गुरुवार, 26 सितंबर 2013

सफलता की गाथा  

आजकल मीडिया में समाचार को सेंसेशनल तरीके से पेश करने का चलन ना-काबिल-ए-बर्दाश्त की हद तक पहुँच गया है। पर जैसी की एक अंग्रेजी उक्ति है 'बेगर्स आर नॉट चूज़र्स'। न्यूज़ और टी वी देखना हमारी विशुद्ध पर्सनल बीमारी या मज़बूरी, जो भी कह लें, है। किसी डॉक्टर ने तो कहा नहीं है कि देश-दुनिया का हाल अगर आप नहीं जानेंगे तो फलां रोग लग जायेगा। ना ही किसी वैद्य ने बताया कि चैनल सर्फ नहीं करोगे तो वायु-पित्त-कफ में से एक या तीनों टाइप के विकार होने की सम्भावना है। ये वन वे ट्रेफिक है। तो भाई चैनल जो भी दिखाए, देखना ही पड़ता है। चैनेल्स की प्रतिस्पर्धात्मक मजबूरियां इतनी ज्यादा हैं कि हर चैनेल अपने समाचार को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में जुटा हुआ है। और जो लोग सास-बहु, घर-उजाड़, हंसाते-भूत, सच्ची-कथाएँ टाइप के सोप ऑपेराओं का आनंद लेने में असक्षम हैं उनके लिए तो न्यूज़ चैनेल की सर्फिंग के अलावा कोई काम बचता ही नहीं। इन चैनलों पर भी न्यूज़ कम और इश्तहार ज्यादा। पर इसी को तो मज़बूरी कहा जाता है। जैसे उडि जहाज को पंछी पुनि जहाज पर आवै। टी वी के सामने बैठ कर मै सलमा सुल्तान के ज़माने को याद करते हुए दूर-दर्शन न्यूज़ और आजकल के सनसनी खेज़ समाचारों का तुलनात्मक विश्लेषण कर ही था कि एक चैनेल पर सनसनी टाइप के पत्रकार ने न्यूज़ फ्लैश की "प्याज़ की जमाखोरी से किसान ने लाखों कमाये "।

प्याज़ के बढ़ते दामों से तो पूरा देश चिंतित है। जनता परेशान तो सरकारें भी परेशान। पहले भी ऐसा होता रहा है। जब-जब प्याज़ के दाम बढ़े सरकारों की नींदें हराम हो गयीं। ये तो एक ऐसी कमोडिटी बन चुका है जो सरकार बना भी सकता है और गिरा भी। प्याज़ की राखी बन रही है, संता -बंता के चुटकुले बन रहे हैं, दहेज़ और गिफ्ट में भी प्याज़ का ज़िक्र।सोशल साइट्स पर भी ये मुद्दा छाया हुआ है। प्याज़ और प्याज़ के दाम के लिए इतनी चिल्ल-पों को देख कर लगता है जैसे ये कोई जीवन- दायनी आधारभूत खाद्य सामग्री हो। अगर ये न हो तो आदमी भूखा मर सकता है। हिंदुस्तान के कई धर्मों-सम्प्रदायों में प्याज़-लहसुन का प्रयोग निषिद्ध है। इसे तामसी प्रवृत्ति का माना गया है। पर मनुष्य ही क्या जो प्रवृत्तियों का दास न हो। नहीं तो महात्मा नहीं बन जायेगा वो। इनके खाने वाले इनके गुण गिनाते नहीं थकेंगे। पर यही बात काजू-बादाम-अखरोट पर भी लागू होती है। बहुत फायदे हैं इनके। पर हम अपनी-अपनी औकात और जेब अनुसार इन शुष्क फलों का आनंद लेते हैं या नहीं लेते हैं। लेकिन इनके बिना कोई भूखा नहीं रहता। कोई हाहाकार भी नहीं मचता। फ्री में मिल जाये तो चबैने सा चबा लें और खरीद के खाना हो तो एक-एक काजू का लुफ्त उठाएं। ये मामला पूरी तरह आर्थिक है जिसके पास पैसा हो उसकी तो रोटी भी चुपड़ी होती है। जिसके पास नहीं है वो दाल के पानी में रोटी भिगो के खाए या नमक के साथ, ये उसका अपना ऑप्शन है। तो निवेदन ये है की भाई हैसियत नहीं है तो प्याज़ क्यों खानी। प्याज़ के बिना क्या नहीं रहा जा सकता। स्वाद की बात है तो जब प्याज़ सस्ता हो जाये तब साल भर की सारी तमन्ना निकाल लीजिये।पर आजकल ऐसी आग लगी है गोया प्याज़, प्याज़ न हो कर पानी हो गया हो। जिसके बिना सारा जग सूना-सूना लग रहा हो। रहीम दास जी आज होते तो बहुत संभव है कि लिख देते -

