शनिवार, 3 जून 2023

मुस्कुराइये आप लखनऊ में हैं

मुस्कुराइये आप लखनऊ में हैं

उस दिन एबिडेमी का चेहरा कुछ मायूस सा लग रहा था. रात तो अच्छा भला छोड़ के गया था. उसका मूड सातवें आसमान पर था. गेस्ट हाउस की सब्जी-रोटी-दाल की जगह मुर्ग-मुसल्लम का डिनर, वो भी कॉकटेल के साथ. उसकी कई दिनों की पेंडिंग मुराद पूरी जो हो गयी थी. कुछ दिन पहले ही उसका भारत आना हुआ था. नॉलेज एक्सचेंज प्रोग्राम की तहत, नाइजेरिया से. इस एक्सचेंज प्रोग्राम के साथ-साथ उसे उम्मीद थी कि कुछ भारत देखने को भी मिलेगा. अकेले आया था. नया देश, नये लोग और नया खान-पान. उसके आने से पहले ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर ने एक नॉलिजियेबल प्रोग्राम बना दिया था. बहुत ही टाइट शेड्यूल था कि बन्दा लौटे तो ज्ञान का कोई कोना छूट न जाये. हफ़्ते भर क्लास-प्रैक्टिकल-इंडस्ट्री विज़िट और सन्डे-सन्डे उसके इंटरटेन्मेंट के नाम पर आस-पास के टूरिस्ट प्लेसेज़ का भ्रमण. ये बात अलग है कि हमारे यहाँ देशाटन से ज़्यादा तीर्थाटन की सम्भावना है. बेचारा मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे-चर्च में माथा टेक-टेक के हैरान हो गया. बा-मुश्किल 25 साल के युवा ने ऐसी भयंकर ट्रेनिंग की कल्पना भी नहीं होगी.

उसके साथ मुझ जैसे खड़ूस आदमी को अटैच कर दिया गया. जो न खाये, ना खिलाये. जो न पिये, ना पिलाये. उस समय तक मुस्कुराने की आदत भी कम थी. हाँ, दिल का तब भी बहुत अच्छा था, जैसे कि हम सभी हिन्दुस्तानी होते हैं, दिल के अच्छे-सच्चे-साफ़. क्योंकि राज कपूर साहब बरसों पहले फरमा गये थे कि इस देश के लोग इसलिये सच्चे और साफ़ हैं क्योंकि सिर्फ़ इसी देश में गंगा बहती है. और गंगा जी हैं तो सारे पाप धोने का प्रावधान भी है. लेकिन ये बातें अगर आचार-व्यवहार और चेहरे से न झलके तो किसी को कैसे पता चले. अच्छे दिल वाली बात सिर्फ़ मुझे ही पता थी. दूसरे पता नहीं क्या सोचते हों मेरे बारे में. शायद घमण्डी-धूर्त-चालाक-मतलबी, नहीं पता. अन्फ्रेंडली टाइप के लोगों के विषय में शायद मेरे विचार भी कुछ ऐसे ही होते. एबिडेमी की ये ट्रेनिंग सरकार की ओर से प्रायोजित थी. जिसके लिये एक बजट निर्धारित  था. ये भी हो सकता है कि हमारे विश्विद्यालय ने इस ट्रेनिंग के लिये फीस निर्धारण किया हो. उसमें अपने यहाँ उपलब्ध सुविधाओं के हिसाब से ट्रेनिंग ख़र्च का आँकलन लगाया गया हो. आते ही उसे आम स्टूडेंट समझ के विश्वविद्यालय के गेस्ट हॉउस में रख दिया गया. सात फुट के करीब लम्बाई वाले व्यक्ति का भारतीय एवरेज लम्बाई के बेड पर अटक पाना कठिन था. अगले ही दिन जब मैं उससे मिलने गया तो देखा गद्दा जमीन पर आ चुका था.

हफ़्ते भर तक गेस्ट हॉउस का शुद्ध शाकाहारी भोजन कर-कर के एबिडेमी की हालत बिगड़ चुकी थी. मेरा अन्फ्रेंडली, बिना मुस्कुराहट वाला चेहरा देख के उसकी कुछ कहने या डिमाण्ड करने की इच्छा भी नहीं हुयी होगी. दूसरा शनिवार आते-आते उसका सब्र टूट सा गया. उसने धीरे से कहा 'डू यू पीपल ऑलवेज़ ईट वेजेटेरियन फूड्स'. सद्भावना के तौर पर मुझे बताना पड़ा कि नहीं ऐसा नहीं है. 'वी हैव वेरी वाइड रेंज ऑफ़ नॉन-वेज डिशेज़. बट इन द गेस्ट हाउस एंड द पैकेज फ़ॉर योर ट्रेनिंग, देयर इज़ प्रोविज़न फ़ॉर वेजिटेरियन मील्स ओनली'. उसके चेहरे के हाव-भाव से लग रहा था कि बहुत बड़ी गलती कर दी यहाँ आ कर. पता नहीं कहाँ फँस गया. मेरा गुडनेस ऑफ़ हार्ट जागने लगा था. पहले थोड़ा सा मुस्कुराया, फिर खुल के मुस्कुराया. वो भी मुस्कुराने लगा. मैंने उससे कहा - भाई पहले बताना था. उसने छूटते ही कहा कि भाई तुम्हें पहले मुस्कुराना था. आइस ब्रेक होने की शुरुआत हो चली थी.

यहाँ एक से एक नॉनवेज रेस्टोरेंट्स हैं. मैं इतना कर सकता हूँ कि लंच तो नहीं पर डिनर में बाकी बचे दिनों के लिये तुम्हें लखनऊवा हॉस्पिटैलिटी का आनन्द दिलाता हूँ. वापस जा के ये मत कहना कि कोई हिन्दुस्तान मत जाना नहीं तो लौकी-तरोई-टिंडे से तुम्हारा स्वागत होगा. यहाँ के व्यंजन खा कर तुम ख़ुद बार-बार लखनऊ आना चाहोगे. फिर क्या था. रोज शाम  को पूरे के पूरे दस दिन तक लखनऊ के लज़ीज़ नॉनवेज का उसे आनन्द दिलाने में मुझे भी बहुत आनन्द आया. टुंडे कबाबी, दस्तरख़्वान, फ़लक़नुमा, करीम्स आदि का जो चस्का एबिडेमी को लगा तो वो इंडियन स्पाइसी फूड्स का दीवाना हो गया. उसके जाने में अभी चार दिन बाकी थे, जब उसने कुछ संकोच करते हुये बार के बारे में पूछा. मुझे ये तो मालूम था कि ढंग के बार-रेस्टोरेंट्स में पैग बहुत मँहगे पड़ते हैं. बाहर एक पेग की कॉस्ट में पूरा क्वार्टर आ जाता है. और ये भी पता था कि गेस्ट हॉउस की दीवारों पर लाल अक्षरों में बड़ा-बड़ा धूम्र और मदिरा पान निषेध लिखा हुआ था. ये भी अजीब विधान है कि यदि ग़लत काम छुप के किया जाये वो अपराध और खुले-आम डंके की चोट पर किया जाये तो आन्दोलन बन जाता है. अंग्रेजों की सरकार होती तो ये आन्दोलन भी मै कर गुजरता विदेशी मेहमान के लिये. लेकिन यहाँ अपने बाबा की सरकार रोकती-टोकती तो नहीं पर पकड़े जाने पर तोडती बहुत है. इस कर के उसकी या मेरी आन्दोलन करने कि हिम्मत नहीं हुयी. तय हुआ कि अपराध ही कर के देख लिया जाये. दिक्क़त ये थी कि दुकान से ख़रीदे कौन. पीता मै था नहीं. शहर में जानने वालों के बीच मेरी टी-टोटलर की इमेज को धक्का लगने की सम्भावना थी. यदि किसी ने देख लिया तो बची-खुची भी गयी. और ये भी पक्का था कि यदि एबिडेमी लेने गया तो दुकानदार अनाप-शनाप पैसे माँग सकता है. केयर टेकर लोग इस मामले में सहायक सिद्ध होते हैं, यदि उनका ख्याल कर लिया जाये तो. जो इन परिस्थितियों में गलत भी नहीं था. अपराध-भाव कुछ कम हो गया जब उसने बताया कि यहाँ आये नेशनल और इन्टरनेशनल अधिकांश लोगों को इस सुविधा की दरकार होती है. लोगों के घर से टूर पर निकलने का ये भी एक मुख्य कारण हुआ करता है. उनका इंतजाम उसे ही देखना पड़ता था. टुंडे के कबाब और रुमाली रोटी, और करीम के मुर्ग-मुसल्लम के साथ स्कॉच और रम के कॉकटेल के साथ एबिडेमी ने अपना यादगार डिनर किया. गेस्ट हॉउस अटेंडेंटस को भी उस रात अंग्रेजी से काम चलाना पड़ा.

जब एबिडेमी से पूछा कि - भाई आज क्यों बड़े मायूस से दिख रहे हो. तो उसने बताया कि सुबह जल्दी नींद खुल गयी तो मॉर्निंग वाक पर निकल गया. हर आदमी ऐसे देख रहा था, जैसे कि चिड़ियाघर से कोई जानवर निकल भागा हो. मैंने वेव किया, गुड मॉर्निंग की, स्माइल दी, लेकिन सब के सब घूरते हुये निकलते जाते थे. 

