भारतीय कृषि का इतिहास 9000 वर्षों से भी पुराना है. कृषि एवं पशुपालन अपनाने के साथ ही मानव सभ्यता का विकास एक समाज के रूप में होना आरम्भ हुआ. प्रारम्भ से ही वर्षा आधारित खेती में प्रति वर्ष दो फसल लेने का प्रचलन था. उस समय भी देश-विदेश से खाद्य सामग्री का आदान-प्रदान हुआ करता था, जिसके माध्यम से नयी फसलों का भारत में प्रवेश हुआ और भारतीय फसलें भी विदेशों तक पहुँचीं. मध्ययुगीन काल में भी भारत में सिंचाई और भूमि संरक्षण प्रबन्धन के प्रमाण मिलते हैं. मानव जीवन में पादप और पशुधन की उपयोगिता को भारतीय समाज ने चिन्हित कर लिया था. ईसा से 8000 वर्ष पूर्व ही फसलों में जौ और गेहूँ की खेती और, पशुओं में बकरी और भेंड पालन का उल्लेख मिलता है. पंक्तिबद्ध बुआई, फसलों की मड़ाई, चारागाह और अनाज भण्डारण की पद्यतियाँ भी विकसित की गयी थीं. भारत में कपास का उत्पादन 5वीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व में आरंभ हो गया था, जिसने आधुनिक वस्त्र औद्योगीकरण को एक सुदृढ़ नीव रखी. आम और खरबूज भारतीय उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के मुख्य फल थे. भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग, सिन्धु और गंगा घाटी में धान का उत्पादन लिया जाता था. गन्ने का उद्भव दक्षिणी और दक्षिण पूर्व एशिया माना जाता है. हेम्प का उत्पादन तेल, रेशे और दवाइयाँ प्राप्त करने के लिये किया जाता था. मिश्रित खेती का सिन्धु घाटी सभ्यता की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान था. यहाँ पर पशुचालित कृषि यन्त्रों के उपयोग का भी वर्णन मिलता है. रबी और खरीफ़ का वातावरण किन फसलों के लिये अनुकूल है, इसका ज्ञान भी भारतीय कृषकों को था. जूट का उत्पादन भारत में सबसे पहले आरम्भ हुआ. वनस्पतियों के औषधीय गुणों के आधार पर आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्यति का विकास हुआ. वृक्षों और पशुओं को उनकी उपादेयता के आधार पर पूजनीय भी माना जाने लगा. वैदिक साहित्य में फसलों, फलों, सब्जियों, पशु व मत्स्य पालन आदि एकीकृत कृषि प्रणाली के विषय में भी उल्लेख मिलता है. पारम्परिक अनाज और दलहन फसल चक्र कृषि प्रणाली ने उत्पादन की स्थिरता और भूमि की उर्वरता को बनाये रखा. सहस्त्र वर्षों की कृषि व्यवस्था ने वर्तमान कृषि को एक सुदृढ़ आधारशिला प्रदान की. प्राचीन काल से भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है. वर्तमान में जब कुल जनसंख्या का पचास प्रतिशत भाग जीविकोपार्जन के लिये कृषि पर निर्भर हो, तो इसमें कोई संशय नहीं रहता कि भारत आज भी एक कृषि प्रधान देश है.
भारत में कृषि शोध 1829 में करनाल में एक ऊँट और बैल प्रजनन फार्म की स्थापना के साथ आरम्भ हुआ. बाद में 1868 में कोयंबटूर में कृषि कॉलेज और अनुसंधान स्टेशन, 1889 में पूना में पशु चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बैक्टीरियोलॉजिकल रिसर्च लेबोरेटरी और 1905 में शाही कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के रूप में इनका विस्तार हुआ. आईएआरआई में कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार हेतु प्रशिक्षण आरम्भ किया, किन्तु स्वतन्त्रता के पूर्व इसकी गतिविधियों को समुचित संज्ञान नहीं मिला. स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात यहाँ किये गये प्रयासों ने हरित क्रान्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. हरित क्रान्ति ने न केवल देश को भोजन उपलब्धता के गंभीर संकट उबारा अपितु देश को खाद्य अधिशेष (सरप्लस) राज्य में परिवर्तित कर दिया. हरित क्रान्ति कृषि इतिहास में आज भी मानव जाति की सर्वोत्तम उपलब्धि के रूप में अंकित है.
