शनिवार, 12 मई 2012

अन्नदाता 

इतनी हरियाली के बावजूद किसान को ये नहीं मालूम कि 
उसके गाल  की हड्डी क्यों उभर आई है ?
उसके बाल सफ़ेद क्यों हो गए हैं ?
लोहे की छोटी दुकान पर बैठा आदमी सोना 
और इतने बड़े खेत में खड़ा आदमी मिटटी क्यों हो गया है 

धूमिल की ये पंक्तियाँ किसी भी सहृदय को उद्वेलित करने में सक्षम हैं. जिधर देखो बाज़ार सजा पड़ा है. भांति-भांति के गैजेट्स आ गए हैं. आदमी उन्हीं को पाने की होड़ में सबसे अहम चीज़ भूल गया है. रोटी. 

लोगों को बाज़ार में आई नयी कार का दाम पता है, लैपटॉप का लेटेस्ट वर्ज़न कौन सा आया है, कौन सा मोबाईल ले के चलने में शान बढ़ती है, फ़्रांस-अमेरिका में कौन सा फैशन चल रहा है, कौन सी मॉडल मिस यूनिवर्स की दौड़ में आगे चल रही है, टी. वी. पर किस सीरियल की क्या टी आर पी है, आई.पी.एल. में पोलार्ड कितने में बिका, कन्याकुमारी और गोवा तो अब मिडिल क्लास लोग भी एल.टी.सी. पर जा रहे हैं, मलेशिया और सिंगापूर का चार दिन तीन रात का होलीडे पॅकेज कितने का पड़ेगा, आल वेदर ए.सी. के क्या फायदे हैं, आकाश टैब से अच्छे कितने टैबलेट उपलब्ध हैं, रे-बैन का चश्मा लगाने वाला सभ्य और सुसंस्कृत ही होता है,  कार आदमी की औकात तय करती है. आदमी पर बाज़ार हावी है. 

और खासियत ये है कि हर कोई उस चीज़ के लिए दुखी है जिसका वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं है. जीवन वस्तुतः है क्या? बहुत ही साधारण सी अवधारणा है, पैदा होने से मरने के बीच कुछ करना, और निरंतर करते रहना. कर्म से अर्जन और अर्जन से कर्म कर सकने योग्य शरीर हेतु भोजन. शायद ऐसी जिंदगी आदमी ने जानवरों के लिए छोड़ रक्खी है. उसे तो बस अर्जन को भोग में ही व्यय करना अच्छा लगता है. तभी तो वो सारी उम्र एक सुख से दुसरे सुख की चाह में भटकता रहता है. और भौतिक सुखों की आयु कितनी होती है. तभी तक जब तक वो वस्तु आपके पास नहीं है. 

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,
मिल जाए तो मिटटी है, खो जाए तो सोना है.

इस बहिर्मुखी सम्पन्नता के दौर में आदमी ने आदमी की ही कीमत लगा दी है. संपन्न वो है जो दूसरों को खरीद सकता है. शहर का आदमी अपनी शाब्दिक और मानसिक योग्यता के बल पर नयी नयी ऊँचाईयां छू रहा है. एक करोड़ का पे-पैकेज मिल जाना अब अजूबा नहीं लगता. पता नहीं ये आदमी की पे-बैक वैल्यू भी है या नहीं. वो  देश को वो इसका कम से कम कितना हिस्सा लौटा पायेगा इसमें संशय ज़रूर है. जहाँ सौ करोड़ लोग सिर्फ जीने के लिए जद्दोज़हद कर रहे हों वहां कुछ को दस लाख की आय और कुछ को सिर्फ गुज़ारा भत्ता, बड़ी बेइंसाफी है. पे-कमीशन के बाद सरकार भी एक आदमी को दस लाख तो दे सकती है पर दस आदमी को एक लाख नहीं दे सकती. और गरीबी की रेखा तो गरीबों का मजाक बन कर रह गयी है. एक आदमी को अपने पुराने ए.सी. और कार पर इन्फेरीयारीटी काम्प्लेक्स हो रहा है जब कि एक दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है. 

भवानी प्रसाद मिश्र जी की ये पंक्तियाँ जेहन में कौंध रहीं हैं -

ऐसी सुविधा मत करो 
की कोई सिर्फ दस्तखत करते रह कर  
महल-अटारी-मोटर-तांगे-वायुयान में चढ़ कर डोले 
न ऐसी सुविधा रहे की केवल पढ़-लिख कर 
कोई किसान, कमकर, बुनकर से बढ़ कर बोले.

दुर्भाग्य से जिस भौतिकवादी संस्कृति का उदय हो चुका है, उसमें आदमी को अपने सिवा कुछ दिखाई देना लगभग बंद हो गया है. महानगर में आधे करोड़ के पॅकेज प्राप्त एक मैनेजर महोदय के सामने मैंने बढ़ती मंहगाई का जिक्र कर दिया. उन्होंने सारा दोष मेरी अकर्मण्यता पे धर दिया। ब्लॉग लिखने में जितना समय बर्बाद करते हो उतना किसी प्रोडक्टिव काम में लगाते तो पैसों का रोना नहीं रोते. तुम जानते हो एम.बी.ए.की पढाई कोई हंसी खेल तो है नहीं. कितना रगडा है खुद को तराशने के लिये. पर अब मंहगाई चाहे कितनी भी बढ़ जाए मेरी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता. दाल चाहे सौ रुपये किलो हो या हज़ार रुपये मै खरीद सकता हूँ. इसे मै उनकी गर्वोक्ति नहीं मानता. वो वाकई पढाई में बहुत योग्य था और मेहनती भी. उसके मुकाम पर मुझे फक्र भी है. पर कभी-कभी लगता है कि क्या लक्ष्मी सिर्फ बुद्धि, बलशाली और योग्य लोगों के लिये ही हैं. बाकि को ठीक से जीने का भी अधिकार नहीं है. और पैसे का इतना नग्न प्रदर्शन विचलित करने वाला है. 

अमूमन किसी भी व्यवसाय में व्यापारी उत्पादन के पूरे मूल्य पर मुनाफा जोड़ कर उसका दाम नियत करता है. पर किसान की खेती का मूल्य सरकार तय करती है. पर इसमें कृषि भूमि का व्यावसायिक मूल्य नहीं होता, न ही किसान और उसके परिवार के श्रम का ही मूल्य होता है. बीज बोने से फसल तैयार होने तक कृषक के श्रम को वो हो समझ सकता है जिसने कृषि जीवन को निकट से देखा हो. इसके बाद आढ़तियों के दुश्चक्र में किसान को समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पाता. भण्डारण की सुविधा न होने के कारण वो अपनी उपज को औने-पौने दाम पर बेचने को विवश हो जाता है. और वहीं व्यापारी और मुनाफाखोर किसान के श्रम का अधिकतम लाभ ले जाते हैं. पढ़-लिख कर मिले रोजगार, जिन्हें सफ़ेद कॉलर जॉब कहा जाता है, को लोग समाज में बहुत सम्मान से देखते हैं पर क्या कभी हम अपने किसानों का, जिन्हें अन्नदाता भी कहते हैं, उचित सम्मान कर पाएंगे. पढ़े-लिखे लोगों लोगों का शारीरिक श्रम का अनादर एक भयावह सच बन चुका है. एक अज्ञात भोजपुरी कवि की कविता जिसे मेरे मित्र प्रभात ने सुनाई थी साझा कर रहा हूँ : 

पिचक जईहैं पेटवा, चुचुक जईहैं गाल 
जिस दिन करिहैं भैया किसान हड़ताल.

- वाणभट्ट      

बृहस्पतिवार, 19 अप्रैल 2012

एक तर्क : बाबाओं के पक्ष में

इधर बाबाओं की शामत आई है. हिंदुस्तान का हर तथाकथित बुद्धिजीवी बाबाओं को पानी पी-पी कर कोस रहा है. शायद उसे लग रहा है कि इतना ज्ञानार्जन कर के भी वो अभी तक नौकरी में जूते चटका रहे हैं या दूसरों की चाकरी कर रहे हैं. और लम्पट बाबा सिर्फ लोगों पर आशीर्वाद बरसा कर अकूत दौलत इकठ्ठा कर रहे हैं. इधर जब से लोगों में समृद्धि बढ़ी है वो अपने आगे किसी को कुछ भी समझने को तैयार नहीं है. बाबा की समृद्धि पर तो उसकी निगाह है, पर गलत तरीके से कमाए अपने रुपये उसे उचित जान पड़ते हैं. हर आदमी जब धन के प्रति लालायित है, तो उसे लगता है, बाकि सबको महात्मा की तरह रहना चाहिए ख़ास तौर पर बाबाओं को जिन्होंने अधिकारिक तौर पर माया को तिलांजलि दे रक्खी है. हाल ही में कुछ राजनेताओं ने तो बाबाओं को ढोंगी करार दे कर उन्हें पत्थर बांध कर नदी में डूबा देने तक की बात कर डाली. धन्य हैं वो लोग जो अपनी सत्ता के आगे दूसरों की सत्ता से घबरा जाते हैं. खुद तो हर ऐसा काम करने को तैयार हैं जिससे लक्ष्मी आती है, पर दूसरा सिर्फ और सिर्फ ईमानदारी से धनार्जन करे. ऐसी ही स्थिति पर एक उक्ति है, आपका प्यार, प्यार और हमारा प्यार चक्कर. 

