रविवार, 22 मई 2011

योद्धा और कायर 

देख तू
उनकी छाती
लहू से धरा 
है जिसने सींची 

हो किसान या
कोई मजदूर हो
देखने में लगता भला 
कितना ही मजबूर हो
पर नहीं वो मांगता 
भिक्षा किसी से
ऐसे अभिमानी को
शत-शत नमन हो

देख तू
उनकी आँखें
लाल हैं
पर 
बोलतीं हैं

उनकी बलिष्ठ भुजाएं 
छीन भी सकती हैं हक अपना 
पर नहीं उनकी 
आँखों में सपना
हक दूसरों का मार के
समृद्ध होना
उसने सीखा 
अपनी रोटी के लिए 
संघर्ष करना
पर नहीं सोचा 
स्वप्न में भी संहार करना
ऐसे वीरों को 
शत-शत नमन हो

देख उसको भी
कि जो भ्रष्ट है
दूसरों की समृद्धि से
जो त्रस्त है
इसलिए  वो 
घूस से ही मस्त है
जो गरीबों के लिए था
उस राशी को वो मार के 
दौलत के
नशे से पस्त है
उसकी छाती में 
वो बात नहीं 
उसकी भुजाओं में भी 
वो घात नहीं

ये अलग है बात 
कि   
कानून ने उसको न पकड़ा
पर मानसिक बीमारियों ने 
उसको जकड़ा
उसकी कुंठित
सोच है
उसके मन में भी 
भयानक लोच है
सारी दुनिया 
चाहता है लूट लेना
भगवान् से भी चाहता है 
घूस दे कर छूट लेना
उसमें नहीं है स्वाभिमान 
हाथ फैलाना भी उसकी है शान 
शायद उसे मालूम नहीं
सब ठाठ यहीं है रह जाता 
जब है 
वक्त आता 

देख उसकी कमर से ऊपर निकलती 
तोंद को
बेल्ट कस के चाहता है
इस समृद्धि को दे रोक वो
पर नहीं वो जानता
ऊपर की कमाई 
जो ठूंस-ठूंस के खाई
जीते जी बदहजमी कर जायगी 
या
मरने के बाद किसी और के काम आएगी 
या कि 
सारी धमनियां जाम कर देगी
या कहीं से 
फाड़ के निकल लेगी

ऐसे गद्दारों को
पूरे देश की 
धिक्कार हो

- वाणभट्ट 




















21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब लिखा है, वाणभट्ट जी,
    ऐसे लोगों के साथ ऐसा ही होना चाहिये,

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  2. उनकी बलिष्ठ भुजाएं
    छीन भी सकती हैं हक अपना
    पर नहीं उनकी
    आँखों में सपना
    हक दूसरों का मार के
    समृद्ध होना
    उसने सीखा
    अपनी रोटी के लिए
    संघर्ष करना

    बहुत ही प्रभावी और सशक्त रचना .........

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  3. समाज की वास्तविक स्थित को चित्रित करती रचना बहुत सशक्त शब्दों में हक़ीक़त का बयान करती है।

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  4. बिल्कुल सही..यही होना भी चाहिये...उम्दा रचना.

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  5. कितना ही मजबूर हो
    पर नहीं वो मांगता
    भिक्षा किसी से
    ऐसे अभिमानी को
    शत-शत नमन हो... kam log hain aise , per yahi log jivan ke gudh mayne pate hain ... sabkuch spasht hota jata hai inke aage

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  6. bahut sunder man ko chu gayi aapke ye sunder rachna, badhai

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  7. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 24 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

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  8. jwalant bhavon ka prakhar sambodhan ,mukhar ho uthha hai .shukriya ji .

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  9. समाज की वास्तविक स्थित को चित्रित करती बहुत ही बेहतरीन रचना|

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  10. 'भगवान से भी चाहता है
    घूस दे कर छूट लेना'
    वैसे तो पूरी कविता ही प्रभावशाली है पर ख़ास तौर पर ये पंक्तियाँ दिल को छू जाती हैं..

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  11. देख उसकी कमर से ऊपर निकलती
    तोंद को
    बेल्ट कस के चाहता है
    इस समृद्धि को दे रोक वो
    पर नहीं वो जानता
    ऊपर की कमाई
    जो ठूंस-ठूंस के खाई
    जीते जी बदहजमी कर जायगी
    या
    मरने के बाद किसी और के काम आएगी
    या कि
    सारी धमनियां जाम कर देगी
    या कहीं से
    फाड़ के निकल लेगी

    ऐसे गद्दारों को
    पूरे देश की
    धिक्कार हो!

    वाजिब गुस्सा ! इस स्वर को और प्रखर करें तभी बदलेगी दुनिया ! बढ़िया लेखन.

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  12. यथार्थ का जीवंत चित्रण !
    सुन्दर प्रस्तुति

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  13. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |
    आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||
    --
    बुधवारीय चर्चा मंच

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