देश की इज्जत का सवाल था. मैंने समझाने का प्रयास किया - इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. तुम हो भी तो सबसे अलग. इतने लम्बे हो कि देखने वाले के सर की टोपी गिर जाये. हम लोग थोड़े रिज़र्व टाइप के लोग होते हैं. हम आर्टिफिशियल तरीके से मुस्कुराना नहीं जानते. हमें इस बारे में न बताया जाता है ना सिखाया. पहले तुम भी मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचते थे. एबिडेमी ने बताया कि हम लोग भी किसी अनजान को देख कर नहीं मुस्कुराते लेकिन जब आँखों से आँखें मिल ही जायें तो हेलो-हाय-गुड मॉर्निंग/इवनिंग कह के मुस्कुरा देने में कोई बुराई तो नहीं. लेकिन यहाँ लोग देख तो रहे थे पर रिस्पोंस बिल्कुल नहीं दे रहे थे. मुझे बड़ा अजीब लगा. उसे समझाने के लिये बताना पड़ा कि ये चिन्तकों-मनीषियों का देश है. यहाँ लोग देखते कहीं हैं और सोचते कुछ और हैं. लेकिन सब दिल के अच्छे हैं, बस प्रकट करना नहीं जानते. 

उसे क्या बताता कि आजकल यहाँ यही लेटेस्ट ट्रेन्ड चल रहा है. बचपन में नमस्ते करना सिखाया जाता था. लेकिन उसमें इतना आदर-भाव निहित होता था, जितने आदर के लायक हर व्यक्ति नहीं होता. शनै-शनै लोगों ने नमस्कार अपना लिया क्योंकि इसके माध्यम से आप थोडा तिरस्कार प्रदर्शित कर सकते हैं. लेकिन उसमें भी कम्पटीशन है कि पहले कौन करे. यहाँ बाद में करने वाला ख़ुद को विजेता महसूस करता है. हम मुस्कुराते ही तब हैं जब हमारा किसी से कोई काम पड़ने वाला हो. अगला भी तभी मुस्कुरायेगा जब अगले को मालूम हो कि उसे आप से भी कोई काम पड़ सकता है. यदि ये मालूम हो कि आप से कोई काम नहीं पड़ना, तो खामख्वाह मुस्कराहट क्यों वेस्ट करनी. और कभी जब काम पड़ ही गया, तब मुस्कुरा भी लिया जायेगा. मुस्कराहट की डेप्थ से आप नाप सकते हैं कि किसका किससे काम पड़ने वाला है. जिसके चेहरे पर बत्तीसी दिखाऊ टूथपेस्ट के विज्ञापन वाली स्माइल हो, उसका काम पड़ने वाला है. और फीकी स्माइल वाला जानता है कि जरा सा ज़्यादा मुस्कुरा दिये तो ये अभी ही काम बता देगा. अगर कोई बिना कारण मुस्कुरा रहा है, तो समझ लो कुछ गड़बड़ है. कोई काम पड़ने वाला है. अनजान लोगों से तो कोई काम पड़ना नहीं, तो मुस्कुराना कैसा. सामने से निकलने वाले हर स्त्री-पुरुष को घूरते हुये चलना तो हमारी राष्ट्रीय बीमारी है. लेकिन क्या मजाल कि कोई मुस्कुरा दे या विश कर दे. मेरे एक पड़ोसी और उनकी पत्नी को नाती होने के उपलक्ष्य में बेटी-दामाद ने अमरीका का टिकट भिजवा दिया. न्यूक्लियर फ़ैमिली में, बच्चा जब तक सम्हल न जाये, दादी-बाबा-नानी-नाना की अहमियत बनी रहती है. उनके दो दिन वहाँ रहने के बाद ही एक शाम दामाद जी दो काले चश्मे लेकर ऑफिस से लौटे. बेटी ने धीरे से बताया कि जब आप लोग शोना को घुमाने ले जाते हैं तो ये चश्मे लगा के जाया कीजिये. जाने-अनजाने आप लोग जिसे देखते हैं, देखते ही रह जाते हैं. इसे यहाँ लोग बुरा समझते हैं. पड़ोसी का बच्चा हो या कुत्ता किसी को भी घूरने की जरूरत नहीं है. आप लोग इतनी जल्दी आदत तो बदल नहीं सकते इसलिये चश्मा लगा के निकला कीजिये. 

कुछ आत्मनिर्भर टाइप के लोग भी होते हैं. जो लोग चाहते हैं कि ना वो किसी से काम लें और ना किसी के काम आयें, वो अन्तर्मुखी हो जाते हैं. न किसी की ओर देखते हैं, न मुस्कुराते हैं. सम्भवतः वे ही श्रेष्ठ प्राणी हैं.


-वाणभट्ट

शनिवार, 29 अप्रैल 2023

अंतिम संस्कार

अंतिम संस्कार 

वर्मा पीपल के एक पेड़ की सबसे ऊँची डाली पर पहुँच के उल्टा लटक गया. कैम्पस में बहुत से पीपल के पेड़ बिना प्लानिंग के उग आये थे. चूँकि पीपल में देवी-देवताओं का वास होता है इसलिये श्रद्धा के कारण कोई उसे हटाने को तैयार न था. पाप का भागी कौन बने. सरकारी कैम्पस किसी की व्यक्तिगत प्रॉपर्टी तो होती नहीं. अपना घर-जमीन हो तो मट्ठा डाल-डाल के निकालें. अब आलम ये है कि-

उग रहा है दर-ओ-दीवार पर सब्जा 'ग़ालिब'

हम बयाबाँ में हैं और घर में बहार आयी है 

जुम्मा-जुम्मा आठ साल ही हुये थे, वर्मा को रिटायर हुये. घर-बार-परिवार आज जो कुछ भी उसके पास था, उसके पीछे एक अदद नौकरी का होना ही मुख्य कारण था. वरना दिल के अच्छे और सच्चे लोगों से की दुनिया में कोई कमी है क्या. लेकिन क्या मजाल कि कोई लड़की या लड़की का बाप ऐसे इंसान को अपना पति या दामाद, क्रमशः, बनाने को तैयार हो. नौकरी लगना अपने आप में एक लॉटरी है. जहाँ एक-एक, दो-दो नम्बर से सफलता चूक जाती हो, वहाँ सफलता का श्रेय अपनी कड़ी मेहनत को देना और असफलता का ठीकरा भगवान की मर्ज़ी पर फोड़ना ही नियत बन जाती है. और सबसे बड़ी बात ये थी कि माशाल्लाह वर्मा की शुद्ध सरकारी नौकरी थी. जब तक प्राइवेट में काम करता रहा, वर्मा को ख़ुद ही डाउट हुआ करता था कि शादी होगी भी या नहीं. लड़की वाले इंजीनियर समझ कर आते थे और प्राइवेट के नाम पर मुँह पर ही मुँह बिचका के चले जाते थे. बाद में कितने ही प्रपोजल सिर्फ़ इसलिये आये कि वर्मा के पीछे सरकार खड़ी थी. ये बात तब की है जब प्राइवेट कम्पनियों में पैकेज का दौर शुरू नहीं हुआ था. लड़कियाँ भी स्मार्ट से ज़्यादा लल्लू टाइप के भरोसेमन्द लड़कों को पसन्द करती थीं, जो उनके हिसाब से दिन को रात और रात को दिन बता सके. इस प्रकार उनके घर-बार की स्थापना हुयी. समय के साथ परिवार और समृद्धि में वृद्धि होनी ही थी और हुयी भी. अब उनको काफी हद तक सुखी कहा जा सकता था.  

चूँकि उनके सब कुछ का आधार नौकरी ही थी, इसलिये उन्होंने 'कर्म ही पूजा है' का स्लोगन अपने ऑफिस में अपनी कुर्सी के पीछे लगा रखा था. जिससे हर आने वाला उसे बिना मिस किये पढ़ सके. जिसका नज़रिया सरकारी नौकरी में भी ऐसा हो, वो व्यक्ति कितना महान होगा. वैसे वर्मा कर्मठ व्यक्ति था भी. लेकिन सिर्फ़ कर्मठ होने से काम नहीं चलता. अपने को कर्मठ सिद्ध करने के लिये हर समय मथे रहिये कि आप कर्मठ हैं (और बाक़ी सब निकम्मे). मार्केटिंग का जमाना कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा. सेल्फ़ प्रमोशन के लिये जो भी करना हो, करना चाहिये. भविष्य के इतिहास के जिस हिस्से को हम जी रहे हैं, उसे देख कर सहज आभास हो जाता है, जब महान लोग जीवित रहे होंगे, तो उन्हें लोगों की कितनी आलोचना झेलनी पड़ती होगी. और लोग अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप उन्हें कितने हल्के शब्दों से नवाज़ते रहे होंगे. वो तो तब कैमरे और न्यूज़ चैनेल्स नहीं थे, बस प्रिन्ट मीडिया हुआ करता था और पढना सब जानते नहीं थे. आज के इतने खुले वातावरण में जब मीडिया को गोदी में बैठाया जा सकता है तो तब का इतिहास भी आकाओं के हिसाब से लिखवाया गया होगा. चूँकि वर्मा को उस जमाने में काफी रगड़-घिस के नौकरी मिली थी, तो वो उसके महात्म्य को भली-भाँती समझता था. जो भी जिम्मेदारी मिलती थी उसे यथायोग्यता अनुसार पूरी करने का प्रयास करता था. एक कहावत है 'जहाँ गधे पर नौ मन वहाँ एक मन और' भी डाल दो तो वो चीं नहीं करेगा. जिम्मेदारी निभाते-निभाते वर्मा का हाल वैसा ही हो गया था. सारे थैंकलेस टाइप के कामों के लिये वो हमेशा डिमाण्ड में रहता. ऑफिस के चक्कर में उसने घर को घर नहीं समझा. जाने का तो टाइम था लौटने का कोई पुरसा हाल नहीं. ज़िन्दगी ऐसे ही चलती रही और वर्मा को कभी कोई शिकायत रही हो, ऐसा भी न था. साठ साल की उम्र में जब वो रिटायरगति को प्राप्त हुआ तो उसके बॉसों ने उन पर कशीदों की झड़ी लगा दी. उनके बिना एक निर्वात खड़ा होने वाला था. उसकी पूर्ति कैसे होगी. एक बारगी तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि क्या वो वाकई इतना अच्छा आदमी था, जितना बताया जा रहा था.

