रविवार, 19 मई 2019

साँड़ 

अगल-बगल में सब बेतहाशा दौड़े चले जा रहे थे। उसने भी आव देखा न ताव भाग लिया। और सबको पछाड़ते हुये वो लक्ष्य तक सबसे पहले पहुँच गया। दौड़ तो ऐसे लगा रहे थे जैसे कोई लड्डू मिलने वाला हो। लेकिन कैद हो कर रह गया। अब पछता रहा है कि वो लोग ज़्यादा स्मार्ट थे जो रेस में धीरे-धीरे दौड़ रहे थे। लेकिन जब दौड़ लगी हो तो आम और अमरुद में यही फ़र्क रह जाता है। आम दौड़ लेता है, ख़ामख़्वाह, और अमरुद किनारे खड़ा हो कर रेस का आनन्द लेता है। एक अनार हो और तलबग़ार ज़्यादा तो खामख्वाह दौड़ना ज़रूरी भी हो जाता है और मजबूरी भी। इस प्रकार पण्डित राम नरेश ने अपनी माँ के गर्भ में प्रवेश किया। 

जब पण्डिताइन ने गुड न्यूज़ दी तो पहले से ही तीन बच्चों के पिता बन चुके पण्डित बाँके बिहारी सोच में डूब गये। यहाँ वो अपने आवा-गमन से मुक्ति के चक्कर में लगे पड़े हैं और बच्चे हैं कि एक के बाद एक लाइन लगाये खड़े हैं। लेकिन नियति के खेल में वो किसी प्रकार का व्यवधान भी नहीं डालना चाहते थे। आने वाले को भला कोई रोक पाया है। चलो एक बार फिर से डॉक्टर के चक्कर शुरू। पहले भी वो ये सब देख चुके थे। डॉक्टरनी ने कुछ झिड़कते हुये कहा - "फिर आ गये। आजकल ज़माना एक बच्चे पर पर शिफ्ट कर गया है और आप हैं कि रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। अपना नहीं तो अपनी पत्नी का ही ख्याल कर लीजिये। चार-चार बच्चों को सम्हालना कोई मज़ाक नहीं है। एनी वे मुबारक़ हो आप एक बार फिर बाप बनने वाले हैं।" पंडित जी भला क्या बोलते। गलती तो हो गयी। गर्भ में राम नरेश ये जान कर कुछ दुःख ज़रूर हुआ होगा कि उसे माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध  इस धरा पर अवतरित होना होगा। लेकिन मन को सान्त्वना देने के अलावा वो कर भी क्या सकता था। जो हुआ सो हुआ हुआ। 

पिछले चार-पाँच सालों में ये लेडी डॉक्टर पण्डित और पण्डिताइन के लिये फैमिली डॉक्टर जैसी बन चुकी थी। लेकिन डॉक्टर के लिये उसका पेशेन्ट मात्र एक पेशेन्ट ही होता है। चाहे वो उससे कितना ही प्यार से बात करे लेकिन उसके लिये पेशेन्ट एक सब्जेक्ट से अधिक नहीं होता। उसको अपनी श्रमसाध्य चिकित्सकीय ज्ञान को कहीं न कहीं तो उड़ेलना ही है।और सोने पर सुहागा ये कि इसके लिये सब्जेक्ट मोटी फ़ीस देने को तैयार बैठा है। दवाई कम्पनियाँ-पैथोलॉजी लैब्स-रेडिओलॉजी से मिलने वाला तगड़ा कमीशन इन डॉक्टरों को समाज सेवा करते रहने के लिये निरन्तर प्रेरित करता रहता है। डॉक्टरनी ने आनन -फानन में अपने पैड पर कुछ धारा प्रवाह लिखना शुरू कर दिया। लिखना समाप्त करते हुये कहा मैंने कुछ दवाइयाँ और टेस्ट लिख दिये हैं। राजेश्वरी को ये दवाइयाँ बराबर चलनी हैं। अगली बार आना तो अल्ट्रासाउंड और बाकि टेस्ट कराते लाना। अपने धीर-गंभीर चेहरे पर बिनाका स्माइल चेपते हुये बोली - "बाँके जी दिस इज़ माई बेबी। आपको राजेश्वरी का पूरा ख्याल रखना होगा। बाय राजेश्वरी विश यू ऑल थे बेस्ट, टेक केयर।" फ़ीस पहले ही रिसेप्शन पर जमा कराने के अपने लाभ हैं। एक तो अपनी बारी के इन्तज़ार में पेशेन्ट का सब्र जवाब नहीं देता और दिखाने के बाद उसका कीमती समय व्यर्थ नहीं होता। 

डॉक्टर के कम्पाउंड में स्थित दवाइयों का जब भरी-भरकम बिल मिला तो पण्डित जी को आभास हो गया कि ये बच्चा बाकि बच्चों से मँहगा पड़ने वाला है। पहली बार उन्हें लगा कि डॉक्टरों ने प्रजनन की एक समान्य प्रक्रिया, प्रेगनेंसी को भी बिमारी बना डाला है। कई तरह के इंजेक्शंस, मल्टीविटामिन कैप्सूलों के पत्ते और सिरप जब पण्डिताइन को मिले तो उन्हें कुछ ख़ुशी सी महसूस हुयी। चलो परमेश्वर के पापा कुछ महीने तो उसका ख्याल ठीक से रखेंगे। बच्चे इधर-उधर से आ-आ कर उन दवाइयों के चमकते फॉइल्स से खेलना चाह रहे थे। इसलिये दवाइयों को सुरक्षित रखना ज़्यादा ज़रूरी था। पति-पत्नी बिना नागा जाँच के डॉक्टरनी दीदी के यहाँ जाते रहे। पण्डित जी ने राजेश्वरी के रख-रखाव की पूरी जिम्मेदारी को सहजता से वहन कर लिया था। क्या घर क्या बाहर सब उन्ही ने सम्हाल लिया। बाहर तो कोई भी सम्हाल ले लेकिन तीन बच्चों और एक प्रेगनेंट पत्नी को सम्हालना कोई हंसी खेल तो था नहीं। लेकिन पण्डित जी इस कार्य का निर्वहन भी बखूबी करने लगे। डॉक्टरनी ने भी पूरा ठेका ले रखा था। कब अल्ट्रासाउंड होना है, कब दवाइयों और इंजेक्शन का डोज़ बढ़ाना है। दिन नज़दीक आते जा रहे थे और पण्डित जी की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। अन्तिम तीन महीनों में जब कम्प्लीट बेड रेस्ट बताया तो पण्डिताइन को खुद लगने लगा कि वो बीमार हो गयी हैं।

चाक़ू-कैंची की आवाज़ सुन कर राम नरेश का मन बाहर निकलने का नहीं हो रहा था जबकि वो इस घडी का महीनों से इंतज़ार कर रहा था। डॉक्टरनी ने पण्डित जी को बता दिया था कि पोथा-पत्रा बिचरवा लीजिये बच्चा तो सिज़ेरियन ही होगा इसलिये एकदम मुहूर्त के हिसाब से डिलीवरी करा देंगे। अमूमन इंसान के पास चॉइस सिर्फ़ हाँ और ना की ही होती है लेकिन डॉक्टर के सामने तो ना की गुंजाईश भी नहीं बचती। मुहूर्त के अनुसार तमाम अनिच्छा के बावज़ूद राम नरेश को बाहर आना पड़ा। आते ही पता चला बच्चा अंडरवेट है इसलिये इन्क्यूबेटर में रखना है थोड़ा बहुत पीलिया के लक्षण भी हैं इसलिये आर्टिफिशियल लाइट एक्सपोज़र भी दिया जायेगा। बच्चे को पता नहीं कौन-कौन से इंजेक्शन लगा दिए गये। राजेश्वरी जब राम नरेश को गोद में लेकर अस्पताल से बाहर निकलीं तब तक बांके बिहारी 15-20 हज़ार के लपेटे में आ चुके थे। टीकाकरण की एक पूरी फ़ेहरिश्त पकड़ा दी गयी थी जिसमें डिटेल था कि कब-कब कौन सा टीका कितनी बार उस छोटे से बच्चे को लगना है। और एक भी टीका छूटा तो ये देश और समाज के प्रति विश्वासघात से कम नहीं माना जायेगा। एक जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिये माँ-बाप का ज़िम्मेदार होना ज़रूरी है। ये बात अलग है कि माँ-बाप ज़िम्मेदार ही होते तो चौथे की नौबत ही क्यों आती। 

इस तरह राम नरेश का धरती पर पदार्पण तो हो गया। भगवान या अल्लाह या जीसस को ज़रूरत से ज़्यादा मानने वाले देश में हर किसी को ये भरम पालने का अधिकार है कि उनके अवतरण का कोई न कोई विशिष्ठ प्रयोजन पहले ही नियत कर रखा है। जिंदगी के पचास बसन्त गुजरने के बाद पण्डित राम नरेश को ये आभास हो चुका है कि और कोई सार्थक प्रयोजन प्रभु ने आपके लिए भले ही न सोच रखा हो लेकिन जाने-अनजाने आपके जीवन का एक उद्देश्य बन गया है - देश के डॉक्टरों की दुकान चलाना। ये डॉक्टर अंग्रेजी से लेकर देशी तक कुछ भी हो सकता है। फर्क बस इतना है कि यदि बीमारी का नाम अंग्रेजी में हो तो जेब कुछ ज़्यादा ढीली करनी पड़ सकती है, डॉक्टर के लिए भी और दवाई के लिए भी। वर्ना ऐसे डॉक्टरों की कमी भी नहीं है जिन्होंने किचन में रखे मसालों (जड़ी-बूटियों) से कैंसर तक का इलाज़ कर डाला है। अपने माता-पिता, श्रीमति राजेश्वरी और श्री बांके बिहारी, के इलाज़ के चक्कर में पण्डित राम नरेश का पूरे शहर के हर विधा में नामी-गिरामी (कुछ कम नामी-गिरामी भी) डॉक्टरों से सबाका पड़ चुका था। माता-पिता जी को विभाग की ओर से हर प्रकार के मेडिकल खर्च के रिम्बरस्मेंट सुविधा सुनिश्चित थी। इसलिये उन्होंने कभी सरदर्द के ठीक होने का इंतज़ार नहीं किया। जब भी दर्द उठा, सर उठाया और डॉक्टर के सामने खड़े हो गये। अब इतना हाइली क़्वालिफ़ाइड डॉक्टर इलाज न करे तो लानत है उसके एनाटॉमी-फिजिओलॉजी-मेडिसिन के ज्ञान पर। ये बात अलग है कि अक्सर दवाइयों के डोज़ को देख कर सरदर्द अपने आप भाग जाया करता था। डॉक्टर को भी ये भान था कि पैसा इनकी जेब में वापस आ जायेगा इसलिये उसने भी कभी फ़ीस लेने और दवाई लिखने में कोई कोताही नहीं की। 

इलाज़ कराते-कराते पंडित राम नरेश को भी ये ज्ञात हो गया था कि आज सर में दर्द होगा तो कल पेट में, फिर आँख में, फिर कान में, फिर दाँत में, फिर नाक में, फिर गले में, फिर हार्ट में। और फिर कुछ और ऐसे ही फिरों के बाद फिर सर में दर्द होना शुरू हो जायेगा। पूरा एक चक्र है जो छः महीने में पूरा हो जाता है। लेकिन सब डॉक्टरों के लिये ये नियमित ग्राहक थे। यदि छः महीनों में किसी के यहाँ न पहुंचो तो उनका चिन्तित हो जाना लाज़मी था। जैसे मोहल्ले में परचून की दूकान वाले को पूरा पता होता है कि पण्डित जी के यहाँ आटा पन्द्रह दिन चलता है। सोलहवां दिन आते न आते उसका इन्तज़ार शुरू हो जाता है। यदि गलती से आटा अट्ठारह दिन चल गया तो वो पूछ लेता है पंडित जी कहीं बाहर गए थे क्या? कहने का आशय सिर्फ इतना है कि डॉक्टरों के लिये ये फैमिली मेंबर की तरह हो गए थे। और तो और दवाई की दुकान वाला भी डिस्काउंट के साथ दवाई घर तक पहुँचा जाता। लेकिन पण्डित राम नरेश को सदैव ये संशय रहा कि इतने नामी-गिरामी डॉक्टर्स बीमारी का इलाज़ कर रहे हैं या बुढ़ापे का। बुजुर्गों के मेडिकल पैरामीटर्स वयस्कों से मैच करें ये शायद संभव कभी न हो। लेकिन मामला पेरेंट्स का था इसलिये वो कुछ कह भी न पाते। पेरेंट्स को उनके नालायक होने का जो संशय बचा था वो बना रहना ज़रूरी था।  

