रविवार, 21 जुलाई 2019

ब्रह्मा जी की खूँटी

उसकी साँसें धीरे-धीरे कम होती जा रहीं थीं। नब्ज़ का भी पता नहीं लग रहा था। तभी उसे दुमची (टेल बोन) के अंतिम बिन्दु पर एक तीव्र प्रकाश का अनुभव हुआ जो ऊपर की ओर उठता चला आ रहा था। देखते ही देखते वो प्रकाश शरीर के उच्चतम शिखर तक पहुँच गया था। अन्तर में पूरा का पूरा शरीर दैदीप्यमान होकर चमक रहा था। उस ज्योति का अनुसरण करते करते उसकी आँखे भ्रूमध्य ऊपर कहीं जा कर अवस्थित हो गयी थीं। ब्रह्मकमल सामने था। वो पूर्णतः आकाश तत्व में विलीन हो गया था। उसका शरीर बोध समाप्त हो चुका था।

मेडिसिन में एम.डी., डॉ. दिनकर शर्मा को कानपुर आये हफ़्ता नहीं बीता होगा। नया शहर - नये लोग। जानने - समझने में  जीवन के कुछ साल और निकल जायेंगे। ट्रांस्फरेबल पोस्ट का यही एक फ़ायदा है। जगह बदल जाती है। हर स्थान पर एक नया जन्म। और वो भी पिछले जन्म (पोस्टिंग) के कर्म-अकर्म से निर्लिप्त। ये उनकी वृहद सरकारी सेवा की आखिरी पोस्टिंग थी। हर बार की तरह इस बार भी शुरुआत शहर के दर्शनीय स्थलों के भ्रमण से ही होनी थी।

किसी ने उन्हें ब्रह्मावर्त जाने के लिये बता दिया। बहुत ही पवित्र जगह है। बिठूर का ऐतिहासिक महत्त्व होने के साथ साथ पौराणिक महत्त्व भी है। रानी लक्ष्मीबाई का बाल्यकाल यहीं पर बीता था। स्वतंत्रता सेनानी नाना साहब और तात्याटोपे की ये कर्मस्थली भी रही है। सीता माता के भगवान राम द्वारा परित्याग के पश्चात बिठूर स्थित वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में लव-कुश का जन्म हुआ था। ध्रुव ने यहीं पर अपनी तपस्या से दैवीय तारे के रूप में चमकने का वरदान पाया था।

विज्ञान और चिकित्सा के परा-स्नातक होने के नाते शर्मा जी के धर्म-कर्म का ज्ञान बस वहीं तक सीमित था जितना एक पण्डित परिवार के परिवेश में बिन प्रयास के मिल जाता है। श्लोक-दोहे-चौपाइयाँ उन्हें कंठस्थ थे। लेकिन उसी तरह जैसे तोता रट तो लेता है लेकिन उसके अर्थ और भाव से अनजान रहता है। पढ़ाई के दौरान घर से दूर रहने के कारण उनका दृष्टिकोण दकियानूसी नहीं रह गया था। देश-विदेश की यात्राओं ने भी उनके ज्ञान चक्षुओं को और खोल दिया था। आस्था-आत्मा-परमात्मा से उनका ज़्यादा लेना-देना नहीं था। हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर परखने की आदत, बीमारी की हद तक उनमें प्रवेश कर चुकी थी। क्यों-कहाँ-कैसे किये बिना उन्हें संतोष न मिलता। बिठूर के बारे में भी उनका विचार था कि पत्नी शारदा देवी के साथ एक आउटिंग हो जायेगी और गंगा स्नान भी। जैसे इतनी जगह देखी हैं, ये भी सही। 

स्नान के पश्चात ब्रह्मावर्त घाट की सीढियाँ चढ़ते हुये उनका ध्यान छोटे से मन्दिर की ओर अनायास चला गया। लिखा था "ब्रह्मा जी की खूँटी"। उत्सुकता वश वो उस मन्दिर के पास पहुंच गये। मन्दिर में बैठे बच्चे टाइप के पुजारी ने बिना किसी भूमिका के कहना शुरू कर दिया - दर्शन कर लो। यहाँ तक आने के बाद यदि इसका दर्शन नहीं किया तो क्या लाभ। 

किसी भी तीर्थ स्थान या मन्दिर जाने पर ये फिलिंग हर पढ़े-लिखे इंसान में आती है कि धर्म के नाम पर बेवकूफ़ बना कर हर कोई पैसा वसूलना चाहता है। खूँटी पूरी तरह से फूलों से ढँकी हुयी थी। चूँकि पहली बार बिठूर आना हुआ था इसलिये शर्मा जी के लिये - ये क्या बला है - जानना ज़रूरी था। बीस का नोट उन्होंने बच्चे के सामने ही पुष्प के ऊपर रख दिये। उसने छोटी सी छड़ी से फूलों को एक ओर सरका दिया। बमुश्किल आधे इंच की चाँदी जड़ित एक खूँटी फूलों के नीचे से निकल आयी। उस पुजारी रूपी बच्चे ने रटे-रटाये शब्दों में उस खूँटी का महात्म्य बताना शुरू कर दिया।

यही वो जगह है जहाँ ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना करने से पूर्व 99 साल तक तपस्या की थी। तपस्या करके जब वो उठने लगे तो उनके दाहिने पैर की खड़ाऊँ इसी जगह धँस कर पाताल तक पहुँच गयी और उनके अनेक प्रयासों के बाद भी नहीं निकल पायी। ये जो चाँदी की परत में लिपटी आधे इन्च का खूँटी जैसी चीज़ दिखायी दे रही है, ये उसी खड़ाऊँ का अँगूठा है। ये खूँटी ही समस्त ब्रह्माण्ड का केन्द्र है। इसके दर्शन मात्र से आपकी सभी मनोकामनायें पूरी हो जायेंगी। 

चित्र : सौ. भास्कर.कॉम
जल्दी शादी के कुछ फ़ायदे भी होते हैं। शर्मा जी का विवाह तभी हो गया था जब वो बीएससी कर रहे थे। उसके बाद एमबीबीएस व एम.डी. की पढ़ाई उन्होंने मैरिड हॉस्टल से ही की। आज उनके दोनों बेटा-बेटी अपनी-अपनी शिक्षा लेकर विवाहोपरान्त यूएस में सेटल थे। पत्नी के साथ जीवन सकुशल व्यतीत हो रहा था। ऐसे में उनके पास माँगने के लिये कोई ख़ास मनोकामना नहीं बची थी। उन्होंने खूँटी को मस्तक नवाया और बढ़ लिये। मन ही मन वो मुस्कुरा रहे थे कि हमारे देश में आस्था के नाम पर किस तरह अंध-विश्वास फैलाया जाता है।  

जीवन अपनी रफ़्तार से चलता रहता है। डॉक्टर साहब तो हर जगह व्यस्त हो जाते अपने काम में लेकिन उनकी पत्नी शारदा के लिये समय काटना थोड़ा मुश्किल हो जाता। ऑफिसर्स कॉलोनी की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि कोई आपके ऊपर है या कोई आपके नीचे। हर किसी से खुल कर घुल-मिल भी नहीं पाते। ऐसे में आदमी कितना टीवी देखे। वैसे भी आधा जीवन तो व्यतीत ही हो चुका था। दिन पर दिन रोज-रोज उफ़ान मारने वाले शौक़ भी कम होते जा रहे थे। बगल के वर्मा जी और उनकी मिसेज़ हर सन्डे किसी सत्संग में जाया करते थे। मिसेज़ वर्मा थोड़ी सात्विक प्रवृत्ति की महिला थीं। इसलिये जब भी मिलती थीं तो शर्माइन से ध्यान-योग की बातें किया करतीं थीं। ये बातें शारदा जी की समझ से परे थीं। उनके लिए तो घर में स्थापित मंदिर को फूल-धूप दिखा देना, हनुमान चालीसा और सुन्दर काण्ड पढ़ लेना, आरती गा लेना ही अल्टीमेट पूजा थी। एक बार जब शर्मा जी टूर पर थे तो उन्हें वर्माइन के साथ उनके सत्संग जाने का मौका मिला। बेसिकली वो एक ध्यान केन्द्र था। जहाँ कोई चेला गुरु के उद्बोधन को पढता फिर सब लोग ईश ध्यान के प्रयास में लग जाते। ध्यान, आत्म-साक्षात्कार की दिशा में पहला सोपान माना जाता है। इस गहरे गूढ़ शब्द का मतलब शर्माइन को ज़्यादा तो समझ नहीं आया लेकिन स्थिर होकर ध्यान में बैठने का आनन्द अनिर्वचनीय था। यदा-कदा जब भी उन्हें मौका मिलता वो वर्मा परिवार के साथ हो लेतीं। लेकिन धीरे-धीरे वो इस ग्रुप की नियमित सदस्या बन गयीं।   

कभी-कभी अपने इस आनन्द का वर्णन वो पंडित जी से भी कर देतीं। शर्मा जी पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। पत्नी के आनन्द को टाइम-पास का तरीका मान कर हलके से उड़ा दिया। पढ़ने-लिखने के बाद लोगों को जबानी बातें समझ नहीं आतीं। कुछ भी लिख कर या छाप कर दे दीजिये, तो वो पढ़ डालेंगे। मानें शायद फिर भी नहीं, लेकिन उसकी समीक्षा जरूर करेंगे। शारदा देवी सतसंग में उपलब्ध लाइब्रेरी की पुस्तक/पत्रिकायें अक्सर घर ले आतीं। जिन्हें शर्मा जी भी कभी-कभार पलट लेते। हर खोज की जड़ क्यूरॉसिटी से शुरू होती है। शर्माइन ने शर्मा जी में जिज्ञासा तो जगा दी थी। एक दिन उन्होंने भी साथ चलने की इच्छा जता दी। 

नशा चाहे अफीम का हो या आध्यात्मिकता का, सर चढ़ के ही बोलता है। नया मुल्ला वैसे भी प्याज ज़्यादा खाता है। शर्मा जी ने ध्यान को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बना लिया। सुबह-शाम बिना ध्यान के उन्हें अधूरा सा लगता। अपने व्यस्त शेडयूल में भी जब मौका मिलता वो ध्यान के लिए समय निकालने लगे। अब उनके अध्ययन कक्ष में सिर्फ आश्रम की पुस्तकें ही होतीं। उन में दिये निर्देशों को आत्मसात करने में वो लगे रहते। उनकी दिनचर्या में आये परिवर्तन से पंडिताइन भी परेशान हो जातीं। उन्हें लगता कहीं ये घर-बार से विरक्त न हो जायें। लेकिन शर्मा जी के मन में ऐसा विचार शायद ही आया हो। दिन-रात जब भी मौका मिल जाये शर्मा जी अपनी आत्मसाक्षात्कार की पद्यति को आरम्भ कर देते। उनके गुरु का कहना था - जिस व्यक्ति को भगवान के होने पर भी संदेह है आत्मसाक्षात्कार की स्थिति में वो अपने ही भगवत स्वरुप के दर्शन करेगा। बस निरन्तर भगवान की प्रार्थना करते रहना चाहिये।     

रात तीन बजे उनकी निन्द्रा अचानक टूट गयी थी। अन्दर से ध्यान की तीव्र इच्छा हो रही थी। वो अपनी ध्यान की आसनी पर स्थिर हो बैठ गये। मानो आज बिना दर्शन के नहीं उठेंगे। उन्होंने गुरु की बतायी प्रक्रिया पर अपना ध्यान लगा दिया।  

धीरे-धीरे उनकी साँसें कम होने लगीं। नब्ज़ भी गिरने लगी। तभी उन्हें मेरुदंड के सबसे निचले हिस्से में एक लाल रंग का तीव्र प्रकाश दिखा जो निरन्तर ऊपर की ओर उठता चला आ रहा था। विभिन्न चक्र इंद्रधनुषी रंग के प्रकाश से दैदीप्यमान हो गये। उनके चक्षु सहस्रार पर स्थित तीक्ष्ण श्वेत प्रकाश का अनुसरण करते हुये ऊपर कूटस्थ में टिक गयी थी। पहली बार उन्हें पाँच पंखुड़ियों वाले ब्रह्मकमल के दर्शन हुये। शरीर का बोध एकदम समाप्त हो चुका था। उनका शरीर पूर्णतः आकाश तत्व के साथ एकाकार हो चुका था। समस्त ब्रह्मांड उनके चारों ओर विस्तारित होता दिखायी दे रहा था। वो पुनः अपने सभी चक्रों का निरिक्षण कर सकते थे। टेल बोन, जो बमुश्किल आधा इंच की रही होगी, से ही सभी चक्रों का उद्भव हुआ था। इस स्थिति में पता नहीं कहाँ से उनके अवचेतन मन में ब्रह्मा जी की खूँटी प्रकट हो गयी। बच्चा बोल रहा था - ये खूँटी ही ब्रह्माण्ड का केन्द्र है। हर व्यक्ति के पास ये खूँटी है, हर व्यक्ति सेंटर ऑफ़ यूनिवर्स है। जहाँ स्थिर हो कर बैठ गया, वहीं ब्रह्माण्ड का केन्द्र बन जायेगा। 

प्रातः होते ही उन्होंने शारदा देवी से कहा - चलो बिठूर चलते हैं। ब्रह्मा जी की खूँटी के दर्शन करने हैं। 

