले तो मंत्री-संत्री का दरबार क्यों सजे। ट्रेन में भीड़ होगी तभी तो हवाई यात्रा को बढ़ावा मिलेगा। बंगलुरु से दिल्ली के जहाज खाली चलेंगे तो एयरलाइंस बंद हो सकती है। इसलिये दिल्ली वाले को बंगलुरु भेजो और बेंगलुरु वाले को दिल्ली। जो लोग एक जगह रहते-रहते उकता जाते हैं उनके लिये ट्रांसफर मतलब एक महीने की तनख्वाह और टी टी ए के साथ नये स्थान की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों से रूबरू होने का मौका है।  

देश में विकास की अपरिमित संभावनाएं हैं। लेकिन जब महानगरों में ही ज़िन्दगी के समस्त सार उपलब्ध हों तो बहराइच और गोण्डा में भला कौन रहना चाहेगा। फटी पड़ी जनसंख्या के बीच महानगरों की चकाचौंध आम भारतीय को आमंत्रित करती रहती है। और एक बार जिसे महानगर की हवा लग गयी उसका देवरिया और भदोही में तो दम घुटेगा ही। अब नये-नये शहर बनाने की बात हो रही है। नयी-नयी गाड़ियाँ चलाने की बात हो रही है। जो चल रहा है वो और सुचारू रूप से चल सके इस पर कोई सोचना नहीं चाहता। गोया बजाज के एड की तरह सारे घर के बल्ब बदलने की बात हो रही है। और होनी भी चाहिए। नये काम के लिए नया वित्तीय प्रावधान। पुराने को ठीक करने का काम तो सस्ते में हो सकता है। और एक सशक्त सरकार को टुच्चे काम नहीं करने चाहिये। देश का सुधार होगा वो भी विश्वस्तरीय तकनीक से। दुनिया भर में टेक्नोलॉजी की भरमार है तो अपनी तकनीक को क्या विकसित करना। इसका मूलमंत्र है एफ डी आई। 

हम तो अपने लोगों की बेहतरी नहीं सोच पाये इसलिये विदेशी कंपनियों से आह्वाहन है कि आप आइये हमारी अर्थव्यवस्था को समृद्ध कीजिये। हमारे बेरोजगारों को रोजगार दीजिये। सन छियासी में जब मैंने काइनेटिक हौंडा खरीदी थी तभी मुझे लग गया था बजाज के दिन फिरने वाले हैं। पंद्रह सालों के बाद जब मेरी हीरो-हौंडा का क्लच वायर टूटा तो मुझे भरोसा हो गया कि हीरो को अब साइकिल बनाने तक सिमित हो जाना चाहिये। पहले एक ईस्ट इण्डिया कंपनी थी आज पूरी दुनिया यहाँ घुसी पड़ी है। चूँकि हम रीइनवेंटिंग व्हील के सिद्धान्त में विश्वास नहीं रखते इसलिये पूरी दुनिया को निमंत्रण देते घूम रहे हैं कि आप यहाँ आईये हम बड़े कद्रदान लोग हैं। हुनर पहचान लेते हैं। आप कार बनाइये हम खरीदेंगे। आप जहाज बनाइये हम उसे उड़ाएंगे। आप बम बनाइये हम पड़ोसियों को डराएंगे। लेकिन ये भूल जाते हैं कि बाज़ार में उपलब्ध चीज़ें हमारे पडोसी भी खरीद सकते हैं। और हमेशा नया वर्ज़न पुराने वर्ज़न से बेहतर होता है। तो जो बाद में खरीदेगा वो फायदे में रहेगा। वैसे देश में अच्छे, सच्चे, देशभक्त और चारित्रिक नेताओं का भी सदैव आभाव रहा है। तकनीक की तरह इस क्षेत्र में भी एफ डी आई की अभूतपूर्व संभावनाएं हैं। हम तो हमेशा से वसुधैव कुटुम्बकम के हिमायती रहे हैं। अब हमारे कुटुम्ब वाले ही गच्चा दे जायें तो ये उनकी नियत है। भगवान सब देख रहा है और सबके कर्मों का लेखा चित्रगुप्त जी की डायरी में नोट होता रहता है।    

मेरे विचारों का आयाम देश की सभी समस्याओं तक फैला हुआ है। राय इतनी कि ब्लॉग वालों द्वारा दी गयी फ्री स्पेस कम पड़ जाये। ये तो सिर्फ विचारों की बानगी है। मेरे पाठक मुझे हर बार चेताते हैं कि भट्ट जी आपके विचारों से हमें क्या सरोकार। मै उन्हें समझाता हूँ कि देश हित में है विचारों का आदान-प्रदान। अब मुझे ख़ुशी है कि सरकार ने मेरे जैसे अपठनीय लेखक के लिये एक ऐसा मंच तैयार किया है जहाँ मै फर्जी आई-डी बना के विचारों की भड़ास निकाल सकता हूँ। पढ़ना, न पढ़ना सरकार का काम है। मै इसी प्रकार निर्विकार भाव से अपने मनन और चिंतन को लेखनी बद्ध करता रहूँगा। ताकि सनद रहे। 

- वाणभट्ट

सोमवार, 9 जून 2014

ज़ंजीर


सन तिहत्तर में एक फिल्म आयी जिसने एक आम नायक को महानायक में बदल डाला। ज़ंजीर देखने के लिए चाचा को बच्चों ने पटा लिया। हॉल पहुँच गए रिक्शे में लद-लदा के। लेकिन टिकट नहीं मिला। चाचा बेचारे को ब्लैक में टिकट लेना पड़ा। उन्हें तो पिक्चर में क्या मज़ा आया होगा पर बच्चों ने पैसा वसूल लिया। उस समय जुम्मा-जुम्मा उम्र थी यही कोई आठ साल। मार धाड़ और ढिशुंग ढिशुंग में बहुत मज़ा आया। एक-एक डाइलॉग पर हॉल तालियों से गूंज जाता। शानदार फिल्म के लिए विलेन भी जानदार होना चाहिये। अगर राम से टक्कर हो तो रावण जैसा किरदार भी आपेक्षित है। अजीत की दमदार डाइलॉग डिलीवरी और अमिताभ का एंग्री यंग मैन का रूप भारत की जनता के सर चढ़ के बोला। प्राण साहब तो लाज़वाब थे ही हमेशा से। फिल्म तो सुपर हिट हुयी ही पर अमिताभ को भी उसके बाद पीछे मुड़ के देखना नहीं पड़ा। उस समय मेरे बाल मन में एक जिज्ञासा जगी कि फिल्म का नाम घोड़ा होना चाहिए। ज़ंजीर का इस फिल्म में क्या मतलब। किस अनाड़ी ने रख दिया। विलेन जब गोली चला रहा था तो घोडा ज़ंजीर से लटक रहा था। मेरा ध्यान घोड़े पर तो गया पर हाथ पर बंधी चेन से फिल्म के नामकरण का तात्पर्य मेरी बालबुद्धि के परे था। मेरे हिसाब से फिल्म का नाम अश्व या अश्वथामा या सिर्फ घोड़ा होना चाहिए था।     

आप चाहिए या न चाहिए आपको बड़े तो होना ही है। और बचपन में तो बड़े होने की बड़ी जल्दी भी थी। मै बड़ा हुआ भी उम्र के लिहाज़ से। अक्ल के लिहाज़ से मेरे बड़े होने पर मित्र गणों को थोड़ा संदेह हमेशा बना रहता है। ईमानदारी-देशभक्ति-सत्य-अहिंसा-न्याय-धर्म की बातें आजकल या तो बच्चे करते हैं या कमज़ोर लोग। वीर लोग तो इस धरा-वसुंधरा पर अवतरित सभी भोग्य वस्तुओं का भोग लगाने में ही व्यस्त रहना पसंद करते हैं। और वो भी डेली बेसिस पर। हफ्ते-महीने में कुछ भोग लगाया तो क्या लगाया। हनुमान जी को भी लोग मंगल-मंगल प्रसाद चढ़ा देते हैं। ताकतवर को तो रोज प्रसाद चाहिये। तभी उसे एहसास बना रहता है कि वो वीर है। और माल दूसरे के हिस्से का हो तो और स्वादिष्ट लगता है। बहरहाल जैसे-तैसे बड़े होने था बड़े हो गये। लेकिन बचपन की जिज्ञासा शांत न हो पायी। तब और भी आश्चर्य हुआ जब पता चला कि ये गलती सलीम-जावेद जैसे महान स्क्रीन प्ले लेखकों ने की थी। भाई मर्जी है उनकी और उनके प्रोड्यूसरों की। पैसा उनका, फिल्म उनकी वो भी सुपर-डुपर हिट तो मै भला कौन - खामख्वाह।        

अंग्रेजों के ज़माने में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को ज़ंजीर से बांधा जाता था। किसी बलिष्ठ व्यक्ति को यदि बेड़ियों में रखा जाता तो बात समझ आती थी कि ये किसी को पीट-पाट सकता है। पर कभी-कभी निरीह से मरियल लोगों के भी हाथ-पैर ज़ंजीर से जकड़े रहते। पता चलता था कि उस आदमी की सोच खतरनाक थी जिससे अंग्रेजी साम्राज्य की नीवें हिल सकतीं थीं। बाबर से लेकर अंग्रेजों तक, और आज के दौर में सरकारी अफसरान, जिसकी भी राज करने की लालसा थी, उसे बगावत का फोबिया बना रहता। कोई राजा अगर प्रजा की सेवा करना चाहता हो तो उससे बड़ा सेवक खोजना मुश्किल है। पर फिर राजा बनने में उसने जितने पापड़ बेले हैं, जिन षड्यंत्रों का वो भागी बना, उसका मज़ा जाता रहेगा। इसलिए जब एक बार येन-केन-प्रकारेण सिंघासन मिल जाये तो सारी बगावत की बू को दूर करने में ही प्रोडक्टिव समय व्यर्थ कर देना एक राजसी मानसिकता है। तब समझ आया कि ज़ंजीर प्रतीक है मानसिक गुलामी का। एक कैदी को बमशक़्क़त सजा भी दे दो तो भूख खुल के लगेगी। उसका स्वास्थ्य बन सकता है। पर एक को बेड़ियों में जकड के रख दो तो उसकी सोच की धार कुंद हो जाएगी। मै सलीम-जावेद का कायल हो गया नायक के सपने में भले ही घोडा आता हो पर उन्होंने फिल्म का नाम रखा ज़ंजीरज़ंजीर नायक की बेबसी को बहुत ही संजीदा तरीके से दर्शाती थी। लेखकद्वय  ने अगर मेरे कहे अनुसार फिल्म का नाम अश्व, अश्वथामा या घोडा रखा दिया होता तो शायद न फिल्म हिट होती न अमिताभ।     

