रविवार, 24 मार्च 2013

मरने के बाद


यमराज सामने खड़ा था। फॉर्मल ड्रेस में नहीं था। भैंसा भी आस-पास नज़र नहीं आ रहा था। हाँ एक रजिस्टर था हाँथ में और उसमें कुछ लिफाफे। चित्रगुप्त के हिसाब वाला रजिस्टर लग रहा था। एक लिफाफा उसने हाथ में थमा दिया। लिफाफे पर कांफिडेंशियल लिखा था। लिफाफा खोला तो धरती के उस क्षेत्र से मेरा आबोदाना उठ चुका था। चूँकि आत्मा अमर होती है सो मेरा किसी दूसरे क्षेत्र में पैदा होना लाज़मी था। यहाँ के लिए मै मर चुका था। उस पत्र को पढ़ने के बाद कुछ ऐसा ही एहसास हुआ।

इस धरती पर दो ही सच हैं एक पैदा होना और दूसरा मर जाना। उसके बीच में जो भी कबड्डी है वो रंगमंच की कठपुतलियों का लिखा-लिखाया नाटक है। ऐसा कह कर खुद को सांत्वना दी। पर जैसे पैदा होने की वजहें होतीं हैं वैसे ही मरने की भी कोई न कोई वजह तो होनी ही चाहिए। सही या गलत। आत्मा तो अजर है, अमर है, न ये पानी में भीगती है, न ही इसे सुखाया जा सकता है और न ही जलाया। फिर भला दरवाजे इसे कैसे रोक पाते।

उस कमरे में जश्न का माहौल था। लग्गू और भग्गू बॉस को बधाई देने पहुंचे थे। बॉस आप महान हो। क्या बात है। बॉस क्या तीर मारा है। आपने अन्ना को फ्रेम कर लिया। ऐसे तो वो हाथ आता न था। आपने ऐसा क्या पासा फेंका जो उसका बोरिया-बिस्तर ही समिट गया। लग्गू-भग्गू को मालूम है की बॉस से कुछ उगलवाने के लिये इतना चारा तो डालना ही पड़ेगा। बॉस की मूंछें फड़क रहीं थी। वो भी कुछ बताने को उतावला था।

गला खखार कर वो गुरु गंभीर आवाज़ बोला डियर फ्रेंड्स इट वाज़ नॉट पॉसिबिल विथाउट यु पिपल। मै तो अपने कमरे से निकलता नहीं। मुगलिया नवाबों ने जैसे अपनी रियासतें हुक्मरानों के भरोसे छोड़ रक्खीं थीं। मैंने भी कुर्सी के प्रति आप लोगों की वफ़ादारी देख कर यह पुनीत कार्य आप के सुपुर्द कर निश्चिन्त हो गया। आप लोगों ने ये भी सिद्ध कर दिया कि अगर इंसान वफ़ादारी दिखाने पर आ जाये तो वो कुत्तों को भी पीछे छोड़ सकता है। ये आप ही थे जो हमें आगाह करते रहे कि किस बन्दे ने अभी भी अपना दिमाग इस्तेमाल करना बंद नहीं किया। कौन बगावत पर आमादा है। किसे ठिकाने लगाना ज़रूरी है। आई ऐम प्राउड ऑफ़ यू। 

अन्ना  को ठिकाने लगाना सिर्फ मेरे बस की बात नहीं थी अगर दिल्ली साथ नहीं देती। पर दिल्ली को भी उल्लू बनाना भी आसान न था। मेरी इंटिग्रिटी अब तुम लोगों से तो छुपी है नहीं। तुम लोग मेरी महारत फर्जी मेडिकल और टी ए बिल बनाने के लिए तो जानते ही हो। मैंने अन्ना को फँसाने के लिए भी फर्जी केस बना कर दिल्ली भेजा तब उन्हें यकीन हुआ। यही वो मछली है जो सारे तालाब को ख़राब कर सकती है। सबसे खतरनाक हैं विचार। इसलिए अच्छा एडमिनिस्ट्रेटर पहले विचार को मारता है। बाकि सब तो खुद-ब-खुद मर जाता है। ये देश एक अन्ना तो अफोर्ड कर नहीं पा रहा है और जिसे देखो हर कोई अन्ना बना जा रहा है। इस लिए इस अन्ना को ठिकाने लगाना ज़रूरी था। अब हमारे यहाँ कोई दूसरा अन्ना बनने की कोशिश नहीं करेगा। लेट्स सेलिब्रेट। लग्गू तुम फ्रिज से आइस और सोडा निकालो और भग्गू तुम पेग बनाओ आज जश्न मनाया जाए। तेइस मार्च को ही तो शहीद दिवस मनाया जाता है। आज इसे शहीद कर दिया हमने। उसकी मूंछें ख़ुशी से और भी फड़क उठीं थीं।   