- वाणभट्ट 

रविवार, 30 जून 2019

ठीकरा

यदि आप के पास समाधान नहीं है तो आप समस्या का हिस्सा हैं। लेकिन आज के युग में ये भी सच है कि यदि आपने किसी सही समस्या को चुन लिया और कस कर जकड़ लिया तो आपका जीवन तर गया समझिये। बाकी दुनिया के लिये आपने जिस समस्या को पैदा कर दिया वो उसी में उलझ के रह जायेगी। यदि आपको देश-दुनिया में आगे बढ़ना है और नाम कमाना है तो आप का काम है एक समस्या को आइडेंटिफाई करना। फिर अपने विचारों-लेखों-व्याख्यानों द्वारा उसके आयाम को इतना विस्तारित करना कि वो समस्या समस्त विश्व की समस्या बन जाये। यदि आप स्वयं समस्या बनाने की क्षमता न रखते हों तो बहुत से ऐसे ग्रूप्स हैं, जिनका काम ही है समस्या खड़ी करना। उनमें शामिल हो जाइये, आपका भव-सागर पार। हर व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य है, अपनी आजीविका की व्यवस्था करना। जब चिंता करना ही आजीविका का साधन बन जाये तो समस्या के समाधान में भला किसकी दिलचस्पी हो सकती है। बात चाहे ग्लोबल वार्मिंग की हो या क्लाइमेट चेंज की। एशिआ-अफ्रीका की बढ़ती जनसंख्या की हो या अतिवंचितों के अधिकार संरक्षण की। गंगा सफाई की हो या शहरों से निकलने वाले कचरे की। ये सब ऐसे मुद्दे हैं जो जग-जाहिर हैं। 

दर्द दो प्रकार के होते हैं - आम और खास। आम दर्द और ख़ास दर्द में बड़ा अंतर होता है। आम दर्द आपका अपना होता है, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ आपको दर्द देता है। जिसके लिये तथाकथित हमदर्द च-च-च करके आनन्दित हो लेते हैं। लेकिन यदि आप अपने दुःख का आयाम बड़ा करने में सफल हो गये तो समझ लीजिये आपने अपनी तरक्की का जैकपॉट हिट कर दिया है। आपकी श्वास समस्या आपकी अपनी समस्या हो सकती है लेकिन उसे वायु प्रदूषण-पर्यावरण से लिंक करके आप उस समस्या को क्षेत्रीय, राष्ट्रीय या वैश्विक बना सकते हैं। समस्या का दर्द इस कदर होना चाहिये कि वो आपकी शख़्सियत से चिपक जाये। लोग देखते ही समझ जायें कि अलां बन्दा वॉटर-सॉयल कंजर्वेशन मैन है या फलां ग्राउंड-वॉटर रिचार्ज के लिए तन-मन से समर्पित है। धन की आवश्यकता न होती तो शायद कोई समस्या भी न होती। दर्द का परिमाण इतना व्यापक होना चाहिये कि आप गर्व से कह सकें  - 

खंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम अमीर 
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है 

अमूमन ऐसा हर समस्या के साथ होता है। समस्या पर आप जितना ध्यान लगाते हैं वो समस्या उतनी ही बड़ी और विकराल होने लगती। समस्या जितनी बड़ी होगी नीति-नियन्ताओं का उतना ही अधिक ध्यान खींचेगी। ये एक अन्तहीन विशियस सर्किल की तरह है। वो समस्या कभी बड़ी नहीं हो सकती जिसका समाधान हो। यदि समस्या का समाधान हो गया तो बेरोज़गारी, जो अभी भी कम नहीं है, सारे रिकॉर्ड तोड़ डालेगी। समस्याओं पर चिन्ता करने से बड़ा कोई रोज़गार नहीं हो सकता। ज़िन्दगी बहुत बड़ी है। यदि समाधान निकाल लिया तो नयी समस्या पैदा करनी पड़ेगी। ऐक्सपर्टाइज़ हासिल करने में जब उम्र जाया हो गयी तो नयी समस्या भला हम क्यों खोजें। नये लोग भी अपनी रोजी-रोटी के लिये नयी समस्या की खोज करें या हमारे पिछलग्गू बन कर अपनी गुजर-बसर का इंतज़ाम करें। कोई आपकी विशेज्ञता को चुनौती न दे दे इसलिये कुछ आधे-अधूरे समाधान आपकी पोटली में होने चाहिये। लेकिन उतना ही जो कुछ आशा की किरण तो दिखाते हों लेकिन पूर्ण समाधान नहीं। यदि आप थोड़ी बहुत पूजा करते हैं तो अपने पूजाघर में ऐसे महापुरुषों के चित्र ज़रूर लगाइये जो ताउम्र समस्या को कलेजे से लगाये, सीने पर चिपकाये जीते रहे और जिस दिन रिटायर हुये अपना सारा रिव्यू ऑफ़ लिटरेचर अलमारियों में भरा छोड़ कर निकल लिये। और तुर्रा ये कि आने वाली नस्लों के लिये जैसे कोई धरोहर छोड़ के जा रहे हों। इनके उत्तराधिकारी समझ नहीं पा रहे हैं उस कबाड़ का करें क्या। इनके इलाज़ करने के तरीक़े का आलम कुछ इस प्रकार रहा -

मरीज़-ए -इश्क़ पर रहमत ख़ुदा की 
मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की 

इस धरती पर एक जीव ऐसा भी है जिसे इंजीनियर कहा जाता है। जब से फ़र्जी कॉलेजों की भरमार हो गयी है हर सड़क चलता व्यक्ति इंजीनियर का मज़ाक उड़ा सकता है। लेकिन यदि दुनिया में कहीं भी कोई समस्या है तो उस समस्या के समाधान के अन्त में अमूमन कहीं न कहीं कोई न कोई टेक्निकल या इन्जीनियर बन्दा खड़ा मिलेगा। दुर्योग से पेट्रीडिश समाधानों के शोध तो हाई रेटिंग इम्पैक्ट फैक्टर वाले जर्नल्स में छप जाते हैं, लार्ज स्केल पर समस्या का निराकरण करने वाले कामों को शायद ही कभी अख़बारों की हेडलाइन नसीब होती हो। प्रॉब्लम खोजुओं का काम है समस्या को उठाना और उठाये रहना। जब कि इन्जीनियर सोल्यूशन ओरिएंटेड होता है। कारण समझ कर उसका निवारण करने के प्रयास में सदैव तत्पर। वो भी सिर्फ़ प्रयोगशाला स्तर पर नहीं। गौर से देखा जाये तो गौर करने वाली बात ये है कि वर्षों से समस्यायें वही की वही हैं, समस्या के समाधान खोजने के तरीक़े आधुनिक होते जा रहे हैं। आधुनिक भी इसलिए हो रहे हैं कि विकसित देशों ने शोध के लिये बहुत से प्रायोगिक उपकरणों का विकास कर लिया है। उनसे टक्कर लेने के लिये वैसे ही उपकरण चाहिये नहीं तो विदेशी शोध पत्रिकाओं में शोधपत्र कैसे छपेगा। जो काम पहले सिर्फ माइक्रोस्कोप से हो लिये उनके लिये अब इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की ज़रूरत पड़ती है। कभी लोग हरकतों से बेटे का बाप पहचान लेते थे अब उसके लिये डीएनए फ़िंगर प्रिन्टिंग कराने की सुविधा है। इन बातों का लब्बोलबाब ये है कि आज भी हमें विकसित देशों का बाज़ार बनना स्वीकार्य है। चाहे वो उन्नत यन्त्र-उपकरण का इम्पोर्ट हो या अपने शोध का विदेशी शोध पत्रिकाओं में प्रकाशन (अक्सर मुद्रा खर्च करके भी)। 

एलार्म की आवाज़ साथ सुबह होने से पहले उठ जाना तापस की आदत सी बन गयी थी। ब्रश करते हुये प्रत्यक्ष रूप से दर्पण में अपनी भाव-भंगिमायें निहार रहा था। लेकिन वास्तविकता में वो अल्ट्राथिन सुपर सॉफ्ट ब्रिसल्स वाले टूथब्रश बनाने की मशीन के बारे में सोच रहा था। इंजीनियर होने के नाते उसकी दिलचस्पी मानव निर्मित हर उस चीज़ में थी जिसने मानव के जीवन को आसान बना दिया हो। आविष्कारों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिसे देखने के लिये सिर्फ़ अपनी दृष्टि को 360 डिग्री घुमाना होगा। एक बार नज़र घुमा कर देखिये, जितनी भी चीज़ दिखेंगी उसमें किसी न किसी इंजीनियर का योगदान अवश्य होगा। यदि सभी चीज़ें ठीक काम कर रही हैं तो भी उसके पीछे कोई न कोई इंजीनियर खड़ा नज़र आयेगा। जहाँ बाकि सब समस्याओं का सलीब उठाये घूम रहे हों वहाँ इंजीनियर ही एक ऐसा प्राणी है जो समस्या से  ज़्यादा समाधान की बात करता है। बॉक्स के अन्दर-बाहर दोनों बातें सोच सकता है।  

कहने को तो तापस एक शोध संस्थान में अभियांत्रिकी वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत था, लेकिन उसकी योग्यता का अधिकतम उपयोग सिविल-इलेक्ट्रिकल-मेकैनिकल कार्यों के लिये किया जा रहा था। आउट ऑफ़ बॉक्स थिंकिंग, जिसका ज्ञान आज का हर मैनेजर दिन में चार बार देता है, तापस में कूट-कूट के भरा था। हर चिरंजीवी समस्या के लिये उसके पास कुछ न कुछ समाधान भी रहता था, लेकिन जब लोगों की समाधान से ज़्यादा समस्या फायदेमन्द हो तो उनके लिये उसका उपयोग सिर्फ़ खिड़की-दरवाज़ा-पाइप-सीवर-लाइट-फैन-एसी रिपेयर कराने से ज़्यादा नहीं था। 

जब तक नौ मन तेल नहीं होता राधाओं की परफॉर्मेंस बिगड़ जाती है। वातानुकूलित कमरों में ही उच्च गुणवत्ता के शोध संभव हैं। कम्प्यूटर और इंटरनेट आज इन्फॉर्मेशन का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है। दैवयोग से अधिकतर आधुनिक उपकरणों को बिजली की आवश्यकता होती है। जिसे मुहैया कराने के लिये बिजली बोर्ड की सप्लाई थी और बैकअप लिये जनरेटर भी लगा था। बिजली एक ऐसा तेल था जो अनेक प्रयोजनों के बाद भी कभी न कभी साथ छोड़ सकता है। जैसे इंजन को ठण्डा लिये कूलेंट की दरकार होती है, वैसे ही ग्लोबल वार्मिंग के ज़माने में दिमाग़ को ठण्डा रखने के लिये एसी की रिक्वॉयरमेंट होती है। दिमाग़ के लिये रूरी है इसका ठण्डा रहना। नहीं तो गर्मी निकालने के लिये लोग जो करेंगे उससे उनके सहकर्मियों लिये नयी समस्या खड़ी हो सकती है। इंजीनियर की ज़रूरत सभी को है लेकिन एक सपोर्टिंग रोल में। एक सहयोगी की तरह नहीं, एक तुरन्त हुक़्म मानने वाले जिन्न की तरह। पे-कमीशनों से समृद्धि इस कदर बढ़ गयी हो कि लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि पैसा म्युचुअल फंड में डालें या जीपीएफ में या कोई ज़मीन ही खरीद डालें। इस चक्कर में पूरा घर गैजेट्स से भर चुका है। पुनः इनको मेंटेन करने के लिये टेक्निकल आवश्यकतायें होंगी। जो लोग जीवनदायक डॉक्टरों की इज़्ज़त नहीं कर सकता वो भला इंजीनियर को क्या भाव देगा। डॉक्टर-इंजीनियर से कर्तव्य निर्वहन की उम्मीद रखना गलत नहीं है। लेकिन गुज़ारिश कुछ अदद इज़्ज़त की है। डॉक्टर को तो इज़्ज़त फिर भी मिल जाती है क्योंकि बीमारियों और दवाइयों के नाम बड़े कठिन और टेढ़े होते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान का हर बन्दा पैदायशी इंजीनियर होता है। सड़क-पुल-बिजली-मकान हर चीज़ पर इंजीनियर को राय दे सकता है। कुछ लोग तो एक मकान बनवा कर ही सिविल इंजीनियर से ज़्यादा जान गये। कुछ कार की सर्विसिंग करा कर ही ऑटो एक्सपर्ट बन गये। लेकिन यकीन मानिये यदि इंजीनियर एक दिन की हड़ताल कर दे तो स्थिति डॉक्टरों की हड़ताल से भी बदतर हो जाये। पैसों से सुख-सुविधाओं के जितने टंटे इकठ्ठा कर रखे हैं सब घंटा हो जायेंगे।  

