शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

मॉब लिंचिंग

लम्बी सी मेज पर ऑटोकैड से बनाये ढेर सारे चित्र क्रमवार तरतीब से सजा कर रखे हुये थे। उनके निरीक्षण में किसी प्रकार की दिक्कत न हो, इसलिये देखने वाला और दिखाने वाला दोनों ही पेपर्स के पास जाते और डिस्कस करते। करीब सत्ताईस बोन कॉम्पोनेंट्स के फ्रंट-साइड-टॉप व्यूज़ और उनकी असेम्बली ड्रॉइंग्स रखी थीं। दिखाने वाले ने कहा - "सर जैसा आपने कहा था कि ये उत्पत्ति अल्टीमेट होनी चाहिये। मैंने भी पूरा प्रयास किया है। एक-एक पार्ट के माइन्यूट से माइन्यूट पॉइंट का डिटेल है। सब मिल कर अपने आप में सम्पूर्ण और अद्वितीय है। पूरी एक टीबी की हार्डडिस्क भर गयी। इससे बढ़िया रचना न कभी हुयी है न आगे कभी होगी। जब ज्ञान और बुद्धि को आत्मसात करने वाला मस्तिष्क बना दिया है तो ये नित्य कुछ न कुछ नया करने का प्रयास अवश्य करेगा। हो सकता है भविष्य में हमें भी रिप्लेस कर दे। वैसे तो इसका हर कॉम्पोनेन्ट आवश्यक और अपरिहार्य है। लेकिन मशीन को पूर्णतः आत्मनिर्भर और रचनात्मकता को यथार्थ में परिवर्तित करने के लिये ये असेम्बली ही मानव को अन्य प्राणियों से अलग करेगी। मैंने बहुत सी संरचनायें निर्मित की किन्तु मेरे विचार से इससे उत्कृष्ट व्यवहारिक संरचना मेरी कल्पना से परे है। अब मै अपने कम्प्यूटर को फॉर्मैट करना चाहता हूँ ताकि कोई नयी चीज़ सोच-बना सकूँ।"

गहन चिंतन में डूबे संरचना की असेम्बली ड्रॉइंग को देखते हुये उनके माथे पर चिन्ता की कुछ लकीरें उभर आयीं । "सिर्फ़ हाथों की कमी थी। आपने तो धरती के इस प्राणी को तो पूरी तरह भगवान का ही रूप दे दिया। लेकिन जिस सन्यम और विवेक के साथ हम अपनी बुद्धि का उपयोग सृष्टि निर्माण में करते हैं शायद मनुष्य अपने हाथों का उतना विवेकशील उपयोग न कर सके। शक्ति के सदुपयोग से ज़्यादा उसके दुरूपयोग की सम्भावना होती है, वत्स विश्वकर्मा।" उलझी हुयी दाढ़ी को अपने हाथों से सुलझाने के प्रयास में लगे हुये ब्रम्हा जी ने उवाचा।

विश्वकर्मा जी ने विनम्रतापूर्वक कहा "प्रभु रोज-रोज ना-ना प्रकार के एक से एक विचित्र प्राणी बनाते-बनाते मै थक गया हूँ और अघा भी। इसलिए आपसे अनुनय है कि मुझे अपने जैसे प्राणी का निर्माण करने की अनुमति दी जाये। ऐसा प्राणी जो मेरे काम में कुछ सहयोग कर सके। ये पृथ्वी का सबसे उन्नत जीव होगा। सम्भवतः इसके बाद मुझे किसी और जीव को बनाने की आवश्यकता भी न पड़े। ये खुद ही विज्ञान के माध्यम से नए-नए जीव विकसित करने में सक्षम होगा। इसको मैंने देवताओं की सारी शक्तियों से लैस कर दिया है।" विश्वकर्मा जी के ऊपर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सृष्टि का वर्क लोड़ था। 24  x 7  घंटे,  365  दिन। न कोई ईएल न कोई सीएल। और ब्रम्हा जी इस बात से भली-भाँति वाक़िफ़ भी थे। फिर भी उन्होंने कहा "भाई सोच लो ये हाथ दे दिया तो मनुष्य और देवताओं-भगवानों क्या अन्तर रह जायेगा। हो सकता है इसको प्रदान करने के बाद हमारा और तुम्हारा काम ही ख़त्म हो जाये। अभी तो मानव कभी-कभार भगवानों को याद भी कर लेता है। हाथ मिलने के बाद जो कर्ता भाव आयेगा, मुझे डर है कहीं इन्सान खुद को ख़ुदा न समझ बैठे।" लेकिन विश्वकर्मा जी उस समय उसी तरह रिलक्टेंट थे जैसे आज सरकारी दफ्तर के इनडिस्पेंसिबल अधिकारी। जो कह दिया सो कह दिया बॉस भले आप हों लेकिन चलेगी उनकी ही।

डार्विन साहब की इवोल्यूशन की थ्योरी उन लोगों के लिये है जो अँग्रेजी में लिखी हर बात को ज़रूरत से ज़्यादा तरज़ीह देते हैं। लेकिन उस देश में जहाँ हर तीसरा व्यक्ति अपने फंडे प्रतिपादित करता घूम रिया है, वहाँ कुछ लोग सिर्फ फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन के कारण एंटीगुआ में शरण नहीं माँग रहे हैं। चाहे सरकार को गरियाओ चाहे भगवान को, कउनो रोके वाला नहीं ना। चार पिछलग्गू मिल गए तो एक नयी पार्टी बना लो और बीस मिल जायें तो बाबा बन के नया सम्प्रदाय। पूरी आज़ादी है। चचा गुलज़ार पहले ही फ़रमा चुके हैं - थोड़ी बेकारी है वर्ना यहाँ बाकी हाल-चाल-वाल ठीक-ठाक है। 

जो भगवान इतनी वैराइटी के प्राणी बना सकते हैं, वो बन्दर के इंसान बनने का वेट भला क्यों करेंगे। हज़ारों साल के मानव इतिहास में जब किसी ने टिड्डे को चिड़िया में बदलते नहीं देखा तो ये मानना आवश्यक है कि भगवान ने चिम्पैंजी और आदमी अलग अलग बनाये होंगे। हाँ आदमी बनाने की प्रक्रिया में कुछ बन्दर-लंगूर-आरंगुटान-चिम्पैंजी ज़रूर बन गए होंगे। गौर करिये तो शायद हाथों के फ़र्क ने इंसान को अन्य प्राणियों से अलग कर दिया। आयतन (वॉल्यूम) के हिसाब से बहुत से प्राणियों का मस्तिष्क मानव मस्तिष्क से कई गुना बड़ा होगा लेकिन वो वन-टू का फ़ोर नहीं कर पाये।और आदमी है कि हर समय हर जगह उसी के चक्कर है। इसमें किसी को कोई शक़ नहीं होना  चाहिये कि मानव से ज़्यादा विकसित मस्तिष्क किसी अन्य प्राणी का नहीं है। हाथ ने उसे ये रचनात्मक आज़ादी दी कि जिस चीज़ के बारे में वो सोच सकता है उसका निर्माण भी कर सकता है। मानव साक्षात् विश्वकर्मा का रूप है लेकिन तभी तक जब तक कि उसकी बुद्धि और विवेक में सामंजस्य बना हुआ है। रचनात्मकता है तो सृजनशीलता किसी न किसी रूप में परिलक्षित अवश्य होगी। ये जो अपने चारों ओर हैलीकॉप्टर से लेकर टूथब्रश तक जो भी दिखायी दे रहा है, मानव में निहित विश्वकर्मा का ही प्रतिफल है। कुछ ज़्यादा फेंक दिया हो तो लपेटते चलिये फिर लपेटने का मौका मिले न मिले।  

आदमी को अपना ही समकक्ष बना कर विश्वकर्मा जी को लगा अकेले वो जितना काम नहीं कर पा रहे थे उनके बनाये मानव अपनी सृजनशीलता से धरती को स्वर्ग से भी ऊपर ले जाने में सक्षम होंगे। वो ऊपर बैठे-बैठे बस आइडिया देते और आदमी उसे क्रियान्वित करता रहता। लेकिन आदमी तो आदमी है देवता बनने का ठेका तो ले नहीं रखा है इसलिये कभी-कभी बुद्धि-विवेक का सामन्जस्य गड़बड़ाता रहता है। नतीजन उन्हीं हाथों से वो ऐसे-ऐसे विध्वन्सक कृत्य कर बैठता कि विश्वकर्मा जी को अपने निर्णय पर अफ़सोस होता - कि हाथ दे कर कुछ गलत तो नहीं कर दिया, - कि काश उस समय ब्रह्मा जी की बात मान ली होती।