एक दिन जब ऑफिस पहुँचे तो देखा प्रशासनिक भवन के सामने कुछ नाप-जोख चल रही है। जब भी विभाग में कहीं से फंड आ जाता है, इस प्रकार का काम शुरू हो जाता है। ये कोई गौर करने लायक बात न थी। फिर कुछ दिनों के बाद देखा की कालेज के प्रधानाचार्य महोदय के पोर्टिको वाली सड़क पर चेन का बैरियर लग गया है। हुआ यूँ कि पूरे परिसर में साईकिल, स्कूटर, गाड़ी पार्क करने की कोई समुचित व्यवस्था न थी, न प्रशासन ने इस ओर कभी ध्यान दिया। कुछ छायादार हिस्सों में पहले-आओ, पहले-पाओ के आधार पर कुछ गाड़ियां खड़ीं हो जातीं थीं। कुछ के लिये  गिने-चुने पेड़ थे और उनके अलावा लोगों के लिए जाड़ा-गर्मी-बरसात था खुला आसमान। आम आदमी तो प्रशासनिक भवन से दूर ही रहने का प्रयास करता। किन्तु मुंहबोले प्रशासनिक कार्यालय के अधिकारी और कर्मचारी प्राचार्य महोदय की गैर- हाजिरी में पोर्टिको की छाया का आस्वादन करने से नहीं चूकते थे। 

कोई भी विभाग बिना विभागाध्यक्ष के तो चल सकता है पर बिना लग्गू-भग्गुओं के नहीं। लग्गू ने प्राचार्य महोदय को खोंस दिया कि हुज़ूर जब आपकी अम्बेस्डर पोर्टिको की शोभा नहीं बढ़ा रहीं होतीं तो ऑफिस के बाबुओं के दुपहिया वाहन उस पोर्टिको की शोभा ख़राब कर रहे होते हैं। भग्गू कहाँ पीछे रहता बोला सर आप जिस कार्यकुशलता से प्रशासनिक निर्णय लेते हैं बहुत सम्भावना है कोई आपको रिटायरमेंट से पहले हुर-हुरा न दे। इसलिये इस रस्ते पर एंट्री रिस्ट्रिक्ट कर दीजिये। प्राचार्य ने अनमना सा विरोध किया कि लोगों का रास्ता लंबा हो जायेगा, उन्हें घूम के जाना पड़ेगा। लग्गू-भग्गू ने समझाया सर इस पोर्टिको पर सिर्फ और सिर्फ आपका और आपकी अम्बेस्डर का हक़ है। और किसी भी प्रशासक को अपने हक़ के प्रति जागरूक और जनता के हक़ के प्रति यदि सुसुप्त नहीं तो निर्विकार तो रहना ही चाहिये। अभी ये लोग आपके पोर्टिको में कब्ज़ा करेंगे कल आप की अनुपस्थिति में आप के कमरे के एसी की ठंडी हवा भी खाने लगेंगे। दोनों प्रवेश द्वार पर सीकड़ लग जायेगी जैसी इण्डिया गेट पर लगी रहती है फिर किसी की क्या मजाल जो आपके पोर्टिको की छाया का मिसयूज़ कर सके। प्रस्ताव पास हो गया और अमल में भी आ गया। 

लोगों की असुविधा का ख्याल रखना प्रशासक का काम नहीं है। कुछ को बुरा लगा कुछ को भला। पर बुरा-भला लगने या कहने की गुंजाईश न थी। प्राचार्य जी कलम के पक्के थे। मुँह से कुछ न कहते पर कलम से रगड़ देते। और रोजी-रोटी में पूरी आस प्रमोशन पर ही टिकी रहती है। वही तो बरक्कत है। सो लोगों ने मुँह सिल लिये। राजाज्ञा भी कोई चीज़ होती है।एक दिन हमारे शर्मा जी इमोशनलिया गये। बोले साला खाली पोर्टिको में भी गाड़ी नहीं खड़ी कर सकते लानत है ऐसी जहालत पर। जोश आ गया चेन हटा के अपनी स्कूटी पोर्टिको में लगा दी। उस क्षण उन्हें लगा किसी गोरी सरकार का नमक कानून तोड़ दिया। प्राचार्य ने एक जाँच आयोग बैठाया दिया। बगावत की बू पर काबू ज़रूरी था। आयोग ने प्राचार्य के कहे अनुसार शर्मा के इस जघन्य कृत्य की घनघोर भर्तस्ना की। आखिर उनकी भी सत्यनिष्ठा यानि इंटीग्रिटी का मामला था। शर्मा को भयंकर सा मेमो मिला पर्सनल फाइल में एडवर्स एंट्री हुयी सो अलग से। शर्मा के सपने में अब बिना घोड़े वाली ज़ंजीर अक्सर आती है। जिन्हें मेमो नहीं मिला उनके सपनों में भी वो ज़ंजीर जरूर आती होगी उन्हें उनकी बेबसी का एहसास दिलाने।   

- वाणभट्ट               

गुरुवार, 29 मई 2014

पुरवा बयार

शर्मा जी की उम्र पचास के अल्ले-पल्ले रही होगी। मोहल्ले के इको पार्क वॉकर्स क्लब के संस्थापक सदस्य। बहुत ही नियमित।  बहुत ही जिंदादिल। मँहगे हेयर डाई से बालों को रंग के अपनी उम्र के आधे ही जान पड़ते। मुझे मिला कर कुल जमा दस लोगों को अपनी प्रेरणा से जोड़ रक्खा था। ट्रैक पर टहलने के बाद सभी मिल के योग (योगा) करते फिर लाफ्टर सेशन शुरू होता। पूरा एक घंटे का पैकेज है। पार्क में आना उतना ही अनिवार्य है जितना दफ्तर जाना। अटेंडेंस रजिस्टर तो नहीं था पर न आना बहुत मंहगा पड़ता। एक दिन भी कोई चूक गया तो तय है कि पेनल्टी के रूप में उसके घर सब चाय पीने जायेंगे। और कोई शरीफ आदमी सिर्फ चाय तो पिलाएगा नहीं कुछ खिलायेगा भी। ये दो तरफ़ा टैक्टिस बहुत कारगर रही। पार्क नहीं आये तो दोस्त हाल लेने घर पहुँच जायेंगे। और जिस बीवी को सुबह-सुबह बिस्तर से उठ कर चाय बनानी पड़ेगी, वो अगले दिन खुद अलार्म लगा के उठेगी और आपको ठीक समय पर घर के बाहर कर देगी। इस तरह हमारा क्लब कई वर्षों से फल-फूल रहा है। शर्मा जी शारीरिक रूप से बिलकुल स्वस्थ थे और मानसिक रूप से और भी ज्यादा। देखने में पचीस के लगते पर दिल बीस का ही था। लाफ्टर सेशन के लिए अलग से तैयारी करके आते थे। अपने क्रैकिंग जोक्स से सबका जीना मुहाल कर देते। हमेशा हंसने-हंसाने को तत्पर रहते।

जाड़ा-गर्मी-बरसात शर्मा जी को हमने कभी पार्क में नदारद नहीं पाया। लिहाजा हमें उनके घर कभी चाय पीने का सौभाग्य नहीं मिला। नमक मिर्च के साथ बताने वाले बताते हैं कि शर्मा जी ने लव मैरिज की थी। और उनकी पत्नी, यानि हमारी भाभी जी, अपने दिनों में अनिन्द्य सुंदरी हुआ करतीं थीं। अफसर से शादी के बाद नियमित खान-पान से इंशा-अल्ला उनका स्वास्थ्य आवश्यकता से अधिक भरा-पूरा हो गया था। उम्र का असर शर्मा जी की ही तरह उन पर भी हावी नहीं हुआ था। आदमी वही जवान है जो उम्र को मानसिक रूप से दरकिनार कर दे। लिहाजा उन्हें हर आने-जाने वाले पर शक़ रहता कि उसके इरादे गलत हैं। और शर्मा जी के टहलने वाले दोस्तों पर तो उन्हें कतई विश्वास नहीं था। टहलने वाले सर्किल का तो स्टेटस भी नहीं पता। अफसर है, क्लर्क है या चपरासी। शर्मा जी की नियमितता का शायद ये भी एक कारण रहा हो। शर्मा जी तन-मन दोनों से जवान थे, जबकि उनकी पत्नी मन से पूर्णतः युवा। उनसे मिलने की सभी की इच्छा मन ही मन बनी रहती पर शर्मा भूले से भी किसी को अपने घर आने का न्योता न देता। 

चाय की पेनल्टी से बचने का एक मात्र तरीका था - मास बंक। किस किस के घर जा पाएंगे शर्मा जी। ये भी हो सकता है कि हमारे बीच का कोई जासूस शर्मा जी को मास बंक की खबर कर देता हो और वो भी छुट्टी मार लेते हों। कुछ लोगों ने सन्डे ऑफ़ का सिस्टम बना रक्खा था। उन्हें सन्डे एग्जम्प्टेड था। पर आज सन्डे नहीं था। न ही कोई मास बंक का फरमान था। मै यथा समय ठीक साढ़े पांच बजे उद्यान में था। पार्क में मेरे अलावा सिर्फ शर्मा जी ही पहुँच पाये थे। बाकी सबने गच्चा दे दिया। पहले से बता दिया होता तो मै भी फरलो मार लेता। ये भाईसाहब अमूमन सबसे जल्दी आ जाया करते थे। इस समय टहलने के बाद प्राणायाम में लगे हुए थे। मेरे पार्क में एंट्री लेते ही उन्होंने धीमे स्वर में हरि-ओम की आवाज़ लगाई। उनकी आवाज़ से गर्मजोशी गायब थी।