मै बाबा भक्त हूँ पर अंध भक्त नहीं. इतने सारे चैनलों पर इतने बाबा अवतरित हो गए हैं, और हर एक के पीछे हजारों-लाखों की भीड़ खड़ी है तो ज़रूर भारत को उनकी ज़रूरत है. जिस देश में सरकार जैसी कोई चीज़ न हो और सामाजिक ढांचा भी चरमरा जाये ऐसे में आम आदमी कहाँ जाये. किसके कंधे पर सर रख के रोये. कहाँ अपनी बात कहे. पहले पास-पड़ोस, संयुक्त परिवार हुआ करते थे. हर समस्या का समाधान आपस में ही निकल आता था. अब हर आदमी अपनी-अपनी लड़ाई लड़ रहा है. हमारे बुद्धिजीवी कहेंगे, मनोवैज्ञानिक हैं न. पर क्या वो मुफ्त इलाज कर रहा है. वो भी अपने ज्ञान की पाई-पाई वसूल रहा है. वही काम तो बाबा मुफ्त कर रहा है. आराम मिल जाये तो लोग अपना तन-मन-धन सब न्योछावर करने को तैयार हैं. इसमें गलत क्या है.


कोई भी बाबा गलत बात नहीं सिखाता. अच्छी-अच्छी बातें करता है, जो अमूमन सबको पता हैं. सच बोलो. पडोसी से प्रेम करो. समाज सेवा करो. प्यासे को पानी पिलाओ और भूखे को खाना खिलाओ. घंटे-दो घंटे के प्रवचन को लोग श्रद्धा भाव से सुनते हैं. कम से कम उन दो-घंटों में तो वो कोई बुरा काम नहीं कर रहे हैं. घर जाते-जाते भी उसका कुछ प्रभाव ज़रूर बचता होगा. हर कोई तो धक्का-मुक्की कर के बाबा को सुनने जा नहीं रहा. जिसमें कुछ जिज्ञासा होगी वो ही वहां तक पहुँच सकता है. हम अपने ज्ञानियों को ये बहुत ही सहज रूप से कहते और गर्वोक्ति स्वीकार करते सुन सकते हैं कि भारत सदियों से विश्व का अध्यात्मिक गुरु रहा है. हममें से हर किसी ने महसूस किया होगा की भगवन अगर कहीं बसते हैं तो भारत में. घर से दफ्तर के रस्ते में जितने मंदिर-मजार पड़ते हैं, सर झुक ही जाता है. गैस सिलिंडर के लिए लाइन लगानी हो तो भगवान के आगे मत्था टेक कर निकलते हैं, कि हे भगवान आज गैस का ट्रक आ जाये. बच्चे का विज्ञान का परचा हो तो उसे दही-चीनी खिला के भेजा जाता है. शायद सरल प्रश्न-पात्र कि उम्मीद रहती हो. पंडित से बिना बिचरवाये न तो शादी हो रही है न समस्याओं का समाधान हो रहा है. पहले तो शादियाँ बिना कुंडली मिलाये हो भी जातीं थीं, पर अब विदेश में बसे लडके-लड़की के भी ३६ गुण मिला के देखे जाते हैं. ये बात अलग है कि शादी वहीँ होने की सम्भावना ज्यादा होती हैं जहाँ माल ज्यादा मिले. लोगों का गला और उंगलियाँ नाना प्रकार के मणि-माणिक्यों से लदा नज़र आना एक सामान्य बात है.

हम मोहल्ले के एक दबंग के आगे नतमस्तक हो जाते हैं, इलाके का सभासद पार्क पर कब्ज़ा कर लेता है और हम उसके रसूख से डर कर उससे अपने सम्बन्ध बनाये रखते हैं, सरकारी दफ्तरों के बाबुओं का पेट भरने में हमें कतई संकोच नहीं होता, भ्रष्ट और देशद्रोही अफसरों के हम तलुए चाटने से भी नहीं चूकते, हत्यारों, बलात्कारियों, घोटालेबाजों को कानून से खिलवाड़ करने का अधिकार है, आतंकवादियों को पोसना कोई हमसे सीखे, राजनेताओं और माफियाओं के मकडजाल में आम आदमी का जीना ही जंजाल बन गया है. ऐसे में अगर एक आसरा, एक संबल नज़र आता है तो वो है भगवान का. और गुरु और बाबा उनके इस धरती पर नुमाइनदे हैं. भारत में तो ऐसा ही लगता है. 

मेरे एक मित्र के भाई ऑस्ट्रेलिया में बसे हुए हैं. उनके माता-पिता जी कई बार वहां जा चुके हैं. हर बार जब वो अपने अनुभव बाँटते हैं तो लगता है, जहाँ कानून और व्यवस्था का राज होता है वहां न भगवान कि ज़रूरत है न बाबाओं की. एक बार उनके भाईसाहब परिवार के साथ हार्बर ब्रिज घूमने गए. उनके पिता जी ने विशुद्ध भारतीय अंदाज़ में कुछ खा कर उसका कागज़ (गोली बना कर) हार्बर ब्रिज से नीचे समुन्दर में गिरा दिया. ये देखते ही उनका ढाई साल का बच्चा चीख पड़ा, "पापा, बाबा हैज़ लिटर्ड". बच्चे की इस सत्यनिष्ठा की कीमत उन्हें पेनाल्टी दे कर चुकानी पड़ी. वहीँ घर के अंदर किचेन में माता जी ने बहू का काम आसन करने के उद्देश्य से बर्तन माँजने का प्रयास किया. फिर उस देवदूत ने बहता नल देख दादी को नसीहत दे डाली "दादी यू आर वेस्टिंग वाटर". एक सन्नाटी सड़क पर वही भाईसाहब किसी की फेंस में अपनी कार घुसेड बैठे. उतर कर मकान  की घंटी बजाई, आस-पास देखा, कोई आदम न आदम जात. भाईसाहब ने सोचा जब किसी ने देखा नहीं तो निकल लो. पर ऑफिस पहुंचते ही फोन आया कि थाने चले आओ, दुर्घटना करके रिपोर्ट न करने पर भी पेनाल्टी है. और इन्सुरेंस से उस फेंस का पुनः निर्माण हो गया. मेरे एक मित्र को वियतनाम जाने का मौका मिला. कोई वैज्ञानिक गोष्ठी थी. जिसमें वहां के मंत्री और विभाग के मुखिया को भी आना था. नियत समय पर कार्यक्रम बिना मुख्य अतिथि के आरंभ हो गया और मुख्य अतिथि बीच में ही आकर अपने आसन पर बैठ गए. कार्यवाही निर्बाध रूप से चलती रही. कोई बुके ज्ञापन या अपने स्थान पर खड़े होने जैसी औपचारिकता की भी आवश्यकता नहीं समझी गयी. एक मित्र कीनिया और नाइजेरिया रह कर लौटे. उन्होंने बताया वहां सुबह-सुबह लोग रेलवे लाइन की पटरियों पर तीतर लड़ाने नहीं जाते. बल्कि उन्होंने पूरे अपने प्रवास के दौरान किसी को कहीं भी तीतर लड़ाते नहीं देखा. एक नाइजेरियन हमारे यहाँ ट्रेनिंग पर आया, वो हतप्रभ रह गया जब प्रातः भ्रमण के दौरान सब उसे घूर रहे थे पर उसकी गुड मोर्निंग का किसी ने जवाब देना उचित नहीं समझा. ये सब मै इस लिए लिख रहा हूँ कि आप ये महसूस कर सकें कि भगवान तो यहीं बसते हैं, बाकि जगह आदमियों का वास है और अगर वाकई हम सुधारना चाहते हैं तो किस उम्र से प्रयास करना चाहिए. या तो आदमी नियम-कानून से चल सकता है, या समाज से, या धर्म से. किसी का तो डर होना चाहिए. पर दबंगों के देश में सिर्फ समझदार को जीने की इजाजत है. मूर्खों के ऊपर ही तो ये समझदार टिके हैं. किसी भी नेता या अभिनेता का मंदिर तो बन सकता है. उन्हें चांदी-सोने से तौला जा सकता है पर बाबा जो लोगों को सिर्फ जीवन जीने का हौसला दे रहा है वो कैसे सोने के सिंघासन पर बैठ सकता है. 

सबके अपने-अपने हुनर हैं. कोई झूठ बेच रहा है, कोई छल. रोज धन को अल्प समय में दुगना-चार गुना किया जा रहा है. काले जादू वाले बाबा बहुतों की झोली भर रहे है. खानदानी शफाखाने अभी भी सड़क के किनारे दिख जायेंगे. नीम-हकीमों में हमारी आस्था कम नहीं हुई है. गंजों के सर पर बाल उगाये जा रहे है. रातों-रात सिर्फ चाय पी कर तोंद को गायब किया जा रहा है. इन्टरनेट और शेयर के माध्यम से लोगों के पैसे निकलवाये जा रहे हैं. सबका लक्ष्य भोली-भाली जनता है जो १२५ करोड़ पार कर चुकी है. १२५ से ऊपर जो दो-चार करोड़ हैं उनकी चिंता नहीं है, वो खुद किसी न किसी तरह लूट-खा रहे हैं. अगर आप में कोई भी हुनर है, आजमाइए इस देश में कद्रदानों कि कमी नहीं है.

मेरे मित्र जिनके भाई ऑस्ट्रेलिया में बस गए हैं, उनके माँ-बाप अपने उसी लायक बेटे के गुण गाते रहते हैं. और मेरे मित्र के जीवन का लक्ष्य है अपने वृद्ध माता-पिता को खुश रखना-देखना. एक बाबा जिसे उसने गुरु मान रक्खा है उसे कहता है बेटा प्रभु की इच्छा सर्वोपरि है. वो जिस हाल में रक्खे उसी में आनंद लो. निष्काम भाव से कर्म किये जाओ. ईश्वर सब देख रहा है. तुम्हें तुम्हारे सत्कर्मों का फल अवश्य मिलेगा. गुरु की तस्वीर जो उसने गले में टांग रक्खी है उसे हर विपत्ति से बचाती है और जीने का मकसद देती है. कम से कम उसका तो यही मानना है.