कुछ देशों ने छोटे-मोटे अपराधों के लिये कॉर्पोरल पनिशमेंट यानि ठुकाई का प्रावधान रखा है। हेलमेट-रॉन्ग साइड-सीट बेल्ट-रैश ड्राइविंग-कूड़ा फेंकना-फब्तियाँ कसना आदि-इत्यादि के लिये यदि गाहे-बगाहे ठुकाई होती रहे तो आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि शौकिया कानून तोड़ने वाले अप्रत्याशित रूप से कम हो जायेंगे। और उस ठुकाई के सजीव प्रसारण के लिये एक चैनल भी डेडिकेट किया जा सकता है। दूसरे के फ़टे में आनन्द खोजने वाले देश में न्यूज़ चैनल से ज़्यादा टीआरपी ऐसे चैनल को मिलनी सुनिश्चित है। कुछ आदिम सभ्यता का पालन करने वाले देशों में तो चोरी-चाकरी जैसे कृत्यों के लिये हाथ के विभिन्न हिस्सों को कम करने का भी प्रावधान है। उंगली काटनी है कि अँगूठा या पूरा हाथ ये चोर की नियत और चोरी के मैग्नीट्यूड पर निर्भर करता है। वो भी 24 से 48 घण्टे के भीतर, बिना किसी लम्बी न्यायिक प्रक्रिया के। वहाँ सड़क पर पर्स फेंक आइये तो भी किसी की क्या मजाल जो उठा ले। यहाँ बैग में बम रख आइये तो भी कबाड़ी चेक करके पुलिस को सूचित करेगा कि सर फलां जगह बम पड़ा मिला है, कहो तो डिफ्यूज करके घर ले जायें। चूँकि पुराने ज़माने के बच्चों की टीचरों और पड़ोसियों द्वारा इतनी ठुकाई हो चुकी होती थी कि बच्चे ज़रूरत से ज़्यादा सुधर जाते थे। इतने सुधर जाते थे कि बड़े होने पर उन्हें घटिया और दुष्ट लोगों की संगत करनी पड़ती थी ताकि वो सिस्टम में फिट हो सकें। यदि देश में छोटे-छोटे अपराधों के लिए वीडिओ रिकॉर्डिंग के साथ यदि ठुकाई की सजा मिलने लगे तो पूरी उम्मीद है बड़े-बड़े न्यायलय और कारागार कबूतरों की क़ब्रगाह बन के रह जायेंगे। सुना है एक देश में तो शिक्षा और कर्तव्य का पाठ पढ़ कर लोगों ने इस कदर अपराध करना छोड़ दिया कि कारागार बंद करने तक की नौबत आ गयी।

अब दिमाग है और हाथ है तो हर आदमी कुछ न कुछ तो करेगा ही। हर आदमी सृजनात्मक रूप से क्रिएटिव हो ऐसा सम्भव भी नहीं है। ऐसे लोगों से ही हाथ के दुरूपयोग की सम्भावना है। वो कान में उँगली करेगा या नाक में। अपने तक सीमित रहे तो गनीमत है। जब अपने नाक-कान साफ़ हो गये तो वो खाली बैठने से तो रहा। अपने नहीं तो दूसरों के ऊँगली करेगा। यहीं से सारी गड़बड़ की शुरुआत होती है। चाहे तो वो हाथ पे हाथ धर के भी बैठ सकता है। लेकिन उसके ज़िन्दा रहने पर लोग प्रश्न खड़े करने लगेंगे। इसलिये ज़रूरी है कि कुछ न कुछ हाथों का उपयोग करता रहे। 

ब्रह्मा जी ने विश्वकर्मा जी से अपनी व्यथा बतायी कि "इन्हें ऐसे छोड़ दिया तो प्रलय से बहुत पहले ही प्रलय लानी पड़ेगी। कुछ करते क्यों नहीं।" टेक्नीकल लोगों की एक खासियत तो है ही कि वो हर समस्या का अप्प्लाईड समाधान निकाल लेते हैं। स्वान्तः सुखाय टाइप के मौलिक शोध में सन्साधन और समय वो व्यर्थ करें जिन्हें कभी नोबेल मिलने की उम्मीद हो। मुस्कुराते हुये विश्वकर्मा जी ने कहा "बस इत्ती से बात"। उन्होंने आनन्-फानन में स्मार्टफ़ोन की परिकल्पना पृथ्वीवासियों के हाथों में थमा दी।

इसका मिलना था कि एक क्रांति आ गयी। कम्प्यूटर की शक्ति वाले इस यन्त्र में असीमित क्षमतायें उफान मारने लगीं। जिन लोगों से ए जी - ओ  जी नहीं सम्भल  रहा था वो  देखते ही देखते 3 जी - 4 जी की बातें करने लगे। हाथ बिज़ी हो गये। लोग अपने आँख-नाक-कान तक भूल गये। अब देश और दुनिया उनके फिंगर टिप पर थी। जो चाहे देखो जो चाहे सुनो। एक बच्चे ने तो हिस्ट्री-जॉग्रेफी विषयों के कोर्स में रखे जाने के औचित्य पर ही सवाल उठा दिया। कहा रटने-रटाने के दिन लद गये। जब गूगल है तो ख़ामख़्वाह अपनी हार्डडिस्क पर क्यों फालतू लोड डालना। हर चीज़ का क्रैश कोर्स है। जब चाहेंगे पढ़ लेंगे, सीख लेंगे। अभी तो बस दिमाग़ को खुलने दीजिये। पैराशूट और दिमाग़ तभी काम करते हैं जब खुले हों। हमारा ज़माना होता तो सरऊ को दुइ कन्टाप मारते। लेकिन अब ज़माना बदल गया है।

ज़माना कितना भी बदल जाये लेकिन आदमी और आदमी की फ़ितरत तो बदलने से रही। विशेष रूप से उस देश में जहाँ नियम-कानून को मानव विकास की सबसे बड़ी बाधा मान कर हर कोई तोड़ने के लिए उत्साहित रहता हो। पहले तो लोग उंगली करके सन्तुष्ट हो लेते थे, स्मार्ट फोन आने के बाद से अँगूठा करने से बाज नहीं आ रहे। दिन भर चैटिंग। पता नहीं कितनी साइट्स और सोशल साइट्स खुल गयी हैं हाथों को व्यस्त रखने के लिये। इस फ़िराक़ में जेसचर-पॉशचर सब बदल गया है। दिमाग और अँगूठे का सामंजस्य बिठाने के चक्कर में बुद्धि और विवेक का तारतम्य टूटता चला गया। शक्ति का उपयोग तभी तक अच्छा है जब तक वो मानव कल्याण में लगे। अब हर कोई अपने-अपने ज्ञान और अनुभव के हिसाब से सामाजिक परिदृश्य की विवेचना कर रहा है। सूचना विस्फोट ने तो आदमी को कन्फ्यूज़ कर ही रखा था उस पर पे कमीशनों ने सोने पे सुहागे काम किया। ज्ञान के साथ इंसान विनम्र होता चला जाता है लेकिन धन के साथ अकड़ता। उसका स्मार्टफोन मेरे स्मार्टफोन से महँगा कैसे। बदल डालो। आदमी इतना बिज़ी है, इतना बिज़ी है कि किताबें पढ़ने का समय नहीं मिलता। तो चिन्ता की क्या बात है। वाट्सएप्प और फेसबुक और इंस्टाग्राम तो है। यहाँ ज्ञान फटा पड़ रहा है। जितना चाहे बाँटो जितना चाहे बटोरो। 

ज्ञान बटोरने तक तो फिर भी ठीक है लेकिन बाँचने से पहले आप ट्रैफिक सिगनल वाला रूल अपनाइये। रुकिए-देखिये-जाइये। ध्यान से पढ़िये - गौर से सोचिये किसे भेजना है - फिर फॉरवर्ड कीजिये। अब होता क्या है कि इतनी इन्फॉर्मेशन जब हर तरफ से दिन भर लगातार आ रही हो तो कई बार बुद्धि-विवेक किनारे रह जाते हैं। जैसे फ़ास्ट बाउन्सर के आगे खड़े हो कर विराट को बल्ला लगाने या छोड़ने का निर्णय फ्रैक्शन ऑफ़ सेकेंड्स में लेना होता है। मैसेज आया और फॉरवर्ड किया में भी स्थिति कुछ ऐसी ही होती है। कई बार तो यकीन मानिये पढ़ने का भी समय नहीं होता आदमी बस बिज़ी रहने के लिये फॉरवर्ड कर देता है। लेकिन समय से बड़ा कोई गुरु नहीं होता। स्वयं गलती करके सीखने के लिये ये जीवन कम है इसलिए जो दूसरों की गलती से सबक ले ले उसे वाकई बुद्धिमान समझा जाना चाहिये। 