लेकिन ये तो समय चक्र है जो नौकरी में आया है, वो साठ का होते ही जायेगा, चाहे वो कितना भी स्वस्थ और एक्टिव हो. कर्मयोगी लोग रिटायर्मेंट के बाद अक्सर इसीलिये बीमार हो जाते हैं कि पूरे दिन में इतना समय है, करें तो करें क्या. रिटायर्मेंट के एक दिन पहले तक इतने व्यस्त रहे कि पूजा-अर्चना-योग-ध्यान और शौक के लिये समय ही नहीं था. अब रोज उठते हैं तो देखते हैं पूरा दिन पहाड़ की तरह सामने खड़ा है. कितना टहलें, कितनी सब्जी लायें. बच्चे सब बंगलौर-पूना-कनाडा-अमरीका निकल लिये. जब तक बच्चों के बच्चों को बस्ते नहीं टंगे थे, दादी-बाबा को लगता था, मूल का सूद ही अब उनके जीवन का मकसद है. लेकिन बस्ता टंगते ही थ्री बीएचके फ्लैट्स में जगह की कमी हो जाना स्वाभाविक सी बात है. टिन्कू को एक अपना अलग स्पेस चाहिये और यदा-कदा आने वाले आगंतुकों के लिये गेस्ट रूम. पापा हर समय टिन्कू को टीवी में घुसाये रखते हैं और मम्मी के लाड ने तो टिन्कू को बिगाड़ रखा है. जब तक शरीर स्वस्थ था, तो वर्मा जी साल में चार बार बच्चों के यहाँ चक्कर काट आते थे. लेकिन पिछले विजिट में उन्हें ये आभास हो गया कि उनके रहने से टिन्कू की पढायी डिस्टर्ब होती है. वो अपने बनाये मकान और अपने कर्मक्षेत्र वाले शहर वापस आ गये. पुराने यार-दोस्तों के बीच कुछ समय सब ठीक चला. उसके बाद जो उन्हें हुआ उसे बीमारी नहीं कहा जा सकता. डिप्रेशन से बचने के लिये योग-प्राणायाम की जगह बच्चों के सजेशन पर डॉक्टरों की सलाह ले ली. लेकिन जैसे-जैसे दवा करते गये मर्ज बढ़ता ही गया. कुछ दिन आईसीयू में बीते.

आज वो बहुत हल्का महसूस कर रहे थे. 'गाईड' की वहीदा रहमान की तरह जीने की तमन्ना और मरने का इरादा साथ-साथ कुलाँचे मार रहा था. आईसीयू से उनके शरीर को बाहर कर दिया गया था. बच्चे आये. जल्दी में थे. तीन दिन में सभी संस्कारों को समाप्त करके सब निकल गये. पत्नी को भी साथ लेते गये कि मम्मी का मन बदल जाये. बच्चों का माता जी के प्रति प्रेम और सम्मान वर्मा को खुश कर गया. तेरह दिन तक तो आत्मा अपने घर में ही रहती है इसलिये वो वहाँ रहे.

वापस चलने ही वाले थे कि उन्हें ध्यान आया, सोने के समय को छोड़ दें तो जागते हुये समय का अधिकांश समय तो उसने ऑफिस में ही बिताया है. वही ऑफिस जिसके लिये उनका दिल-औ-जाँ समर्पित हुआ करती थी. वहाँ भी तो कोई संस्कार बाक़ी होगा. लोग बाग हैं कि बस फ़ेसबुक और वाट्सएप्प पर आरआईपी और ओम शांति से काम चलाना चाहते हैं. वो आ गये और तब से उल्टे लटके पड़े हैं, पीपल के पेड़ की सबसे ऊँची टहनी पर कि कन्डोलेंस हो जाये तो चलें.          

-वाणभट्ट 

मंगलवार, 18 अप्रैल 2023

काजी जी क्यूँ दुबले

एक जमाना था जब काजी शब्द सामने आते ही किसी दुबले-पतले व्यक्ति की इमेज आँखों के सामने आ जाया करती थी. क्योंकि एक मुहावरा होता था - काजी जी क्यूँ दुबले, शहर के अन्देशे. उसका आशय ये हुआ करता था कि शहर भर की चिन्ता में काजी जी दुबले होते रहते हैं. जब से हिन्दुस्तान में ओबेसिटी और मोटापे की बात शुरू हुयी है, तब से उस तरह के दुबले-पतले आदमी की कल्पना करना भी मुश्किल हो गया है. और इंडिया वालों की एक ख़ासियत तो माननी पड़ेगी, कि क्या मजाल ये किसी भी चीज़ की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लें. मुग़ल आये तो उन्हें लगा अपनी हिस्ट्री बनाने से अच्छा है दूसरों की पढ़ लेना. और जब अंग्रेज़ आये तो उन्होंने महसूस किया कि सभ्यता कोट-पैंट-बुशर्ट में चलती है और विज्ञान तो अंग्रेज़ी में ही लिखा जाता है. ये परम्परा तब से अब तक कायम है. हिन्दी या संस्कृत या किसी प्रादेशिक भाषा में लिख कर आप ज्ञानी तो कहला सकते हो, विज्ञानी नहीं. जब हर आदमी गर्भवती महिला की तरह पेट फुलाये घूम रहा हो तो इसे हम अपना आलसीपन कैसे मान लें. ये जो गेहूँ हम खा रहे हैं, सारा दोष उसी का है वरना हम तो बस दो रोटी सुबह और दो रोटी शाम खाते हैं और तोंद है कि घटने का नाम नहीं लेती. दिनभर में जो समोसा-ढोखला-बर्गर-पिज्जा डकार गये, वो तो बस हल्का सा स्नैक्स है, और वो खाने की कैटेगरी में थोड़ी नहीं आता. 

बहरहाल काजी जी का काम चिन्ता करना ही होता था. चिन्ता तो बस करने की चीज़ होती है. अगर आप किसी दिन दोनों हाथ और पाँव लेकर जुट गये, तो बहुत सम्भव है कि चिन्ता का समाधान निकल जाये. लेकिन शरीर को कष्ट देने की अपेक्षा चिन्ता करना कहीं ज़्यादा आसान काम है. आपको लगता रहता है कि बहुत कुछ कर रहे हैं लेकिन करना कुछ भी नहीं है. चिन्ता करने वालों का फुल टाइम काम, सिर्फ़ और सिर्फ़ चिन्ता करना है. और जब चिन्ता करने में कोई काम नहीं करना पड़ता, तो काजी जी दुबले कैसे होते थे, ये बात समझ से परे है. उन्हें तो माशाल्लाह हलाल के बकरे की तरह ख़ासा मोटा-ताज़ा होना चाहिये था. लेकिन चूँकि मुहावरे देश-काल के हिसाब से सटीक हुआ करते थे, इसलिये ये मानना पड़ेगा कि काजी जी शहर भर की चिन्ता किया करते थे और दुबले भी हुआ करते थे. 

एक कारण ये भी हो सकता है कि तब तक ग्रीन रिवोल्यूशन ने दस्तक न दी हो. या गेहूँ तब तक ईज़ाद न हुआ हो. तब के मोटे अनाज और आज के श्रीअन्न की कमी रही हो. न नौकरी का कॉनसेप्ट था, न ही पे कमिशन्स हुआ करते थे. तो बहुत सम्भव है, पैसा उनके पास चला जाता हो जो शरीर हिलाने में संकोच नहीं करते थे. और वही लोग खाते-पीते, हृष्ट-पुष्ट हुआ करते हों. ऐसे में अगर चिन्तक टाइप के लोग दुबले रह जायें, तो उसे उनकी अकर्मण्यता कहना सर्वथा अनुचित होगा. बुद्धिजीवी के लिये बुद्धिजीवी बने रहना ज़्यादा इम्पॉर्टेंट है. काम तो कोई भी कर सकता है, लेकिन सोचना हर किसी के बस की बात नहीं है. घण्टों एक जगह बैठना और बैठ कर सोचना बहुत श्रमसाध्य कार्य है. आप बस पन्द्रह मिनट एक जगह बैठ के दिखा दीजिये, सोचना तो दूर की बात है. काजी जी इसलिये भी दुबले बने रहना चाहते थे कि उनकी भुखमरी और दरिद्रता, विद्वता की आड़ में छिप जाये और किसी को उनके माली हालातों के बारे में पता न लगे. 

लेकिन अब वो दिन लद गये हैं जब काजी जी दुबले-पतले हुआ करते थे. देश भले ही डेवलपिंग का डेवलपिंग रह गया लेकिन हर कोई व्यक्तिगत रूप से डेवेलप कर गया. जिनके परदादा सायकिल के लिये तरसते थे उनका परपोता अपने एलआईजी मकान में बोलेरो के लिये गेट लगवाता है. यही तरक्क़ी है. कहाँ खाने के लाले थे, अब गली-गली खोमचे-खानों-व्यंजनों-पकवानों की दुकानें हैं.  ग्रीन रिवोल्यूशन ने आदमी को भुखमरी से सिर्फ़ निजात ही नहीं दिलायी बल्कि खाद्यान्न इतनी प्रचुरता में उपलब्ध करा दिया कि काजी जी को बिना खाये सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती है. वो सोच-सोच के खाने के बजाय खा-खा के सोच रहे हैं. रेडी-टू-ईट खानों की उपलब्धता के कारण, जो थोड़ी बहुत मेहनत करनी भी पड़ती थी, वो भी करने की ज़रूरत खत्म. पहले जब भूख लगती थी तो चौके तक जा कर कुछ बनाना पड़ता था. अब तो जंक फूड की बाढ़ आ रखी है. ऐसे में काजी जी को कम से कम खाने-पीने की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है. 

