रविवार, 31 मार्च 2013

अपनी-अपनी होली 

होली सर पर थी। पडोस के एक बच्चे की सालगिरह भी आन पड़ी थी। बच्चों ने मोबाईल करके बोल दिया पापा पिचकारी और गिफ्ट लेते आइयेगा। आजकल के बच्चों को तो बस सब चीज़ हाँथ में चाहिए। वो वर्चुअल दुनिया में इतने मशगूल हैं कि किसी तीज-त्यौहार के प्रति उत्साह दिखाई नहीं देता। होली हो या दिवाली फेसबुक पर ही बधाइयाँ ली-दीं  जातीं हैं। एक हम लोग थे दिवाली से दो दिन पहले पटाखे धूप में सुखाने लग जाते थे। झालरें खुद बनाई जातीं थी और अगली दिवाली के पहले जब वो जलने से मना कर देतीं तो एक-एक बल्ब को टेस्टर से टेस्ट किया जाता। होली में पीतल की पिचकारियों के वॉशर को कडुए तेल में डुबो कर रख दिया जाता था। किसको किस तरह और कहाँ-कहाँ रंग लगाना है इसकी स्ट्रेटेजी बच्चा पार्टी बनाने लगती थी। हर कोई उत्साह से अपने रंग को एकदम पक्का बताने में लगा रहता था। बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर बस त्यौहार का ज़िक्र होता। और त्यौहार की तैयारी करने की सारी जिम्मेदारी बच्चों पर होती थी। बड़ों का हस्तक्षेप सिर्फ हड्काने और मुद्रा उपलब्ध करने तक ही सीमित था। हमने भी तो बच्चों को बच्चा बना कर रख छोड़ा है। सारे गैजेट्स मोहैया करा दिए। बस्तों के बोझ के नीचे दबे बच्चों को माँ-बाप भी कुछ बोल नहीं पाते। कुरकुरे, टकाटक, चिप्स और चॉकलेट तो इन्सेन्टिव की तरह हैं कि बच्चे दफ्तर से लौटे माँ-बाप से ज्यादा मगजमारी न कर पाएं। एक हमारे ज़माने के माँ-बाप थे उन्हें बच्चों से मगजमारी की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।

ट्रेडिशनल पुरखे तो अगली पीढ़ी को हमेशा अपने से कमतर बताने में लगे रहते हैं पर जब मै देश की वर्तमान अवस्था और व्यवस्था पर नज़र डालता हूँ तो हर जगह तरक्की झलकती नज़र आती है। अगर आने वाली नस्लें अपने पुरखों से ख़राब होतीं तो शायद दृश्य कुछ अलग होता। मै अपने को ट्रेडिशनल बापों की श्रेणी से अलग रखता हूँ इसलिए मुझे अगली पीढ़ी में संभावनाएं दिखाई देतीं हैं। मुझे विश्वास है कि भारत ही नहीं विश्व के सभी देशों का वर्तमान भूत से बेहतर है और आगे भी बेहतर ही होगा। ऑफिस में अपने तथाकथित मैनेजरों की तुलना में नयी पौध ज्यादा अच्छा मैनेज करती है और ज्यादा विश्वसनीय है। ये बात अलग है कि  उनकी सत्यनिष्ठा ऐसे व्यक्ति लिखते हैं जिनकी सत्यनिष्ठा देश-समाज के प्रति न हो कर आत्म-केन्द्रित रहती है। गत वर्षों में युवाओं ने जिस शिद्दत से भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी वो हमारी और हमारी पिछली पीढ़ियों ने कभी न देखा था न सुना। वो अभी भी भ्रष्ट व्यवस्था को संरक्षित-संवर्धित करने को प्रतिबद्ध दिखाई पड़ते हैं। ये हम कहाँ आ गए। बात तो बात है। निकलती है तो कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है। मै तो खिलौनों की दुकान में पिचकारी और गिफ्ट के इरादे से घुस चुका था।