इसी बीच इलाहाबाद (वर्तमान में प्रयागराज) में वर्ष 1910 में डॉ. सैम हिगिनबॉटम के नेतृत्व में, भारत में ईसाई चर्च संगठनों ने कृषि संस्थान की स्थापना की. डॉ. हिगिनबॉटम ने 1903 से 1909 तक, इलाहाबाद क्रिश्चियन कॉलेज में अर्थशास्त्र और विज्ञान पढ़ाया, जिसे वर्तमान में इविंग क्रिश्चियन कॉलेज के रूप में जाना जाता है, और साथ ही साथ स्थानीय बोली का अध्ययन भी किया। इस अवधि में वो आसपास के गाँवों में एक परिचित व्यक्ति बन गये. उन्होंने ग्रामीणों की रहन-सहन की स्थिति को बहुत पास से देखा. कृषि में प्राचीन प्रणाली के उपयोग ने उन्हें चिन्ता में डाल दिया. उनको अनुभव हुआ कि कृषकों में अत्यधिक आर्थिक गरीबी का मूल कारण कम उत्पादकता है. अंततः 1909 के अंत में उन्होंने एक कृषि स्कूल की स्थापना करने का निर्णय लिया. उनकी कल्पना, ग्रामीण छात्रों को उन्नत कृषि विधियों की शिक्षा के माध्यम ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार लाने की थी. डॉ. हिगिनबॉटम एक ऐसा कृषि विद्यालय स्थापित करना चाहते थे जो युवाओं को गाँवों में काम करने के लिए प्रशिक्षित करे और साथ ही ग्रामीणों की व्यावहारिक कृषि समस्याओं पर शोध भी करे. प्रयागराज में यमुना नदी की दूसरी ओर के क्षेत्र को कृषि तकनीकों के प्रदर्शन के उद्देश्य से विकसित किया गया ताकि प्रति वर्ष संगम पर आने वाले श्रद्धालुओं को उन्नत कृषि प्रणालियों का प्रदर्शन कराया जा सके. अनौपचारिक रूप से कृषि शिक्षा वर्ष 1912 में प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से आरम्भ की गयी. डेयरी, पशुपालन और कृषि फार्म विकसित किये गये. कृषि यान्त्रिकी और डेयरी में डिप्लोमा 1923 में आरम्भ हुआ, फिर 1932 में कृषि में स्नातक और वर्ष 1943 में कृषि अभियन्त्रिकी में स्नातक शिक्षा आरम्भ हुयी. यह संस्थान कृषि अभियन्त्रिकी में स्नातक प्रदान करने वाला एशिया का पहला और विश्व का चौथा संस्थान बन गया. कृषि अभियन्ता प्रो. मैसन वाग ने कृषि अभियान्त्रिकी विभाग की स्थापना की, और उन्हें आज भी भारत में कृषि अभियान्त्रिकी के संस्थापक के रूप में स्मरण किया जाता है.
कृषि उत्पादन में हरित क्रान्ति द्वारा अभूतपूर्व वृद्धि में उच्च उपज देने वाली उन्नत प्रजातियों के उपयोग का मुख्य व अमूल्य योगदान है. उन्नत प्रजाति के बीजों से वांछित उत्पादकता प्राप्त करने के लिये खाद और सिंचाई की समुचित व्यवस्था भी सुनिश्चित की गयी. पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वृहद सिंचित क्षेत्रों और साधन सम्पन्न कृषकों के चयन ने हरित क्रान्ति में अपनी भूमिका निभायी. नीतिगत निर्णय जैसे सरकार द्वारा उत्पादित फसल का उचित मूल्य पर क्रय ने भारतीय किसानों को मँहगे आदान के प्रति प्रतिक्रियाशील (इनपुट रेस्पोंसिव) कृषि पद्यतियों को अपनाने के लिये प्रेरित किया. फसलों के सुरक्षित भण्डारण की सुविधा भी विकसित की गयी. जब यही उत्पादित अन्न, सार्वजानिक वितरण प्रणाली के माध्यम से उपभोक्ताओं की थाली तक पहुँचा, तब जा कर हरित क्रान्ति संपन्न हुयी. हरित क्रान्ति के सभी कारकों का यदि सूक्ष्म निरीक्षण किया जाये तो इसके प्रमुख घटक थे- 1. उन्नत प्रजाति के बीज और उनकी उपलब्धता, 2. खाद की समुचित मात्रा, 3. वृहद सिंचित क्षेत्र, 4. नीतिगत व्यवस्थायें, जैसे समर्थन मूल्य पर उत्पाद की सुनिश्चित खरीद, 5. भण्डारण व्यवस्था, और 6. सार्वजानिक वितरण प्रणाली. कृषि उत्पादन के किसी भी क्षेत्र में हरित क्रान्ति मॉडल को दोहराने के लिये हरित क्रान्ति के समस्त कारकों का संयोजन करना पड़ेगा.