अपनी पीएचडी के विषय को लेकर तापस अपने एक सीनियर शर्मा जी से मिला। इंजीनियर बन्दा सोच भी क्या सकता है। एक समस्या और उस समस्या के समाधान हेतु मशीन बनाने की बात थी। सीनियर ने जता दिया कि उसके बाल धूप की वजह से नहीं झड़े हैं, कुछ तजुर्बा भी हासिल किया है। वे बोले - "देख भई मशीन बनायेगा तो दो बातें होंगी। या मशीन चलेगी या नहीं चलेगी। चल गयी तो ठीक, लेकिन यदि नहीं चली तो तेरी पीएचडी लटक जायेगी। कुछ ऐसी प्रॉब्लम उठाओ जो सार्वभौमिक टाइप की हो। सारी दुनिया उसी समस्या पर लगी पड़ी हो। तुम भी उसी पर लग जाओ। वो सारे मिल कर इतने सालों से कद्दू में तीर नहीं मार पाये तो तुम क्या ख़ाक तीर मारोगे। बस पीएचडी हो जायेगी। शोध के लिये तो ज़िन्दगी पड़ी है। ग्लोबल वार्मिंग मेरा एक पसंदीदा मुद्दा है। जिसका समाधान एक न एक दिन शायद प्रकृति से ही निकल कर आयेगा। जब तक ये मुद्दा ज़िन्दा रहेगा हमारे शोधपत्र 10-12 रेटिंग के जरनल में छपते रहेंगे, पीएचडियाँ होती रहेंगी और इस मिशन में जुटे लोग वैश्विक स्तर पर चिंता की अभिव्यक्ति के लिये देश-दुनिया के खूबसूरत शहरों के खूबसूरत रिसॉर्ट्स में सेमीनार और सिम्पोजियाज़ के बाद ख़ुशनुमा शाम के लिये मिलते-जुलते रहेंगे। तुम्हें भी कुछ इस प्रकार की समस्या लेनी चाहिये। थोड़ी मैथेमैटिकल मॉडलिंग लगा देना, काम हो गया। अर्जुन ने जिस तरह मछली की आँख पर निशाना साधा था, तुम्हारा ध्यान बस पीएचडी पर होना चाहिये। बाकि होइहैं वही जो राम रची राखा।" आखिरी वाक्य ने वैज्ञानिक सोच पर आध्यात्मिकता का जामा चढ़ा दिया। विज्ञान चाहे कहीं पहुँच जाये भगवान के बिना यहाँ कुछ नहीं हो सकता। भला बताइये ऐसी महान सोच रखने वाले महापुरुषों के प्रति कोई ख़ुद को साष्टांग दण्डवत करने से कैसे रोक सकता है। 

इस विषय पर शोध करते-करते तापस को इतना तो पता चल गया था कि ये मानव निर्मित समस्या है और इसका निदान भी इंसान के हाथ में है। ग्लोबली चिन्ता करना छोड़ कर कुछ-कुछ लोकली एक्ट करना पड़ेगा और सबको करना पड़ेगा। ईटिंग-मीटिंग-चीटिंग से कुछ होने वाला नहीं। क्लाइमेट चेंज पर आप अनुसन्धान कर सकते हैं, पेपर छाप सकते हैं लेकिन समाधान के लिये हक़ीक़त की जमीन पर कुछ करना पड़ेगा। पेड़ लगाना, वॉटर कन्ज़र्वेशन, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, ग्रांउड वॉटर रिचार्ज, हरनेसिंग रिवर वॉटर आदि सोल्यूशन सबको मालूम हैं लेकिन अमल में लाने को हर कोई तैयार नहीं है। यदि आपने पानी समुचित संरक्षण कर लिया तो समझिये ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ आपने एक बड़ी जंग जीत ली। पानी की उपलब्धता से प्रकति के कोप को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। कम से कम जो लोग इस विषय के प्रति सजग हैं उन्हें तो अनुकरणीय उदाहरण पेश करना चाहिये। 

अनुभवी सीनियर शर्मा जी ने अक्सर मुलाकातें हो जाया करती थीं। एक दिन उन्होंने सूचित किया - भाई अपना रिटायरमेंट अब नज़दीक है, सो जितनी कॉन्फ्रेंस ग्लोबल वार्मिंग या क्लाइमेट चेंज पर होनी हैं उनमें मेरी सहभागिता ज़रूरी है। बाद में अपना योगदान देने का पुनीत अवसर मिले न मिले। तुम्हें तो अभी बहुत नौकरी करनी है तब तक शायद मौसम अपना सायकिल पूरा करके वापस लौट आये। हो सकता है एक बार फिर आइस-एज आ जाये बस पृथ्वी के अक्ष में हल्का टिल्ट चाहिये। वैसे अपने प्रयास जारी रखने में कोई बुराई नहीं है। कुछ पेपर आ जायेंगे तो प्रमोशन में फायदा ही देंगे। हाल ही में मुझे एक प्रोजेक्ट मिल गया है। कुछ ऐसी प्रजातियों का विकास करेंगे जिन पर ग्लोबल वार्मिंग का असर न हो। चाहो तो तुम भी इसमें शामिल हो जाओ। 

तापस को ये भली भाँति मालूम है कि यदि इन्वेस्टमेंट पानी और भूमि के संरक्षण पर किया जाये तो ग्लोबल वार्मिंग से तो नहीं लेकिन उसके प्रभाव से जरूर बचा जा सकता है। बहुत से प्रैक्टिकल सोल्यूशंस हैं। कुछ तथाकथित रूप से पिछड़े देशों ने बिजली की खपत कम करने और डे लाइट का अधिक उपयोग करने के लिये ऑफिस का टाइम ही बदल कर सुबह सात बजे का कर दिया। चाहे कोई कितनी भी उन्नत प्रजाति विकसित कर ले, बिना जल और मृदा प्रबन्धन के उनका भविष्य व्यक्तिगत उपलब्धियों तक ही सीमित है। लेकिन एकांगी सोच ने पूरे शोध की दिशा ही पलट रखी है। हर कोई अपनी-अपनी विशेषज्ञता लिये घूम रहा है। एक मेज़ पर बैठने का न तो किस के पास समय है, न मौका, न दस्तूर। सबको अपनी-अपनी पड़ी है। तुर्रा ये है कि बढ़ती आबादी को खाना खिलाना है, वो भी कम पैसे में। साथ ही किसान की आय को भी बढ़ाना है। बिना माँगे राय देना भी इंजीनियरों की एक बीमारी ही है। तापस ने राय दी कि सर आपका ये काम अत्यंत महत्वपूर्ण है इसलिये आप अपना एक इंडिपेंडेंट पावर बैकअप रखिये। ताकि बिजली की समस्या न हो। स्टेट बोर्ड की बिजली या सेंट्रल जनरेटर पर कुछ हद तक तो निर्भर किया जा सकता है लेकिन डबल अश्योर के लिये अपनी लैब के लिये भी एक जनरेटर होना चाहिये। 

तापस के पास समस्या को गहरे देखने की क्षमता थी। उसका ध्यान समस्या से ज़्यादा समाधान की ओर लगा रहता था। उसके अधिकारियों, जिनका मुख्य ध्येय बजट को हिल्ले लगाना होता था, के लिये ये एक बड़ी समस्या थी। उन्हें राय देने वाले इंजीनियर कतई पसंद नहीं। इंजीनियर का उपयोग वहीं तक ठीक है जब तक वो हुक़्म बजाता रहे। वर्ना ये फील्ड इतनी विस्तृत और अप्प्लाईड है कि किसी भी कारण से किसी को फेल सिद्ध किया जा सकता है। शोध बिजली की कमी से बाधित हो सकता है, मुख्य वक्ता के अभिभाषण वक़्त ऑडिटोरियम का पीए सिस्टम दग़ा दे सकता है। ऐसे कोई भी कारक काफी हैं। हर कोई समाधान की खोज में लगा है बगैर इंजीनियर के। ख़ास बात ये है कि शोध की समस्याओं का समाधान इंजीनियरिंग के बिना असंभव है, लेकिन इतिहास गवाह है, इंजीनियर कभी भी किसी भी मौलिक शोध का हिस्सा नहीं होता है। उसका काम है बस बाकी शोधकर्ताओं के लिए नौ मन तेल का इंतज़ाम करना।  

शर्मा जी ने मुखर होते हुये कहा - बेटा तापस कुछ सुधर जाओ। जब तीस साल में कुछ नहीं निकला तो अब तीन साल में क्या ख़ाक निकलेगा। अभी का टारगेट है प्रोजेक्ट का बजट कन्ज़्यूम करना। कुछ टूर-वूर करने हैं। देश-दुनिया में क्या हो रहा है इसकी जानकारी लेते-लेते तीन साल भी निकले समझो। यदि सहयोगियों की सहायता से कुछ शोध हो गया तो दो बातें होंगी। या तो कुछ कंक्रीट निकल के आयेगा या नहीं निकलेगा। निकल गया तो ठीक। नहीं निकला तो कुछ न कुछ तो होना चाहिये ठीकरा  फोड़ने के लिये। लैब के जेनरेटर के बारे में सोचना भी मत। बिजली से अच्छा कोई ठीकरा है भला हमारे प्रदेश में?

- वाणभट्ट  

रविवार, 19 मई 2019

साँड़ 

अगल-बगल में सब बेतहाशा दौड़े चले जा रहे थे। उसने भी आव देखा न ताव भाग लिया। और सबको पछाड़ते हुये वो लक्ष्य तक सबसे पहले पहुँच गया। दौड़ तो ऐसे लगा रहे थे जैसे कोई लड्डू मिलने वाला हो। लेकिन कैद हो कर रह गया। अब पछता रहा है कि वो लोग ज़्यादा स्मार्ट थे जो रेस में धीरे-धीरे दौड़ रहे थे। लेकिन जब दौड़ लगी हो तो आम और अमरुद में यही फ़र्क रह जाता है। आम दौड़ लेता है, ख़ामख़्वाह, और अमरुद किनारे खड़ा हो कर रेस का आनन्द लेता है। एक अनार हो और तलबग़ार ज़्यादा तो खामख्वाह दौड़ना ज़रूरी भी हो जाता है और मजबूरी भी। इस प्रकार पण्डित राम नरेश ने अपनी माँ के गर्भ में प्रवेश किया। 

जब पण्डिताइन ने गुड न्यूज़ दी तो पहले से ही तीन बच्चों के पिता बन चुके पण्डित बाँके बिहारी सोच में डूब गये। यहाँ वो अपने आवा-गमन से मुक्ति के चक्कर में लगे पड़े हैं और बच्चे हैं कि एक के बाद एक लाइन लगाये खड़े हैं। लेकिन नियति के खेल में वो किसी प्रकार का व्यवधान भी नहीं डालना चाहते थे। आने वाले को भला कोई रोक पाया है। चलो एक बार फिर से डॉक्टर के चक्कर शुरू। पहले भी वो ये सब देख चुके थे। डॉक्टरनी ने कुछ झिड़कते हुये कहा - "फिर आ गये। आजकल ज़माना एक बच्चे पर पर शिफ्ट कर गया है और आप हैं कि रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। अपना नहीं तो अपनी पत्नी का ही ख्याल कर लीजिये। चार-चार बच्चों को सम्हालना कोई मज़ाक नहीं है। एनी वे मुबारक़ हो आप एक बार फिर बाप बनने वाले हैं।" पंडित जी भला क्या बोलते। गलती तो हो गयी। गर्भ में राम नरेश ये जान कर कुछ दुःख ज़रूर हुआ होगा कि उसे माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध  इस धरा पर अवतरित होना होगा। लेकिन मन को सान्त्वना देने के अलावा वो कर भी क्या सकता था। जो हुआ सो हुआ हुआ। 

पिछले चार-पाँच सालों में ये लेडी डॉक्टर पण्डित और पण्डिताइन के लिये फैमिली डॉक्टर जैसी बन चुकी थी। लेकिन डॉक्टर के लिये उसका पेशेन्ट मात्र एक पेशेन्ट ही होता है। चाहे वो उससे कितना ही प्यार से बात करे लेकिन उसके लिये पेशेन्ट एक सब्जेक्ट से अधिक नहीं होता। उसको अपनी श्रमसाध्य चिकित्सकीय ज्ञान को कहीं न कहीं तो उड़ेलना ही है।और सोने पर सुहागा ये कि इसके लिये सब्जेक्ट मोटी फ़ीस देने को तैयार बैठा है। दवाई कम्पनियाँ-पैथोलॉजी लैब्स-रेडिओलॉजी से मिलने वाला तगड़ा कमीशन इन डॉक्टरों को समाज सेवा करते रहने के लिये निरन्तर प्रेरित करता रहता है। डॉक्टरनी ने आनन -फानन में अपने पैड पर कुछ धारा प्रवाह लिखना शुरू कर दिया। लिखना समाप्त करते हुये कहा मैंने कुछ दवाइयाँ और टेस्ट लिख दिये हैं। राजेश्वरी को ये दवाइयाँ बराबर चलनी हैं। अगली बार आना तो अल्ट्रासाउंड और बाकि टेस्ट कराते लाना। अपने धीर-गंभीर चेहरे पर बिनाका स्माइल चेपते हुये बोली - "बाँके जी दिस इज़ माई बेबी। आपको राजेश्वरी का पूरा ख्याल रखना होगा। बाय राजेश्वरी विश यू ऑल थे बेस्ट, टेक केयर।" फ़ीस पहले ही रिसेप्शन पर जमा कराने के अपने लाभ हैं। एक तो अपनी बारी के इन्तज़ार में पेशेन्ट का सब्र जवाब नहीं देता और दिखाने के बाद उसका कीमती समय व्यर्थ नहीं होता। 