दिन ऐसे ही हंसी-ख़ुशी मज़े में कट रहे थे। जब पण्डित राम नरेश के मोहल्ले में एक साँड़ ने प्रवेश किया। चूँकि उनके मोहल्ले में अधिकांश लोगों ने घर क्या फुटपाथ तक के एक-एक इंच हिस्से को सीमेंट-कंक्रीट से कवर कर रखा था, इसलिये उस साँड़ को दिन में दरकार होती थी एक छाँव की। पण्डित जी ने घर के बाहर फुटपाथ पर कुछ पेड़ लगा रखे थे इसलिये वो साँड़ जब घूम-फिर के थक जाता तो उन स्थापित पेड़ों की छाया में बैठ जाता। निराश्रित गायों को कुछ लोग रोटी भले डाल देते हों लेकिन साँड़ को कभी किसी ने रोटी डालते न देखा था। साँड़ की चाल-ढाल बहुत ही गरिमामय थी। उसे किसी बात की जल्दी नहीं होती थी। उसे मालूम था कि पूरा दिन पड़ा है टहलने को। जल्दी या तेज़ चलने से कुछ नहीं होने वाला। समय अपने हिसाब से ही चलेगा। इसलिये जब मर्ज़ी होती चलने लगता और जब मर्ज़ी हो बैठ जाता। अक्सर वो इन्हीं के घर के सामने बैठता।  निर्विकार भाव, न सुक्खम न दुःक्खम, उसके चेहरे पर सदैव व्याप्त रहता। इसी लिये मानव जीवन में लोग भीषण से भीषण योग साधना करने को तत्पर रहते हैं। उसे देख कर ऐसा लगता मानो कोई तपस्वी निरन्तर अपनी साधना में लीन हो। पण्डित राम नरेश को साँड़  की ये निर्लिप्त पर्सनालिटी प्रेरणा देती।

पण्डित राम नरेश के ऑफिस में भी वार्षिक हेल्थ चेकअप कम्पलसरी कर दिया गया था। कम्पनी जब अपने अधिकारी पर प्रति माह इतने रुपये इन्वेस्ट कर रही है तो उनको भी तो ये मालूम होना चाहिए कि ये घोडा दाँव लगाने लायक बचा भी है या नहीं। देश-विदेश की ट्रेनिंग और सुविधाएं देने के बाद यदि बन्दा समय से पहले टाँय बोल गया तो सारा इन्वेस्टमेंट बेकार। बहरहाल टेस्ट के नाम से पण्डित जी के शरीर से इतना खून निकाल लिया गया कि पण्डित जी कुछ दिनों तक खुद को साइक्लॉजिकली कमज़ोर समझने को विवश हो गये। अल्ट्रासाउण्ड से उन-उन बीमारियों को चुन-चुन के खोजा गया जिनकी पण्डित जी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। जैसे मैकेनिक के पास जाइये तो वो नयी से नयी कार में भी डिफेक्ट निकालने का माद्दा रखता है। वैसे ही मेडिकल टेस्ट की कोई रिपोर्ट सही आ जायेगी इसकी गुंजाईश कम ही रहती है। क्या जवान क्या बूढ़े, कोई भी इम्प्लॉयी 'ए' ग्रेड में नहीं पास हो सका। जिन्हें 'बी' ग्रेड मिला था वो 'डी ' और 'ई'  ग्रेड वालों को ऐसे देख रहे थे जैसे उन्होंने इसके लिये कोई कॉम्पटीटिव एग्जाम दिया हो। 

कंसल्टेशन के दिन डॉक्टर के सामने जाने में पण्डित जी को उसी तरह घबराहट हो रही थी जैसी किसी एग्जाम के रिज़ल्ट के निकलते समय हुआ करती थी। रैगिंग के दौरान मुस्कान काटने की भी एक ट्रेनिंग हुआ करती थी। पण्डित जी को अब समझ आया कि ये ट्रेनिंग क्यों दी जाती थी। यदि आप मुस्कुरा कर कोई गंभीर बात बोलेंगे तो लोग उसे हल्के में लेंगे। केबिन के अन्दर डॉक्टर ने जब सीरियसली बोलना शुरू किया तो एक पल के लिये पण्डित जी को लगा कि ये वचन स्वयं यमराज जी के श्रीमुख से फूट रहे हैं। "देखिये राम नरेश जी आपके पिता जी को हाइपरटेंशन था, डायबिटीज़ थी इसलिये आपको भी ये सब होने की सम्भावनायें हैं। आपका ब्लडप्रेशर भी हायर साइड में है। इसलिये आपको अभी से प्रिकॉशन्स लेने पड़ेंगे। ब्लडप्रेशर की एक दवाई आपको लिखनी ही पड़ेगी।" पण्डित जी को मालूम था कि डॉक्टरों के चक्कर व्यर्थ नहीं जाते। वो इलाज़ ऐसे ही शुरू करेंगे। आज एक गोली फिर धीरे-धीरे पन्द्रह कैप्सूल। उन्होंने पेरेन्ट्स के इलाज़ का अच्छा-खासा तजुर्बा हो रखा था। जब डॉक्टर ने बताया कि उनकी रिपोर्ट 'बी' है, तो पण्डित जी के चेहरे पर एक मुस्कान सी तैर गयी। डॉक्टर बुरा मान गया। उसे लगा राम नरेश उसकी बात को संजीदगी से नहीं ले रहा है। "देखिये आप पचास के ऊपर हैं। थोड़ा हाइपरटेंसिव भी। उम्र के साथ नसें कमज़ोर हो जाती हैं। जैसे गार्डेन वाला रबर का पाइप स्टिफ हो जाता है वैसा ही धमनियों के साथ भी होता है। प्रेशर बढ़ गया तो कौन सी नस कहाँ से फटेगी पता भी नहीं चलेगा।" डॉक्टर ने कुछ दवाइयाँ लिख कर पर्चा पण्डित जी को थमा दिया। 

पण्डित जी बालकनी में बैठे थे जब उन्हें पेड़ के नीचे साँड़ के बैठे होने की आहट हुयी। उन्होंने सोचा इस साँड़ ने भी अपनी माँ के गर्भ तक पहुँचने के लिये तेज दौड़ लगायी होगी। इसका और इसकी माँ के इलाज़ के लिये पता नहीं कोई डॉक्टर था भी या नहीं। इसके भी कोई टीका लगा या नहीं। दिन भर चलते-चलते इसको भी दर्द होता होगा। न कोई बाम या न कोई एनासिन। किसी को तो इसकी भूख की चिन्ता भी नहीं। न कोई ठाँव न कोई ठौर। यहाँ डॉक्टर आदमी का इलाज़ कर-कर के परेशान हो रखे हैं। उन्हें ये भी पता नहीं कि बीमारी का इलाज़ कर रहे हैं या उम्र का। कोई ये नहीं कहता कि बाल जो झड़ गये हैं वो उम्र का तकाज़ा है, वो नया उगाने के नुस्ख़े बताने में व्यस्त हैं। पाइप स्टिफ भी होगा और फटेगा भी, लेकिन पाइप की उम्र के बाद। यहाँ इलाज़ कराने के लिये पैसा है, ख्याल करने के लिए परिवार में सदस्य हैं, तो डॉक्टर्स का प्रोफ़ेशन फल-फूल रहा है। इस साँड़ के न तो आगे कोई है न पीछे। न उसके पास पैसा है इलाज़ के लिये। यदि साँड़ को बोलने का सौभाग्य भगवान एकाएक दे दे तो यकीन मानिये उसका दर्द बयां करने को लिए शब्द कम पड़ जायें। 

पण्डित राम नरेश बालकनी से उठे और फ्रिज से ब्रेड का पूरा पैकेट लेकर नीचे उतर आये। शायद ये पहली बार होगा जब किसी ने किसी लावारिस साँड़ को रोटी डाली होगी। 

-वाणभट्ट 


रविवार, 21 अप्रैल 2019

बेचारा

जब से चारा चोरी का घोटाला सामने आया है यकीन मानिये दुनिया से यकीन उठ सा गया है। चारा चोर अब बेचारे से बने घूम रहे हैं। गोया घोटाले तो हर विभाग में वर्षों से होते रहे हैं और होते रहेंगे। इसके पहले तो किसी को सजा मिली नहीं। ये विपक्षी सरकार क्या बनी हमको टारगेट करके फँसा दिया गया। ये अन्याय  पराकाष्ठा है। अब तो तभी दोषमुक्ति मिलेगी जब कोई लंगड़ी-लूली सरकार सत्ता में आयेगी। प्रायश्चित करना तो अपनी फितरत में नहीं है। मुझे दण्डित करना है तो जाओ उन सबको पकड़ के लाओ जिन्होंने अब से पहले इस भ्रष्टाचार की परिपाटी को सिंचित और पोषित किया। यदि वो छुट्टे घूम रहे हैं या उहलोक गमन कर चुके हैं तो थोड़ा सब्र मेरे लिये भी रख सकते हैं। 

जब चारे का ज़िक्र हो ही गया है तो ये बताना भी ज़रूरी है कि पूरे देश कि अर्थव्यवस्था तो बेचारे लोगों पर ही टिकी है। सरकारों को टैक्स चाहिये ताकि बेचारों को रोटी-कपडा-मकान मिल सके। ये बात अलग है कि देश के अन्तिम बेचारे की फ़िक्र में सरकारी महकमों के लोग दिन-दूनी रात चौगुनी तेज़ी से फल भी रहे हैं और फूल भी। ये फूल फ्लावर वाला फूल नहीं है।  ये फूल वो फूल है जो बेल्ट के बाहर लटकते पेटों से झलकता है। कुछ लोग उसे तोंद कहने की गुस्ताख़ी भी कर देते हैं। दरअसल देश के बेचारों की सेवा में ये तन-मन से इस कदर लगे हुये हैं कि अपनी सुध-बुध ही नहीं रहती। धन तो बरसता ही रहता है। सेवा करोगे तो मेवा मिलेगा ये शाश्वत नियम है। जब देश सेवा का संकल्प ले लिया और उसके लिये एक ऑल इण्डिया इम्तहान पास कर कुर्सी पर कब्ज़ा कर लिया तो अब दस्तूर भी है उस पर बैठे रहने का। इस प्रॉसेस में अपने लिये समय कहाँ मिलता है वर्ना हम भी नब्बे साल के मिल्खा सिंह की तरह कुलाँचे मार रहे होते। इससे महान त्याग कोई हो सकता है भला। 

जरा सा गौर कीजिये तो साफ दिखायी देता है कि देश में हर कोई शिक्षा सिर्फ इसलिये पाना चाहता है ताकि वो देश और देशवासियों की सेवा कर सके। कामों की कमी तो कहीं नहीं है लेकिन हमें नौकरी करनी है। वो भी सरकारी तभी हम जन-जन की सेवा कर पायेंगे अन्यथा कोई अम्बानी-अडानी हमारी योग्यता का नाज़ायज़ लाभ उठा के अमीर बन जायेगा। अब जिन्हें देश की चिंता नहीं हो, जिन्हें पैसे की ज़्यादा भूख हो वो टाटा-बिरला के लिये काम करे, हम तो इतना रगड़-घिस के जो डिग्री लिये हैं वो पैसा कमाने के लिये थोड़ी न है। हमें सेवा का अवसर देना सरकार का कर्तव्य है और हमारा अधिकार। हमें सरकारी नौकरी मिले तभी हम अपने और देश के दरिद्दर दूर कर पायेंगे। यूंकि गौर करने वाली बात ये है कि जिन्हें दूसरों के दरिद्दर दूर करने हैं पहले वो अपने दरिद्दर दूर करने पर आमादा हैं। ये बात अलग है कि अपने दरिद्दर दूर करते-करते अपनी भावी सात पुश्तों की चिन्ता करना भी आवश्यक हो जाता है। अपने भाई-बन्धु का भला कर भी दिया तो वो इस जन्म उस एहसान को तो उतार नहीं सकते। तो फिर अपनी अगली पीढ़ी के बारे में कुछ करने में क्या बुराई है।

देश सेवा का ऐसा ज्वर हर दिशा में देखा जा सकता है। चाहे वो शिक्षा हो, अभियांत्रिकी हो, स्वास्थ्य हो, राजनीति हो या कृषि। चूँकि मै कृषि से जुड़ा हुआ हूँ तो मै देखता हूँ यहाँ समाज और देश सेवा की अपरिमित सम्भावनायें हैं। 60 प्रतिशत लोग मिल कर देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में मात्र 15 प्रतिशत का योगदान कर पाते हैं। देश में स्माल और मार्जिनल (लघु और सीमान्त) किसानों की संख्या लगभग 85% है जिनके हिस्से खेती योग्य भूमि का मात्र 45% भाग ही आता है। स्थिति और चिंताजनक हो जाती है जब पता चलता है कि 85% कृषक परिवार कृषि आय का मात्र 9% ही अर्जित कर पाते हैं जबकि बाकी 15% के हिस्से 91% आय आती है। ऐसे में देश के लघु और सीमान्त किसानों की चिंता करना सभी समाज और देश प्रेमियों का परम कर्तव्य बन जाता है। चूँकि यही वो लोग हैं जिनकी चिन्ता नेता चुनाव आते ही और अफसर चुनाव जाते ही करनी शुरू कर देते हैं। विश्व में भी बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय संस्थायें सिर्फ़ अफ्रीका और एशिया के लघु सीमान्त किसानों की समस्याओं का निदान और उनकी आय में वृद्धि के लिये वर्षों से कृतसंकल्प हैं। इस पुनीत कार्य में उन्होंने देश-दुनिया के कितने ही कोने-अतरों में न जाने कितने सेमीनार-सिम्पोजिया कर डाले। ये बात उन बेचारे कृषकों को शायद ही पता चल सके। बेचारा शब्द किसी को कह दो तो उसे खुद अपने ऊपर दीनता की फिलिंग आने लगती है। लेकिन हर वह शख़्श बेचारा है जिसके चारे की चिन्ता दूसरे करने लगें। बेचारा इसलिये भी कि उन्हें नहीं मालूम कि उनके उत्थान की ख्वाहिश लिये कितने लोग दिल-औ -जान से वर्षों से लगे हुये अपनी-अपनी रोटियाँ (टू बी मोर करेक्ट, पकवान) तोड़ रहे हैं। 