भारतीय कृषि ने हाल के वर्षों में प्रभावशाली वृद्धि दर प्राप्त की है. अब भारत कृषि वस्तुओं के आयात के साथ ही उनका निर्यात भी कर रहा है. भारत चावल का सबसे बड़ा निर्यातक बन चुका है, तथा भैंस-माँस, पोल्ट्री, अंडे और दूध के बड़े उत्पादक देशों में से एक बन गया है. दूध और फसल उत्पादन के एकीकरण ने बड़ी संख्या में सीमांत किसानों की आय में वृद्धि करने में सहायता की है। गौ और पशुपालन के द्वारा मृदा स्वास्थ्य में सुधार की भी संभावनाओं ने देश को पुन: आकृष्ट किया है. प्राकृतिक और जैविक खेती का मुख्य उद्देश्य है - खेती व्यय को कम करना, भोजन में पौष्टिकता को बनाये रखना, मृदा एवं जल संरक्षण. कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार प्रणाली ने कृषि उत्पादन और उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, किन्तु भविष्य की बढ़ती हुयी जनसंख्या, खाद्य आवश्यकता, पर्यावरण असन्तुलन, कीटाणु-जीवाणु प्रकोप आदि चुनौतियों का समाधान खोजना भी अत्यन्त आवश्यक है. बदलते वैश्विक परिपेक्ष्य और उभरती हुयी चुनौतियों की पृष्ठभूमि में, कृषि अनुसन्धान, शिक्षा एवं विस्तार प्रणाली एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. भविष्य की आशंकाओं और सम्भावनाओं के बीच देश का कृषि उत्पादन, अनुसन्धान व विस्तार की कार्य प्रणाली पर ही निर्भर है. आज उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि के साथ जल एवं मृदा संरक्षण की महत्ता को भी समझा जा रहा है. कृषि में लघु और सीमांत किसानों के लिये फसल उत्पादन में लाभप्रदता भी एक मुख्य चुनौती बन कर उभरी है. बढ़ते परिवार के साथ घटती हुयी प्रति व्यक्ति जोत ने खेती की लाभप्रदता को प्रभावित किया है. बढ़ती आदान लागत, मौसम पर निर्भरता, घटती श्रमिक उपलब्धता और उत्पाद का उचित मूल्य न मिल पाने के कारण आज कृषि एक लाभप्रद व्यवसाय नहीं रह गया है. श्रम और आय के अनुपात को देखते हुये ग्रामीण युवा पीढ़ी का कृषि से विमुख होना सहज सम्भाव्य है. समुचित आय व रोजगार की खोज में गाँवों से पलायन बढ़ा है. ग्रामीण अंचल में कृषि कार्यों को सम्पादित करने के लिये श्रमिकों का अभाव है. आजकल हर कोई टिकाऊ खेती की बात कर रहा है, किन्तु उससे अधिक आवश्यक हो गया है कि किसान खेती में टिका रहे. यदि भूमि के हिस्से से होने वाली आय एक परिवार के लिये पर्याप्त न हो तो ऐसे व्यक्ति का खेती में टिके रहने को विवशता से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता. वर्तमान अर्थयुग में सम्पन्नता के सभी समीकरण आय और लाभ केन्द्रित हो गये हैं और होने भी चाहिये, ऐसे में किसी को खेती करने के लिये प्रेरित करना सम्भव नहीं है. खेती को लाभप्रद बनाने के लिये आवश्यक है सम्यक समग्र दृष्टि.
वर्तमान परिस्थितियों में खेती को लाभप्रद बनाने की दिशा में प्रयास हो रहे हैं. प्राय: ये मान लिया जाता है कि उत्पादन दुगना हो गया तो लाभ भी दुगना हो जायेगा. किन्तु माँग और आपूर्ति की गणित इसके ठीक विपरीत है. कृषि को लाभप्रद उद्योग बनाने के प्रयास में किसान बीज, उर्वरक, कीट-पतवार नाशक, यन्त्र निर्माताओं आदि कृषि आदान कम्पनियों के लिये एक बाज़ार मात्र है. भारत में अभी भी 50 प्रतिशत से अधिक लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रह कर कृषि आधारित कार्यों में संलग्न हैं. जबकि उत्पादन के बाद कृषि उत्पाद शहरों में स्थित मिलों में भण्डारण व प्रसंस्करण के लिये चला जाता है. इन प्रसंस्करण कंपनियों के लिये गाँव सस्ते कृषि उत्पाद के स्रोत हैं. समस्त खाद्य मूल्य श्रृंखला गाँवों के बाहर स्थापित है. फसल उत्पादन में सन्निहित सभी संकटों का सामना किसान करता है जबकि उसके उत्पाद का मूल्य निर्धारण बाज़ार करता है. प्राय: किसान को अपना उत्पाद न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम मूल्य पर बेचने को विवश होना पड़ता है. इसके पीछे ग्राम स्तर पर भण्डारण और प्रसंस्करण सुविधाओं का अभाव है. एक प्रकार से देखा जाये तो पूँजी प्रवाह गाँवों से शहरों की ओर जाता दिखायी देता है. इन परिस्थितियों में ग्रामीण युवाओं का उन्नत जीवन शैली के लिये ग्राम्य अंचल से शहरों में पलायन नितांत स्वाभाविक है. मूल्य श्रृंखला में किसान सबसे निर्बल कड़ी और मूल्य श्रृंखला के अन्य हितधारकों का दायित्व है कि वे श्रृंखला की कमज़ोर किन्तु अनिवार्य कड़ी के हितों का संरक्षण करें.
