गुरुवार, 15 जनवरी 2026

प्रदूषण

पूरे शहर की पत्तियों का रंग बदल सा गया है. छोटे-बड़े सभी पेड़ों का यही हाल है. हरी-हरी पत्तियों पर धूल की परत देखते-देखते, अब ये हमारी आदत में शुमार हो गया है. वनस्पतियों की वास्तविक हरीतिमा को देखने के लिये आपको बरसात का इंतज़ार करना पड़ सकता है. आपके अट्ठारहवीं मंजिल के आलिशान फ़्लैट की बालकनी के गमलों में शोभायमान पौधों की पत्तियों को तो आप स्प्रे गन की सहायता से थोड़ा-बहुत पानी डाल कर साफ़ कर सकते हैं, लेकिन यदि आपका घर जमीन पर है, तो यकीन मानिये घर के बाहर रखे पौधों का वही हाल होता है, जो शहर भर के पेड़-पौधों का. सारी पत्तियाँ धूल-धूसरित. घर को अगर ढंग से पैक करके नहीं रखा तो घर के अन्दर और बाहर में अंतर कर पाना बहुत कठिन है. खिड़की पर मच्छर जाली, शीशे के पल्ले और मोटे-मोटे पर्दों के आच्छादन के बाद भी सुबह से शाम तक घर के हर सामान पर धूल की एक मोटी परत बिछ जाती है. यदि आपको सफ़ाई की सनक है, तो भगवान ही आपका मालिक है. आप दिन भर डस्टिंग करते ही नज़र आयेंगे. और जितनी बार कोई वाहन, स्कूटर या कार, बाहर से निकलेगी, एक-दो किलो धूल का रुख़ आपके होम-स्वीट-होम की ओर ही होगा. सबसे कठिन काम है, घर में जगह-जगह से लाये सजावटी सामानों को साफ़ करना. कभी-कभी तो लगता है घर में सामान न होते, या जो होते भी, वो बंद अलमारियों के अन्दर, तो कितना अच्छा होता. बस मेज-कुर्सी-सोफ़ा और जमीन ही साफ़ करनी पड़ती. 

सरकारी व्यवस्थाओं से अमूमन हर कोई त्रस्त है. ऐसा ही हाल है जल निगम द्वारा 'हर घर पानी' की व्यवस्था का. गाहे-बगाहे पानी झटका दे जाता है. तमाम इंतजाम के बाद भी गन्दा-बदबूदार पानी आ जाना, अजूबा नहीं लगता. वस्तुतः ये सरकार की आम जनता की इम्युनिटी बूस्ट करने-कराने की योजना है. विदेशों में सेटल्ड हमारे ही लोग जब भारत की पावन धरा पर उतरते हैं, तो उन्हें सबसे ज्यादा डर पीने के पानी से लगता है. जिन-जिन को सरकारी पानी की सप्प्लाई पर भरोसा नहीं था, उन सभी ने अपने-अपने घर में बोरिंग करा ली. पम्प का प्रेशर इतना तेज़ है कि रोक नहीं पाता घर के पेड़-पौधों की पत्तियाँ साफ़ करने से. बीच में कार भी आ जाती है, इसलिये वो भी धुल जाती है. वर्ना पर्यावरण प्रेमियों का इरादा तो बस पत्तियों को हरा-भरा देखने का ही था. कुछ दूरदर्शी लोग होते हैं. वो समस्या को 'निप ऑफ द बड' के सिद्धांत से समाप्त कर देना चाहते हैं. वो रोज अपने घर के सामने की सड़क सिर्फ़ इसलिये धोते हैं कि धूल बैठ जायेगी तो उड़ेगी नहीं. हमारे यहाँ संसाधनों की कमी नहीं है, लेकिन हमारा प्रयास सदैव ये रहता है कि हम संसाधनों का दोहन अपने पड़ोसियों से ज्यादा करें. अब मै अपनी महानता का क्या बखान करूँ, इस चलते-पुर्जे ज़माने में भी कुछ मेरे जैसे आदर्शवादी लोग हैं, जो अभी भी सरकारी पानी की सप्प्लाई का उपयोग कर रहे हैं और आधी बाल्टी पानी में पोछा निचोड़-निचोड़ के अपनी कार को साफ़ रखने का प्रयास करते हैं, वो भी हफ़्ते-दस दिन में एक बार.