डॉक्टर के कम्पाउंड में स्थित दवाइयों का जब भरी-भरकम बिल मिला तो पण्डित जी को आभास हो गया कि ये बच्चा बाकि बच्चों से मँहगा पड़ने वाला है। पहली बार उन्हें लगा कि डॉक्टरों ने प्रजनन की एक समान्य प्रक्रिया, प्रेगनेंसी को भी बिमारी बना डाला है। कई तरह के इंजेक्शंस, मल्टीविटामिन कैप्सूलों के पत्ते और सिरप जब पण्डिताइन को मिले तो उन्हें कुछ ख़ुशी सी महसूस हुयी। चलो परमेश्वर के पापा कुछ महीने तो उसका ख्याल ठीक से रखेंगे। बच्चे इधर-उधर से आ-आ कर उन दवाइयों के चमकते फॉइल्स से खेलना चाह रहे थे। इसलिये दवाइयों को सुरक्षित रखना ज़्यादा ज़रूरी था। पति-पत्नी बिना नागा जाँच के डॉक्टरनी दीदी के यहाँ जाते रहे। पण्डित जी ने राजेश्वरी के रख-रखाव की पूरी जिम्मेदारी को सहजता से वहन कर लिया था। क्या घर क्या बाहर सब उन्ही ने सम्हाल लिया। बाहर तो कोई भी सम्हाल ले लेकिन तीन बच्चों और एक प्रेगनेंट पत्नी को सम्हालना कोई हंसी खेल तो था नहीं। लेकिन पण्डित जी इस कार्य का निर्वहन भी बखूबी करने लगे। डॉक्टरनी ने भी पूरा ठेका ले रखा था। कब अल्ट्रासाउंड होना है, कब दवाइयों और इंजेक्शन का डोज़ बढ़ाना है। दिन नज़दीक आते जा रहे थे और पण्डित जी की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। अन्तिम तीन महीनों में जब कम्प्लीट बेड रेस्ट बताया तो पण्डिताइन को खुद लगने लगा कि वो बीमार हो गयी हैं।

चाक़ू-कैंची की आवाज़ सुन कर राम नरेश का मन बाहर निकलने का नहीं हो रहा था जबकि वो इस घडी का महीनों से इंतज़ार कर रहा था। डॉक्टरनी ने पण्डित जी को बता दिया था कि पोथा-पत्रा बिचरवा लीजिये बच्चा तो सिज़ेरियन ही होगा इसलिये एकदम मुहूर्त के हिसाब से डिलीवरी करा देंगे। अमूमन इंसान के पास चॉइस सिर्फ़ हाँ और ना की ही होती है लेकिन डॉक्टर के सामने तो ना की गुंजाईश भी नहीं बचती। मुहूर्त के अनुसार तमाम अनिच्छा के बावज़ूद राम नरेश को बाहर आना पड़ा। आते ही पता चला बच्चा अंडरवेट है इसलिये इन्क्यूबेटर में रखना है थोड़ा बहुत पीलिया के लक्षण भी हैं इसलिये आर्टिफिशियल लाइट एक्सपोज़र भी दिया जायेगा। बच्चे को पता नहीं कौन-कौन से इंजेक्शन लगा दिए गये। राजेश्वरी जब राम नरेश को गोद में लेकर अस्पताल से बाहर निकलीं तब तक बांके बिहारी 15-20 हज़ार के लपेटे में आ चुके थे। टीकाकरण की एक पूरी फ़ेहरिश्त पकड़ा दी गयी थी जिसमें डिटेल था कि कब-कब कौन सा टीका कितनी बार उस छोटे से बच्चे को लगना है। और एक भी टीका छूटा तो ये देश और समाज के प्रति विश्वासघात से कम नहीं माना जायेगा। एक जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिये माँ-बाप का ज़िम्मेदार होना ज़रूरी है। ये बात अलग है कि माँ-बाप ज़िम्मेदार ही होते तो चौथे की नौबत ही क्यों आती। 

इस तरह राम नरेश का धरती पर पदार्पण तो हो गया। भगवान या अल्लाह या जीसस को ज़रूरत से ज़्यादा मानने वाले देश में हर किसी को ये भरम पालने का अधिकार है कि उनके अवतरण का कोई न कोई विशिष्ठ प्रयोजन पहले ही नियत कर रखा है। जिंदगी के पचास बसन्त गुजरने के बाद पण्डित राम नरेश को ये आभास हो चुका है कि और कोई सार्थक प्रयोजन प्रभु ने आपके लिए भले ही न सोच रखा हो लेकिन जाने-अनजाने आपके जीवन का एक उद्देश्य बन गया है - देश के डॉक्टरों की दुकान चलाना। ये डॉक्टर अंग्रेजी से लेकर देशी तक कुछ भी हो सकता है। फर्क बस इतना है कि यदि बीमारी का नाम अंग्रेजी में हो तो जेब कुछ ज़्यादा ढीली करनी पड़ सकती है, डॉक्टर के लिए भी और दवाई के लिए भी। वर्ना ऐसे डॉक्टरों की कमी भी नहीं है जिन्होंने किचन में रखे मसालों (जड़ी-बूटियों) से कैंसर तक का इलाज़ कर डाला है। अपने माता-पिता, श्रीमति राजेश्वरी और श्री बांके बिहारी, के इलाज़ के चक्कर में पण्डित राम नरेश का पूरे शहर के हर विधा में नामी-गिरामी (कुछ कम नामी-गिरामी भी) डॉक्टरों से सबाका पड़ चुका था। माता-पिता जी को विभाग की ओर से हर प्रकार के मेडिकल खर्च के रिम्बरस्मेंट सुविधा सुनिश्चित थी। इसलिये उन्होंने कभी सरदर्द के ठीक होने का इंतज़ार नहीं किया। जब भी दर्द उठा, सर उठाया और डॉक्टर के सामने खड़े हो गये। अब इतना हाइली क़्वालिफ़ाइड डॉक्टर इलाज न करे तो लानत है उसके एनाटॉमी-फिजिओलॉजी-मेडिसिन के ज्ञान पर। ये बात अलग है कि अक्सर दवाइयों के डोज़ को देख कर सरदर्द अपने आप भाग जाया करता था। डॉक्टर को भी ये भान था कि पैसा इनकी जेब में वापस आ जायेगा इसलिये उसने भी कभी फ़ीस लेने और दवाई लिखने में कोई कोताही नहीं की। 

इलाज़ कराते-कराते पंडित राम नरेश को भी ये ज्ञात हो गया था कि आज सर में दर्द होगा तो कल पेट में, फिर आँख में, फिर कान में, फिर दाँत में, फिर नाक में, फिर गले में, फिर हार्ट में। और फिर कुछ और ऐसे ही फिरों के बाद फिर सर में दर्द होना शुरू हो जायेगा। पूरा एक चक्र है जो छः महीने में पूरा हो जाता है। लेकिन सब डॉक्टरों के लिये ये नियमित ग्राहक थे। यदि छः महीनों में किसी के यहाँ न पहुंचो तो उनका चिन्तित हो जाना लाज़मी था। जैसे मोहल्ले में परचून की दूकान वाले को पूरा पता होता है कि पण्डित जी के यहाँ आटा पन्द्रह दिन चलता है। सोलहवां दिन आते न आते उसका इन्तज़ार शुरू हो जाता है। यदि गलती से आटा अट्ठारह दिन चल गया तो वो पूछ लेता है पंडित जी कहीं बाहर गए थे क्या? कहने का आशय सिर्फ इतना है कि डॉक्टरों के लिये ये फैमिली मेंबर की तरह हो गए थे। और तो और दवाई की दुकान वाला भी डिस्काउंट के साथ दवाई घर तक पहुँचा जाता। लेकिन पण्डित राम नरेश को सदैव ये संशय रहा कि इतने नामी-गिरामी डॉक्टर्स बीमारी का इलाज़ कर रहे हैं या बुढ़ापे का। बुजुर्गों के मेडिकल पैरामीटर्स वयस्कों से मैच करें ये शायद संभव कभी न हो। लेकिन मामला पेरेंट्स का था इसलिये वो कुछ कह भी न पाते। पेरेंट्स को उनके नालायक होने का जो संशय बचा था वो बना रहना ज़रूरी था।  

दिन ऐसे ही हंसी-ख़ुशी मज़े में कट रहे थे। जब पण्डित राम नरेश के मोहल्ले में एक साँड़ ने प्रवेश किया। चूँकि उनके मोहल्ले में अधिकांश लोगों ने घर क्या फुटपाथ तक के एक-एक इंच हिस्से को सीमेंट-कंक्रीट से कवर कर रखा था, इसलिये उस साँड़ को दिन में दरकार होती थी एक छाँव की। पण्डित जी ने घर के बाहर फुटपाथ पर कुछ पेड़ लगा रखे थे इसलिये वो साँड़ जब घूम-फिर के थक जाता तो उन स्थापित पेड़ों की छाया में बैठ जाता। निराश्रित गायों को कुछ लोग रोटी भले डाल देते हों लेकिन साँड़ को कभी किसी ने रोटी डालते न देखा था। साँड़ की चाल-ढाल बहुत ही गरिमामय थी। उसे किसी बात की जल्दी नहीं होती थी। उसे मालूम था कि पूरा दिन पड़ा है टहलने को। जल्दी या तेज़ चलने से कुछ नहीं होने वाला। समय अपने हिसाब से ही चलेगा। इसलिये जब मर्ज़ी होती चलने लगता और जब मर्ज़ी हो बैठ जाता। अक्सर वो इन्हीं के घर के सामने बैठता।  निर्विकार भाव, न सुक्खम न दुःक्खम, उसके चेहरे पर सदैव व्याप्त रहता। इसी लिये मानव जीवन में लोग भीषण से भीषण योग साधना करने को तत्पर रहते हैं। उसे देख कर ऐसा लगता मानो कोई तपस्वी निरन्तर अपनी साधना में लीन हो। पण्डित राम नरेश को साँड़  की ये निर्लिप्त पर्सनालिटी प्रेरणा देती।

पण्डित राम नरेश के ऑफिस में भी वार्षिक हेल्थ चेकअप कम्पलसरी कर दिया गया था। कम्पनी जब अपने अधिकारी पर प्रति माह इतने रुपये इन्वेस्ट कर रही है तो उनको भी तो ये मालूम होना चाहिए कि ये घोडा दाँव लगाने लायक बचा भी है या नहीं। देश-विदेश की ट्रेनिंग और सुविधाएं देने के बाद यदि बन्दा समय से पहले टाँय बोल गया तो सारा इन्वेस्टमेंट बेकार। बहरहाल टेस्ट के नाम से पण्डित जी के शरीर से इतना खून निकाल लिया गया कि पण्डित जी कुछ दिनों तक खुद को साइक्लॉजिकली कमज़ोर समझने को विवश हो गये। अल्ट्रासाउण्ड से उन-उन बीमारियों को चुन-चुन के खोजा गया जिनकी पण्डित जी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। जैसे मैकेनिक के पास जाइये तो वो नयी से नयी कार में भी डिफेक्ट निकालने का माद्दा रखता है। वैसे ही मेडिकल टेस्ट की कोई रिपोर्ट सही आ जायेगी इसकी गुंजाईश कम ही रहती है। क्या जवान क्या बूढ़े, कोई भी इम्प्लॉयी 'ए' ग्रेड में नहीं पास हो सका। जिन्हें 'बी' ग्रेड मिला था वो 'डी ' और 'ई'  ग्रेड वालों को ऐसे देख रहे थे जैसे उन्होंने इसके लिये कोई कॉम्पटीटिव एग्जाम दिया हो। 

कंसल्टेशन के दिन डॉक्टर के सामने जाने में पण्डित जी को उसी तरह घबराहट हो रही थी जैसी किसी एग्जाम के रिज़ल्ट के निकलते समय हुआ करती थी। रैगिंग के दौरान मुस्कान काटने की भी एक ट्रेनिंग हुआ करती थी। पण्डित जी को अब समझ आया कि ये ट्रेनिंग क्यों दी जाती थी। यदि आप मुस्कुरा कर कोई गंभीर बात बोलेंगे तो लोग उसे हल्के में लेंगे। केबिन के अन्दर डॉक्टर ने जब सीरियसली बोलना शुरू किया तो एक पल के लिये पण्डित जी को लगा कि ये वचन स्वयं यमराज जी के श्रीमुख से फूट रहे हैं। "देखिये राम नरेश जी आपके पिता जी को हाइपरटेंशन था, डायबिटीज़ थी इसलिये आपको भी ये सब होने की सम्भावनायें हैं। आपका ब्लडप्रेशर भी हायर साइड में है। इसलिये आपको अभी से प्रिकॉशन्स लेने पड़ेंगे। ब्लडप्रेशर की एक दवाई आपको लिखनी ही पड़ेगी।" पण्डित जी को मालूम था कि डॉक्टरों के चक्कर व्यर्थ नहीं जाते। वो इलाज़ ऐसे ही शुरू करेंगे। आज एक गोली फिर धीरे-धीरे पन्द्रह कैप्सूल। उन्होंने पेरेन्ट्स के इलाज़ का अच्छा-खासा तजुर्बा हो रखा था। जब डॉक्टर ने बताया कि उनकी रिपोर्ट 'बी' है, तो पण्डित जी के चेहरे पर एक मुस्कान सी तैर गयी। डॉक्टर बुरा मान गया। उसे लगा राम नरेश उसकी बात को संजीदगी से नहीं ले रहा है। "देखिये आप पचास के ऊपर हैं। थोड़ा हाइपरटेंसिव भी। उम्र के साथ नसें कमज़ोर हो जाती हैं। जैसे गार्डेन वाला रबर का पाइप स्टिफ हो जाता है वैसा ही धमनियों के साथ भी होता है। प्रेशर बढ़ गया तो कौन सी नस कहाँ से फटेगी पता भी नहीं चलेगा।" डॉक्टर ने कुछ दवाइयाँ लिख कर पर्चा पण्डित जी को थमा दिया। 