रंग-बिरंगी पिचकारियों और खिलौनों से अटा पड़ा था वो शो-रुम। ये बात अलग है कि सभी सामान चीन से आयातित ही दिखाई दे रहा था। मैंने बताया कि अपने बच्चों के लिए मुझे प्रेशर वाली पिचकारियाँ चाहिए और एक बर्थडे गिफ्ट भी। शो-रूम की हैसियत के हिसाब से हमारी क्रय शक्ति भी बढ़ जाती है। कहीं दुकानदार हमें ऐरा-गैरा न समझ ले इस लिए नौकरी-पेशा आदमी जल्दी दाम नहीं पूछता। लेबल पर दाम पढ़ने की कोशिश ही करता रहता है। पर खिलौनों के मामले में ऐसा नहीं है। प्रिंट प्राइस अगर चार सौ लिखा है तो दो-ढाई सौ तक मोल-भाव हो सकता है। ये शो-रूम भी इस बात से अलग नहीं था। रसीद तो देनी नहीं है न ही कोई टैक्स।

सेल्समैन ने मेरे बजट का एक अनुमान पूछा। जैसे टोह लेना चाहता हो कि बन्दे ने सिर्फ ढंग के कपडे पहन रक्खे हैं या जेब में पैसा भी है। मेरी पुरानी मारुती दूर खड़ी थी वर्ना आदमी की औकात बताने के लिए कार और कार का मॉडल काफी है। ये बात अलग है कि कार भाड़े की हो सकती है या कर्जे की। सेल्समैन ने मेरे मतलब के सामान दिखाने शुरू कर दिए थे जब उसने प्रवेश किया। 

उसके चहरे पर कुछ वैसे ही भाव थे जैसा पढ़ते समय कभी बिन पैसे रेमंड्स के शो-रूम में घुसते हुए मेरे हुआ करते थे। लगता था सेल्स मैन ने नज़रों से मेरी पॉकेट अपनी आँखों से स्कैन कर लिया हो। और उसे पता हो फटीचर सिर्फ कपड़ों को हाथ लगा लगा के गन्दा करेगा और खरीदेगा फुटपाथ से। एक बार जब आदमी को पढ़ने की आदत लग जाये तो उसके हाव-भाव, वेश-भूषा, चाल-चलन सब बता देता है कि बन्दे की वकत कितनी, कुछ खरीदेगा या नहीं। और सेल्समैन के सामने से तो रोज़ सैकड़ों लोग निकलते रहते हैं। पर उसने बड़े लोगों की तरह अपनी असलियत छुपाने का कोई प्रयास भी नहीं किया था।

कपड़ों से देख कर कोई भी ये निष्कर्ष निकाल सकता था कि वो मेहनत-मजदूरी कर के अपना जीवन-यापन करता होगा। मेहनतकश बलिष्ठ शरीर उसके कई दिनों से साफ़ न किये गए कपड़ों से साफ़ झलकता था। आँखों की चमक बताती थी कि उसे अपने और अपने काम पर भरोसा था। आत्मविश्वास से लबरेज लगीं थीं उसकी आँखें। वर्ना ऐसे कपडे पहन कर कोई उस शो-रूम में घुसने से पहले कई बार सोचता। उसके साथ उसका ६-८ साल का खूबसूरत प्यारा सा बेटा भी था। बच्चे ने देखते ही हाई -प्रेशर वाली पिचकारी पकड़ ली। पापा यही वाली चाहिए। सेल्समैन ने बच्चे के बाप को ऐसे देखा जैसे कोई धन्नासेठ की औलाद बनाने की कोशिश कर रहा हो। बाप मुस्कराया। बेटा चला के तो देख लो। देखो कितनी दूर तक फ़ेंक सकती है ये रंग। कहीं फुस्फुसिया पटाखे सी फुस्स न हो जाये। फिर वो सेल्समैन से बोल भाई जरा इसको चला के तो दिखाओ।

सेल्समैन सुबह से कितनी ही पिचकारियाँ बेच चुका था। पर ये पहला ग्राहक था जिसने चला के पिचकारी देखने का आग्रह किया होगा। थोडा हिकारत से बोला ३०० की है। अरे मैंने दाम तो नहीं पूछा बस चला के दिखाने को कहा है। मुझे उसकी दिल्लगी और सेल्समैन की बेरुखी में मज़ा आने लगा था। इसलिए बोला पहले आप इसे ही निपटा लो तब तक मै खिलौने देख लेता हूँ। सेल्समैन ने पानी भर कर उस पिचकारी को दुकान के बाहर चलाया। अब बाप ने उसे हिकारत से देखा। ये कोई प्रेशर पिचकारी है? हमारी प्लास्टिक की पिचकारी भी १५ मीटर से ज्यादा दूर फ़ेंक सकती है। ये तो बस १० मीटर ही तक गयी। लड़का बोला पापा मुझे ये पिचकारी पसंद है। पर बाप था कि अड़ गया। नहीं बेटा ये बड़ी दुकान वाले घटिया सामान रखते हैं। दाम की तो पूछो नहीं। सेल्समैन और मै  दोनों उसकी मंशा ताड़ने की कोशिश कर रहे थे। सेल्समैन ने मुस्करा के देखा बोला भाई पिचकारी पसंद नहीं आई या दाम। 