मुझे शक हुआ कि हो न हो कुछ गड़बड़ है। लगता है शर्मा जी की तबियत ठीक नहीं है। मुझे लगा उन्हें आत्मीयता की ज़रूरत है। पार्क में कोई अन्य मित्र दिख भी नहीं रहा था। सो टहलने का कार्यक्रम स्थगित करके मैंने पूरी गर्मजोशी से पूछा - शर्मा क्या बात है, बड़े बुझे-बुझे से लग रहे हो। वो एक ठंडी आह भर के चुप लगा गये। थोड़ा और कुरेदा तो बोले कुछ नहीं यार जब पुरवा हवा चलती है तो पूरे बदन में हल्का-हल्का दर्द रहता है। पुरानी चोटें फिर से हरी हो जातीं हैं। एक सिसकारी के साथ वो फिर चुप हो गए। उनका ध्यान आज प्राणायाम में नहीं लग रहा था। मुझे लगा राख में कहीं अंगार छिपा है। बोला - पुरवा तो सबके लिये है। हाँ थोड़ा आलस्य ज़रूर लगता है शायद इसीलिए आज अनुपस्थिति ज़्यादा है। पर घर के अंदर एसी में सोने वालों पर भला पुरवा क्या असर करेगी। आपको कौन सी चोट लग गयी शर्मा जी। शर्मा जी मेरे अतिक्रमण पर थोड़ा बुरा सा मान गये। लेकिन बड़ी शराफत से बोले वर्मा जी आज चलता हूँ, कल मिलूंगा। और वो बिना हँसे-हँसाये, मेरे अंदर जिज्ञासा का तूफ़ान खड़ा करके पार्क से निकल लिये। जिसका शीघ्र निवारण होना ज़रूरी था। लिखने वाले को तो बस लिखने का मसाला चाहिये। कोई सुख में हो या दुःख में लेखक अगर अपने स्वार्थ से उबर जाए तो कितनी ही कहानियां अनकही रह जाएँ।  

शर्मा जी के एक पुराने मित्र जो हमारे वॉकर क्लब के सदस्य भी थे वही मेरी शंका का समाधान कर सकते थे। रास्ता थोड़ा लम्बा था पर आज टहलना भी तो नहीं हुआ था। मिश्रा जी ने सोचा आज वर्मा जी अकेले ही पेनल्टी वसूल करने कैसे आ गये। जब हम ड्राइंग रूम में चाय का इंतज़ार कर रहे थे, मैं अपनी जिज्ञासा पर ज़्यादा संयम न रख सका। तुरंत मुद्दे पर आ गया। यार शर्मा आज बड़ा सेंटी सा लग रहा था कह रहा था पुरवा हवा चलती है तो बदन टूटता है। मिश्रा थोड़ा संजीदा हो गया फिर बोला यार मै शर्मा को बचपन से जानता हूँ। शुरू से ही बहुत ही हृष्ट-पुष्ट सुन्दर और स्मार्ट बंदा है। कालेज के दौरान इसे इश्क का रोग लग गया। जिस लड़की से लगा वो इससे भी ज्यादा सुन्दर थी लेकिन इसे घास भी नहीं डालती थी। उसकी अपनी सीमाएं थीं जात-बिरादरी की। भाईसाहब उसकी राह में मारे-मारे फिरा करते। जाति और सम्प्रदाय के हिसाब से तो दोनों में जो अंतर था वो शायद पट भी जाता पर स्टेटस का फ़र्क पाटने के लिये लड़की वाले राजी नहीं थे। लिहाज़ा एक दिन इनको बुरी तरह पीट-पाट के रेलवे ट्रैक पर डाल आये। किस्मत अच्छी थी जो किसी की नज़र पड़ गयी और ये बच गये। कालान्तर में शर्मा जी एलआईसी में अफसर बने और उसी लड़की ने घर से भाग कर इनसे शादी की। घर-समाज सबने लड़की का बहिष्कार कर दिया। शर्मा जी ने भी अपने-पराये सबसे जम के मोर्चा लिया। इसीलिए शर्मा के घर बाहरी लोगों का आना-जाना कम है और घर वाला तो न कोई इनका है न उनका। लोग इनके बारे में न जाने क्या-क्या कयास लगाया करते हैं। पर इन दोनों की दुनिया अलग है जिसमें ये मग्न रहते हैं। वॉकर्स ग्रुप और ऑफिस यही शर्मा का बाह्य दुनिया से संपर्क है। मेरा तो घर का आना जाना है। कभी तुम्हें शर्मा के यहाँ चाय पिलवाता हूँ। इसकी बीवी बहुत ही ज़हीन  है। दोनों में गज़ब का सामंजस्य है। इन्होने शादी तो की लेकिन आज तक ये लोग अपने-अपने धर्म पर कायम हैं। 

हमारी चाय आ गयी थी। पुरवा हवा की जो तफ्तीश मुझे मिश्रा के यहाँ तक खींच लायी थी। वो पूरी हुयी। भिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे के धर्म का आदर करें, यही धर्म है। मेरा अपना मानना है धर्म के अलावा जो कुछ भी है वो अधर्म है। मजहब-पूजा पद्यति कितनी भी अलग हो लेकिन धर्म तो धर्म ही रहेगा। सर्वधर्म-समभाव सिर्फ नारे की चीज़ नहीं है। शर्मा दम्पति इसका एक जीवंत उदाहरण हैं। उनके प्रति आदर का उदगार है मेरा ये लेख। प्रभु हमारे देश वासियों को ऐसी ही सन्मति प्रदान करे। 

बाहर पुरवा अपने उफान पर थी। मेरे लिए ये ताज़ी बयार का झोंका था।      

- वाणभट्ट 

सोमवार, 26 मई 2014

जीनोटाइप

सत्य आधार जी सभा अध्यक्ष की कुर्सी पर पूरे ठसके के साथ विराजमान थे।

कुछ लोग कभी रिटायर नहीं होते। वे अपने कार्यकाल में इतने महान कार्य सम्पादित कर चुके होते हैं कि उनका जाना एक निर्वात खड़ा कर देता है। और इस खाली जगह को भरने के लिए उनके समतुल्य किसी व्यक्ति को खोज पाना वर्तमान शासकों के लिये निकट भविष्य में संभव नहीं हो पाता। लिहाज़ा ऐसे महान सेवकों को सेवाकाल में विस्तार से नवाज़ा जाता है। यदि सेवा विस्तार नहीं मिला तो तमाम परामर्श समितियों में साहब के समायोजन की पर्याप्त संभावनाएं होतीं हैं। कुछ नहीं तो उनके वैचारिक निवेश का सम्बल अगली पीढ़ी को मिलता रहेगा। यदि आपने अवकाश प्राप्त करने से पहले अपने पोस्ट रिटायरमेंट असाइनमेंट का जुगाड़ नहीं कर लिया तो आपकी अब तक की हुयी जोड़-तोड़ से अर्जित सभी उपलब्धियां व्यर्थ गयीं। नौकरी में रहते हुये जिसने भविष्य के उभरते सितारों के मेन्टॉर बन कर उनका मूल्य-सम्वर्धन कर दिया हो, उसका रिटायर हो जाना कतिपय असंभव है। आपके कार्यकाल के दौरान आपकी असीम अनुकम्पा से योग्यता और अयोग्यता के बावज़ूद जो आगे पदोन्नत होते चले गए, उनके लिए ऋण से उऋण होने का समय है आपका रिटायरमेंट। क्योंकि सिर्फ योग्यता के बल पर यदि कोई आशान्वित है कि वो परम पद प्राप्त करेगा तो वो अवश्य दिवा स्वप्न दोष विकार से पीड़ित होगा। ऋण से उऋण होने का तरीका है किसी प्रकार उनकी आवश्यकता को बनाये रखिये।   

ये सामाजिक प्रगति का ही लक्षण है कि व्यक्ति वानप्रस्थी की आयु में भी गृहस्थ आश्रम के आनन्द  छोड़ना नहीं चाहता। शिलाजीत और पुष्टिवर्धक औषधियों की कम्पनियाँ इन्हीं के भरोसे चल रहीं हैं। संन्यास की तो बात अब बेमानी हो गयी लगती है। चिकित्सा के क्षेत्र में हुए आविष्कार ये सुनिश्चित करते हैं कि जब तक गाँठ में पैसे हैं या जब तक आप न चाहें, धरती का बोझ कम होने से रहा। और कर्मयोगी मनुष्य के साथ दिक्कत ये है कि वो कर्म नहीं करेगा तो जीते जी मर जायेगा। इसलिए ऐसे कर्मयोगियों को अगर देश ने नहीं पहचाना तो ये अपना एनजीओ बना लेंगे। और एनजीओ को मिलने वाली सरकारी-गैरसरकारी अनुदान राशि से देश सेवा करते रहेंगे। जब तक साँसें है कोई ज़िन्दगी को झुठला नहीं सकता।  दिल का धड़कना भी ज़रूरी है। धड़कते दिल में कई स्टंट दफ़न हों तो भी चलेगा। क्योंकि चलती का नाम है गाड़ी। दिमाग जो साठ साल में ही सठियाने लगता है, उस पर प्रश्न करना देश के उदीयमान भविष्य पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर सकता है। ज़िन्दगी है तो सपने भी होंगे। शरीर शिथिल पड़ सकता है पर सपने नहीं। शिथिल शरीर के लिये पुरखों की जड़ी-बूटियां हैं, तेल-मालिश है। रहे सपने तो, दूसरों के खर्च पर हवाई यात्रायें और अतिथिगृहों में मिलने वाली सुविधाएँ आपको सदैव सपने देखने के लिए प्रेरित करतीं रहेंगी। सो जो-जो पुनीत कार्य आपसे अपने उत्पादक कार्य काल में छूट गए हों उन्हें करवाने के लिये यही सबसे मुफीद समय है। क्योंकि अब आपको सिर्फ ज़ुबान हिलानी है और शरीर किसी और को।     