पण्डित जी बालकनी में बैठे थे जब उन्हें पेड़ के नीचे साँड़ के बैठे होने की आहट हुयी। उन्होंने सोचा इस साँड़ ने भी अपनी माँ के गर्भ तक पहुँचने के लिये तेज दौड़ लगायी होगी। इसका और इसकी माँ के इलाज़ के लिये पता नहीं कोई डॉक्टर था भी या नहीं। इसके भी कोई टीका लगा या नहीं। दिन भर चलते-चलते इसको भी दर्द होता होगा। न कोई बाम या न कोई एनासिन। किसी को तो इसकी भूख की चिन्ता भी नहीं। न कोई ठाँव न कोई ठौर। यहाँ डॉक्टर आदमी का इलाज़ कर-कर के परेशान हो रखे हैं। उन्हें ये भी पता नहीं कि बीमारी का इलाज़ कर रहे हैं या उम्र का। कोई ये नहीं कहता कि बाल जो झड़ गये हैं वो उम्र का तकाज़ा है, वो नया उगाने के नुस्ख़े बताने में व्यस्त हैं। पाइप स्टिफ भी होगा और फटेगा भी, लेकिन पाइप की उम्र के बाद। यहाँ इलाज़ कराने के लिये पैसा है, ख्याल करने के लिए परिवार में सदस्य हैं, तो डॉक्टर्स का प्रोफ़ेशन फल-फूल रहा है। इस साँड़ के न तो आगे कोई है न पीछे। न उसके पास पैसा है इलाज़ के लिये। यदि साँड़ को बोलने का सौभाग्य भगवान एकाएक दे दे तो यकीन मानिये उसका दर्द बयां करने को लिए शब्द कम पड़ जायें। 

पण्डित राम नरेश बालकनी से उठे और फ्रिज से ब्रेड का पूरा पैकेट लेकर नीचे उतर आये। शायद ये पहली बार होगा जब किसी ने किसी लावारिस साँड़ को रोटी डाली होगी। 

-वाणभट्ट 


रविवार, 21 अप्रैल 2019

बेचारा

जब से चारा चोरी का घोटाला सामने आया है यकीन मानिये दुनिया से यकीन उठ सा गया है। चारा चोर अब बेचारे से बने घूम रहे हैं। गोया घोटाले तो हर विभाग में वर्षों से होते रहे हैं और होते रहेंगे। इसके पहले तो किसी को सजा मिली नहीं। ये विपक्षी सरकार क्या बनी हमको टारगेट करके फँसा दिया गया। ये अन्याय  पराकाष्ठा है। अब तो तभी दोषमुक्ति मिलेगी जब कोई लंगड़ी-लूली सरकार सत्ता में आयेगी। प्रायश्चित करना तो अपनी फितरत में नहीं है। मुझे दण्डित करना है तो जाओ उन सबको पकड़ के लाओ जिन्होंने अब से पहले इस भ्रष्टाचार की परिपाटी को सिंचित और पोषित किया। यदि वो छुट्टे घूम रहे हैं या उहलोक गमन कर चुके हैं तो थोड़ा सब्र मेरे लिये भी रख सकते हैं। 

जब चारे का ज़िक्र हो ही गया है तो ये बताना भी ज़रूरी है कि पूरे देश कि अर्थव्यवस्था तो बेचारे लोगों पर ही टिकी है। सरकारों को टैक्स चाहिये ताकि बेचारों को रोटी-कपडा-मकान मिल सके। ये बात अलग है कि देश के अन्तिम बेचारे की फ़िक्र में सरकारी महकमों के लोग दिन-दूनी रात चौगुनी तेज़ी से फल भी रहे हैं और फूल भी। ये फूल फ्लावर वाला फूल नहीं है।  ये फूल वो फूल है जो बेल्ट के बाहर लटकते पेटों से झलकता है। कुछ लोग उसे तोंद कहने की गुस्ताख़ी भी कर देते हैं। दरअसल देश के बेचारों की सेवा में ये तन-मन से इस कदर लगे हुये हैं कि अपनी सुध-बुध ही नहीं रहती। धन तो बरसता ही रहता है। सेवा करोगे तो मेवा मिलेगा ये शाश्वत नियम है। जब देश सेवा का संकल्प ले लिया और उसके लिये एक ऑल इण्डिया इम्तहान पास कर कुर्सी पर कब्ज़ा कर लिया तो अब दस्तूर भी है उस पर बैठे रहने का। इस प्रॉसेस में अपने लिये समय कहाँ मिलता है वर्ना हम भी नब्बे साल के मिल्खा सिंह की तरह कुलाँचे मार रहे होते। इससे महान त्याग कोई हो सकता है भला। 

जरा सा गौर कीजिये तो साफ दिखायी देता है कि देश में हर कोई शिक्षा सिर्फ इसलिये पाना चाहता है ताकि वो देश और देशवासियों की सेवा कर सके। कामों की कमी तो कहीं नहीं है लेकिन हमें नौकरी करनी है। वो भी सरकारी तभी हम जन-जन की सेवा कर पायेंगे अन्यथा कोई अम्बानी-अडानी हमारी योग्यता का नाज़ायज़ लाभ उठा के अमीर बन जायेगा। अब जिन्हें देश की चिंता नहीं हो, जिन्हें पैसे की ज़्यादा भूख हो वो टाटा-बिरला के लिये काम करे, हम तो इतना रगड़-घिस के जो डिग्री लिये हैं वो पैसा कमाने के लिये थोड़ी न है। हमें सेवा का अवसर देना सरकार का कर्तव्य है और हमारा अधिकार। हमें सरकारी नौकरी मिले तभी हम अपने और देश के दरिद्दर दूर कर पायेंगे। यूंकि गौर करने वाली बात ये है कि जिन्हें दूसरों के दरिद्दर दूर करने हैं पहले वो अपने दरिद्दर दूर करने पर आमादा हैं। ये बात अलग है कि अपने दरिद्दर दूर करते-करते अपनी भावी सात पुश्तों की चिन्ता करना भी आवश्यक हो जाता है। अपने भाई-बन्धु का भला कर भी दिया तो वो इस जन्म उस एहसान को तो उतार नहीं सकते। तो फिर अपनी अगली पीढ़ी के बारे में कुछ करने में क्या बुराई है।

देश सेवा का ऐसा ज्वर हर दिशा में देखा जा सकता है। चाहे वो शिक्षा हो, अभियांत्रिकी हो, स्वास्थ्य हो, राजनीति हो या कृषि। चूँकि मै कृषि से जुड़ा हुआ हूँ तो मै देखता हूँ यहाँ समाज और देश सेवा की अपरिमित सम्भावनायें हैं। 60 प्रतिशत लोग मिल कर देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में मात्र 15 प्रतिशत का योगदान कर पाते हैं। देश में स्माल और मार्जिनल (लघु और सीमान्त) किसानों की संख्या लगभग 85% है जिनके हिस्से खेती योग्य भूमि का मात्र 45% भाग ही आता है। स्थिति और चिंताजनक हो जाती है जब पता चलता है कि 85% कृषक परिवार कृषि आय का मात्र 9% ही अर्जित कर पाते हैं जबकि बाकी 15% के हिस्से 91% आय आती है। ऐसे में देश के लघु और सीमान्त किसानों की चिंता करना सभी समाज और देश प्रेमियों का परम कर्तव्य बन जाता है। चूँकि यही वो लोग हैं जिनकी चिन्ता नेता चुनाव आते ही और अफसर चुनाव जाते ही करनी शुरू कर देते हैं। विश्व में भी बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय संस्थायें सिर्फ़ अफ्रीका और एशिया के लघु सीमान्त किसानों की समस्याओं का निदान और उनकी आय में वृद्धि के लिये वर्षों से कृतसंकल्प हैं। इस पुनीत कार्य में उन्होंने देश-दुनिया के कितने ही कोने-अतरों में न जाने कितने सेमीनार-सिम्पोजिया कर डाले। ये बात उन बेचारे कृषकों को शायद ही पता चल सके। बेचारा शब्द किसी को कह दो तो उसे खुद अपने ऊपर दीनता की फिलिंग आने लगती है। लेकिन हर वह शख़्श बेचारा है जिसके चारे की चिन्ता दूसरे करने लगें। बेचारा इसलिये भी कि उन्हें नहीं मालूम कि उनके उत्थान की ख्वाहिश लिये कितने लोग दिल-औ -जान से वर्षों से लगे हुये अपनी-अपनी रोटियाँ (टू बी मोर करेक्ट, पकवान) तोड़ रहे हैं। 

समस्या ये नहीं है कि लघु और सीमान्त किसानों की सेवा में समर्पित लोगों ने उनकी समस्याओं के समाधान हेतु प्रयासों में कोई कसर रख छोड़ी हो। समस्या ये है कि कोई पूरे परिदृश्य पर फोकस नहीं करता या करना चाहता। सब विषय वस्तु विशेषज्ञ (सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट) अपने-अपने हिसाब से समाधान खोजने और उसे प्रचारित करने में लगे हैं। सक्सेस स्टोरीज़ (सफलता गाथाओं) की बाढ़ आ रखी है। उसकी आड़ में हर कोई अपनी सफलता की गाथा लिख रहा है। कोई ऐसा काम जो पेपर या पेटेंट में परिवर्तित न हो वो आपके किसी काम का नहीं। दूसरों के उत्थान का बीड़ा उठाने वाले यदि अपना ही उत्थान न कर पाये तो जीवन व्यर्थ गया समझो। और सबसे बड़ी बात ये है कि यह बीमारी सार्वभौमिक  है। जो व्यक्ति या देश जितना अधिक संपन्न या विकसित है, उसे दुनिया के साधनविहीन और विपन्न लोगों की उतनी ही अधिक चिंता है। कोई उन सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट्स को बताये कि दस लाख को सौ लाख बनाना आसान है लेकिन दस रुपये को सौ रुपया बनाना नामुमकिन। एक या दो हेक्टेयर से कम खेत से अनाज उगा कर के चार लोगों का परिवार वैसे ही पल सकता है जैसे पल रहा है। एक तरफ तो बीज-खाद-कीटनाशक आदि कंपनियों ने किसान को उपभोक्ता बना के रख छोड़ा है तो दूसरी तरफ़ किसान प्रसंस्करण कंपनियों के लिये सस्ते उत्पाद का माध्यम बन गया है। ग़ौर करने वाली बात ये है कि सभी का फायदा किसान के किसान बने रहने में निहित है। यदि किसान वाकई सम्पन्न हो गये तो इन सबके मुनाफ़े का क्या होगा। इसलिये किसान का किसान बने रहना ज़रूरी है और उनकी चिन्ता का स्वांग भी उतना ही ज़रूरी है

आजकल एक नया ट्रेन्ड प्रचलन में है समस्या को हाइलाइट करो और पैसा पाओ। बहुत सी देसी और अन्तर्देशी संस्थायें हैं जो समस्या के समाधान पर पूँजी लगाने के लिये उद्धत हैं। समस्या जितनी व्यापक होगी उतना बड़ा नेटवर्क और उतना ही बड़ा निवेश। समाधान तो वहीं से निकलेगा जहाँ से समस्या। अब तक सारा फोकस उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने पर ही लगा हुआ था। लेकिन ये समझने में बहुत देर लग गयी कि उत्पादन दुगना कर दिया तो मुनाफ़ा आधा। पूंजीवादी व्यवस्था कमज़ोर के लिये नहीं होती। यदि किसान सिर्फ़ भण्डारण की क्षमता विकसित कर ले तो बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ उनके इशारे पर नाचती नज़र आयें। लेकिन लघु और सीमांत किसान के पास न तो इतना उत्पादन है न ही इतनी क्षमता। एक तरीक़ा ये भी है की कृषि कार्य में उतने ही लोग लगें जितना उनका सकल घरेलू उत्पाद में योगदान है। इस हिसाब से यदि सिर्फ 15% जनसँख्या यदि खेती करें तो खेती भी उद्योग बन सकता है। आज बीज से लेकर मशीन तक तकनीकों की कोई कमी नहीं है लेकिन किसानों के हित में सफलता गाथा लिखने के लिये छोटी-छोई सफलताओं को विस्तार देने की आवश्यकता है, जो शायद व्यावहारिक शोध और अभियांत्रिकी के सहयोग के बिना संभव नहीं है। लेकिन हमारी शोध की दिशा और उनकी फ़ंडिंग मौलिक शोध तक सीमित हो कर रह गयी है। इसरो की सतत सफलता ये दर्शाती है कि दुनिया लैब के बाहर है जो आप का इन्तज़ार कर रही है। जिसका लाभ समस्त देश और दुनिया को होना चाहिये।  