-वाणभट्ट       

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

उगता सूरज


टहलने के नेक इरादे से घर के बाहर कदम रक्खा ही था कि शर्मा जी मिल गए.


"भाई वर्मा जी, क्या बात है पूरा महीना निकल गया और कोई पोस्ट नहीं चेपी. ख्याल चुक गए क्या. आपकी ब्लॉग फ्रीक्वेंसी बहुत कम है. लोग तो  रोज़-रोज़  चेप रहे हैं."


मैंने एक्सप्लेन करने कि मुद्रा में बचाव किया " शर्मा जी, मै कोई रेगुलर लेखक या कवि तो हूँ नहीं. जब भड़ास हद से गुज़र जाती है तो उड़ेल देता हूँ. मेरी इस दिशा में फिलहाल कोई कैरियर बनाने की कोई इच्छा भी नहीं है. वैसे भी ब्लॉग लिखने की प्रक्रिया बहुत उत्साहवर्धक नहीं है. पूरी जान लगा के लिखो तो खींचखांच के २५-३० पाठक ही मिलते हैं. तीन साल में फोल्लोवर लिस्ट अभी ३० के पार पहुंची है. जिसमें मै एक खुद ही हूँ. इस चक्कर में पता नहीं किस-किस की पढ़नी पड़ती है सो अलग से. कभी-कभी दिल टूट जाता है. और इच्छा होती है की बस बहुत हो गया अब ब्लॉग नहीं लिखूंगा. पर क्या करूँ जब विचार दिमाग फाड़ने लगें तो यही एक जगह है जहाँ जा के हल्का हुआ जा सकता है. अपना कोई पब्लिशर तो है नहीं. एक बार पैसा दे कर कविता संग्रह छपवा तो लिया पर अब समस्या ये है की जो कॉम्प्लीमेंट्री २५ कॉपी मिलीं थीं उनका क्या करूँ. पिछले हफ्ते तो अति हो गयी. बीवी कहती है बिग बाज़ार में सेल लगी है. कबाड़ बेचो तो २५% तक डिस्काउंट मिल रहा है. तीन-चार किलो की तो ये होंगी ही. खामखाह बच्चों की अलमारी घेर रक्खी है. मैंने शायद बहुत घूर के देखा होगा, दो-चार दिन स्वाद का तड़का खाने में नहीं लगा."


शर्मा जी मेरे उन हिमायतियों में से हैं जो नियमित रूप से मेरे ब्लॉग पर पहुँच कर अपनी उपस्थिति ज़रूर दर्ज करते थे. मेरे प्रशंसक कम आलोचक ज्यादा. वैसे भी मै जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आलोचकों के प्रति सदैव आभारी रहा हूँ, ये ही वो जीव हैं जो आदमी को आदमी बनाये रखते हैं. वर्ना जिसे सिर्फ च ढाने वाले मिले उसे खुदा बनते देर नहीं लगती. और कोई किसी को तब तक नहीं चढ़ाता जब तक उसका कोई स्वार्थ-सिद्ध न हो.


शर्मा जी ने उवाचा, "वर्मा जी ब्लॉग को पोपुलर करना भी हुनर है. आप वाणभट्ट के छद्म नाम से लिख रहे हो. अरे वाणी भट्ट के नाम से लिखो. जब नाम छद्म है तो क्या स्त्रीलिंग क्या पुल्लिंग. इन्टरनेट से किसी मॉडल की खुबसूरत फोटो ले कर चेप दो. देखो फोल्लोवर लिस्ट कैसे बढ़ती है. एक तो आपको कोई ढंग का नाम नहीं मिला. दूसरे खच्चर पे सवार किसी खणूस की फोटो लगा रक्खी है. बताओ कैसे लोगों को आकर्षित करोगे. लेखनी में भी दम  है नहीं. उथली-उथली बातें करते हो. गाम्भीर्य का सर्वथा अभाव है. लोग ब्लॉग को ले कर कितने सीरियस और संजीदा हैं और आप हैं की हें-हें, हें-हें कर रहे हैं. मेरा बताया नुस्खा आजमाइए और देखिये कामयाबी आपके कदम चूमेगी. हम वो नहीं हैं जो खामखाह फाख्ता उड़ाते हैं (अंतर्मन की आवाज़ - गोया फाख्ता उड़ाने का भी कोई परपज होता है). बात में वज़न हो तो लोग खुद बखुद खींचे आते हैं."


वज़न का ज़िक्र होते ही मुझे अपने बढ़ते वज़न की याद हो आई. इसीलिए तो मैंने टहलना शुरू किया है. सरसरी तौर पर शर्मा जी की कमर पर मेरी नज़र दौड़ गयी. माशाअल्ला कमरा बनने की कगार पर पहुँच गयी थी. शर्मा जी ने मुद्दा थमा दिया था. मुझे उम्मीद जग गयी कि आज शाम तक एक ब्लॉग अवतरित हो जायेगा. मैंने फटाफट शर्मा जी को उनके नेक विचारों के लिए धन्यवाद दिया और सरपट खच्चर गति से निकटवर्ती पार्क की ओर अग्रसर हो गया.


इस देश ने आज़ादी के बाद काफी सम्पन्नता हासिल की. जो हर तरफ परिलक्षित हो रही है (गाम्भीर्य भरने का प्रयास). जिसे देखो गाड़ी-घोड़े बदल रहा है. मंहगाई के साथ ही विशाल अट्टालिकाएं बन रहीं हैं. लोग अपनी नव अर्जित संम्पत्ति को शर्मनाक स्तर तक  प्रदर्शित करने में नहीं चूक रहे हैं. अभी तक लक्ष्मी सिर्फ व्यापारियों या भ्रष्टाचारियों पर ही मेहरबान थीं पर अब तो सरकारी तनख्वाहों पर पलने वालों पर भी उनकी कृपा दृष्टि पड़ रही है. पे कमीशन और निरंतर मिल रहे डी.ए. के कारण अब सरकारी नौकरी भी उतनी  बुरी नहीं रह गयी है. प्राइवेट में तो जिसे देखो लाखों के पैकेज पर काम कर रहा है. कुछ प्रोफेशनल लोग तो अब प्राइवेट छोड़ कर सरकारी नौकरियों का रुख कर रहे है. जहाँ नियमित आय के साथ-साथ कुछ सिक्यूरिटी भी मिल जाती है. कहने का मौजूं ये है की हर तरफ समृद्धि की बहार है. समृद्धि हर जगह टपक रही है या यों कहें की फटी पड़ रही है. (गंभीरता बहुत हो गयी अब औकात पर आ जाता हूँ.)


सबसे ज्यादा फर्क पड़ा है आदमी के वज़न में. (शर्मा जी संभवतः अब खुश हो जायें क्योंकि मैंने बात-बात में वज़न डालने की कोशिश की है.) घूमने-खेलने के संसाधनों में ज्यादा वृद्धि तो नहीं हुई है पर खान-पान के आलयों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हर तरफ सहज दिख  जाती है. गली-कूचों और कस्बों में फ़ूड जोइंट खुल गए हैं और लगातार खुल रहे हैं. के ऍफ़ सी, पिज़ा हट, डोमिनो, मेक्डोनाल्ड, सबवे आदि-आदि न जाने कितने मल्टी नेशनल  रेस्टोरेंट अब बड़े शहरों में नहीं रीवा, इलाहाबाद, कानपुर जैसे शहरों में भी पोपुलर हो रहे हैं. नियोन लाइट में सजे इनके होर्डिंग्स हर जगह दिखना अब आम बात हो गयी है. लोगों को भी कम पैसे में ज्यादा कैलोरी की चीजें जितना आकर्षित करतीं हैं उतनी हाई फाइबर, लो कैलोरी वाली नहीं. जंक फ़ूड का ज़माना है. बच्चे चोकोलेट और कुरकुरे के लिए तो होम वर्क भले कर लें. पर दादी के हाथ के बने फरे देख घर छोड़ भाग जाते हैं. मटर का निमोना उन्हें बहुत शैबी लुक देता है पर मंचूरियन की गंदली करी वो बड़े स्वाद से खाते हैं. लिहाजा ऐसे फ़ूड जोइंट की बाढ़ आ गयी है. और उनपे शाम होते-होते लोग बर्र के छत्ते से टूट पड़ते हैं. अफोर्ड करने की बात है. आप के.ऍफ़.सी. से लेकर सड़क किनारे चुन्नू नूडल कार्नर तक कहीं भी मुंह मार सकते हैं. चाइनीज़, थाई, इटालियन या स्पनिश जैसा भी टेस्ट रखते हैं, हर प्राइस रेंज में चीजें उपलब्ध हैं. और लोग है कि अपनी समृद्धि का एक बड़ा हिस्सा घर के बाहर खाने में खर्च कर रहे हैं. अजीनोमोटो डाल-डाल के ये विदेशी व्यंजन आपके मुंह को लार से भर देते हैं. और आप उनके स्वाद के एडिक्ट बन जाते हैं. खैर समृद्धि आपकी है, पेट आपका है, तो खाइए दिल खोल के. घूमना-सैर-सपाटा अभी भी मंहगा है. अच्छे क्लब की मेम्बरशिप तो पैदायशी समृद्धों के लिए है.