समस्या ये नहीं है कि लघु और सीमान्त किसानों की सेवा में समर्पित लोगों ने उनकी समस्याओं के समाधान हेतु प्रयासों में कोई कसर रख छोड़ी हो। समस्या ये है कि कोई पूरे परिदृश्य पर फोकस नहीं करता या करना चाहता। सब विषय वस्तु विशेषज्ञ (सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट) अपने-अपने हिसाब से समाधान खोजने और उसे प्रचारित करने में लगे हैं। सक्सेस स्टोरीज़ (सफलता गाथाओं) की बाढ़ आ रखी है। उसकी आड़ में हर कोई अपनी सफलता की गाथा लिख रहा है। कोई ऐसा काम जो पेपर या पेटेंट में परिवर्तित न हो वो आपके किसी काम का नहीं। दूसरों के उत्थान का बीड़ा उठाने वाले यदि अपना ही उत्थान न कर पाये तो जीवन व्यर्थ गया समझो। और सबसे बड़ी बात ये है कि यह बीमारी सार्वभौमिक  है। जो व्यक्ति या देश जितना अधिक संपन्न या विकसित है, उसे दुनिया के साधनविहीन और विपन्न लोगों की उतनी ही अधिक चिंता है। कोई उन सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट्स को बताये कि दस लाख को सौ लाख बनाना आसान है लेकिन दस रुपये को सौ रुपया बनाना नामुमकिन। एक या दो हेक्टेयर से कम खेत से अनाज उगा कर के चार लोगों का परिवार वैसे ही पल सकता है जैसे पल रहा है। एक तरफ तो बीज-खाद-कीटनाशक आदि कंपनियों ने किसान को उपभोक्ता बना के रख छोड़ा है तो दूसरी तरफ़ किसान प्रसंस्करण कंपनियों के लिये सस्ते उत्पाद का माध्यम बन गया है। ग़ौर करने वाली बात ये है कि सभी का फायदा किसान के किसान बने रहने में निहित है। यदि किसान वाकई सम्पन्न हो गये तो इन सबके मुनाफ़े का क्या होगा। इसलिये किसान का किसान बने रहना ज़रूरी है और उनकी चिन्ता का स्वांग भी उतना ही ज़रूरी है

आजकल एक नया ट्रेन्ड प्रचलन में है समस्या को हाइलाइट करो और पैसा पाओ। बहुत सी देसी और अन्तर्देशी संस्थायें हैं जो समस्या के समाधान पर पूँजी लगाने के लिये उद्धत हैं। समस्या जितनी व्यापक होगी उतना बड़ा नेटवर्क और उतना ही बड़ा निवेश। समाधान तो वहीं से निकलेगा जहाँ से समस्या। अब तक सारा फोकस उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने पर ही लगा हुआ था। लेकिन ये समझने में बहुत देर लग गयी कि उत्पादन दुगना कर दिया तो मुनाफ़ा आधा। पूंजीवादी व्यवस्था कमज़ोर के लिये नहीं होती। यदि किसान सिर्फ़ भण्डारण की क्षमता विकसित कर ले तो बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ उनके इशारे पर नाचती नज़र आयें। लेकिन लघु और सीमांत किसान के पास न तो इतना उत्पादन है न ही इतनी क्षमता। एक तरीक़ा ये भी है की कृषि कार्य में उतने ही लोग लगें जितना उनका सकल घरेलू उत्पाद में योगदान है। इस हिसाब से यदि सिर्फ 15% जनसँख्या यदि खेती करें तो खेती भी उद्योग बन सकता है। आज बीज से लेकर मशीन तक तकनीकों की कोई कमी नहीं है लेकिन किसानों के हित में सफलता गाथा लिखने के लिये छोटी-छोई सफलताओं को विस्तार देने की आवश्यकता है, जो शायद व्यावहारिक शोध और अभियांत्रिकी के सहयोग के बिना संभव नहीं है। लेकिन हमारी शोध की दिशा और उनकी फ़ंडिंग मौलिक शोध तक सीमित हो कर रह गयी है। इसरो की सतत सफलता ये दर्शाती है कि दुनिया लैब के बाहर है जो आप का इन्तज़ार कर रही है। जिसका लाभ समस्त देश और दुनिया को होना चाहिये।  

देर से ही सही वैल्यू चेन की बात शुरू होना एक खुशखबरी से कम नहीं है। ग्रीन रिवोल्यूशन (हरित क्रांति) में उन्नत बीज की उपलब्धता के अलावा अनेक कारकों जैसे सिंचाई की सुविधा, खाद-कीटनाशक का प्रयोग, संपन्न किसान, सरकार द्वारा क्रय,भण्डारण और सार्वजानिक वितरण प्रणाली का भी अमूल्य योगदान था। जब उत्पादन थाली तक पहुँचा तब हरित क्रांति कम्प्लीट हुयी। लेकिन हम बीज पकड़ कर बैठ गये। दुग्ध क्रांति में भी पूरी वैल्यू चेन विकसित की गयी। कोई भैंस विकसित करने लग जाता तो शायद दुग्ध उत्पादन तो बढ़ जाता लेकिन क्रांति न हो पाती। शहर के हर गली-कोने पर अण्डों के ठेले एक अघोषित क्रांति की ओर इशारा कर रहे हैं। वैल्यू चेन एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोशिश होती है कि उत्पादक से उपभोक्ता तक की सभी कड़ियों के लिये विन-विन स्थिति हो। पूरी वैल्यू चेन में सबसे मजबूत कड़ी सबसे कमज़ोर कड़ी ही होती है। फ़ूड वैल्यू चेन में किसान ही सबसे कमज़ोर कड़ी बनता है। जबकि सारी चेन किसान के उत्पादन के बलबूते फलती-फूलती है। चेन की अन्य कड़ियों की ये नैतिक और आर्थिक मज़बूरी होनी चाहिये कि सबसे कमज़ोर कड़ी को मज़बूत करें। सब अपने-अपने चारे यानि मुनाफ़े का कुछ हिस्सा कमज़ोर कड़ी को मज़बूत करने में लगायें ताकि कोई भी किसान बेचारा न रह जाये। और उसका मूल्य बस एक वोट भर बन के न रह जाये। 

- वाणभट्ट 


रविवार, 10 मार्च 2019

सी थ्रू

कुछ दिन पहले एक मित्र ने आग्रह किया - "आजकल हर तरफ़ मीटू-मीटू चल रहा है। आप को आइडिया दे रहा हूँ, मौका है कुछ लिख मारो।" उसे क्या मालूम कि वाणभट्ट दुनिया के साथ चल रहा होता तो नोबल नहीं तो बुकर नहीं तो साहित्य अकादमी नहीं तो कम से कम मोहल्ला पत्रिका के अवार्ड का जुगाड़ तो कर ही लेता। लेकिन जब दुनिया खेत की बात करेगी तो वो खलिहान बघारेगा। लेकिन राय तो राय है उसकी क़द्र करना भी लेखक का कर्तव्य बन जाता है। ये सुधी पाठक ही हैं जो लेखनी को जागृत किये रहते हैं। वर्ना अब शेक्शपीयर का ज़माना तो है नहीं जो लोग टाइम पास करने के चक्कर में किताबें पढ़ जायें। यहाँ तो घेर-घेर के पढ़ाना पड़ता है। दूसरों के ब्लॉग पर यदि आपने वाह -वाह नहीं किया तो आपके कितने भी उत्कट विचार हों कोई मर्सिया पढ़ने भी नहीं आयेगा। यूँ तो वाणभट्ट को इनसे कोई फ़र्क तो पड़ता नहीं लेकिन इस युग में टीआरपी भी कोई चीज़ है। और वैसे भी लेखक के लिये पाठकः देवो भवः। इसलिये निर्णय किया कि मात्रायें वही रखी जायेंगी।      

अंधियारे से कॉरिडोर के जब एक छोर पर मैंने कदम रखा तभी दूसरी तरफ से उसका भी प्रवेश हुआ। बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में पता नहीं इतने छोटे छोटे कॉरिडोर क्यूँ होते हैं। कम से कम फोर लेन तो होने ही चाहिये ताकि कोई चाहे तो बिना टकराये निकल जाये। लेकिन संकरे कॉरिडोर में इस बात की गुंजाईश कम थी। सधे क़दमों से हम एक दूसरे की ओर बढ़ रहे थे। अब बात बस इतनी थी कि पहल कौन करेगा देखने की, मुस्कुराने की, फिर हेलो कहने की। इससे ज़्यादा की न तो उम्मीद थी न ही गुंजाईश।    

क्लास की पिछली सीटों पर जीनियस ही काबिज़ होते हैं। अगली सीट वाले सिर्फ़ दो दुनी चार करना और रट्टा मार कर नम्बर लाना ही जानते हैं। ये बात थ्री इडियट्स आने से पहले किसी ने कही होती तो उसे निश्चय ही इडियट घोषित कर दिया गया होता। कभी आपने गौर किया कि फिल्मों को हिट करने का सीधा फार्मूला है, मास को फिल्म के साथ जोड़ो। वर्ना श्याम बेनेगल पूरी ज़िन्दगी में एक भी हिट फिल्म नहीं दे पाये क्योंकि वो क्लास को टारगेट करते थे। प्रमुख इंजीनियरिंग और डॉक्टरी संस्थानों में प्रवेश की इतनी मारा-मारी है कि बहुत से खट्टे अंगूर वाले बताते घूमते फिर रहे हैं कि इंजीनियरिंग-डॉक्टरी में कुछ नहीं रखा है। सरकारी नौकरी में तबला बजाने वाला भी उतनी ही तनख्वाह उठा रहा है जितनी इंजीनियर या डॉक्टर। शौक़ का शौक़ और रोजगार का रोजगार। कुछ लोग हर्डल रेस को ऊपर से पार करते हैं, कुछ नीचे से ही फर्राटा मारते टारगेट तक पहुँच जाते हैं। पढ़-लिख के भला कोई क्या घुइंयाँ छील लेगा। एक से एक सफल लोग तो स्कूल के ड्रॉपआउट्स हुआ करते हैं। तारे ज़मीन पर और थ्री इडियट्स सरीखी फिल्म बनाने वाले महान कलाकार ने ख़ुद बारहवीं से ऊपर पढाई को उचित नहीं समझा। तो उसे क्या पता कि कुछ लोगों का मन पढ़ने-लिखने में भी लगता है। ऐसे लोग कम ही होते हैं। एक क्लास में दो-चार। लेकिन यदि आप पैसा कमाने में सफल हो गये तो कौन आपकी आठवीँ की मार्क्सशीट देखता है। फिर बड़े-बड़े ज्ञानी आपके सामने पानी भरें और आप अज्ञान में उनकी खिल्ली उड़ायें। फिल्म के हिट होने में भी उन्हीं लोगों का योगदान अधिक हुआ करता है जो चाह कर भी पढ़ने में मन नहीं लगा पाये। अब आमिर भाई को कौन समझाये कि आज जिस टेक्नॉलोजी की सहायता से वो अपनी भावनायें इतनी बारीकी से व्यक्त कर पा रहे हैं। वो नैसर्गिक रूप से घुम्मकड़ या कवि  या लेखक या खेल कूद से नवाब बनने वाले लोगों के बस की बात नहीं थी। कुछ लोगों का आईआईटी और एम्स में जाना भी  ज़रूरी है ताकि यान अंतरिक्ष में जा सके और नीम-हक़ीम  से बच कर इस धरा दीर्घायु जीवन जिया जा सके। चूँकि पैसा बोलता है इसलिये पढ़े-लिखे ज्ञानवान लोगों का फुद्दू खींचा जा सकता है। क्रिएटिव जीनियस तो कोई भी हो सकता है। उसके लिये पढ़ायी - लिखायी की आवश्यकता नहीं। ये ईश्वर प्रदत्त गुण है इस पर इंसान को किंचित मात्र गुरुर करना शोभा नहीं देता। लेकिन फिर उसका इंसान होना डाउट में पड़ जायेगा।     