देर से ही सही वैल्यू चेन की बात शुरू होना एक खुशखबरी से कम नहीं है। ग्रीन रिवोल्यूशन (हरित क्रांति) में उन्नत बीज की उपलब्धता के अलावा अनेक कारकों जैसे सिंचाई की सुविधा, खाद-कीटनाशक का प्रयोग, संपन्न किसान, सरकार द्वारा क्रय,भण्डारण और सार्वजानिक वितरण प्रणाली का भी अमूल्य योगदान था। जब उत्पादन थाली तक पहुँचा तब हरित क्रांति कम्प्लीट हुयी। लेकिन हम बीज पकड़ कर बैठ गये। दुग्ध क्रांति में भी पूरी वैल्यू चेन विकसित की गयी। कोई भैंस विकसित करने लग जाता तो शायद दुग्ध उत्पादन तो बढ़ जाता लेकिन क्रांति न हो पाती। शहर के हर गली-कोने पर अण्डों के ठेले एक अघोषित क्रांति की ओर इशारा कर रहे हैं। वैल्यू चेन एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोशिश होती है कि उत्पादक से उपभोक्ता तक की सभी कड़ियों के लिये विन-विन स्थिति हो। पूरी वैल्यू चेन में सबसे मजबूत कड़ी सबसे कमज़ोर कड़ी ही होती है। फ़ूड वैल्यू चेन में किसान ही सबसे कमज़ोर कड़ी बनता है। जबकि सारी चेन किसान के उत्पादन के बलबूते फलती-फूलती है। चेन की अन्य कड़ियों की ये नैतिक और आर्थिक मज़बूरी होनी चाहिये कि सबसे कमज़ोर कड़ी को मज़बूत करें। सब अपने-अपने चारे यानि मुनाफ़े का कुछ हिस्सा कमज़ोर कड़ी को मज़बूत करने में लगायें ताकि कोई भी किसान बेचारा न रह जाये। और उसका मूल्य बस एक वोट भर बन के न रह जाये। 

- वाणभट्ट 


रविवार, 4 नवंबर 2018

और जेब कट गयी 

ये त्यौहार भी खूब आते हैं। और जब आते हैं तो अपने साथ लाते हैं नई-नई रंगत। जिसका साल भर इन्तज़ार करने का अपना मज़ा है। लेकिन इसका बुख़ार दिल-ओ-दिमाग़ पर इस क़दर हावी हो जाता है कि जो लोग कल तक मँहगाई का मर्सिया पढ़ते नहीं थक रहे थे, वो पूरे शहर की पार्किंग और सडकों को चोक किये घूम रहे हैं। धनतेरस बाद अख़बार की हेड लाइन कोई आज भी बता सकता है। कानपुर ने धनतेरस के दिन स्वर्ण आभूषण खरीद का नया कीर्तिमान बनाया। करोड़ों रुपये जुए-पटाखों में फूँक कर, परीवा के दिन से फिर साल भर के लिये राग-दरिद्दर शुरू हो जायेगा। 

जब से साल भर नये कपड़े खरीदे जाने लगे, तब से त्योहारों पर खरीददारी बस एक शगुन सा बन गया है। त्यौहार है तो उल्लास दिखना चाहिये। लेकिन अब दिखने से ज़्यादा दिखाने का चलन है। इसलिये त्यौहार दिखाने की प्रवृत्ति में हुयी बढ़ोत्तरी दिन-दूनी रात-चौगुनी प्रगति कर रही है। लोग तो बहाने खोज रहे हैं। होली एक ऐसा त्यौहार है जो अमीर-गरीब के फासले को कम कर देता है। अमीर विदेशी लेगा तो गरीब देसी। और लेने के बाद क्या राजा क्या रंक। पूरा साम्यवाद। इसलिये दीपावली को लक्ष्मी जी को सुपुर्द कर दिया गया है। अब जो चूके तो दिखाने का मौका साल भर बाद मिलेगा। कौन दिवाली रोज़-रोज़ आती है। अब जेब कटे तो कटे। 

परिवार से विमर्श किया गया कि जब साल के तीन सौ पैंसठ दिन नवधनाढ्य लोग अपनी इम्पोर्टेड गाड़ियों से सडकों को जाम किये रहते हैं, (आप इसे लेखक का काम्प्लेक्स भी मान सकते हैं।), तो धनतेरस के शुभ अवसर पर और बुरा हाल हो सकता है। त्यौहार पर, जनसँख्या विस्फोट के कारण यदि एक चौथाई प्राणी भी घर से निकल आये, तो जाम की स्थिति तो बन ही जायेगी। हाँ, जाम की स्थिति में ये बड़ी-बड़ी गाड़ी वाले लोग हॉर्न और डिपर ऐसे मारते हैं जैसे टीलीली...ली करके चिढ़ा रहे हों। शहर में हाई बीम पर चलने और बेवज़ह हौंक करने वालों का तो चालान होना चाहिये। लेकिन भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकारें ऐसा कोई कदम उठाना नहीं चाहतीं, जिससे सरकारी नुमाइंदों को भ्रष्टाचार करने का और मौका मिले। घर वालों से मशविरा किया तो समझ आया कि समझदारी इसी में है कि मंडे को धनतेरस की शॉपिंग शनिवार को ही निपटा दी जाये। संडे साफ़-सफ़ाई और बिजली की झालर लगाने को मिल जायेगा। शादी के पच्चीस साल होते-होते पति वैसे भी ट्रांसपोर्टर (फिल्म वाला ) बन कर ही रह गया है।

इसमें किसी को शक़ नहीं होना चाहिये कि इस देश में समझदारों की कभी कोई कमी नहीं रही है। यदि बेवकूफ होते तो दो दिन में देश आज़ाद हो गया होता। तीस करोड़ हिन्दुस्तानियों के आगे एक-दो लाख फ़िरंगी दो दिन न टिकते। लेकिन यहाँ तो विपक्षी टीम को पदा-पदा के थकाने में मज़ा आता है। इसलिये मैच को जितना स्पोर्टिंग स्पिरिट से हम लेते हैं, दुनिया के और देश ले ही नहीं सकते। जीतने से ज़्यादा हम खेलने के लिये खेलते हैं। अगर मैच ख़त्म हो गया तो टाइम काटने की दिक्कत होगी। इसीलिये क्रिकेट के सारे फॉर्मैट हमने जिला के रखे हैं। टी-टवेंटी के ज़माने में यदि समय है तो टेस्ट मैच का भी आनन्द उठाइये। ससुर अंग्रेजवन को इतना झेलाया भाई, कि ख़ुद ही बाय-बाय कह कर भाग गये। 

स्मार्ट सिटी बनाने का काम भी इसीलिये नहीं हो पा रहा है। या तो लोग स्मार्ट होंगे या सिटी। स्मार्ट लोग खलनायक अजित की मोना डार्लिंग की तरह हुआ करते हैं। अपने फ़ायदे के लिये नियम-क़ानून को ताक पर रखने वाले। और स्मार्ट सिटी के लिये आवश्यक हैं नियम-क़ानून का पालन करने वाले लोग। अब ऐसे में विपक्ष सरकार की नियत पर शक़ करें तो शक़ होना लाज़मी है कि कुछ तो गड़बड़ है...दया। ये सीआईडी वालों ने इतना पका रखा है कि कहीं गड़बड़ हो, दया की याद तो आनी ही है। 

इतनी रामायण का आशय ये सिर्फ इतना समझाने के लिये था कि सिर्फ़ हम ही समझदार नहीं हैं। पूरा का पूरा कानपुर ही स्मार्ट है। सड़क पर जाम की शुरुआत देख कर अपनी छोटी सी तथाकथित गाड़ी को थोड़े लम्बे रूट की ओर मोड़ दिया। लेकिन चाहे पतंगा कितना बड़ा-बड़ा चक्कर काट ले गति तो शम्मा के पास जाने से ही मिलेगी। आउटर रूट से होते हुये जब लगा कि गंतव्य पास आ गया है तो भीतर की ओर घुसना आरम्भ कर दिया। जल्द समझ आ गया कि मैच लम्बा होने वाला है। 

हिन्दुस्तान में निकम्मे से निकम्मे आदमी के लिये बीवियाँ भड़ास निकालने का सबसे उचित और सुरक्षित माध्यम हैं। कहीं और भड़ास निकलने की गुंजाईश ही नहीं है। बॉस है कि बस बोलता रहता है और सबऑर्डिनेट है कि सुनता ही नहीं। यारी-दोस्ती तो देखने-दिखाने के चक्कर में खत्म हो गयी। अकेले हम-अकेले तुम में ग़नीमत ये रही कि हम में पति-पत्नी और कुछ दूर तक बच्चे रह गये। यदि दोनों में से एक भी कम सहिष्णु रहा तो, भगवान दूसरे के फटे में टांग न अड़वाये, लालू के सुपुत्तर वाला हाल होता। "लिस्ट बना के दे देती तो मै स्कूटर से सब सामान ले आता। अब जाम में फँसवा दिया। झेलो"। 

पत्नियों के सिक्स्थ सेन्स की दाद देनी चाहिये ये अच्छी तरह से जानती हैं कि कब, कहाँ और कैसे बदला लेना है। जानतीं हैं कि जाम में फँसे ड्राइवर को उकसाना ठीक नहीं। कार पर एक खरोंच और बढ़ जायेगी। मौका आया है तो बिन माँगी सलाह भी देता चलूँ। जीएसटी और नोटबंदी के बाद से किसी व्यापारी से भी बहस न करें। वो कैश माँगे तो कैश दें। वो रसीद देने से मना करे तो मान जायें। उन्हें जूते के बदले समोसा बेचने की सलाह तो कतई न दें। उन्हें पता होता कि बिना टैक्स के समोसे में कितना मुनाफ़ा है तो यक़ीन मानिये सारे उद्योगपति आज पकौड़ा तल रहे होते।         

कुर्सी पर बैठने के लिये लड़के ने अपनी स्किन टाइट जींस से खींच-खाँच के, आड़े-तिरछे हो कर, साढ़े सात इंच का 'किसका बजा' वाला मोबाइल निकाल के मेज़ पर रख दिया। बेफ़िक्री से इधर-उधर देख के मेरे पास आया और बड़ी बेअदबी से कहा "अंकल ज़रा पेन देना"। सब्र की भी हद होती है। "ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई बैंक आये और पेन न लाये। इतना बड़ा मोबाईल ला सकते हो और पेन के लिये जगह नहीं है। बैंक आ रहे हो और पेन माँग रहे हो"। कुछ सुबह से कोई मिला नहीं था और कुछ अपने बच्चे के भी दोनों कान खुले रहने के कारण दूसरों को समझाने में आवाज़ ऊँची हो जाती है। अब लड़के अपने संस्कार और अपनी तमीज़ का परिचय दिया। "सॉरी अंकल अगली बार ले कर आऊँगा"। बच्चे ने सॉरी कह कर मेरे प्रवचन पिलाने के इरादे पर पानी फेर दिया। मैंने ग़ौर किया उसकी टी-शर्ट्स में जेब नहीं थी। बच्चे तो बच्चे हैं क्या अपने क्या पराये। मै मुस्कराया क्योंकि मेरा बेटा भी इसी दौर का है। दरअसल आजकल पता नहीं कौन सा ट्रेंड चल गया है कम्पनियों ने टी-शर्ट्स में जेब लगाना बंद कर दिया है। मेरी चिन्ता बस यही रहती है कि पेन और मोबाईल आख़िर कहाँ रखें। इस वज़ह से मै नयी टी-शर्ट्स नहीं ले पा रहा हूँ। 

महिलाओं की वेशभूषा में यही कमी खटकती है। साड़ी हो या सलवार-सूट, जेब नहीं होती। इसीलिये पैसा और मोबाइल रखने के लिये उन्हें पर्स या बैग के रूप में अतिरिक्त एक्सेसरी ढ़ोनी पड़ती है। चाहे-अनचाहे ये उनके फ़ैशन या ड्रेसिंग सेन्स का हिस्सा बन चुका है। और शायद इसीलिये अपनी ख्वाइशों की ज़िन्दगी जीने को बेताब मोटरसाइकिल सवार उचक्कों के लिये वो सॉफ्ट टारगेट बन जातीं हैं। बैग में कुछ नहीं तो मोबाइल और पैसा तो मिलेगा। गहने तो बस अब लॉकर की ही शोभा बढ़ा रहे हैं। शायद इसीलिये नयी लड़कियों में जींस का प्रचलन बढ़ा है। आदमी का दिमाग भी क्या चीज़ हैं कहीं भी, कुछ भी सोच सकता है। बाहर लगे जाम और चिल्ल-पों का मेरे मस्तिष्क में उठ रहे विचारों से कोई सरोकार नहीं था।

सरकते-सरकते एकाएक मेरी निगाह बायीं तरफ़ बने एक मॉल पर पड़ी। टारगेट गंतव्य तक जाने की बात सोच कर मेरे त्यौहार का जोश कम हो चला था। मैंने गाड़ी घुमा दी। मेरी तरह फँसे समझदार लोगों ने भी यही किया होगा। ऐसा ठसाठस भरी पार्किंग देख कर प्रतीत हो रहा था। दैवयोग से मेरी छोटी सी कार के लिये पार्किंग के दिल में जगह निकल आयी। ऐज़ अ ड्राइवर, मुझे ऐसी ख़ुशी मिली जिसने शॉपिंग के बाद मुझे लौटते समय जाम की चिन्ता से मुक्त कर दिया।  

पहले बच्चे पिता जी से आग्रह किया करते थे अलां चाहिये या फ़लां। पिता जी त्यौहार का हवाला देते, होली में नहीं तो दिवाली में ज़रूर दिला देंगे। भला हो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की राष्ट्रिय गरीबी का, कि बच्चों की इच्छायें माता-पिता बिन माँगे ही पूरी कर देते हैं। सिर्फ़ हम दो- हमारे दो तक सीमित जीवन व्यवस्था ने समाज और परिवार के दूसरे सदस्यों के प्रति हमें अपनी ज़िम्मेदारियों से असंवेदनशील कर दिया है। 

