गुरु जी ने आज सुबह के प्रवचन में कहा कि मंगल भाव का होना सबसे अच्छा है. यदि आप सबके मंगल की कामना करते हैं, तो आपका मंगल अपने आप हो जाता है. आती साँस में सामने वाले के मंगल की कामना कीजिये और जाती साँस में अपने मंगल की. मुझे ये गुरु जी इसीलिये पसन्द हैं जो बाकि गुरुओं की तरह सिर्फ़ त्याग की बात नहीं करते. त्याग तो तुम तब करोगे जब कोई वस्तु तुम्हारे पास होगी. साँस लोगे तभी तो छोड़ोगे.
जब मै कॉरिडोर में एक तरफ़ से घुसा, तभी उसने भी कॉरिडोर में दूसरी तरफ़ से प्रवेश किया. हमको एक-दूसरे से टकराना निश्चित था. ये नियति सुनिश्चित करती है कि किस दिन हम किससे मिलेंगे. भले मिलना चाहें या ना चाहें. किस्मत में जिन्हें मिलना लिखा है, वो ना मिल पायें ऐसा किस्मत होने नहीं देगी. और नियति के आगे हम सबको नतमस्तक होना ही होता है. हम दोनों मंथर गति से आगे बढ़ रहे थे. बहरहाल हम दोनों का आमना-सामना होना ही था. बस सौ फिट लम्बा कॉरिडोर ही था, हम दोनों के बीच. न वो मेरी शक्ल देखना चाहता था, न मै उसकी. निकट भविष्य में हमारा एक-दूसरे से काम पड़ने की सम्भावना भी न के बराबर थी. हम हिन्दुस्तानियों, विशेष रूप से सरकारी कर्मचारियों में टीम स्पिरिट की कमी इसलिये पायी जाती है, क्योंकि 'हम किसी से कम नहीं' और न ही हमारा कोई कॉमन टारगेट या अजेंडा होता है. सबके अपने राग-अपनी ढपली. एक तो अपना-अपना अहम् लिये हम लोग टीम में काम करके राजी नहीं, दूसरा अंग्रेज़ों के ज़माने की ट्रेनिंग लिये मैनेजर्स भी ये सुनिश्चित करने में लगे रहते हैं कि गलती से मिस्टेक न हो जाये, और कोई टीम बन जाये. कोई बड़ा लक्ष्य हो तो टीम बन भी जाये. जब लक्ष्य छोटे और व्यक्तिगत हों तो - अकेले हम अकेले तुम, अपनी-अपनी देखो. इस प्रक्रिया में ऊपर वालों के दिन कुशलता से कट जाते हैं. कर्म योग की ट्रेनिंग करना इसीलिये ऊपर से नीचे तक सभी कर्मचारियों के लिये अनिवार्य कर दिया गया. सेवा भाव तो जगे तो विकास को गति मिले.
देश दिन पर दिन तरक्की करता जा रहा है लेकिन आज भी कभी-कभी लगता है कि हमारे पूर्वज कुछ अधिक समझदार थे. नवनिर्मित भवनों में जाइये तो दिन और रात का पता तक नहीं चलता है. बिजली के ऊपर हमारी निर्भरता सौ प्रतिशत नहीं तो निन्यानबे प्रतिशत तो हो ही गयी है. दिन में भी बिजली जलाये बिना कोई काम नहीं कर सकते. पहले बिजली की उपलब्धता या तो थी नहीं, या थी भी तो सीमित हुआ करती थी. भवन ऐसे बनते थे, जहाँ डे-लाईट का अधिकतम उपयोग हो सके. बीच में दालान, चारों ओर बरामदा फिर कमरे. हर कमरा अलग. सबका अपना-अपना कमरा, हर कमरे के अपने-अपने ताला-ताली. हर व्यक्ति आत्मनिर्भर. अपना कमरा खोलो और अपना काम करो. क्या घर क्या दफ़्तर सब जगह कमोबेश ऐसी ही व्यवस्था थी. हवा-धूप-पानी सब इफ़रात में उपलब्ध. आज भी कुछ गर्म देश दिवा प्रकाश के उपयोग और गर्मी से निपटने के लिये ऑफिस का टाइम सुबह रखते हैं.
अब स्थिति ये है कि भवन नहीं बिल्डिंग्स बन रही हैं, अट्टालिकायें बन रही हैं. लेकिन उनकी डिज़ाइन में बेसिक कमी ये है कि रोशनी के लिये, प्राय: दिन में भी, कृतिम प्रकाश पर निर्भर रहना पड़ता है. बिजली का कनेक्शन बरक़रार रखने के लिये लम्बा-चौड़ा बिल भी देना पड़ता है. दिवा-प्रकाश का न्यूनतम उपयोग करने के बाद भी, हर कोई बिजली बचाने के लिये बड़ी-बड़ी बातें करने से नहीं चूकता. ये कृतिम प्रकाश का ही नतीजा है कि हर कोई ख़ुद तो डिप्रेशन में है ही और दूसरे को डिप्रेशन में डालने के लिये तत्पर दिखता है. इस माहौल में जो भी अपनी व्यथा-कथा बताता है, उसे मै किसी न किसी बाबा को पकड़ लेने की मुफ़्त सलाह दे देता हूँ. लोग मजा लेंगे लेकिन कन्धा नहीं. बाबा मजा भी नहीं लेता और कन्धा भी देता है. और उसकी ट्रस्ट को दिया दान, डॉक्टर्स के साइड एफेक्ट वाली दवाइयों से सस्ता ही पड़ता है.