चौथी क्लास का पहला पीरियड चल रहा था। मैथ्स की टीचर अपने द्वारा दी गयी समस्या (प्रॉब्लम) को ब्लैकबोर्ड पर हल करने के प्रयास में उलझी हुयी थीं। बीच-बीच में पीछे मुड़ के पूछ लेतीं - "समझे कि नहीं समझे"। विजयवा पूरे उत्साह से कहता - "यस मैम।" मैम कहतीं - "यू  बदमाश, अभी देखती हूँ"। उन्हें ये पूर्ण विश्वास था कि विजयवा ज़रूर किसी खुराफ़ात में लगा है। लेकिन एक बच्चे के चक्कर में पूरी क्लास का नुक्सान तो नहीं कर सकते। वो तो सुधरने से रहा। क्लास की पिछली बेंच पर विजई ने खुसुर-पुसुर करके अपनी ही क्लास लगा रखी थी। नाम तो विजय था लेकिन नाम का अन्त उसने वाई की जगह आई से किया था, इसलिये उसके यार-दोस्त उसे विजई बुलाते थे। प्रेम से विजयवा।अमिताभ का डाई हार्ड फैन। हाव-भाव से भी वो था पूरा विजयी। उसके अगल-बगल के बच्चे मेज़ के नीचे हो रही किसी गतिविधि को कौतूहल से देख रहे थे। बीच के मीडियोकर बच्चों में खलबली सी होने लगी थी। आज ज़रूर विजई के दुबई वाले मामा ने कोई ख़ास गिफ़्ट लाये होंगे। लंच तक जिनमें उत्सुकता को दबाने की ताक़त थी, वो मैथ्स में लग गये। अशोक से नहीं रहा गया। टीचर जैसे ही मुड़ीं वो पीछे वाली बेंच तक पहुँच गया। और नीचे झुक के बैठ गया। पूछा "आज क्या लाये हो विजई"। "इस बार मामा जी ने एक्स-रे-स्पेक्स दिया है। जानते हो इसको लगाते ही सब कुछ आर-पार दिखने लगता है।" को-एड में पढ़ने का और कोई लाभ हो या न हो लेकिन सब कुछ जानने की उत्सुकता जल्दी विकसित हो जाती है। अशोक ने हर्षातिरेक में दोहरा दिया - "सब कुछ"। लेकिन अपनी आवाज़ पर संयम न रख सका। इस बार मैडम मुड़ने के बजाय पलट कर खड़ी हो गयीं।

अशोक जहाँ था, वहीं छिपकर बैठ गया। "यू बैकबेंचर विजय व्हाट इस गोइंग ऑन।" "मैम ये देखिये अशोक यहाँ छिप कर बैठा है और मुझे डिस्टर्ब कर रहा है।" अशोक को उठना पड़ा। "मैम वो शार्पनर गिर गया था।" "यू रास्कल्स। मेरी क्लास में बैठना है तो शान्ति से बैठो वर्ना बाहर निकलो।" इतने अच्छे प्रपोज़ल को सुन कर विजय ने धीरे से कहा "यहाँ रुकना कौन चाहता है।" जिसे सिर्फ पीछे वाले बच्चे सुन पाये और खिलखिला दिये। मैडम का पारा सातवाँ आसमान छूने लगा। "गेट आउट फ्रॉम माई क्लास, यू  बोथ।" अशोक थोड़ा संकोच कर रहा था कि विजई ने दायीं आँख दबा दी। अन्धा क्या माँगे दो आँखें। क्लास में ब्लैकबोर्ड था और बाहर दुनिया। ये मैम थोड़ी ठीक थीं, जो क्लास से बाहर कर सोचती थीं, सजा दे दी। कुछ टीचर्स तो क्लास के अंदर ही ठीक करने लग जाती थीं। दोनों प्रत्यक्ष रूप से दुःख दिखाते हुये, ख़ुशी-ख़ुशी क्लास के बाहर आ गये। मामा जी का दिया चश्मा विजय के हाथ में था।              

चश्मे में काले रंग का शीशा लगा हुआ था। स्कूल में चश्मुक बच्चों को तो चश्मा अलाउड था लेकिन किसी प्रकार का सन ग्लास लेकर शायद ही कोई बच्चा स्कूल आता हो। अशोक, विजई की बहादुरी से अभिभूत था। 'गुरु ज़रा चश्मा लगाने को तो दो। कसम से आजतक काला चश्मा नहीं लगाया है।" पहले विजई ने चश्मा लगाया और बहुत ही शान से चारों ओर निहारने लग गया। "यार क्या दिख रहा है" अशोक ने पूछा। "अबे जब कोई सामने होगा तो दिखेगा। अभी तो बस पेंड़ -पौधे दिख रहे हैं। सामने लगा घंटा भी दिख रहा है। बड़ा अच्छा लग रहा है। बस थोड़ा काला-काला दिख रहा है।" अशोक का सब्र जवाब दे रहा था। उसन विजय से लगभग चश्मा खींच कर अपनी आँखों पर लगा लिया। तभी जोर से तड़ाक की आवाज़ आयी। चश्मा धराशायी हो चुका था और उसके दोनों ग्लास टूट कर चकनाचूर हो चुके थे। सामने राव मैम खड़ी थीं। ये राव मैम कब कहाँ से आ गयीं अशोक को कुछ दिखायी नहीं दिया। बाद में विजय ने समझाया कि मामा ने बताया था कि चश्मा आर-पार देखता था इसलिये राव मैम दिखायी ही नहीं दीं। और ऐसा चश्मा भला किस काम का, अच्छा हुआ टूट गया।       

हमारे बीच अब बस दस कदम की दूरी थी। हम दोनों का ध्यान अपने -अपने कूटस्थ पर केंद्रित था। पहले  आप,  पहले आप के चक्कर में किसके हाथों में पहले शिरक़त होगी यही दोनों तय करने में लगे थे। कौन पहले मुस्कुरायेगा, कौन पहले हेलो बोलेगा। दस कदम यानि तीन सेकेण्ड इसी रफ़्तार से कोहली को बॉल स्ट्राइक करनी होती है अन्यथा बॉल अपने रस्ते और बैट अपने। शरीर तो उनके लिये है जिन्हें आत्मा का भान न हो। इस देश में आदमी इंसान भले न बन पाये इतना आध्यात्मिक तो हो ही जाता है कि जब चाहे शरीर बन जाये जब चाहे आत्मा। चूँकि निकट भविष्य में हमें एक-दूसरे से कोई काम पड़ने की उम्मीद कम थी इसलिए हम दोनों ने आत्मा मोड में रहना प्रेफर किया। इस प्रकार दो आत्माओं ने एक-दूसरे में प्रवेश करते हुये एक दूसरे को क्रॉस किया। नैनं छिदन्ति शस्त्राणि - आत्मा का कोई क्या बिगाड़ लेगा। मुझे लगा विजय का एक्स-रे-स्पेक्स भी ऐसे ही काम करता होगा। यदि किसी को न देखना हो तो चश्मा लगा लो। और देखना हो तो हटा लो। सी-थ्रू मोड में हमारे शरीर अदृश्य थे। ये बात अलग है कि हम दोनों फेसबुक के बहुत ही घनिष्ट मित्र, या फेसबुक की भाषा में कहें तो फ्रेंड हैं। इतने फ्रेंडली हैं कि दिन में तीन बार लाइक्स का आदान-प्रदान होता है और बर्थडे और एनिवर्सरी विश करना तो भूलते ही नहीं। थैंक्स फेसबुक, कम से कम यहाँ आत्मायें जीवित तो रहती हैं। 

- वाणभट्ट 


रविवार, 4 नवंबर 2018

और जेब कट गयी 

ये त्यौहार भी खूब आते हैं। और जब आते हैं तो अपने साथ लाते हैं नई-नई रंगत। जिसका साल भर इन्तज़ार करने का अपना मज़ा है। लेकिन इसका बुख़ार दिल-ओ-दिमाग़ पर इस क़दर हावी हो जाता है कि जो लोग कल तक मँहगाई का मर्सिया पढ़ते नहीं थक रहे थे, वो पूरे शहर की पार्किंग और सडकों को चोक किये घूम रहे हैं। धनतेरस बाद अख़बार की हेड लाइन कोई आज भी बता सकता है। कानपुर ने धनतेरस के दिन स्वर्ण आभूषण खरीद का नया कीर्तिमान बनाया। करोड़ों रुपये जुए-पटाखों में फूँक कर, परीवा के दिन से फिर साल भर के लिये राग-दरिद्दर शुरू हो जायेगा। 

जब से साल भर नये कपड़े खरीदे जाने लगे, तब से त्योहारों पर खरीददारी बस एक शगुन सा बन गया है। त्यौहार है तो उल्लास दिखना चाहिये। लेकिन अब दिखने से ज़्यादा दिखाने का चलन है। इसलिये त्यौहार दिखाने की प्रवृत्ति में हुयी बढ़ोत्तरी दिन-दूनी रात-चौगुनी प्रगति कर रही है। लोग तो बहाने खोज रहे हैं। होली एक ऐसा त्यौहार है जो अमीर-गरीब के फासले को कम कर देता है। अमीर विदेशी लेगा तो गरीब देसी। और लेने के बाद क्या राजा क्या रंक। पूरा साम्यवाद। इसलिये दीपावली को लक्ष्मी जी को सुपुर्द कर दिया गया है। अब जो चूके तो दिखाने का मौका साल भर बाद मिलेगा। कौन दिवाली रोज़-रोज़ आती है। अब जेब कटे तो कटे। 

परिवार से विमर्श किया गया कि जब साल के तीन सौ पैंसठ दिन नवधनाढ्य लोग अपनी इम्पोर्टेड गाड़ियों से सडकों को जाम किये रहते हैं, (आप इसे लेखक का काम्प्लेक्स भी मान सकते हैं।), तो धनतेरस के शुभ अवसर पर और बुरा हाल हो सकता है। त्यौहार पर, जनसँख्या विस्फोट के कारण यदि एक चौथाई प्राणी भी घर से निकल आये, तो जाम की स्थिति तो बन ही जायेगी। हाँ, जाम की स्थिति में ये बड़ी-बड़ी गाड़ी वाले लोग हॉर्न और डिपर ऐसे मारते हैं जैसे टीलीली...ली करके चिढ़ा रहे हों। शहर में हाई बीम पर चलने और बेवज़ह हौंक करने वालों का तो चालान होना चाहिये। लेकिन भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकारें ऐसा कोई कदम उठाना नहीं चाहतीं, जिससे सरकारी नुमाइंदों को भ्रष्टाचार करने का और मौका मिले। घर वालों से मशविरा किया तो समझ आया कि समझदारी इसी में है कि मंडे को धनतेरस की शॉपिंग शनिवार को ही निपटा दी जाये। संडे साफ़-सफ़ाई और बिजली की झालर लगाने को मिल जायेगा। शादी के पच्चीस साल होते-होते पति वैसे भी ट्रांसपोर्टर (फिल्म वाला ) बन कर ही रह गया है।

इसमें किसी को शक़ नहीं होना चाहिये कि इस देश में समझदारों की कभी कोई कमी नहीं रही है। यदि बेवकूफ होते तो दो दिन में देश आज़ाद हो गया होता। तीस करोड़ हिन्दुस्तानियों के आगे एक-दो लाख फ़िरंगी दो दिन न टिकते। लेकिन यहाँ तो विपक्षी टीम को पदा-पदा के थकाने में मज़ा आता है। इसलिये मैच को जितना स्पोर्टिंग स्पिरिट से हम लेते हैं, दुनिया के और देश ले ही नहीं सकते। जीतने से ज़्यादा हम खेलने के लिये खेलते हैं। अगर मैच ख़त्म हो गया तो टाइम काटने की दिक्कत होगी। इसीलिये क्रिकेट के सारे फॉर्मैट हमने जिला के रखे हैं। टी-टवेंटी के ज़माने में यदि समय है तो टेस्ट मैच का भी आनन्द उठाइये। ससुर अंग्रेजवन को इतना झेलाया भाई, कि ख़ुद ही बाय-बाय कह कर भाग गये। 

स्मार्ट सिटी बनाने का काम भी इसीलिये नहीं हो पा रहा है। या तो लोग स्मार्ट होंगे या सिटी। स्मार्ट लोग खलनायक अजित की मोना डार्लिंग की तरह हुआ करते हैं। अपने फ़ायदे के लिये नियम-क़ानून को ताक पर रखने वाले। और स्मार्ट सिटी के लिये आवश्यक हैं नियम-क़ानून का पालन करने वाले लोग। अब ऐसे में विपक्ष सरकार की नियत पर शक़ करें तो शक़ होना लाज़मी है कि कुछ तो गड़बड़ है...दया। ये सीआईडी वालों ने इतना पका रखा है कि कहीं गड़बड़ हो, दया की याद तो आनी ही है। 