एक बार उसकी गलती से मिस्टेक हो गयी। कोई मैसेज आया। पढ़ने से पहले अँगूठे ने अपना काम कर दिया। बाद में जब लोगों के सद्भावना सन्देश आने लगे तो उसने ठीक से पढ़ा तब मिस्टेक का पता चला। जो ज्ञान शेयर किया था वो ज्ञान उस ग्रुप वालों को नहीं चाहिए था। फिर क्या था साहब पूरा का पूरा ग्रुप तीन दिन तक उसके उस ज्ञान पर अपना अज्ञान बघारता रहा। वो तो भला हो विश्वकर्मा जी का जो फोन से निकल कर आदमी सामने खड़ा हो जाए ऐसा आइडिया अभी नहीं दिया है। नहीं तो मॉब लिंचिंग के शिकार में एक नाम और शुमार हो जाता। फिर उसकी धर्म-जाति-बिरादरी देख कर कुछ लोग अवार्ड वापस कर रहे होते और कुछ भारत माता पर गर्व।

- वाणभट्ट 

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

बिरादर 

चीफ साहब ने अपने रिटायरमेंट की फेयरवेल पार्टी थ्री-स्टार होटल में रखी थी। वो कभी साहब का ख़ास हुआ करता था, सो दूसरे शहर में रहने के बावजूद उसको आमन्त्रण मिला। चूँकि आख़िरी मौका था। इसके बाद कुछ श्रद्धा सुमन अर्पित करने का सौभाग्य न मिले, इसलिये आधे दिन की छुट्टी लेकर वो फ़ंक्शन में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने पहुँच गया। 

टैक्सी कर के पहुँचने पर भी उसे कुछ देर हो गयी। जब वो पहुँचा, पार्टी अपने शबाब पर थी। हॉल में घुसते हुये उसके पेट में एक अजीब सी गुड़-गुड़ होने लगी। उसे लगा सबकी निगाहें उसी पर टिकी हैं और हर शख़्स उसे घूरता सा लगा। कुछ लोग उसे देख कर बातें कर रहे थे। कुछ उसे कनखियों से देख कर मुस्कुराते और अट्ठहास करते से लगे। वो कॉन्शस हो गया। 

दरअसल उसने इस पार्टी के लिये विशेष रूप से सूट सिलवाया था। जल्दबाज़ी में टेलर को सिर्फ एक बार ट्रायल दे पाया। ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी लेकर जैसे-तैसे टेलर के यहाँ से सूट कलेक्ट करते हुये जब तक घर पहुंचा, तब तक टैक्सी वाला आ चुका था। दस मिनट में तैयार हो कर वो टैक्सी में बैठ गया था। घर से चलते-चलते उसने आदमक़द आईने में अपना निरीक्षण किया। एक झल्लाहट सी हुयी उसे टेलर के ऊपर। इतना कहने के बाद भी दायें कन्धे के पास एक झोल आ ही गया। जब वो पार्टी में पहुँचा तो उसे लगा पार्टी में मौज़ूद हर व्यक्ति का ध्यान नये सूट के उस झोल पर है और हर कोई उस पर टीका-टिप्पणी कर के आनन्द ले रहा है। उसका मूड स्पॉइल हो गया। ये लोग भी अपने काम से काम नहीं रखते बस दूसरे के फटे में टांग अड़ाते रहते हैं। एक तो दर्ज़ी ने इतना मँहगा कपड़ा ख़राब कर दिया और इन्हें मज़ाक का मौका मिल गया।

जब वो बीटेक करने प्रौद्योगिकी कॉलेज में प्रवेश लेने गया था तब भी उसे ऐसा लगता था कि सारे लोग उसके प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। वो उसको पिछड़ा होने के कारण कुछ हेय दृष्टि से देखते हैं। प्रोफ़ेसर और छात्र सब उसके ख़िलाफ़ हैं और जानबूझ कर उसे नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं। उसको सामाजिक असमानता का पाठ घुट्टी में पिलाया गया था। तथाकथित सम्भ्रान्त बने बैठे लोगों ने उनके पुरखों पर कितने अत्याचार किये। उनको गाँव के बाहर रहना पड़ता था। लोग उनकी परछाईं से भी दूर भागते थे। कोई उनके हाथ का छुआ न छूता था न खाता था। उन्हें अछूत होने का दंश झेलना पड़ता सो अलग से। ठाकुर-बाम्हन-बनिया सब सक्षम लोग थे जो इनको आगे बढ़ते नहीं देख सकते थे। शिक्षा के अधिकार तक से इन्हें वंचित कर रखा था।

यद्यपि की जीवन ने उस जीवन को न कभी देखा था न भोगा था। लेकिन रोज सुबह शीशे में अपना अक़्स देखते हुये उसकी सारी स्मृतियाँ चलचित्र की तरह जागृत हो जाती। तथाकथित अगड़ों के प्रति उसका मन तिरस्कार से भर जाता था। पिता जी भी उसे याद दिलाने का कोई मौका न छोड़ते कि उनके साथ बहुत अन्याय हुये थे। 

पिता जी को बचपन से पढ़ने-लिखने में होशियार थे। उनकी प्रतिभा को देख कर पण्डित हेडमास्टर ने उन्हें प्रोत्साहित किया। पाँचवीं की छात्रवृत्ति के आधार पर उनका दाखिला शहर के सरकारी स्कूल में करवाने में हर संभव मदद की। अपने अथक परिश्रम और प्रयासों के द्वारा पिता जी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में समाज में व्याप्त तमाम अंतर्विरोधों के बावज़ूद बड़े अधिकारी के पद तक पहुँचे। लेकिन अतीत के नाम पर उनके पास केवल समाज में व्याप्त कुरीतियाँ और पुरखों की कानबीती के दुःस्वप्न ही बचे थे। जिसमें हेडमास्टर साहब का योगदान शामिल नहीं था। 

वो अपने सभी बच्चों को पढ़ने के लिये प्रेरित करते और अपने बीते हुये दिन याद दिलाते रहते। ये बात अलग है कि अधिकारी बनने के बाद से उनका गाँव से संपर्क लगभग खत्म था। सरकारी स्कूल में दाखिले के साथ ही गाँव का मोह कम होता चला गया। वजीफ़े से ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढाई ने घर पर निर्भरता को ख़त्म कर दिया था। पिता जी ने जिस दिन छोटे भाइयों को अपने साथ रख कर पढ़ाने के लिये कहा तो साल में दो-चार चक्कर जो घर के लग जाते थे, वो भी कम हो गये। नौकरी लग जाने के बाद अपनी ही बिरादरी के शहराती परिवार ने छेक लिया। और पढ़ी-लिखी लड़की के बीवी बन जाने के बाद तो गाँव-घर जाना बन्द सा हो गया। एक-एक कर के वो हर उस छाया से दूर होने में लग गये जो उनको उनके पिछड़ेपन की याद दिलाती। अपने ही गाँव-घर-परिवार के लोग उन्हें पिछड़े और जाहिल नज़र आते। अतीत का सब कुछ वो भूल चुके थे सिवाय इसके कि उनके पुरखे किस अन्याय और अत्याचार से गुजरे थे। अपने बच्चों को वो इन्हीं यादों के सहारे पढ़ाई के लिए प्रेरित करते। 

उन्होंने सभी बच्चों को बारहवीं तक विज्ञान विषय से पढ़ने का अवसर दिया। टारगेट था किसी तरह बारहवीं पास करना। अपनी-अपनी योग्यता अनुसार कोई इंजिनियर बन गया कोई डॉक्टर। चूँकि उनकी तरह किसी ने बीए नहीं किया नहीं तो प्रशासनिक सेवा में ज़रूर सेलेक्ट हो जाता। जीवन ने एनआईटी से सिविल में बीटेक किया। उस समय सिविल सिर्फ़ एंट्रेंस के टॉप उम्मीदवारों को ही मिल पाती थी। निर्माण विभाग में उसकी नौकरी की शुरुआत आज रिटायर हो रहे चीफ़ साहब के अन्तर्गत ही हुयी। अपनी ही बिरादरी के होने के कारण उन्होंने उसको एक पुत्र का सा स्नेह दिया। उनकी छत्रछाया में उसने अभियांत्रिकी के वो गुर सीखे जो एनआईटी के गुरुजन नहीं सीखा पाए थे। आज उसके पास वो सब कुछ था जो एक सुविधजनक जीवन के लिये आवश्यक समझा जाता है। उसके जीवन में ऐसा कुछ नहीं था जिसके लिये वो किसी और को दोष दे सके। लेकिन पिता जी के द्वारा बचपन से सुनाये गये संस्मरण उसके जेहन में ऐसे अंकित थे जैसे उसने भी वही नारकीय जीवन जिया हो। गाहे-बगाहे बिना उसकी इच्छा और अनुमति के पिता प्रदत्त संस्कार जागृत हो जाते थे। विशेष रूप से किसी आयोजन या समारोह में। 