वो मुस्करा कर बोला बेटा चल ये पिचकारी अच्छी नहीं है। अपने मोहल्ले के पंसारी के यहाँ बहुत नयी-नयी पिचकारियाँ आयीं हैं वहीँ से ले लेंगे।  बच्चा इतना प्यारा था कि मन में आया एक पिचकारी उसे गिफ्ट कर दूँ। पर हीरो की तरह जीने वाले उस बाप से बेटे के सामने कुछ कहने की इच्छा नहीं हुयी। बच्चे का हाथ पकड़ वो झट से बाहर निकल गया। 

- वाणभट्ट       










          

रविवार, 24 मार्च 2013

मरने के बाद


यमराज सामने खड़ा था। फॉर्मल ड्रेस में नहीं था। भैंसा भी आस-पास नज़र नहीं आ रहा था। हाँ एक रजिस्टर था हाँथ में और उसमें कुछ लिफाफे। चित्रगुप्त के हिसाब वाला रजिस्टर लग रहा था। एक लिफाफा उसने हाथ में थमा दिया। लिफाफे पर कांफिडेंशियल लिखा था। लिफाफा खोला तो धरती के उस क्षेत्र से मेरा आबोदाना उठ चुका था। चूँकि आत्मा अमर होती है सो मेरा किसी दूसरे क्षेत्र में पैदा होना लाज़मी था। यहाँ के लिए मै मर चुका था। उस पत्र को पढ़ने के बाद कुछ ऐसा ही एहसास हुआ।

इस धरती पर दो ही सच हैं एक पैदा होना और दूसरा मर जाना। उसके बीच में जो भी कबड्डी है वो रंगमंच की कठपुतलियों का लिखा-लिखाया नाटक है। ऐसा कह कर खुद को सांत्वना दी। पर जैसे पैदा होने की वजहें होतीं हैं वैसे ही मरने की भी कोई न कोई वजह तो होनी ही चाहिए। सही या गलत। आत्मा तो अजर है, अमर है, न ये पानी में भीगती है, न ही इसे सुखाया जा सकता है और न ही जलाया। फिर भला दरवाजे इसे कैसे रोक पाते।

उस कमरे में जश्न का माहौल था। लग्गू और भग्गू बॉस को बधाई देने पहुंचे थे। बॉस आप महान हो। क्या बात है। बॉस क्या तीर मारा है। आपने अन्ना को फ्रेम कर लिया। ऐसे तो वो हाथ आता न था। आपने ऐसा क्या पासा फेंका जो उसका बोरिया-बिस्तर ही समिट गया। लग्गू-भग्गू को मालूम है की बॉस से कुछ उगलवाने के लिये इतना चारा तो डालना ही पड़ेगा। बॉस की मूंछें फड़क रहीं थी। वो भी कुछ बताने को उतावला था।

गला खखार कर वो गुरु गंभीर आवाज़ बोला डियर फ्रेंड्स इट वाज़ नॉट पॉसिबिल विथाउट यु पिपल। मै तो अपने कमरे से निकलता नहीं। मुगलिया नवाबों ने जैसे अपनी रियासतें हुक्मरानों के भरोसे छोड़ रक्खीं थीं। मैंने भी कुर्सी के प्रति आप लोगों की वफ़ादारी देख कर यह पुनीत कार्य आप के सुपुर्द कर निश्चिन्त हो गया। आप लोगों ने ये भी सिद्ध कर दिया कि अगर इंसान वफ़ादारी दिखाने पर आ जाये तो वो कुत्तों को भी पीछे छोड़ सकता है। ये आप ही थे जो हमें आगाह करते रहे कि किस बन्दे ने अभी भी अपना दिमाग इस्तेमाल करना बंद नहीं किया। कौन बगावत पर आमादा है। किसे ठिकाने लगाना ज़रूरी है। आई ऐम प्राउड ऑफ़ यू। 