कोई भी उद्योग बिना लाभ के पुष्पित-पल्लवित नहीं हो सकता. सर्वाधिक उद्यम वाले कार्य कृषि, को कभी उद्योग की दृष्टि से नहीं देखा गया. जबकि कृषि ही ऐसा उद्योग है जो बढ़ती जनसंख्या के लिये आय व रोजगार का एक चिरस्थायी समाधान बन सकता है. किन्तु इसके लिये कृषि में उन्नत बीजों से लेकर भोजन की थाली तक पहुँचने में मूल्य श्रृंखला के समस्त आयामों पर कार्य होना चाहिये. हरित क्रांति के उपरोक्त अनेक घटकों में सर्वाधिक ध्यान किसी एक कारक ने आकृष्ट किया तो वो था - उन्नत प्रजाति. क्रान्ति के अन्य कारकों का योगदान गौण हो गया. फलस्वरूप कृषि शोध की दिशा ही बदल गयी. फसल प्रबन्धन जैसा व्यावहारिक और अनुप्रयुक्त विज्ञान नेपथ्य में चला गया. उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि के लिये कृषि शोध, प्रजाति विकास के एकांगी मार्ग पर बढ़ गया. जिस क्षेत्र में वित्तीय पोषण का प्रावधान अधिक होगा, वही शोधकर्ताओं को आकृष्ट भी करेगा. इसका सीधा उदाहरण एलोपैथी चिकित्सा व अन्य वैकल्पिक चिकित्सा पद्यतियों में देखने को मिलता है. अधिक वित्तीय उपलब्धता के कारण एलोपैथी श्रेष्ठ मस्तिष्क और छात्रों को आपनी ओर आकृष्ट करने में सफल रही है. इसमें छात्र ने किस भाषा में, किनके द्वारा शिक्षा प्राप्त की, वही छात्र के विचारों का निर्धारण करता है. अंग्रेजों की आधीनता ने भारतीय मानस पटल पर अंग्रेजी में पढ़े और पढाये विषयों की अमिट छाप छोड़ी है. ये छाप इतनी गहरी है कि देश अपने ही पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान को संदिग्धता से देखता है. आयुर्वेद और होमियोपैथी का सबसे मुखर विरोध एलोपैथी चिकित्सकों द्वारा ही होता है. ऐसे ही जब प्राकृतिक और जैविक खेती के वैज्ञानिक अध्ययन का विषय उठा तो सबसे अधिक विरोध अंग्रेजी में कृषि शिक्षा ग्रहण किये लोगों की ओर से हुआ. जबकि इसका मूल उद्देश्य खेती-किसानी में लागत मूल्य और फसल को रासायनिक उर्वरक और कीट-खरपतवार नाशकों के उपयोग को कम करना था. ताकि लोगों में रसायन रहित भोजन के उपयोग को बढ़ावा दे कर उन्हें खाद्यजनित रोगों से बचाया जा सके. इसके प्रचार के मूल में प्राकृतिक और जैविक खेती से उत्पन्न उत्पादों के लिये उच्च मूल्य के बाज़ार का निर्माण करना भी है.
भारत ने कृषि शिक्षा के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व प्रगति की है. 1877 में सैडापेट में पहले कृषि कॉलेज की स्थापना के साथ औपचारिक कृषि शिक्षा का आरम्भ हुआ, जो बाद में कोयंबटूर में स्थानांतरित हो गया. बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज, शिवपुर में वर्ष 1898 में औपचारिक पाठ्यक्रम के रूप में कृषि शिक्षा आरम्भ की गयी. यह केवल 20 वीं शताब्दी के आरम्भ में वृहद स्तर पर औपचारिक कृषि अनुसंधान और शिक्षा की आवश्यकता का अनुभव किया गया. 1905 में आईएआरआई की स्थापना के बाद, 1906 में कानपुर, नागपुर, लायलपुर और कोयंबटूर, 1907 में पुणे और 1908 में सबौर में कृषि कॉलेजों की स्थापना की गयी. आज भारत में 74 कृषि विश्वविद्यालयों की एक सुदृढ़ और सशक्त कृषि शिक्षा प्रणाली है, जिसमें 63 राज्य कृषि विश्वविद्यालय, 3 केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, 4 केन्द्रीय विश्वविद्यालय कृषि संकाय के साथ, और 4 मानित विश्वविद्यालय सम्मिलित हैं. इन विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध कृषि कॉलेजों की संख्या भी कम नहीं है.
