शनिवार, 25 जुलाई 2020

सन्तो

ये जो होता है न, हमेशा अच्छे के लिये ही होता है।  ऐसा धुर पॉज़िटिव एटीट्यूड रखने वाले निःसंकोच कहते रहते है। जब कोरोना की आहट हुयी तो लगा अब पॉसिटिव सोच वालों की शामत आयी। लेकिन नहीं आयी। दरअसल ये वो लोग हैं जो अलबत्ता तो तीर चलाते नहीं, और यदि किसी गरज़ से तीर चलाना पड़ ही गया तो लक्ष्य की तनिक भी परवाह नहीं करते। जहाँ तीर लग गया वहीं गोला खींच आते हैं। आत्मविश्वास को सफलता की कुन्जी कहा गया है। ये इन भाई लोगों कूट - कूट कर भरा होता है। ज्ञानी लोग तो सदैव आत्मसंशय  से पीड़ित रहे हैं। लेकिन इन भाई लोगों में संशय ली लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं होती। कोरोना को किसी देश ने इतने हल्के में नहीं लिया होगा जितना कि भारत में। सरकारें लगी पड़ी हैं, लेकिन ये भाई लोग हैं  कि सब भगवान और अल्लाह पर छोड़ कर मस्त हैं। हम तो क़ुदरत के बन्दे हैं हमारा कोई क्या बिगाड़ लेगा और जब ऊपर वाला बुलाना चाहेगा तो बुला भेजेगा। नीचे वाला क्या रोकेगा। मेरे और भगवान के बीच में   कोरोना कहाँ से आ गया। कुछ ने फ़रमाया ये सिर्फ उन्हें होगा जो दूसरे पशु-पक्षियों को अपना आहार समझ के दिन-रात चर रहे हैं। शाकाहारियों को कोरोना छुयेगा भी नहीं। प्रकृति अपना बदला ले रही है। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक डिक्लेयर  कि भारत की गर्मी में कोरोना दम तोड़ देगा। ये तो भला हो मौसम का जो जून में भी प्रचंड गर्मी नहीं पड़ पायी वर्ना उन्हें कोई नया सिद्धान्त प्रतिपादित करना पड़ता। छूट-पुट  बूंदा-बांदी और बंगाल-गुजरात के तूफ़ानों तापमान को बढ़ने नहीं दिया। लेकिन जो ज्ञान की आँधी इन दिनों बही है उसने सभी अगले - पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिये। लॉकडाउन ने लोगों को सोचने - समझने का इतना मौका कि कम्बख़्त टाइप के लोगों ने अपने ज्ञान को गुलज़ार-ग़ालिब-बच्चन के नाम से पेल दिया। उन्हें इतना कॉन्फिडेंस तो था ही की उनके नाम पर लोग मैसेज बिना पढ़े ही डिलीट कर देंगे। ग़ालिब के चक्कर में कइयों ने ज्ञान कई - कई बार आगे फॉरवर्ड कर दिया। लेकिन ऐसे लोगों से गुजारिश है कि जिसने इन कवियों को पढ़ रखा हो उनके मासूम दिलों पर रहम करें।  

जैसे हर किसी को अपनी किसी न किसी बात पर बेवजह फ़क्र होता है वैसे ही शर्मा जी को ग़लतफ़हमी हो गयी थी कि व्हाट्सएप्प और फेसबुक के जरिये वो दोस्तों और दोस्ती की वो इबारत गढ़ेंगे जो जय और वीरू की दोस्ती से भी आगे निकल जायेगी। लिहाज़ा उनके दिन का अधिकांश हिस्सा सोशल मिडिया पर बीतने लगा। पहले तो हर बार कम्प्यूटर या लैपटॉप खोलने की जहमत उठानी पड़ती थी। जबसे चीन द्वारा निर्मित सस्ते, सुन्दर और अच्छे स्मार्ट फोन्स की मार्केट में भर मार हो गयी है, सोशल मिडिया पर एक्टिव रहने वालों की तो लॉटरी खुल गयी। हर हाथ में मोबाईल है, हर गर्दन झुकी हुयी है, हर समय। गोया कि-  

दिल के आईने में है तस्वीर-ए-यार 
जरा गर्दन झुकायी देख ली 

शर्मा जी ने आव देखा ना ताव। धड़ाधड़ फ्रेंड रिकवेस्ट भेज डालीं फेसबुक पर। देखते, न देखते उनका फेसबुक फ्रेंड्स का आँकड़ा हजार के अल्ले - पल्ले पहुँच गया। देखते, वो वाले थे जिन्हें उन्होने रिकवेस्ट भेजी थी और न देखते वाले वो थे जिनसे शर्मा जी कभी न कभी टकराये होंगे। पुरानी गर्लफ्रेंड्स खोजी गयीं। उन्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी गयी। और वो तब तक भेजते रहते जब तक कि उनका निवेदन स्वीकार न कर लिया जाता। लेकिन कानून भी कोई चीज़ है। किसी महिला को दो बार से ज़्यादा फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजना गुनाह बन चुका है। इसलिये शर्मा जी मन मसोस कर रह गये। जैसे ताली एक हाथ से नहीं बजती, वैसे ही दोस्ती के लिये भी दोनों तरफ़ आग बराबर लगी होनी चाहिये। किसी पुरानी दुश्मनी को ख़त्म करने का तरीका है, फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दो या एक्सेप्ट कर लो और फिर लड़ो फेसबुक पर। उसके हर विचार की सामूहिक आलोचना करो और तब तक करते रहो जब तक वो या आप या दोनों एक-दूसरे को ब्लॉक न कर दें। अब आपको ये अफ़सोस नहीं होगा कि दोस्ती बढ़ाने के प्रयास में कोई कमी रह गयी। पहले तो बेशर्म बन कर दूसरे के पास जाना पड़ता था। अपनी इज्ज़त ताक पर रख कर बोलना पड़ता था - भाई बुरा मान गया क्या। अब तो बहुत आसान है फेसबुक पर लड़ लो, व्हाट्सएप्प ग्रुप पर लानत-मलानत भेज दो, बाद में पर्सनल मेसेज से माफ़ी माँग लो। माफ़ कर दिया तो ठीक, वर्ना पे-कमीशन लग जाने के बाद से किसको किसकी ज़रुरत पड़नी है।  

हर किसी के जन्मदिन पर शुभकामनाओं की झड़ी सी लग जाना आम सी बात हो गयी है। अक्सर लोगों को ये समझ नहीं आता कि कितनों को वाकई धन्यवाद देना है। अगले दिन वो बड़ी विनम्रता से सभी के लिये एक कॉमन मैसेज डाल देते हैं कि उन्होंने उसके दिन को यादगार बना दिया इसलिये सभी को हृदय से धन्यवाद। एक बार तो शर्मा जी को खुशफ़हमी हो गयी, जब उनकी बर्थडे पर दो - ढाई सौ बधाइयाँ आ गयीं। उन्होंने हर किसी को व्यक्तिगत तौर पर धन्यवाद ज्ञापित किया। बैंक-जीवन बीमा-म्युचुअल फण्ड-सिम कम्पनियों ने  भी शुभ सन्देश देने की व्यवस्था कर रखी है। बीवी भले जन्म दिन भूल जाये, पर ये अपने ग्राहक को एसएमएस और ईमेल के जरिये फील गुड़ कराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। एक बार तो हद हो गयी। उन्नीस के आम चुनाव से पहले प्रधानमन्त्री का पर्सनलाइज़्ड मैसेज आ गया ईमेल पर। शायद कभी माई गॉव पर अपनी जानकारी दी होगी। अब क्या कहने शर्मा जी ने उसे कॉपी पेस्ट करके फेसबुक पर चेप दिया। लेकिन वोट पक्का हो जाने के बाद कभी पीएम साहब की नज़र-ए-इनायत नहीं हुयी। उसके बाद से लगता है नये वोटरों को सन्देश जा रहे होंगे। शायद ऐसे ही एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों तक  पहुँचा जा सकता है। एक बार प्रोफ़ाइल पर कुछ छेड़-छाड़ करते हुये शर्मा जी की डेट ऑफ़ बर्थ हट गयी। यकीन मानिये बैंक और एलआईसी वालों के अलावा न तो एक मेल आया न मैसेज। दिल बस टूटने ही वाला था लेकिन उन्होंने ख़ुद को समझाया कि भाई लोग बिज़ी हैं, फेसबुक ही है जो सबको जन्मदिन याद दिलाता रहता है, नहीं तो दुनिया में कौन जानने वाला है। 

धीरे-धीरे फेसबुक का उफ़ान जैसे चढ़ा था, उतरने लगा। आज ऐसा दौर आ गया जब सब लोग फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर एक्टिव तो रहते लेकिन कोशिश करते कि लोग उन्हें बिज़ी समझें। इसलिये उन्होंने प्रोफ़ाइल के नोटिफिकेशन्स बंद कर दिये। ताकि खोजी लोग ये न जान सकें कि उन्होंने पोस्ट पढ़ ली है। जहाँ पहले कमेंट देना सामाजिक पुण्य समझा जाता था, वहाँ अब पोस्ट का आनन्द ले कर भी कमेंट न करने का फैशन चल पड़ा। समाज सेवा के लिये पहले भी समय निकालना पड़ता था। लेकिन तब थोड़ा अडोसी-पडोसी से मिलने-मिलाने का रिवाज़ हुआ करता था। अब तो सारी दोस्ती व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर सिमट कर रह गयी है। किसी ने आपको यहाँ समय दे दिया तो समझ लीजिये आप उसके घर की चाय पी आये। यदि वास्तविक दुनिया में यारी-दोस्ती जैसी चीज़ बची होती तो वर्चुवल दोस्ती को कौन पूछता। अब दोस्ती का क्राइटेरिया ये हो गया है कि आपकी पोस्ट पर कितने कमेंट आये या कितने लाइक मिले। दुश्मनी भी लोग ऐसे ही निकाल रहे हैं - पोस्ट को अनदेखा करके। शुक्र है अनलाइक का ऑप्शन नहीं है। अब जब लोगों ने व्हाट्सएप्प और फेसबुक को भी टाइम वेस्ट करने का ज़रिया मान ही लिया है तो दोस्ती का तो भगवान ही मालिक है। अब सोचने वाली बात ये है कि तीन-चार प्राणियों के परिवार वाले लोग बिज़ी कहाँ हैं। पडोसी से भी मुलाकात अब मॉल में ही होती है। कोई किसी को डिस्टर्ब नहीं करता कि अगला पता नहीं कितना बिज़ी है। एक साहब ने अपने मातहतों को निर्देश दे रखा था कि मिलने  पहले पर्ची में नाम और काम लिख कर भेजो, यदि उचित होगा तभी मिलना संभव होगा। सुबह से शाम तक वो अपने काम में व्यस्त रहते। एक दिन किसी ने गलती से मिस्टेक कर दी। अन्दर का नज़ारा कुछ और था। फाइलों के ढेर के पीछे साहब हाथ में मोबाईल लिये मशगूल थे। 

और इधर दिन प्रतिदिन शर्मा जी बदनाम हुये जा रहे थे। कोई काम नहीं है सुबह से ही गुड मॉर्निंग करने लग जाते हैं और गुड नाइट के बाद ही सोते हैं। दिन भर पोस्ट पर कमेंट और रिएक्ट करने का टाइम कहाँ से मिल जाता है। बड़का लोगों की तरह इनके पास कोई ट्विटर सेल तो है नहीं। पता नहीं कितना समय है बर्बाद करने के लिये। शनै - शनै शर्मा जी का परिचय भी कुछ इस प्रकार हो गया। लोग पूछते - कौन से शर्मा जी हैं ? दूसरे बताते - फेसबुक वाले। लेकिन शर्मा जी बिना निराश और हताश हुये अपने सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में लगे पड़े हैं। उन्हें कभी-कभी आश्चर्य भी होता था लोग अपने समय का करते क्या हैं। सबसे कीमती समय है ऐसा लोग कहते रहे हैं। लेकिन समय का करना क्या है ये किसी ने नहीं बताया है। 