उसके पेट की गुड़-गुड़ बढ़ती जा रही थी। मन हो रहा था समारोह छोड़ कर निकल जाने का। ख़ामख़्वाह वो क्यों हास्यास्पद बना सबके सामने घूम रहा है। सबकी नज़रें उसके सूट के दायें कन्धे के झोल पर टिकी हुयी थीं। इतने में चीफ साहब की नज़र जीवन पर पड़ गयी। उन्होंने दूर से ही उसे आवाज़ दे कर बुलाया और बड़ी ही आत्मीयता से सीने में भींच लिया। जैसे कोई छोटा भाई बहुत दिनों बाद मिला हो। मन ही मन जीवन ने सोचा - चीफ साहब कितने भले इन्सान हैं उनका ध्यान सूट के झोल पर नहीं गया। उसे शायद ये नहीं पता कि तेज रोशनी में  लिपे-पुते चेहरे अपना-अपना झोल सीने में दफ़न किये हँसते-मुस्कुराते-खिलखिलाते हैं। उसी की तरह सब अपने-अपने झोल में उलझे हैं, दूसरे के झोल से किसी को कोई सरोकार नहीं है। सभी का अतीत गर्व करने लायक हो ऐसा तो हो नहीं सकता।   

कीमती गिफ्ट मिसेज़ चीफ़ के हाथों सौंप कर उसने पहली बार हॉल को नज़र भर देखा कि शायद कोई अपना बिरादर मिल जाये। 

- वाणभट्ट 
     

शनिवार, 1 सितंबर 2018

या देवी सर्व भूतेषु

सुबह-सुबह अदरक की कुटाई चल रही थी। टहलने के बाद किसी धार्मिक चैनल पर प्रवचन सुनते हुये अखबार से चिपक जाना प्रकाश की आदत बन चुकी थी। लोग अखबार ऐसे पढ़ते हैं जैसे किसी एग्जाम के लिये जीके की तैयारी कर रहे हों। पता नहीं कौन सा क्वेशचन कहाँ से आ जाये। लेकिन दस मिनट बाद कोई पूछ लें कि कोई खास खबर तो बतायेंगे फलां मोहल्ले में चोर भैंस हाँक ले गये...कैसा ज़माना आ गया है। 

कुछ अलग करने की गरज़ से प्रकाश एडिटोरियल पढ़ा करता था। समकालीन चिंतकों के विचार पढ़ना उसका शग़ल था। कब कहाँ मौका मिल जाये और वो उन विचारों को अपना बता कर बुद्धिजीवियों की कतार में शामिल हो जाये। विचारों का कहाँ कॉपीराइट होता है। ये बात अलग है कि संख्याबल पर चलने वाले इस देश में बुद्धिजीवियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। पढ़ते-पढ़ते उसने जिज्ञासा को आवाज़ लगायी "चाय नहीं आयी अभी तक, अखबार खत्म होने को आया। अरे हाँ आज का अखबार बिल्कुल छूना मत। पता नहीं क्या-क्या छाप देते हैं देवी।" वो जिज्ञासा को देवी ही बुलाता था। शायद स्वयं को देवता घोषित करने का ये सबसे आसान तरीका है क्योंकि यंत्र नार्य पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता वाला सीधा-सटीक सिद्धान्त है।

जिज्ञासा चाय की ट्रे हाथ में लिये हाज़िर हो गयी। "क्यों न पढ़ूँ आज का पेपर। ज़रूर कोई नारी मुक्ति की बात लिखी होगी। चाहे कोई कितना भी पढ़-लिख ले लेकिन नारी की स्वतंत्रता उसे रास नहीं आती। अब तो पढ़ना ही पड़ेगा। अखबार बढ़ाओ।" चाय का प्याला पकड़ते हुये प्रकाश ने अखबार का न पढ़ने वाला पन्ना आगे करके पत्नी को पकड़ा दिया। 

प्रकाश एक मल्टीनेशनल फर्म में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। जिज्ञासा विज्ञान में पीएचडी कर के एक फार्मा कम्पनी में कार्यरत थी। दोनों की केमिस्ट्री अच्छी थी। नोक-झोंक हर समय चलती रहती। ऐसे ही साल गुज़रते गये और जिम्मेदारियाँ बढ़ती गयीं। जिज्ञासा ऑफिस और घर का मैनेजमेंट बखूबी निभाती जबकि उम्र में प्रकाश से कुछ छोटी ही थी। लेकिन दो बच्चों के बाद भी प्रकाश पूरा बच्चा ही बना हुआ था। जब तक वो घर पर रहता उसकी ज़िन्दगी जिज्ञासा के इर्द-गिर्द ही घूमती। कपड़े निकल दो। टाई कहाँ है। क्या खिला रही हो। हर समय कहाँ बिज़ी रहती हो। कुछ देर साथ बैठ जाया करो। लेकिन डबल ड्यूटी करने वाली जिज्ञासा के पास इतना समय कहाँ था। सो निर्णय ये हुआ कि सुबह की चाय साथ पियेंगे। और ये नियम बदस्तूर चलता था।

आज के एडिटोरियल में किसी महिला एक्टिविस्ट ने एक बहुत ही सुन्दर लेख लिखा था। उसका अभिप्राय ये था कि आज महिलायें लगभग हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम कर रही हैं। और अक्सर उनसे अच्छा भी। वो उच्च पदों को सुशोभित ही नहीं कर रही बल्कि उनमें निहित व्यावसायिक ज़िम्मेदारियाँ बखूबी निभा रही हैं। खास बात ये है कि घर वापसी पर भी घर के सारे काम उनका इंतज़ार कर रहे होते हैं। और वो इसे काम भी नहीं मानती। पति और बच्चों के साथ दोस्त-रिश्तेदारों को सम्हालना शायद सुपरवुमन के बस की ही बात है।

लेख ने एक प्रश्न खूबसूरती से उछाला था कि ये पुरुष ऑफिस में ऐसा क्या करते हैं कि घर आने के बाद सिर्फ टीवी देखने और मैगज़ीन पलटने लायक ही बचते हैं। देवता बनना शायद  कठिन नहीं है लेकिन देवता बने रहना थोड़ा मुश्किल ज़रूर है। जिज्ञासा ने लेख खत्म करते हुये अपने अंदाज में कहा "कब से हाथ बटाने का इरादा है मिस्टर प्रकाश।"

- वाणभट्ट

शनिवार, 25 अगस्त 2018

काली भेंड़ 

तीसरा लगते-लगते इन्सान के अन्दर का आदमी बाहर झाँकने लगता है। जैसे रंगे सियार का रंग छूटता है। सुपीरिऑरिटी और अंग्रेज़ी दोनों सर चढ़ कर बोलने लगती है। शर्मा जी का तीसरा पैग ख़त्म होने की कगार पर था। आँखें शून्य की ओर लगभग स्थिर हो रही थी। आवाज़ लड़खड़ा ज़रूर रही थी लेकिन थी रौबीली और दमदार। क्लोज़ सर्किट की पार्टी थी। लेकिन किसी दारु पार्टी का असली मज़ा वही लोग लेते हैं जो इरशाद-इरशाद और मुकर्रर-मुकर्रर करके दूसरों को चढ़ाये रहें। 

बोले " यू  नो , फ्रॉम द वेरी बिगनिंग आई वाज़ वेरी हार्ड वर्किंग। इन फ़र्स्ट  अटेम्प्ट आई क्वालिफाइड फॉर सिविल सर्विसेज़। माई इल्डर ब्रदर वाज़ ऑल्सो वेरी इंटेलिजेंट। ही जॉइन्ड फॉरेन सर्विसेज़। यंगर ब्रदर मैनेज्ड विथ स्टेट सर्विसेज। वी हैड वेरी लॉन्ग जर्नी। फ्रॉम स्माल हैमलेट टु बेस्ट सर्विसेज़। आल विथ आवर हार्ड वर्क एंड डेडिकेशन। वी आर नाव वेरी रेप्यूटेड एंड सक्सेसफुल फैमिली इन माई विलेज। फ़ादर वाज़ सिम्पल प्राइमरी स्कूल टीचर..."।

वर्मा को मालूम था अब कैसेट पूरा रिपीट हो कर ही रुकेगा। लेकिन वो ये भी जानता था कि कहानी कब और कैसे ख़त्म करनी है। तब तक इरशाद करने का फ़र्ज़ तो बनता ही था। पूरा २०-२५ मिनट के मोनोलॉग से सभी पूर्व परिचित थे।  

"... वी ऑल आर वेल सैटल्ड। डूइंग वेल इन ऑफिस एंड फैमिली फ्रंट्स।"

कार्यक्रम का पटाक्षेप करने के उद्देश्य से वर्मा ने ठाकुर को आँख दबाते हुये पूछ ही लिया "सर आप लोग तो चार भाई हैं?"  बस फिर क्या था सभा में एक सन्नाटा सा छा गया। पर मजबूरी थी। शर्मा को झाड़ से उतारने का ये आज़माया हुआ नुस्खा था। पलीता लगा कर वो चुप हो गया। चौथा पेग अन्दर जा चुका था। शर्मा कन्ट्रोल के बाहर होने को था। लेकिन वर्मा का प्रश्न सुन कर एक ठण्डी साँस लेते हुये हिंदी में बोला "एक और बनाओ यार। क्या बतायें वर्मा वही सबसे छोटा भाई इज़ ब्लैक शीप इन माई फैमिली...।" मोनोलॉग फिर शुरू हो गया। पर आवाज़ का वो वज़न ग़ायब था जो शुरुआत में था। पता नहीं लोग क्यों दूसरे की ख़ुशी से खुश नहीं हो पाते। वर्मा को कुछ आत्मग्लानि सी महसूस हुयी। लेकिन तीर चल चुका था।      