सत्य आधार जी की आँखों में गाम्भीर्य झलक रहा था। और चेहरे पर अद्भुत ओज उनके द्वारा अर्जित उपलब्धियों का सहज बखान कर रहा था। समिति के अन्य सदस्य भी उन्हीं की तरह या तो अवकाश प्राप्त थे या उसी कगार पर पैर लटकाये बैठे थे। अपने अध्यक्षीय भाषण में साहब ने बताया कि किस प्रकार वो देश को अन्न की समस्या और कुपोषण से निजात दिलाना चाहते हैं। इसके लिये दूसरों को क्या-क्या कदम उठाने चाहिये और नयी पीढ़ी को क्या क्या करना चाहिये। किस प्रकार विकसित प्रजातियों और तकनीकों  प्रयोग करके फसलों का उत्पादन और उनकी उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है। उनके विचार, उनकी पावन जिव्हा से धारा-प्रवाह फूट रहे थे। 

उनके भाषण का लब्बोलबाब कुछ इस प्रकार था। भारत कृषि प्रधान देश रहा है और रहेगा। कृषि भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग १५% का योगदान करता है और ५०% जनसँख्या को रोजगार मुहैया करता है। आज आवश्यकता है तो इसे उद्योग की तरह अपनाने की है।आज बहुत सी उन्नत प्रजातियां हमारे प्रजनक लोगों ने विकसित कर दीं हैं। आवश्यकता है तो उनके प्रचार-प्रसार की। किसानों को उन्नत प्रजातियाँ अपनाने की। हम अभी भी औद्योगिक खेती से बहुत दूर हैं। थोड़ा आउट ऑफ़ बॉक्स थिंकिंग हो तो तो कृषि का उत्पादन दुगना करना ज्यादा कठिन नहीं है। यदि कृषि कार्यों में हुए मशीनीकरण को वृहद रूप से अपनाया जाए तो लागत मूल्य कम किया जा सकता है। कम समय में ज्यादा काम हो सकता है। पानी का समुचित प्रबंधन होना चाहिये। इसके लिए ड्रिप या स्प्रिंकलर्स का प्रयोग किया जा सकता है। बुआई से लेकर कटाई तक यदि सभी शस्य क्रियाओं के लिये आधुनिक यंत्रों का प्रयोग करें तो उसी भूमि से अधिक उत्पादन ले सकते हैं। फिर करीब १५-२०% उत्पादित अन्न उचित रख-रखाव और प्रसंस्करण के आभाव में खराब हो जाता है और खाने योग्य नहीं रह जाता।इसके लिए आवश्यक है उचित प्रबंधन। उचित प्रबंधन के द्वारा हम न सिर्फ अधिक अन्न का उत्पादन कर सकते हैं अपितु बल्कि उनका संरक्षण भी कर सकते हैं। आज हमारे पास ऐसी प्रजातियां हैं जो गर्मी झेल सकतीं हैं। एक्सट्रीम कोल्ड में भी सर्वाइव कर सकतीं हैं। ये रेनफेड एरियाज में कम पानी की स्थिति में भी संतोषजनक उत्पादन देतीं  हैं। वी मस्ट थिंक आउट ऑफ़ बॉक्स। थिस इज़ हाई टाइम। इसके लिए देश के इंजीनियरों और मैनेजरों को कृषि क्षेत्र में अपनी सहभागिता बढ़ानी चाहिये। माना कि कृषि में पैसा कम है किन्तु अपने देश और देश की बढ़ती जनसँख्या के लिये प्रोफेशनल्स को आगे आना ही होगा। इत्यादि-इत्यादि।  

बहुत ही ओजपूर्ण था सत्य आधार जी का भाषण। हमारे सिस्टम के हिट और फिट लोगों की एक खासियत है वो कभी उद्वेलित नहीं होते। उन्हें किसी कार्य के लिये प्रेरित करने के लिए वित्तीय प्रावधान का खुलासा करना आवश्यक है। अन्यथा उनके दोनों कान खुले रहते हैं। बड़े-बड़े देश सेवा के लिये उनको प्रेरित नहीं कर सके, तो सत्य आधार जी की भला क्या बिसात। लेकिन उनके हाव-भाव से ऐसा लगता मानो वे इस ओज पूर्ण भाषण को सुनने मात्र से कल से ही देश-सेवा में जुटने वाले हैं। कल से इसलिए कि कल किसने देखा है। ये लोग सभाओं में अपने विचार देने की अपेक्षा बंद कमरों में बॉस के समक्ष अपने उदगार व्यक्त करते हैं। इससे दो फायदे हैं। एक तो बॉस का समय, जो कट नहीं रहा होता है, कट जाता है। और दूसरा बॉस को ये ग़लतफ़हमी बनी रहती है कि यही मेरा वफादार चेला है। बॉस अगर फायदा न भी करे तो कम से कम नुक्सान तो नहीं करेगा। वफ़ादारी चीज़ ही ऐसी है जो दोनों तरफ से निभायी जानी चाहिये। ऐसा सिस्टम के ज्ञानियों और ध्यानियों का मानना है। 

सभा में इंजिनियर शर्मा भी बैठा था। उनकी उम्र अभी-अभी ऐसी गहन सभाओं में बैठने की हुयी थी। भाषण सुन कर उद्वेलित हो गया। इस देश के इंजीनियरों को ये ग़लतफ़हमी अक्सर हो जाती है कि सिर्फ वो ही आउट ऑफ़ बॉक्स प्राग्मेटिक सोलूशन्स सोच सकते हैं। जबकि शासन उनका उपयोग सिर्फ जिम्मेदारी फिक्स करने में करता है। फाइलों पर मलाई अफसर और उनका मुंह लगा बीए फेल बाबू खाये, जिम्मेदारी अभियंता की। बड़ी नाइंसाफी है। शर्मा ने कुछ बोलने के लिये हाथ खड़ा कर दिया। सभा में उपस्थित विद्वतजनों ने उसे घूर कर देखा। पर बेचारा देश के प्रति अपने कर्तव्यबोध के कीड़े के प्रभाव से उस क्षण ग्रसित हो गया लगता था। बोला सर मै कुछ कहना चाहता हूँ। चूँकि मामला आउट ऑफ़ बॉक्स और युवाओं का था, सत्य आधार जी को आज्ञा देनी पड़ी। बाकि सब बकरे की खैर मनाने में लग गये। उन्हें मालूम था कि सत्य आधार जी को सुनाने की आदत है, सुनने की नहीं। 

अपने अंध जोश से भरपूर शर्मा ने कहना शुरू कर दिया। सर मै मानता हूँ कि कृषि उद्योग नहीं है किन्तु इसने कितने ही उद्योगों को संरक्षण और पश्रय दे रक्खा है। बीज, कीटनाशक, खर-पतवारनाशक, कृषि यंत्र, भण्डारण, प्रसंस्करण सभी क्षेत्रों में अनेकों राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सक्रिय भागीदारी है। ये सभी कम्पनियाँ दिन-दूनी रात चौगनी तरक्की कर रही हैं। इनका ग्राहक या तो किसान है या आम उपभोक्ता। जबकि कृषि अपने आप में एक हानिकारक व्यवसाय बनता जा रहा है। एक ही कृषि क्षेत्र के लिए अनेक प्रजातियों के बीज संस्तुत हैं। बीज बनाने का काम कम्पनियाँ कर रहीं हैं, जिनके लिए किसान एक ग्राहक है और वो इनसे अपने उत्पाद का अधिकतम मूल्य वसूलतीं हैं। यदि एक क्षेत्र के लिए कम से कम प्रजातियां चिन्हित हों तो थोड़े प्रशिक्षण के बाद उनका बीज बनाना किसानों के लिए भी संभव हो सकता है। प्रजातियों के विकास से उत्पादन बढ़ाना सिंगल डाइरेक्शन सोच है। एक बार एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि वो मैदानी इलाकों के लिए ऐसी मछली विकसित कर रहा था जो ठण्ड में न मरे। मैंने उसे राय दी की भाई ठन्डे इलाके की मछली ले आओ शायद वो जिन्दा रह जाए। लेकिन फ्री की राय में वित्तीय प्रावधान तो होता नहीं इसलिए वो भाई अभी तक अपने प्रयास में तन-मन-धन से लगे हुए हैं। संभवतः हम सभी कृषि समस्याओं का समाधान फसल सुधार के द्वारा करना चाहते हैं। किन्तु अच्छे से अच्छे बीज को चाहिए खाद, पानी और उचित प्रबंधन। खाद्यान्नों की उत्पादन और उपलब्धता बढ़ाने के लिये समग्र दृष्टि की आवश्यकता है। अच्छे बीज, उर्वर भूमि, समुचित जल प्रबंधन, उचित शस्य क्रियाएँ और साथ में मशीनीकरण, भण्डारण और प्रसंस्करण में ग्रामीण सहभागिता के द्वारा ही हम कृषि को उद्योग के रूप में स्थापित कर सकते हैं। किसी भी उद्योग के लिये ब्रेक इवन पॉइंट का निर्धारण किया जाता है। इसी प्रकार कितनी भूमि और कितनी पैदावार किसान के लिये फायदेमंद होगी इसका आँकलन ज़रूरी है। जितना प्रयास हम फसलों को उन्नत करने में कर रहे हैं उससे कम खर्च में वर्षा और भूगर्भ जल का संचयन और संवर्धन कर के हम अधिक से अधिक वर्षा आधारित कृषि क्षेत्र को सिंचित क्षेत्र में बदल कर पैदावार बढ़ा सकते हैं। इससे मौसम पर हमारी निर्भरता कम होगी और मौसम की मार से भी रहत मिलेगी। सर आज की लड़ाई हमें उन्हीं हथियारों से लड़नी है, जो हमारे हाथ में हैं। सस्टेनेबिलिटी अर्थात निरंतरता किसी भी उद्योग का मूल है। ये बात कृषि पर भी लागू है। उन्नत प्रजातियों की उत्पादन क्षमता और वास्तविक उत्पादन में सदैव अंतर रहा है। हमें ऐसे प्रबंधन परिक्षण करने चाहिये जिससे हम उत्पादन को उस प्रजाति की अधिकतम उत्पादन क्षमता तक ले जा सकें। ऐसा बोल के इंजिनियर शर्मा आत्मविभोर होकर चुप हो गया। उसे लगा उसने देश की खाद्यान्न समस्या सिर्फ अपनी बातों से सुलझा दी। उसे क्या पता था कि विद्वान लोग समस्या को सुलझाने नहीं उलझाने में यकीन रखते हैं। समस्या है तो विद्वान हैं। समस्या खत्म तो विद्वान की आवश्यकता भी ख़त्म हो सकती है।   