गुड डे बिस्कुट का एड आता है कि काजू है तो दिखना चाहिए. वैसे ही समृद्धि हो तो छलकनी चाहिए. कंज्यूमर ड्यूरेबल में तो जो लगाओगे वो तो एक दिन में ख़त्म होगा नहीं. सो लोग कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल से ही अपनी पहचान बनाने में लग गए हैं. कपडे ब्रांडेड, चश्मे ब्रांडेड, परफ्यूम ब्रांडेड, और तो और खाना भी ब्रांडेड. मिठाई की जगह चोकलेट ने ले ली है. घर में पार्टी देने के बजाय मेक्डोनाल्ड में ही गेस्ट बुला लेना लेटेस्ट फैशन है. किसी माध्यम वर्गीय परिवार में बिन बुलाये भी पहुँच जाइये तो वो आपकी खातिर रोस्टेड काजू और गरिष्ठ मिठाइयों से कर सकता है. कुल बातों का लब्बो-लबाब ये है की समृद्धि का एक बड़ा हिस्सा आदमी अपने खाने पर खर्च कर रहा है. 


और ये समृद्धि कैसे और कहाँ-कहाँ से छलकती है, सुभानल्लाह. किसी ने पैंट ३६ से ४० करा रक्खी है, तो पीछे एक विक्टरी वाला वी बनता है, मानो जग जीत लिया. कहीं बेल्ट बेचारी स्ट्रगल करती नज़र आती है. कहीं तोंद शर्ट की बटनों के बीच से बाहर के नज़ारे लेने को आतुर दिखाई देती है. ओवर वेट होना आज का स्टेटस सिम्बल है. बचपन से ही बेटा अपना नाम करना शुरू कर देता है, देखते ही लगता है किसी खाते-पीते घर का नुमाइन्दा है. महिलाओं का तो हिन्दुस्तानी पोशाक में विशेष ध्यान रक्खा है. जितना चाहो उतना बड़ा फलेंटा मार लो. फिर बढ़ते कमरे के हिसाब से कुर्ते और सलवार में दाब छोड़ दो. यहाँ तो पुरुष भी धोती ही पहनना पसंद करते थे. पर भला हो अंग्रेजों का जो पतलून इस देश में इंट्रोड्यूस कर गए. जींस ने तो रही-सही कसर भी पूरी कर दी. बढ़ने की कोई गुंजाईश नहीं छोड़ी. ये मै कहाँ आ गया. आज तो मूड वज़नदार बात करने का था पर मै वापस अपने स्टैण्डर्ड पर आ गया.


समृद्धि का सीधा असर हमारे रहन-सहन पर पड़ता है, उसका असर खान-पान पर और उसका असर वज़न पर. तो भैया समृद्धि इज डायरेकटली प्रपोशानल टु वज़न. जितने लोग दुर्भिक्ष में भूंख से नहीं मरे उतने आज खा-खा के मर रहे हैं. वज़न अपने साथ कई महान बीमारियाँ भी लाता है. पर भाई लोगों का मानना है बीमारी भी हो तो पैसे वाली. जिसके इलाज में जितना खर्च वो उतना अमीर. कुछ लोगों के तो शरीर से कोलेस्ट्राल टपकता दिखाई पड़ता है. पर भाई का कौनफिड़ेंस इतना तगड़ा है की रोटी सुखी तो गले से उतरती ही नहीं. अपने मोबाइल में शहर के हार्ट स्पेशलिस्ट का नंबर फीड कर रक्खा है. उनसे बात भी कर रक्खी है. ५०-६० हज़ार में बाइपास और डेढ़-दो लाख में मेडिकेटेड स्टंट पड़ जाता है. कानपुर में रीजेंसी में फाइव स्टार सुविधा है तो दिल्ली में अपोलो और एस्कोर्ट है ही. वज़न ज्यादा है तो लोड तो घुटनों पर ही पड़ेगा. घुटना प्रत्यरोपण के लिए तो हर ओर्थोपेडिक सर्जन का हाथ खुजला ही रहा है. 


डॉक्टर खुद तो अपने स्वास्थ्य का ख्याल खान-पान से करते हैं पर रोगियों को सिर्फ  दवा पर निर्भर रहने की सलाह देते हैं. बहुत ही गया बिता डॉक्टर होगा जो अपने शरीर का ख्याल न रखता हो. पर वो कभी मरीज़ को प्राणायाम या योग की सलाह नहीं देगा. खुद तो जिम जा कर अपना पसीना बहा लेगा पर क्या मजाल की मोटे लाला को वर्जिश की सलाह दे. बोलता है लाला तू खाए जा, मै हूँ ना.


बहुत पहले अमिताभ की एक फिल्म आई थी जिसमें उन्होंने सुबह उठ कर कसरत करने की सलाह बहुत ही बढ़िया ढंग से दी थी. उसका आशय कुछ इस प्रकार था कि जिसने उगता सूरज नहीं देखा वो लेटे-लेटे ही तकिया पर सर रक्खे-रक्खे ही उगता सूरज देखेगा. उस समय ये बात मेरे पल्ले नहीं पड़ी थी. अब जब मेरे पास तोंद जैसी चीज़ का अविर्भाव हो चुका है मै उस गीतकार को उगते सूरज की कल्पना के लिए कोई भी रत्न देने को तैयार हूँ. ये बात अलग है की हम भारतवासी अक्सर डाक्टरी सलाह के बाद ही सूर्योदय देखने का प्रयास करते हैं.    


यहाँ ये बताना भी ज़रूरी है भारत विषमताओं का देश है. जहाँ लोग खा-खा के मर रहे हैं वहां भूख से मरने वाली खबरें भी आती रहतीं हैं. ये बात दीगर है कि सरकारें उनकी लीपा-पोती में लग जातीं हैं. जहाँ थुलथुल शरीर में मोटे नज़र आते हैं वहां कुपोषण से त्रस्त बच्चे भी भयावह भविष्य का संकेत देते हैं. मुझे लगता है जहाँ फ़ूड फॉर आल आज़ादी के साठ दशक बाद भी सपना है, वहां अति-आहार को राष्ट्रीय अपराध की श्रेणीं में डाल देना चाहिए. अमीर आदमी दिन में दाल तो खाता ही है और रात में चिकेन तोड़ने से भी बाज नहीं आता. गरीब का तो प्रोटीन दाल से ही आता है और भाई का सरप्लस प्रोटीन को ना पचा पाने के कारण यूरिक एसिड बढ़ जाता है. इसलिए देश की खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से हर व्यक्ति के बॉडी-मास  इंडेक्स के अनुसार डायट चार्ट बनना चाहिए. उसी हिसाब से खुराक तय होनी चाहिए. जैसे कोई भी आदमी ज्यादा अमीर दूसरों का हक मार के ही बन सकता है वैसे ही मोटापा दूसरे के हिस्से का खाना खाने से बढ़ता है. मेरे शरीर का जो दो इंच फैट बढ़ा है, वो निश्चय ही किसी और के काम आ जाता अगर मैंने पहले ही उसे बाँट दिया होता. अब सुबह-शाम जोग्गिंग करके भी उसे गलाना मुश्किल हो रहा है. मेरे एक मित्र जापान में कुछ वर्ष बिता के लौटे हैं. बता रहे थे की वहां हर आदमी का हेल्थ इन्सुरेंस है. उसका प्रीमियम बॉडी-मास इंडेक्स के अनुसार घट या बढ़ सकता है. हमारे देश के नियंता वैसे तो ब्लॉग पढ़ते नहीं पर उम्मीद है कुछ सरकारी आला अफसरों की निगाह इस प्लानिंग पर पड़ जाये. इस आशय से मै इसे चेप रहा हूँ. विचार मेरे और क्रेडिट उनका. 


कल सुबह हो सकता है मुझे शर्मा जी के कोप का भाजन बनना पड़े. पर समृद्ध और स्वस्थ भारत के लिए मै ये मोर्चा भी झेल लूँगा. शर्मा जी को नाराज़ भी नहीं कर सकता, उन्हीं जैसे सुधी पाठकों के लिए ही तो मै उदगार व्यक्त करता हूँ. शर्मा जी अब कम से कम ये नहीं कह सकते बात में वज़न नहीं है.                    


- वाणभट्ट 


बाद में : इस लेख का आशय स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करना है ना कि मोटापे से ग्रस्त किसी का मजाक उड़ना. आशा है पाठक इसे इसी सन्दर्भ में पढेंगे. 

रविवार, 19 फरवरी 2012

नथिंग पर्सनल अबाउट इट


ऑफिस से घर आया ही था कि बच्चों ने काम लगा दिया. पापा परेड से कोई किताब लानी है. हम शहर के बाहर रहने वालों को कोई शहर जाने को बोले तो बुखार आ जाता है. बच्चों की पढाई का मामला है सो जाना ही पड़ेगा. बच्चों की भी कोई साजिश लगाती है की बाप को घर पर न रहने दो. रहेगा तो कुछ न कुछ उल्टा-पुल्टा काम लगाये रहेगा. श्रीमती जी से सेटिंग इतनी तगड़ी है कि क्या बताएं. घर में कुछ गड़बड़ हो जाये, शीशा टूट जाये, शो-पीस ध्वस्त हो जाये, रिमोट काम करना बंद कर दे, पेलमेट उखड आये, अलबत्ता तो मुझे पता ही नहीं चलेगा. और चल भी गया तो किसकी कारस्तानी है ये पता करना तो नामुमकिन है. गैंग के तीनों मेंबर, मेरी बीवी, बेटा और बेटी, मुस्कराते रहेंगे पर क्या मजाल कि जुबान खोल दें.