हर तरफ़ बेडौल से डोलते लोगों को देख कर आप सोच सकते हैं कि अब काजियों की प्रजाति लुप्तप्राय हो गयी है. लेकिन ये एक्सटिंक्ट हो जाने वाले जीव नहीं हैं. ये खाना मिले तो खा लेंगे और नहीं मिले तो कॉकरोच की तरह हाइबरनेशन में चले जायेंगे, लेकिन सोचना नहीं छोड़ सकते. आज के हालात ये हैं कि कोई भूखा मरना भी चाहे तो सरकार मरने नहीं देगी, कम से कम भूख की वजह से तो बिल्कुल नहीं. मुफ़्त राशन वितरण एक ऐसी ही योजना है, जिसमें लोग राशन ले कर मार्केट में बेच भी सकते हैं. पुरानी फ़िल्म का एक डायलॉग याद आ रहा है, जिसमें विलेन कहता है कि - मैं तुम्हें ऐसी जगह मारूँगा जहाँ पानी भी न मिलेगा. उस पर अपने धरम पा जी का रिप्लाई था - कुत्ते, मैं तुझे पानी पिला पिला के मारूँगा. अगर मेडिकल साइंस का लेटेस्ट इतिहास लिखा जाये, तो पता चलेगा कि वाकई लोग भूख से कम मगर खा-खा के ज़्यादा मर रहे हैं. क्या खायें या क्या न खायें बताने से अच्छा है, मँहगी-मँहगी दवाई ही खिलायें. पूरा का पूरा चिकित्सा उद्योग इसी सिद्धांत पर चल रहा है. समीकरण सीधा है, लोग हैं तो खायेंगे. भोजन उपलब्ध हो तो हर समय खायेंगे. सुबह उठने से रात के सोने तक खायेंगे. वो तो अच्छा है कि बीच में नींद आ जाती है, वरना मुँह और पेट के थोड़े आराम की किसे चिन्ता है. गलती से रात में नींद खुल गयी तो कभी-कभी ये समझ नहीं आता कि तीन बजे रात को खायें तो खायें क्या. कृषि क्षेत्र में इतनी क्रांतियाँ आ चुकी हैं कि भोजन प्रचुरता में उपलब्ध है. उस पर तुर्रा ये है कि न आपको बनाना है, न पकाना. बस पैकेट खोलो और शुरू हो जाओ. इन परिस्थितियों में आप दुबले-पतले काजी की उम्मीद कैसे पाल सकते हैं.

काजी हैं तो एक जगह बैठ के ही सोचेंगे. सोचेंगे तो दिमाग़ पर लोड पड़ेगा. दिमाग़ दौड़ेगा तो थकेगा भी और उसे भूख भी लगेगी. भूख लगेगी तो कहीं भी उठ के जाने की ज़रूरत भी नहीं है. बगल में चिप्स-कुरकुरे-टकाटक-मंच-न्यूट्रीबार-शेक-जूस का अम्बार लगा है. बस हाथ बढ़ाने की देरी है. और उसके बाद यदि बीच में लंच-डिनर का टाइम आ जाये तो थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, बस दरवाज़े तक जाने में. स्विग्गी-ज़ोमैटो हैं न. ट्रेडिशनल खाने में मुँह की बेवजह कसरत हो जाती है और चिन्तन से ध्यान भटकने की गुंजाइश रहती है. इस दृष्टि से पिज़्ज़ा-बर्गर-मोमोज़-फ्रेंच फ्राइज़ आपको कम डिस्ट्रैक्ट करते हैं. आपने खाया भी लेकिन नहीं खाने वाली फ़ीलिंग उसी तरह बनी रहती है जैसे व्रत में सिंघाड़े के आटे का हलुआ और साबूदाने-मखाने की खीर और कुट्टू के आटे की पूड़ी खाने के बाद भी व्यक्ति कह सकता है कि वो उपवास कर रहा है.

इसलिये आपको जो आस-पास डायनासॉर के भतीजे सरीखे घूमते हुये लोग दिख रहे हैं, दरअसल ये नये जमाने के काजी हैं. वाणभट्ट कोई इनसे अलग नहीं है. लेकिन क्लेम हमारा ब्लेम तुम्हारा टाइप के हर उस आदमी के बुद्धिजीवी होने पर लानत है जो ब्लेम अपने सर ले ले. जब श्रीअन्न खाते थे, अच्छा सोचते थे, और अच्छा सोचते थे तो स्वस्थ भी रहते थे. ये गेहूँ न होता तो हम बस भूखे ही तो रहते. मौके, दस्तूर और नज़ाकत का फ़ायदा उठा कर इन काजियों ने सारी तोहमत लाद दी, गेहूँ पर, इसी के कारण तो व्हीट बेली होती है. ये गेहूँ ही हमारे उभरते या उभर चुके तोंद का मुख्य अपराधी है. इस परिपेक्ष्य में पुराने मुहावरे को रिवाइज़ करने की आवश्यकता है - काजी जी क्यूँ मोटे, शहर के अन्देशे.

-वाणभट्ट

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

कद्दू में तीर

कद्दू में तीर 


बात उन दिनों की है जब मुझे नया-नया आत्म ज्ञान मिला कि अन्य नौकरियों की तरह शोध और शिक्षा अब शौक़ या हॉबी न रह कर नौकरी बन चुके हैं. जैसे की बहुत से ज्ञानीजन बता चुके हैं कि इन्टर के बाद सबसे इन्टेलीजेन्ट लोग इंजीनियरी या डॉक्टरी में प्रवेश ले लेते हैं. उसके बाद वाले आईएएस या एमबीए में सेलेक्ट हो जाते हैं. जिनके पास सामाजिक गतिविधियों के कारण पढने-लिखने का समय कम होता है, वो नेता बन सकते हैं और उनके नीचे आइएएस और इंजीनियर काम करते हैं. बीटेक या ग्रेजुएशन करते करते छात्र अक्सर इतना पक जाते हैं कि एक अदद नौकरी की तलाश शुरू कर देता है. खुद्दार टाइप के बच्चे ट्यूशन और छोटी-मोटी नौकरी करके अपनी पढायी जारी रखने का प्रयास करते हैं, ताकि पिता जी के बोझ को कुछ कम किया जा सके. वहीं कुछ बाप ऐसे भी होते हैं, जो बच्चों में ये विश्वास भरते हैं कि बेटा लौटना तो अशोक की लाट वाली नौकरी ले कर वर्ना घर में इतना पुदीना सूख रहा है कि तेरी सात पुश्तों को भी नौकरी करने की जरूरत नहीं पड़ने वाली. शायद ही किसी बाप ने सपने में भी बेटे को वैज्ञानिक बनाने का सपना पाला हो. और शायद ही कोई बेटा भी ऐसा हुआ हो जिसने वैज्ञानिक बनने की इच्छा दिखायी हो. जिन्हें ऐसा स्वप्न आया भी होगा तो उन्हें नासा और इसरो से कम का तो नहीं ही आया होगा. 

अक्सर एक अदद सरकारी नौकरी के प्रति अदम्य इच्छा शक्ति ही उच्च से उच्चतर शिक्षा कम्प्लीट कर लेने के लिये प्रेरित करती रहती है. जब तक नौकरी न मिल जाये, उच्च शिक्षा ज़माने में सर छुपाने का सबसे कारगर हथियार है. ग्रेजुएशन करके कोई गलती से गाँव-घर पहुँच गया तो सभी इष्ट-मित्र-ख़ैरख्वाह पूछ-पूछ के जीना हराम कर देते हैं कि बेटा आगे क्या करने का इरादा है. सो घर पर रह कर कॉम्पटीशन्स की तैयारी करना एक कठिन काम है. शहर में या घर से दूर रहिये तो बाप को भी बता सकते हैं कि बस दो नम्बर से मेन्स चूक गया. पिता जी को भी फ़ख्र करने का मौका मिल जाता है कि बेटा सिविल की तैयारी में जुटा है. कला संकाय वालों के पास तो बहुत ऑप्शन हैं. बीए, एमए करने के बाद एलएलबी-एलएलएम करने की गुंजाईश बची रहती है. लेकिन विज्ञान संकाय वाले बच्चों के पास पीएचडी का ही स्कोप बचता है. ऐसा नहीं कि उन्हें एलएलबी करने की मनाही है. लेकिन टू द पॉइन्ट और पूर्णतः सही या गलत उत्तर देने वाले बच्चों के लिये बेवजह भाँजना थोड़ा कठिन तो है. जबकि वहाँ का सिद्धांत है कि कॉपी पर लिखोगे नहीं तो एग्ज़ामिनर नम्बर कैसे देगा. इसलिये लिख के ज़रूर आना. खेत पूछे तो खलिहान लिखना लेकिन कागज़ कोरे मत छोड़ना. बी और सी कॉपी ले लोगे तो अच्छे मार्क्स भी मिल सकते हैं. बहुत से लोग कॉम्प्टिशन्स की तैयारी में पीएचडी तक कर डालते हैं. शोध शुरू करने से पहले ये भी शोध किया जाता है कि किस विश्वविद्यालय का कौन सा एडवाइजर टाइम से डिग्री दिलवा सकता है और कौन शोध में इतना डूब जाता है कि उसे आपकी डिग्री की चिन्ता ही नहीं रहती. वैसे भी डिग्री जब आपकी है तो किसी और को भला क्यों चिन्ता होने लगी.