जब लोगों के जीवन में आप-धापी अपने चरम पर थी, तब पदार्पण हुआ - कोरोना का। सारी दुनिया वहीं रुक गयी। ज़िन्दगी जो फ्री में मिली हुयी लगती थी, उसकी कीमत लोगों को अनायास समझ आ गयी। थाली-घण्टी किसी से ऐसे ही बजवा कर देख लो। लॉजिकल लोग जो अभी तक चपेट में नहीं आये हैं, इसका मज़ाक बना सकते हैं। लेकिन ज़िन्दगी लॉजिक से कहीं उपर विश्वास के लेवल पर चलती है। इस त्रासदी ने क्या-क्या नहीं देखा-दिखाया - सरकारों के खुले ख़ज़ाने, दान वीरों का दान, कर्म वीरों का त्याग, किसान और जवान का योग दान और आम नागरिकों का नियम पालन। सबने सिद्ध कर दिया कि संकट जितना बड़ा होता है जिजीविषा भी उतना बड़ा रूप ले लेती है। लेकिन इस स्थिति में जिसने आपको-हमको-सबको सम्बल दिया वो क्या था - व्हाट्सएप्प और फेसबुक। भाई लोगों ने क्या - क्या ज्ञान नहीं बाँटा। हल्दी, अदरक, निम्बू , कालीमिर्च और गुड़ की ऐसी मार्केटिंग कभी नहीं देखी। मार्च से शुरू हुआ लॉक डाउन लगभग चार महीने का होने जा रहा है। शुरुआत जोरशोर से हुयी। दसियों जोक्स रोज इधर से उधर घूमते रहते। फिर लोगों की छिपी हुयी प्रतिभायें, गायन-वादन-कुकिंग आदि उभरने लगीं। महीना बीतते न बीतते जोक्स कार्टून का सर्कुलेशन घटने लगा। करोना से बचने-बचाने की बातें शुरू हो गयीं। डॉक्टर्स के इंटरव्यूज़ घूमने लगे। जीवन दर्शन पर पता नहीं कितनी थीसिसें लिख दीं गयीं। लेकिन काबिल-ए-गौर बात ये थी कि हास्य और व्यंग जिसकी पहले प्रधानता हुयी करती थी, वो गायब हो गया। ज्ञान बिन माँगे धड़ाधड़ बँट रहा है मानो सबके ज्ञान चक्षु खुल गये हैं। इस स्थिति का कबीर साहब ने कुछ इस तरह बखान किया था  - 
संतो भाई आई ज्ञान की आँधी रे 
भ्रम की टाटी सबै उड़ानी, माया रहै न बाँधी 
हिति चित्त की द्वै थूंनी गिरानी, मोह बेलिंडा टूटा 

बड़ी - बड़ी विभूतियाँ भी जब कोरोना की चपेट में आ चुकी हैं तो ये तय है कि कोरोना किसी को कभी भी, कहीं भी पकड़ सकता है। इसलिये सन्त जनों से निवेदन है कि ज्ञान को विराम देने कष्ट का करें। शायद व्हाट्सएप्प के लिए चुटकुले लिखने वाली कम्पनियाँ भी लॉक डाउन का शिकार हो गयी हो। जो कार्टून्स आ भी रहे हैं वो राजनितिक होते चले गये। जिनके कारण ग्रुप्स में वाद-विवाद भी बढ़े। नतीजा ये कि कोई ग्रुप छोड़ के भाग रहा है, कोई वाद-विवाद में उलझ रहा है, कोई सिर्फ देख रहा है कमेंट नहीं कर रहा है। जब ईमेल शुरू हुआ था, तब लोग दिन में चार बार इंटरएक्ट करते थे। अब ईमेल पूरी तरह ऑफिशियल हो चुका है। व्हाट्सएप्प के भी ऑफिशियल ग्रुप बनते जा रहे हैं। यदि यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब सब वर्चुअल दोस्ती से भी महरूम हो जायेंगे। शर्मा जी बस समाज कल्याण के उद्देश्य से इस सेवा को चालू किये पड़े हैं। भला हो शर्मा जी का वर्ना आज के युग में जब सबको अपने अलावा सोचने का समय नहीं है, वो फेसबुक और व्हाट्सएप्प की विधा पर अपना निरंतर योगदान दे रहे हैं। फूल बाँटने वालों के हाथ भी महकते हैं, ऐसा ज्ञान आज ही कहीं से टपका है। अच्छे चुटकुलों और कार्टून्स के लिये लगता है शर्मा जी को किसी वर्चुअल टैलेंट सर्च का कम्पटीशन करवाना पड़ेगा - बेस्ट चटकुला ऑफ़ द डे। 

- वाणभट्ट 






शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

कर्मयोगी

साहब तौलिया लपेटे भड़भड़ाये हुये वरांडे में इधर-उधर घूम रहे थे। आदत भी बुरी चीज़ होती है। सुबह-सुबह नहाना उनकी ऐसी ही आदत में शुमार था। उनके कानों में बस एक बात घूम रही थी। इक्कीस दिन। बिना काम किये जिसका एक पल न कटता हो उसे इक्कीस दिन का बिन माँगा आराम। घनघोर अन्याय है। कोरोना ऐसी कौन सी बला आ गयी है। मास्क हैं, ग्लव्स हैं, सैनिटाइज़रर्स हैं, तो फिर ये घर से न निकलने और काम न करने की बात कहाँ से आ गयी। चूँकि अब जब वो साहब बन चुके हैं तो उनका मुख्य काम दूसरों से ज्यादा से ज्यादा काम करवाना होता है। नीचे वाले तो निकम्मे और निकृष्ट हैं। जब तक न हाँको काम ही नहीं चलता। दरअसल उनका काम ही था, मैनेजर वाला। अपनी मैनेजमेंट दक्षता के चलते ही वो अपनी संस्था के शीर्षस्थ पद को कृतार्थ कर रहे थे। उन्हें अपने काम की उतनी चिंता भी नहीं थी। ज़्यादा चिंता उन्हें मातहतों के आराम की थी। ये बात अलग है कि दहशत के इस माहौल में जब लोगों की हवा खराब है, कौन आराम से रह सकता है। लेकिन बॉस तो बॉस होता है। ऐसे कैसे कोई प्रधान सेवक मेरे मातहतों को मेरी मर्ज़ी के बिना काम करने से रोक सकता है, ये बात उन्हें अभी भी हज़म नहीं हो रही थी। यदि मातहत इक्कीस दिन काम नहीं करेंगे तो वो किस काम के रह जायेंगे। और उनके सारे श्रेय तो इसी बात पर निर्भर थे कि उन्होंने क्या-क्या करवा डाला। प्रतिदिन अपने ओजस्वी उद्बोधन द्वारा मातहतों का जो मार्गदर्शन वो किया करते हैं, उसे अब कौन सुनेगा। घर पर बीवी और बच्चे तो सुनने से रहे। सिर्फ़ फ़िक्र करने से ही काम नहीं चलता। ज़िक्र भी ज़रूरी है। और ज़िक्र करने के लिये मीटिंग से बढ़िया कोई दूसरी जगह नहीं हो सकती है। 

भाइयों और बहनों, क्या आपको भी नहीं लगता कि अपने भारत वर्ष में एकाएक कर्मयोगियों की बाढ़ सी आ गयी है। जिन्हें लगता है कि पूरी दुनिया का दारोमदार उन्हीं के मज़बूत कन्धों पर टिका है। बाकी सब तो पैदायशी निकम्मे-निकृष्ट हैं। मातहत भी बेचारे क्या करें। बेरोजगारी के इस दौर में जिसे नौकरी मिल गयी है, वो वैसे ही खुद को भाग्यशाली मानते हैं। इसलिए बॉस की ख़ुशफ़हमी को बनाये रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। इसमें कोई ज़्यादा दिक्कत भी नहीं है। बस दोनों कान खुले रखने हैं।  

जब द्वापर भगवान कृष्ण ने गीता में कर्मयोग का सिद्धान्त अर्जुन को दिया था, तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनकी बात को दूर-दराज़ के देशों में इतने संवेदनशीलता से समझा जायेगा। नतीजा हम सबके सामने है। सबसे पुरानी सभ्यता का दम्भ भरने वाला देश हज़ारों सालों की ग़ुलामी को झेलते-झेलते दासता का आदी हो गया। जब तक बॉस से दो-चार गाली न खा लें, उनका निकम्मेपन का एहसास जाता रहता है। लगता है - बॉस हो तो ऐसा, क्या गरियाता है। देश के अधिकांश लोग इसी में खुश है कि विकसित देश, उसे अभी भी विकासशील देश की श्रेणी में रखे हुये हैं। विकासशील शब्द को वो ऐसे गर्व से वहन करता है जैसे कोई गोल्ड मेडल हो, जिसे वो अपने गले से उतारने को तैयार न हो। जहाँ आज़ादी के सत्तर साल बाद भी लोग अपने को पिछड़ा घोषित रखने के लिये कर लालायित हों, वहाँ डेवलपिंग नेशन का सिद्धान्त उनके विक्टिम माइंड सेट को बहुत सूट करता है। इसके पीछे सांस्कृतिक, राजनितिक और आर्थिक कारण हो सकते हैं। लेकिन कोई भी ऐसा देश नहीं है, जिसे हम विकसित मानते हों, और उसे इन समस्याओं से जूझना न पड़ा होगा। कुछ देश तो विश्व युद्ध की भयंकर त्रासदी भोगने के बाद भी पुनः कुछ वर्षों में न सिर्फ़ आत्मनिर्भर बन गये बल्कि नित-निरन्तर विकास के नये प्रतिमान गढ़ रहे हैं। भारत में भले ही गीता का उद्भव हुआ हो, लेकिन उन देशों ने गीता को जीवन में उतारने का सार्थक प्रयास किया है। कृष्ण महाभारत का युद्ध स्वयं भी लड़ सकते थे। लेकिन तब कहानी में जो ट्विस्ट था, वो न रहता। अट्ठारह दिन के बजाय कुछ क्षणों में ही सब आर-पार हो गया होता। लेकिन इस बात से प्रभु श्री कृष्ण ने यह भी समझा दिया कि बेटा अर्जुन कर्म तो तुम्हें ही करना होगा। ये बात अलग है कि जिस देश में प्रभु ने सन्देश दिया वो यही समझता रहा कि वो प्रवचन सिर्फ़ अर्जुन के लिये था। हमारा क्या? हमें कौन सा राज-पाठ मिलना है। हमारी तो नियति में ही तुर्कों और फिरंगियों की ग़ुलामी लिखी थी। हमने तो गीता से सिर्फ़ उतना ही सार उठाया जितना हमारे लिये कनविनियेंट था। क्या ले कर आये थे और क्या लेकर जाना है। विनाशाय च दुष्कृताम सम्भवामि युगे-युगे। हमें क्या करना जब अवतारी पुरुष आयेगा तो सबसे निपट लेगा। भगत सिंह पडोसी के घर ही अच्छा। हमने कभी ये सोचने की जहमत नहीं उठायी कि अगली पीढ़ियों के लिये क्या छोड़ कर जाना है। जिन्होंने सोचा भी तो अपने पोते और पर-पोते के आगे नहीं सोच पाये।    