अन्ना  को ठिकाने लगाना सिर्फ मेरे बस की बात नहीं थी अगर दिल्ली साथ नहीं देती। पर दिल्ली को भी उल्लू बनाना भी आसान न था। मेरी इंटिग्रिटी अब तुम लोगों से तो छुपी है नहीं। तुम लोग मेरी महारत फर्जी मेडिकल और टी ए बिल बनाने के लिए तो जानते ही हो। मैंने अन्ना को फँसाने के लिए भी फर्जी केस बना कर दिल्ली भेजा तब उन्हें यकीन हुआ। यही वो मछली है जो सारे तालाब को ख़राब कर सकती है। सबसे खतरनाक हैं विचार। इसलिए अच्छा एडमिनिस्ट्रेटर पहले विचार को मारता है। बाकि सब तो खुद-ब-खुद मर जाता है। ये देश एक अन्ना तो अफोर्ड कर नहीं पा रहा है और जिसे देखो हर कोई अन्ना बना जा रहा है। इस लिए इस अन्ना को ठिकाने लगाना ज़रूरी था। अब हमारे यहाँ कोई दूसरा अन्ना बनने की कोशिश नहीं करेगा। लेट्स सेलिब्रेट। लग्गू तुम फ्रिज से आइस और सोडा निकालो और भग्गू तुम पेग बनाओ आज जश्न मनाया जाए। तेइस मार्च को ही तो शहीद दिवस मनाया जाता है। आज इसे शहीद कर दिया हमने। उसकी मूंछें ख़ुशी से और भी फड़क उठीं थीं।   

आत्मा वहां से निकली तो लोगों ने रस्ते बदल लिए। मरे हुए के साथ किसी ने देख लिया...तो। 

वहां से निकल कर आत्मा उन लोगों के पास पहुंची जो कुछ दोस्त और खैरख्वाह टाइप के लोग थे। नौकरी की दोस्ती कोई दांत काटी दोस्ती तो होती नहीं। बस फटे की यारी समझ लो। किस्मत ने साथ कर दिया तो समय काटने की ग़रज़ से दोस्ती कर ली। कुछ कॉमन फायदे हैं जो समाज में मिलने-जुलने से मिल जाते हैं वर्ना दोस्ती निभाने के लिए दोस्ती थोड़ी न होती है नौकरी में। एक दुखी था। बोला कितना समझाया भाई भगत सिंह दूसरे के घर ही अच्छे। पर उसे तो शहीद होने का शौक चर्राया था। अब हो गया न शहीद। दूसरा बोला भाई इतने लोग नौकरी कर रहे हैं क्या उन्हें नहीं मालूम सही-गलत। पर नौकरी तो नौकरी है। दिल-दिमाग घर छोड़ के आओ बस हाँ में हाँ ही तो मिलानी है बॉस की। तीसरा बोला भ्रष्ट सिस्टम में रह कर उसे ही भ्रष्ट कहना कहाँ की समझदारी है। हम भी तो बीवी-बच्चे पाल रहे हैं। नौकरी में और क्या कर सकते हो। मरने दो साले को अन्ना  बनने चला था।          

घर पर बीवी-बच्चे भी दुखी से लग रहे थे। स्वाभाविक है। बाप के कहीं और जीने का क्या मतलब जब वो साथ न हो। सुख-दुःख न बाँट पाए। अगर अन्ना ही बनना था तो परिवार बनाने की क्या ज़रूरत थी। अकेले रहते फिर जो मर्जी करते। वृद्ध पिता जी की स्थिति 'नमक के दरोगा' के वंशीधर के पिता सरीखी हो रक्खी थी। जो बेटे को हमेशा नसीहत देते आये कि बेटा मेरी तो इमानदारी से कट गयी पर तब ज़माना दूसरा था। बेइमान लोग भी ईमानदार की कद्र करते थे। पर अब वो बात नहीं रही। लोग ईमानदार की परछाईं से भी परहेज करते हैं। देश-समाज में रहना है तो उसके ही चाल-चलन निभाने पडेंगे। पर माँ तो आखिर माँ ही होती है। वो बोल तो नहीं रही थी पर रब का शुकराना अता कर रही थी। खुदा तू जो भी करता है भला ही करता है। लाखों में एक है मेरा बेटा। दिल का सच्चा और नेक। मेरे बेटे को बुरे लोग, बुरी नज़र से बचाना। तूने उसे बलाओं से दूर कर दिया तेरा बहुत-बहुत शुक्रिया।