आपको लग रहा होगा कि मुद्दा प्रदूषण का था और वाणभट्ट बस धूल की बात कर रहा है. तो भाइयों और बहनों, मुझे ये बताना है कि मेरे फेफ़ड़ों के हालात बहुत नासाज़ हैं. लेकिन वाहनों के धुयें से मेरी एलर्जी उतनी एग्रिवेट नहीं होती, जितनी धूल के बारीक कणों से. पुतिन और नेतान्याहू ने जितने बम फोड़ डाले हैं, उसके बाद मै ये दावे से कह सकता हूँ कि बारूद और फॉसिल फ्यूएल से ग्लोबल वार्मिंग तो बढ़ सकती है लेकिन प्रदूषण नहीं. प्रदूषण के नाम पर हर कोई वाहनों में प्रयुक्त होने वाले ईधन को ही सबसे बड़ा गुनाहगार मान रहा है लेकिन असली गुनहगार धूल है. जाड़ों में फॉग और धूल-धुयें के कण मिल कर स्मॉग बना देते हैं, जो कमज़ोर रेस्पिरेटरी सिस्टम वालों के लिये परेशानी का सबब बन जाते हैं. दिल्ली वालों ने दिल्ली के प्रदूषण के लिये हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने को मुख्य कारण माना. निसंदेह इसने स्मॉग को बढाया है, लेकिन केवल कोहरा और धुआँ, धूल के महीन कणों के बिना बहुत घातक नहीं हो सकता. धूल के वो कण मुझे ज़्यादा खतरनाक लगते हैं, जो अत्यंत महीन होते हैं. ड्राई डस्टिंग के बाद भी मेरी कार पर चिपके धूल के महीन कणों के कारण मेरी कार का असली रंग, वेट वाश के बाद ही दिखायी देता है. हवा में तैरते धूल के ये अदृश्य कण मेरी चिन्ता का मुख्य कारण हैं. अब चूँकि मेरी अवधारणा में विज्ञान या रसायन शास्त्र के शब्द, जैसे कार्बन मोनो-ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन आदि-इत्यादि, नहीं हैं, इसलिये किसी भी अंग्रेजी में साइंस पढ़े विशषज्ञों को मेरी बात अनर्गल प्रलाप लग सकती है. इसमें मै अपना नहीं उनकी शिक्षा का दोष मानता हूँ, जिसने उनकी सोचने-समझने की क्षमता को इस हद तक प्रभावित कर रखा है कि वो उसी को सच मानते हैं जो अंग्रेजी में लिखी हो. धूल के प्रति ये विचार मेरे तब बने थे जब सन 1990 में मैंने दिल्ली में नौकरी शुरू की थी. तब भी मुझे सड़कों पर फैली हुयी रेतीली धूल दिखती थी, जो घास रहित फुटपाथ पर पसरी रहती थी, और वाहनों के आने जाने से विस्थापित हो जाती थी. उसके विस्थापन का एक और कारण था, सुबह-सुबह मोहल्लों में झाड़ू से सफ़ाई. झाड़ू पोलीथिन और अन्य कचरे को भले साफ़ करती हो, लेकिन इसी के माध्यम से इधर की धूल उधर और उधर की धूल इधर आ जाती थी. और यही धूल खिड़कियों और दरवाज़ों से घर के अन्दर आ जाती थी. 