और अब जब शोध नौकरी बन गया है तो आइन्स्टाइन-एडिसन-न्यूटन की तरह मनमर्जी से शोध नहीं कर सकते. ऑफिस टाइम में अगर आप पेंड के नीचे झपकी ले रहे हो तो कोई भी आपकी फोटो निकाल के बॉस को प्रेषित कर सकता है. और गलती से सेब आपके ऊपर गिर भी जाता तो आप हडबडा कर ऑफिस की ओर भागेंगे या ये सोचेंगे कि सेब क्यों गिरा. शुक्र मनाते कि सेब न गिरता तो पता ही न चलता कि शाम होने को आयी. नौकरी के अपने नियम हैं. यहाँ ना-करी नहीं कर सकते. बॉस इज़ ऑलवेज राईट का सिद्धांत भी चलता है. अन्य नौकरी की तरह यहाँ भी तेल-मालिश और बटर-पॉलिश प्रमोशन के अमोघ अस्त्र हैं. जब पहली बार प्राइवेट नौकरी ज्वाइन की तो फैक्टरी मैनेजर ने वेलकम करने के लिये कमरे में बुलाया और डूज़ और डोंट्स की एक लिस्ट पकड़ा दी. काम वेल डिफाइंड था. जब शोध संस्थान पहुँचा तो बॉस ने वेलकम करते हुये कहा कि वर्मा तुम क्या करना चाहते हो. मेरे अंडर में काम करने वालों को काम करने की पूरी छूट है. जो चाहे करो मेरा पूरा सपोर्ट रहेगा. तब से हर हफ्ते में एक-दो प्रोजेक्ट बना कर बॉस से मिलता. और बॉस के पास कई तर्क होते - इस काम के लिये यहाँ सुविधा नहीं है, ये काम बहुत ही कठिन है, अभी तुम कर नहीं पाओगे और सबसे अच्छा तर्क था कि यदि ये हो सकता होता तो अमरीका-जापान वाले कर चुके होते. बॉस चूँकि सदैव सही होते हैं इसलिये मै फिर अगले हफ्ते मिलने का वादा लेकर विदा हो लेता. और अगले मिलन में मेरे दिल में उठ रहे यूरेका वाले भाव की अच्छी तरह से बत्ती बनायी जाती और डस्टबिन के हवाले कर दी जाती. अगली बार जब मै गया तो उनके चेहरे पर कुछ निश्चयात्मक भाव पहले से व्याप्त था. लेकिन उन्होंने मेरे प्रोजेक्ट को पूरे गौर से सुना. लेकिन उस पर कोई कमेन्ट नहीं किया. बल्कि राय दी कि यदि मै आटा चक्की पर काम करूँ तो कैसा रहेगा. मै हतप्रभ सा अपलक नेत्रों से उनके मुखारबिन्दु की ओर देखता रह गया. बाद में पता चला कि उन्होंने उसे घूरने की संज्ञा दे दी. बहरहाल वो मेरे लिये पहली सीख थी कि सजेशन्स नीचे से ऊपर नहीं जाते, ऊपर से जो इंस्ट्रकशंस आयेंगे उन्हीं को फ़ॉलो करना है. सही भी है. बॉस कौन है, ये हमेशा याद रखना चाहिये. बॉस वहाँ तक देख सकता है, जहाँ तक हम सोच भी नहीं सकते.      

अब चूँकि ये नौकरी है इसमें प्रमोशन के लिये कुछ शर्तें भी ज़रूर होंगी. उसमें से एक शर्त थी कि काम चाहे आप कुछ भी कर लीजिये, प्रमोशन के लिये एक पीएचडी की डिग्री होनी ही चाहिये. दिल का तो काम ही है कि रोज कोई ख्वाहिश, कोई तमन्ना पैदा की जाये. तब तक बीवी-बच्चों की ओर से कुछ-कुछ निपट चुके थे, तो सोचा कैरियर की ओर भी ध्यान दे लिया जाये. पीएचडी करने से पहले वाली खोज शुरू की गयी कि किस विश्वविद्यालय में किस प्रोफेसर के अन्तर्गत शोध किया जाये ताकि तीन साल की डिग्री तीन साल में ही मिल जाये. अब मै इन सर्विस कैंडिडेट था इसलिये स्टडी लीव में ही काम खत्म करना आवश्यक था. जब रैगिंग का दौर चला करता था, सीनियर्स और जूनियर्स के रिश्ते बने रहते थे. अमुक युनिवर्सिटी में अमुक प्रोफ़ेसर बहुत ही सीधे और सहज स्वभाव के हैं. तीन साल में यदि लड़का डिग्री नहीं भी करना चाहे तो वो धक्का लगा कर बाहर करवा ही देते हैं ताकि उनका रिकॉर्ड खराब न हो. वो ईमेल और डब्ल्यु डबल्यु डब्ल्यु डॉट इन वाला ज़माना तो था नहीं कि मुलाकात फिक्स करके निकलते. अगले ही मौके पर मै उनके सामने प्रस्तुत था.

गुरु जी में गुरु के सारे लक्षण थे. चेहरे पर अन्तस का तेज दैदीप्यमान था. इतनी सहृदयता से मिले कि मेरी अन्तरात्मा कहने लगी गर फ़िरदौस डिग्री करनी है तो बस यहीं अस्तो, यहीं अस्तो, यहीं अस्तो. मै अपने ढेर सारे प्रोजेक्ट प्लान्स ले कर इस उम्मीद में गया था कि किसी न किसी पर तो प्रोफ़ेसर साहब मान ही जायेंगे. उन्होंने ने भी उतने ही गौर से सुना जितनी उत्सुकता से मै बता रहा था. सारी बातें सुनने कर बाद उन्होंने गुरु-गंभीर आवाज़ में बोलना शुरू किया. देखो बेटा तुम लोग यंग हो, अभी बहुत कुछ करना चाहते हो लेकिन समय सीमित है. तुम्हारी तो नौकरी ही शोध की है, और काम करने के लिये पूरी ज़िन्दगी पड़ी है. मेरा कन्सर्न ये है कि तुम तीन साल में डिग्री लो और यहाँ से चले जाओ. तुम्हारे सारे के सारे काम अप्प्लाइड और सोल्यूशन ओरियेंटेड हैं. मै हमेशा पाथब्रेकिंग काम करता हूँ. एकदम नया एरिया खोजता हूँ और उस पर काम शुरू कर देता हूँ. जब तक दूसरों का ध्यान उधर जाता है और वो उस एरिया में काम शुरू कर दें, उससे पहले मै नया पाथ ब्रेक करने में लग जाता हूँ. मान लो तुमने कोई मशीन बनाने का प्रयास किया तो दो बातें होंगी. या तो मशीन चलेगी, या नहीं चलेगी. चल गयी तो ठीक, लेकिन नहीं चली तो तुम्हारी डिग्री लटक जायेगी. थोडा आध्यात्मिक होते हुये उन्होंने बोलना जारी रखा. शोध आत्मा-परमात्मा की तरह होना चाहिये. या तो आत्मा को पता हो कि उसने क्या किया या परमात्मा को. अप्प्लाईड काम चाहे कितना भी उपयोगी हो, हाई रेटिंग के जर्नल्स में छापना मुश्किल हो जाता है. जब कि अबूझ शोधपत्र बहुत ही अच्छी रेटिंग पाते हैं. ऐसे शोध से सदैव बचना चाहिये जिसका जवाब आपसे हाँ या ना में माँगा जाये. जवाब के बदले में  आप और दस सवाल पैदा कर दें. फ्यूचर रिसर्च के क्षेत्र आइडेंटिफाई करना भी शोध का एक प्रमुख लक्ष्य होता है. समस्या ऐसी होनी चाहिये, जिस पर सारी दुनिया काम कर रही हो, पर कर कोई कुछ भी न पा रहा हो. समाधान के चक्कर में कभी पड़ना ही नहीं चाहिये. समस्या खत्म हो गयी तो तुम करोगे क्या. इतिहास साक्षी है कि समस्यायें वहीं की वहीं हैं, कितने ही शोधकर्ता आये और आ कर चले गये. हाँ ये बात अलग है कि अब समाधान खोजने के लिये शोध पर खर्च बढ़ते जा रहे हैं. क्योंकि उच्च रेटिंग के जर्नल में छापने के लिये काम उन्नत तकनीकों और यन्त्रों द्वारा करना पड़ता है, इसलिये शोध का ख़र्च बढ़ना लाज़मी है. समाधान न उनको मिलना है, न तुमको मिलेगा. सब कद्दू में तीर मार रहे हैं, तुम भी मारो. न उनका तीर लगेगा, न तुम्हारा. अलबत्ता तुम्हारी पीएचडी समय पर ज़रूर हो जायेगी. भाव विह्वल हो कर मैंने उनके चरणों की ओर हाथ बढ़ाना चाहा लेकिन उन्होंने मुझे गले से लगा लिया. 

कृष्ण ने जैसे महाभारत काल में अर्जुन को दिव्य दृष्टि दी थी, वैसे ही मेरे ज्ञान चक्षु खुलते जा रहे थे. हर कोई हाथ में धनुष लिये कद्दू पर निशाना साधता हुआ दिखायी दे रहा था.

-वाणभट्ट 

गुरुवार, 30 मार्च 2023

अमावा

अमावा 

दरवाज़े पर घण्टी बजी तो सामने वो खड़ा था. मुलाकात या जान पहचान कोई खास नहीं थी. इलेक्शन ड्यूटी में वो मेरा सेक्टर मजिस्ट्रेट हुआ करता था. नौकरी में आने के बाद कितने इलेक्शन का हिस्सा बना, अब याद भी नहीं रहा. बहुत से लोगों से मुलाक़ात होती है. एक उत्सव सा माहौल बन जाता है. कितने ही जन्मों के बिछड़े उसी तरह मिलते हैं, जैसे कुम्भ के मेले में खो गये हों. चार दिन की इंटीमेसी इलेक्शन्स ख़त्म होते ही ख़त्म हो जाती है. लेकिन उन भाई साहब का भाईचारा देख कर मन आल्हादित हो गया. बोले इधर से गुजर रहा था तो सोचा वर्मा जी को खटखटाता चलूँ. इतने प्यार से कोई मिले और हम चाय भी न पूछें, ऐसे तो हालात नहीं हैं. चाय पर चर्चा लम्बी चली और इतनी घनिष्ठता देख के मेरे मन में ये विचार आना स्वाभाविक था कि इसका कोई काम तो नहीं पड़ने वाला. लेकिन फिर ध्यान आया साइंटिस्ट जैसे निरीह प्राणी से किसी का क्या काम पड़ सकता है. वो अपना काम तो निकाल नहीं पाता तो भला दूसरे का क्या भला करेगा. बातें बहुत ही सौहार्द पूर्ण वातावरण में हुयीं. जाते-जाते फिर मिलने का वादा कर और करवा के भाई साहब निकल लिये. जिस आत्मीय तरीक़े से वो मिले थे, पत्नी को शक़ होना स्वाभाविक था कि उनके भोले-भाले पति फिर किसी को उधार देने के चक्कर में न पड़ जायें. जब से पे-कमिशन्स लगे हैं, लोग भयंकर रूप से आत्मनिर्भर हो गये हैं. कोई किसी के घर आना-जाना पसन्द नहीं करता. दुर्योग से अगर आप में कोई ऐब नहीं है, तो समाज आपको वैसे ही आइसोलेट कर देता है जैसे कोरोना से पीड़ित व्यक्ति को. जल्द ही आपको एहसास होने लगता है कि दारु-सिगरेट-पान-गुटका तो शुरू कर ही देना चाहिये. क्योंकि दोस्ती की पहली इबारत यहीं लिखी जाती है. ऐसे वातावरण में कोई एकदम अचानक टपक पड़े तो अतिथि देवो भव: वाला भाव आने लगता है.