रहिमन प्याज़ राखिये बिन प्याज़ सब सून, 
फोटो चेपिये फेसबुक पर, खाते दोनों जून।  
वह-वाह, वह-वाह (अपनी दाद खुद ही देनी पड़ती है आजकल। लोगों के पास व्यस्त जीवन में ब्लॉग पढ़ने और समझने का समय ही कहाँ होता।)

चूँकि ये सिर्फ और सिर्फ स्वाद का मामला है तो बहुत संभव है कि ये हाहाकार समृद्ध लोगों ने ही मचा रक्खी हो। क्योंकि कि आम-आदमी तो रुखी-सूखी खाय के साफ़ पानी को भी तरस रहा है। ठन्डे की तो बात ही क्या करनी, उसका मतलब तो कोका-कोला होता है। लहसुन-प्याज़ के बारे में वो हो सोच सकता है जिसने दो जून के आटे-दाल-चावल-तेल-केरासिन का जुगाड़ कर लिया हो। जमाखोरी भी तो अमीरों की ही देन है। सीधा डिमांड-सप्लाई का नियम है। डिमांड बढ़ाने के लिए सप्लाई कम कर दो। फिर मुंह माँगा दाम वसूलो। ये बात सिर्फ प्याज़ पर नहीं भारत में हर चीज़ पर लागू हो सकती है और होती रही है। बचपन में मुझे याद है जब जाड़ा आता था तो बोरोलीन या तो मिलती नहीं थी या मिलती थी तो प्रिंट मूल्य से दो रुपये ज्यादा में। अमीरी ऐसे ही तो आती है। बिजनेस और राजनीति में एथिक्स का सर्वथा अभाव रहा है। एक तरफ इनका गठबंधन किल्लत बनाता है और दूसरी तरफ जनता से ज्यादा पैसा वसूल लिया जाता है। चाहे वो चीनी रही हो या गैस, दाल रही हो या गेहूं, आलू रहा हो या प्याज़। इस मामले में हमारे व्यापारी बहुत ही स्मार्ट रहे हैं और सारा सरकारी अमला तो मात्र इन्हें सपोर्ट करने के लिए ही बना है। जमाखोरी इनके सहयोग के बिना नामुमकिन है। बिजनेस और सत्ता दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।  

यदि प्याज़ कोई मूलभूत सामग्रियों (एस्सेन्शिअल कमॉडीटी) में शुमार हो तो ये हाय-तौबा समझ आती है। प्याज के बिन कौन भूखा मरा जा रहा है। हमारे यहाँ जनसँख्या विस्फोट ने एक वृहद् रूप ले लिया है। सबको सिर्फ और सिर्फ अपनी पड़ी है, देश का होना न होना गौण हो गया है। इसलिए हम हर उस काम को करने को तत्पर रहते हैं जिससे हमें थोडा भी फायदा होने वाला हो। लाइन में लग कर मूवी का टिकट लेना भी हमें गवारा नहीं। सरकार द्वारा प्रदत्त सब्सिडाइज्ड गैस से अपनी कार चलाना हमारे स्मार्ट होने की निशानी है। पैदा होने से लेकर मरने तक हमें कितनी ही सरकारी सुविधाओं के लिए उन लोगों को घूस देना पड़ता है जिनकी नियुक्ति ही जनता को सेवा देने के लिए हुयी है। और वो भी भीख नहीं, अधिकार की तरह। यहाँ तो बिना घूस के न जन्म मिलता है न मृत्यु। राजा का कर्तव्य अगर सेवा करना हो, और वो ये मानता भी हो, तो शायद उससे बड़ा नौकर खोजना मुश्किल है। पर सरकारी अमले तो बनाये ही इसलिए गए हैं कि वो जनता जनार्दन पर राज कर सकें। अगर हम सब, पूरा देश, घूस देने से मना कर दें तो कितने ही विभाग हमारे घर आयेंगे कहेंगे भैया सुविधाएं ले लो। लाइसेंस बनवालो, टैक्स दे दो, रजिस्ट्री करवा लो, मकान खरीद लो नहीं तो हमारा टारगेट नहीं मीट होगा। पर अभी तो सबको अपनी-अपनी पड़ी है। तो फिर किसी और को दोष क्यों देना। जिसे मौका मिलेगा हमारा खून चूसेगा। अरे भाई जिस चीज़ की जमाखोरी शुरू हो, जिस चीज़ का दाम अनियंत्रित-असामान्य रूप बढ़ना शुरू हो जाये उसका परित्याग शुरू कर दो। जमाखोर खुद ही घबरा जायेगा। लेकिन हम तो स्टेटस के चक्कर में पड़े हैं। अगर अभी प्याज़ नहीं खाया तो लोग क्या कहेंगे। मंहगाई के दौर में भी अगर कुछ दिखावा न कर पाए तो जनाब लानत है हमारी रईसी को।