समस्यायें हैं, तो उनके समाधान के लिये सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थायें हैं. सरकारी संस्थायें तो नौकरी बन जाती हैं. इसलिये लोग उतना ही काम करते हैं, जितने में काम चलता रहे. अपना भी और समस्या का भी. समस्या है तो हम हैं. समस्या नहीं तो हम नहीं. ज्ञानी विद्वानों को भी मालूम है कि सरकारी संस्थानों के पास संसाधनों का नितान्त अभाव रहता है और वे अपने लिये संसाधन सृजन का प्रयास भी नहीं करते. मूलतः इनका प्रयास जो भी वित्तीय प्रावधान किया गया है, उसके निस्तारण की ओर अधिक रहता है. इनके लिये बजट कन्ज़म्प्शन की समस्या सर्वोपरि है. इसीलिये हर विषय के एक्सपर्ट लोगों ने समस्याओं के समाधान के लिये एक ऐसी नॉन-प्रॉफिटेबल, चैरिटेबल, नॉन-गवर्नमेंटल व्यवस्था बनायी है, जिन्हें ट्रस्ट या सोसायटी के माध्यम से संचालित किया जाता है. इनका काम है विभिन्न मुद्दों को राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाना और उठाये रखना, क्योंकि समस्या का समाधान किसी और को करना है. इस पुनीत कार्य के लिये ये मैगज़ीन निकालेंगे, जर्नल छापेंगे और गोष्ठियाँ करेंगे. पिछले तीस सालों का मेरा तजुर्बा बताता है कि समस्या चाहे कितनी भी बड़ी हो, उस पर यदि एक सेमिनार या सिम्पोजियम हो गया तो समस्या एक-दो दशक के लिये ख़त्म हो जाती है. अगली बार उसी थीम पर दुबारा सेमीनार, प्रायः नहीं होता, और होता भी है तो दस-बीस साल बाद. ये बात अलग है कि सेमिनार की थीम चाहे कुछ भी हो, वक्ताओं और प्रतिभागियों की थीम नहीं बदलती. वो पुराने कन्टेन्ट, नये पावर पॉइंट प्रेजेंटेशंस में ले कर आ जाते हैं. दो-तीन दिन चलने वाले समागम में ऐसी गहमा-गहमी होती है मानों कुम्भ मेले में बिछड़े बन्धु-बांधव का पुनर्मिलन हो रहा हो. 

देश-दुनिया में बढ़ते प्रदूषण से निपटने के लिये ऐसी ही एक संस्था 'सोल्यूशन फॉर पॉल्यूशन' का आविर्भाव कराया गया. जाने-माने गण्यमान नीति नियन्ताओं, चिन्तकों और सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट्स को घेर-घार कर मेंबर बनाया गया. सोसायटी के मेम्बर बनना भी एक फ़क्र की बात है. बहुत से लोग इसे अपने विज़िटिंग कार्ड और लेटर हेड पर भी छपवा लेते हैं. स्पेशलिस्ट्स को स्पेशलिस्ट तभी माना जा सकता है जब उसने समस्या के समाधान की दिशा में कुछ काम किया हो. काम करके नाम कमाने में मुद्दत लग जाती है, कभी-कभी तो जीवन कम पड़ जाता है. और काम करने का एक खामियाजा ये भी है कि जब तक दूसरे आपके काम की सराहना न करें, आपके सारे प्रयास व्यर्थ हैं. देश और समाज जो आगे गया है उसमें अनेकानेक लोगों का योगदान है. लेकिन नाम उन्हीं का दर्ज हुआ, जिन्होंने ख़ुद अपने नाम से लिखा या दूसरों से अपने बारे में लिखवाया. अब हमारे गुरु, बाणभट्ट, को ही ले लीजिये. यदि उन्होंने अपने नाम से न लिखा होता तो सातवीं शताब्दी में भारत की धरा पर जन्म लेने वाले इस महान लेखक के बारे में किसे पता होता. तो अमर होने का सबसे आसन फार्मूला है, आप जीते जी इतना लिख (छाप) जाइये कि धरतीवासी आपको भूल न पायें. इसी महान उद्देश्य को लक्षित करके प्रदूषण को समर्पित सोसायटी एस-एफ़-पी एक मैगजीन और एक जर्नल भी निकालती है. उसी में छाप-छाप के अनेकानेक लोग रातों रात स्पेशलिस्ट बन गये. अब दुनिया में कहीं भी सेमिनार-सिम्पोजिया-कॉन्फ्रेंस हो तो इनके बिना सब सूना-सूना सा लगता है. इनके प्रेजेंटेशंस विज्ञान में गूढ़ शब्दों का समावेश इस कदर होता है कि सुनने वाले को इन्फेरियोरिटी काम्प्लेक्स हो जाये. उसे लगने लगता है कि उसे साइंस का सा भी नहीं आता. ये सिर्फ एयर पाल्यूशन के इतने कारण और प्रकार बता दें कि आदमी गिनते-गिनते थक जाये. लेकिन उसमें धूल जैसी नामाकूल चीज़ शामिल हो तो लानत है विज्ञान और वैज्ञानिक दोनों पर. विज्ञान ने ब्रह्माण्ड की जटिलताओं को सहज रूप से जिज्ञासुओं को समझाने का प्रयास किया, किन्तु वैज्ञानिकों ने स्वयं को सिद्ध करने के उदेश्य से सहज और सामान्य ज्ञान को भी जटिल अवधारणा बना डाला. और बात यदि अंग्रेजी में कही गयी हो तो आधा हिन्दी मीडियम में पढ़ा वैज्ञानिक भी बिना बात ताली बजा दे. 