इतनी रामायण का आशय ये सिर्फ इतना समझाने के लिये था कि सिर्फ़ हम ही समझदार नहीं हैं। पूरा का पूरा कानपुर ही स्मार्ट है। सड़क पर जाम की शुरुआत देख कर अपनी छोटी सी तथाकथित गाड़ी को थोड़े लम्बे रूट की ओर मोड़ दिया। लेकिन चाहे पतंगा कितना बड़ा-बड़ा चक्कर काट ले गति तो शम्मा के पास जाने से ही मिलेगी। आउटर रूट से होते हुये जब लगा कि गंतव्य पास आ गया है तो भीतर की ओर घुसना आरम्भ कर दिया। जल्द समझ आ गया कि मैच लम्बा होने वाला है। 

हिन्दुस्तान में निकम्मे से निकम्मे आदमी के लिये बीवियाँ भड़ास निकालने का सबसे उचित और सुरक्षित माध्यम हैं। कहीं और भड़ास निकलने की गुंजाईश ही नहीं है। बॉस है कि बस बोलता रहता है और सबऑर्डिनेट है कि सुनता ही नहीं। यारी-दोस्ती तो देखने-दिखाने के चक्कर में खत्म हो गयी। अकेले हम-अकेले तुम में ग़नीमत ये रही कि हम में पति-पत्नी और कुछ दूर तक बच्चे रह गये। यदि दोनों में से एक भी कम सहिष्णु रहा तो, भगवान दूसरे के फटे में टांग न अड़वाये, लालू के सुपुत्तर वाला हाल होता। "लिस्ट बना के दे देती तो मै स्कूटर से सब सामान ले आता। अब जाम में फँसवा दिया। झेलो"। 

पत्नियों के सिक्स्थ सेन्स की दाद देनी चाहिये ये अच्छी तरह से जानती हैं कि कब, कहाँ और कैसे बदला लेना है। जानतीं हैं कि जाम में फँसे ड्राइवर को उकसाना ठीक नहीं। कार पर एक खरोंच और बढ़ जायेगी। मौका आया है तो बिन माँगी सलाह भी देता चलूँ। जीएसटी और नोटबंदी के बाद से किसी व्यापारी से भी बहस न करें। वो कैश माँगे तो कैश दें। वो रसीद देने से मना करे तो मान जायें। उन्हें जूते के बदले समोसा बेचने की सलाह तो कतई न दें। उन्हें पता होता कि बिना टैक्स के समोसे में कितना मुनाफ़ा है तो यक़ीन मानिये सारे उद्योगपति आज पकौड़ा तल रहे होते।         

कुर्सी पर बैठने के लिये लड़के ने अपनी स्किन टाइट जींस से खींच-खाँच के, आड़े-तिरछे हो कर, साढ़े सात इंच का 'किसका बजा' वाला मोबाइल निकाल के मेज़ पर रख दिया। बेफ़िक्री से इधर-उधर देख के मेरे पास आया और बड़ी बेअदबी से कहा "अंकल ज़रा पेन देना"। सब्र की भी हद होती है। "ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई बैंक आये और पेन न लाये। इतना बड़ा मोबाईल ला सकते हो और पेन के लिये जगह नहीं है। बैंक आ रहे हो और पेन माँग रहे हो"। कुछ सुबह से कोई मिला नहीं था और कुछ अपने बच्चे के भी दोनों कान खुले रहने के कारण दूसरों को समझाने में आवाज़ ऊँची हो जाती है। अब लड़के अपने संस्कार और अपनी तमीज़ का परिचय दिया। "सॉरी अंकल अगली बार ले कर आऊँगा"। बच्चे ने सॉरी कह कर मेरे प्रवचन पिलाने के इरादे पर पानी फेर दिया। मैंने ग़ौर किया उसकी टी-शर्ट्स में जेब नहीं थी। बच्चे तो बच्चे हैं क्या अपने क्या पराये। मै मुस्कराया क्योंकि मेरा बेटा भी इसी दौर का है। दरअसल आजकल पता नहीं कौन सा ट्रेंड चल गया है कम्पनियों ने टी-शर्ट्स में जेब लगाना बंद कर दिया है। मेरी चिन्ता बस यही रहती है कि पेन और मोबाईल आख़िर कहाँ रखें। इस वज़ह से मै नयी टी-शर्ट्स नहीं ले पा रहा हूँ। 

महिलाओं की वेशभूषा में यही कमी खटकती है। साड़ी हो या सलवार-सूट, जेब नहीं होती। इसीलिये पैसा और मोबाइल रखने के लिये उन्हें पर्स या बैग के रूप में अतिरिक्त एक्सेसरी ढ़ोनी पड़ती है। चाहे-अनचाहे ये उनके फ़ैशन या ड्रेसिंग सेन्स का हिस्सा बन चुका है। और शायद इसीलिये अपनी ख्वाइशों की ज़िन्दगी जीने को बेताब मोटरसाइकिल सवार उचक्कों के लिये वो सॉफ्ट टारगेट बन जातीं हैं। बैग में कुछ नहीं तो मोबाइल और पैसा तो मिलेगा। गहने तो बस अब लॉकर की ही शोभा बढ़ा रहे हैं। शायद इसीलिये नयी लड़कियों में जींस का प्रचलन बढ़ा है। आदमी का दिमाग भी क्या चीज़ हैं कहीं भी, कुछ भी सोच सकता है। बाहर लगे जाम और चिल्ल-पों का मेरे मस्तिष्क में उठ रहे विचारों से कोई सरोकार नहीं था।

सरकते-सरकते एकाएक मेरी निगाह बायीं तरफ़ बने एक मॉल पर पड़ी। टारगेट गंतव्य तक जाने की बात सोच कर मेरे त्यौहार का जोश कम हो चला था। मैंने गाड़ी घुमा दी। मेरी तरह फँसे समझदार लोगों ने भी यही किया होगा। ऐसा ठसाठस भरी पार्किंग देख कर प्रतीत हो रहा था। दैवयोग से मेरी छोटी सी कार के लिये पार्किंग के दिल में जगह निकल आयी। ऐज़ अ ड्राइवर, मुझे ऐसी ख़ुशी मिली जिसने शॉपिंग के बाद मुझे लौटते समय जाम की चिन्ता से मुक्त कर दिया।  

पहले बच्चे पिता जी से आग्रह किया करते थे अलां चाहिये या फ़लां। पिता जी त्यौहार का हवाला देते, होली में नहीं तो दिवाली में ज़रूर दिला देंगे। भला हो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की राष्ट्रिय गरीबी का, कि बच्चों की इच्छायें माता-पिता बिन माँगे ही पूरी कर देते हैं। सिर्फ़ हम दो- हमारे दो तक सीमित जीवन व्यवस्था ने समाज और परिवार के दूसरे सदस्यों के प्रति हमें अपनी ज़िम्मेदारियों से असंवेदनशील कर दिया है। 

बहुत दिनों बाद हम सबने दिवाली पर ट्रेडिशनल परिधान पहनने का निश्चय किया था। माँ-बेटी ने सलवार सूट लिया तो बाप-बेटे ने कुर्ता-पायजामा। भीड़ और भीड़ के कारण मची हबड़-तबड़ में, दीपावली की शॉपिंग निपटाई गयी। ट्रायल की गुंजाइश नहीं थी। चीन से हमें कुछ और सीखने को मिला हो या न मिला हो लेकिन एक बात तो है कि हमने प्यार-मोहब्बत को भी चाइना का माल बना दिया है। चले तो चाँद तक नहीं तो शाम तक। एक ज़माना था जब पिता जी दो साल बड़े भाई साहब को बाटा का लोहा-लाट स्कूल शू दो नंबर बड़ा खरीदते थे। दो साल भाई पहनते फिर मेरा नम्बर आ जाता। एक नॉर्थस्टार जूते से पूरे चार साल का बी.टेक. कर डाला, जूते का बाल भी बाँका न हुआ। वो तो नौकरी के चक्कर में दिल्ली में चटक गया नहीं तो घर के म्यूज़ियम में पड़ा होता। रंग और डिज़ाइन देख कर सब कपड़े खरीद कर, जाम में फँसते-फँसाते किसी तरह घर में दाखिल हो गये। 

मै टीवी के सामने नि:स्पृह भाव से चॅनेल्स बदलने में जुट गया। अन्दर ट्रायल शुरू हो चुका था। थोड़ी देर में बेटे ने पूछा "पापा कैसा लग रहा है, कुर्ता"। अपने बच्चे किसे अच्छे नहीं लगते। वो भी नये-नए कुर्ते में। "वेरी नाइस बेटा। लुकिंग ग्रेट"। अब तो अपना स्टैण्डर्ड भी फेसबुक टाइप के कमेंट्स देने का ही रह गया है। उसने मुस्कुराते हुये बताया "पापा इसमें जेब नहीं है"। "और मेरे  वाले में"। "नहीं, उसमें भी नहीं है"। जाम के ख़ौफ़ से लौटाने-बदलने का साहस नहीं बच रहा था। दुकान में लिखा एक स्लोगन मुझे टीलीली... ली कर के चिढ़ा रहा था "फ़ैशन के दौर में गारंटी की अपेक्षा न करें"। चीन से हमने यही तो सीखा है। 

दीपावली सर पर है। लक्ष्मी के आगमन के लिये घर की सफ़ाई भी ज़रूरी है। शॉपिंग में अपना सन्डे खराब नहीं करना चाहता। त्यौहार हैं तो जेब तो कटनी ही है। ऐसे नहीं तो वैसे। 

- वाणभट्ट  

पुनश्च : यह ब्लॉग एक सत्य घटना पर आधारित है। पात्र काल्पनिक हो सकते हैं। इसका जीवित लोगों से लेना-देना है। मरों की परवाह आज के युग में कौन करता है। त्यौहार के मौसम में कुर्ते में साइड जेब न लगा कर कम्पनी ने कितना श्रम, समय और पैसा बचा लिया इसका आँकलन प्रबुद्ध पाठकों पर छोड़ता हूँ। यदि आप मेरी तरह जेब प्रेमी हैं तो ट्रायल ज़रूर करके देख लें। मॉल है बड़का बाज़ार।

मंगलवार, 2 अक्तूबर 2018

भोजन का भविष्य 

कमॉडिटी ट्रेडिंग छोड़ कर ग्रो-इंटेलीजेंस नामक डाटा एनालिसिस कम्पनी आरम्भ करने वाली सुश्री सारा मेंकर को टेड टॉक पर सुनना एक अद्भुत अनुभव रहा। अगस्त, 2017 में प्रेषित ये वार्ता भविष्य में भोजन की उपलब्धता के लिये समय रहते आगाह करने का प्रयास है। उनके अनुमान के अनुसार भोजन उपलब्धता की भयावह तस्वीर देखने के लिये शायद 2050 का इन्तज़ार न करने पड़े। आज उस भयावहता की कोई कल्पना भी न करना चाहे। लेकिन बहुत सम्भव है अब से मात्र एक दशक बाद ही इस स्थिति से दो-चार होना पड़ जाये। कुछ घण्टी बजी। हम भी इस चपेट में आ सकते हैं। प्रस्तुत लेख सुश्री सारा की वार्ता से प्रेरित है।  

उनके आँकलन के अनुसार 2050 तक 9 बिलियन तक पहुँच चुकी वैश्विक जनसंख्या को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिये आज की तुलना में 70% अधिक खाद्य सामग्री की आवश्यकता होगी। प्रत्येक व्यावसायिक गतिविधि सदैव उर्ध्वगामी नहीं होती। एक ऊंचाई तक पहुँचने के बाद एक अप्रत्याशित उतार अवश्य आता है और स्थितियाँ एकदम से बदल जाती हैं। और कई बार ये परिस्थितियाँ अपरिवर्तनीय होती हैं। स्टॉक मार्केट अक्सर इन अनिश्चितताओं से गुज़रता है। वहाँ प्रत्यक्ष रूप से आम आदमी या मानवता पर कोई संकट दिखायी नहीं देता। कृषि क्षेत्र में ऐसा परिदृष्य तब आयेगा जब भोजन की माँग और आपूर्ति में अन्तर को पाटना असम्भव हो जायेगा। यदि कभी खाद्य उपलब्धता में ऐसा हुआ तो दृश्य भयावहता की कल्पना से परे होगा। विभीषिका या भूख के कारण से उत्पन्न अराजकता, संवैधानिक और राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करेगी। असामान्य मूल्य पर भी खाद्य सामग्री की अनुपलब्धता मानवता के लिये खेदपूर्ण हो सकती है। तब सम्भवतः ये समझने का समय भी न मिले कि पैसा और तकनीक भोजन नहीं उपलब्ध करा सकते। कृषि व्यवस्था की स्थिति बहुत ही छिन्न-भिन्न है और भविष्य की नीति निर्धारण के लिये उपलब्ध आँकड़ों का आधार बहुत सीमित और अल्प है। इसी कारण सुश्री सारा ने कमॉडिटी ट्रेडर का काम छोड़ कर एक उद्यमी बनने का निश्चय किया। ग्रो-इंटेलिजेंस एक डाटा विश्लेषण कम्पनी है जो पॉलिसी बनाने वालों को आँकड़े उपलब्ध कराती है। ये कम्पनी विश्व के प्रत्येक नागरिक को खाद्य सुरक्षा में आने वाले संकट से बचाने के लिये एक व्यावहारिक मार्गदर्शक का काम भी कर रही है। 