माँ को शायद ये नहीं पता उसने भगत पैदा किया है जिसे पडोसी के घर पैदा होना था। वो भोली है और ये भूल चुकी है कश्मीर से कन्याकुमारी तक हम एक हैं, चाहे कहीं चले जाएँ। उसकी हालत बकरे की खैर मनाती माँ से बेहतर मुझे तो नहीं लगती।  

- वाणभट्ट 

    

गुरुवार, 7 मार्च 2013

जेनेटिक मैनिपुलेशन 

साथियों पिछले कुछ साल मुझे ऐसे लोगों के साथ रहने का सौभाग्य मिला जो भगवान तो नहीं पर लगभग भगवान ही हैं। जिन्होंने पूरी दुनिया की खाद्य चीजों की नस्ल सुधारने का ठेका ले रक्खा है। सामान्य भाषा में आप इन्हें ब्रीडर कह सकते हैं। ब्रीडिंग यानि कि एक ऐसा विज्ञान जो भगवान की बनायीं इस धरती पर अपना योगदान देकर उपलब्ध वनस्पतियों/पशु/पक्षियों को संवर्धित कर रहा है। ताकि कोई भूखा न मरे, और मरे तो खा-खा के। (बतर्ज़ : धर्मेन्द्र की किसी फिल्म में विलेन बोलता है मै तुम्हें ऐसी जगह मारूंगा जहाँ पानी भी न मिलेगा। इस पर अपने धरम पा जी की रिप्लाई थी "और मै तुम्हें पानी पिला-पिला के मारूंगा)। इसीलिए इस कौम को लगभग भगवान मानना ज़रूरी भी है और मज़बूरी भी है। क्योंकि भूखे भजन न हो हिं गोपाला।

भगवान तो आवश्यकता अनुसार फल, फूल, पेड़, पौधे, पशु, पक्षी और उनकी जितनी आवश्यक थीं, प्रजातियाँ बना कर, संतुष्ट हो गए। पर ये कौम भगवान की इस बायोडाइवर्सिटी से भरी दुनिया में रोज नयी डाईवर्सिटी पैदा कर रही है। नयी-नयी किस्में दिए जा रही है या देने को तत्पर है। हमारे पुरखों ने तो उपलब्ध समस्त वनस्पतियों-प्राणियों में से उपयोग कारक चीजों को ग्रहण कर ही लिया था। अपने पुरखों ने ये बताया की चिरौंजी कहाँ मिलती है या पुदीने में क्या गुण होते हैं। कडुआ खीरा भले खा लो पर कड़वी ककड़ी और लौकी कतई नहीं। लवण भास्कर चूर्ण में क्या-क्या इनग्रेडीएन्ट पड़ते हैं। मेथी के गुण के क्या होते हैं उन्होंने खोज निकला था। दाल, चावल, गेहूँ, पपीता खरबूजा, तरबूजा, कटहल, कुंदरू क्या-क्या क्या खाया जा सकता है, मेरे विचार से ये जान पाना ही अपने आप में एक बड़ा विज्ञान रहा होगा. इसके लिए हम अपने पूर्वजों के ऋणी रहेंगे।