यहीं पता चलता है कि लड़कियां बाप को क्यों प्रिय होतीं हैं. जब मेरे गुस्सा करने कि सम्भावना न्यून स्तर पर होती है, (दो-तीन दिन बाद मै जब घटना को भूल चुका होता) तब वो मेरी गोद में बैठ बड़ी मासूमियत से पूरी घटना को पुनर्जीवित करती. जब कोई ऐसी घटना या दुर्घटना घटती तो उनका प्रयास होता कि ऑफिस से लौट कर पापा को कुछ देखने-सोचने-समझाने का मौका न दो. वर्ना चाय तो बुड्ढा बाद में पिएगा प्रवचन पहले पिलाएगा. यहाँ ये बताना आवश्यक है कि मेरे घर में बच्चों कि पिटाई बिलकुल नहीं होती. और गुस्से में तो कतई नहीं. कभी-कभी उनकी पीठ की सहन शक्ति बढ़ने के लिए एकाध धौल ज़रूर मार देता हूँ, ये बताने के लिए कि बेटा हमारे गुरु और पडोसी भी इतना स्नेह हमें दिखाने से नहीं चूकते थे. तात्पर्य ये है कि मै भारत वर्ष में उपलब्ध इस सुविधा का सदुपयोग नहीं कर रहा हूँ. और अपने आप को पुरातनपंथी बापों की श्रेणी से अलग रखता हूं.


जब आते-आते ही मेरा काम लगाया गया तो सशंकित भाव से मैंने चारों ओर दृष्टि घुमाई. सब चीजें सही-सलामत लग रहीं थीं. सारे शो-पीस यथावत रक्खे थे. एक भी शीशा क्रेक नहीं लग रहा था. सरसरी निगाह से मैंने पूरे घर का आंकलन कर लिया. फिर इस नतीजे पर पहुंचा कि कभी-कभी इनकी डिमांड जिन्यून भी होती होगी. गैंग मेरी गतिविधियों को ओंठ भींचे भांप रहा था. आश्वस्त हो के मैंने कहा "भाई कुछ चाय-पानी तो पी लेने दो". बच्चों की माता जी तुरंत आगे आ गयीं "अरे पापा को थोडा रेस्ट तो कर लेने दो. घर घुसते ही तुम लोग फरमाइश रख देते हो. मै अभी चाय ले कर आई. हाँ, जब शहर जा ही रहे हो तो बच्चों के लिए पिज्जा लेते आना. इन्हें पिज्जा पसंद है. हम लोग भी वही खा लेंगे. दो लोगों के लिए अलग से क्या पकाना." तीनों आँखों ही आँखों मुस्कराए. मै समझ गया मेरा बकरा बन चुका है.


श्रीमती जी ने जल्दी जल्दी चाय-पानी-नाश्ता कराके मुझे गेट के बाहर कर दिया. बच्चे भी बहुत विनम्र भाव से बाय करने के लिए आ गए. उनकी आँखों में जो चमक थी वो बाप को जानबूझ का बेवकूफ बनने को प्रेरित करती है. आखिर उन्हीं की ख़ुशी के लिए तो इतने बवाल पालने पड़ते हैं. 


शहर कोई पंद्रह किलोमीटर दूर था. कानपुर जैसे शहर की खासियत है की अगर आपको ज़ल्दी है तो आप यात्रा का लुफ्त नहीं उठा सकते. इस शहर का मज़ा लेना है तो जाम को एन्जॉय करना सीखिए. यहाँ दूरी किलोमीटर में नापना बेमानी है. दो किलोमीटर की दूरी में दो घंटे भी लग सकते हैं. उस दिन किस्मत साथ थी लिहाज़ा मैंने ये यात्रा तक़रीबन पैंतालिस मिनट में ही पूरी कर ली.  पंद्रह मिनट पुस्तक की दुकान खोजने में और पंद्रह मिनट दुकानदार को किताब खोजने में लग गए. घर से निकले मुझे पूरे सवा घंटे हो गए थे जब तक पेमेंट के बाद किताब मेरे हाथ में आई. तब पहली बार मेरे पेट के निचले हिस्से ने कुछ दस्तक दी.


जल्दबाजी में ऑफिस से लौट का मै फ्रेश होना भूल गया था. ऊपर से दो गिलास पानी और एक कप चाय ने अब अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था. दुकान वाले से पूछा "भाई कोई जगह है यहाँ खाली होने की". दुकानदार मुस्कराते हुए मेरी तरफ मुखातिब हुआ "क्या साहब जगह ही जगह है. मार्केट से बाहर निकल कर बायीं हाथ एक पतली गली है. वहां की आबोहवा थोड़ी ठीक नहीं है पर क्या करें. म्युनिसिपल कारपोरेशन ने मार्केट बनाते समय इस बात पर विचार ही नहीं किया. हम तो वहीँ जाते हैं एक नंबर के लिए. दो नंबर के लिए तो रेलवे स्टेशन तक जाना पड़ता है". आबोहवा की बात सुनते ही मैंने उस गली में घुसने का विचार त्याग दिया. रेलवे स्टेशन कम से कम २ कि.मी. दूर था पर वहां जाम लगाने का अंदेशा भी अधिक था. सोचा मार्केट से कुछ दूर जा कर प्रयास करूँगा.           


आते समय मार्केट जो कुछ खाली-खाली था समय के साथ अपने पूरे शबाब पर आ चुका था. मेरी ८०० से सटा कर किसी ने अपनी कार लगा दी थी. मैंने मन ही मन उस कार वाले को क्या-क्या कहा प्रबुद्ध पाठक समझ ही रहे होंगे. पर मेरी स्थिति का आंकलन वो ही कर सकता है जो इस परिस्थिति से गुजरा हो. और इस जीवन में सभी के साथ ऐसा ज़रूर हुआ होगा. तभी मुझे पिज्जा की याद आ गयी. वो भी तो लेना था. चलो जब तक ये कार हटे, ये काम भी निपटा लूं. ये सोच कर मै रेस्टोरेंट की ओर बढ़ गया. एक उम्मीद थी की शायद यहाँ कोई जुगाड़ बन जाए. घुसते ही मैंने अपने निर्दिष्ट स्थान के लिए जानकारी मांगी. बैरे ने जैसा मुंह बनाया उस स्थिति में मेरे मन-मस्तिष्क पर संडास की शक्ल कौंध गयी. शायद ऐसी ही परिस्थितियों के लिए मुहावरा सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखाई देता है रचा गया होगा. मुझे संडास की दरकार थी सो हर तरफ वही नज़र आ रहा था. बोला "है न वो मार्केट के बगल में पतली वाली गली. बाएँ हाथ को". मुझे अब समझ आया कि बेचारे कि शक्ल वैसी क्यों बन गयी थी. वहां कि आबोहवा संभवतः उसके जेहन में घूम गयी हो. घर अभी भी डेढ़ घंटे की दूरी पर था. एक घंटा यात्रा का और आधा घंटा पिज्जा बनने का. 


पिज्जा का आर्डर दे कर मैंने सोचा चलो जब पूरा मार्केट उस गली को कृतार्थ कर रहा है तो हम भी कोशिश कर के देख लें. फर्स्ट हैण्ड निरीक्षण में ही असली बात पता चलती है. गली जैसा लोगों ने बताया था, वाकई पतली थी. और उसकी तरावट को गली के मुहाने से ही महसूस किया जा सकता था. मुझे अनायास एक शेर याद आ गया, ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लिए, एक आग का दरिया है और डूब के जाना है. तैरने के फन में मैं वैसे भी कुछ कम ही माहिर हूँ सो ये इरादा मुझे ड्रॉप करना पड़ा. और ये मामला भी इश्क का नहीं था. पिज्जा पैक करवा के जब तक मै लौटा मेरी खुशकिस्मती से वो कार हट रही थी और दूसरी वहां लगने की फिराक में तत्पर खड़ी थी. मैंने दौड़ कर कार लगाने वाले को रोका. बहुत ही भला मानुस रहा होगा जो मेरी बात को उसने नज़रंदाज़ नहीं किया. वर्ना भारत के अन्य शहरों की तरह इस शहर में भी बद्तमिजों की कमी नहीं है. उनका बस चले तो सारी पृथ्वी को ८०० विहीन कर दें. उनके विचार से ऐसे लोगों को कार रखने का कोई अख्तियार नहीं है जो वक्त के साथ कार बदल न सकें. खैर ये समय विवेचना का नहीं था. मेरे लिए कार को शीघ्रातिशीघ्र बाज़ार से दूर ले जाना अत्यावश्यक था. 


लेकिन बाज़ार अब तक जाम की स्थिति में आ चुका था. सडकों का हाल तो पूरे यू.पी. में एक सा ही है. विश्व बैंक ने पता नहीं कितना रुपया शहरों में सीवर व्यवस्था के उत्थान के लिए दे दिया है. क्या कानपुर, क्या इलाहाबाद, क्या वाराणसी पूरा का पूरा शहर खुदा पड़ा है. एक शायर ने तो यहाँ तक कह दिया, यहाँ भी खुदा है, वहां भी खुदा है, जहाँ नहीं खुदा है वहाँ कल खुदा मिलेगा. मार्केट की सड़क भी कुछ ऐसी ही स्थिति से दो-चार हो रक्खी थी. मेरी बानगी ये थी कि हर आहट पे समझूँ वो आय गयो रे. खैर शनै-शनै मै जाम के क्षेत्र से बाहर आ गया. पर उस दिन जिंदगी में पहली बार मुझे सोडियम लैम्प कि जगमगाहट से वितृष्णा सी हुई. दूर-दूर तक ये लाइट रोशन थी और मुझे एक अदद अँधेरे की तलाश थी. 