भगवान के घर देर तो है लेकिन अन्धेर सिर्फ़ उन्हीं के घर है जिन्होंने अपनी अक्ल की खिड़की पर जहालत का परदा डाल रखा है। अंधकार से प्रकाश की ओर जाने को कहो तो कहेंगे कि अँधेरे में कोई लोड नहीं है, जब जाहे जागो - जब चाहे सो जाओ। बिजली की भी बचत। उजाले में तो जगना ही पड़ेगा। उलटी गंगा बहाने में का आनन्द, तुम क्या जानो। हम चाहे कितनी भी जहालत की न्यूनतम गहराइयों गोते लगा रहे हों, लेकिन भगवान निरन्तर कोशिश करते रहते हैं, हमें अंधकार से निकालने के लिये। वो हमेशा के लिये हमें पतन के मार्ग पर नहीं छोड़ सकते। इसीलिये हमारे बीच वो समय-समय पर महापुरुषों को भेजते रहते हैं। ये बात अलग है कि महापुरुषों का अनुसरण करने से कहीं आसान है, उनकी फोटो को ड्राइंगरूम में लटका लेना और साल में एक-आध बार (जन्म-मरण दिवस पर) उस फोटो पर माला टाँग देना। जब इतने से ही काम चल जाता है तो उनके सिद्धांतों पर कौन चले। उन महापुरुषों की किस्मत भी क़ाबिल-ए-ईर्ष्या है कि उनके युग में दूर-संचार के माध्यम कम थे। आज कल जब स्पॉन्सर्ड न्यूज़ छप सकती है तो उस ज़माने में भी मिडिया पर ताकतवर लोगों का प्रभाव अवश्य रहा होगा। सो जिसने भी ढंग से मिडिया मैनेज कर लिया, वो महान बन गया होगा, ऐसा कोई भी सहजता से समझ सकता है। असली चुनौती तो अब है, कोई महान से महान व्यक्ति महान बन कर दिखा दे। पचहत्तर अख़बार और न्यूज़ चैनल हैं। प्रेस मिडिया के युग में यदि कोई अवतार जन्म ले भी ले तो ये तत्व ज्ञानी लोग उसकी बधिया उधेड़ डालेंगे। वो भी सोचने पर मजबूर हो जायेगा कि किन जाहिलों से पाला पड़ा है। मरने दो इन्हें, हम किसी और देश निकल लें, तभी भला। शायद इसी विचार ने ब्रेन-ड्रेन को जन्म दिया। तमाम ज्ञानी जनों ने इसीलिये  देश सेवा से ज़्यादा मानवता की सेवा को तरजीह दी और निकल लिये। यहाँ रहते तो किसी दफ्तर में बस कम्पेरेटिव स्टेटमेंट पर साइन कर रहे होते। जिस पर कोई छोटा सा बड़ा बाबू ऑब्जेक्शन लगा के कूड़े के ढेर में फेंक देता। कलियुग में प्रभु श्री कृष्ण यदि गीता का सन्देश देने साक्षात् स्वयं उतर आयें, तो मीडिया पर वर्चस्व जमाये अर्बन नक्सल उनकी विवेचना कर डालें। बतायें कि बाबा मार्क्स के विचारों से जो मेल नहीं खाता वो व्यक्ति भगवान कैसे बन सकता है। ये धर्म विशेष का प्रपोगेंडा है। भगवान भी ये सोचने को विवश हो जाते कि - अपना टाइम निकल चुका पता नहीं अब आयेगा भी या नहीं।

द्वापर का कर्मयोग का सन्देश शनै-शनै वाया अमरीका-जापान-यूरोप-सिंगापुर-ताइवान-कोरिया घूम-फिर कर वापस उसी धरती पर पहुँच गया जहाँ से इसका प्रदुर्भाव हुआ था। लेकिन अब जब आया तो इस यात्रा के पद चिन्ह उस पर प्रतिबिम्बित हैं। भौतिकवादी देशों से निकल कर इसका स्वरूप ही बदल गया है। बाकी बची खुची जो कमी रह गयी थी, उस पर कलियुग का मुलम्मा चढ़ गया है। करेला वो भी नीम चढ़ा। कर्म सिर्फ कर्म तक ही सीमित रहता तो गनीमत थी लेकिन काल के प्रभाव में फल की इच्छा इस कदर बलवती हो गयी है कि फल की इच्छा के बिना किसी कार्य के सम्पन्न होने की कल्पना कर पाना असंभव हो गया है। ये तो कुछ बुद्धिजीवी टाइप के लोग हैं जो निष्काम भाव से कागज़ काले किये जा रहे हैं। वो ये भली भाँति जानते हैं कि उनके इस पुनीत कर्म से न उनका भला होना है न किसी और का। लेकिन जैसा पहले भी लिख चुका हूँ, कर्म के ऊपर भी एक चीज़ है - आदत। जिस तरह कुछ लोगों की आदत कर्म करना पड़ गयी है। उसी तरह कुछ लोगों की आदत है बाल की खाल निकालना। होता ये है कि जिन्हें काम करने की लगन होती है उनके पास समय बहुत कम होता है। वो इसी जन्म में सब काम निपटाना चाहते हैं। क़्वालिटी के चक्कर में पड़ेंगे तो कोई दूसरा क्रेडिट ले उड़ेगा। सही या गलत कर्म का विभेद करने का न समय है, न दस्तूर। ये जो पत्रकार टाइप के लोग हैं, उनको सोचने और कलम घिसने की आदत पड़ गयी है। जब कर्म योगी सुधरने को राजी नहीं हैं, तो बेचारे ये क्यों सुधर जायें। ऐसे लोग अक्सर पत्रकार टाइप बिरादरी से सम्बन्धित होते हैं। और कलियुग के कर्मयोगियों को सबसे ज़्यादा दिक़्क़त इन्हीं लोगों से है। ये लिखा-पढ़ी करने वाले लोग न हों तो ये कर्मयोगी लोग धरती-पाताल एक कर दें। वो कुछ करना चाहते हैं, तो ये लेखन-योगी कोर्ट-कचहरी करने लगते हैं। ये लोग प्रेस और मीडिया में प्रश्न पूछने लगते हैं। ये एजी-सीएजी की रिपोर्टें चाट डालते हैं। इन्हें कुछ करना-धरना तो है नहीं, बस सवाल पूछना है। ये फ़र्क सिर्फ़ और सिर्फ़ नज़रिये का है। जब कोई रिपोर्टर चीख-चीख कर सिस्टम की नाकामी पर सवाल उठाता है, तो यक़ीन होता है कि इस आदमी ने अपने घर की टोंटी का वॉशर भी कभी अपने हाथ से नहीं बदला होगा। और तो और यहाँ राजनीतिज्ञों की एक ऐसी जमात है, जो कभी सत्ता में नहीं रही लेकिन सरकार के हर काम-काज की कमी ऐसे गिनाती है जैसे वो होते तो कद्दू में सटीक तीर मारने से दुनिया की कोई ताक़त उन्हें रोक नहीं पाती। कर्मयोगी इन्हें देश का दुश्मन मानते हैं और ये कर्मयोगियों को। गौर से देखा जाये तो दोनों ही देश प्रेम की भावना से ओत-प्रोत हैं। दैव-योग से दोनों अपना-अपना काम कर रहे हैं। लेकिन इस नज़रिये के लिये आपको राज-योग के लेवल तक आना होगा। तब पता चलेगा कि नियति ही सब कुछ चलाती है। हम नहीं चलाते। कर्मयोगी होना भी भाग्य की बात है और उसका फल भी आपकी झोली में ही गिरे, तो डबल भाग्य। अक्षय कुमार जैसा बड़ा कलाकार अपनी सफलता का 65% श्रेय भाग्य और 35% श्रेय कर्म को देता है। अमिताभ भी अपनी सभी उपलब्धियों को अत्यन्त विनम्र भाव से ऊपर वाले को समर्पित कर देते हैं। तो कर्मयोगियों का भी कर्तव्य है स्वयं को अकिंचन मान कर कुछ श्रेय ऊपर वाले से शेयर कर लें। लेकिन इतना ही तत्व ज्ञान इनके पास होता तो राजा हरिशचंद्र न बन जाते। 

क्या मजाल कि वेस्टर्नाइज़्ड गीता के फॉलोअर अपनी उपलब्धियों का खज़ाना किसी से शेयर कर लें। सारी उपलब्धियाँ ये ख़ुद ओढ़ के बैठ जाते हैं। आई हैड बीन देयर, आई डिड दैट। ख़ुदा न ख़ास्ता यदि कहीं कोई प्रोजेक्ट बैकफायर कर गया, तो क्या मजाल कि इन पर आँच भी आ जाये। ये फोड़ने के लिये दो-चार ठीकरे भी तैयार रखते हैं। इनके पास एक नहीं तीन-तीन प्लान्स होते हैं - प्लान ए , प्लान बी और प्लान सी। और हर प्लान के केंद्र में ये स्वयं होते हैं या इनका स्वार्थ। द्वापर के कर्मयोगी से जो उम्मीद की गयी थी, इनसे करने की गलती कतई मत कीजियेगा। कलियुग के कर्मयोगियों की भी दो किस्में हैं। एक प्राइवेट वाली और एक पब्लिक वाली। प्राइवेट को तो सिर्फ़ मुनाफ़े से मतलब होता है। मानो शोले की बसन्ती - जब तक है जान, जाने जहान। क्योंकि वहाँ लाला का पैसा लगा होता है। वहाँ का कर्मयोग वैश्विक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का शिकार है। इसे हमारे प्रधान सेवक ने जॉब की संज्ञा दी है। लेकिन पब्लिक सेक्टर के कर्मयोगियों से उम्मीद की जाती है कि वो द्वापर के सिद्धांत का अमल करें। क्योंकि वो नौकरी कर रहे हैं। यहाँ देश के टैक्स पेयर्स का पैसा लगा है। जिसके सदुपयोग के लिये उन्हें नौकरी मिली है। लेकिन लाखों की भीड़ को चीर कर जिन्होंने ने कम्पटीशन के माध्यम से नौकरी पायी है, उनमें सेवा भाव से पहले अफसर भाव जागृत हो जाना स्वाभाविक है। आधे  लोग तो सरकारी नौकरी सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि बचपन से ही उनमें देश-सेवा की भावना कूट-कूट के भरी थी। कुछ लोगों ने आरक्षण की व्यवस्था अन्यूज़ड न रह जाये, इसलिये इधर का रुख किया। प्रेस-मीडिया-राजनेता सदैव ये एहसास दिलाने के लिये तत्पर रहते हैं कि वो सरकारी नौकर हैं, लेकिन घर पर बीवी और ऑफ़िस में मातहत उन्हें याद दिलाते रहते हैं कि उनमें अफसरी के सारे गुण विद्यमान हैं। उसने भी तो इसी अफसरी के लिये प्राइवेट जॉब के मोटे पैकेज को तिलांजलि दी थी। कर्म करने का आनन्द भी तब ही है जब पूँजी किसी और की, और ज़िम्मेदारी किसी और की। तुर्रा ये कि अपन तो बस निष्काम भाव से कर्म कर रहे हैं। यहाँ एक ख़ास बात ये भी है कि हर कर्म के साथ वित्तीय प्रावधान जुड़ा होता है। अर्थात हर कर्म के साथ उसका फल भी जुड़ा होता है। प्रत्येक कर्म के फलस्वरूप जो प्रसाद मिल जाता है उससे अपना गुजारा आम आदमी से ज़्यादा अच्छी तरह हो जाता है। जब ऊपर वाले ने प्रसाद के लिये हमें ही चुना तो हम क्या प्रसाद ऐसे ही बाँट दें। यदि इनके कर्मफल पर भी टैक्स लग जाये तो गारंटी है, ये कर्मयोग छोड़ कर भक्ति मार्ग पर चल देंगे। सालों बाद एक ऐसी सरकार बनी है जो लोगों में देशभक्ति जगा कर काम कराना चाह रही है। लेकिन पुरानी आदतें तो जाते-जाते जातीं हैं। 