ऐसी उम्मीद तो नहीं थी कि वो ज़नाब दोबारा जल्दी आयेंगे. लेकिन वो आये. इस बार उनकी श्रीमति जी भी साथ थीं. वो भी अपने पति की तरह खुशमिज़ाज़ और मिलनसार थीं. चाय बनाने के बहाने किचन का और सूसू के बहाने बाथरूम तक पूरे घर का मुआयना कर आयीं. लौटने के बाद वो थोडा संजीदा हो कर बैठ गयीं. धर्मपत्नी जी भी चाय-वाय, बिस्कुट-विस्कुट, दालमोट-वालमोट, सेंटर टेबल पर लगा कर उनके बगल में बैठ गयीं. चाय पीते हुये उन्होंने धीरे से कहा आप तो अच्छी खासी नौकरी पर हैं लेकिन सामान तो सारा बाबा जी वाला यूज़ करते हैं. जो बहुत ही सस्ते और घटिया होते हैं. वैसे तो मै ख़ुद को बहुत ही जमीन से जुड़ा व्यक्ति मानता हूँ, लेकिन जब कोई इनफेरियौरिटी कॉम्प्लेक्स थोपने का प्रयास करता है, तो मेरा सुपीरीयौरिटी  कॉम्प्लेक्स जागने लगता है. बेसिकली इलाहाबादी होने के नाते उतना बदतमीज़ नहीं हूँ कि तू का जवाब तड़ाक से दूँ, इसलिये थोडा मुलम्मा चढ़ा कर विचारों को पेश कर देता हूँ. बोला भाभी जी बहुत बार एक्स्ट्रा क्रीम वाला साबुन ट्राई किया लेकिन अब मेरी गैंडे जैसी खाल तो मुलायम होने से रही. सर पर जब बाल ही नहीं रहे तो सतरीठा लगाओ या लॉरियाल, बाल तो उगने से रहे. मुझे लगा मेरे इतने उम्दा जोक पर कुछ ठहाका-वहाका लगेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उस दिन मुझे पता चला कि मुँह बिचकाना किसे कहते हैं. मोहतरमा ने मुँह बिचकाते हुये बगल में बैठी मेरी श्रीमति जी की ओर कनखी से देखा. उन्हें ये नहीं पता था कि मेरी धर्मपत्नी यदि मार्केट ओरियेंटेड होतीं तो मेरे जैसे आउटडेटेड पति को कब का बदल चुकी होतीं. मेरी पत्नी ने कहा भाभी जी क्या बतायें ये तो मार्केट में घूम-घूम के, ढूँढ-ढूँढ के सबसे सस्ता सामान लाते हैं. कहते हैं साबुन-तेल-कंघी में कौन सी टेक्नॉलोजी लगी है. स्वदेशी सस्ता भी पड़ता है और चलता भी ज़्यादा है. लेकिन वो तो जलील करने पर आमादा लग रहीं थीं. बोलीं कभी मेरी कोठी पर आइये. उनके पति देव, जो अब तक मौन से बैठे थे, ने ऐन मौके पर इन्ट्री ली. सर ऐसा नहीं है, जब तक आप हाई एन्ड प्रोडक्टस यूज़ नहीं करते, आप उन चीजों की कमी नहीं देख पाते, जिन्हें आप यूज़ कर रहे हैं. आपके जो बाल झड़े हैं, उसमें रुसी से ज़्यादा शैम्पू का रोल हो सकता है. बहुत से हेल्थ प्रोडक्ट्स भी आते हैं, जो आपकी न्यूट्रीशन की आवश्यकता पूरी करते रहते हैं. बढती उम्र थम सी जाती है. अब हम ही लोगों को देख लीजिये पचास क्रॉस कर चुके हैं लेकिन कोई बता नहीं सकता. अगले शनिवार आप लोग आइये चाय पर फिर और बातें होंगी. वे लोग वाकई एलीट टाइप के लोग लग रहे थे. चलते समय उन्होंने एक कैसेट और बुक और पकड़ा दी. इसे सुनिये और पढियेगा. अब एक बात तो तय थी कि या तो उनका सामान वापस देने हमें उनके यहाँ जाना पड़ेगा या वो अपना सामान वापस लेने के बहाने एक बार फिर आयेंगे.

मेरी वाइफ़ मुझसे भी ज़्यादा भोली-भाली हैं. उन्होंने ने सोचा क्यों न एक बार चल कर उनकी कोठी भी देख ली जाये. दो बार तो बिना बुलाये आ कर मेहमाननवाज़ी करा चुके. एक मौका उन्हें भी देना चाहिये. इसलिये पहले ऑप्शन के लिये वो तैयार हो गयीं. जीपीएस की मदद से अपने घर से काफ़ी दूर एक पतली गली में उनकी कोठी खोजने में ज़्यादा दिक्क़त नहीं हुयी. हाँ, थोडा आश्चर्य ज़रूर हुआ कि अपने मकान, जिसे हम घर कहते हैं, से उनकी कोठी काफ़ी छोटी थी. लेकिन कोठी के अन्दर की दुनिया निराली थी. जितनी भी उपभोक्तावादी वस्तुयें आप सोच सकते हैं, उन सबके टॉप मॉडल घर में भरे पड़े थे. रंग-बिरंगी फॉल्स रूफ़ से छन के आती लाइट्स. महँगा पंखा-एसी-टीवी. सोफ़ा और सेंटर टेबल इतने बड़े कि इधर से उधर जाने की जगह दिख नहीं रही थी. जितना बड़ा टीवी उनके यहाँ लगा था, उतना बड़ा टीवी मैंने कभी देखा ही नहीं था. टीवी सेट और सोफ़े के बीच की दूरी बहुत नहीं थी, इसलिये गर्दन टेढ़ी कर के देखना पड़ रहा था. मुझे उन दिनों की याद आ गयी जब स्टूडेंट जीवन के दौरान सिनेमास्कोप फिल्में हॉल में आगे की पहली-दूसरी रो वाली सीट्स (बेंच कहना ज़्यादा उचित होगा) पर बैठ के देखनी पड़ती थी. बालकनी का टिकट औकात से बाहर हुआ करता था. जब बायीं तरफ से अमिताभ की एन्ट्री होती थी, तो शक़ होता था संजय दत्त आ गया क्या. उन्होंने थोड़ी देर बैठने के बाद ही इशारा किया कि आप लोग इधर अन्दर निकल आइये, डाइनिंग टेबल पर ही बैठते हैं. मुझे लगा सीधे मुद्दे पर आ गये. जल्दी चाय-वाय पिला कर रुखसत कर देंगे. 

अन्दर का भी वही हाल था. उस लॉबी में जितनी बड़ी डाइनिंग टेबल और फ्रिज सम्भव थी, लगी हुयी थी. पूरा का पूरा घर सामान से भरा हुआ था और हर सामान ब्रान्डेड और हर सामान से पैसा टपक रहा था. अब मुझे घर और कोठी का अन्तर भी समझ आ रहा था. बस काम चलाऊ तरीक़े से सामान खरीद लेना, घर तो बना सकता है लेकिन उसे कोठी बनाने के लिये आपको पैसे खर्च करने पड़ते हैं. हम लोगों की सोच थी कि दिखाना किसे है, ख़ुद ही तो देखना है. इसलिये मार्केट सर्वे करके सबसे सस्ते विकल्पों की तलाश करते थे. तभी हमने ये भी मार्क किया कि इन दोनों के कपड़े-लत्ते-जूते-चश्मे सब ब्रैंडेड थे. ये मियाँ-बीवी तो ख़ुद चलते-फिरते ब्रैंड एम्बेसडर थे. उनकी बातों में भी दम था कि हम लोग वाकई बिलो स्टैण्डर्ड लाइफ़ जी रहे हैं. उनकी वाइफ़ का मुँह बिचकाना, मुझे जस्टिफाईड लगने लगा. डाइनिंग टेबल के परले सिरे की तरफ़ दीवार पर एक व्हाइट बोर्ड भी लगा था. मुझे लगा भाभी जी ज़रूर ट्यूशन क्लासेज़ लेती होंगी. चाय के इंतज़ार में हम लोग इधर-उधर की बातें करते रहे. ज़्यादातर विषय उनके और हमारे लिविंग स्टैण्डर्डस से ही रिलेटेड रहे. 

इतने में घंटी बजी और मेजबान लोग दरवाज़े की ओर बढ़ गये. आगंतुक बिना किसी संकोच के अन्दर आ गया. डाइनिंग टेबल पर अपना भारी-भरकम बैग रख एक सीट पर कब्ज़ा करके बैठ गया. उनकी बातों से लगा कोई और भी आने वाला है. एक बार घन्टी और बजी. एक और बन्दा बिना तक़ल्लुफ़ के आ कर सामने बैठ गया. अब छ: सीटें थीं और आदमी भी छ: थे. किसी के साथ बेइंसाफी की गुंजाईश दिख तो नहीं रही थी. हमारे मेजबान ने नवागन्तुकों से हमारा परिचय कराना उचित नहीं समझा. जब सब लोग सेटेल हो गये तो होस्ट महोदय ने बात शुरू करने की गरज से बस इतना ही कहा - यही हैं वर्मा जी. उनकी परिचयात्मक शैली से ये आभास हो गया कि बाकी लोग हमारे बारे में उतना तो जानते ही होंगे जितना मेरे होस्ट को पता था.