ब्लैक शीप यानी काली भेंड़ को बचपन से मालूम था कि पढ़ाई -लिखाई उसके बस की बात नहीं है। बड़े भैया लोग शहर में रह कर पढ़ रहे हैं। वो बताते रहते हैं बड़ी मेहनत है पढ़ने में। उनका खर्चा मास्टर जी छोटी सी तनख्वाह और थोड़ी सी खेती से बड़ी मुश्किल से हो पाता था। मास्टर जी को भी लगता कि सब लायक निकल गए तो बुढ़ापे में उनकी सेवा-टहल कौन करेगा। पिता जी जब अपने सेमी-पक्के मकान के वरांडे में पड़े सोफे पर पैर चढ़ा कर यार-दोस्तों संग बैठते तो जोश में बेझिझक एक लड़का नालायक होने की महत्ता पर बल देते। उन सबको चाय-पानी कराते हुये काली भेंड़ को लगता पिता जी सही ही तो कह रहे हैं। उसके अलावा कौन है उनका ख्याल रखने वाला। बड़े भैया लोग गाँव में उनकी ज़रूरत का पूरा ख्याल जो रखते थे। नया सोफा लिया तो पुराना यहाँ छोड़ गये। नयी कार ली तो पुरानी  बजाज की ताली मना करने के बाद भी थमा गये कि पिता जी को कहीं जाना हो तो दिक़्क़त न हो। फ्रिज़-टीवी सब तो  हो गया है। धीरे-धीरे कच्चा मकान पक्का हो रहा है। छत पड़ गयी है और फर्श भी बन जायेगा। भाई लोग जब भी कोई ज़रूरत हो, धन का अभाव नहीं होने देते थे। बच्चों को बड़े भाइयों के बच्चों के कपड़े और किताबें सब मिल जाते। खेती में जो लागत लगती, उसका खर्च देते रहते। शहर वालों को शुद्ध खान-पान कहाँ मिलता है इस गरज़ से काली भेंड़ उनकी गाड़ियों में ताजे फल-सब्ज़ी रख देता। नौकरी कहीं भी हो पर घर के पास रहने के लिहाज़ से लखनऊ में सबने अपने-अपने मकान बनवा लिए थे। अब गोंडा के कस्बे में रहना उनके लिए मुश्किल था। सुबह आते और शाम तक निकल जाते। जाते-जाते उनका दिल भर जाता कहते पिता जी का ख्याल रखना। इससे ज़्यादा सुख की कल्पना कभी काली भेंड़ ने नहीं की थी।  

"...वी आर रियली वरीड। व्हाट विल हैपन टु हिम व्हेन फ़ादर इज़ नॉट देयर।"  

सुधी पाठकों से निवेदन है कि काली भेंड़ को ये बात कोई बताना मत। 

- वाणभट्ट  


रविवार, 6 मई 2018

बेरोज़गारी 

2019 का चुनाव क्या आ रहा है, सारा का सारा विपक्ष विकास ओरिएंटेड हो गया। अब हर कोई पूछ रहा है विकास कहाँ है। कोई विकास को पागल बता रहा है कोई ग़ुमशुदा। सब ये याद दिलाने में लगे हैं की एक ज़माना था जब विकास की नदियाँ दिन दहाड़े बहा करतीं थीं। आलम ये है कि हर विपक्षी कोई चीख़ - चीख़ के गा रहा है " कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन"। और पक्ष कह रहा है "छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी"।     

लेकिन कालचक्र का काम है आगे बढ़ना। हाँ यदि सत्ता विरोधियों के बस चले तो घड़ी को एंटीक्लॉकवाइज़ घुमा दें। क्योंकि आजकल उनका एन्टी शब्द से प्रेम उफान पर है। उनका काम है सरकार के हर काम के एंटी चलना या एंटी बोलना। चाहे सरकार सर के बल खड़ी हो जाये। चुनाव सर पर है इसलिये फूफा और जीजा टाइप के लोगों का विरोध चरम पर है। घर में तो कोई पूछ नहीं रहा है तो देश की चिंता ही कर ली जाये। अगर थोड़ा ढीले पड़े तो 2019 भी हाथ से गया समझो। और अगर दस साल मिल गये तो शायद सरकार का विकास देश को दिखने भी लगे। तब किस बात से देश की धर्म-सम्प्रदाय-जातियों में बँटी जनता को भड़काया पायेंगे। 

दरअसल विकास तो सिर्फ बहाना है चूँकि सोशल मीडिया पर जाति या धर्म के आधार पर बरगलाना अशिक्षित और पिछड़ेपन की निशानी है इसलिए विकास और बेरोज़गारी ही ऐसे मुद्दे हैं जो धर्मनिरपेक्ष टाइप लगते है। हालाँकि यहाँ भी एक संप्रदाय या कुछ जातियों के विकास/बेरोजगारी की ही प्रमुखता है। एक विपक्षी मित्र से रहा नहीं गया बोले किस टाइप के वर्मा हो अगर ये सरकार चल गयी तो मनुवादी फिर हावी हो जायेंगे। मैंने कहा की उसमें बुराई ही क्या है। मनुस्मृति कहती है - "जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते" अर्थात "जन्म से सब शूद्र होते हैं और कर्म से पण्डित बनते हैं"। और चिंता की क्या बात है। देश तो संविधान से चलता है न की मनुस्मृति से। हमारे घर के पूजाघरों में गीता-रामायण तो हैं लेकिन मनुस्मृति शायद ही किसी के घर मिले। फिर इस पुस्तक का इतना विरोध क्यों। बहुत सी किताबें हमने नहीं पढ़ीं हैं, बहुत सी बैन हैं। जिन्हें जो पढ़ना है पढ़े, जिन्हें जो मानना है माने, मेरा क्या। फिर उन्होंने दार्शनिक अंदाज़ में फ़रमाया - आप नहीं समझेंगे आपने उस प्रताड़ना को नहीं भुगता है जिन्हें उनके पुरखे युगों से भुगतते आये हैं। इसमें कोई शक नहीं शहर में रहने के कारण संभवतः समाज के इस विद्रूप रूप को हमें करीब से देखने का मौका न मिला हो। जाते-जाते साहब ने आखिरी तीर मारा - ये साम्प्रदायिक लोग हैं देश के टुकड़े-टुकड़े कर देंगे। शायद उन्हें याद नहीं कि एक समय ऐसा था जब लोग मंदिर-मंदिर और मठ-मठ नहीं घूमते थे। इमाम साहब के दरबार में उनके गुर्दे सहलाये जाते थे कि वो धर्म निरपेक्ष राजनितिक पार्टी के पक्ष में फ़तवा निकाल दें। आजकल वो बेचारे कहाँ झख मार रहे हैं इस बात में मीडिया चैनलों की दिलचस्पी होनी चाहिये।  

वैसे मुझे लगा इनकी बात में वाकई दम है। यदि कर्म से ही सब पण्डित बनते तो चलती का नाम गाडी सरीखे युग में पण्डितों की संख्या भी विलुप्तप्राय प्राणियों जैसी हो गयी होती। ये वाकई गलत है कि लोग जातियों से चिपक के रह गये। इसलिए जो जहाँ था वहीँ ठहर गया। पंडित बिना कर्म किये भी पंडित बना रहा और अन्य कर्म कर के भी पंडित न बन पाये। शिक्षा के प्रचार-प्रसार से इतना फर्क तो पड़ा है ज्ञान किसी वर्ग विशेष तक सिमित नहीं रह गया। इस युग में कोई भी ज्ञानार्जन कर सकता है। लेकिन ज्ञान पाने के लिये आदमी को जिज्ञासु होना चाहिये। लेकिन उस ज्ञान का क्या करेंगे जो दो जून की रोटी भी मुहैया न कर सके। इसलिये नौकरी का प्रावधान किया गया। अब नौकरी है तो  कुछ योग्यताएं भी होनी चाहिये इसलिये इम्तहान भी होने लगे प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक। यहीं से कर्महीन व्यवस्था ने अपनी जड़ें फैलानी शुरू कर दीं। चूँकि नौकरी में न्यूनतम शिक्षा की दरकार होती है इसलिए ऐन-केन-प्रकारेण डिग्री हासिल करने की कवायद बढ़ गयी। पढ़-लिख कर पास होना हमेशा कठिन रहा है। इसलिये पाथ ऑफ़ लीस्ट रेसिस्टेंस के अनुगामियों ने सीधा-सुन्दर-सस्ता तरीका अपनाया। एग्जाम फिक्स करने का। "जहाँ सच न चले वहाँ झूठ सही जहाँ हक़ न मिले वहाँ लूट सही" साहिर साहब बहुत पहले ही फ़रमा गये हैं। हमारी एक खूबी तो है कर्म करके पंडित बनने की बात हमें भले न समझ आती हो लेकिन झूठ और लूट की बातें सजह स्वीकार्य हो जातीं हैं। एक वैज्ञानिक गोष्टी के सबसे आकर्षक प्रोग्राम, लंच, की लम्बी लाइन में खाली प्लेट-चम्मच लिए खड़ा था जब एक पीएचडी याफ़्ता सीनियर मोहतरमा अपनी टीन एज बेटी के साथ बीच में घुस गयीं। उनके किसी मित्र ने टोका मैडम प्लीज़ फॉलो द रूल्स। मोहतरमा ने बिना समय गँवाये अपनी वाक्पटुता का परिचय दे दिया "रूल्स आर फॉर फूल्स"। यकीन मानिये उस दिन से कुछ दिनों के लिये शिक्षा व्यवस्था से विश्वास उठ सा गया था। लेकिन जब दिनोंदिन कठिन होते जा रहे कम्पटीशन्स के सफल अभ्यर्थियों के विश्वास से दमकते चेहरे देखता हूँ तो पुनः विश्वास हो जाता है ज्ञान की खोज अभी भी जारी है। जातियों से हट के पाण्डित्य का आविर्भाव सतत होता रहता है और होता रहेगा।  