इन कर्मयोगियों की कर्म करने की इच्छा में बजट एक उत्प्रेरक का काम करता है। ऐसा नहीं है कि देश में काम की कमी हो, लेकिन काम करने की इच्छा ही तब और बलवती हो जाती है जब उस कार्य के लिये बजट का निर्धारण कर दिया जाये। एक बार यदि बजट का प्रावधान हो गया तो इनकी वित्तीय दक्षता इस बात पर निर्भर करती है कि इन्होने कितनी सुगमता से इसे हिल्ले लगा दिया। जिसे ये लोग यूटिलाइजेशन बोलते हैं अक्सर वो कंज़म्प्शन से ज़्यादा नहीं होता। बजट रिलीज़ के बाद इनका समस्त फ़ोकस सिर्फ उसे निपटाने पर होता है। कई बार इस काम की इतनी जल्दी होती है कि उपयोग (युटीलिज़ेशन) और उपभोग (कंज़म्प्शन) का अंतर समाप्त हो जाता है। इकत्तीस मार्च अभी-अभी निकला है कमोबेश सभी विभागों द्वारा कोरोना लॉकडाउन के बाद भी बजट का 95 से 100 प्रतिशत तक निस्तारण कर लिया गया। काम की आवश्यकता तक के बारे में सोचने का समय नहीं था, तो उसकी गुणवत्ता के बारे में बात करना बेमानी है। स्थितियां भी कुछ ऐसी बन चुकी हैं कि या तो कर्म कर लो या सोच लो। नीचे वाले तो बैठे ही हैं अपने सर पर ठीकरा फुड़वाने के लिये। कभी-कभी लगता है कि काश भगवान ने कर्मयोगियों को कुछ समय सोचने के लिये भी दिया होता की आवश्यक और अनावश्यक कार्यों में वे भेद कर पाते। फिनलैंड नाम का एक छोटा सा देश है लेकिन इसकी कई कम्पनियाँ मल्टीनेशनल लेवल पर काम कर रही हैं। वहाँ जब डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार हो जाती है तो उस काम को कुछ सालों के लिये रिव्यू हेतु स्थगित कर दिया जाता है। दो-चार साल बाद भी यदि उस कार्य की उपयोगिता समझ आती है, तभी बजट रिलीज़ किया जाता है। यहाँ आज आइडिया आया नहीं कि कल दौलताबाद के लिये कूच कर देंगे। 

लॉकडाउन ने ये बात तो भली भाँति समझा दी कि दुनिया में हर किया जा सकने वाला काम ज़रूरी नहीं है। इस अवधि ने लोगों को स्वाध्याय और रचनात्मकता की ओर प्रेरित किया है। अब ये अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि कैसे लंगोट पहन कर और कुटिया में रह कर हमारे ऋषियों-मनीषियों ने ग्रह-नक्षत्रों की चाल तक को भाँप लिया था। कारण कुछ भी हो, आप-धापी न होने से करने से ज़्यादा सोचने-मनन करने का समय मिल जाता था। कोरोना संकट काल में किसी को और कुछ समझ आया हो या न आया हो लेकिन ये समझ ज़रूर आ जाना चाहिये कि इच्छाओं की लम्बी फेहरिश्त में आवश्यकतायें बस दो वक्त की रोटी से ज़्यादा नहीं हैं। लॉकडाउन की खबर आते ही मार्केट से आटा सबसे पहले गायब हुआ। यदि मिला भी तो अधिक दाम पर। उसका मुनाफ़ा किसान तक पहुँच पायेगा या नहीं, ये तो समय बतायेगा। लेकिन इस समय ने ये बता दिया कि दूसरों को खाना खिलाना ही निस्वार्थ कर्म है। इस काम में या तो किसान लगे हैं या देश के जवान। सफाई कर्मियों के योगदान को अक्सर कम करके आँका जाता है। भला हो इस महामारी का कि जो बात प्रधान सेवक समझा-समझा कर थक गया, लोगों को स्वतः समझ आ गयी। भोजन के बाद यदि किसी चीज का महत्त्व है, तो हाइजीन और स्वच्छता का। अपनी जान को संकट में डाल कर दूसरों की जान बचाने वाले डॉक्टर्स भी आज कर्मयोगी के रूप में पहचान बनाने में सफल हुये हैं। इन सभी कर्मयोगियों को पूरा देश हृदय से धन्यवाद दे रहा है।   

आज की परिस्थितियों में अत्यावश्यक कार्यों के अलावा लॉक डाउन का कठोरता से पालन ही सच्ची देशभक्ति है। लेकिन कर्मयोगियों के हालात विरहाग्नि में जलने वाले प्रेमियों जैसे हो रखे हैं - हम प्यार में जलने वालों को, चैन कहाँ, हाय, आराम कहाँ। अपने दिल की फ़िक्र का ज़िक्र करने के लिये सजने वाली महफिलें वीरान हो गयी हैं। हर वर्ष की भाँती इस बार भी बजट बँट गया है। ज़िंदगी हर दिन एक नयी जंग है। अब उसे हिल्ले लगाने की होड़ शुरू हो जायेगी। लॉक डाउन की ऐसी-गम-तैसी। एक वाइडली ट्रेवेल्ड मित्र ने बताया कि दुर्योग हम सिर्फ़ स्काईस्क्रैपर्स और मेट्रो को तरक्की की निशानी मान बैठे हैं। आदमी पर इन्वेस्ट करो। बहुत अच्छा लगता है, जब विदेश में लोग सॉरी और थैंक यू का बहुतायत से प्रयोग करते हैं। अच्छा नागरिक बनाओ, देश अपने आप अच्छा बन जायेगा। सरकारें नहीं, लोग देश बनाते और चलाते हैं। कोई भी और कैसी भी सरकार रही हो, देश आगे ही बढ़ा है और आगे ही बढ़ेगा। इसमें किसी शक़-शुबहे की गुंजाईश नहीं होनी चाहिये। जिस दिन हम फल की इच्छा को त्याग कर कर्म करने लगेंगे, देश की प्रगति को उत्तरोत्तर नयी गति मिलेगी और हमें विकसित होने से कोई नहीं रोक सकेगा। ये तभी संभव है जब बजट खर्च करने वाला नहीं बचाने वाले पुरस्कृत हो। उसी तरह जैसे मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। एक  बड़े साहब अपने मातहत से इसीलिये रुष्ट हो गये कि उसने तीन करोड़ का काम तीन रुपये में करा लिया था। विकासशील देश है, बजट तो मिलता ही रहेगा, लेकिन उसको हिल्ले लगाने के उद्देश्य से काम करना कतई उचित नहीं है। लेकिन ये बात बजट ओरियेंटेड कर्मयोगियों की समझ से परे है। इनमें से अधिकांश ने काम ही तब किया है, जब बजट का आवंटन हो गया है। वर्ना कौन सा कर्म, कौन सा कर्मयोग। 

कर्मयोग और भक्तियोग का अन्तर बहुत बारीक़ है। यदि आपको आपके मन का मिल गया तो आप कर्मयोगी बन जाते हैं। यदि नहीं मिला तो भगवान की मर्ज़ी कह कर निवृत हो लेते हैं। हारे को हरि नाम। कभी-कभी सोचता हूँ कि 130 करोड़ लोगों में यदि सब कर्मयोगी हो जाते तो इतना बजट देने के लिये तो वर्ल्ड बैंक भी हाथ खड़े कर देता। यदि वो बजट मिल जाता और उसे बराबर-बराबर 130 करोड़ लोगों में बाँट देते तो क्या देश विकसित देशों की कतार में न खड़ा हो जाता। स्काईस्क्रैपर्स नहीं तो क्या झोपड़ी ही वर्ल्ड क्लास हो जाती। बात सोचनीय है, सोचियेगा ज़रूर। नीति आयोग का गठन हर विभाग में होना चाहिये ताकि कर्मयोगियों की कर्मठता और बजट को देश हित में साधा जा सके।

दस बजने को आ रहा था। साहब की उत्तेजना बढती जा रही थी। प्रधान सेवक की बात उनके कानों में गूँज रही थी - इक्कीस दिन का टोटल लॉक-डाउन। उन्हें लगने लगा हो न हो ये चीन वालों की उनके प्रति साजिश हो।उन्होंने आउट हॉउस में रहने वाले ड्राइवर को आवाज़ दी - गाडी निकालो।सर्जिकल मास्क और ग्लव्स पहन कर वो अपने ऑफ़िस प्रदत्त तख़्त-ए -ताउस पर विराजमान हो गये। अन्यमनस्क भाव से मेज पर रखी फाइलों को पलटने लगे। अनायास हाथ घंटी पर भी चला गया। फिर ध्यान आया वो अकेले हैं। जब भी कोई बोर हो रहा हो तो सोशल मिडिया ही एक विकल्प बच जाता है टाइम पास का। मोबाईल निकाल कर वाट्सएप्प पर उंगली चलायी लेकिन वो नहीं चला। फिर ध्यान गया हाथ पर तो ग्लव्स चढ़े हैं। ये सब सेवायें समय काटने के लिये ही इज़ाद की गयी हैं। दस्ताने उतार कर व्हाट्सएप्प खोला तो किसी मित्र ने जोक भेज रखा था -

बॉसों के लिये हेल्पलाइन : लॉकडाउन का सबसे ज़्यादा असर बॉसों पर। कोरोना के कारण अधिकांश बॉस में डिप्रेशन में। घरों में बीवियों ने मातहतों की तरह बात मानने से इंकार। समझदार बॉस बर्तन और झाड़ू-पोछा करके डिप्रेशन से बचने की जुगत में। सरकार ने खोला एक हेल्पलाइन नम्बर। जिस पर प्रतिदिन 15 से 20 इंस्ट्रक्शंस दे कर बॉसगिरी दिखायी जा सकती है। उधर से बस एक ही आवाज़ आती है। यस सर...यस सर...यस सर...      
           