विश्व कृषि परिदृश्य में गिरावट 2027 में ही परिलक्षित होने लगेगी जब विश्व की खाद्य आवश्यकता और उपलब्धता में 214 ट्रिलियन कैलोरी का अन्तर होगा। सभी खाद्य पदार्थों की पोषक क्षमता बराबर नहीं होती इसलिये टन और किलोग्राम में खाद्य उपलब्धता व्यक्त करने का कोई प्रयोजन नहीं है। भोजन की मात्रा नहीं, भोजन द्वारा प्राप्त कैलोरी का निर्धारण स्वस्थ जीवन शैली के लिये आवश्यक है। आज से चालीस साल पहले कृषि की स्थिति का आँकलन करने पर पता चलता है कुछ ही देश कैलोरी की दृष्टि के स्वावलम्बी थे या कैलोरी निर्यातक थे। अधिकाँश देश कैलोरी के आयातक हुआ करते थे। जिनमें अफ्रीका, यूरोप और भारत भी सम्मिलित थे। चीन उन दिनों खाद्य कैलोरी उपलब्धता में विषय में स्वावलम्बी था। चालीस साल बाद आज चीन में औद्योगिक क्रांति तो दिखायी देती है किन्तु खाद्य आवश्यकताओं के आधार पर यह एक बड़ा आयातक देश बन गया है। भारत ने हरित क्रांति के माध्यम से खाद्य आत्मनिर्भरता में के बड़ी छलाँग लगायी। विश्व पटल पर अफ्रीकी और मध्य एशिया के देशों और चीन को छोड़ कर अधिकाँश देश अपनी कैलोरी आवश्यकताओं में आत्मनिर्भर हो गए हैं। लेकिन आज से पाँच साल बाद (2023 में) जब विश्व की आधी आबादी के अफ़्रीका, भारत और चीन में होगी तब खाद्य अवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा ये सोचने का विषय है। ये तीनों क्षेत्र विश्व में खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से बड़ी चुनौतियाँ प्रस्तुत करने वाले हैं। ये सभी देश अतिरिक्त कैलोरी उत्पादक देशों से कैलोरीज़ का आयात करने को विवश होंगे। समस्त अतिरिक्त कैलोरी अफ़्रीकी देशों, भारत और चीन का ही भरण करने में सक्षम होंगी। अतिरिक्त कैलोरी उत्पन्न करने वाले देशों को भी ये उत्पादन वृद्धि निर्वनीकरण के रूप में मूल्य चुका कर ही करनी होगी।

कैलोरी अभाव वाले देशों के लिये अतिरिक्त कैलोरी उत्पादक देशों से खाद्य सामग्री की बर्बादी कम करने या खाद्य उपयोग में परिवर्तन लाने की आशा करना सही नहीं है, न ही समस्या का समाधान है। कोई आपकी आवश्यकता के लिए अपना खाद्य व्यवहार भला क्यों बदलेगा। समस्या का समाधान भी कैलोरी अभाव वाले क्षेत्रों से ही आयेगा। चीन में कृषि हेतु भूमि और पानी की उपलब्धता की समस्यायें हैं। इसलिए समाधान के लिये अफ्रीका और भारत ही से आशा की जा सकती है। भारत में भी भूमि एक सीमित संसाधन है किन्तु उत्पादकता में वृद्धि की सम्भावनायें हैं। अफ्रीका में कृषि योग्य भूमि बड़ी मात्रा में उपलब्ध है और वहाँ अभी भी उत्पादकता का स्तर वही है जो 1940 में उत्तरी अमेरिका का था। खाद्य सुरक्षा की समस्या के समाधान के लिये बहुत समय नहीं बचा है। इसलिये आवश्यकता है कुछ नया करने की, कुछ अलग करने की, कुछ सुधार करने की। आवश्यकता है अफ्रीका और भारत में कृषि के व्यवसायीकरण और औद्योगीकरण की। इसका उद्देश्य मात्र खेती के व्यवसायीकरण से नहीं है। इसका उद्देश्य आंकड़ों का विश्लेषण करके नीति निर्धारण में सहायता, आधारभूत संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) का विकास, परिवहन मूल्यों में कमी, बैंकिंग और बीमा क्षेत्रों में सुधार, तथा खेती में असुरक्षा की आशंका को कम करना है। बिना लघु और मझोले किसानों को प्रभावित किये सम्पूर्ण कृषि व्यवस्था के व्यवसायीकरण की महती आवश्यकता है। व्यावसायिक खेती और लघु किसानों के मध्य सहअस्तित्व का मॉडल विकसित करने की आवश्यकता है। भारत भविष्य में उत्पादकता में वृद्धि के द्वारा अपनी स्वावलम्बन की स्थिति को बनाये रखने में सक्षम है। किन्तु 2027 तक 214 ट्रिलियन कैलोरी की कमी और 8.3 बिलियन जनसंख्या को भोजन उपलब्ध कराने में अफ़्रीकी देशों की महत्वपूर्ण भूमिका होने वाली है। भविष्य में बढ़ती जनसंख्या और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के प्रश्न का उत्तर अब  हमारे पास है। बस उस पर अमल करने की आवश्यकता है।  

वर्ष 2006 में योजना के सितम्बर अंक में एक लेख छपा था "एग्रीकल्चर ऐज़ ऐन इंडस्ट्री"। कृषि ही एक ऐसा उद्योग है जो बढ़ती जनसंख्या को भोजन, रोजगार और आय उपलब्ध करा सकता है। आवश्यकता है इसे समग्रता से देखने की। आर्थिक समृद्धि को सहजता से अधिक भोजन ग्रहण करने की प्रवृत्ति से जोड़ा जा सकता है। जेब में पैसा है तो स्वाद पर सबका अधिकार जायज़ है। दिन-दूना रात चौगुना बढ़ता मेरा पेट मुझे रोज चिढ़ाता है। किसी दूसरे के खाद्य हिस्से पर मेरा हक़ नहीं है। डाक्टरों के यहाँ निरन्तर बढ़ती लाइनें और बढ़ता मेडिकल बिल उन्हें भी नहीं चिंतित कर पाता जो दिन-रात खाद्य समस्या हाइलाइट करने में उलझे हुये हैं। अधिक भोजन ही अधिकांश बीमारियों की जड़ है, जब कि संतुलित आहार से ही स्वस्थ जीवन शैली सम्भव है। इसलिये कैलोरी ग्रहण (काउन्ट) पर बहस करने का अब मुनासिब समय है। गुटका, शराब, अतिकैलोरी खाद्य सामग्री के उपयोग को सिर्फ इसलिए बढ़ावा मिल रहा है कि लोगों की क्रय शक्ति में वृद्धि हुयी है। इलाज़ पर खर्च भी उन्हीं का बढ़ रहा है जो स्वाद और जीवन-आनन्द को रुपयों से तौल रहे हैं। जापान में बॉडी-मास इंडेक्स में परिवर्तन के हिसाब से इंश्योरेंस प्रीमियम घटता या बढ़ता है। संपन्न लोगों से दूसरों के लिए त्याग की अपेक्षा व्यर्थ है लेकिन उनसे उन्हीं के स्वास्थ्य की अपेक्षा तो की ही जा सकती है। असंयमित जीवन शैली कारण मानवजनित अस्वस्थता पर इंश्योरेंस प्रीमियम में वृद्धि तथा इलाज़ पर हुये ख़र्च पर टैक्स शायद लोगों को संतुलित भोजन के लिये प्रेरित कर सके। 

जब देश भविष्य में युद्ध की आशंका से बम और बारूद के ज़खीरे इकट्ठा कर सकते हैं तो क्या भविष्य के लिये भोजन के भण्डार नहीं बनाये जा सकते। भविष्य की लड़ाई हमें आज उपलब्ध तकनीकों से ही लड़नी होगी। विगत वर्षों में दलहन में भारत की आत्मनिर्भरता ने एक नयी इबारत लिख दी है। इस सफलता ने यह सिद्ध कर दिया है कि गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता बढ़ा कर, बीज प्रतिस्थापन और सुनिश्चित सरकारी खरीद के द्वारा उत्पादन लक्ष्य को वर्तमान तकनीकों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। अब बात मात्र कृषक आय दोगुनी की ही नहीं होनी चाहिये। बात ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाओं की भी होनी चाहिये, ताकि शहरों पर बढ़ते अनावश्यक बोझ को कम किया जा सके। इसके लिये  ग्राम्य-अंचल में कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना करनी आवश्यक है। कटाई उपरान्त होने वाली हानियों को कम करके भोजन की उपलब्ध्ता को बढ़ाया जा सकता है। प्रसंस्करण के माध्यम कृषि उत्पाद की भण्डारण अवधि (शेल्फलाइफ़) तथा ग्रामीण आय में कई गुना वृद्धि सम्भव है। भण्डारित अनाज का एक बड़ा हिस्सा आपात स्थितियों से निपटने के लिये भी होना चाहिये। एक लीटर में अस्सी किलोमीटर चलने वाली हीरो हौंडा मोटरसाइकिल जब सन 1985 में जब लॉन्च हुयी थी तब उनका स्लोगन था "फिल इट-शट इट-फॉरगेट इट"। भविष्य में खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों को देखते हुये कुछ ऐसा ही प्रबन्धन आवश्यक है। बचपन में कहानी सुना करते थे अकाल पड़ने पर राजा ने अपने सारे गोदाम खोल दिये। गोदाम भी होते थे पहाड़ की कंदराओं में। तकनीकी रूप से अब हम अधिक सक्षम हैं। दिक्कत सिर्फ इतनी है कि समस्याओं पहचान और उन्हें चिन्हांकित (हाइलाइट) करने में हमने इतनी ऊर्जा लगा दी है कि संभावनाओं और समाधानों की ओर से हमारा ध्यान भटक गया है। हम ऐसी खोज के पीछे भाग रहे हैं जिस पर जलवायु परिवर्तन, कीट या रोग का प्रकोप न पड़े। उचित जलवायु, मृदा और जल के जटिल जाल में इच्छित परिणाम प्राप्त करने में कुछ हद तक सफलता  मिली अवश्य है किन्तु ये विकास की सतत चलती रहने वाली अन्तहीन प्रक्रिया है। जैसा सुश्री सारा ने बताया हमारे पास समाधान हैं बस उन्हें अमल में लाने की आवश्यकता है। समाधान पूरी कृषि मूल्य श्रृंखला (वैल्यू चेन) के समग्र प्रबन्धन में निहित है।  

यदि भोजन और स्वास्थ्य सरकारों की ज़िम्मेदारी है तो इस दिशा में भी नीतियाँ बननी चाहिये। ताकि 2023 तक हम चुनौतियों के लिये तैयार रहें। आज देश उस महापुरुष का 149वां जन्मदिन मना रहा है जिसने पूरे देश को वस्त्र उपलब्ध हो सके इसलिये आधी धोती पहन ली। क्या हम अपने स्वास्थ्य के लिये अपनी कैलोरी नहीं गिन सकते। भोजन की कमी की समस्या का निवारण उसकी उचित वितरण प्रणाली से संभव है।खाद्य समस्या के निदान के लिये उन्हीं देशों को प्रयास करना पड़ेगा जिनके लिये यह चिंता का विषय है। सम्भवतः समस्याओं का हल भी वहीं से निकलता है जहाँ से वो शुरू होती हैं।  

- वाणभट्ट 




  

शनिवार, 29 सितंबर 2018

प्रायश्चित 

करिया भैया जब पैदा हुए तो झक सफ़ेद थे। दादी ने "आ गए करियउ" कहते हुये बच्चे का स्वागत किया और माथे पर काला टीका लगा दिया। बच्चे के माँ और बाप दोनों ही साफ़ रंग के थे इसलिये बच्चे के काला होने की गुंजाइश न के बराबर थी। लेकिन दादी को मालूम था कि कितनी मन्नतों और चार लड़कियों के बाद ईश्वर ने उनकी सुनी। गोदी में पोता लिया तो जैसे इस जन्म के सारे बन्धन कट गये। आठ पाउण्ड के सुन्दर-स्वस्थ बच्चे को हर बुरी नज़र से बचाना ज़रूरी था। इसलिये उन्होंने पहले से ही नाम सोच रखा था - काली प्रसाद मिश्र। उन दिनों 40 -50 साल के होने को आये बेटा-बहू की क्या मज़ाल कि अपने माँ -बाप की आज्ञा की अवहेलना कर सकें। इस प्रकार काली प्रसाद मिश्र जी का अवतरण भवानी प्रसाद मिश्र जी के आँगन में हो गया। स्कूल के नाम से अलग नाम की व्यवस्था सम्भवतः इसलिये की गयी ताकि घर-पास-पड़ोस का हर प्राणी अपने-अपने प्रेम को अपने-अपने हिसाब से व्यक्त कर सके। फलस्वरूप काली के जितने अपभ्रन्श सम्भव थे उन सभी नामों से उस खूबसूरत-हँसते-मुस्कुराते-खिलखिलाते बच्चे को नवाज़ा गया। कलुवा, करियवा, कालिया, कल्लू और करिया आदि-आदि। आखिर के दो नाम बच्चे के साथ ऐसे चिपके कि लाख चाहने के बाद भी वो किसी के लिये कल्लू था तो किसी के लिये करिया। 