शायद जगह की कमी ने कॉम्पैक्ट और मल्टीस्टोरी भवन बनाने को प्रेरित किया होगा. सबसे नायाब डिज़ाइन हुआ करती है, एक अंतहीन लम्बा कॉरिडोर. कॉरिडोर के अगल-बगल कमरे, और अन्त में, या सबकी सुविधा के लिये बीच में, प्रसाधन की व्यवस्था. सरकारी भवन जो बने तो लगता है, इस नक़्शे को पूरे देश ने बिना किसी संशय के अपना लिया. सरकारी भवन मुख्यतः सरकारी निर्माण विभागों द्वारा बनाये जाते हैं. उनके लिये अनुमानित लागत निकालना आसान हो जाता है. उन्हें अधिकतर प्रोजेक्ट के बजट से मतलब होता है. जहाँ उन्हें कोई नया डिज़ाइन दिखाया या बताया तो उन्हें लगता है कि नयी डिज़ाइन और नया एस्टीमेट बनाना पड़ेगा. इसलिये घुमा-फिरा कर ये आपको वही डिज़ाइन सजेस्ट करेंगे जो आज तक बनाते आये हैं. ये नहीं है कि ये डिज़ाइन कर नहीं सकते, लेकिन जब नौकरी करनी है, तो सीधे-सच्चे, समय की कसौटी पर जाँचे-परखे नक़्शे पर काम करना ही सही भी है और आसान भी. जब ट्रांसफ़र-पोस्टिंग हर तीन साल पर बदल ही जानी है, तो जल्दी से जल्दी बजट हासिल करो, काम शुरू करो-कराओ, और काम ख़त्म होने से पहले निकल लो. आपका फैलाया रायता कोई और समेटेगा. आप नयी जगह, नया रायता फैलाओ. इन परिस्थितियों में किसकी तमन्ना होगी इंजीनियरिंग मार्वेल्स बनाने की. और विभागों का भी परम ध्येय ये ही होता है कि बजट मिला है तो जल्दी से जल्दी हिल्ले लगा दो, वर्ना अगले बजट में कटौती की सम्भावना रहती है. जब दोनों को (बनवाने और बनाने वाले) को जल्दी हो तो प्लान और एलिवेशन पर काम करना समय की बर्बादी है. नतीजा बिल्डिंग में कॉरिडोर, कॉरिडोर के दोनों ओर कमरे और आख़िर या बीच में प्रसाधन, इससे अधिक भवन का उपयोग करने वाले कर्मचारी-अधिकारी न सोच पाते हैं, न आशा करते हैं.
कमरे हैं तो खिड़कियाँ भी होंगी. जिनसे दिन में सूर्य-प्रकाश आने की सम्भावना रहती है. लेकिन हमारे कर्मचारी थोड़े सोफेस्टिकेटेड होते हैं. घर में तो परदे बीवी की मर्ज़ी के लगते हैं. ऑफिस में अपनी पसंद के परदे लगाने की छूट मिल जाती है. तो हर कमरे को लोग-बाग़ अपने मनपसंद रंग के परदों से सजाने का मौका नहीं चूकते. अब चूँकि परदे होते ही प्राइवेसी के लिये हैं, तो उन्हें इतना मोटा तो होना ही चाहिये कि अन्दर का नज़ारा बाहर से न दिखे. ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल ने जरुर इन्टरवीन किया होगा जो निर्णय लिया गया कि कॉरिडोर की ओर दरवाज़े शीशे के होंगे ताकि ऑफिस टाइम में ट्रांसपेरेंसी बनी रहे और कॉरिडोर से गुजरने वाला हर शख्स ये देख सके कि अन्दर चल क्या रहा है. लेकिन जैसा कि पहले बताया जा चुका है, प्राइवेसी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. इसलिये शीशों के ऊपर गाढ़ी काली फ़िल्म का आवरण चस्पा कर दिया गया. अब कॉरिडोर में सूर्य के प्रकाश के पहुँचने की जो रही-सही कसर भी थी, वो समाप्त हो गयी. रवि के पहुँचने की सम्भावना थी नहीं, कवि भला उन गलियारों में क्यों घुसना चाहता. कहते भी है कि जहाँ रवि न पहुँचे, वहाँ कवि पहुँच जाता है. लेकिन कवि के लिये कोई मोटिवेशन, कोई प्रेरणा तो हो. अन्धकार इतना घुप्प था कि यदि कॉरिडोर में कुछ एल.ई.डी. बल्ब न टिमटिमा रहे होते तो मुझे पता भी नहीं चलता कि दूसरे छोर से कौन घुसा. हो सकता है हम टकरा भी जाते.
इतनी लम्बी विवेचना में हम लोगों के बीच की दूरी घट कर मात्र बीस फिट रह गयी होगी. मुस्कराहट, हेल्लो-हाय की प्रीरिक्वीज़िट होती है. उसका चेहरा सख्त था. जिन्हें स्वयं पर अतिशय विश्वास होता है, वो बाबा लोगों के चक्कर से दूर रहते हैं. इसलिये भारतीय दर्शन के विराट ज्ञान से वंचित रह जाते हैं. मुझ नाचीज़ पर मुस्कराहट वेस्ट करने का कोई इरादा न देख कर, मैंने भी अपना सारा ध्यान कूटस्थ पर लगा दिया. आती साँस मंगल तेरा, जाती साँस मंगल मेरा. अस्तित्वबोध ख़त्म हो रहा था. हम एक दूसरे के आर-पार देख रहे थे - सी थ्रू .
-वाणभट्ट