आत्मा वहां से निकली तो लोगों ने रस्ते बदल लिए। मरे हुए के साथ किसी ने देख लिया...तो। 

वहां से निकल कर आत्मा उन लोगों के पास पहुंची जो कुछ दोस्त और खैरख्वाह टाइप के लोग थे। नौकरी की दोस्ती कोई दांत काटी दोस्ती तो होती नहीं। बस फटे की यारी समझ लो। किस्मत ने साथ कर दिया तो समय काटने की ग़रज़ से दोस्ती कर ली। कुछ कॉमन फायदे हैं जो समाज में मिलने-जुलने से मिल जाते हैं वर्ना दोस्ती निभाने के लिए दोस्ती थोड़ी न होती है नौकरी में। एक दुखी था। बोला कितना समझाया भाई भगत सिंह दूसरे के घर ही अच्छे। पर उसे तो शहीद होने का शौक चर्राया था। अब हो गया न शहीद। दूसरा बोला भाई इतने लोग नौकरी कर रहे हैं क्या उन्हें नहीं मालूम सही-गलत। पर नौकरी तो नौकरी है। दिल-दिमाग घर छोड़ के आओ बस हाँ में हाँ ही तो मिलानी है बॉस की। तीसरा बोला भ्रष्ट सिस्टम में रह कर उसे ही भ्रष्ट कहना कहाँ की समझदारी है। हम भी तो बीवी-बच्चे पाल रहे हैं। नौकरी में और क्या कर सकते हो। मरने दो साले को अन्ना  बनने चला था।          

घर पर बीवी-बच्चे भी दुखी से लग रहे थे। स्वाभाविक है। बाप के कहीं और जीने का क्या मतलब जब वो साथ न हो। सुख-दुःख न बाँट पाए। अगर अन्ना ही बनना था तो परिवार बनाने की क्या ज़रूरत थी। अकेले रहते फिर जो मर्जी करते। वृद्ध पिता जी की स्थिति 'नमक के दरोगा' के वंशीधर के पिता सरीखी हो रक्खी थी। जो बेटे को हमेशा नसीहत देते आये कि बेटा मेरी तो इमानदारी से कट गयी पर तब ज़माना दूसरा था। बेइमान लोग भी ईमानदार की कद्र करते थे। पर अब वो बात नहीं रही। लोग ईमानदार की परछाईं से भी परहेज करते हैं। देश-समाज में रहना है तो उसके ही चाल-चलन निभाने पडेंगे। पर माँ तो आखिर माँ ही होती है। वो बोल तो नहीं रही थी पर रब का शुकराना अता कर रही थी। खुदा तू जो भी करता है भला ही करता है। लाखों में एक है मेरा बेटा। दिल का सच्चा और नेक। मेरे बेटे को बुरे लोग, बुरी नज़र से बचाना। तूने उसे बलाओं से दूर कर दिया तेरा बहुत-बहुत शुक्रिया।

माँ को शायद ये नहीं पता उसने भगत पैदा किया है जिसे पडोसी के घर पैदा होना था। वो भोली है और ये भूल चुकी है कश्मीर से कन्याकुमारी तक हम एक हैं, चाहे कहीं चले जाएँ। उसकी हालत बकरे की खैर मनाती माँ से बेहतर मुझे तो नहीं लगती।  

- वाणभट्ट 

    

10 टिप्‍पणियां:

  1. अन्ना को ठिकाने लगाना सिर्फ मेरे बस की बात नहीं थी अगर दिल्ली साथ नहीं देती

    -गज़ब...सन्नाट!! वाह!

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  2. आने वाला समय शायद ये बता सके की कौन ठिकाने लगा ... अन्ना ... उसको लगाने वाला ... या जनता ...
    होली की बधाई ...

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  3. उम्मीद की एक नाजुक सी किरण ...... उसपर तुषारापात करनेवाले लाखों महारथी ... यही चलता रहेगा

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    रंगों के पर्व होली की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  5. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल 26/3/13 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका स्वागत है ,होली की हार्दिक बधाई स्वीकार करें|

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  6. बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति...

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  7. भैया, एक कहावत है न कि नकटों के गाँव में नाकवाले एकाध की बसर आसान नहीं।
    बहुत कठिन है डगर पनघट की..

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  8. सटीक और वर्तमान का सार्थक सच
    सुंदर प्रस्तुति
    बहुत बहुत बधाई

    आग्रह है मेरे ब्लॉग jyoti-khare.blogspot.in
    में सम्मलित हों ख़ुशी होगी

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यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...