इस बीच सभा में उपस्थित सभी के चेहरे पर विभिन्न हाव-भाव आते और जाते रहे। शर्मा के खैरख्वाह आँखें मार-मार के उसे चुप होने को आगाह करते रहे। पर उस पर तो जैसे विक्रम वाला वेताल सवार था, ये बात अलग थी कि यहाँ हलाल वेताल को होना था और ठहाके विक्रम को लगाने थे। सत्य आधार जी को सुनने की आदत तो थी नहीं। उन्हें शर्मा का इस प्रकार बोलना अखर गया। लेकिन इस बक्से के बाहर की सोच को वो चुप भी नहीं करा सकते थे। वो मुस्कराते हुए बोले इंजिनियर तुम्हें अपना जीनोटाइप मालूम है। शर्मा आश्चर्यचकित सा बोला - नहीं सर। "तुम्हारा जीनोटाइप है यूएसए टाइप। यू नो मीनिंग ऑफ़ यूएसए, इट्स अन-सटिस्फाइड आंटी यानि असंतुष्ट चाची"। पूरी सभा सन्नाटे में आ गयी। अपने गज़ब का सेन्स ऑफ़ ह्यूमर की तारीफ करते हुये सत्य आधार जी का ठहाका कमरे में गूँज रहा था।

शर्मा ने सत्य आधार (जी की अब कोई गुंजाईश न थी) की आँखों में आँखे घुसेड़ दीं। सर आपने न सिर्फ मेरा बल्कि अपना जीनोटाइप भी बता दिया। साऊथ अफ्रीका। उसके बाद जो हुआ वो कहानी का हिस्सा नहीं है। 

- वाणभट्ट

मंगलवार, 20 मई 2014

गुज़र तो जाएगी तेरे बगैर भी लेकिन...

एक दिन सपने में देखा सपना। वैसे सपने में सपना देखने का कॉपीराइट चचा गुलज़ार का है। पर वो भतीजा ही क्या जो चाचा के माल पर अपना अधिकार न समझे। तो साहबान सपने में सपना इसलिए कि ऐसे सपनों के सपने में भी सच होने की सम्भावना असंभव सी लगती है। जैसे अमिताभ बच्चन फिल्मों में अमोल पालेकर की वजह से मार्केट से आउट हो जाये। ये सपना भी कुछ ऐसा ही था। हमारे महान देश में व्यवस्था परिवर्तन हो गया है। और वो भी कोई छोटा-मोटा नहीं। अमूल-चूल। सरकार ऐसी जो सेवा करना चाहे। नौकरशाही भ्रष्टाचार से मुक्त। सारे काली कमाई वाले जेल के अंदर। पेट की खातिर जुर्म करने वाले जेल के बाहर। सबको रोजगार। दगाबाज और देशद्रोहियों की खैर नहीं। न सिर्फ विदेशों में पड़ा काला धन बल्कि देश में जमा सारा काला धन कुर्क कर लिया गया।काले-सफ़ेद सभी तरह के हराम के धंधे बंद। पुलिस चाक-चौबंद। शुद्ध जल और वायु। प्रदूषण का अंत। गंगा साफ़। इधर-उधर गंदगी फैलाना और थूकना ख़त्म। सांप्रदायिक सदभाव, सर्वत्र व्याप्त। नारी उत्पीड़न और दहेज़ मानो बीते ज़माने की बात। पडोसी मुल्कों की क्या मज़ाल कि हमारी ओर आँख भी उठा सकें। दूर देशों में हमारे सामानों का निर्यात बढ़ गया है। चीन और अमरीका के बाजार भारतीय सामानों से अटे पड़े हैं। लोकपाल आ गया। किसी पर आय से अधिक संपत्ति का शक हुआ नहीं कि वो जांच की गिरफ्त में। राम-राज्य का सपना जो प्रभु राम के समय भी पूरा न हो सका था, पूरा हो गया। ये सपना किसी एक ने देखा ऐसा न था। देश के सभी भ्रष्टों को एक साथ सुबह चार बज के पैंतालीस मिनट पर ये सपना आया। इतना भयावह सपना सपने के अंदर ही देखा जा सकता है। सब अंदर तक हिल गए। सुबह का सपना है कहीं सच हो गया तो।

जिस प्रकार त्रिजटा राक्षसी को लंका दहन से पहले ही अनिष्ट की सम्भावना हो गयी थी एक स्वप्न के माध्यम से। भ्रष्टों के भ्रष्ट भी इस दुःस्वप्न को लेकर चिंतित हैं। किन्तु रावण को भी मरते दम तक ये एहसास कहाँ हो पाया कि वो गलत पक्ष और वजह के लिए लड़ रहा है। इस धन-बल से ग्रसित महाबलियों को भारत के महान लोकतंत्र पर वृहद आस्था है। वे आश्वस्त हैं कि बरसों से पुष्पित-पल्लवित हमारे पुरखों की भ्रष्टाचार में लिप्त विरासत सिर्फ सरकार बदल जाने से दम तोड़ दे ऐसा कतिपय संभव नहीं। ऐसा कभी हो सकता है कि आज़ादी के पहले और आज़ादी के बाद की गुलामी और कुशासन का जीवन जीते-जीते जनता जाग जाए और पूरे के पूरे सिस्टम को ही कटघरे में खड़ा कर दे। जनता बदलाव चाहती है जबकि सत्ता वर्षों से पोषित कुव्यवस्था को ही महिमा मंडित करने में लगी रहती है। हर देश में विषमताएं होती ही हैं। सत्ता कम से कम प्राकृतिक समस्याओं के समाधान में लगी रहतीं तो भला था। पर यहाँ तो सत्ता ने अनेक मानव निर्मित विषमताएं रच डालीं। जिस भी क्षेत्र पर शासन की नज़र पड़ी समस्या पैदा हो गयी। देश है तो समस्याएं हैं, समस्याएं हैं तो उनके समाधान खोजने के लिये विद्वतजन हैं। विद्वतजन कोई सस्ता उपाय बतायें तो हर कोई अपना ले। लेकिन फिर बजट भी कम हो जायेगा। जब बजट होगा तो उसके कार्यन्वयन में सरकारी अमला होगा। इस अमले में हर एक के आगे पेट लगा है और जब पेट लगा है तो भूख भी होगी। और भूख है तो पहले अपनी-अपनी बुझाओ, देश गया भाड़ में। ऐसी महान सेवा भावना के आगे हर किसी को नत-मस्तक देख हर किसी ने इसे ही सफलता का मूल-मन्त्र मान लिया है। जिनके पास ऐसी नौकरी नहीं है तो ये मान लिया जाता है कि इनके पास न तो पेट होगा न भूख। यही वो लोग हैं जिनकी सेवा के लिए सरकार बनी है। इनमें मज़दूर, किसान, व्यापारी व  अन्य प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले शामिल हैं। अपने जीविकोपार्जन में व्यस्त इन लोगों में तोंद जैसी उपलब्धि खोज पाना थोड़ा दुर्लभ है। यदि कोई भी व्यक्ति इस एक्सेसरी से युक्त है तो मान लीजिये वो किसी न किसी प्रकार से दूसरों के हिस्से का भोगी या भागी है।

भ्रष्टाचार की जड़ में है समस्या की खोज। सभी विद्वतजन मिल बैठ कर सरकार को ये बताते हैं की फलां जगह फलां समस्या है। समस्या जब तक छोटी है वो समस्या नहीं है। समस्या का आकर उसके समाधान में होने वाले फण्ड द्वारा निर्धारित होता है। इस क्षेत्र में विदेशी ट्रेनिंग और एक्सपर्टीज़ की जरुरत हो तो समस्या सार्वभौमिक टाइप की हो जाएगी। जिसका समाधान विदेश यात्रा करने मात्र से निकल आएगा। कुछ समस्याओं की ओर विद्वत जन  मात्र इस लिए ध्यान नहीं दे रहे हैं कि विदेशों में इनका समाधान नहीं है। ऐसी ही समस्या है गाँवों में नील गाय और शहरों में बंदरों की बढ़ती तादाद। पर अभी इन समस्याओं का आविर्भाव विकसित देशों में नहीं हुआ है इसलिए इनका समाधान मिलना मुश्किल है। इनके समाधान में ज़्यादा बजट एलोकेट करने की  गुंजाईश भी नहीं है लिहाजा हमारे विद्वानों का इनको समस्या मानने से भी इंकार है। साठ के दशक में नील गाय की समस्या का ज़िक्र संसद में मिलता है जब इसे वनरोज डिक्लेयर करने की बात उठी थी। पर बहुत संभव है उपयुक्त बजट एलोकेशन के आभाव में इस समस्या को स्थगित कर दिया गया हो। जब तक खाने-पचाने के लिये बजट में पर्याप्त प्रावधान न हो समस्या को नज़रअंदाज़ करने में ही देश और समाज का हित है। एक तरफ समस्या के परिमाण को दिनोदिन बढ़ाते जाइये दूसरी तरफ ऐसा इलाज खोजने में शक्ति-संसाधन व्यय कीजिये जो कारगर न हो सके।