- वाणभट्ट 

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

जात


नफरतों की दीवार की 
नींव बहुत गहरी है
मज़हबी-सियासी बातों में
चाल बहुत गहरी है

जख़्म के भरने में
कुछ वक़्त तो लगता है
हर पल कुरेदने वालों की
घात बड़ी गहरी है 

साज़िशों से महफ़ूज़ रह सको 
तो ही गनीमत
मंज़र है स्याह और 
रात बड़ी गहरी है 

उगाते हैं सरसों हथेली पे 
ज़ुबानों की खेती है 
सियासतदानों की हर 
बात बड़ी गहरी है 

बाँटते हैं धर्म को 
सेकते हैं रोटियाँ 
बोलते हैं खून की 
जात बड़ी गहरी है 

- वाणभट्ट 

मंगलवार, 10 मार्च 2020

चन्दा ओ चन्दा 

होली आपसी मेल-मिलाप का त्यौहार है। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर विजय का द्योतक है। चूँकि ये सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत का पेटेंटेड त्यौहार है इसलिये इसमें गंगा-जमुनी तहज़ीब और साम्प्रदायिक सौहार्द का एंगल और घुस जाता है। प्रश्न ये भी उठता है गंगा और जमुना जब तीर्थराज प्रयाग में जब घुल मिल गयीं तो जमुना की अलग आइडेंटिटी को बरक़रार रखने का प्रयास क्यों किया जाता है। और सभी नदियाँ सहजता से गंगा में समा गयीं। वर्तमान परिदृश्य पर जब गौर से गौर किया जाये तो ये पता चलता है कि तटस्थ और समदर्शी रहे भारत वर्ष में विघटनकारी शक्तियाँ अनन्त काल से सक्रीय रही हैं। शायद इसीलिये यहाँ पर सुर और असुर के कॉन्सेप्ट ने जन्म लिया। एक तरफ़ ऐसे लोग थे जो लंगोट पहन कर सम्पूर्ण जगत के कल्याण हेतु हवन-पूजन में लगे रहते तो दूसरी तरफ़ वैसे लोग थे जिन्हें हवन में विघ्न डालने में ही आनन्द आता। मानव प्रवृत्तियों का अध्ययन कीजिये तो पता चलता है कि ज़िन्दगानी के सारे मज़े पाशविक और आसुरी प्रवृत्तियों में है। अगला जन्म सुधारने के चक्कर में इस जन्म को व्यर्थ कर देना कहाँ की समझदारी है। आज कल के दास मलूकाज़ फरमा रहे हैं ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा। भोग आज की प्राथमिकता बन गया है और योग बस उतना जितने में कोई एलोपैथिक डॉक्टर भोग छोड़ने के लिये न कह दे। दवाइयों के साथ भी यदि भोग हो सकता है तो भोग छोड़ने और योग करने की क्या आवश्यकता है। जब से सुर और असुर दोनों के बराबर ह्यूमन राइट्स की बात होने लगी है तब से सुरों को अपने ऊपर डाउट होने लगा है। मज़ा लेकर मरें या अगले जन्म का इंतज़ार करें। अगले जन्म में दिक्कत ये है कि फिर आर्किमिडीज़ से लेकर आइंस्टाइन तक मग्घा मारने के बाद भी एक अदद नौकरी के लिये पापड़ बेलने पड़ेंगे। चूँकि पुनर्जन्म की अवधारणा इसी देश के एक धर्म विशेष पर लागू होती है इसलिये आप ये तो भूल ही जाइये की भगवान किसी और देश या धर्म में आपको पैदा करेंगे। इसमें किसी को कोई दुविधा नहीं होनी चाहिये। लेकिन यदि आप निरन्तर आत्मउत्थान के लिये कार्य करते रहेंगे तो निश्चय ही किसी न किसी जन्म में निर्वाण को प्राप्त करेंगे।  

शर्मा जी ने मुँह के आगे दो उँगलियों के बीच से जगह बनाते हुये पान की पीक की लम्बी धार वर्मा जी के गेट के बगल में दे मारी थी। पान की असली जुगाली करने वाला यदि थूक दे तो समझ लीजिये कहने वाली बात का मूल्य पान के मूल्य से कहीं ज़्यादा है। सारी होली की टोली वर्मा जी से होली का चन्दा निकलवाने का प्रयास कर-कर के थक गयी थी। इसलिये शर्मा जी को अपने महँगे ज़र्दे वाले पान की तिलांजलि देनी पड़ गयी। "देखिये भाई वर्मा जी साल में एक त्यौहार आता है जिसमें हम लोग आपके दरवाज़े कुछ माँगने आते हैं। चूँकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिये हम सबका दायित्व है कि समाज बना रहे और हम सब मिल-जुल कर त्यौहार मनाते रहें। पास-पड़ोस ही सबसे पहले वक्त-ज़रूरत काम आता है इसलिये इस चन्दे को एक तरह का इन्वेस्टमेंट ही समझिये। सब लोग थोड़ा बहुत सहयोग करेंगे तभी होलिका दहन और होली मिलन का कार्यक्रम हो पायेगा। होली तो हम सब मना सकते हैं अपने अपने घर में। लेकिन मिल-जुल के मनायें तो कुछ और बात है। ये तो बस सबको आपस में जोड़ने का एक प्रयास है। इस पुनीत कार्य में आपकी सहभागिता की हम सब अपेक्षा करते हैं।" 

वर्मा अपने गेट के सामने हाथ बाँधे उसी तरह अटल खड़ा था जैसे कभी-कभी सत्य खड़ा हो जाता है। "एक बार कह दिया नहीं देना तो नहीं देना। हर साल चले आते हैं। और कोई काम धंधा नहीं है क्या। मुझे होली नहीं खेलनी न ही मिलनी। वैसे भी इस बार हम लोग होली नहीं मना रहे हैं। एक रिश्तेदार नहीं रहे। कोई जोर-जबरदस्ती है क्या।" वर्मा जी का पारा चढ़ता ही जा रहा था। शायद वो उस दिन अपनी ब्लड प्रेशर की दवा खाना भूल गया था। ऐसा नहीं था कि चन्दे के 200 रुपये उनकी आय के बजट से बाहर हो। लेकिन जब से पे-कमीशन लगा तब से भले लोगों की आय बढ़ गयी हो लेकिन पास-पड़ोस से संपर्क घटता गया। बड़े बड़े टीवी हैं बड़ी बड़ी कारें हैं लेकिन बड़े दिल की आशा की तो आपका दिल टूट सकता है, जिसे जोड़ने की गारेन्टी क्विकफिक्स भी नहीं लेता। बैंक बैलेंस और हेल्थ इंश्योरेंस पर इतना भरोसा है कि यदि आवश्यकता पड़ जाये तो मल्टी स्पेशियैलिटी हॉस्पिटल्स में पैकेज़ पर इलाज़ करा कर बिना रिश्तेदारों और पड़ोसियों को इन्फॉर्म किये ठीक हुआ जा सकता है। एक मित्र (तथाकथित ही सही) ने फेसबुक पर अपने हर्निया के ऑपरेशन का चित्र साझा किया तो मैंने भी अपनी शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की संवेदना व्यक्त कर दी। बाद में भाई ने  बताया कि ये दस दिन पहले की बात है अब तो मैंने ऑफिस ज्वाइन कर लिया है। बीस हज़ार का पॅकेज था जो हेल्थ इंश्योरेंस से कवर था। बस एक सिग्नेचर करना पड़ा। उसे नहीं पता कभी-कभी डॉक्टर से भी गल्ती हो जाती है। 

सारी दोस्ती और दुश्मनी फेसबुक पर ही निकाली जा रही है। दोस्ती का आलम तो ये है कि कुछ लोग आमने-सामने भले न पहचानें, बस फेसबुक और व्हाट्सएप पर ही दोस्ती निभा रहे हैं। दोस्ती लाइक और कमेंट करके और दुश्मनी बिना कोई लाइक या कमेंट दिये। एक पोस्ट के बाद यदि लाइक या कमेंट न आयें तो लगाने लगता है - ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं। लेकिन ज़िन्दगी तो चलते रहने का नाम है। हारे हुये जुआड़ी की तरह अगले दिन फिर वो इक नयी पोस्ट फेंकता है। दूसरों की दो-चार पोस्ट्स पर लाइक और कमेंट चेपता है ताकि कोई उसकी पोस्ट पर भी ध्यान दे। कई बार तो अपनी ही पुरानी पोस्ट को हाइलाइट करने के लिये लाइक कर देता है। यदि रेस्पॉन्स न मिला तो कल से फेसबुक को तिलांजलि देने के संकल्प के साथ सो जाता है। ये जानते हुये भी कि कल कभी नहीं आता। सोशल मीडिया के अपने विराट अनुभव के आधार पर मै ये विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि वर्मा सोशल साइट्स के इसी काम्प्लेक्स से ग्रसित लग रहा है। उसे शायद ये नहीं पता कि समाज की तरह सोशल मीडिया के भी अपने नियम होते हैं। एक हाथ दे तभी दूसरे हाथ ले। आप मेरे पोस्ट को चुपचाप देख कर निकल जाओगे और मुझसे कमेंट पाने की उम्मीद रखोगे तो ऐसा नहीं चलेगा। लेकिन इस समय वर्मा आसुरी प्रवृत्तियों के प्रभाव में था। शर्मा जी की सभी दलीलों को ख़ारिज करते हुये बन्दा डटा रहा। कमेटी के अध्यक्ष, सचिव और खजान्ची ने देख लिया कि आज तिल का मूड सही नहीं है इसलिये तेल निकालने का प्रयास व्यर्थ है। सो उन्होंने अपना निमन्त्रण पत्र वर्मा जी को प्रेषित कर दिया। कोई बात नहीं वर्मा जी आप हमारी सोसायटी के माननीय सदस्य हैं। होलिका दहन का मुहूर्त कल सायं 8 बजे का है, परसों सुबह चौराहे पर रंगों के ड्रम भरे मिलेंगे और शाम को उसी स्थान पर होली मिलन का कार्यक्रम है। इष्ट-मित्रों के साथ आप की उपस्थिति प्रार्थित है।     

चूँकि कार्यक्रम करना था और एक-एक व्यक्ति पर इतनी मगज़मारी लिये समय कम था, लिहाजा कमेटी आगे बढ़ चली। 

अगले दिन कमेटी के पदाधिकारियों ने कुछ रिटायर्ड सदस्यों की सहायता से होलिका दहन की तैयारिओं को अंजाम दिया। नियत समय पर पण्डित जी भी आ गये। कोरोना से देश की मुक्ति हेतु पण्डित जी ने दो-चार श्लोक एक्स्ट्रा पढ़े। और होलिका की अग्नि प्रज्वलित हो कर धधक उठी। हवन सामग्री, देशी घी, लोबान और कपूर की सुगन्ध वातावरण में फैल गयी। जितने लोगों ने चन्दा दिया था उससे कहीं अधिक लोग गन्ने पर चने का झाड़ बाँधे पता नहीं कहाँ से अवतरित हो गये। होलिका में होरहे की भुनाई और परिक्रमा के बीच एक आकृति वर्मा जी की भी नज़र आयी। शर्मा जी का पीकने का मन किया लेकिन आज पान का मूल्य कही जाने वाली बात से ज़्यादा था।

-वाणभट्ट     


शनिवार, 11 जनवरी 2020

गड्ढे

इन दिनों सड़कों पर बहुत गड्ढे हो गये हैं। कुछ गड्ढे तो इतने बड़े और गहरे हो गयें हैं कि उन्हें खाई की संज्ञा भी दी जा सकती है। भारत की सहिष्णु जनता को दिक्कतों की आदत इस कदर पड़ चुकी है कि वो गड्ढों के बीच सड़क खोज कर निकल जाती है। मोटरसाइकिल और कार वाले भी तभी ऊपर वाले या सरकार को कोसते हैं जब सर्विस सेंटर वाले नये शॉकर की कीमत बताते हैं। एक अदद ज़िन्दगी में बवाल ही बवाल हैं। किसी ने तो गाना ही बना डाला - ज़िन्दगी हर कदम इक नई जंग है, जैसे कि बन्दा ज़िन्दगी जीने के लिये नहीं लड़ने के लिये धरा पर उतरा है। लेकिन किसी से हाल-चाल पूछ लो तो आजकल फेसबुकिया पॉज़िटिव एटीट्यूड के प्रवचनों के कारण मज़ाल है कोई ख़राब बता दे। यदि मूड सही हुआ तो बन्दा मौसम के ख़ुशगवार होने की बात करेगा। यदि अपना मूड सही नहीं है तो यक़ीन मानिये सारा दोष मौसम के सर मढ़ देगा।

