शनिवार, 11 जून 2011

ग़ज़ल : अगर इस कह सकते हैं तो...

सोते हुए शहर को जगाने की चाह है
सोते शहर में जागना भी इक गुनाह है

पत्तों भी दरख्तों का साथ छोड़ जायेंगे 
कुचले हुए चमन के फूलों की आह है

पसरा पड़ा है घटाटोप अँधेरा हर कहीं
चिरागों को शहीद बनाने की राह है

कीचड़ निगल रहा कमल को सरेआम
सूरज पे भी दाग लगाने की चाह है

अपनों ने ही लगाई है दामन की ये आग
समझे जिसे बैठे थे कि ये ही पनाह है

अंधों को बेच आईने तू क्या करे 'प्रसून'
वो देख क्या सकेंगे जब फ़िज़ा ही स्याह है

वाह-वाह, 
(स्वनामधन्य पत्रकारिता के युग में अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना ज़रूरी है...पता नहीं कोई और तारीफ़ करे...न करे...)  

- वाणभट्ट 

5 टिप्‍पणियां:

  1. अजी इस क़ाबिले तारीफ़ ग़ज़ल को सुन (पढ़) कर वाह-वाह तो निकलेगी ही।
    कीचड़ निगल रहा कमल को सरेआम
    सूरज पे भी दाग लगाने की चाह है
    बेहतरीन! लाजवाब!!

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  2. पत्तों भी दरख्तों का साथ छोड़ जायेंगे
    कुचले हुए चमन के फूलों की आह है
    bahut hi badhiya gazal

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  3. कीचड़ निगल रहा कमल को सरेआम
    सूरज पे भी दाग लगाने की चाह है

    अपनों ने ही लगाई है दामन की ये आग
    समझे जिसे बैठे थे कि ये ही पनाह है

    बहुत सटीक बात कही है ..

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  4. कीचड़ निगल रहा कमल को सरेआम
    सूरज पे भी दाग लगाने की चाह है
    बहुत सटीक बात|

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यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...