बाढ़-सूखा, आंधी-तूफान तो प्राकृतिक आपदाएं हैं। पर इनका समाधान तो मनुष्य के द्वारा ही किया जा सकता है। भारत की समृद्ध जलवायु इस बात आश्वासन तो देती ही है कि यदि सूखा नहीं पड़ा तो इस वर्ष बाढ़ अवश्यम्भावी है। ऐसे में प्राकृतिक आपदा प्रबंधन विभाग को ज़्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। सूखा और बाढ़ राहत पैकेज का डाटा तो कम्प्यूटर में फीड है। जनसँख्या के हिसाब से डाटाबेस खुद ही फण्ड का आंकलन कर देता है। बस प्रिंट कमांड देना है और वित्तीय प्रावधान निकल आएगा। पर इस प्रकार की आपदा से पीड़ित लोग अमूमन आम आदमी होते हैं। जिन्हें ये तक नहीं मालूम होता कि वो खबरों की सुर्खियां बन चुके हैं। टाइम्स के फ्रंट पेज पर उनकी फोटो छपी है और सरकार ने उनकी पुनर्स्थापना के लिए लाखों की राशि संस्तुति कर रखी है।

कुछ शासन निर्मित समस्याएं भी हुआ करतीं हैं। अक्सर इनके साथ वोट चिपका होता है। फलां जाति-सम्प्रदाय के लोग पुअरेस्ट ऑफ़ पुअर की श्रेणी में आते हैं। इसलिए उन्हें मुफ्त रोटी, कपडा और मकान मिलना चाहिये। उन्हें शिक्षा भी मिलनी चाहिये। कोई ये बताये की यदि किसी को जीवन के लिए आवश्यक चीजें बिना परिश्रम के मिल जाए तो वो काम ही क्यों करे और पढाई तो करने का सवाल ही नहीं उठता। ये बात अलग है कि इन लोगों के नाम पर जो राशि स्वीकृत हुयी, उसे उन्हीं के कुछ बंधु -बांधव, नेता-मंत्री-संतरी मिल-बाँट के चट कर गये। ऐसी ही कुछ सार्वदेशीय समस्याएं हैं बिजली-पानी-सड़क। ये अगर लोगों को मिल गया तो लोग ज़्यादा समृद्ध हो जाएंगे। समृद्ध हो जाएंगे तो टी वी देखेंगे। पढ़-लिख भी लेंगे। देश-दुनिया देख कर ही तो आज़ादी के दीवानों को लगा कि हम गुलाम हैं और गुलामों की कोई आवाज़ नहीं होती। ज्ञान मिल गया तो सोचने भी लगेंगे भला हमारा देश दूसरे फिसड्डी देशों से पीछे कैसे। सरकार में कमी है तो सरकार बदल दो। और सत्ता गयी तो वर्षों का पाला-पोसा सिस्टम भी बदल जायेगा। और सिस्टम बदल गया तो कौन भला हमारी और हमारे पेट की सोचेगा। आज़ाद लोग सिस्टम के काम नहीं आते बल्कि वो सिस्टम से काम लेने लगते हैं, जवाबदेही तय करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में फख्र से अर्जित नौकरी असली नौकरी में बदल जाती है। जब मुखिया ही खुद को नौकर नंबर वन मानता हो तो ऐसी स्थिति में परमानेंट-गवर्नमेंट-सर्वेंट नौकरी का क्या लुत्फ़ ले पायेगा। तुर्रा ये कि किसी भी समय कोई पीछे पड़ गया तो आय से अधिक संपत्ति लोकपाल हड़प लेगा। ऐसा जीना भी कोई जीना होगा। ऐसे में एक ही शेर जेहन में कौंधता है - 

गुज़र तो जाएगी तेरे बगैर भी लेकिन 
बहुत उदास बहुत बेकरार गुज़रेगी...


- वाणभट्ट


शनिवार, 5 अप्रैल 2014

लोकतंत्र में विचारधारा का महत्त्व


लेखक क्या है विचारों के बिना। अलबत्ता मुझे ये गलतफहमी कभी नहीं रही कि मै लेखक हूँ। पर गाहे-बगाहे कुछ इष्ट-मित्र मेरी पोस्टों पर अपनी टिप्पणियाँ दे कर मुझे अनुग्रहित करते रहते हैं। मै सदैव उनका ह्रदय से कृतज्ञ रहता हूँ और रहूँगा भी। ये बात अलग है कि मै बिना पढ़े उनके ब्लॉग पर 'वाह -वाह क्या बात है' टाइप की टिप्पणी नहीं करता। इसलिए चार सालों में मेरी टी आर पी (फॉलोवर लिस्ट) अभी तक बमुश्किल ५७ ही पहुंची है। अन्य दिग्गज ब्लॉगरों की तीन-चार सौ से ऊपर देख के रश्क होना स्वाभाविक है। कई गुरुघंटालों को साधने की कोशिश भी की कि गुरु ये बताओ टी आर पी  बढ़ाने  के लिए तुमने कौन सी जुगत लगाई। तो गुरु लोग संजीदा हो जाते हैं कहते हैं अपनी लेखनी में जादू लाओ लोग खुद-बखुद तुम्हारे फॉलोअर बन जायेंगे। हाल ही में टॉप ३०० पठनीय हिंदी ब्लॉगरों की लिस्ट का कहीं से आविर्भाव हुआ है। एक स्वनाम धन्य ब्लॉगर महोदय ने लड़-भिड़ के अपना नाम इस फेहरिस्त में घुसेड़वा भी लिया है। लिखा-पढ़ी करके कुछ ब्लॉग के महारथियों से सिफारिश से बंदा लिस्ट को शुभ अंक ३०१ करवा भी लेता। किन्तु ऐसा करने से मेरे महान गुरु बाणभट्ट, खुदा उन्हें जन्नत बख्शे, की आत्मा को असीम कष्ट होता। जिस गुरु ने अपने जीते जी राजा-महाराजाओं के ज़माने में चाटुकारिता का साथ देने से इंकार कर दिया हो, उसका ये कलयुगी चेला वाणभट्ट सिर्फ टी आर पी के लिए इतना गिर जाये, ये शर्म की बात है। आजकल तो बेशर्मी हद के पार हो गयी है और भाई लोगों ने तो मुहावरा ही गढ़ डाला कि जिसने की शरम उसके फूटे करम। तो भाइयों और बहनों अपनी फूटी किस्मत को लेकर अपने महान गुरु का नाम ख़राब करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। एकलव्य टाइप का चेला हूँ। गुरु की स्वतः प्रेरणा से आज मै कुछ ऐसा लिखने पर आमादा हूँ जिसे इस बार ५-१० से कुछ ज्यादा टिप्पणियां मिल जाएँ। २-४ लोग टी आर पी में जुड़ जायें। गुरु मुझ पर ऐसे ही कृपा बनाये रक्खें। इससे ज्यादा वाणभट्ट को और क्या आकांक्षा रखनी चाहिये। इस आशय से मैंने सामायिक विषय भारत के लोकतंत्र में चल रही महाभारत को मुद्दा बनाने का फैसला लिया है।

चौसर बिछ चुकी है। हर दल अपने-अपने शकुनियों के भरोसे चालें चल रहा है। पूरी की पूरी महाभारत करा देने वाले मामाश्री रणभूमि से विरक्त ही रहे। बहन के पूरे कुनबे का नाश पीटने के बाद मामा का उह-लोक गमन किस प्रकार हुआ, इस बारे में मेरा ज्ञान सीमित है। ये तो निश्चित है कि मामा जी ने कुरुक्षेत्र में युद्ध करते हुए अपने प्राण नहीं गंवाएं होंगे। और कुरुक्षेत्र के मैदान में कोई शकुनि नाम का प्राणी यदि सहदेव के हाथों मारा भी गया होगा तो शकुनि का बॉडी डबल रहा होगा। इतना इंटेलिजेंट मामा युद्ध में जाने की बेवकूफी नहीं करेगा। महाभारत एक ऐसा ग्रन्थ है जो हर देश-काल में फिट बैठता है। और हमारे देश का चुनाव किसी महायुद्ध से कम है क्या? एक तरफ़ सत्ता पक्ष का गठबंधन है तो दूसरी तरफ विपक्ष गुटबाजी में लगा है। परन्तु आज के इस युद्ध में ये कहना मुश्किल है कि पांडव कौन है और कौरव कौन। दोनों पक्षों में दुर्योधन भी हैं और दुश्शासन भी। कुछ पितामह हैं। कुछ आचार्य हैं। हर दल में धृतराष्ट्र भी हैं और गांधारी भी। जितने पात्रों की महर्षि वेद व्यास ने उस समय मात्र कल्पना की होगी आज साक्षात् भारत की पावन धरा पर अवतरित हो चुके हैं। और २०१४ के इस महासंग्राम में अपनी-अपनी ताल ठोंक रहे हैं। दरअसल ताल होती ही ऐसी जगह है जहाँ कोई दूसरा ठोंक नहीं सकता। जिसे कोई दूसरा ठोंक सके वो शरीर में ताल के ठीक विपरीत स्थापित है। बस एक विचार आ गया तो सोचा इसे भी चटका दिया जाये।