गड्ढों की प्रवृत्ति पर गौर किया जाये तो लगता है ये गड्ढे हमारे देश-प्रदेश की सरकारों की देन हैं। सरकारों का हाल किसी से छुपा तो है नहीं। यदि सरकार को अगली बार न आने का डर हो तो सब के सब कमाने में जुट जाते हैं, पता नहीं फिर मौका मिले या ना मिले। और यदि सरकार को अपनी स्थिरता का विश्वास हो तो उन्हें लगता है - हमार कोई का करिबै। इसलिये गड्ढे निरन्तर बढ़ते जाते हैं। और जनता मोबाईल कंपनियों के दिये फ़्री डाटा को साधने के उद्देश्य से फेसबुक और व्हाटएप्प पर अपना ज्ञान लेने -देने में लग जाती है। जब से अड़ोस-पड़ोस की दीवारें ऊँची हो गयी हैं और घर-परिवार में हर इन्सान अपनी ज़िन्दगी में हद से ज़्यादा बिज़ी हो गया है, यदि ये फ्री डाटा न मिले तो मोबाईल से अपना नहीं तो अपने पड़ोसी का सर तो अवश्य फोड़ दे। पिछले कुछ दिनों इंटरनेट परिचलन के बंद होने के बाद कमोबेश ये स्थिति हर उस बन्दे की थी जिसके लिये सोशल मीडिया से बढ़िया टाइम पास कुछ और नहीं हो।   

वो बात आज भी अच्छी तरह से याद है जब पिता जी ने पहली बार चौबीस इंच वाली सायकिल सीख लेने के लिये ऑफर की थी। शादी में मिली रेले सायकिल को शायद ही उन्होंने किसी को हाथ लगाने दिया हो। पाँचवीं या छठवीं कक्षा में रहा होऊँगा। बेसिक ट्रेनिंग के बाद उन्होंने बताया बेटा पैर चलाने के साथ-साथ हैंडल को भी साधना पड़ता है। बस सडकों के इन गड्ढों से बच कर चलने की कोशिश करो, धीरे-धीरे हैंडल सध जायेगा। बाद में पता लगा ये बात जीवन के हर पहलू पर लागू होती है। अपने अन्दर भी और अपने बाहर भी। जिसने छोटे-छोटे गड्ढों से बचना सीख लिया उसे जीवन का मूल मन्त्र मिल गया। दिक्कत तब शुरू होती है जब हम गड्ढों को नज़रन्दाज़ करना शुरू कर देते हैं। धीरे-धीरे हमें गड्ढों की आदत पड़ जाती है और कुछ समय बाद गड्ढों में आनंद भी आने लगता है। ये गड्ढे जब गहरे हो जाते हैं कि उनसे निकलना असाध्य लगने लगता है। छोटा सा घाव कब नासूर बन जाता है पता ही नहीं चलता। पिता जी की वो टिप आज और आज के परिवेश में उतनी ही सार्थक लगती है। अब लगता है यदि हैंडल साधना है तो गड्ढों से बचना ही काफी नहीं है, गड्ढों को भरते भी जाना चाहिये। 

पूरा हुजूम मानों गेट-वे ऑफ़ इण्डिया पर उमड़ आया था। आतंकवादी हमले ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। कैंडल ले कर सब लोग ग़म और शोक में डूबे चले जा रहे थे। जो घर से नहीं निकले थे, उनका दुःख भी कम न था। नम आँखों से टीवी पर देश का विरोध प्रदर्शन देख रहे थे। कैंडल कल्चर की शायद वहीं से शुरुआत हुयी हो। उसके बाद तो कैंडल कल्चर ने जोर पकड़ लिया। जब भी कोई भयावह घटना घट जाती है लोग अपने रोष या दुःख का प्रदर्शन करने सडकों पर उतर आते हैं कैंडल ले ले कर। आतंकियों द्वारा पोषित अघोषित युद्ध में सेना के वीर नवजवानों की शहादत हो या महिलाओं के प्रति बढ़ते जघन्य अपराध हों, कैंडल मार्च विरोध प्रदर्शन का पर्याय बन चुका है। देश के लाखों-करोड़ों लोगों की मुखर आवाज़ बन चुके हैं, ये मार्च। कुछ ऐसे भयावह काण्ड इधर घटित हुये हैं जिनके ज़िक्र मात्र से मानवता शर्मसार होने लगती है। ज़ख्मों को कुरेदने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन ज़ख्म को भुला देना भी कहाँ तक सही है। लोग निकलते हैं रोष सडकों-चौराहों-मीडिया पर व्यक्त करने के बाद फिर सो जाते हैं लम्बी नींद में तब तक के लिये जब तक एक और कांड न हो जाये। फिर कुछ दिनों की अफ़रातफ़री फिर गहरा सन्नाटा। 

हैदराबाद की हैवानियत के बाद एक बार फिर गुस्सा उबाल पर था। सभी चैनल अटे पड़े थे न्यूज़ से। जगह-जगह धरने प्रदर्शन चल रहे थे। कुछ सारा ठीकरा व्यवस्था पर फोड़ने में लगे थे कुछ सामाजिक परिवेश पर। सबकी उँगलियाँ दूसरे की ओर इशारा कर रहीं थीं। कोई अपने गिरेबान में झाँकने को राजी नहीं दिखा। भीड़ क्रान्तिकारी हुयी जा रही थी। मानों न्याय को अपने हाथों में लेने पर आमादा हो। मुझे पिता जी की बात याद आ रही थी। हमने छोटे-छोटे गड्ढों से बचने के बजाय उन्हें नज़रअंदाज़ में लग गये। जब भी मौका मिला थोड़ा बहुत पैचवर्क (पैबंद) से काम चला लिया। मुझे लग रहा था जिस देश में इतने देशभक्त हों वो देश कैसे ग़ुलाम हो गया और वहाँ ग़ुलामी इतने वर्षों कैसे टिक गयी। क्या ये वही लोग हैं जो घूस लेने-देने से मना कर देते हैं। अपने स्वार्थ से ऊपर कर्तव्य को रखते हैं। गुटका खा कर पुड़िया जेब में रख लेते हैं और पीक थूकते हैं अपने घर के पीकदान में। सारा ट्रैफ़िक अपनी लेन का पालन करता है और क्या मजाल कि कोई बेवज़ह हॉर्न बजा दे या स्पीड लिमिट क्रॉस कर जाये। अपने घर में कच्ची ज़मीन पर किचन गार्डन बनाते हैं न कि फुटपाथ पर। अपना रैम्प पडोसी से नीचे रखते हैं ताकि उनके नित्य-प्रति कार धोने में व्यर्थ हुआ पानी पडोसी के घर में न जाये। फ़र्ज़ी बही-खाता और फ़र्ज़ी रसीद से इनका कोई सरोकार नहीं है। टैक्स ये बिना माँगे पूरी ईमानदारी से सरकारी कोष में जमा करा देते हैं ताकि देश की विश्वव्यापी समस्याओं गरीबी-भुखमरी-बेरोज़गारी-शिक्षा से बेहतर ढंग से लड़ सके। विद्यालयों में छात्र अध्ययन और शिक्षक शिक्षण में ही लगे हों राजनीति में नहीं। नेताओं-पुलिस-अधिकारियों से जिन समाजसेवा की अपेक्षा की जाती है उसका पालन वो जनता भी करती है जो दूसरे की मानसिक विकृतियों को ठीक करने के लिये मृत्यदण्ड की अनुशंसा कर रही है। मज़हबी और सामाजिक ताना-बाना इस क़दर मज़बूत है कि देश के लिये सब मर-मिटने के लिये तैयार हैं और पूजा-इबादत करना उनका व्यक्तिगत मामला है। 

अश्रुपूरित नेत्रों से मै लगातार चैनल पर चैनल बदलता जा रहा हूँ। कहीं आक्रोश फूटा पड़ रहा है। कहीं डिबेट में सरकार की कामी-नाकामी को लेकर प्रवक्ता लड़े जा रहे हैं। पल-पल ब्रेकिंग न्यूज़ में ख़ुलासे किये जा रहे हैं। लगता है सब देशप्रेमी न्याय करा कर ही मानेंगे। इसमें कोई शक नहीं की टीवी न्यूज़ चैनेल्स की वज़ह से अधिकाधिक घटनायें प्रकाश में आ रही हैं, अन्यथा सब ओर अमन-चैन ही नज़र आता। दो-चार दिन बाद जब सब शांत हो जायेगा, उसी केस में पीड़ित को न्याय दिलाने में आठ-दस साल लग जायेगा। कुछ को न्याय मिल भी जाता हो, अधिकांश तो न्याय की आस में वैसी ज़िन्दगी जीने को विवश होते हैं जिसे ज़िन्दगी कहना भी गुस्ताख़ी होगी।  

सडकों पर गहराते गड्ढों की तरह देश के कई घाव नासूर बन गये हैं। जब मेजर सर्जरी होती है तो पूरा देश बिलबिलाता है। लेकिन सबका ध्यान बड़े-बड़े गड्ढों पर टिका हुआ है। छोटे गड्ढों को अभी भी नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। यदि छोटे क्राइम को समाज ने सहना सीख लिया तो कभी भी बड़े गड्ढों से निजात नहीं मिलने वाली। शुरुआत ढाई साल के बच्चों से ही होगी यदि दस साल बाद हम भारत को वैसा देखना है जैसी कि हम सब बातें करते हैं। नागरिक के अधिकारों की बातें बहुत हो चुकीं अब अच्छे नागरिक के कर्तव्यों की बात होनी चाहिये। गलत काम या व्यवहार की सजा अपराध के परिमाण अनुसार अवश्य मिलनी चाहिये। बढ़ते अपराध और अपराधियों के की रोकथाम का ये सहज उपाय है - निप ऐट द बड। जड़ें जब गहरी हो जातीं हैं तो प्रूनिंग से काम नहीं चलता, पूरा पेड़ उखड़ना पड़ता है। 

यदि गड्ढा रहित सड़क चाहिये तो छोटे-छोटे गड्ढों को भरना शुरू कीजिये। प्रगति की रफ़्तार में लगायी जाने वाली ऊर्जा सिर्फ़ हैंडल सम्हालने में ख़र्च करना कहाँ की समझदारी है।             

-वाणभट्ट 

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

कल चमन था

आज कल फिल्म वालों के पास सब्जेक्ट ख़त्म हो गए हैं या कुछ नया कहने की चाह में कुछ भी कहे जा रहे हैं। ऐसी फिल्में बना किसके लिये रहे हैं। जिनके चमन उजड़ गये हैं, उनका दुनिया कम मज़ाक बनाती है, जो फिल्म वाले भी उन पर पिल पड़े हैं। एक नहीं दो-दो फिल्में। भाई जिसे आप मज़ाक समझ रहे हो वो मेरे लिये गंजे लोगों का मखौल उड़ाने से कम नहीं है। दुनिया में लगभग 10 प्रतिशत लोग 50 की उम्र आते-आते गंजेपन का शिकार हो जाते हैं। भारत, जहाँ हर व्यक्ति एक भयंकर इमोशनल ज़िन्दगी जी रहा हो, वहाँ गंजे होने की सम्भावना और भी बढ़ जाती है। भारतीय पुरुषों में गंजे हो जाने का आँकलन लगभग 60 प्रतिशत है। ऐसे में किसी बदनसीब के उजड़े चमन पर हँसने से पहले ये अवश्य सोच लीजियेगा कहीं ये आप की भी मंज़िल-ए-मक़सूद तो नहीं है। ऐसे देश में ऐसे विषय को चुनना बहुत नाइन्साफ़ी है उन लोगों के प्रति जो कभी लहलहाती खेती से अब महरूम हो चुके हैं। बहरहाल फिल्म बनाने से पहले कोई पब्लिक ओपिनियन तो ली नहीं जाती वर्ना डेमोक्रेसी के मक्के हिन्दुस्तान में ये कहानी फिल्म बनने से पहले ही दफ़न हो जाती। लेकिन अब ये फिल्में बन भी गयी हैं और सिनेमा हॉल्स में चल भी रही हैं, तो क्या किया जा सकता है। इसे गंजों की शराफ़त कहें या किसी एसोशिएशन का न होना कहा जाये, इस वाहियात विषय वाली फिल्मों के विरोध में न कोई धरना हुआ न प्रदर्शन, न कोई स्वर उठा, न थियेटरों में आगजनी। और तो और गंजे ख़ुद अपने ऊपर बनी फिल्मों को देखने जा रहे हैं। 