सड़क भी वीआईपी थी. डीएम से लेकर पुलिस के आला अफसर सब उसी सड़क पर रहते थे. तभी आमिर का विज्ञापन भी याद आ गया. शर्म के ताज वाला. मुझे लगा की जैसे ही मै शुरू हुआ कोई ताज ले के मुझे पहनाने न आ जाये. और फोटो भी न खींच ले. और कल के अखबार में मै सुर्ख़ियों में न आ जाऊं. ये हिन्दुस्तानी हीरो जमीनी हकीकत से कितनी दूर रहते हैं. खुद तो चलते हैं ऐसी गाड़ी में जिसमें पूरा घर चलता है, ड्राइंगरूम, बेडरूम, किचेन, बाथरूम और टोईलेट भी. और दूसरों को प्रवचन देते हैं कि देश की नाक इस लघु कर्म से छोटी हो जाती है. कहते हैं कि इससे इनक्रेडिबल इंडिया कि छवि को धक्का लगता है. अरे भाई कोई इन्हें ये बताये कि ये देश इनक्रेडिबल इन्हीं कारणों से तो है कि जहाँ चाहे वहाँ थूको और जहाँ चाहे वहाँ वो-वो करो जिस पर दूसरे देशों में पेनाल्टी लग जाती है. उनकी आज़ादी भी कोई आज़ादी है लल्लू. पूर्ण स्वतंत्रता का हमारा देश आज़ादी के पहले से कायल रहा है. अगर इस विद्रोह को करके लोग क्रांतिकारी कहलाते तो उस समय मेरी अदम्य इच्छा क्रन्तिकारी बनने की कर रही थी. मुझे आमिर पर भी बहुत गुस्सा आ रहा था. पहले जन-सुविधाएं बनवाओ फिर एड करो. फिर चाहे मुझे इस जघन्य अपराध के लिए जेल भेज दो या सूली चढ़ा दो, बुरा नहीं मानूंगा. 


जैसा की मैंने पहले भी कहा था, उस दिन मेरी किस्मत बहुत अच्छी थी. एक सोडियम पर अँधेरा था. मेरी बांछें खिल उठीं. अपनी ८०० और खम्भे की आड़ में मुझे जो सुख मिला वो वाकई इनक्रेडिबल था.


- वाणभट्ट                               
        

सोमवार, 6 फरवरी 2012

आज का युवा

आज का युवा 
अपनी परिपक्वता को
तमगे की तरह
लगा के चलता है

उसे कुछ ही समय में 
आकाश छूना है

दौड़ लगी है
और हर कोई जीतना चाहता है
जब कि
मालूम है कि पिरामिड की नोक 
पर खतरा है किसी भी तरफ 
लुढ़क जाने का 

एवरेस्ट की चोटी पर
सिर्फ एक की जगह है
फिर भी असमंजस और अज्ञान से भरा वो 
दौड़ रहा है
एक मरीचिका से दूसरी 
फिर तीसरी की ओर
असमंजस को तो मानता है
पर अज्ञानता से अनभिज्ञ है

और पथ प्रदर्शक बुजुर्ग
अभी भी जकडे हैं 
जंग लगी रुढियों में
जो रोकतीं हैं 
उन्हें आकाश छूने से 

ये जोश भरे
युवा चमकना चाहते हैं
पिरामिड की चोटी पर
कुछ पल के लिए ही सही

ये धड़कती जवान रूहें
कम समय में 
कुछ कर गुजरना चाहतीं हैं
गुमनाम या गुमशुदा जीवन 
इनको नहीं गवारा
ये तो 
पल भर में दुनिया पलटना चाहतीं हैं


यही जूनून है
जो देश को आगे ले जायगा
इसी का तो
कब से इंतज़ार था


- वाणभट्ट 









बृहस्पतिवार, 19 जनवरी 2012

हामिद का चिमटा

पूरी पार्किंग में मेरी कार अलग ही दिखाई देती है. अपने इर्द-गिर्द खड़ी गाड़ियों पर नज़र डालते हुए मेरे दिल में एक सुखद भाव अनायास तैर गया. हर तरफ नये-नये मॉडेलों की कारें खड़ी हुईं हैं. जब से ये पे कमीशन आया है हर तरफ सम्पन्नता का दौर दिखाई देने लग गया है. सरकारी लोग जो कभी अपनी दरिद्रता का बखान करते नहीं अघाते थे. अब नयी-नयी गाड़ियाँ फ्लौंट करते घूम रहे हैं. भाई जब कमा रहे हैं तो छिपाना कैसा. ये बात दीगर है कि उन्हीं के प्राइवेट काउंटर पार्ट उनसे चार गुनी ज्यादा तनखाह उठा रहे हैं. पर सरकारी लोगों के लिए यही काफी है कि वो अपने अड़ोसियों-पड़ोसियों से कुछ ज्यादा कमा रहे हैं. और बात जब रौब गांठने की हो तो गाड़ी ही एक मात्र स्टेटस सिम्बल है. जब से ब्रांडेड कपड़ों और फैशन अक्सेस्सरिज़ का चलन बढ़ा है, बन्दों को  (और बंदियों को भी) देख कर उनकी औकात का पता लगाना मुश्किल हो गया है. काल्विन क्लेन या रे-बैन के चश्मे होंगे. गले में तनिष्क की मोटी सी चेन. ला-कोस्ट या एड़ीडैस ( जिसे मै लाकोस्टे या आदिदास समझता था) की शर्ट. ली/लेविस/लीकूपर की जींस. नाइकी या रीबाह्क (जिसे मै नाइके या रिबोक बोलता था) के जूते. मोज़े हेंस या पुमा के. बेल्ट कोच या ट्रअफलगर की. यहाँ तक की अंतर्वस्त्रों की बात होगी तो जॉकी के होंगे या डीज़ल के. जैकेट या स्वेटर होंगे तो रेमंड या मोंटे कार्लो के. रोलेक्स या अरमानी की घडी. यानि आदमी पूरा चलता-फिरता ब्रांड अम्बेसडर बना हुआ है. बहुत कठिन हो गया है आम और अमरुद आदमी में फर्क करना.

कुछ लोगों ने दूध और पानी को अलग करने के लिए स्वान (यानि हंस) विधि अपना ली है. यदि आदमी को पहचानना हो तो देखो वो किस गाड़ी से उतरा है. उसी के अनुसार उनको आदर-सत्कार पाने का हक है. वैसे ये बात पार्टी या उत्सवों पर ही लागू होती है. दफ्तरों में तो हर कोई हर किसी की हर बात जानता है. इसलिए ये बात यहाँ लागू नहीं होती पर खानदानी रईस दिखने के लिए नफासत को पोर-पोर से झलकना चाहिए. और इसकी प्रैक्टिस के लिए ऑफिस से मुफीद कोई जगह हो सकती है क्या भला. सो ब्रांडेड आदमी जब अठलखिया कार से उतरता है तो पूरे दिन इसी खुमार में घूमता है की शाम को फिर इसी में सवार हो कर वो लोगों के दिलों पर लोटता सांप छोड़ कर पुनः अपने बिल में घुस जायेगा.

जैसे खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है, फिजां में नयी-नयी कार लेने की बयार चल पड़ी. व्यापारियों में तो चलन तीस लाख से ऊपर वाली कारों का चल गया पर बाबू लोग आठ-दस लाख पर ही अटक गए. बच्चों की पढाई और उनकी शादी का ख्याल एक नौकरी-पेशा आदमी को खुल कर ऐय्याशी भी नहीं करने देता. और वैसे भी इन्हें कार चलाने से ज्यादा दिखाने की फ़िक्र हुआ करती है. अड़ोसी-पडोसी ने देख ली और यार-दोस्तों ने थोड़ी तारीफ़ कर दी तो इनका पैसा लगाना स्वारथ हो गया. अब टोयोटा, फोक्सवैगन, फोर्ड, निसान, पोर्सा, स्कोडा आदि एवं इत्यादि मिडिल क्लास इंसानों को लुभाने में लगे हैं.

ये पार्किंग किसी ऑफिस की नहीं थी. मिस तनरेजा के तीसरे पति के भाग और चौथे पति के मिल जाने की ख़ुशी में पार्टी रक्खी गयी थी. कैम्पस के सामुदायिक मिलन केंद्र में. मिस तनरेजा इस तरह के उत्सवों को बेहद सादे तरीके से मनाना पसंद करतीं थी. वर्ना वो ये पार्टी लैंडमार्क में भी दे सकतीं थीं. पर इससे, होने वाले वर को अपनी महत्ता का गुमान होने का शक हो सकता था. हाँ वो नयी-नवेली दुल्हन की तरह पोशाक बनवाना  कभी न भूलतीं. और अपने विभाग तथा इष्ट-मित्रों को अपनी इस ख़ुशी में अवश्य शामिल करतीं. मै उनके इस उपलक्ष्य में आयोजित प्रीति-भोज में पधारा था. मुझे अपनी बेवकूफियों पर उतना ही गर्व है जितना समझदारों को अपनी समझदारी पर. ऊपर वाले ने मुझे ये नेमत दी है कि मै बड़ी आसानी से अपने आप को किसी भी प्रचलित चूहा दौड़ से अलग रख सकूं. इसीलिए जब लोग अपनी नव-अर्जित समृद्धि को लिबास और दिखावे पर खर्च करते, मै फक्कड़ी को अपनी ढाल बना के चलता. सो होंडा और टोयोटा के ज़माने में मारुती-८०० रखना और उस पर फक्र करना मुझ जैसे बिरले इंसान के ही बस की बात है. पाठकगण यदि मै अपनी शान में कुछ ज्यादा कह गया हों तो माफ़ कीजियेगा. और यदि आप भी दिखावे के ज्वर से पीड़ित हों तो इसे अनर्गल प्रलाप समझ कर मेरी मानसिकता को कोसने का मौका अपनी टिप्पणियों में मत छोड़ियेगा. पर मै क्या करूँ, मै ऐसा ही हूँ.