अब बात करते हैं बेरोजगारी की। ये एक वृहद् समस्या बन चुकी है। उसके पीछे जॉब्स की घटती सँख्या शायद उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी सरकारी नौकरी की उम्मीदें। सर्वशिक्षा अभियान के तहत शिक्षा तो दी जा सकती है ज्ञान नहीं। ज्ञान को तो अर्जित करना पड़ता है। लेकिन एग्जाम पास करने की हड़बड़ी में शिक्षा और ज्ञान दोनों से हमारी पीढ़ियाँ वंचित रह गयीं। अपने हाईस्कूल और इण्टर के दौरान (80 के दशक में) भी लोग गेस पेपर और पेपर आउट करने की फ़िराक़ में रहते थे। एग्जामिनेशन सेन्टर के बाहर अभिभावकों की भीड़ बता देती थी की बोर्ड परीक्षाएं शुरू हो गयीं हैं। कुछ लोग रिमोट स्कूलों से फॉर्म भरते थे। ठेका प्रथा उन्हें पास करने की गारंटी लेती थी। गुनी लोग बोर्ड ऑफिस से कॉपियां ट्रैक करके एग्जामिनर तक पहुँच जाते थे। समय के साथ कल का घाव आज नासूर बन चुका है। अब जब कोई नक़ल रोकने की बात करता है तो उसे छात्र विरोधी करार दे दिया जाता है। डिग्री कॉलेज में लड़कियों ने फ़्लाइंग स्क्वॉड में गए प्रोफेसरों को पीट दिया। हर जगह नक़ल हो रही है तो हमें ही रोकने क्यों आ गये। एक कॉलेज में लड़के नक़ल कराने के लिए आंदोलित हो गये। बोले अभी तक यहाँ बोल-बोल के नक़ल करायी जाती थी। पास कराने के लिए पैसा ले लिया और अब नक़ल रोक रहे हैं। ये हिम्मत और जज़्बा कबील-ए -गौर है। ये मामला यहाँ तक बढ़ चुका है की मुन्ना भाई की अवधारणा हक़ीक़त बन गयी है। अब जब किसी प्रकार डिग्री मिल गयी है तो हम इतने शालीन भी नहीं हैं कि स्वीकार कर सकें की डिग्री तो मिल गयी लेकिन ज्ञान का गागर खाली ही रहा।

बेतहाशा बढ़ रही जनसंख्या के देश में शिक्षा एक उद्योग बन गया। स्कुल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों की बाढ़ सी आ गयी। उतने ही कोचिंग संस्थान खुल गए। स्कूलों में पढाई की फ़ीस और कोचिंग में ज्ञान बँटने लगा। आज आईआईटी से ले कर आईएएस तक हर चीज़ की कोचिंग है। प्राइमरी से ट्यूशंस की बात करना भी बेमानी लगता है। जो पार्टियाँ सत्ता में रहते हुये धड़ल्ले से नक़ल की पक्षधर थीं आज बेरोजगारी के मुद्दे को लेकर उतनी ही मुखर हैं। और सबके मूल में कहीं रोज़गार की बात नहीं है अलबत्ता सरकारी नौकरी की बात ज़रूर है। कम्पटीशन इतना टफ होता जा रहा है कि डिग्री की कलई खुलनी तय है। ऐसा नहीं है कि सब बच्चे नक़ल कर रहे हैं लेकिन सुविधा विहीन स्कूलों और कॉलेजों में भी छात्र एडमिशन ले रहे हैं और डिग्रियां हासिल कर रहे हैं। पार्टियाँ भी चुनावी माहौल में नौजवानों को नौकरी का प्रलोभन देने में पीछे नहीं रहतीं। एक से बढ़ कर एक वादे किये जाते हैं लेकिन बाद में इन्हें पूरा करना कठिन हो जाता है। 

शिक्षा का मूल उद्देश्य ही मनुष्य को प्रवृत्तियों से मुक्त करना है। पर क्या हम शिक्षा में उन मूल्यों को जोड़ पाए जो उन्हें अच्छा नागरिक बनाने के लिये आवश्यक हैं। शिक्षित व्यक्ति स्वाभाविक रूप से रूल और लॉ को मानने वाला होना चाहिये। ये वाँछित नहीं आवश्यक योग्यता है। बेरोजगारी के विरुद्ध आंदोलन कर रहे छात्रों का उग्र हो जाना, तोड़-फोड़ करना, मार-पीट करना शिक्षित होने के मानदण्डों को पूरा नहीं करता। बड़ी-बड़ी बातें तो कोई भी कर सकता है। आम जनता की छोटी-छोटी बातें देश की दिशा बतातीं हैं। रूल्स को सहज रूप से तोड़ने की प्रवृत्ति हमें अपने पूर्वजों से भी पीछे ढकेल देतीं हैं। बदतमीज़ी स्मार्टनेस का पर्याय बन चुकी है। केजी के बच्चे से तो हम गुड़ मॉर्निंग-थैंक्यू-सॉरी की उम्मीद करते हैं। उम्मीद करते हैं की वो कूड़ा डस्टबिन में डालेगा। पर डिग्रीधारक गुटखा-पान-ज़र्दा चबा कर चुल्लू भर फेचकुर कही भी उगल सकता है। चलती कार के दरवाज़ा खोल कर गुटखे का झाग इस तरह फेंकना कि अपनी कार न ख़राब हो, स्वाध्याय द्वारा कौशल विकास का उदाहरण है। एक मोटरसाइकिल पर तीन सवारी वो भी बिना हेलमेट के, गरदन झुका के मोबाईल पर बात करना और वाहन चलाना, चार लेन सड़क पर उल्टा चलना, कूड़े को निस्पृह भाव से बाहर फेंक देना आदि-इत्यादि कुछ बानगियाँ हैं हमारे शिक्षित समाज की। इनमें बेरोजगार और नौकरीशुदा सब शामिल हैं। तब लगता है सर्वशिक्षा अभियान शायद साक्षरता मिशन से ऊपर नहीं उठ पाया। शिक्षित व्यक्ति बस-ट्रक में आग लगायेगा। रेल रोकेगा पटरी उखड़ेगा। तो समय है रुक कर सोचने का। कुछ कमी हमारी उपब्रिंगिंग में भी हो सकती है। लेकिन शायद शिक्षा का उद्देश्य डिग्री बाँटने तक ही सीमित हो कर रह गया है। 

जिस देश में सब लोग राय देना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हों वहाँ एक राय चिटकाना मेरा भी फ़र्ज़ बनता है। भारत की इस पावन धरा पर जिसका भी जन्म हो उसे एक गुज़ारा-भत्ता देने का सरकार प्रावधान करे। सबको प्राइमरी-सेकेंडरी तक फ्री शिक्षा दे। जिसमें नागरिक शास्त्र अच्छी तरह से पढ़ाया जाए ताकि देश के प्रति कर्तव्य और अपने अधिकारों को सब समझ सकें। उसी योग्यता को जॉब्स का एंट्री लेवल रखा जाये। उच्च पदों पर जहाँ उच्च शिक्षा की दरकार हो उचित लोगों का चुनाव किया जाये। उच्च डिग्री लेकर कम क्षमता वाले पदों पर आवेदन करना नवजवानों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव डालता है। विद्वान लोगों की संख्या सदैव आम लोगों से कम रहेगी। सिर्फ संख्याबल के दम पर ये सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है कि सब इंसान बराबर हैं। इंसानियत के लिहाज़ ये यक़ीनन सब बराबर हैं लेकिन पद-प्रतिष्ठा-पैसे की दृष्टि से हमें अपना परिमार्जन करना ही होगा। और इसका कोई विकल्प भी नहीं है।  