जो सीनियर मोस्ट बन्दा था, उसने बिना गला खखारे बोलना शुरू किया तो मुझे अन्दाज़ लग गया था कि इसे बोलने और बोलते रहने की आदत है. उसने धीरे से कहा वर्मा जी आप वैज्ञानिक हैं, काफी पढ़े-लिखे भी हैं लेकिन ये बताइये नौ से पाँच नौकरी करने के बाद आप क्या करते हैं. मुझे उम्मीद है कि आप भी अन्य नौकरीशुदा लोगों की तरह ऑफिस से आकर सोफ़े पर बैठ जाते होंगे और, समाचार और टीवी पर अपना अमूल्य समय व्यर्थ कर देते होंगे. आप नौकरी में हैं, और आपकी एक निश्चित आय है इसलिये आपको कभी एक्स्ट्रा पैसे की आवश्यकता महसूस नहीं हुयी होगी. लेकिन एक्स्ट्रा पैसा किसे बुरा लगता है. नौकरी से गुजारा चल सकता है लेकिन शौक पूरा करने के लिये यू नीड समथिंग एक्स्ट्रा. एक ही जिंदगी मिलती है सबको, उसको खुल के जीना चाहिये और खुल के जीने के लिये आपको चाहिये पैसा. आप की पत्नी भी काफी पढ़ी-लिखी और क्वालीफाईड हैं और आप लोग शाम को अपने घर में बैठ के अपना पोटेन्शियल वेस्ट कर रहे हैं. पता नहीं आप लोगों ने कैसेट सुना या बुक पढ़ी की नहीं. लेकिन अब आप सही जगह आ गये हैं. हम लोग आपकी आय बढाने के लिये आपको नेटवर्क मार्केटिंग की दुनिया से इंट्रोड्यूस करने वाले हैं. मुझे ये एहसास होने लगा था कि कम से कम एक बार बुक को पलट के देख लेता, तो आज की स्थिति से बचा जा सकता था. नेटवर्क मार्केटिंग के गुर उसकी टिप्स पर थे. यदि हम एक ऐसी कम्युनिटी बनायें जो अपनी ही कंपनी के उत्पाद ख़रीदे, उपयोग करे और बेचे तो ये विन-विन सिचुएशन होगी. जो आपने ख़रीदा उस पर रिबेट मिलेगा और जो आप बेचेंगे उस पर कमीशन. वो बन्दा वाइट बोर्ड मार्कर उठा कर वाइट बोर्ड की ओर बढ़ गया. फिर बोर्ड पर उसने कुछ न्यूक्लियर फिशन जैसे चित्र बना डाले और उसके माध्यम से अपनी बात को और प्रभावशाली ढंग से रखने का प्रयास करने लगा. आपको बस चेन बनानी है. एक बार चेन बन गयी तो आपको लाख - डेढ़ लाख तो हर महीने घर बैठे मिलने लगेंगे. उसने अपने प्रेसेंटेशन में मेरी वर्तमान आर्थिक परिदृश्य यानि स्थिति, समस्या यानि संकुचित सोच और समाधान यानि नेटवर्क डेवलपमेंट, तीनों की बात की. उसकी वाक्पटुता निसंदेह अनुकरणीय थी. हम दोनों हिप्प्नोटाइज़ से होकर ये तक भूल गये कि भाई साहब ने शाम की चाय पर बुलाया था. इस चक्कर में हम घर की चाय बिना पिये ही नियत समय छ: बजे तक आ गये थे. आठ बजने को था और चाय का ज़िक्र तक नहीं हुआ. एक-एक करके अमावा कम्पनी के ढेर सारे प्रोडक्ट्स उनकी खूबियों का बखान करते हुये डाइनिंग टेबल पर सजा दिये गये. 

बाक़ी तीनों एप्रेशियेशन के साथ उसको बोलते हुये सुन रहे थे और बीच-बीच में हमारे चेहरों पर आते-जाते मनोभावों को पढने का प्रयास कर रह थे. मुझे भी ये अन्दाज़ लग चुका था कि अगर जरा भी चूं-चपड़ की तो लेक्चर रात तक चलेगा. और जब अब तक चाय नहीं मिली तो डिनर क्या ख़ाक मिलेगा. मनोभावों को छिपा कर मै बार-बार गुड-गुड, वेरी गुड-वेरी गुड बोल कर उन्हें ये एहसास दिलाने की कोशिश करता रहा कि मुर्गा हलाल होने को सहर्ष तैयार है. वो लोग अपने विचारों से इतने कनविंस थे कि मुझे ये भी एहसास हुआ कि मार्केटिंग करनी हो तो इतना कन्विक्शन और पैशन होना जरूरी है. मै इमैजिन करने लगा लैब से लौट कर वर्मा जी टाई-सूट में अमावा का साबुन हाथ में लिये घर-घर घूम रहे हैं. हर तरफ से पैसा घुसा आ रहा है. घर बड़े-बड़े मँहगे सामानों से इतना भर गया है कि चलने तक की जगह नहीं मिल रही है. मुस्कुराते हुये जब मैंने अफ़र्मेटिव तरीक़े से सर हिलाया, तो थोड़ी देर में चाय भी आ गयी. 

मैंने ये बताना जरूरी नहीं समझा कि भैया बेचना-वेचना मेरी फ़ितरत में होता तो जहाँ भी रहता वहाँ बहुत आगे निकल जाता. मुझे पहले से ही अपनी स्मार्टनेस पर डाउट था, इसीलिये शोध में अपना कैरियर बनाने का निर्णय लिया और शोध परीक्षा से पहले कहीं भी बायोडाटा नहीं भेजा. छिहत्तर लोगों के बैच में जब पूछा गया कि आप में से कितने लोग वैज्ञानिक ही बनना चाहते थे, तो सिर्फ़ तीन लोगों ने हाथ उठाया था. उसमें एक हाथ मेरा भी था. बहुत से लोगों ने प्रशासनिक सेवाओं में असफल होने के बाद इस सेवा का चयन किया. कुछ ने रौब और रुतबे की ख़ातिर तहसीलदारी पसंद कर ली. कुछ का इरादा रिटायरमेंट में बाद प्रधानी लड़ने का है. शायद इसीलिये उनके आचार-व्यवहार में वैज्ञानिक वाली सौम्य सहजता का नितान्त अभाव साफ़ दिखता है. यदा-कदा उनके हाव-भाव में प्रशासक की झलक देखने को मिल जाती. मेरा तो हाल ही ग़जब था. ऑफिस वाले हों या घर वाले सबको लगता, ये नार्मल लोगों की तरह क्यों नहीं रह पाता. कोई काम सीधे तरीक़े से क्यों नहीं करता. हर चीज़ में यूँ होता तो क्या होता करता रहता है. तीस साल के शोधार्थी जीवन के बाद ये लगता है कि अमावा हो या शोध, तरक्की के लिये मार्केटिंग और नेटवर्क दोनों स्किल्स का होना आवश्यक है. उस रात मुझे सपना आया कि गुरुदेव चौराहे पर मै टाई-वाई लगाये चीख़-चीख़ के कुछ बेचने का प्रयास कर रहा हूँ - एक हाथ में अमावा का दन्त मंजन है और दूसरे में शोधपत्र. 

-वाणभट्ट            

शुक्रवार, 17 मार्च 2023

साज़िश

पियर रिव्यू मीटिंग होनी थी आज। सुबह-सुबह नहाने धोने से पहले जूता पॉलिश से चमका कर रख दिया। मीटिंग फॉर्मल थी।

रैगिंग के दौरान सीनियर्स के दिये प्रवचन इंजीनियरिंग कॉलेज के पहले छः महीनों में ही कंठस्थ करा दिये जाते हैं। कई प्रकार के सम्पुट, उद्बोधन और विशेषणों के साथ ये समझा दिया जाता था कि आप अपने घर के वरांडे में नहीं टहल रहे हैं। कॉलेज का डेकोरम होता है। लाइट कलर की शर्ट, डार्क कलर की पैंट, कमर में बेल्ट और लेदर शूज़ के साथ-साथ जब तक फ्रेशर्स फंक्शन न हो जाये, टाई पहनना अनिवार्य था। ताकि सीनियर्स को जूनियर्स को आइडेंटिफाई करने में कोई दिक्कत न हो। 

एक नियम सीनियर्स के आगे अपनी शर्ट के तीसरे बटन को देखते हुये बात करना। उसके पीछे औचित्य यही रहा होगा कि आप ये न देख पायें कि कौन क्या बक रहा है। हमारे कॉलेज में रैगिंग का उद्देश्य इंट्रोडक्शन तक ही सीमित था। सबकी हिडेन टैलेंट्स को खोजा जाता। कौन ड्रॉइंग अच्छी बनाता है, किसकी राइटिंग अच्छी है, कौन गाना सुना सकता है और कौन चुटकुले। ताकि सीनियर्स को मालूम रहे कि किससे ड्रॉइंग बनवानी है, किससे असाइनमेंट लिखवाने हैं और किस-किस का उपयोग एंटरटेनमेंट के लिये करना है। छः महीनों में ही ऐसी आदत पड़ गयी कि चप्पल-सैंडल-पम्प शूज़ हम लोगों के जीवन से बाहर हो गये। तब स्पोर्ट्स शूज़ के नाम पर उतनी वैरायटीज़ नहीं थीं जितनी आज हैं। जिन्हें दौड़ना-खेलना होता था, उनके पास सफ़ेद पी.टी. शूज़ के अलावा कोई ऑप्शन नहीं था। चार साल निकलते-निकलते लेस वाले लेदर शू हमारी पर्सनालिटी का अभिन्न अंग बन चुके थे। 