हाँ तो मै मिस तनरेजा कि पार्टी अटेंड करने आया था. १९९५ का मॉडल जो मैंने सन २००० में सेकेण्ड हैण्ड ख़रीदा था, उसे २०१२ तक मेंटेन करने का गुरुर वो ही समझ सकता है जिसने मशीन का दिल देखा हो. कोई भी मशीन बूढी नहीं होती नयी-नयी तकनीकें आ जातीं हैं. कुछ सुविधाएं बढ़ जातीं है. आज भी जब मै अपने पी-फोर कंप्यूटर पर काम करता हूँ तो महसूस करता हूं कि माइक्रोसोफ्ट के सोफ्टवेयर के लिए बार-बार हार्डवेयर बदलना कहाँ की समझदारी है. जबकि प्रोसेस्सर नहीं मेरी खुद की स्पीड मेरी कार्य की गति निर्धारित करती है. बहरहाल मैंने अपने चारों ओर विराजे ने वाहनों में विद्यमान नयी तकनीकों पर प्रसंशा की एक दृष्टि डाली. मन ही मन अपनी मेंटेनेंस को भी सराहा और पार्टी स्थल की ओर कूच कर गया. 

वहां उपस्थित सभी अतिथियों ने भी मेरे आने को भली-भांति नोटिस कर लिया था. पुराने साइलेंसर कुछ कम काम करते थे. कुछ लोग मुस्करा रहे थे. कुछ कमेन्ट मार रहे थे "लो आ गया फटीचर". मैंने उन सबको अनसुना करके मिस तनरेजा और उनके नये पति को बधाई देना उचित समझा. हद तो तब हो गयी जब मिस तनरेजा ने मेरा इंट्रो अपने पति से करवाया. "हनी, ये वर्मा जी हैं, हमारे यहाँ वैज्ञानिक के पद पर काम करते हैं. एकदम ज़मीन से जुड़े इंसान हैं". पतिदेव को देख कर जितना मै मुस्कराया उससे कहीं ज्यादा वो मुस्कराए. मुझे लगा शायद मेरी पर्सनालिटी से इम्प्रेस हो रहे हैं. पर भाई साहब क्या बताएं भैंस मुंह खोलेगी तो गाना नहीं गाएगी. उनके मुंह से निकला "वही मारुती-८०० वाले, बहुत नाम सुना है आपका". मुझे ये कतई गुमान नहीं था की मै इस विशेषण से भी जाना जाता हूँ. पीछे से लोगों के ठहाके मेरे कानों में गूंज गए. मिस तनरेजा के मुख का वो हाल था कि 'शोभा वरननी न जाई'.  

मै मुस्कराया और बोला "जी हाँ मै वही मारुती वाला हूँ. लोग प्यार से मुझ फटीचर भी कहते हैं. पर सच ये है कि हिंदुस्तान और विशेषकर कानपुर  के लिहाज़ से मारुती ही एक कम्प्लीट कार है. छोटी सी कार है कहीं भी पार्क कर लो. जाम में आसानी से निकल जाती है. पूरे शहर में चाहे एक लाख की गाड़ी हो या पचास लाख की सब ठुंकी हुई हैं. और तो और मोटर चोरों की नज़र भी नयी कारों पर ही होती है. आप लोग भी नयी कार को पार्क करके न तो चैन से शौपिंग कर पाते हैं, न ही पार्टी का मज़ा ले पाते हैं. महँगी गाड़ियों के स्पेयर भी मंहगे होते हैं इसलिए उन्हें मेंटेन करने में भी काफी खर्च हो जाता है. अपनी मारुती तो सस्ती, सुन्दर और टिकाऊ भी है. आप सबने लोन ले कर ये मंहगी-मंहगी गाड़ियाँ सिर्फ शोशेबाजी के लिए खरीदी है. जबकि मैंने अपनी आवश्यकता के लिए. हर कंपनी अपनी कार में नयापन लाने के लिए अजीब-अजीब से शेप निकाल रहीं हैं. सबका कम्पटीशन मारुती से है. आप लोग चाहे कितना भी हँस लें मुझ पर, पर जब भी नयी कार में स्क्रैच लगता है, आप लोगों का दर्द मै बयां नहीं कर सकता. मारुती कल की गाड़ी थी, आज की गाड़ी है और कल की गाड़ी भी रहेगी." मेरे इस धारा प्रवाह उद्बोधन को पार्टी में उपस्थित लोग विस्मयादिबोधक चिन्ह के साथ सुनते रहे. मुझे लगा मारुती को मुझे अपना सेल्समैन रख लेना चाहिए.  

बाद में खाना खाते समय फुल्कों को देख कर मुझे हामिद का चिमटा याद आ गया. अंगूर खट्टे हों ऐसा भी नहीं है.    

- वाणभट्ट

* मुंशी प्रेमचंद के 'ईदगाह' को सादर समर्पित.


   
                                 

रविवार, 13 नवम्बर 2011

पावर हॉउस


(ये कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और इसका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है.)


शहर जहाँ से लगभग खत्म होता है, वहीँ एक छोटा सा ढाबा है. कौतुहल से दूर, शांत और गंवई हवा में पूरी तरह डूबा हुआ. ढाबा छोटा ज़रूर है, पर है बहुत ही एस्थीटीकली डिज़ाइंण्ड. आगे फूलों की क्यारियां हैं, जिसमें मौसम के हिसाब से पौधे बदल जाते हैं. पीछे लॉग-हट टाइप के पांच-छः झोंपड़े बेतरतीब से सजे खड़े हैं. खाने की टेबलें इन्हीं झोंपडेनुमा शेड्स में रक्खीं हैं. एकदम पीछे कंक्रीट की छत के नीचे चमा-चम चमकते भगोने दिन में हाइवे पर चलने वालों का ध्यान खींचने के लिए काफी हैं. रात का नज़ारा चाइनीज़ लाइटों की जगमगाहट में और भी मनोहारी हो जाता है. हल्के-हल्के बजती मेंहदी हसन की गज़लें या आबिदा परवीन के सूफियाना गीत माहौल को और खुशगवार बनाने में बची-खुची कसर पूरी कर देते. यह ढाबा इतन अलूफ और सुकून वाला है कि शहरी लोगों का एक पसंदीदा डेस्टिनेशन बन गया है. शाम होते-होते गाँव की ठंडी बयार और इस ढाबे का स्वादिष्ट खाना उथल-पुथल भरी शहरी जिंदगियों को बरबस खींच लाता. शनिवार और रविवार को तो अक्सर बुकिंग तक की नौबत आ जाती. कोई भी आने वाला ढाबे के मालिक के मधुर स्वभाव और उम्दा पसंद को एप्रिशिएट किये बिना नहीं रह पता.


उस रात जब मै डिनर के इरादे से पहुंचा तो माहौल हमेशा की तरह खुशगवार था. चूँकि मै अकेला था, मेरे लिए खुले लॉन में इंतजाम कर दिया गया. यहाँ रोशनी कुछ कम थी पर लॉग-हट में लगीं बाकी मेजें सहज विजिबल थीं, जिससे अकेलेपन के एहसास में कुछ कमी ज़रूर होती थी. खाने का आर्डर देने के बाद मैं सुकून से वातावरण में तैरती मेंहदी हसन की आवाज़ से मुतास्सिर हुआ - उनसे अलग मै रह नहीं सकता इस बेदर्द ज़माने में, मेरी ये मज़बूरी मुझको याद दिलाने आ जाते हैं....कोई जल्दी नहीं थी. जल्दी होती तो शहर से इतनी दूर आता ही क्यों. 


तभी एक तल्ख़ आवाज़ मेंहदी हसन की आवाज़ पर तारी हो गयी. एक टेबुल पर बैठा फ्रेंचकट दाढ़ी वाला शख्स अपना आपा खो बैठा. उसने दाल का पूरा कटोरा वेटर के ऊपर दे मारा था. "ये दाल है तुम्हारी. एकदम जला डाली. दाल बनाना भी नहीं आता तो चिकन क्या ख़ाक बनाओगे. पूरा मूड चौपट कर के रख दिया. अबे अब खड़ा क्या है. जा जाके अपने मालिक को भेज". बंदा बहुत गरम हो रहा था. मालिक शोर सुन कर उस मेज़ की ओर पहले ही बढ़ चुका था. बैरा बडबडाने लगा था कि कहाँ-कहाँ से रईसजादे चले आते हैं. इतने बड़े लाट साहब हो तो जाओ किसी फाइव स्टार होटल में. शहर में होटलों की कौन सी कमी है. इतना सुन कर तो वो रईसजादा हत्थे से उखड गया. और पूरी मेज़ ही पलट दी. 


मालिक बैरे को चुप रहने की हिदायत और खिसक लेने का इशारा करते हुए बीच-बचाव की मुद्रा में आ गया. "क्या हो गया साहब. ये तो हमारे यहाँ की स्पेशल दाल मक्खनी है. आप नाहक बैरे से उलझ पड़े. ये तो कम पढ़े-लिखे लोग हैं. आपको मुझसे कम्प्लेंट करनी चाहिए थी". अपने सुरुचिपूर्ण टेस्ट की तरह ही मालिक मधुर और मीठा था. ढाबे की गुडविल का सवाल था, सो मालिक उसे खुश करने में लग गया. " साहब आप लोग दूसरी टेबल पर बैठ जाइये. कभी-कभी गड़बड़ी हो जाती है. मै आपको अपने यहाँ की सबसे लज़ीज़ डिश शाही मुर्गमुसल्लम खिलवाता हूं. पसंद आये तभी पेमेंट कीजियेगा. मै अश्योर करता हूँ आप बार-बार यहाँ आना चाहेंगे". ढाबा मालिक इतना शरीफ होगा मैंने कभी सोचा न था. उसने सभी को दूसरी मेज़ पर बैठा कर उनका आर्डर भी खुद ही बुक कर दिया. पूरा ग्रुप संतुष्ट होकर नई टेबल पर बैठ गया.