मेधावी काली प्रसाद मिश्र ने उच्च शिक्षा प्राप्त करके एक शालीन सरकारी नौकरी का जुगाड़ कर लिया था। भवानी प्रसाद ने पूरी ज़िन्दगी सरकारी क्लर्की में निकाल दी थी। बेटा जब सरकारी अफसर बन गया तो उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। सरकारी आवास मिला। सरकारी गाड़ी मिली। गज़टेड क्लास वन बताते-बताते भवानी इतने भाव-विह्वल हो जाते कि लगता इसके पहले या बाद में कोई और इस पद की शोभा नहीं बढ़ा पायेगा। अब उनकी तमन्ना थी जल्दी से जल्दी अवकाश प्राप्त करके बेटे के साथ रहने की और उसकी अफसरी का लुफ़्त उठाने की। रिटायरमेन्ट के बाद स्कूल में शौकिया पढ़ाने वाली बहू ने बहुत समझाने की कोशिश की कि पिता जी आप अपने शहर और अपने मकान में ही रहिये हम लोग आते-जाते रहेंगे और आपका ख्याल रखेंगे। लेकिन भवानी बाबू के अपने तर्क थे। पत्नी के देहावसान और बेटियों के विवाह के बाद अब बस बेटा-बहू-पोते के साथ ही रहने की इच्छा है। और फिर पाँच कमरों के सरकारी बंगले में तुम ढाई प्राणी क्या करोगे। मैं साथ रहूँगा तो पोते को कहीं क्रेच में नहीं डालना पड़ेगा। "देखो कल्लू अब मैं अकेले यहाँ नहीं रहने वाला"। भवानी बाबू ने अपना निर्णय सुना दिया था। 

सरकारी मकान में आ कर और पोते को गोद में लेकर दिन भर भवानी बाबू कालोनी में घूमा करते। काली प्रसाद को जिस बात का अन्देशा था वो होना ही था और हुआ भी। पूरे मोहल्ले को जल्द ही मालूम हो गया कि केपी साहब के घर का नाम कल्लू है। उन्होंने ड्राइंग रूम के दीवान पर अपना कब्जा जमा लिया। चूँकि टीवी भी वहीँ लगा था इसलिये यदि क्रिकेट या फुटबॉल मैच न आ रहा हो तो अपने पोते लालता प्रसाद मिश्र, जिसे प्रेम से वो लल्लू, लालू, ललुआ बुलाते, के साथ पोगो देखने में उन्हें बहुत आनंद आता। बेटे-बहू ने पिता जी के चक्कर में टीवी देखना छोड़ दिया। उन्हीं के चक्कर में केपी की मित्र मण्डली और बहू की सहेलियों ने आना-जाना कम कर दिया। निष्कपट भवानी बाबू का ध्यान इस ओर कभी गया ही नहीं। इन सब प्रपंचों से मुक्त उन्होंने अपना सर्वस्व लल्लू की सेवा में झोंक रखा था। उनके हिसाब से उन्हें इस जिन्दगी इससे ज़्यादा की उम्मीद भी नहीं थी। 

सब कुछ ठीक चलता रहता यदि लल्लू का प्ले ग्रुप में दाख़िला ना होता। भवानी बाबू को क्या पता कि अफसर बनाना अब उतना आसान नहीं रहा। प्लेग्रुप से जब बच्चा मेहनत करेगा तभी तो इंजिनियर या डॉक्टर बनेगा। उनका ज़माना तो रहा नहीं कि डिग्री लो और नौकरी पा जाओ। बेटे-बहू को अब पोते के भविष्य की चिन्ता होने लगी थी। "देखो ये पिता जी के साथ रहेगा तो यही सब करेगा। टीवी में कितना मन लगता है इसका। ऐसा करो पिता जी को पीछे कमरे में शिफ्ट कर देते हैं। एक टीवी और लगवा दो। उन्हें क्या, बस दिन भर टीवी ही तो देखना है।" पति-पत्नी ने मशविरा किया और अगले दिन इस योजना को क्रियान्वित भी कर दिया। पढ़ाई बढ़ने के साथ-साथ लल्लू भी व्यस्त होता चला गया। कभी ट्यूशन्स तो कभी कोचिंग। उम्र के इस पड़ाव तक पहुँचते-पहुँचते बिना जले ही रस्सी के सारे बल ढीले पड़ जाते हैं। मूल और सूद के दम पर अपना घर छोड़ आये थे। अब तो जिस विधि राखे राम उसी विधि रहिये वाली स्थिति थी। शरीर भी कम साथ देने लगा था इसलिये बाहर निकलना दिनोंदिन कम होता जा रहा था। शाम होते-होते पीछे कमरे में उनका मन हुड़कने लगता। पता भी नहीं चलता कल्लू ऑफिस से आये की नहीं।

साढ़े-चार बजते न बजते वो साइड के गलियारे से निकल कर गेट तक आ जाते। और गेट पर लटक कर कल्लू के लौटने का इन्तज़ार करते। हर आने-जाने वाले से अपनी फ़िक्र का ज़िक्र ज़रूर करते। "का बतायीं अबहिन तक कल्लू नहीं आये।" अन्दर से बहू चिल्लाती "बाबू जी अन्दर आ जाइये जब आना होगा आ जायेंगे। आपके गेट पर खड़े होने से वो जल्दी नहीं आ जायेंगे।" धीरे-धीरे ये रोज का नियम बन गया था। अब तो अडोसी-पडोसी भी चुटकी लेते। पूछ लेते "बाबू जी कल्लू अभी आये नहीं क्या।" भवानी बाबू निशंक भाव से बताते कि "आज बड़ी देर हो गयी। कल्लू को पता नहीं ऑफिस में कौन सा काम आ गया। पता नहीं कहाँ लेट हो गये।" गेट पर ऑफिस की दिशा में टकटकी लगाये खड़े बाबू जी को देख कर सरकारी गाड़ी से उतरते हुये श्रीमान केपी  मिश्र  उर्फ़ कल्लू का रोम-रोम सुलग उठता। उन्हें पता था कि साढ़े-चार बजे से गेट पर लोग कल्लू-कल्लू नाटक का रसास्वादन कर रहे होंगे। वो आपे से बाहर हो उठता। उन्हें लगभग डाँटते हुये अन्दर चलने को कहता। भवानी बाबू शायद इसी में खुश हो जाते कि बेटा सकुशल वापस आ गया और उसने उनसे बात की।

जगह बदलती है, समय बदलता है, नहीं बदलता है समय का लेख। कल ही किसी ने सूचना दी कि करिया भैया बेटे लल्लू के साथ लखनऊ में रह रहे हैं। आजकल केपी बाबू हर शाम बालकनी में आधे लटके हुये टकटकी बाँधे लल्लू के ऑफिस से लौटने का इंतज़ार करते हैं। और लल्लू ऑफिस से लौटते ही जब तक उन्हें दो-चार खरी-खरी न सुना दे, वो अन्दर नहीं जाते। उन्हें उसकी बातों का बिल्कुल बुरा भी नहीं लगता। ये सिलसिला हर रोज घटित होता है। जाने अन्जाने शायद यही उनका प्रायश्चित है।         

-वाणभट्ट 

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

मॉब लिंचिंग

लम्बी सी मेज पर ऑटोकैड से बनाये ढेर सारे चित्र क्रमवार तरतीब से सजा कर रखे हुये थे। उनके निरीक्षण में किसी प्रकार की दिक्कत न हो, इसलिये देखने वाला और दिखाने वाला दोनों ही पेपर्स के पास जाते और डिस्कस करते। करीब सत्ताईस बोन कॉम्पोनेंट्स के फ्रंट-साइड-टॉप व्यूज़ और उनकी असेम्बली ड्रॉइंग्स रखी थीं। दिखाने वाले ने कहा - "सर जैसा आपने कहा था कि ये उत्पत्ति अल्टीमेट होनी चाहिये। मैंने भी पूरा प्रयास किया है। एक-एक पार्ट के माइन्यूट से माइन्यूट पॉइंट का डिटेल है। सब मिल कर अपने आप में सम्पूर्ण और अद्वितीय है। पूरी एक टीबी की हार्डडिस्क भर गयी। इससे बढ़िया रचना न कभी हुयी है न आगे कभी होगी। जब ज्ञान और बुद्धि को आत्मसात करने वाला मस्तिष्क बना दिया है तो ये नित्य कुछ न कुछ नया करने का प्रयास अवश्य करेगा। हो सकता है भविष्य में हमें भी रिप्लेस कर दे। वैसे तो इसका हर कॉम्पोनेन्ट आवश्यक और अपरिहार्य है। लेकिन मशीन को पूर्णतः आत्मनिर्भर और रचनात्मकता को यथार्थ में परिवर्तित करने के लिये ये असेम्बली ही मानव को अन्य प्राणियों से अलग करेगी। मैंने बहुत सी संरचनायें निर्मित की किन्तु मेरे विचार से इससे उत्कृष्ट व्यवहारिक संरचना मेरी कल्पना से परे है। अब मै अपने कम्प्यूटर को फॉर्मैट करना चाहता हूँ ताकि कोई नयी चीज़ सोच-बना सकूँ।"

गहन चिंतन में डूबे संरचना की असेम्बली ड्रॉइंग को देखते हुये उनके माथे पर चिन्ता की कुछ लकीरें उभर आयीं । "सिर्फ़ हाथों की कमी थी। आपने तो धरती के इस प्राणी को तो पूरी तरह भगवान का ही रूप दे दिया। लेकिन जिस सन्यम और विवेक के साथ हम अपनी बुद्धि का उपयोग सृष्टि निर्माण में करते हैं शायद मनुष्य अपने हाथों का उतना विवेकशील उपयोग न कर सके। शक्ति के सदुपयोग से ज़्यादा उसके दुरूपयोग की सम्भावना होती है, वत्स विश्वकर्मा।" उलझी हुयी दाढ़ी को अपने हाथों से सुलझाने के प्रयास में लगे हुये ब्रम्हा जी ने उवाचा।

विश्वकर्मा जी ने विनम्रतापूर्वक कहा "प्रभु रोज-रोज ना-ना प्रकार के एक से एक विचित्र प्राणी बनाते-बनाते मै थक गया हूँ और अघा भी। इसलिए आपसे अनुनय है कि मुझे अपने जैसे प्राणी का निर्माण करने की अनुमति दी जाये। ऐसा प्राणी जो मेरे काम में कुछ सहयोग कर सके। ये पृथ्वी का सबसे उन्नत जीव होगा। सम्भवतः इसके बाद मुझे किसी और जीव को बनाने की आवश्यकता भी न पड़े। ये खुद ही विज्ञान के माध्यम से नए-नए जीव विकसित करने में सक्षम होगा। इसको मैंने देवताओं की सारी शक्तियों से लैस कर दिया है।" विश्वकर्मा जी के ऊपर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सृष्टि का वर्क लोड़ था। 24  x 7  घंटे,  365  दिन। न कोई ईएल न कोई सीएल। और ब्रम्हा जी इस बात से भली-भाँति वाक़िफ़ भी थे। फिर भी उन्होंने कहा "भाई सोच लो ये हाथ दे दिया तो मनुष्य और देवताओं-भगवानों क्या अन्तर रह जायेगा। हो सकता है इसको प्रदान करने के बाद हमारा और तुम्हारा काम ही ख़त्म हो जाये। अभी तो मानव कभी-कभार भगवानों को याद भी कर लेता है। हाथ मिलने के बाद जो कर्ता भाव आयेगा, मुझे डर है कहीं इन्सान खुद को ख़ुदा न समझ बैठे।" लेकिन विश्वकर्मा जी उस समय उसी तरह रिलक्टेंट थे जैसे आज सरकारी दफ्तर के इनडिस्पेंसिबल अधिकारी। जो कह दिया सो कह दिया बॉस भले आप हों लेकिन चलेगी उनकी ही।

डार्विन साहब की इवोल्यूशन की थ्योरी उन लोगों के लिये है जो अँग्रेजी में लिखी हर बात को ज़रूरत से ज़्यादा तरज़ीह देते हैं। लेकिन उस देश में जहाँ हर तीसरा व्यक्ति अपने फंडे प्रतिपादित करता घूम रिया है, वहाँ कुछ लोग सिर्फ फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन के कारण एंटीगुआ में शरण नहीं माँग रहे हैं। चाहे सरकार को गरियाओ चाहे भगवान को, कउनो रोके वाला नहीं ना। चार पिछलग्गू मिल गए तो एक नयी पार्टी बना लो और बीस मिल जायें तो बाबा बन के नया सम्प्रदाय। पूरी आज़ादी है। चचा गुलज़ार पहले ही फ़रमा चुके हैं - थोड़ी बेकारी है वर्ना यहाँ बाकी हाल-चाल-वाल ठीक-ठाक है। 