- वाणभट्ट 

रविवार, 7 मई 2017

माँ 

माँ को बनते देखा है 
मैंने 

अनगढ़-अल्हड सी लड़की ही तो थी 
जब आयी थी 
अपनी माँ की कुछ यादें 
कुछ हिदायतें सहेजे 

अनजाने लोगों के दिल में 
पहला प्रवेश चौके से होगा 
सब को मीठी खीर 
और 
पति की कटोरी में थोड़ा नमक 
अगर चुपचाप खा जाए 
तो बेटी - सुखी रहोगी 
माँ ने सिखलाया होगा

फिर तो समय को पंख लग गये 
दो वर्षों की अवधि पलों में बीत गयी
जब पहले शिशु का हुआ आगमन 
वो बेपरवाह सी लड़की 
पलों में बदल गयी 
हर आहट 
हर क्रंदन को  
जीती थी वो प्रतिपल 

अब वो पहले माँ थी 
फिर कुछ और 
बेटी-पत्नी-बहू नहीं 
वो केवल माँ थी 
दूसरे शिशु के बाद 
जो नहीं बदला था 
वो थी माँ  

अल्हड-अटखेलियां कब छूट गयीं 
जीवन के इतने वर्षों में 
बस इतना ही जान सका 
प्राण बसते हैं 
उसके संतानों में 
और किसी का होना सुख है 
पर बच्चों के लिए सब कुछ करना 
मात्र लक्ष्य है 

वो बच्चे जो उड़ जायेंगे दूर 
समय पर 
फिर भी उनके सुख को जीने का अपना सुख है 

उसके सुख में ही सबका सुख है 
वो है तो घर, घर है 
शब्दों की सीमाओं में 
उसे बाँधना बहुत कठिन है 

हाँ मैंने माँ को बनते देखा है 
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अपनी पत्नी में ...
अपने जीवनसाथी में...  

- वाणभट्ट 

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

जड़त्व का सिद्धान्त 


दुनिया में गति विषयक नियमों के प्रतिपादन का सारा श्रेय न्यूटन महोदय को दिया जाता है। लेकिन भारत के ज्ञानी लोग जानते और मानते हैं कि विज्ञान के सभी विषयों का उद्दभव भारत में ही हुआ था। हम लोग तो ख़ुद अपने लोकल जर्नल्स, वेद और पुराण, लिखने में इतने बिज़ी थे कि अपने ज्ञान को किसी विश्व स्तरीय जर्नल में छापने की सोच भी नहीं पाये। अन्यथा भौतिक, रसायन और वनस्पति शास्त्र के सारे के सारे नियम हमारे खाते में ही आते। मियाँ न्यूटन जब सेब के पेड़ से गिरने का इंतज़ार कर रहे थे तब तक हम उन नियमों का अपने जीवन में आत्मसात कर चुके थे। अब हमें गुरुत्वाकर्षण और जड़त्व कोई क्या सिखायेगा। ऊपर से नीचे जाने और यथास्थिति को बनाये रखने में आजतक हमारा कोई सानी नहीं रहा। गंगा जी को जब आकाश से उतरना था तो कोई ऐसा व्यक्ति चाहिये था जो उस मोमेंट ऑफ़ इनर्शिया को ब्रेक कर सके। गंगा यदि शिव जी की जटाओं में न उतरतीं तो सीधे पाताल लोक पहुँच जातीं। जड़त्व को तो हमारे मौलिक अधिकारों की लिस्ट में सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिये था। लेकिन संविधान के लोगों में विज्ञान का ज्ञान कम होने के कारण यह नियम आजतक हमारे मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं हो पाया है। 



जड़ता हमारे देश के कण-कण में व्याप्त है। जब एक जगह अवस्थित होकर हम अपने भीतर ही आत्मसाक्षात्कार जैसे अनिर्वचनीय सुख का अनुभव कर सकते हैं तो भौतिक सुख-समृद्धि के लिये दुनिया को हिला डालना कहाँ की समझदारी है। ब्रम्हानंद और परमानन्द की खोज कोई और क्यों नहीं कर सका। क्योंकि किसी और को उनके गुरुओं ने स्थिर हो के बैठना सिखाया ही नहीं। दिमाग़ को हर रोज़ फॉरमैट करने का प्रावधान किसी और देश से नहीं आरम्भ हो सका। अब जब हम आनंद के अनंत सागर की कल्पना में जड़ हो ही गए तो कोई सिकन्दर आये या बाबर हमें क्या फर्क पड़ता है। हम तो राजा और रंक में भी विभेद नहीं रखते। तुम जग के राजा तो हम मन के राजा। बात बराबर। 



जीवन का सार हमें विरासत में दिया जाता है। क्या लेकर आये हो और क्या लेकर जाना है। जिन्हें ये नहीं पता वो अमरीका खोजें और भारत तक का समुद्री मार्ग तलाशें। हमारा क्या हम तो जिस विधि राखे राम उसी में खुश। इसीलिए हमारे यहाँ क्राँतियाँ नहीं होतीं। मुग़ल आये तो मुग़ल हमारे बादशाह अंग्रेज आये तो रानी हमारी विक्टोरिया। अमरीका में क्राँति होती है तो बीस साल में अंग्रेजों को खदेड़ दिया गया। यहाँ 1857 के बाद कोई क्राँति नहीं हुई। हाँ क्राँतिकारी अवश्य हुये। जिन्होंने अवाम में व्याप्त जड़ता को तोड़ने का प्रयास तो किया, लेकिन जनता में जड़त्व का प्रभुत्व इस कदर छाया रहा होगा कि उसे जन-आंदोलन का रूप नहीं मिल पाया।बल्कि कितने ही क्रांतिकारी देशप्रेम की अलख जगाते-जगाते शहीद की श्रेणी में पहुँच गये। हरित और सूचना क्राँति जन-चेतना का रूप हैं उन्हें आन्दोलन का नाम नहीं दिया जा सकता। आज भी यही जड़ता हर जगह परिलक्षित होती है। मुझे पूरी उम्मीद हैं कि तब और अब की स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं आया होगा। तब भी सत्य-अहिंसा-न्याय की बात करने वाले अल्पसंख्यक थे। आज भी भगत सिंह पड़ोसी के घर ही अच्छे लगते हैं। ऐसे ही कोई देश सैकड़ों वर्ष की गुलामी नहीं ढोता। आज भी कोई बदलाव की बात करता है तो हम तुरंत उसे नकार देते हैं। कहते हैं भाई यहाँ तो ऐसा ही होता रहा है। घूस और दहेज़ भी हमारी परम्परा का हिस्सा बन चुके हैं। गन्दगी तो बाहर है हम मन साफ़ रखते हैं। खुले में शौच से कई लाभ हैं एक तो रिहायशी इलाकों से दूर जाने के चक्कर में टहलना हो जाता है और खेतों की मिट्टी को ख़ुराक़ मिल जाती है।   


गाँधी, सुभाष और शास्त्री जी में संभवतः वह नैतिक बल था कि उनके आवाह्न पर देश के लोग बड़े से बड़ा त्याग करने को उद्दत हो जाते थे। तब ज़माना मीडिया ट्रायल का नहीं था कि उनकी बातों की बाल की खाल निकाली जाती। ना तब जनता बयान देते नेता की भाव-भंगिमा देख पाती थी। अखबार में जो छप गया, लोगों ने अपनी-अपनी श्रद्धा के साथ ग्रहण कर लिया। अब नेता को देश कैमरे की आँखों से देखता है। देश से आँख मिला के बात कर पाने के लिये भी एक नैतिक बल चाहिये। जो अधिसंख्य तथाकथिक लीडरान में नहीं है। उनकी भाषा और चरित्र दोनों ही लिबलिबे हैं जिसे कैमरे से छिपा पाना असंभव हो जाता है। ये नेता लीड कम और लीद ज्यादा करते हैं। लेकिन फिर भी हमारी जड़ता की जड़ें इतने गहरे पैठीं हैं कि कोई आँखों-देखी पर भी भरोसा करने को राजी नहीं है। शक़ के बीज बो रही जड़ता की एक खूबी ये है कि वो बिना संशय के मान लेती है जो उसे बताया जाता है। आज भी लोग अपनी पसंद का अखबार या चैनल देखना पसंद करते हैं। सरकार के विपक्षी और विरोधी पत्रकार सरकारी योजनाओं की धज्जियाँ उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। और समर्थक उतनी ही शिद्दत से सरकार के पक्ष में पैरोकारी करते नज़र आते हैं। कोई तटस्थ तरीके से तथ्यों को नहीं रखता-देखता। यही हाल जनता का है। या तो सरकार के पक्ष में खड़ी होती है या विरोध में। कुछ तो सिर्फ इसलिए विरोध करते हैं कि इसी विरोध पर ही उनकी रोजी-रोटी टिकी है। गलत को गलत और सही को सही कहना हमेशा कठिन रहा है। चाहे घर हो या बाहर। बाप यहाँ बेटे में श्रवणकुमार ढूंढता है और गुरु एकलव्य। जब नयी पीढ़ी इन आदर्शों पर प्रश्न उठाती है, तो लोग ज़माने के ख़राब होने की दुहाई देने लगते हैं। 