अब फ्रेंचकट दाढ़ी वाला शख्स ठीक मेरे सामने था. मैं उसे गौर से देखा तो शक्ल कुछ जानी पहचानी सी लगी. ये तो लालाबत्ती का लड़का लग रहा है. वही जो हमारे पुराने मोहल्ले में साथ-साथ पला बढ़ा था. आजकल कहीं विदेश में सेटेल है. लालाबत्ती का ध्यान आते ही मेरे सामने सारा सीन फ्लैश-बैक की तरह घूमने लग गया. लालबत्ती हमारे पुराने मोहल्ले में रहते थे. सारे मोहल्ले में वो इसी नाम से फेमस थे. इतना फेमस की शायद ही कोई उनका असली नाम जानता हो. इस नाम की भी एक अंतर्कथा है.


लालाबत्ती बिजली विभाग में काम करते थे. और जैसा की हर विभाग में  होता है, उसकी सुविधाएं फ्री में लेना कर्मचारियों का जन्मसिद्ध अधिकार होता है. लालाबत्ती बिजली के प्रति ऐसा ही सहज भाव रखते थे. लिहाज़ा बिजली के मीटर और वैध कनेक्शन की उन्हें कभी आवश्यकता महसूस ही नहीं हुई. बल्कि ये उनकी एकमात्र शान की तौहीन से कम न था. कटिया मार कर बिजली हरण के लिए उन्होंने हमारे मोहल्ले में अग्रज और पथप्रदर्शक होने का गौरव भी प्राप्त किया. उनकी देखा-देखी और लोगों ने भी कटिया व्यवस्था को सुदृढ़ करने में यथासंभव-यथाशक्ति योगदान दिया. हमारे मोहल्ले का नाम बिजली के नैसर्गिक उपयोग में लिम्का या गिनिस रिकॉर्ड में तो नहीं पर बिलजी विभाग की लिस्ट में शीर्ष स्थान पर आ गया. कर्टसी लालाबत्ती. लोग उनकी आड़ में जितना मज़ा तब संभव था, (उन दिनों लोगों को ए.सी., फ्रिज, हीटर, टी.वी. का ज्ञान न था) पूरा लूट रहे थे.


सामने जो हो रहा होता है उस पर किसी और का नियंत्रण होता होगा, वर्ना हमारा मोहल्ला, जो उन दिनों खुशहाल मोहल्लों में शुमार था, पर यूँ गाज न गिरती. आकाश में सितारे और ग्रह अपनी-अपनी चाल चलते रहते हैं, और यहाँ आदमी की ऐसी की तैसी हो जाती है. एक बार बिजली विभाग में कोई कड़क अफसर आ गया. जिसे वाकई रेवेन्यु की चिंता हुई. उसने सभी नामी-गिरामी मोहल्लों की फेहरिस्त दरकार की. यहाँ ये याद दिलाना ज़रूरी नहीं है कि हमारे मोहल्ले को शीर्ष स्थान पर देखना शहर के बाकी मोहल्लों को फूटी आँख न सुहाता था. सितारों ने साजिश रची और हमारे मोहल्ले पर रेड का नंबर सबसे पहले आना बदा था, सो सबसे पहले नंबर लगा भी. विभाग के सोये हुए अधिकारियों ने गज़ब की फुर्ती दिखाते हुए छापा मारा, आनन्-फानन में कटियाँ नोच डालीं और कनेक्शन रेग्युलराइज़ करने का अल्टीमेटम दे डाला.


मोहल्ले में कोई हार्डकोर क्रिमिनल तो था नहीं. सभी नौकरी-पेशा करने वाले डरपोक किस्म के लोग थे. सभी ने कनेक्शन रेग्युलराइज़ करा लिया. पर लालाबत्ती ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया. बिजली विभाग में रहते  हुए अगर बिजली मोल ली तो लानत है. विभाग के लोगों ने समझाया कि अफसर अक्खड़ है बाद में देख लिया जायेगा. पर लाला थे कि अपने बर्थ-राइट पर अड़े पड़े थे. उनकी भी कटिया नोच ली गयी. अफसर ने जवाब-तलब किया सो अलग से. क्या लाला की फाइल और क्या लाला की सी.आर. सब रंग गयी. केस बिगड़ चुका था. पर लाला कहते कि विभाग वाले न सिर्फ कटिया लौटायेंगे बल्कि माफ़ी भी मांगेंगे. न ऐसा होना था न हुआ. अब सारा मोहल्ला रोशन था पर लाला के घर पर अँधेरा छाया रहता. लाला की लड़ाई जारी थी.


पर ज़ालिम ज़माने को चैन कहाँ? और वो पडोसी भी क्या जो दूसरे के फटे में अपना आनंद न खोज लें. लोग पूछते लाला जी बत्ती कब आएगी. लाला जी यथासंभव निर्विकार भाव से बताने लगते कि लगे हुए हैं, ऊपर तक हिला रक्खा है, अफसर की भी भेद-भाव की कम्प्लेंट कर दी है, सबके कच्चे चिट्ठे हैं मेरे पास आदि-आदि. न लोगों ने पूछना छोड़ा न लाला ने बत्ती लगवाने का प्रयास किया. शनैः-शनैः लोगों को इसमें मज़ा आने लगा और लाला को गुस्सा. अब कोई बत्ती का ज़िक्र करता तो लाला भड़क जाते. किसी ने थोडा ज्यादा इंटेरेस्ट लिया तो तय था कि वार्तालाप का समापन लाला की गालियों से होगा. लोगों को लाला में और मज़ा आने लगा. 


बड़ों को तो चुटकी लेने में मज़ा आता ही था, अब तक बच्चे भी लाला की इस चिढ से वाकिफ हो चुके थे. खेलने-खालने के बाद सब बच्चे लाला के घर के सामने बने चबूतरे पर इकठ्ठा हो जाते और एक सुर में चिल्लाते - लाला बत्ती आई. और लाला जी अन्दर से लाठी-डंडा लिए गाली देते बाहर आ जाते. लडके कुछ और तड़का लगाते तो लाला उन्हें डंडा लेकर दौड़ा लेते. बच्चे तितर-बितर हो कर भाग लेते. थोड़ी देर बाद फिर एकत्र हो कर अपनी हरकतों को दोहराते. ये हर शाम का सिलसिला बन गया था. एक लड़का चिल्लाता - "लाला जी", बाकी बच्चे समवेत स्वर में चिल्लाते - "बत्ती आई". एक लड़का चिल्लाता - "लाला जी की", बाकी चिल्लाते - "बत्ती गुल". एक लड़का चिल्लाता - "लाला जी की", बाकी चिल्लाते - "बत्ती ठप्प". इस तरह उनके कई नाम पड़े - लालाबत्ती आई, लालाबत्ती गुल, लालाबत्ती ठप्प. मोहल्ले के बड़े बुज़ुर्ग लालाबत्ती से ही काम चला लेते. 


जब तक हम उस मोहल्ले में रहे, लाला की बत्ती न आनी थी न आ सकी. बच्चे भी बड़े हो रहे थे. सो पढाई और काम-धंधे की फ़िक्र में लग गए. पर लाला का घर बिजली नहीं देख सका. पर हाँ, अब वो चिढाने-चिढाने वाली बात न रही थी. लाला ने शायद हालात से समझौता कर लिया था. पर उनकी जिद खत्म होने का नाम न लेती थी. ये जिद की पराकाष्ठा ही थी, जिसने खुद न देखा हो उसके लिए सहज विश्वास करना कठिन है. पर अगर लाला ऐसे न होते तो भला उस आम कद-काठी के मिडिल क्लास इंसान तो कौन याद रखता. बहरहाल लोगों से सुना कि लाला अपने जीते-जी बिजली बहाल न करा पाए. उनकी इस सनक ने उन्हें बीवी-बच्चों से भी दूर कर दिया. उम्मीद की रोशनी शायद पहले ही उनसे दूर हो चुकी थी इसलिए उन्हें बिजली की दरकार ही न रही हो, ऐसा भी हो सकता है. 


ये साहब उन्हीं के साहबजादे थे. मेरा खाना आ चुका था. जो हमेशा की तरह गरम और सुस्वाद था. पर लालाबत्ती के बेटे की मेज़ पर अभी भी कोहराम की अवस्था बनी हुई थी. ढाबा मालिक अभी भी अपने ग्राहक को खुश कर पाने की उम्मीद पाले हुए था. आफ्टरऑल एक एन.आर.आई. का मामला था. पर मुझे अतीत दिखाई दे रहा था. यहाँ भी फ्री खाने का जुगाड़. पतंग जब आसमान में होती है तो भूल जाती है कि वापस उसे ज़मीं पर ही आना है. और वो पतंग ही क्या जो ऊंचाई पर जा के बहके नहीं. जी में आया कि बीच-बचाव करूँ, पर डर था कि ढाबा मालिक पर अपना इम्प्रेशन ख़राब न हो जाए. मन ही मन मै पुराने दृश्यों को याद कर मुस्करा रहा था. और सोच रहा था कि किसी ने शायद ऐसे ही लोगों के लिए मुहावरा गढ़ा है कि 'बाप मरे अंधियारे में और बिटवा का नाँव पावर-हॉउस'.                      


- वाणभट्ट