आज अधिकांश कृषि शोध उन्नत प्रजातियों के विकास पर प्रमुखता से कार्य कर रहे हैं. कृषि की प्रत्येक समस्याओं का समाधान प्रजातियों के विकास में खोजा जा रहा है. चाहे जलवायु परिवर्तन का विषय हो या उत्पादन-उत्पादकता का, फसल सुधार के माध्यम से ही समस्याओं को सुलझाने का प्रयास हो रहा है. इस एकल दिशा प्रयास के कारण प्राकृतिक जैविक विविधता के बाद भी दिन प्रति दिन संस्तुत नयी-नयी प्रजातियों का विकास हो रहा है. इनमें अधिकांश प्रजातियाँ, उत्पादकता व एक या दो अन्य विशेषताओं के लिये चिन्हित की जा रही हैं. इनका उद्देश्य 15 से 20 प्रतिशत तक उत्पादकता में वृद्धि है. जबकि उचित फसल प्रबन्धन से इस वांछित उत्पादकता को प्राप्त किया जा सकता है. केवल उचित यन्त्रीकरण से उत्पादन-उत्पादकता में वृद्धि के साथ ही संसाधनों का उपयोग अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है. कृषि की अनेकानेक समस्याओं के व्यावहारिक व अभियांत्रिकी समाधान सहज उपलब्ध हैं. स्वतंत्रता के पचहत्तर सालों में अभियांत्रिकी के विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व विकास हुआ है. प्रजातियों का विकास एक समय लेने वाली प्रक्रिया है. अभियान्त्रिकी का सदुपयोग करके कृषि समस्याओं का शीघ्र व त्वरित निदान किया जा सकता है. खेती में श्रम और लागत कम करने में कृषि अभियान्त्रिकी ने अमूल्य योगदान दिया है. उत्पादित फसल के मूल्य सम्वर्धन से कृषक और ग्रामीण आय में वृद्धि की अपार संभावनायें हैं. जलवायु परिवर्तन सहिष्णु, कीट व रोग रोधी प्रजातियों के विकास का मुख्य उद्देश्य, उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि ही रहा है. प्राय: मुख्य उपयोगकर्ताओं, किसान, प्रसंस्करणकर्ता और उपभोक्ता, की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रजातियों के विकास को वरीयता नहीं मिलती. खेती में कृषि कार्यों की समयबद्धता अत्यंत आवश्यक है. इसलिये वृहद् स्तर पर खेती करने के लिये प्रत्येक कृषि कार्य के यंत्रीकरण की आवश्यकता है. इसके लिए आवश्यक है कि प्रजातियों के विकास में यन्त्रों के प्राचल (पैरामीटर्स) का भी ध्यान रखा जाये. पंक्तिबद्ध व मेंढ पर बुआई के लिये सीड ड्रिल और प्लांटर्स का उपयोग होता है. अगल प्रजातियों के भिन्न आकार के बीजों के कारण मशीन का बार-बार संयोजन करना पड़ता है. उत्पादित अनाज की साफ़-सफाई में भी हर आकार की चलनी न होने के कारण सफाई क्षमता प्रभावित होती है. प्रत्येक फसल के दानों की आकार-सीमा नियत करके सीड ड्रिल से लेकर थ्रेशर, ग्रेडर, और प्रसंस्करण मशीनों की दक्षता को बढाया जा सकता है.
अब आवश्यकता है चतुर (स्मार्ट) फसल सुधार की. अभियांत्रिकी औसत के नियम पर कार्य करती है. पूरे विश्व में मानव संरचना अलग-अलग है, किन्तु पूरे विश्व में मेज और कुर्सी की ऊँचाई लगभग नियत है. भवनों के निर्माण में भी अधिकांश पैरामीटर्स वैश्विक स्तर पर सामान्य मानव के आधार पर बनाये जाते हैं. इसी प्रकार मशीनों का डिज़ाइन भी सामान्य मानव के अनुरूप तैयार किया जाता है. इससे यन्त्र निर्माण में सुविधा हो जाती है. कृषि में भी प्रजाति विकास में अभियांत्रिकी और मशीन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना चाहिये. यदि कृषि उत्पादन का अधिकतम यंत्रीकरण करना है तो बोआई, निराई, गुड़ाई, कटाई, थ्रेशिंग आदि समस्त फसल उत्पादन प्रणालियों की आवश्यकताओं को प्रजाति विकास में सम्मिलित करना होगा. मशीन की सेटिंग के अनुसार यदि कृषि पद्यतियों को अपनाया जाये तभी कृषि का अधिकतम यन्त्रीकरण सम्भव हो पायेगा. अभी एक ही फसल की भिन्न प्रजातियों के बीज अलग-अलग आकार के होते हैं, इसके कारण हर प्रजाति के लिये मशीन पैरामीटर्स को बदलना पड़ सकता है. यंत्रीकरण में सर्वाधिक योगदान ट्रैक्टर्स का है. इसलिये आवश्यक है कि फसल पंक्तियों के बीच कम से कम ट्रैक्टर के पहिये के बराबर दूरी सुनिश्चित हो. आजकल मशीन द्वारा हार्वेस्ट करने के लिये सभी फसलों की ऊँचाई बढ़ाने के प्रयास चल रहे हैं. इस प्रोजेक्ट की विशेषता ये है कि इस मशीन से कटाई और मड़ाई के शोध में कोई अभियन्ता सम्मिलित नहीं है. यंत्रीकरण का लाभ तब ही है जब बोआई से लेकर कटाई तक के सभी कार्य मशीनों की सहायता से किये जायें. जबकि इस परियोजना का लक्ष्य मात्र कटाई और मड़ाई तक ही सीमित है. बोवाई व अन्य कृषि कार्य मानव श्रम द्वारा ही किये जाते हैं. चूँकि फसल पंक्तियों के बीच की संस्तुत दूरी ट्रैक्टर के पहियों की चौडाई से कम होती है इसलिये अन्य कृषि कार्य जैसे निराई-गुड़ाई, कीटनाशक का स्प्रे श्रमिकों द्वारा किया जाता है. ट्रैक्टर के पहिये के बराबर दूरी रखने पर खेत