पर इन भाइयों ने जब से धरा को अवतरण लिया है, इन्होने पुरखों के द्वारा आइडेंटीफाइड सभी चीजों को और भी अधिक संवर्धित करने का बीड़ा उठा रक्खा है। तुर्रा ये कि जनसंख्या बेतहाशा बढ़ रही है, उसे खिलाने के लिए भोजन तभी आएगा जब अधिक उत्पादन वाली प्रजातियों का विकास होगा। सो भाई लोग क्या बछड़ा, क्या मुर्गी, क्या पालक, क्या मूली सबकी नस्ल सुधारे जा रहे हैं। रोज रोज नयी नयी प्रजातियों की बाढ़ आ गयी है. कुम्भ के मेले में देसी गाय के बछड़े के दान का प्रयोजन किया जाता है. पर अब की इस वर्ण-संकर व्यवस्था में गोपालकों की चांदी हो गयी। देसी बछड़ा ४० से ५० हज़ार रुपये में बिका है और एक ही बछड़ा कई बार बिका. इतने वर्षों में कोई नयी खाद्य फसल, फल/फूल या सब्जी तो नहीं खोजी गयी, पर अपने पुरखों के द्वारा खोजी गयी चीजों की नस्ल को सुधार ज़रूर दिया। जिनकी नहीं सुधार पाए भविष्य में उन सभी की नस्ल सुधारने का दावा भी किया जा रहा है. अधिक लवण और अधिक भास्कर वाली प्रजातियों का चयन संभवत: आसन प्रक्रिया होती बनिस्पत ऐसी प्रजाति विकसित करने की जिसमें लवण और भास्कर की मात्र बढा दी जाये। अब इन्हें कौन समझाए। और हम रोकने वाले होते भी कौन हैं।   

ऐसी प्रजातियों का विकास हो चुका है या किया जा रहा है जो सूखे में भी जी सकें और मौसम की मार को हंसते हंसते झेल जायें। बढ़ती हुई आबादी का हौव्वा बनाया गया है. भाई उत्पादन नहीं बढेगा तो सब के सब भूखे मर जायेंगे। इस लिए अधिक उत्पादन वाली प्रजातियों का विकास ज़रूरी है। इन पर न तो बिमारियों का असर होगा न ही कीट-पतंगों का। हर आदमी के हिस्से में समुचित मात्र में खाना होगा तभी सभी स्वस्थ और खुशहाल रहेंगे। बकौल किसी शायर "भूख के मारे कोई बच्चा नहीं रोएगा, चैन की नींद हर इक शख्स यहाँ सोयेगा"। लेकिन आखिर में शायर पेसीमिस्ट हो गया और कहता है "दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है". क्योंकि जब मै अपने इर्द-गिर्द फटी पड़ रही तोंदों और खाना पचाने के लिए दौड़ते लोगों को देखता हूँ। भारी फ़ीस दे कर डाक्टरों के यहाँ लगी अंतहीन लाइनों को देखता हूं। बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमते डायनासोर सरीखे लोगों के देखता हूँ। तो महसूस करता हूँ, खाने की कमी नहीं है। हाँ दूसरे का हिस्सा भी खा जाने की होड़ साफ़ दिखाई देती है। प्रकृति ने आवश्यकता के हिसाब से सब दिया है पर लालच के हिसाब से नहीं। ऐसा मै नहीं कहता हमारे महापुरुषों ने कहा है और कईयों ने इसे दोहराया है। ये बात समझनी ज़रूरी है।

अभी आप तोंद पर टैक्स रख दीजिये देखिये, खाने की उपलब्धता बढ़ती है या नहीं। मेरे एक जापान रिटर्न मित्र ने बताया की वहां बॉडी मास इंडेक्स के हिसाब से बीमा का प्रीमियम रक्खा जाता है। यदि वो गड़बड़ाया तो आपको जेब ढीली करनी पड़ सकती है। वहां बिना इंश्योरेंस के डॉक्टर की फ़ीस भी देना शायद मुमकिन नहीं है और डॉक्टर के पर्चे के बिना दवाई तो खैर मिलने से रही। यहाँ एक भाई साहब इसी चक्कर में गुजर गए कि वो सूखी रोटी नहीं खा सकते थे और ओपन हार्ट सर्जरी मात्र पचास हज़ार में हो जाती है। दूसरी सर्ज़री में किस्मत उनके साथ नहीं थी।   