ये बाला जो सुपर-डूपर हिट होने की कगार पर खड़ी है, उसमें गंजों के योगदान के लिये निर्माता-निर्देशकों को अपनी कमाई से एक हेयर ट्रान्सप्लांट का ट्रस्ट बनाना चाहिये, जो देश भर के उन गंजों को सुविधा मुफ़्त दे, जो इसका खर्च वहन कर सकने में असमर्थ हों। बल्कि यदि मुनाफ़े की राशि का २५% भी इस ट्रस्ट को देने का विचार अपने प्रचार माध्यमों से प्रसारित करे तो मैं ये गारंटी लेता हूँ कि शोले के सफलता को बीट नहीं लेकिन रिपीट तो किया जा सकता है। गंजों के बिहाफ़ पर मैं इसलिये बोलने का हक़ रखता हूँ कि क़ुदरत ने उम्र के साथ मुझे भी बालों के नायाब उपहार से वंचित कर दिया है। फिल्मों के नायकों से अलग मेरे लिये बालों का झड़ना चुनौती नहीं बना क्योंकि ये प्रक्रिया विवाहोपरान्त आरम्भ हुयी। कथित रूप से पुरुष प्रधान समाज में इसका श्रेय अनुवांशिकता से अधिक धर्मपत्नी को दिया जा सकता है। शायद इसीलिये श्रीमती जी ने भी बढ़ती टमी की तरह झड़ते बालों पर कभी कोई आपत्ति भी नहीं की। उन्हें भी ये भली भाँति पता है कि पुरुषों को बाँधे रखने का यह नुस्ख़ा वर्षों से आज़माया जाता रहा है। तभी तो कहते हैं पुरुष के हृदय का रास्ता पेट से हो कर गुज़रता है। इन टोटकों के बाद उन्हें वैवाहिक असुरक्षा का डर हमेशा के लिये समाप्त हो जाता है। गौर करने वाली बात ये है कि जो पुरुष अपने लुक्स पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देते हैं, वो अपना मोबाईल कभी भी बिना पासवर्ड के नहीं रखते। अपना क्या, जैसे बाहर वैसे अन्दर। किसी ने वाट्सएपिया ज्ञान भेजा था कि आज के ज़माने में वही व्यक्ति ट्रस्टवर्दी (वफ़ादार) है जिसके मोबाईल पर पासवर्ड न हो। तब मुझे लगा इससे बड़ा कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट किसी ने आजतक नहीं दिया होगा। अब सम्हलने की बारी उन महिलाओं की है जिनके बीएफ या हबी अपने बालों पर कुछ ज़्यादा कंघी किया करते हैं या टमी अन्दर करने के लिये जिम जाने को उद्दत रहते हों। यदि उनके मोबाईल पासवर्ड प्रोटेक्टेड हों तो शक़-शुबहे की कोई गुंजाईश नहीं बचती है। वो चाहें तो प्राइवेट डिटेक्टिव भी लगा सकती हैं। बाद में ये गऊ (गधे-उल्लू का कॉम्बिनेशन), सीधी-साधी, भोली-भाली होने की बात न कहना। (एक गंजा अगर अपनी पर उतर आये तो किसी के हरे-भरे चमन को वीरान करवाने का माद्दा भी रखता है।)  

जब से पीवीआर हॉल्स के किरायों में अतिशय वृद्धि हुयी है पिक्चर्स का बचा-खुचा क्रेज़ भी कम हो गया है। चूँकि ये फिल्में मेरी दुखती रग के करीब थीं, सो इन्हें देखने का निर्णय लिया गया। शादी पहले हुये गंजों की व्यथा समझने के लिये इन फिल्मों का देखना मेरे लिए ज़रूरी था। कौन सी फिल्म चलनी है, इस पर जब श्रीमती जी ने आयुष्मान खुराना वाली फिल्म का नाम लिया तो सच बतायें कसम से रोम-रोम सुलग गया। उन्होंने बहुत ही सहज तरीके से मुझे मेरे गंजे हो जाने का एहसास करा दिया। आज जब ये फिल्म हिट बतायी जा रही है तो मेरा सीना भी फ़क्र से चौड़ा हुआ जा रहा है कि मेरा भी तुच्छ योगदान है इस फिल्म के हिट होने में। यदि ये लेख मै कलाकारों की लाज़वाब एक्टिंग, डायलॉग्स, फिल्म की स्क्रिप्ट राइटिंग, एडिटिंग, सोशल मेस्सेज, बैकग्राउण्ड म्यूज़िक और मधुर गीतों की तारीफ करने के लिये लिख रहा होता, तो मेरे पास शब्द कम पड़ जाते। लेकिन मै ये लिख रहा हूँ, उनके लिये जिनके लिये इस समस्या को उठाया गया है। 

बात उन दिनों की है जब ये तो पता था कि पढ़ायी से ज़रूरी कुछ भी नहीं है लेकिन पढ़ायी में मन लगाना कठिन था। बताने वाले बताते हैं कि इसमें इंसान का कम और उम्र का दोष ज़्यादा होता है। साथ में भाँती-भाँती के लोग थे, डिग्री की रैट रेस में। जो लोग अपने लुक्स के प्रति कॉन्शस थे, दिन-रात आइना तोड़े पड़े रहते थे। एक कंघी हर समय जेब में पड़ी रहती थी। जब जरा मौका मिला या कहीं आइना दिखा, बाल संवारना चालू। (ख़ुदा गवाह है कि बन्दे ने न तब कंघी रखी, न आज रखता है। सुबह के बाद चेहरे को शायद ही कभी दुबारा देखता हो। पर्पज़ली तो कतई नहीं।)  उन फैशन परस्त तब के युवाओं के बाल आज पचासवें बसन्त के बाद भी बरकरार हैं। घोड़ों की खरहरा प्रक्रिया के बारे में तो पता ही होगा। आयरन ब्रिसल्स वाले ब्रशों से खरहरा किया जाता है ताकि उनकी त्वचा पर ब्लड सर्कुलेशन सुचारु रूप से बना रहे। जितना खरहरा उतनी चमकते बाल और त्वचा। कंघी भी एक प्रकार से उसी खरहरे का काम करती है। दूसरों की गलती से जो सीख ले वो बुद्धिमान होता है। काश कि किसी ने खरहरे पर पहले ज्ञान दिया तो आज भी चमन बरक़रार रहता। 

उन्हीं दिनों हमारे साथ एक सहपाठी थे वत्सल। जिन्हें बाकी बच्चे केएलपीडी के नाम से बुलाते थे - काला-लम्बा-पतला-दुबला। अपने लुक्स पर ध्यान न देने की वजह से उसका पढ़ाई पर ध्यान औरों की अपेक्षा ज़्यादा रहता था। इसी चक्कर में भाई को खरहरा करने का ख्याल कदाचित आता हो। शरीर में सर के बाल ही सबसे बेवफ़ा हिस्सा हैं, सबसे पहले साथ छोड़ने को आमादा रहते हैं। वत्सल की मेधा के सब कायल थे लेकिन अपने लुक्स के कारण किसी मिक्स्ड ग्रुप का हिस्सा नहीं बन पाता था। कक्षा में अव्वल और गेड़ा काटने में सबसे पीछे। काफी समय तक तो उसे ये ही पता था की शादी में सही विधि से मन्तर न पढ़े जायें तो बच्चे ही नहीं पैदा होते। भला हो छात्रावास के ज्ञानियों का जिन्होंने उसे इस ब्रह्म ज्ञान से वंचित नहीं रहने दिया। बहरहाल जब उसने २२ साल की आयु में अपने पहले प्रयास में राष्ट्रीय स्तर की सेवा स्थान बनाया। तो उसने उसी कन्या को अपनी जीवनसंगिनी चुना जिसके पीछे गेड़ा काटने में बाकि अपना समय बर्बाद कर चुके थे। कहीं से कोई विरोध के स्वर उठे हों ऐसा मुझे नहीं पता। 

बाला एक बेहतरीन फिल्म है ऐसा मै कहूंगा तो लोग कहेंगे कि गंजा सिम्पैथी चाह रहा है। लुक्स के लिये कभी ध्यान नहीं दिया। हाँ अब कभी-कभी ये लगता है कि काश बाल होते तो ठण्ड से थोड़ा बचाव हो जाता। बारिश का पानी चश्मे पर कुछ छन के आता। दूसरों को देख कर रंग न पाने की गुंजाइश का मलाल भी कभी-कभी होता है। चूँकि मेरी ये स्थिति शादी के बाद आयी थी, इसलिये विवाह से पूर्व गंजे हो जाने के दर्द को समझने के लिये इस फिल्म को देखना लाज़मी था। जिसे इस फिल्म ने खूबसूरती से दिखाया है। एक मिडल क्लास कनपुरिया इससे आगे कहाँ सोच सकता है। एक नौकरी-एक शादी। बस इतनी सी ख्वाहिश वाली ज़िन्दगी। 

स्वानुभूति से मै ये कह सकता हूँ कि खरहरे से बढ़िया कुछ भी नहीं। इसलिए खरहरा करते रहिये जब भी मौका मिले। कहीं शीशा मिल जाये तो अपने अक्स को देखने से कतई गुरेज़ न कीजिये। असलियत से कभी कोई समझौता नहीं कीजिये हर किसी के लिये कहीं न कहीं कोई न कोई बना हुआ है। इंतज़ार कीजिये अपने समय का। असलियत छुपा कर के आप, अपने आप को कष्ट देंगे। जिस समाज में लोग अपने से ज़्यादा दूसरे में इंटरेस्ट रखते हों, वहाँ वो चीज़ सबसे पहले उजागर होती है, जिसे आप छुपाना चाहते हैं। इसलिये नथिंग बेटर दैन ओरिजिनल। और हाँ वत्सल की तरह अपने पे-पैकेज पर काम कीजिये। ये एक शर्तिया इलाज है किसी भी प्रकार के कमी को छिपाने के लिये। 

मेरे लिखने से यदि एक भी बन्दा या बन्दी यदि हॉल की सीट तक पहुँच गया या गयी तो समझूँगा मेरा लेखन बेकार नहीं गया। कृपया मुझे सूचित करना न भूलियेगा। गंजों के लिए फ्री हेयर ट्रांसप्लांट का प्रोजेक्ट चलने के लिये सम्बल मिलेगा। 