जब से ऑफिस सुबह 9 बजे का हुआ है, समय से ऑफिस पहुँचने ले लिये आपा-धापी मची रहती है। पूरी तरह तैयार होने के बाद आख़िरी आइटम जूते का ही बच रहा था। जूता तो तैयार था ही। मोजा पहन कर ज्यों ही लेस चढ़ाने की कोशिश की तो आधा लेस हाथ में आ गया। दूसरे जूते पर पॉलिश करने का समय तो था नहीं। पैंट-शर्ट के साथ स्पोर्ट्स शू सूट नहीं करता, लेकिन मजबूरी आदमी से जो न कराये। मीटिंग में शायद ही किसी ने मेरे जूतों पर ध्यान दिया हो, लेकिन मुझे लगता रहा कि आज कुछ तो गड़बड़ है।

सुबह उठने में किसी दिन देर हो जाये तो पूरे दिन के टारगेट वाले 10000 स्टेप्स पूरे करना मुश्किल हो जाता है। शाम को स्टेप्स पूरे करने और फ़ीता लेने की गरज से चाय पी कर टहलने निकल पड़ा। पास के पनकी मार्केट में जूतों की बड़ी-बड़ी दुकानें और शो रूम्स थे।

मुझे थोड़ा आश्चर्य ज़रूर हुआ जब पहले शो रूम के वर्कर ने रुखाई से फ़ीता न होने की बात कही। अगले शो रूम पर भी वैसा ही जवाब मिला। फिर तो मैं अगले-अगले-अगले और अगले शो रूम्स की ओर बढ़ता गया। सबका जवाब वही था और मेरा आश्चर्य बढ़ता जा रहा था। 

अमूमन मुझे 3000 स्टेप्स पूरे करने में 30 मिनट लग जाते हैं। डेढ़ घण्टे होने को आये लेकिन फ़ीता पूरे मार्केट से नदारद लग रहा था। स्टेप्स पूरे करते-करते पनकी रोड से बिठूर रोड तक पहुँच गया। दसियों दुकानों पर निगेटिव उत्तर मिल चुका था। इस बार तो गर्मी फरवरी से ही चढ़ चुकी थी। बिना पानी-वानी पिये जब मैं ग्यारहवीं दुकान पर पहुँचा होऊंगा तो पसीना बाहर तक झलक रहा था और तालू सूख रहा था। फ़ीता बोलना चाहा लेकिन ज़बान फ़ी पर ही अटक गयी। पहला दुकानदार था, जो कुछ मुस्कुराया। पीछे उसने वर्कर को आवाज़ दी - भाई साहब को पानी पिलाओ। इतना सत्कार देख के मैं भाव-विभोर होने ही वाला था कि उसने आगे कहा - भाई साहब पहले लोग पैदल चलते थे तो दो-चार साल में जूता बदलने की नौबत आ जाती थी। सबके पास चार-चार जोड़ी जूते हैं। लोग कार और स्कूटर पर चलते हैं। अब जूते कहाँ टूटते हैं। फ़ीते न टूटें तो कोई जूता न खरीदे। कहिये तो नया जूता दिखाऊँ।

मोची के यहाँ से लिये सस्ते फ़ीते लेदर के जूतों से मैच तो नहीं कर रहे थे। लेकिन जिस वाणभट्ट ने बीटेक के चार साल एक नार्थ स्टार में ही काट लिये हों, वो नया जूता खरीदने से तो रहा।

-वाणभट्ट

शनिवार, 4 मार्च 2023

आँखों देखी 

अगर वो किसान का खेत होता और बाबा की गाय घुस गयी होती तो कोई हंगामा नहीं बरपता. हमारे किसान संतोषी टाइप के जीव हैं. बिजनेस की तरह नहीं कि अपने उत्पाद और मेहनत की कीमत मनमानी माँग लें. जब बिजनेस वाला शो देखना शुरू किया, तब पता चला कि एक बार ब्रैंड बन जाये तो मार्केट प्राइस और मुनाफ़ा आप ख़ुद डिसाइड कर सकते हैं. जबकि खेती में किसान मेहनत ख़ुद करते हैं और आशीर्वाद ऊपर वाले का माँगते हैं कि सब ठीक-ठाक निकल जाये तो बिचौलियों का कर्ज़ उतर जाये. 

जब हमारी विभागीय कार धूल उडाती हुयी गाँव में प्रधान जी के दालान में पहुँची तो ग्रामीण भाइयों की भीड़ लग गयी. सभी को उम्मीद रहती है कि बड़ी गाड़ी आयी है तो कुछ बीज-खाद दे कर जायेगी. खेतों का मुआयना करने हमारी टीम जिधर भी जाती तो लोगों का एक छोटा लेकिन दृश्यमान हुजूम उधर बढ़ लेता. वो भीड़ में सबसे पीछे धीरे-धीरे लाठी के सहारे चला आ रहा था. उपरी शरीर पर कोई कपडा नहीं था और नीचे का हिस्सा एक मैली सी आधी धोती से कुछ ढँका-अनढँका सा था. चेहरा पूरी तरह से भाव रहित था. भीड़ का अंग हो कर भी वो भीड़ से अलग दिख रहा था. उसे देख कर मन में दया भाव का आना सहज ही था. सोचा जब चलने लगूँगा तो कुछ सहायता राशि उसके हाँथों में रख दूँगा. हमारे टीम लीडर एक खेत के पास जा कर रुक गये. और आवाज़ लगाते हुये बोले - अरे भाई सिरोही, तुम्हारी मूँग तो सब नील गाय ने खराब कर दी. कुछ भी नहीं मिलेगा. अब वो पीछे से अपनी उसी चाल से चलते हुये टीम के सामने आ गया. साहब क्या बतायें नील गाय की बहुत समस्या है लेकिन उपर वाले की मेहरबानी रही तो खेत एक-दो कुन्तल दे कर ही जायेगा. तब मुझे एहसास हुआ कि जिस व्यक्ति के प्रति मेरे मन में दया भाव आ रहा था दरअसल वो एक जमीन का मालिक है. और जिसकी आस्था इतनी प्रगाढ़ है, उसे कोई क्या दे सकता है. मै कुछ देता तो शायद वो ले भी लेता लेकिन जमींदार व्यक्ति को कुछ देने की हिमाक़त करने की मेरी हिम्मत न हुयी. 

यहाँ बात अलग थी. शोध का खेत था. रात में किसी आवारा जानवर ने खेत में घुस कर फसल को तितर-बितर कर दिया था. ये ऐसा नुक्सान था जिसके पीछे वर्षों की मेहनत और शोध लगा था. उस नुक्सान का आँकलन करना कतई सम्भव नहीं था. जिसका नुक्सान हुआ उसका गुस्सा जायज़ भी था. लेकिन जहाँ खेत की फेंस कई जगह से गल के ख़राब हो चुकी हो वहाँ से किसी छुट्टा पशु का आ जाना असंभव नहीं था. बगल के खेतों में गन्ने की कटाई हो जाने के कारण संभव है कि जानवर इधर घुस गये हों. उनके लिये आम खेत और शोध खेत में फ़र्क करना सम्भव होता तो शायद वो इधर न आते. किसी ने बताया आठ-दस सूअर झुण्ड में आ कर फसल को रौंद गये. किसी ने बताया जहाँ से फेंस टूट गयी है, वहाँ से सूअरों का झुण्ड घुस आता है और फसल तबाह कर जाता है. जहाँ से ये फेन्स टूटी थी, वहाँ से इस खेत के बीच में कई और खेत भी पड़ते थे. किसी ने सूअरों के चरित्र पर प्रकाश डाला कि वो सबसे आख़िर में जो खेत होता है, वहीं विचरना पसन्द करते हैं. वो फसल खाते कम हैं और लोटते ज़्यादा हैं. शहरी सूअरों के बारे में तो हमें कुछ आइडिया है, जो नाली के कीचड़ और गन्दगी में घुस के पड़े रहने में ही आनन्द लेते हैं. सींग वाले जंगली सूअरों के बारे में उतना ही पता है, जितना जिम कॉर्बेट की कहानी में खौफ़नाक जंगली सूअर के शिकार का ज़िक्र था. लेकिन जब दृश्य को रीक्रियेट किया गया तो सीन कुछ ऐसा बना - जहाँ से फेंस टूटी हुयी थी वहाँ से दर्जन भर जंगली सूअरों ने प्रवेश किया. वो फेन्स के किनारे-किनारे या सड़क पर चलते हुये आखिरी उस खेत तक आये, जहाँ फ़सल पक के कटाई के लिये तैयार खड़ी थी. उसे देख के उनके मन उल्लास से भर गये और वो उसमें लोटने लगे. 

सुबह प्रत्यक्षदर्शी सिर्फ तहस-नहस हुये खेत को ही देख पाये. ये वारदात रात में हुयी थी. जिसका कोई चश्मदीद गवाह न था. नुक्सान बहुत बड़ा था. आक्रोश उससे भी ज़्यादा. तीस साल के मेरे अनुभव में ऐसा नुक्सान शायद ही कभी हुआ हो. समाधान फेन्स को मजबूत करने में था. लेकिन नतीजा निकाला गया कि चूँकि बुजुर्ग सिक्योरिटी इन्चार्ज अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं कर पा रहा है इसलिये उसे काम छोड़ कर स्वेच्छा से रिटायर्मेंट ले लेना चाहिये. बहुत सम्भव है इस घटना की पटकथा इसी मन्तव्य से लिखी गयी हो. ऐसा भी हो सकता है.

बैक मिरर में सभी पीड़ित पक्ष चाय लड़ाने के उद्देश्य से ऑफिस बिल्डिंग की ओर बढ़ते दिखे.

-वाणभट्ट   

 


मुस्कुराइये आप लखनऊ में हैं

मुस्कुराइये आप लखनऊ में हैं उस दिन एबिडेमी का चेहरा कुछ मायूस सा लग रहा था. रात तो अच्छा भला छोड़ के गया था. उसका मूड सातवें आसमान पर था. गेस...