मै "इंसाफ की डगर पर बच्चों दिखाओ चल कर" सुन कर बड़े होने वालों की जमात से हूँ और मै अब ये दावे से कह सकता हूँ कि हम मानते हैं कि आदर्श और नीति सिर्फ बच्चों के लिए हैं। बड़ा कोई ऐसी बात करे तो बड़े आराम से कह देते हैं कि ये बच्चा ही रह गया। किसी को यदि देश अधोगति में जाता लगता है तो वो बच्चों की वजह से नहीं हमारी वजह से है। शायद हम उनके सामने उचित आदर्श प्रस्तुत करने में विफल रहे हैं। सबसे ज्यादा निराश करता है शिक्षित और संपन्न वर्ग। जो नियम-कानून का पालन करने से गुरेज़ करता है। मानता है रूल्स आर ओनली फॉर फूल्स। तथाकथिक पढ़े-लिखे लोग सही और गलत में अंतर न कर पाएं तो इस शिक्षा व्यवस्था पर संदेह होना लाज़मी है। आज जब स्वच्छता अभियान की बात होती है तो वो सड़क पर किलो भर थूक उगल के कहता है "सफाई अभियन्वा फेल हुई गवा"। स्वच्छता अभियान का मूल उद्देश्य सम्भवतः लोगों में जागरूकता पैदा करना था कि कम से कम वो कूड़ा फैलाना तो बंद कर दें। सफाई कर्मियों की कठिनाइयों और कर्तव्यों के प्रति लोगों का ध्यान आकृष्ट करना रहा है। लेकिन लोग इसे सरकार की विफलता बता कर खुश हो रहे हैं। लेन में चलना हो या लाइन लगाना इन पढ़े-लिखे अनपढों से आप अधिक उम्मीद नहीं कर सकते।   

आजकल टीवी पर ऐसा ही एलान पूरी बेशर्मी से हो रहा है कि विमुद्रीकरण और कैशलेस अर्थव्यवस्था से कोई लाभ नहीं होने वाला। काला धन, घूस और भ्रष्टाचार को रोक पाना उन्हें असम्भव  लगता है। जितनी मेहनत वो सरकार के दावों की हवा निकालने में कर रहे हैं उतनी कोशिश कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में करते तो आम आदमी का संशय कुछ कम होता। लेकिन वे तो इस जागरूकता को बढ़ाने के बजाय उल्टे-पुल्टे बयान दे रहे हैं। दलील है कि भारत जैसे कम साक्षरता वाले देश में ये लागू नहीं हो सकता। इनमें वो लोग भी शामिल हैं जो अनपढ़ जनता को फ्री लैपटॉप और स्मार्ट फ़ोन बाँटने की वकालत करते हैं। दुकानदार मोबाईल बैंकिंग और स्वाइप मशीनें इसलिए लगाने को तैयार नहीं हैं कि उन्हें वाइट मुद्रा में काम करने की आदत नहीं है। एक मिठाई वाला लागत के दुगने मूल्य की मिठाई बेचता है और डिब्बे सहित तौल कर बिना बिल के पैसा वसूलता है। यही हाल लगभग कमोबेश सभी दुकानदारों का है। बिल और टैक्स देना तो इनके ख़्वाब में भी नहीं आता। जड़त्व का सिद्धान्त इस मामले में भी एक सार्वभौमिक सत्य के रूप में उभरा है। 



जड़ता के आलम का अंदाज़ इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जनता बैंक और ए टी एम के आगे इसलिए लाइन लगाए खड़ी है ताकि मिठाई वाले को, दवाई वाले को, किराने वाले को, सब्जी वाले को, दूध वाले को पैसा कैश दे सके। एक मिठाई वाले को जब मैंने स्वाइप और मोबाईल बैंकिंग के लिये प्रेरित करने का प्रयास किया तो उसने सीधा प्रश्न किया कि "टैक्स कौन भरेगा। हम तो भैया कैश ही लेंगे। किसी को लेना हो तो ले न लेना हो तो न ले"। 



"क़त्ल की जब उसने दी धमकी मुझे, 
कह दिया मैंने भी देखा जायेगा"


उसी क्षण मैंने निर्णय लिया कि इनका व्यवसाय चमकाने में के लिये इनका साथ नहीं दूँगा। लाइन मै लगाऊँ ताकि आप रोकड़ा गिनें।शुरुआत में कुछ कष्ट हुआ। पर अब मैंने ऐसी दुकानों को छाँट लिया है जो मोबाईल या स्वाइप मशीनों का इस्तेमाल कर रहीं हैं। कैश का इस्तेमाल आपात स्थिति में तो ठीक है लेकिन उनका सहयोग करना मुश्किल लगता है जो अभी भी कैशलेस भुगतान के लिये तैयार नहीं हैं। कम से कम मेरे लिए तो ये संभव नहीं है। अब मै उसी दुकान से क्रय करूँगा जो व्यापार में लाभ के साथ-साथ टैक्स भरने की भी मंशा रखते हों। 



हर लेन-देन का हिसाब जिस दिन शुरू हो जायेगा मुझे लगता है चोरी-चकारी, घूसखोरी, दहेज़ प्रथा, काले धन, बेनामी सम्पत्ति, आदि-इत्यादि बुराइयों का समूल नाश हो जायेगा। जड़त्व को तोड़ने के लिए सबसे पहले जड़ को काटना आवश्यक है। ख़ुदा के लिये इस फ़ैसले की बुराई न कीजिये हो सकता है अच्छे दिन आ ही जायें। फिर आप क्या करोगे। हो सके तो आप भी ये संकल्प लीजिये कि अपने इर्द-गिर्द कैशलेस सेवा का प्रसार-प्रचार करेंगे। वर्ना आपके जड़त्व का फ़ायदा दुकानदार उठाएँगे वो भी डंके की चोट पर। शुरुआत तो उनसे होनी ही चाहिए जो स्वयं को शहरी और शिक्षित समझते हैं। यकीन मानिये अशिक्षित लोगों को यदि नियम-कानून का भान हो तो वो कदाचित ही इसके विपरीत जाते हैं। आज स्लीपर कोच में शायद ही कोई अशिक्षित व्यक्ति बिना उचित टिकट के सफर करता मिले। बैंकर और सीए नेटवर्क इस आंदोलन को फुस्स करने में लगा है। जज साहब को दंगे का अंदेशा होता है तो आयकर विभाग के अधिकारी साफ़गोई से नेशनल चैनेल पर इतने मामलों की तफ्तीश कर सकने की अपनी असमर्थता व्यक्त कर रहे हैं। शायद इन्हें ये नहीं मालूम कि प्राइमरी शिक्षा के लिए भी शिक्षकों की भारी कमी है। इसके बावज़ूद यहाँ ग्रेजुएट्स की संख्या में दिन-रात वृद्धि ही हुयी है और उसी की उत्पत्ति सम्वेदना और संस्कार विहीन लोग उच्च पदों की शोभा बढ़ा रहे हैं। 



सरकार ने एक-एक चूड़ी रोज़ कसने के बजाय पूरा पेंच कस दिया है। पूरा का पूरा डण्डा ही दे दिया है। इसे क्राँति कहने में भी विपक्षी भाई लोग कोताही कर रहे हैं। रोज नये-नये संदेह पैदा किये जा रहे हैं। सौ और हज़ार सालों में कुछ हो भी गया तो मेरे विचार से उसे क्राँति की संज्ञा देना उचित नहीं होगा। क्राँति तो वो है जो मात्र कुछ सालों में ही परिकल्पित, रूपांकित और क्रियान्वित हो जाये। ये कुछ ऐसा ही कदम है। सफलता या असफलता का आँकलन तो समय करेगा। फ़िलहाल अभी तो इस क्राँति में सहयोग दीजिये या तटस्थ हो कर इसका मज़ा लीजिये। आप चाहें या न चाहें बदलाव की बयार तो बह चली है। प्रतिरोध का मार्ग छोड़ कर इस बदलाव स्वीकार करने का जिगरा दिखाइये। वर्चुअल मोटरसाइकिल चल पड़ी है। जड़त्व को मारिये गोली। एक बार पूरे जोर से बोलिये - ढर्र-ढर्र, हर्र-हर्र, घर्र-घर्र, फर्र-फर्र। 

"करत-करत अभ्यास के जड़मति होय सुजान,
रसरी आवत जात के, सिल पर पडत निशान।" 
     
- वाणभट्ट