में पौधों की संख्या कम हो जाती है, जो उत्पादन और उत्पादकता पर ऋणात्मक प्रभाव डालती है. कृषि उत्पादों का अंतिम उपयोगकर्ता या तो प्रसंस्करणकर्ता होता है या उपभोक्ता. किन्तु दुर्योग से प्रजाति विकास में उनकी आवश्यकताओं की उपेक्षा की जाती है. उनकी आवश्यकताओं का समावेश करके लक्ष्योंमुख प्रजातियों का विकास कम संसाधन में किया जा सकेगा. भारत जैविक विविधताओं का देश है, अन्तः आवश्यकता है देशी प्रजातियों की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाने की. कृषि शिक्षा में रत सभी विश्वविद्यालय व कॉलेज फसल सुधार कार्यक्रम चला रहे हैं. इस प्रकार देश की जैविक विविधता को निर्बाध रूप से बढाया जा रहा है. स्थिति ये हो गयी है कि शुद्ध देसी प्रजाति खोजना और उनका संरक्षण कर पाना कठिन होता जा रहा है. भारत को जलवायु और मृदा संरचना के आधार पर बाईस कृषि पारिस्थितिक क्षेत्रों में बाँटा गया है. प्रत्येक क्षेत्र में स्थापित विभिन्न शिक्षा व् शोध संस्थान उस क्षेत्र की फसलों के विकास में लगे हुये हैं. सभी के पास उन्नत प्रजातियाँ हैं, किन्तु हर समूह अपनी-अपनी प्रजाति की संस्तुति कर रहा है. यदि सभी समूह मिल कर ये निर्णय लें कि इस क्षेत्र में ये दो या चार प्रजातियाँ ही उच्चतम उत्पादन देंगी, तो बहुत संभव है किसान को उन्नत प्रजातियों के बीज आसानी से उपलब्ध हो सकें. इससे न केवल फसल उत्पादन और प्रसंस्करण में यन्त्रीकरण करना सुलभ हो जायेगा, अपितु उत्पादकता में भी वृद्धि अवश्य होगी. फसल सुधार का कार्य नेपथ्य में चलता रहता है, अग्रभाग में तो विकसित प्रजातियाँ और उनके बीज ही दिखायी देते हैं. मिसाइल के विकास में कितना मौलिक विज्ञान, भौतिकी, गणित, रसायन शास्त्र पर काम हुआ, ये कोई नहीं देखता. दिखाई देता है आकाश, पृथ्वी और नाग का सफल प्रक्षेपण. अपने कार्यक्षेत्र से भिन्न विषयों का शोध में समावेश करके कम समय में उपयुक्त उन्नत प्रजाति का चयन या विकास किया जा सकता है. पहले बैसाखियों का भार बहुत अधिक होता था. कलाम साहब के सुझाव से मिज़ाइल में उपयोग होने वाले हल्के और मजबूत मिश्र धातु के उपयोग ने एक बहुत बड़ा परिवर्तन ला दिया. फसल सुधार व कृषि सम्बंधित अन्य विषय विशेषज्ञों का सामूहिक प्रयास अधिक उन्नत और प्रचलित प्रजाति का विकास करने में सक्षम होगा. प्रसंस्करणकर्ता को भी एकसमान कच्चा माल चाहिये होता है, भिन्न प्रजातियों के लिये भिन्न प्रसंस्करण उपचार भी करने पड़ते हैं. इसमें अन्तिम उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है. भारत में आम के पैक्ड जूस का विपणन बहुत सी कम्पनियाँ कर रही हैं. वे भी आम का गूदा या गाढ़ा जूस विदेशों से आयात करती हैं. जबकि भारत में आम की पैदावार बहुतायत से होती है. जब कंपनियों से पूछा गया कि आप भारतीय पल्प का उपयोग क्यों नहीं करते तो उनका उत्तर था यहाँ आम की इतनी अधिक प्रजातियाँ हैं कि पूरे खेप के लिये एक सान्द्रता, रंग और मिठास का पल्प नहीं मिलता जबकि आयातित पल्प एकरूप होता है. यही समस्या मिल मालिकों को भी होती है. आयातित दलहनी फसलों की पूरी खेप एक सी होती है, इसलिये मशीन सञ्चालन में बहुत ज्यादा समायोजन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती. कम प्रजातियों का अर्थ है, किसानों के लिये बीजों की सहज उपलब्धता और प्रसंस्करण हेतु एकरूप कच्चा माल. प्रजातियों की संख्या कम करने के लिये निस्तारण से पहले प्रजातियों को जितने अधिक परीक्षणों (स्क्रीनिंग) से गुजरना होगा, उतनी ही कम प्रजातियाँ सभी पैरामीटर्स पर सफल होंगी. अभी तक उन्नत प्रजातियों को उत्पादन, उत्पादकता और रोग रोधकता के आधार पर निर्गत किया जाता है. मशीन निर्माताओं और प्रसंस्करण के लिये उपयोगी पैरामीटर्स को भी संज्ञान में लिये जाने से निश्चय ही प्रजातियों के निस्तारण संख्या में कमी आयेगी. उपभोक्ताओं के स्वाद और वरीयता को सम्मिलित करने से किसी भी निर्गत प्रजाति के अप्रचलित हो जाने की सम्भावना भी कम होती है. बीस साल पहले फसल की ऊँचाई बढ़ाने के उद्देश्य से फसल सुधार कार्यक्रम आरम्भ किये गये थे. एक अभियन्ता ही ये समझ सकता है कि फसल को ऊँचा करने की तुलना में कंबाइन की कटर बार को नीचे करना एक आसान विकल्प है. आज अधिकांश फसलें कम्बाइन से कट रही हैं. बीस साल पहले यदि किसी ने इस बात पर ध्यान दिया होता तो मशीन से कटाई के लिये फसल की ऊँचाई बढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती. कुछ लोगों की अवधारणा थी कि बीजों का आकार छोटा होना चाहिये, क्योंकि बड़े दाने थ्रेशर मशीन में टूट जाते हैं. बहुत सम्भव है उन्हें थ्रेशर में सेटिंग बदलने के प्रयोजन का भान न रहा हो.