फाइव स्टार होटल या इन्टरनैशनल टूरिस्ट डेस्टिनेशंस पर कॉन्फ्रेंस रखने का उद्देश्य ये होता है कि ये दिखाया जा सके कि सोसायटी भूखे-नंगों की नहीं है. सब पैसे का खेला है. 'विकास और शहरों में बढ़ता प्रदूषण' थीम पर कॉन्फ्रेंस भारत के साफ़-सुथरे शहर विजाग के पाँच सितारा होटल में रखने का निर्णय लिया गया. तीन दिन की गहमा-गहमी और वक्ताओं के ओजस्वी व्याख्यानों से देश, दिल और दिमाग़ का सारा प्रदूषण धुआँ-धुआँ हो गया. प्लेनरी सेशन आते-आते प्रतिभागियों की संख्या बस अवार्ड लेने वालों और कुछ ताली बजाने वालों तक सीमित रह गयी. कॉन्फ्रेंस की भयंकर सफलता पर सभी ने आयोजकों की और भाग लेने के लिये एक-दूसरे की सराहना की. खाने=पीने की व्यवस्था अद्भुत थी. अधिकांश आयोजक बैग की क्वालिटी में चिरकुटई कर जाते हैं. इस बार ऐसा नहीं हुआ था. अमेरिकन टूरिस्टर का झोला बच्चों के काम आयेगा. ये सोच कर. सभी ने भूरी-भूरी प्रशंसा की.

शिद्दत से कॉन्फ्रेंस की प्रोसीडिंग्स बनीं. हर तरह के पाल्यूशन को मात देने के सभी विचार, जिसमें धूल को मुद्दा नहीं बनाया गया था, सूचीबद्ध किये गये. ये बात अलग है कि वो प्रोसीडिंग्स डेढ़ साल बाद सोसायटी के ऑफ़िस में आज भी पड़े-पड़े धूल खा रही है. 

धूल के नाम लेते ही मेरे गले में खिच-खिच शुरू हो जाती है.

-वाणभट्ट 

प्रदूषण

पूरे शहर की पत्तियों का रंग बदल सा गया है. छोटे-बड़े सभी पेड़ों का यही हाल है. हरी-हरी पत्तियों पर धूल की परत देखते-देखते, अब ये हमारी आदत में...