बहुत दिनों बाद हम सबने दिवाली पर ट्रेडिशनल परिधान पहनने का निश्चय किया था। माँ-बेटी ने सलवार सूट लिया तो बाप-बेटे ने कुर्ता-पायजामा। भीड़ और भीड़ के कारण मची हबड़-तबड़ में, दीपावली की शॉपिंग निपटाई गयी। ट्रायल की गुंजाइश नहीं थी। चीन से हमें कुछ और सीखने को मिला हो या न मिला हो लेकिन एक बात तो है कि हमने प्यार-मोहब्बत को भी चाइना का माल बना दिया है। चले तो चाँद तक नहीं तो शाम तक। एक ज़माना था जब पिता जी दो साल बड़े भाई साहब को बाटा का लोहा-लाट स्कूल शू दो नंबर बड़ा खरीदते थे। दो साल भाई पहनते फिर मेरा नम्बर आ जाता। एक नॉर्थस्टार जूते से पूरे चार साल का बी.टेक. कर डाला, जूते का बाल भी बाँका न हुआ। वो तो नौकरी के चक्कर में दिल्ली में चटक गया नहीं तो घर के म्यूज़ियम में पड़ा होता। रंग और डिज़ाइन देख कर सब कपड़े खरीद कर, जाम में फँसते-फँसाते किसी तरह घर में दाखिल हो गये। 

मै टीवी के सामने नि:स्पृह भाव से चॅनेल्स बदलने में जुट गया। अन्दर ट्रायल शुरू हो चुका था। थोड़ी देर में बेटे ने पूछा "पापा कैसा लग रहा है, कुर्ता"। अपने बच्चे किसे अच्छे नहीं लगते। वो भी नये-नए कुर्ते में। "वेरी नाइस बेटा। लुकिंग ग्रेट"। अब तो अपना स्टैण्डर्ड भी फेसबुक टाइप के कमेंट्स देने का ही रह गया है। उसने मुस्कुराते हुये बताया "पापा इसमें जेब नहीं है"। "और मेरे  वाले में"। "नहीं, उसमें भी नहीं है"। जाम के ख़ौफ़ से लौटाने-बदलने का साहस नहीं बच रहा था। दुकान में लिखा एक स्लोगन मुझे टीलीली... ली कर के चिढ़ा रहा था "फ़ैशन के दौर में गारंटी की अपेक्षा न करें"। चीन से हमने यही तो सीखा है। 

दीपावली सर पर है। लक्ष्मी के आगमन के लिये घर की सफ़ाई भी ज़रूरी है। शॉपिंग में अपना सन्डे खराब नहीं करना चाहता। त्यौहार हैं तो जेब तो कटनी ही है। ऐसे नहीं तो वैसे। 

- वाणभट्ट  

पुनश्च : यह ब्लॉग एक सत्य घटना पर आधारित है। पात्र काल्पनिक हो सकते हैं। इसका जीवित लोगों से लेना-देना है। मरों की परवाह आज के युग में कौन करता है। त्यौहार के मौसम में कुर्ते में साइड जेब न लगा कर कम्पनी ने कितना श्रम, समय और पैसा बचा लिया इसका आँकलन प्रबुद्ध पाठकों पर छोड़ता हूँ। यदि आप मेरी तरह जेब प्रेमी हैं तो ट्रायल ज़रूर करके देख लें। मॉल है बड़का बाज़ार।

मंगलवार, 2 अक्तूबर 2018

भोजन का भविष्य 

कमॉडिटी ट्रेडिंग छोड़ कर ग्रो-इंटेलीजेंस नामक डाटा एनालिसिस कम्पनी आरम्भ करने वाली सुश्री सारा मेंकर को टेड टॉक पर सुनना एक अद्भुत अनुभव रहा। अगस्त, 2017 में प्रेषित ये वार्ता भविष्य में भोजन की उपलब्धता के लिये समय रहते आगाह करने का प्रयास है। उनके अनुमान के अनुसार भोजन उपलब्धता की भयावह तस्वीर देखने के लिये शायद 2050 का इन्तज़ार न करने पड़े। आज उस भयावहता की कोई कल्पना भी न करना चाहे। लेकिन बहुत सम्भव है अब से मात्र एक दशक बाद ही इस स्थिति से दो-चार होना पड़ जाये। कुछ घण्टी बजी। हम भी इस चपेट में आ सकते हैं। प्रस्तुत लेख सुश्री सारा की वार्ता से प्रेरित है।  

उनके आँकलन के अनुसार 2050 तक 9 बिलियन तक पहुँच चुकी वैश्विक जनसंख्या को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिये आज की तुलना में 70% अधिक खाद्य सामग्री की आवश्यकता होगी। प्रत्येक व्यावसायिक गतिविधि सदैव उर्ध्वगामी नहीं होती। एक ऊंचाई तक पहुँचने के बाद एक अप्रत्याशित उतार अवश्य आता है और स्थितियाँ एकदम से बदल जाती हैं। और कई बार ये परिस्थितियाँ अपरिवर्तनीय होती हैं। स्टॉक मार्केट अक्सर इन अनिश्चितताओं से गुज़रता है। वहाँ प्रत्यक्ष रूप से आम आदमी या मानवता पर कोई संकट दिखायी नहीं देता। कृषि क्षेत्र में ऐसा परिदृष्य तब आयेगा जब भोजन की माँग और आपूर्ति में अन्तर को पाटना असम्भव हो जायेगा। यदि कभी खाद्य उपलब्धता में ऐसा हुआ तो दृश्य भयावहता की कल्पना से परे होगा। विभीषिका या भूख के कारण से उत्पन्न अराजकता, संवैधानिक और राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करेगी। असामान्य मूल्य पर भी खाद्य सामग्री की अनुपलब्धता मानवता के लिये खेदपूर्ण हो सकती है। तब सम्भवतः ये समझने का समय भी न मिले कि पैसा और तकनीक भोजन नहीं उपलब्ध करा सकते। कृषि व्यवस्था की स्थिति बहुत ही छिन्न-भिन्न है और भविष्य की नीति निर्धारण के लिये उपलब्ध आँकड़ों का आधार बहुत सीमित और अल्प है। इसी कारण सुश्री सारा ने कमॉडिटी ट्रेडर का काम छोड़ कर एक उद्यमी बनने का निश्चय किया। ग्रो-इंटेलिजेंस एक डाटा विश्लेषण कम्पनी है जो पॉलिसी बनाने वालों को आँकड़े उपलब्ध कराती है। ये कम्पनी विश्व के प्रत्येक नागरिक को खाद्य सुरक्षा में आने वाले संकट से बचाने के लिये एक व्यावहारिक मार्गदर्शक का काम भी कर रही है। 

विश्व कृषि परिदृश्य में गिरावट 2027 में ही परिलक्षित होने लगेगी जब विश्व की खाद्य आवश्यकता और उपलब्धता में 214 ट्रिलियन कैलोरी का अन्तर होगा। सभी खाद्य पदार्थों की पोषक क्षमता बराबर नहीं होती इसलिये टन और किलोग्राम में खाद्य उपलब्धता व्यक्त करने का कोई प्रयोजन नहीं है। भोजन की मात्रा नहीं, भोजन द्वारा प्राप्त कैलोरी का निर्धारण स्वस्थ जीवन शैली के लिये आवश्यक है। आज से चालीस साल पहले कृषि की स्थिति का आँकलन करने पर पता चलता है कुछ ही देश कैलोरी की दृष्टि के स्वावलम्बी थे या कैलोरी निर्यातक थे। अधिकाँश देश कैलोरी के आयातक हुआ करते थे। जिनमें अफ्रीका, यूरोप और भारत भी सम्मिलित थे। चीन उन दिनों खाद्य कैलोरी उपलब्धता में विषय में स्वावलम्बी था। चालीस साल बाद आज चीन में औद्योगिक क्रांति तो दिखायी देती है किन्तु खाद्य आवश्यकताओं के आधार पर यह एक बड़ा आयातक देश बन गया है। भारत ने हरित क्रांति के माध्यम से खाद्य आत्मनिर्भरता में के बड़ी छलाँग लगायी। विश्व पटल पर अफ्रीकी और मध्य एशिया के देशों और चीन को छोड़ कर अधिकाँश देश अपनी कैलोरी आवश्यकताओं में आत्मनिर्भर हो गए हैं। लेकिन आज से पाँच साल बाद (2023 में) जब विश्व की आधी आबादी के अफ़्रीका, भारत और चीन में होगी तब खाद्य अवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा ये सोचने का विषय है। ये तीनों क्षेत्र विश्व में खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से बड़ी चुनौतियाँ प्रस्तुत करने वाले हैं। ये सभी देश अतिरिक्त कैलोरी उत्पादक देशों से कैलोरीज़ का आयात करने को विवश होंगे। समस्त अतिरिक्त कैलोरी अफ़्रीकी देशों, भारत और चीन का ही भरण करने में सक्षम होंगी। अतिरिक्त कैलोरी उत्पन्न करने वाले देशों को भी ये उत्पादन वृद्धि निर्वनीकरण के रूप में मूल्य चुका कर ही करनी होगी।

कैलोरी अभाव वाले देशों के लिये अतिरिक्त कैलोरी उत्पादक देशों से खाद्य सामग्री की बर्बादी कम करने या खाद्य उपयोग में परिवर्तन लाने की आशा करना सही नहीं है, न ही समस्या का समाधान है। कोई आपकी आवश्यकता के लिए अपना खाद्य व्यवहार भला क्यों बदलेगा। समस्या का समाधान भी कैलोरी अभाव वाले क्षेत्रों से ही आयेगा। चीन में कृषि हेतु भूमि और पानी की उपलब्धता की समस्यायें हैं। इसलिए समाधान के लिये अफ्रीका और भारत ही से आशा की जा सकती है। भारत में भी भूमि एक सीमित संसाधन है किन्तु उत्पादकता में वृद्धि की सम्भावनायें हैं। अफ्रीका में कृषि योग्य भूमि बड़ी मात्रा में उपलब्ध है और वहाँ अभी भी उत्पादकता का स्तर वही है जो 1940 में उत्तरी अमेरिका का था। खाद्य सुरक्षा की समस्या के समाधान के लिये बहुत समय नहीं बचा है। इसलिये आवश्यकता है कुछ नया करने की, कुछ अलग करने की, कुछ सुधार करने की। आवश्यकता है अफ्रीका और भारत में कृषि के व्यवसायीकरण और औद्योगीकरण की। इसका उद्देश्य मात्र खेती के व्यवसायीकरण से नहीं है। इसका उद्देश्य आंकड़ों का विश्लेषण करके नीति निर्धारण में सहायता, आधारभूत संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) का विकास, परिवहन मूल्यों में कमी, बैंकिंग और बीमा क्षेत्रों में सुधार, तथा खेती में असुरक्षा की आशंका को कम करना है। बिना लघु और मझोले किसानों को प्रभावित किये सम्पूर्ण कृषि व्यवस्था के व्यवसायीकरण की महती आवश्यकता है। व्यावसायिक खेती और लघु किसानों के मध्य सहअस्तित्व का मॉडल विकसित करने की आवश्यकता है। भारत भविष्य में उत्पादकता में वृद्धि के द्वारा अपनी स्वावलम्बन की स्थिति को बनाये रखने में सक्षम है। किन्तु 2027 तक 214 ट्रिलियन कैलोरी की कमी और 8.3 बिलियन जनसंख्या को भोजन उपलब्ध कराने में अफ़्रीकी देशों की महत्वपूर्ण भूमिका होने वाली है। भविष्य में बढ़ती जनसंख्या और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के प्रश्न का उत्तर अब  हमारे पास है। बस उस पर अमल करने की आवश्यकता है।  

वर्ष 2006 में योजना के सितम्बर अंक में एक लेख छपा था "एग्रीकल्चर ऐज़ ऐन इंडस्ट्री"। कृषि ही एक ऐसा उद्योग है जो बढ़ती जनसंख्या को भोजन, रोजगार और आय उपलब्ध करा सकता है। आवश्यकता है इसे समग्रता से देखने की। आर्थिक समृद्धि को सहजता से अधिक भोजन ग्रहण करने की प्रवृत्ति से जोड़ा जा सकता है। जेब में पैसा है तो स्वाद पर सबका अधिकार जायज़ है। दिन-दूना रात चौगुना बढ़ता मेरा पेट मुझे रोज चिढ़ाता है। किसी दूसरे के खाद्य हिस्से पर मेरा हक़ नहीं है। डाक्टरों के यहाँ निरन्तर बढ़ती लाइनें और बढ़ता मेडिकल बिल उन्हें भी नहीं चिंतित कर पाता जो दिन-रात खाद्य समस्या हाइलाइट करने में उलझे हुये हैं। अधिक भोजन ही अधिकांश बीमारियों की जड़ है, जब कि संतुलित आहार से ही स्वस्थ जीवन शैली सम्भव है। इसलिये कैलोरी ग्रहण (काउन्ट) पर बहस करने का अब मुनासिब समय है। गुटका, शराब, अतिकैलोरी खाद्य सामग्री के उपयोग को सिर्फ इसलिए बढ़ावा मिल रहा है कि लोगों की क्रय शक्ति में वृद्धि हुयी है। इलाज़ पर खर्च भी उन्हीं का बढ़ रहा है जो स्वाद और जीवन-आनन्द को रुपयों से तौल रहे हैं। जापान में बॉडी-मास इंडेक्स में परिवर्तन के हिसाब से इंश्योरेंस प्रीमियम घटता या बढ़ता है। संपन्न लोगों से दूसरों के लिए त्याग की अपेक्षा व्यर्थ है लेकिन उनसे उन्हीं के स्वास्थ्य की अपेक्षा तो की ही जा सकती है। असंयमित जीवन शैली कारण मानवजनित अस्वस्थता पर इंश्योरेंस प्रीमियम में वृद्धि तथा इलाज़ पर हुये ख़र्च पर टैक्स शायद लोगों को संतुलित भोजन के लिये प्रेरित कर सके। 