ये मेरा सौभाग्य रहा है की मुझे धरती के भगवानों के बीच रहने और उनके पावन विचार जानने-सुनने-समझने का अवसर मिला। एक भाई का विचार था कि जेनेटिक मैनिपुलेशन से ऐसी प्रजाति विकसित की जा सकती है जो हेलिकोवर्पा का दांत तोड़ने में कामयाब होगी। एक ने फ़रमाया कि मै ऐसी प्रजाति विकसित करूँगा जो धरती के बढ़ते तापमान से बेअसर रहे। एक ने कहा की मेरी प्रजाति कम पानी में भी अच्छी पैदावार देगी। यहाँ ख़ास बात ये है कि हर कोई अलग-अलग प्रजाति के सुधार में लगा है। एक ही वैरायटी में ये सारी कोशिशें नहीं की जा रही हैं। एक भाई ने तो छोटी पादप संरचना के पौधे को ऊँचा करने का बीड़ा सिर्फ इसलिए उठा लिया है कि कम्बाइन हार्वेस्टर गेंहूँ की फसल के हिसाब से बनाये गए हैं। मुझ नाचीज़ के मुंह से ये निकल गया कि भाई पौधे को ऊँचा करना आसन है या कम्बाइन को नीचा करना। भाई ने मुझे ऐसा घूरा जैसे कच्चा चबा जायेंगे। खैर मुझे ही अपनी नज़रें चुरानी पड़ गयीं। संभवत: हम हर समस्या का इलाज़ जेनेटिक इम्प्रूवमेंट में खोज रहे हैं। यदि ऐसा ही संभव है तो मेरे विचार से शुरुआत तो आदमी से होनी चाहिए क्योंकि अधिकांश समस्या की जड़ तो खुद इंसान ही है। कुछ साइंस फिक्शनस और फेंटेसीज़ में ऐसा जिक्र ज़रूर हुआ है। क्या अच्छा होता जो हम ईमानदार-देशभक्त-सत्यनिष्ठ लोगों को भी ब्रीड कर पाते।  

इस धरती पर अवतरित हुए मुझे भी लगभग पचास वर्ष हो चुके है। और मै अब तक के तजुर्बे से ये मानता हूँ कि जिंदगी नयी नयी चुनौतियाँ लाती है और कभी भी दो समय पर दो चुनौतियाँ एक सी नहीं होती। हर चुनौती पिछले से बड़ी और भयावह महसूस होती है। पर सही प्रबंधन ज्ञान से हमारे पुरखों ने उन्हें सुलझाया है। अभी भी अगर हजारों प्रजातियाँ इस धरती पर है, तो ये सिद्ध होता है की कोई भी नस्ल एक्सटिंकट होना नहीं चाहती और कहीं न कहीं वो संरक्षित और फल-फूल रही है। इन्हीं को एक्सप्लोर किया जाना है और किया भी जा रहा है। जिस प्रकार हर फूल की अपनी अलग रंग-रूप-सुगंध है वैसे ही हर प्रजाति की अपनी विशेषता होती है। इसका आदर किया जाना चाहिए। इंसान के रंग-नस्ल भेद को लेकर तो लोग जागरूक हो रहे हैं पर फसलों, पेंड़, पौधों, पशुओं में ये वर्ग बनाया जा रहा है। एक ही क्षेत्र के लिए २५ लोगों की २५ प्रजातियाँ हैं और हर किसी में कुछ न कुछ ख़ास है पर सिर्फ एक में सब कुछ नहीं है। शायद हो भी नहीं सकता।             

भारत में नदियों का एक व्यापक संजाल है जिसका दोहन अभी भी सम्पूर्ण रूप से नहीं हो पाया है। जितनी उर्जा, समय और धन हम प्रजातियों के विकास पर कर रहे हैं उसका कुछ अंश भी अगर जल के समुचित उपयोग पर किया जाए तो हम अधिक से अधिक असिंचित क्षेत्र को सिंचित क्षेत्र में परिवर्तित कर सकते हैं। सूखे और जलवायु परिवर्तन के विपरीत असर को निष्प्रभावी करने के लिए नदीय जल का उचित प्रबंधन हमारी खाद्य सुरक्षा पर धनात्मक दूरगामी परिणाम देगा। विभिन्न चुनौतियों/परिस्थितियों के लिए उचित प्रजातियों का चयन और उनके प्रबंधन से उत्पादन, उत्पादकता और गुणवत्ता को आसनी से सुधारा जा सकता है. सिर्फ उत्पादन बढ़ाने से ही काम ख़त्म नहीं हो जाता। आवश्यकता होती है कटाई के उपरांत फसल की समुचित भण्डारण और प्रसंस्करण की। बिना जिसके खेत से उत्पादित खाद्य सामग्री भोजन के रूप में  थाली तक नहीं पहुँच सकती। आवश्यकता है तो सही सोच और समग्र दृष्टि की।

- वाणभट्ट