जिस तरह प्रजातियों का विकास हो रहा है, उसी तरह अभियान्त्रिकी तकनीकों का विकास भी हो रहा है. कृषि वैज्ञानिकों को चाहिये कि प्रजाति विकास में उन्नत अभियांत्रिकी तकनीकों का भी प्रयोग करें. काल्पनिक सुपर वैरायटी की अवधारणा में अवांछित क्षेत्रों में शोध संसधान को व्यर्थ कर देना उचित नहीं है. आजकल फसल कटाई के दौरान न झडें या भण्डारण में बिना किसी रसायन के भण्डारगृह में कीट से सुरक्षित रहे, इस दिशा में प्रजाति विकसित करने की योजना की चर्चा हो रही है. जिन समस्याओं का सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ प्रबंधन हो सकता है, उन क्षेत्रों में प्रजातियों का विकास करने के प्रयास, मानव श्रम और वित्तीय संसाधनों के दुरूपयोग से अधिक कुछ नहीं है. कृषि शोध में एक समस्या ये भी है कि हर व्यक्ति अलग-अलग परियोजना पर काम कर रहा है. जबकि बड़े-बड़े काम समूह द्वारा किये जाते हैं. इसरो में एक परियोजना पर हज़ारों लोग मिल कर काम करते हैं, जो उनकी सामूहिक उपलब्धि होती है. कृषि शोध में शोध एकाकी है तो सफलता भी व्यक्तिगत है. कृषि के किसी भी क्षेत्र में अभियन्ताओं की भूमिका पर कोई विशेष बल नहीं दिया गया है. यहाँ तक कि अधिकांश कृषि विज्ञान केन्द्रों में हर विषय के विषयवस्तु विशेषज्ञ मिल जायेंगे सिवाय कृषि अभियंता के. अभियंता का दृष्टिकोण समाधान उन्मुखी होता है और वो संस्थान में संसाधन सृजन के कार्य में प्रमुख भूमिका निभा सकता है. प्रजातियों के विकास कार्यक्रमों में अभियंताओं का समावेश प्रजाति विकास को एक नयी दिशा देने में सक्षम है. इनका व्यावहारिक ज्ञान कृषि शोध को नया आयाम देगा.
कृषि शोध की वर्तमान समस्या ये है कि ये हर कृषि समस्या का समाधान प्रजातियों के उन्नयन में देखती है. जबकि उनका प्रबंधन एक सस्ता और आसन विकल्प हो सकता है. समस्याओं का उन्नत प्रजातियों के विकास से सम्पूर्ण निराकरण के प्रयास कभी भी अधिक समय तक प्रभावी नहीं रहते. इसीलिये जो समस्यायें कृषि में पचास वर्ष पहले थीं, वो आज भी अस्तित्व में बनी हुयी हैं. समस्या के सम्पूर्ण उन्मूलन करने की चेष्टा से अधिक सरल है उनका प्रबन्धन. अभियांत्रिकी तकनीकों के माध्यम से समस्या को समाप्त तो नहीं पर उसकी तीव्रता को कम लागत में नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है. इसी प्रकार वर्षों से पौधों के उकठा रोधी बनाने के लिये शोध चल रहे हैं. किसी ने मृदा की नमी से इसे सहसम्बद्ध करने का प्रयास नहीं किया. सम्भवतः भूमि में नमी की कमी उकठा रोगाणु को सक्रिय करता हो. सिंचाई की आधारभूत संरचना में निवेश कृषि एवं कृषक की अनेकानेक समस्याओं को साधने में सिद्ध होगा. विगत छह वर्षों में, भारत के सिंचित क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुयी है, जो सकल फसली क्षेत्र के 47% से बढ़ कर 55% हो गया है. भविष्य में सिंचित क्षेत्र का परिमाण बढ़ना सुनिश्चित है. प्रजातियों के विकास हेतु शोध दल में भिन्न विषय वस्तु विशेषज्ञों का समावेश किसी अनावश्यक शोध की सम्भावना को कम करेगा, साथ ही कृषि शोध में टीम भावना का भी विकास करेगा. अधिकांश प्रजातियों को कीट और रोगरोधी क्षमता, जलवायु परिवर्तन के न्यूनतम असर और अल्पतम जल आवश्यकताओं के लिये परीक्षित (स्क्रीन) किया जाता है. किसी क्षेत्र के लिये किसी प्रजाति की संस्तुति से पहले उसे अधिकाधिक पैरामीटर्स के लिये स्क्रीन करना चाहिये ताकि संस्तुत प्रजातियों की संख्या कम से कम हो और उसका अधिकाधिक उपयोग हो सके. कम प्रजातियों की संख्या बीजों की उपलब्धता को भी सुनिश्चित करेंगी और, यन्त्र निर्माताओं और प्रसंस्करणकर्ताओं की आवश्यकता की पूर्ति भी करेगी.