देखने वालों ने देखा है धुआँ, 
किसने देखा दिल मेरा जलता हुआ, 
कल चमन था 



तब और अब 


- वाणभट्ट 

रविवार, 29 सितंबर 2019

एक पे एक : फ्री

पूरा का पूरा अख़बार अटा पड़ा था सेल के विज्ञापनों से। नवरात्रि क्या शुरू हुयी लोगों के लिये लुभावने प्रोडक्ट्स के साथ अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसी ऑनलाइन कम्पनियाँ जुट गयीं हैं। एक से एक लार टपकाऊ ऑफर्स ले कर। दाम इतने कम कि खरीदने का मन न भी हो तो लोग दो-चार चीज़ें खरीद ही डालें। लोगों की तमन्नायें उफान मारने लगती हैं इतने सस्ते दाम देख कर। लगता है जैसे श्राद्ध के समय में अपनी इच्छाओं को जबरदस्ती कंट्रोल किये हुये थे। अब मौका लगा है तो पूरा बाज़ार घर में घुसा पड़ रहा है। मार्किट का हाल भी ऑनलाइन मार्किट से अलग नहीं है। त्योहारों की धूम हर तरफ दिखाई दे रही है। देवी का दरबार सजाने, व्रतों को उत्सव में तब्दील करने की होड़ शुरू हो गयी है। हर कोई सस्ते और अच्छे माल को अविश्वसनीय मूल्य पर बेचने को आमादा है। मानों ग्राहक के भले के लिये सब के सब घाटा उठाने तो तत्पर हैं। ऐसा कभी हुआ है, जो अब होगा। जो लोग मन्दी का सियापा पीटते नहीं अघा रहे थे, उनके लिये दुःखख़बरी है कि बाज़ार से मन्दी दिवाली तक के लिये गायब होने वाली है। लोग घरों का रंग-रोगन करायेंगे, सोने-चाँदी-जवाहरात खरीदेंगे और पटाखों में आग लगाने के पिछले सब रिकॉर्ड ध्वस्त कर देंगे। जिन्हें ये सिद्ध करने की अदम्य लालसा है कि वाकई मन्दी छायी है वो पर्यावरण प्रदुषण का सहारा लेकर बंद कमरों में एक रुपये बोर्ड वाला जुआ खेल कर अपने ग़म को कम कर सकते हैं। 

जब पण्डित दीना नाथ शर्मा के यहाँ तीसरी लड़की हुयी तो उन्हें तृप्ति का एहसास होने लगा। पहली में लगा था कि प्रीति का फल है तो नाम रखा प्रीति। बेटे के प्रयास में जब दूसरी लड़की ने जन्म लिया तो उन्होंने उसे अपना बेटा मान लिया। सोचा अब ये ये ही मेरा यश और कीर्ति बढ़ायेगी, सो उसके नाम में भी कोई दिक्कत नहीं हुई। नाम रखा गया कीर्ति। लेकिन लड़के की ख़्वाहिश का क्या किया जाये, इस चक्कर में तृप्ति भी आ गयीं। चौथे और पाँचवें के लिये पंडिताइन ने विद्रोह कर दिया वर्ना पण्डित जी कहाँ मानने वाले थे। हिन्दुस्तानी माँ-बाप की सोच कितनी संकुचित होती है कि उन्हें एक बेटा सिर्फ इसलिए चाहये जो बुढ़ापे की लाठी बन जाये। जब चार-छः का ज़माना था तब बात और थी एक-आध बच्चा अपने निखट्टूपन के कारण माँ-बाप के पास रह जाया करता था। और माँ-बाप उसमें बिना उसकी मर्ज़ी के श्रवण कुमार देखना शुरू कर देते थे। बाकी भाई-बहन दूर से श्रवण कुमार को राय दिया करते कि माँ-बाप की देखभाल कैसे करनी है। अमूमन ये निखट्टू घर का छोटा बेटा हुआ करता था। मशहूर शायर जनाब मुनव्वर राणा तो यहाँ तक कह गये -

किसी के हिस्से में मकां आया किसी के हिस्से दुकां आयी 
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में माँ  आयी

बहरहाल जब शर्मा जी के घर तीसरी बेटी का पदार्पण हो गया, तो पहले उनसे ज़्यादा चिन्ता उनके पडोसी-नाते-रिश्तेदारों को हुयी। तीन-तीन लड़कियों को कैसे निपटायेंगे। वो ज़माना और था, तब लोग प्रेम प्रदर्शन पीठ पीछे और ताने मुँह पर दिया करते थे। लोगों के उन्नत विचार सुन-सुन के शर्मा जी डिप्रेशन की हद तक दुःखी हो गये। यही प्लानिंग करने में लगे रहते कि कैसे तीन-तीन लड़कियों की परवरिश करेंगे। इससे भी ज़्यादा चिन्ता उन्हें उनके शादी-विवाह की होती। सोच-सोच के हर तरफ़ अँधेरा-अँधेरा दिखायी देता। लेकिन बिटिया की छट्ठी आते-आते में शर्माइन में गज़ब की हिम्मत आ गयी थी। षष्ठी पूजन उन्होने पूरे विधी-विधान के साथ किया। उन्होंने पण्डित जी से साफ-साफ कह दिया बेटी का जन्म भी पूरे धूम-धाम के साथ मनायेंगे। बेटी हो या बेटा माँ लिये दोनों बराबर हैं। उठो और सब इष्ट मित्र और रिश्तेदारों को बारहवें दिन पर होने वाले बेटी के नामकरण संस्कार के लिये आमंत्रित करके आओ। दमयन्ती का ऐसा स्वरुप पण्डित दीना नाथ को पहले कभी देखने को नहीं मिला था। फोन-मोबाइल का समय तो था नहीं। थोड़ा बहुत ना-नुकुर करके पण्डित सबको आमंत्रित करने निकल गये। ये बात अलग है कि जहाँ भी गये लोग उनसे अपनी सम्वेदनायें  व्यक्त करने से नहीं चूके। पंडिताइन ने अपनी बेटी के नामकरण संस्कार उसी हर्षोल्लास से मनाया जैसे पहली दो बेटियों का मनाया था। 

हिन्दुस्तान में बेटियाँ होने के कुछ फायदे भी हैं। यदि आपके पास एक अदद नौकरी है और उसमें ऊपरी आय की कुछ भी गुंजाइश है तो आपको खुलकर भ्रष्टाचार करने का लाइसेंस मिल जाता है। यहाँ अपनी आय से तो किसी का पेट भरता नहीं। मुंशी प्रेमचन्द के समय से लोग बहते झरने की तलाश में लगे रहते। माल-गोदाम में नौकरी करते हुये पण्डित दीना नाथ के पास इसकी पूरी सहूलियत थी। तीसरी बेटी के बाद वो कुछ विरक्त से हो गये थे। घर-परिवार में मन न लगता। उनका बस चलता तो वो दिन-रात गोदाम में ही पड़े रहते। माल जमा और निकासी पर उगाही फिक्स थी। ईमानदारी इतनी कि पाई-पाई का हिसाब होता, जो हिसाब से ऊपर से नीचे तक बँटता। अपनी इस ईमानदारी की धाक पण्डित जी ने ऊपर तक जमा रखी थी। दमयन्ती अपनी बेटियों में व्यस्त हो गयी। उसका उद्देश्य था उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाना, जो उसे नहीं मिल पायी थी, और बेटियों को अपने पैरों पर खड़ा करना। बेटियों ने भी उसे निराश नहीं किया।

शर्मा जी जितने सीनियर होते जा रहे थे, घर में मुनाफ़ा बढ़ता जा रहा था। बेटियों की परवरिश में पैसा कभी आड़े आया हो ऐसी स्थिति कभी नहीं आयी। कालांतर में तीनों बेटियाँ अपने-अपने पैरों पर खड़ी हो गयीं। शर्मा जी को सुयोग्य वर की तलाश में ज़्यादा घूमना भी नहीं पड़ा। लड़कियां स्वयं सम्पन्न और समृद्ध थीं इसलिये दहेज की जिस चिन्ता में शर्मा जी आकण्ठ भ्रष्टाचार में लिप्त रहे, वो धरा का धरा रह गया। विधि का विधान है समय के साथ शर्मा जी रिटायर हो गये। अब घर पर रहना मज़बूरी बन गया था। दिन-रात गोदाम के काम में व्यस्त रहने के कारण इष्ट-मित्र भी छिटक चुके थे। लेकिन वो नाते-रिश्तेदार ही क्या जो वक़्त-बेवक़्त आपको आपकी बेबसी याद दिलाने से बाज आ जायें। कभी-कभार अपना स्नेह दिखाने आ जाते। "कोई बेटा होता तो बुढ़ापे में ख्याल रखता।" " मैंने तो एक बेटे को इसीलिये दुकान खुलवा दी कि साथ रहेगा और बुढ़ापे में सेवा करेगा।" "आप लोगों का बुढ़ापा कैसे कटेगा कोई देखने वाला भी तो नहीं है।" लोगों ने इतनी सहानुभूति जताई कि शर्मा जी एक बार फिर से डीप डिप्रेशन में चले गये। उन्हें लगता कि काश मेरे भी एक बेटा होता जो बुढ़ापे की लाठी बनता। अभी तो हाथ पैर चल रहे हैं। कहीं कुछ हो गया तो कौन हमारी देखभाल करेगा। शर्माइन बहुत समझाती कि आप हिम्मत मत हारिये। लेकिन उनकी हिम्मत जवाब दे जाती। डिप्रेशन बढ़ता ही जा रहा था। तब दमयन्ती ने बड़ी बेटी प्रीति से अपनी परेशानी का ज़िक्र किया। 

वो अगले ही दिन अपने पति साथ घर आ गयी। मै आप लोगों को ऐसे कैसे छोड़ सकती हूँ। सामान बांधिये और चलिये मेरे साथ। बेटी के ससुराल में जा के रहना उन्हें किसी भी प्रकार अच्छा नहीं लग रहा था। लेकिन दामाद जी भी पीछे पड़ गये। अब ज़माना बदल गया है आप लोग भी कितनी पुरानी बातें कर रहे हैं। बेटे और दामाद में अब कोई अन्तर नहीं है। उनके बहुत समझाने पर पंडित और पण्डिताइन, प्रीति के घर चले गये। नाती-नातिनों के साथ रह कर न सिर्फ़ डिप्रेशन दूर हुआ बल्कि सही अर्थों में उनके दिन बहुर गये। जैसे उनके दिन बहुरे वैसे उनके दिन भी बहुर पायेंगे जिनको अपने बेटों पर कभी नाज़ हुआ करता था, थोड़ा डाउटफुल है। तीनों बेटियों ने ये निर्णय लिया कि साल के तीन-तीन महीने सब पापा-मम्मी को अपने-अपने पास रखेंगे चौथे क़्वार्टर में यदि उनकी इच्छा हो तो इलाहाबाद के अपने मकान की साफ़-सफ़ाई करवा आया करें। बेटियों के समूह के आगे किस दामाद की हिम्मत कि चूँ कर सके। आज शर्मा जी से सुखी शायद ही कोई हो। साल भर नये-नये स्थान का ससम्मान भ्रमण।और क्या चाहिये था इस बढ़ती उम्र में।  

लगभग साल भर पूरा करके शर्मा जी घर लौटे हैं। पास-पड़ोसी, नाते-रिश्तेदार, जिनको ताने न मार पाने के कारण अपच सी हो रही थी, मिलने पहुँच गये। सब उम्र के उसी दौर में थे। सबके पास बेटे-बहु होने का संतोष तो था लेकिन उतनी ख़ुशी नहीं थी जितनी पण्डित जी के चेहरे से छलकी पड़ रही थी। पंडित-पंडिताइन का प्रफुल्लित चेहरा देख कर वे लोग थोड़ा सदमे में आ गये। उन्होंने इस ख़ुशहाली का राज़ जानना चाहा तो पण्डित जी ने भी अपनी ख़ुशी छिपाने का प्रयास नहीं किया। किसी मजे हुये सेल्समैन की तरह बत्तीसी निकालते हुये बोले "भैया देखो, एक बहु के साथ एक बेटा हाथ से गया समझो, लेकिन एक बेटी के साथ एक दामाद फ्री। इसलिये बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ।"

-वाणभट्ट