जब देश भविष्य में युद्ध की आशंका से बम और बारूद के ज़खीरे इकट्ठा कर सकते हैं तो क्या भविष्य के लिये भोजन के भण्डार नहीं बनाये जा सकते। भविष्य की लड़ाई हमें आज उपलब्ध तकनीकों से ही लड़नी होगी। विगत वर्षों में दलहन में भारत की आत्मनिर्भरता ने एक नयी इबारत लिख दी है। इस सफलता ने यह सिद्ध कर दिया है कि गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता बढ़ा कर, बीज प्रतिस्थापन और सुनिश्चित सरकारी खरीद के द्वारा उत्पादन लक्ष्य को वर्तमान तकनीकों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। अब बात मात्र कृषक आय दोगुनी की ही नहीं होनी चाहिये। बात ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाओं की भी होनी चाहिये, ताकि शहरों पर बढ़ते अनावश्यक बोझ को कम किया जा सके। इसके लिये  ग्राम्य-अंचल में कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना करनी आवश्यक है। कटाई उपरान्त होने वाली हानियों को कम करके भोजन की उपलब्ध्ता को बढ़ाया जा सकता है। प्रसंस्करण के माध्यम कृषि उत्पाद की भण्डारण अवधि (शेल्फलाइफ़) तथा ग्रामीण आय में कई गुना वृद्धि सम्भव है। भण्डारित अनाज का एक बड़ा हिस्सा आपात स्थितियों से निपटने के लिये भी होना चाहिये। एक लीटर में अस्सी किलोमीटर चलने वाली हीरो हौंडा मोटरसाइकिल जब सन 1985 में जब लॉन्च हुयी थी तब उनका स्लोगन था "फिल इट-शट इट-फॉरगेट इट"। भविष्य में खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों को देखते हुये कुछ ऐसा ही प्रबन्धन आवश्यक है। बचपन में कहानी सुना करते थे अकाल पड़ने पर राजा ने अपने सारे गोदाम खोल दिये। गोदाम भी होते थे पहाड़ की कंदराओं में। तकनीकी रूप से अब हम अधिक सक्षम हैं। दिक्कत सिर्फ इतनी है कि समस्याओं पहचान और उन्हें चिन्हांकित (हाइलाइट) करने में हमने इतनी ऊर्जा लगा दी है कि संभावनाओं और समाधानों की ओर से हमारा ध्यान भटक गया है। हम ऐसी खोज के पीछे भाग रहे हैं जिस पर जलवायु परिवर्तन, कीट या रोग का प्रकोप न पड़े। उचित जलवायु, मृदा और जल के जटिल जाल में इच्छित परिणाम प्राप्त करने में कुछ हद तक सफलता  मिली अवश्य है किन्तु ये विकास की सतत चलती रहने वाली अन्तहीन प्रक्रिया है। जैसा सुश्री सारा ने बताया हमारे पास समाधान हैं बस उन्हें अमल में लाने की आवश्यकता है। समाधान पूरी कृषि मूल्य श्रृंखला (वैल्यू चेन) के समग्र प्रबन्धन में निहित है।  

यदि भोजन और स्वास्थ्य सरकारों की ज़िम्मेदारी है तो इस दिशा में भी नीतियाँ बननी चाहिये। ताकि 2023 तक हम चुनौतियों के लिये तैयार रहें। आज देश उस महापुरुष का 149वां जन्मदिन मना रहा है जिसने पूरे देश को वस्त्र उपलब्ध हो सके इसलिये आधी धोती पहन ली। क्या हम अपने स्वास्थ्य के लिये अपनी कैलोरी नहीं गिन सकते। भोजन की कमी की समस्या का निवारण उसकी उचित वितरण प्रणाली से संभव है।खाद्य समस्या के निदान के लिये उन्हीं देशों को प्रयास करना पड़ेगा जिनके लिये यह चिंता का विषय है। सम्भवतः समस्याओं का हल भी वहीं से निकलता है जहाँ से वो शुरू होती हैं।  

- वाणभट्ट 




  

शनिवार, 29 सितंबर 2018

प्रायश्चित 

करिया भैया जब पैदा हुए तो झक सफ़ेद थे। दादी ने "आ गए करियउ" कहते हुये बच्चे का स्वागत किया और माथे पर काला टीका लगा दिया। बच्चे के माँ और बाप दोनों ही साफ़ रंग के थे इसलिये बच्चे के काला होने की गुंजाइश न के बराबर थी। लेकिन दादी को मालूम था कि कितनी मन्नतों और चार लड़कियों के बाद ईश्वर ने उनकी सुनी। गोदी में पोता लिया तो जैसे इस जन्म के सारे बन्धन कट गये। आठ पाउण्ड के सुन्दर-स्वस्थ बच्चे को हर बुरी नज़र से बचाना ज़रूरी था। इसलिये उन्होंने पहले से ही नाम सोच रखा था - काली प्रसाद मिश्र। उन दिनों 40 -50 साल के होने को आये बेटा-बहू की क्या मज़ाल कि अपने माँ -बाप की आज्ञा की अवहेलना कर सकें। इस प्रकार काली प्रसाद मिश्र जी का अवतरण भवानी प्रसाद मिश्र जी के आँगन में हो गया। स्कूल के नाम से अलग नाम की व्यवस्था सम्भवतः इसलिये की गयी ताकि घर-पास-पड़ोस का हर प्राणी अपने-अपने प्रेम को अपने-अपने हिसाब से व्यक्त कर सके। फलस्वरूप काली के जितने अपभ्रन्श सम्भव थे उन सभी नामों से उस खूबसूरत-हँसते-मुस्कुराते-खिलखिलाते बच्चे को नवाज़ा गया। कलुवा, करियवा, कालिया, कल्लू और करिया आदि-आदि। आखिर के दो नाम बच्चे के साथ ऐसे चिपके कि लाख चाहने के बाद भी वो किसी के लिये कल्लू था तो किसी के लिये करिया। 

मेधावी काली प्रसाद मिश्र ने उच्च शिक्षा प्राप्त करके एक शालीन सरकारी नौकरी का जुगाड़ कर लिया था। भवानी प्रसाद ने पूरी ज़िन्दगी सरकारी क्लर्की में निकाल दी थी। बेटा जब सरकारी अफसर बन गया तो उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। सरकारी आवास मिला। सरकारी गाड़ी मिली। गज़टेड क्लास वन बताते-बताते भवानी इतने भाव-विह्वल हो जाते कि लगता इसके पहले या बाद में कोई और इस पद की शोभा नहीं बढ़ा पायेगा। अब उनकी तमन्ना थी जल्दी से जल्दी अवकाश प्राप्त करके बेटे के साथ रहने की और उसकी अफसरी का लुफ़्त उठाने की। रिटायरमेन्ट के बाद स्कूल में शौकिया पढ़ाने वाली बहू ने बहुत समझाने की कोशिश की कि पिता जी आप अपने शहर और अपने मकान में ही रहिये हम लोग आते-जाते रहेंगे और आपका ख्याल रखेंगे। लेकिन भवानी बाबू के अपने तर्क थे। पत्नी के देहावसान और बेटियों के विवाह के बाद अब बस बेटा-बहू-पोते के साथ ही रहने की इच्छा है। और फिर पाँच कमरों के सरकारी बंगले में तुम ढाई प्राणी क्या करोगे। मैं साथ रहूँगा तो पोते को कहीं क्रेच में नहीं डालना पड़ेगा। "देखो कल्लू अब मैं अकेले यहाँ नहीं रहने वाला"। भवानी बाबू ने अपना निर्णय सुना दिया था। 

सरकारी मकान में आ कर और पोते को गोद में लेकर दिन भर भवानी बाबू कालोनी में घूमा करते। काली प्रसाद को जिस बात का अन्देशा था वो होना ही था और हुआ भी। पूरे मोहल्ले को जल्द ही मालूम हो गया कि केपी साहब के घर का नाम कल्लू है। उन्होंने ड्राइंग रूम के दीवान पर अपना कब्जा जमा लिया। चूँकि टीवी भी वहीँ लगा था इसलिये यदि क्रिकेट या फुटबॉल मैच न आ रहा हो तो अपने पोते लालता प्रसाद मिश्र, जिसे प्रेम से वो लल्लू, लालू, ललुआ बुलाते, के साथ पोगो देखने में उन्हें बहुत आनंद आता। बेटे-बहू ने पिता जी के चक्कर में टीवी देखना छोड़ दिया। उन्हीं के चक्कर में केपी की मित्र मण्डली और बहू की सहेलियों ने आना-जाना कम कर दिया। निष्कपट भवानी बाबू का ध्यान इस ओर कभी गया ही नहीं। इन सब प्रपंचों से मुक्त उन्होंने अपना सर्वस्व लल्लू की सेवा में झोंक रखा था। उनके हिसाब से उन्हें इस जिन्दगी इससे ज़्यादा की उम्मीद भी नहीं थी। 

सब कुछ ठीक चलता रहता यदि लल्लू का प्ले ग्रुप में दाख़िला ना होता। भवानी बाबू को क्या पता कि अफसर बनाना अब उतना आसान नहीं रहा। प्लेग्रुप से जब बच्चा मेहनत करेगा तभी तो इंजिनियर या डॉक्टर बनेगा। उनका ज़माना तो रहा नहीं कि डिग्री लो और नौकरी पा जाओ। बेटे-बहू को अब पोते के भविष्य की चिन्ता होने लगी थी। "देखो ये पिता जी के साथ रहेगा तो यही सब करेगा। टीवी में कितना मन लगता है इसका। ऐसा करो पिता जी को पीछे कमरे में शिफ्ट कर देते हैं। एक टीवी और लगवा दो। उन्हें क्या, बस दिन भर टीवी ही तो देखना है।" पति-पत्नी ने मशविरा किया और अगले दिन इस योजना को क्रियान्वित भी कर दिया। पढ़ाई बढ़ने के साथ-साथ लल्लू भी व्यस्त होता चला गया। कभी ट्यूशन्स तो कभी कोचिंग। उम्र के इस पड़ाव तक पहुँचते-पहुँचते बिना जले ही रस्सी के सारे बल ढीले पड़ जाते हैं। मूल और सूद के दम पर अपना घर छोड़ आये थे। अब तो जिस विधि राखे राम उसी विधि रहिये वाली स्थिति थी। शरीर भी कम साथ देने लगा था इसलिये बाहर निकलना दिनोंदिन कम होता जा रहा था। शाम होते-होते पीछे कमरे में उनका मन हुड़कने लगता। पता भी नहीं चलता कल्लू ऑफिस से आये की नहीं।

साढ़े-चार बजते न बजते वो साइड के गलियारे से निकल कर गेट तक आ जाते। और गेट पर लटक कर कल्लू के लौटने का इन्तज़ार करते। हर आने-जाने वाले से अपनी फ़िक्र का ज़िक्र ज़रूर करते। "का बतायीं अबहिन तक कल्लू नहीं आये।" अन्दर से बहू चिल्लाती "बाबू जी अन्दर आ जाइये जब आना होगा आ जायेंगे। आपके गेट पर खड़े होने से वो जल्दी नहीं आ जायेंगे।" धीरे-धीरे ये रोज का नियम बन गया था। अब तो अडोसी-पडोसी भी चुटकी लेते। पूछ लेते "बाबू जी कल्लू अभी आये नहीं क्या।" भवानी बाबू निशंक भाव से बताते कि "आज बड़ी देर हो गयी। कल्लू को पता नहीं ऑफिस में कौन सा काम आ गया। पता नहीं कहाँ लेट हो गये।" गेट पर ऑफिस की दिशा में टकटकी लगाये खड़े बाबू जी को देख कर सरकारी गाड़ी से उतरते हुये श्रीमान केपी  मिश्र  उर्फ़ कल्लू का रोम-रोम सुलग उठता। उन्हें पता था कि साढ़े-चार बजे से गेट पर लोग कल्लू-कल्लू नाटक का रसास्वादन कर रहे होंगे। वो आपे से बाहर हो उठता। उन्हें लगभग डाँटते हुये अन्दर चलने को कहता। भवानी बाबू शायद इसी में खुश हो जाते कि बेटा सकुशल वापस आ गया और उसने उनसे बात की।

जगह बदलती है, समय बदलता है, नहीं बदलता है समय का लेख। कल ही किसी ने सूचना दी कि करिया भैया बेटे लल्लू के साथ लखनऊ में रह रहे हैं। आजकल केपी बाबू हर शाम बालकनी में आधे लटके हुये टकटकी बाँधे लल्लू के ऑफिस से लौटने का इंतज़ार करते हैं। और लल्लू ऑफिस से लौटते ही जब तक उन्हें दो-चार खरी-खरी न सुना दे, वो अन्दर नहीं जाते। उन्हें उसकी बातों का बिल्कुल बुरा भी नहीं लगता। ये सिलसिला हर रोज घटित होता है। जाने अन्जाने शायद यही उनका प्रायश्चित है।         

-वाणभट्ट