बात विचार से शुरू हुयी थी। लोकतंत्र में विचारों का महत्त्व। जब किसी एक के विचार को नासमझ लोगों की पूरी की पूरी फ़ौज सिर्फ इसलिए मानने लग जाए कि नेता जी की जी-हजूरी में ही अपनी भलाई है तो यही विचार, विचार-धारा में तब्दील हो जाते हैं। विचार भी उन्हीं के मानने योग्य माने जाते हैं जिनके पास पद-धन-बल की ताकत है। ये बात कोई नहीं पूछता कि ये ताकत आपने किस प्रकार अर्जित की है। अगर आपको लगता है कि आपके विचारों और जेब में दम है, तो हमारा जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, आपको इजाज़त देता है कि आप अपनी एक पार्टी बना लें। खुद को उसका सीईओ नियुक्त कर लें। भूखे-बेरोजगार और दारुबाजों की निरंतर बढती जनसंख्या किसी भी उदीयमान नेता को निराश नहीं करती। और नेता का खून तो सिर्फ और सिर्फ अपने इर्द-गिर्द छाये चापलूसों के नारों से ही बढ़ता है। उसे छुहारा-बादाम-मिश्री खाने की ज़रूरत नहीं है। एक बार आप नेता बन गए तो विचार आपके पेटेंट हो जाते हैं। इस देश में हर वो शख्स महान हो सकता है जो भोले-भाले लोगों को सपने बेच सके। पूरा का पूरा फ़िल्म उद्योग इस बात का जीता-जागता सबूत है। जिन्हें एक वख्त की  रोटी नसीब नहीं होती वही लोग सल्लू मियां की  दबंग को हिट करा देते हैं। फ़िल्म या टी वी  देख के कोई कह सकता है कि भारत में हर जगह गरीब और गरीबी ही दिखायी देती है। सत्ता पक्ष के लोग इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। वो हर साल लाखों लोगों को गरीबी रेखा के ऊपर कर देते हैं। ये रेखा कुछ वैसी ही रेखा लगती है जैसे हाई जम्प में रॉड लगायी जाती है। अगर नहीं डांक पाये तो उसे नीचे कर लो। जितने गरीब रेखा के ऊपर जा रहे हैं उससे दुगनी संख्या में नए गरीब पैदा हो रहे हैं। पहले हर घर में साईकिल बड़ी चीज़ हुआ करती थी। आज झोंपड़-पट्टे में भी मोटरसाइकिल और टीवी आम हो गए हैं। गांव-गांव, गली-गली में लोगों को हिंदी सिनेमा ने कपडे पहनने के तौर-तरीके सिखा दिए हैं। ब्यूटी पार्लर का चलन अब शहरों-कस्बों तक ही सीमित नहीं रह गया है। पहले के गरीब सिर्फ दो वक्त की रोटी की आस रखता था। अब की गरीबी मानसिक है। अगर आपके पास साईकिल है तो मोटरसाइकिल के ख्वाब आपको सोने नहीं देंगे, और मारुती है तो हौंडा सिटी के। तनख्वाहें बढ़ीं हैं पर लोगों के सपने भी बेलगाम हुए हैं। लोग खाने से ज्यादा दिखाने में लगे हुए हैं। जिस तरह लोगों का क्रेज़ मोबाइल जैसे गैजेट्स पर होना शुरू हुआ है, लगता है लोग बिना खाने के तो जी सकते हैं पर बिना बतियाये नहीं। और नेता लोगों का काम ही क्या है, बुझे-मुरझाये लोगों में आशा का संचार करना। जैसे अच्छे स्वाद पर सबका हक़ है वैसे ही देश की अमीरी पर भी सबका हक़ होना चाहिये। और वो भी बिना शर्त, बिना मेहनत मिलना चाहिये। गरीबों का मसीहा बनने के लिये अमीरों को गाली दीजिये और धीरे-धीरे अमीरों की  लिस्ट में शामिल हो जाइये। नेताओं की संख्या और उनकी चल-अचल संपत्ति में जितनी वृद्धि गत वर्षों में हुयी है वो कल्पनातीत है। ३००-४०० परसेंट का ग्रोथ उद्योग और उद्यम के किसी क्षेत्र में शायद ही मिला हो। पर नेतागिरी में ये आम है। गरीबी हटाते-हटाते ये कब अमीर हो गए इन्हें खुद पता नहीं चला। अगर नूरजहाँ आज होतीं तो कश्मीर के लिए कश्मीर जाने की  कोई ज़रूरत नहीं थी। कश्मीर खुद दिल्ली आ जाता। और मोहतरमा कहतीं कि धरती पर अगर नेताओं के लिये स्वर्ग है तो बस यहीं है, यहीं है, यहीं है।

और कोई हर-हर, घर-घर पहुंचा हो या न पहुंचा हो पर इसमें शक़ नहीं कि टीवी की आज वही स्थिति है जिसकी इस देश का हर नेता कामना करता था। क्या गांव क्या कस्बे। क्या गली क्या कूचे। टीवी के साइज़ और दाम में अंतर हो सकता है पर अब इस माया का वास घर-घर पहुँच गया है। रही-सही कसर चैनेलों ने कर दी है। देश-दुनिया में क्या हो रहा है और हमारे यहाँ क्या हो सकता है, इस पर देश का बच्चा-बच्चा बोल सकता है। इस तकनीक ने देश में सूचना क्रांति ला दी। अब बच्चा पड़ोस के चचा यानि अंकल, जो एक सर्वमान्य-सर्वव्याप्त शब्द हो गया है, की शक्ल भले न पहचान पाये न पहचान पाये पर मलिंगा और क्रिस गेल को ज़रूर पहचानता होगा। इस क्रांति का श्रेय सत्ता पक्ष लेने में जुटा रहता है पर मुझे ये तरक्की उपभोक्ता वाद की प्रतीक लगती है। आपने सिर्फ दरवाज़ा खोला और बाहर का बाज़ार आपके घर में घुस गया। आज अगर कोई देसी तकनीक गलती से मिल भी जाये तो लोगों को उस पर भरोसा नहीं होता। लेकिन अगर कटरीना या करीना किसी विदेशी उत्पाद को एंडोर्स कर दें तो गांव में भी उस वस्तु का मार्केट तैयार हो जाता है। भारतेन्दु जी होते तो ज़रूर कहते कि घर की तो बस मूंछें ही मूछें हैं। इस तकनीक के सहारे हमारे और आपके घरों में पैठ गया एक ऐसा कल्चर जिससे अभी तक हम वंचित थे। अब हमें ये मालूम है कि हमारे पास क्या-क्या नहीं है और उसके लिए कितने पैसे चाहिए। मौजूदा आमदनी के स्रोतों से तो उतना धन अर्जित करने में कई जनम लगेंगे पर हमारी लालसा सब इसी जनम में पाने की है। भले ही झूठ बोलना पड़े या किसी का गला काटना पड़े। चाहतों का अम्बार है और उसे पूरा करने के लिये क़र्ज़ की व्यवस्था भी सहज उपलब्ध है। और जो ये तुरत-फुरत चाहता है उसके लिए नेतागिरी या किसी स्थापित नेता की चमचागिरी ही एक मात्र विधान है। 

टीवी के जरिये हर बार चुनावी दंगल और भी दिलचस्प हो जाता है। पहले जिन नेताओं को देखने-सुनने को लोग घंटों ग्राउंड पर इंतज़ार करते थे वो आज आपके साथ डिनर कर रहे हैं। टटपुंजिया से टटपुंजिया नेता कुछ ऐसा बोल देगा कि न्यूज़ चैनेलों को मसाला मिल जायेगा। फिर आप भला कैसे उन्हें पहचानने से इंकार कर सकते हैं। नेता तो नेता, उनके परिवार के मेम्बरान और यहाँ तक कि उनकी गाय, भैंस और कुत्तों का भी साक्षात्कार ले लिया जाता है। उनकी लाइक्स और डिस्लाइक्स का भी ख्याल रखा जाता है। नेता जी को जब गाय का दूध निकालते दिखाया जाता है तो आम आदमी को लगता है कि ये नेता हमारे बीच का है। ये बात तो बाद में पता चलती है कि नेता जी पहले ही अमरुद हो गए थे और सेटिंग के चलते ही मिडिया में छाये रहते हैं। वर्ना हर ऐरा-गैरा नेता मीडिया में आने के लिए इरादतन और गैरइरादतन उट-पटांग बकने से बाज नहीं आता। चुनावी समर में हर नेता से रु-ब-रु होने का मौका मिल रहा है। पार्टी लाइन से हट कर सबके विचार और विचार-धाराओं से अवगत होने का ये सुनहरा मौका है। हर पार्टी अपने को दूसरे से बेहतर बताने में जुटी हुयी है। हर प्रत्याशी जिताऊ या नॉन-जिताऊ कैटेगरी में रक्खा जा रहा है।  हर आदमी एक वोट में बदल गया है। चैनेलों के ओपिनियन पॉल मुकाबले को और भी दिलचस्प बना रहे हैं। महान नेता जो पार्टी के मुखिया के विरुद्ध मूक बने रहते थे, विरोधी पार्टी का पश्रय पा कर मुखर हो रहे हैं। जिसे टिकट नहीं मिला उसने बगावत कर दी। जो पहले एक पार्टी की विचारधाराओं का पोषण करता था, अब दूसरी पार्टी की नीतियों का गुणगान कर रहा है। चुनाव से ठीक पहले टिकट न मिलने से उपजे असंतोष और इस असंतोष से उपजी पार्टी छोड़ के दूसरे दलों की ओर पलायन की प्रवृत्ति, ये सिद्ध करती है कि नेताओं में किसी पार्टी या पार्टी के विचारों के प्रति प्रतिबद्धता का सर्वथा आभाव है।