डॉ. हिगिनबॉटम ने अर्थशास्त्री होने के बाद भी 1943 में ही कृषि में अभियांत्रिकी के महत्त्व को समझ लिया था. किन्तु आज स्वतंत्रता के पचहत्तर साल बाद भी इस विषय को कृषि शोध में समुचित स्थान नहीं मिला है. ये दुर्भाग्य ही है कि संस्थानों में कृषि लागत को कम करने के या तकनीक प्रदर्शन के लिये भी यंत्रीकरण को समुचित रूप से नहीं अपनाया गया है. आज भी अधिकांश कृषि शोध संस्थानों में कृषि अभियांत्रिकी विभाग नहीं हैं. जल और मृदा संरक्षण, फसल उत्पादन का यंत्रीकरण और कटाई के बाद प्रसंस्करण आज की महती आवश्यकता हैं जो कृषि को औद्योगिक स्वरुप दे कर कृषक और ग्रामीण आय में वृद्धि करने में सक्षम हैं.
-वाणभट्ट
कृषि विज्ञान केन्द्रों की धीमी मौत। सार्वजनिक क्षेत्र के कृषि विस्तार की हत्या।
जवाब देंहटाएंइनकी शुरुआत बहुत धूमधाम से की गई थी। एक के बाद एक कृषि मंत्रियों ने कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके) की भूमिका की सराहना की थी। वास्तव में, केवीके स्थापित करने की इतनी मांग थी कि मुझे याद है कि राजनीतिक प्रतिनिधि इसके लिए लाइन में लग गए थे। देश के लगभग सभी जिलों में स्थापित इन कृषि विस्तार केन्द्रों से राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के आउटरीच शाखा होने की उम्मीद थी।
पहला केवीके भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा 1974 में पांडिचेरी में स्थापित किया गया था। केवीके को विभिन्न कृषि प्रणालियों के तहत कृषि प्रौद्योगिकियों की स्थान विशिष्टता की पहचान करने के लिए ऑन-फार्म परीक्षण, किसानों के खेत पर इसकी उत्पादन क्षमता स्थापित करने के लिए अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन, आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकियों में अपने ज्ञान और कौशल को अद्यतन करने के लिए किसानों को प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी विकास के अग्रणी क्षेत्रों में उन्हें उन्मुख करने के लिए विस्तार कर्मियों को प्रशिक्षण देने का अधिकार था।
हिंदी दैनिक दैनिक जागरण (28 अप्रैल, 2013) में निडर पत्रकार एस पी सिंह की एक रिपोर्ट इन महत्वपूर्ण कृषि विस्तार केंद्रों की चौंकाने वाली दुर्दशा और उपेक्षा को उजागर करती है। 632 केवीके न केवल दम तोड़ रहे हैं, बल्कि सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया गया है। निजी कृषि क्लीनिकों के लिए सरकार के पास शायद सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार केंद्रों के लिए कोई जगह नहीं बची है। इन्हें अप्रासंगिक बना दिया गया है।
इस पर विचार करें:
1) 100 से अधिक केवीके के पास कार्यालय भवन नहीं हैं। कृषि वैज्ञानिक पेड़ के नीचे बैठकर काम करते हैं।
2) 175 केवीके में बुनियादी मृदा परीक्षण सुविधाएं नहीं हैं।
3) केवीके वैज्ञानिकों की 1,500 नौकरियां खाली पड़ी हैं।
4) वैज्ञानिक उपकरण और मशीनरी कई जगहों पर बेकार पड़ी हैं और जंग खा रही हैं।
5) 234 केवीके में उन्नत तकनीक के प्रदर्शन की सुविधाएं नहीं हैं, और इसमें अनुसंधान फार्म भी शामिल हैं।
6) किसी भी केवीके के पास अपने कर्मचारियों के लिए आवासीय सुविधाएं नहीं हैं।
7) कृषि विस्तार के लिए वार्षिक बजट को 10,000 करोड़ रुपये से घटाकर 4,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह वेतन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।
8) आकस्मिकता के नाम पर, प्रत्येक केवीके को सालाना केवल 5 लाख रुपये मिल सकते हैं।
कार्यप्रणाली वही है। निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए, पहला कदम सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों/निकायों को धन से वंचित करना है। एक बार वित्तीय जीवन रेखा काट दी जाती है, तो अंत निकट होता है। यह भारत में हर जगह हो रहा है, और केवीके कोई अपवाद नहीं हैं। केवीके के लिए मौत की घंटी बज रही है क्योंकि सरकार कृषि विस्तार को निजी हाथों में सौंपने के लिए उत्सुक है। अब कृषि-क्लीनिकों को बढ़ावा दिया जा रहा है (बेशक सरकारी सब्सिडी के साथ)।
कृषि के जगत में इतनी उन्नति के बावजूद किसान अब भी कई विपदाओं का सामना कर रहे हैं, भारत जैसे विशाल देश में प्राकृतिक खेती और जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, तकनीक के साधनों तक सब की पहुँच नहीं हो सकती
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