जो भगवान इतनी वैराइटी के प्राणी बना सकते हैं, वो बन्दर के इंसान बनने का वेट भला क्यों करेंगे। हज़ारों साल के मानव इतिहास में जब किसी ने टिड्डे को चिड़िया में बदलते नहीं देखा तो ये मानना आवश्यक है कि भगवान ने चिम्पैंजी और आदमी अलग अलग बनाये होंगे। हाँ आदमी बनाने की प्रक्रिया में कुछ बन्दर-लंगूर-आरंगुटान-चिम्पैंजी ज़रूर बन गए होंगे। गौर करिये तो शायद हाथों के फ़र्क ने इंसान को अन्य प्राणियों से अलग कर दिया। आयतन (वॉल्यूम) के हिसाब से बहुत से प्राणियों का मस्तिष्क मानव मस्तिष्क से कई गुना बड़ा होगा लेकिन वो वन-टू का फ़ोर नहीं कर पाये।और आदमी है कि हर समय हर जगह उसी के चक्कर है। इसमें किसी को कोई शक़ नहीं होना  चाहिये कि मानव से ज़्यादा विकसित मस्तिष्क किसी अन्य प्राणी का नहीं है। हाथ ने उसे ये रचनात्मक आज़ादी दी कि जिस चीज़ के बारे में वो सोच सकता है उसका निर्माण भी कर सकता है। मानव साक्षात् विश्वकर्मा का रूप है लेकिन तभी तक जब तक कि उसकी बुद्धि और विवेक में सामंजस्य बना हुआ है। रचनात्मकता है तो सृजनशीलता किसी न किसी रूप में परिलक्षित अवश्य होगी। ये जो अपने चारों ओर हैलीकॉप्टर से लेकर टूथब्रश तक जो भी दिखायी दे रहा है, मानव में निहित विश्वकर्मा का ही प्रतिफल है। कुछ ज़्यादा फेंक दिया हो तो लपेटते चलिये फिर लपेटने का मौका मिले न मिले।  

आदमी को अपना ही समकक्ष बना कर विश्वकर्मा जी को लगा अकेले वो जितना काम नहीं कर पा रहे थे उनके बनाये मानव अपनी सृजनशीलता से धरती को स्वर्ग से भी ऊपर ले जाने में सक्षम होंगे। वो ऊपर बैठे-बैठे बस आइडिया देते और आदमी उसे क्रियान्वित करता रहता। लेकिन आदमी तो आदमी है देवता बनने का ठेका तो ले नहीं रखा है इसलिये कभी-कभी बुद्धि-विवेक का सामन्जस्य गड़बड़ाता रहता है। नतीजन उन्हीं हाथों से वो ऐसे-ऐसे विध्वन्सक कृत्य कर बैठता कि विश्वकर्मा जी को अपने निर्णय पर अफ़सोस होता - कि हाथ दे कर कुछ गलत तो नहीं कर दिया, - कि काश उस समय ब्रह्मा जी की बात मान ली होती।

कुछ देशों ने छोटे-मोटे अपराधों के लिये कॉर्पोरल पनिशमेंट यानि ठुकाई का प्रावधान रखा है। हेलमेट-रॉन्ग साइड-सीट बेल्ट-रैश ड्राइविंग-कूड़ा फेंकना-फब्तियाँ कसना आदि-इत्यादि के लिये यदि गाहे-बगाहे ठुकाई होती रहे तो आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि शौकिया कानून तोड़ने वाले अप्रत्याशित रूप से कम हो जायेंगे। और उस ठुकाई के सजीव प्रसारण के लिये एक चैनल भी डेडिकेट किया जा सकता है। दूसरे के फ़टे में आनन्द खोजने वाले देश में न्यूज़ चैनल से ज़्यादा टीआरपी ऐसे चैनल को मिलनी सुनिश्चित है। कुछ आदिम सभ्यता का पालन करने वाले देशों में तो चोरी-चाकरी जैसे कृत्यों के लिये हाथ के विभिन्न हिस्सों को कम करने का भी प्रावधान है। उंगली काटनी है कि अँगूठा या पूरा हाथ ये चोर की नियत और चोरी के मैग्नीट्यूड पर निर्भर करता है। वो भी 24 से 48 घण्टे के भीतर, बिना किसी लम्बी न्यायिक प्रक्रिया के। वहाँ सड़क पर पर्स फेंक आइये तो भी किसी की क्या मजाल जो उठा ले। यहाँ बैग में बम रख आइये तो भी कबाड़ी चेक करके पुलिस को सूचित करेगा कि सर फलां जगह बम पड़ा मिला है, कहो तो डिफ्यूज करके घर ले जायें। चूँकि पुराने ज़माने के बच्चों की टीचरों और पड़ोसियों द्वारा इतनी ठुकाई हो चुकी होती थी कि बच्चे ज़रूरत से ज़्यादा सुधर जाते थे। इतने सुधर जाते थे कि बड़े होने पर उन्हें घटिया और दुष्ट लोगों की संगत करनी पड़ती थी ताकि वो सिस्टम में फिट हो सकें। यदि देश में छोटे-छोटे अपराधों के लिए वीडिओ रिकॉर्डिंग के साथ यदि ठुकाई की सजा मिलने लगे तो पूरी उम्मीद है बड़े-बड़े न्यायलय और कारागार कबूतरों की क़ब्रगाह बन के रह जायेंगे। सुना है एक देश में तो शिक्षा और कर्तव्य का पाठ पढ़ कर लोगों ने इस कदर अपराध करना छोड़ दिया कि कारागार बंद करने तक की नौबत आ गयी।

अब दिमाग है और हाथ है तो हर आदमी कुछ न कुछ तो करेगा ही। हर आदमी सृजनात्मक रूप से क्रिएटिव हो ऐसा सम्भव भी नहीं है। ऐसे लोगों से ही हाथ के दुरूपयोग की सम्भावना है। वो कान में उँगली करेगा या नाक में। अपने तक सीमित रहे तो गनीमत है। जब अपने नाक-कान साफ़ हो गये तो वो खाली बैठने से तो रहा। अपने नहीं तो दूसरों के ऊँगली करेगा। यहीं से सारी गड़बड़ की शुरुआत होती है। चाहे तो वो हाथ पे हाथ धर के भी बैठ सकता है। लेकिन उसके ज़िन्दा रहने पर लोग प्रश्न खड़े करने लगेंगे। इसलिये ज़रूरी है कि कुछ न कुछ हाथों का उपयोग करता रहे। 

ब्रह्मा जी ने विश्वकर्मा जी से अपनी व्यथा बतायी कि "इन्हें ऐसे छोड़ दिया तो प्रलय से बहुत पहले ही प्रलय लानी पड़ेगी। कुछ करते क्यों नहीं।" टेक्नीकल लोगों की एक खासियत तो है ही कि वो हर समस्या का अप्प्लाईड समाधान निकाल लेते हैं। स्वान्तः सुखाय टाइप के मौलिक शोध में सन्साधन और समय वो व्यर्थ करें जिन्हें कभी नोबेल मिलने की उम्मीद हो। मुस्कुराते हुये विश्वकर्मा जी ने कहा "बस इत्ती से बात"। उन्होंने आनन्-फानन में स्मार्टफ़ोन की परिकल्पना पृथ्वीवासियों के हाथों में थमा दी।

इसका मिलना था कि एक क्रांति आ गयी। कम्प्यूटर की शक्ति वाले इस यन्त्र में असीमित क्षमतायें उफान मारने लगीं। जिन लोगों से ए जी - ओ  जी नहीं सम्भल  रहा था वो  देखते ही देखते 3 जी - 4 जी की बातें करने लगे। हाथ बिज़ी हो गये। लोग अपने आँख-नाक-कान तक भूल गये। अब देश और दुनिया उनके फिंगर टिप पर थी। जो चाहे देखो जो चाहे सुनो। एक बच्चे ने तो हिस्ट्री-जॉग्रेफी विषयों के कोर्स में रखे जाने के औचित्य पर ही सवाल उठा दिया। कहा रटने-रटाने के दिन लद गये। जब गूगल है तो ख़ामख़्वाह अपनी हार्डडिस्क पर क्यों फालतू लोड डालना। हर चीज़ का क्रैश कोर्स है। जब चाहेंगे पढ़ लेंगे, सीख लेंगे। अभी तो बस दिमाग़ को खुलने दीजिये। पैराशूट और दिमाग़ तभी काम करते हैं जब खुले हों। हमारा ज़माना होता तो सरऊ को दुइ कन्टाप मारते। लेकिन अब ज़माना बदल गया है।

ज़माना कितना भी बदल जाये लेकिन आदमी और आदमी की फ़ितरत तो बदलने से रही। विशेष रूप से उस देश में जहाँ नियम-कानून को मानव विकास की सबसे बड़ी बाधा मान कर हर कोई तोड़ने के लिए उत्साहित रहता हो। पहले तो लोग उंगली करके सन्तुष्ट हो लेते थे, स्मार्ट फोन आने के बाद से अँगूठा करने से बाज नहीं आ रहे। दिन भर चैटिंग। पता नहीं कितनी साइट्स और सोशल साइट्स खुल गयी हैं हाथों को व्यस्त रखने के लिये। इस फ़िराक़ में जेसचर-पॉशचर सब बदल गया है। दिमाग और अँगूठे का सामंजस्य बिठाने के चक्कर में बुद्धि और विवेक का तारतम्य टूटता चला गया। शक्ति का उपयोग तभी तक अच्छा है जब तक वो मानव कल्याण में लगे। अब हर कोई अपने-अपने ज्ञान और अनुभव के हिसाब से सामाजिक परिदृश्य की विवेचना कर रहा है। सूचना विस्फोट ने तो आदमी को कन्फ्यूज़ कर ही रखा था उस पर पे कमीशनों ने सोने पे सुहागे काम किया। ज्ञान के साथ इंसान विनम्र होता चला जाता है लेकिन धन के साथ अकड़ता। उसका स्मार्टफोन मेरे स्मार्टफोन से महँगा कैसे। बदल डालो। आदमी इतना बिज़ी है, इतना बिज़ी है कि किताबें पढ़ने का समय नहीं मिलता। तो चिन्ता की क्या बात है। वाट्सएप्प और फेसबुक और इंस्टाग्राम तो है। यहाँ ज्ञान फटा पड़ रहा है। जितना चाहे बाँटो जितना चाहे बटोरो। 

ज्ञान बटोरने तक तो फिर भी ठीक है लेकिन बाँचने से पहले आप ट्रैफिक सिगनल वाला रूल अपनाइये। रुकिए-देखिये-जाइये। ध्यान से पढ़िये - गौर से सोचिये किसे भेजना है - फिर फॉरवर्ड कीजिये। अब होता क्या है कि इतनी इन्फॉर्मेशन जब हर तरफ से दिन भर लगातार आ रही हो तो कई बार बुद्धि-विवेक किनारे रह जाते हैं। जैसे फ़ास्ट बाउन्सर के आगे खड़े हो कर विराट को बल्ला लगाने या छोड़ने का निर्णय फ्रैक्शन ऑफ़ सेकेंड्स में लेना होता है। मैसेज आया और फॉरवर्ड किया में भी स्थिति कुछ ऐसी ही होती है। कई बार तो यकीन मानिये पढ़ने का भी समय नहीं होता आदमी बस बिज़ी रहने के लिये फॉरवर्ड कर देता है। लेकिन समय से बड़ा कोई गुरु नहीं होता। स्वयं गलती करके सीखने के लिये ये जीवन कम है इसलिए जो दूसरों की गलती से सबक ले ले उसे वाकई बुद्धिमान समझा जाना चाहिये। 

एक बार उसकी गलती से मिस्टेक हो गयी। कोई मैसेज आया। पढ़ने से पहले अँगूठे ने अपना काम कर दिया। बाद में जब लोगों के सद्भावना सन्देश आने लगे तो उसने ठीक से पढ़ा तब मिस्टेक का पता चला। जो ज्ञान शेयर किया था वो ज्ञान उस ग्रुप वालों को नहीं चाहिए था। फिर क्या था साहब पूरा का पूरा ग्रुप तीन दिन तक उसके उस ज्ञान पर अपना अज्ञान बघारता रहा। वो तो भला हो विश्वकर्मा जी का जो फोन से निकल कर आदमी सामने खड़ा हो जाए ऐसा आइडिया अभी नहीं दिया है। नहीं तो मॉब लिंचिंग के शिकार में एक नाम और शुमार हो जाता। फिर उसकी धर्म-जाति-बिरादरी देख कर कुछ लोग अवार्ड वापस कर रहे होते और कुछ भारत माता पर गर्व।

- वाणभट्ट