फिर मेरा ध्यान गया सभी पार्टियों की मूल विचारधारा पर। सभी पार्टियाँ देश में सुशासन की बात कर रहीं हैं। सभी सांप्रदायिक एकता के लिए कृतसंकल्प हैं। सभी भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। सभी सर्वशिक्षा और सर्व सशक्तिकरण की बात कर रहे हैं। सड़क और बिजली और पानी और स्वास्थ्य सब देना चाहते हैं सबको। सबके रोजगार और आमदनी की गारेंटी सब नेता ले रहे हैं। सब विदेशी धन भारत वापस लाना चाहते हैं। सबका ध्यान गरीब, कामगार और किसानों पर है। ये तबका ही सबसे बड़ा वोटर है। इसलिए हर किसी के पास इनके लिए योजनाओं का भण्डार है। अफ़सोस होता है जब एक जमीन के मालिक किसान को भी गरीब की श्रेणी में रख दिया जाता है। ये बात अलग है कि उसी के खून-पसीने से पूरे देश का पेट भर रहा रहा है। और अगर वो कार कंपनियों की तरह फिक्सड और वर्किंग कैपिटल का आंकलन कर अपना मुनाफा भी जोड़ दे तो महँगी विदेशी कारों में घूमने वाले बड़े-बड़े धन्ना सेठों को रोटी के लाले पड़ जायें। किसी कवि ने कहा था कि सिर्फ दिमाग से खाने-कमाने वाले मेहनतकश से चढ़ कर बोलें, ऐसी व्यवस्था बदल जानी चाहिये। परन्तु सत्ता में आने के बाद सब औद्यौगीकरण और व्यापार के द्वारा पूंजीवाद का राग अलापते नज़र आते हैं। रोटी-कपडा-मकान जैसी मूलभूत समस्यायें हर चुनाव का मुद्दा बन जातीं  हैं और चुनाव के बाद यही समस्याएं गौण हो जातीं  हैं। जो नेता चुनावी मौसम में गरीबों के हमदर्द बने फिरते थे सत्ता में आ कर उनके लिए योजनाएं बनाते हैं और फिर कहते हैं कि जनता तक १० फीसदी रकम ही पहुँच पाती है क्योंकि भ्रष्टाचार है। अगर हमें वोट दोगे तो देश से भ्रष्टाचार अलविदा कह देगा। सभी पिछड़ों को आगे लाना चाहते हैं और अगड़ों को पीछे ले जाना चाहते हैं। ताकि सामाजिक न्याय हो सके। भगवान ने जब सृष्टि बनाई तो हर प्राणी को कुछ गुण दिये ताकि वो जीवन-यापन कर सकें। किसी को ताकत दी तो किसी को भागने की क्षमता। पर भाई लोग ये सिद्ध करने में लगे हैं स्त्री-पुरुष, ज्ञानी-अज्ञानी, निर्धन-धनी सब बराबर हैं। अगर बराबर नहीं हैं तो हम एक ऐसी व्यवस्था प्रतिपादित करेंगे जो सबको बराबर कर देगी। इनका बस चले तो इस व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर लागू कर दें। अमेरिका से कहें कि ७०% हमारे आदमियों को ढोना आपकी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है। आपको अमीर होने का अधिकार तब तक नहीं मिल जाता जब तक धरती पर गरीबी और लाचारी है। सभी अपनी-अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए राज्यों के विभाजन के पक्ष में हैं। सम्भवतः मूल भावना ये हो कि बड़े राज्य में नेता ज्यादा हो जाते हैं और कम्पटीशन बढ़ जाता है। राज्य छोटे होंगे तो हमारे लग्गू-भग्गू भी कमेटियों के चेयरमैन बन जायेंगे। बड़ी सेवा की है उन्होंने पार्टी और नेता की। पूरी बात का लब्बोलाबाब ये है कि हर कोई देश की प्रगति चाहता है और भारत के हर आदमी को खुशहाल देखना चाहता है। तो फिर प्रश्न ये उठता है कि हमारी विचारधारा आपकी विचारधारा से अलग कैसे।

इतिहास गवाह है कि पक्ष और विपक्ष संसंद में इन्हीं सब मुद्दों पर एक नहीं हो पाते। भाई जब सब एक ही चीज़ चाहते हो तो कैसी दिक्कत है। ये महाभारत समझ के परे है कि दोनों एक ही बात कर रहे हैं पर विचार अलग हैं। पुरानी महाभारत में एक लेना चाहता था तो दूसरा देने से इंकार करता था। विचारों का भेद रणक्षेत्र में बदल गया। महाभारत हो गयी। पर वो उन्नीस दिन में समाप्त भी हो गयी। बुराई पर अच्छाई की विजय हर कहानी का सुखद अंत है। पर ये कैसी लड़ाई है जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही है। एक पक्ष जब सत्ता में आये तो वो १०० डैम बनवा दे। हर रोज़ १० किमी सड़क बनवा दे। साल में ५० भ्रष्टाचारियों को ही नाप दे। विपक्ष कहे कि जब हम सत्ता में आएंगे तो इसका दूना करके दिखायेंगे। साझा सहयोग से देश प्रगति के पथ पर बढ़ जायेगा। पर यहाँ तो होड़ लगी है एक-दूसरे को नीचा दिखने की। सब दूसरे को चोर और नाकारा साबित करने में लगे हैं। सांप्रदायिक ताकतें देश के लिए खतरा बन जाएंगी, ये अभी-अभी पता चला है। सांप्रदायिक लोग गंगाजल ले कर असाम्प्रदायिक होने की बात कर रहे हैं तो तथाकथित गैरसंप्रदायिक ये सिद्ध करने में लगे हैं कि ये दिखावा है। नेता ये पब्लिक है सब जानती है जैसे नारे दे कर जनता को बेवकूफ बनाते रहे हैं। और जनता की बेवकूफियों का हर इलेक्शन में इम्तहान होता है। कम से कम एक चीज़ तो सभी चुनावों ने सिद्ध की है कि हम इस इम्तहान में अव्वल नम्बर से पास होते आये हैं। वर्ना ईमानदार और कर्मठ नेता चुनाव हार जाये और नाकारा गुंडा-डकैत जाति-संप्रदाय के नाम पर विजयी हो जाये, ऐसा हो सकता है क्या। साड़ी-पैसा-दारु बांटने वाले वोट खरीदते आये हैं। घुटे नेताओं के चिकने-चुपड़े चेहरे के पीछे का सत्य टीवी चैनेलों के आने से जनता के सामने है। पर क्या वोट देते समय हम उम्मीदवार की योग्यता को पैमाना मान पाते हैं या उसकी खोखली बातों में उलझ के रह जाते हैं। सदन में बैठ कर क्या विपक्ष सिर्फ विरोध करेगा। रचनात्मक विपक्ष का स्वप्न फिलहाल तो पूरा होता दिख नहीं रहा है। जो पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ घिनौनेपन की हद तक इलज़ाम लगा रही हैं क्या वो किसी भी मुद्दे पर सियासत से बाज आयेंगी इसमें मुझे शक़ है। इलेक्शन कमीशन एक विश्वास ज़रूर दिलाता है कि चुनाव दिन प्रति दिन निष्पक्ष होते जा रहे हैं। अब जनता की बारी है कि वो देश के प्रति अपनी वफ़ादारी सिद्ध करे। कम से कम इतना तो कर ही सकती है कि भ्रष्टाचारी और अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को ही रोक दे। एक बार जो संसद चुन दी जाये वो कम से कम पाँच साल देश चलाये। मुद्दे वही पुराने हैं रोटी-कपडा-मकान, बिजली-पानी-सड़क। हर साल देश के कुछ हिस्से ही सही प्रगति कर जायें। बड़ी-बड़ी योजनाओं ने छोटे-छोटे सरकारी मुलाजिमों को इतनी ताक़त दे दी कि वो जनता की नौकरी करने के बजाय उनके रजा बन बैठे। सेवा के बदले मेवे लेने के आदी हो गये।पूंजीवाद-साम्यवाद-समाजवाद की तरह ये भी एक विचारधारा है, भारतवाद। हमें सिर्फ खुद को और अपने देश को देखना है। जहाँ तक मेरा ज्ञान है लोक माने स्थान होता है तो लोकतंत्र का मतलब हुआ सिस्टम ऑफ़ लैंड, जो अब तक भ्रष्टाचार जैसी असाध्य बीमारी से ग्रसित रहा है। इसे लोगतंत्र या जनतंत्र में परिवर्तित करने की आवश्यकता है। इंटरनेट और टी वी के युग में जनता के पास सूचना की कमी नहीं है बस ज़रूरत है तो दृढ इच्छाशक्ति की। ये तो मै बस एक विचार दे रहा हूँ, इसे धारा बनाना जनता का काम है।

पर मुझे अफ़सोस है कि ये महान ब्लॉग सिर्फ मेरे चाहने वाले चंद पाठकों तक ही पहुँच पायेगा। मेरा इतना लम्बा सारगर्भित प्रलाप सुधि जनता तक पहुँचाना अब उन लोगों का पुनीत कर्तव्य है को ब्लॉग्गिंग की विधा में तन-मन से समर्पित हैं, धन तो अभी तक यहाँ दिखा नहीं है। गुरु जी लोगों से विनम्र निवेदन है कि ३०० लोगों की लिस्ट में से मेरे लिए किसी को हटाइये नहीं बस एक नाम और जोड़ लीजिये और इस लिस्ट को तब तक बढ़ाते जाइये जब तक इस प्रकार के बेगैरत लोग डिमांड करते रहें। अपने चारित्रिक पतन के लिये मै गुरु बाणभट्ट जी से क्षमा चाहता हूँ। पर गुरु जी ये बताइये कि इतना दिल और दिमाग झोंक देने के बाद सिर्फ ४-५ पांच टिप्पणियां मिलें और फॉलोअर लिस्ट में इज़ाफ़ा न हो तो आपका ये कलयुगी चेला क्या करे। इसलिये मेरी बात को दिल पर कतई न लीजियेगा। हिंदुस्तान का चुनाव तो चलता रहेगा। हर पाँच साल के बाद फिर आएगा। पर गुरु जी आपसे निवेदन है कि अपने इस तुच्छ चेले की लेखनी को जाग्रत बनाये रखिये। टी आर पी बढे या न बढ़े। टिप्पणियां मिलें या न मिलें। बंदा अपना ज्ञान ब्लॉग्गिंग की इस फ्री सेवा से झाड़ता रहे और सिद्ध पुरुषों से इसी प्रकार ज्ञान अर्जित करता रहे।  

- वाणभट्ट