बात की बात में विषयांतर हो गया। बात थी किसान के द्वारा प्याज़ जमाखोरी से लाखों कमाए जाने की। रिपोर्टर ने जिस तरह बताया उससे लगा इस कानून के पालन करने वालों के महान देश में किसान ने कोई भयंकर अपराध कर दिया हो। जिस देश में आदर्श  बच्चों के लिए हैं और उसूल दूसरों को प्रवचन देने के लिए, वहां किसान पर ऐसा आरोप सुन कर मै स्तंभित रह गया। मुझे ध्यान आया की एक नामी ब्रेड कंपनी ने अपनी ब्रेड को लोकप्रिय बनाने के लिए मैदे में स्किम्ड मिल्क पाउडर की मिक्सिंग करवा दी। ब्रेड इतनी स्वदिष्ट थी कि मक्खन लगाये बिना आप खा सकते थे। शीघ्र की बाकि छोटी कम्पनियाँ बंद हो गयीं। एक बहुराष्ट्रीय कोल्ड ड्रिंक कंपनी ने अपना मार्केट बनाने के लिए दूसरी देसी कंपनी की खाली बोतलें ही खरीद डालीं और उन्हें तुडवा डाला। १२ रुपये किलो का गेहूं जब आटा बन कर २५ रुपये में बिकता है तो कोई हाय-तौबा नहीं मचती। जबकि अधिकांश मुनाफा तो बिचौलिए और प्रसंस्करणकर्ता ही ले जाते हैं। ज़मीन-बीज-खाद-पानी-मेहनत सब किसान की और मुनाफा बिजनेसमैन का। उत्पादन से पहले बीज, खाद, कीटनाशक सब के सब बिलियन डॉलर इंडस्ट्री बन गये हैं। और उत्पादन के बाद फ़ूड प्रोसेस्सिंग इंडस्ट्री खड़ी हो गयी है। पर लकवे-पाले-बीमारी का जोखिम किसान के सर पर। तिस पर बेचने के लिए मंडियों के चक्कर। कोई किसान को ही बिजनेस क्यों नहीं सिखाता। उत्पादन की पूरी लागत, ज़मीन का किराया, सभी फिक्स्ड और वैरियेबल कॉस्ट, पूरे परिवार की दिन-रात की मेहनत का मोल जोड़ कर किसान अपनी उपज की कीमत तय कर सकता है। जैसा कार, साबुन, तेल, कंघी, कपडा, आटा, कंप्यूटर, मोबाईल, सीमेंट, चॉकलेट, नूडल इत्यादि-इत्यादि कम्पनियाँ करतीं हैं। जिस आदमी को गप्प मारने के लिए एक पैसे प्रति सेकेण्ड की टॉक वैल्यू सस्ती लगती है, उसी आदमी को एक रोटी का दस रुपये देना खलता है। पूरा देश आजकल फ़ूड सिक्योरिटी की बात कर रहा है। किसके भरोसे? किसान के भरोसे देश को खाद्य सुरक्षा का भरोसा दिलाया जा रहा है। पर किसान सुरक्षा की कोई बात नहीं कर रहा है। इस विषय पर हम संवेदनहीनता की हद तक लापरवाह हो गए हैं। किसान को भी उन सभी तकनीकी सुख-सुविधाओं का लाभ लेने का हक है जिनका लाभ शहरी भाई उठाने की आदी हो गए हैं। पर इनके लिए चाहिए पैसा। जो किसान के पास अक्सर नहीं होता। वहीँ खाद्य सामग्री के भण्डारण और प्रसंस्करण से जुड़े उद्योग फल-फूल रहे हैं। भण्डारण और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का मूल उद्देश्य ही है कृषि उपज का मूल्य सम्वर्धन। कृषि उत्पादन से उत्पाद के उपभोग तक की सारी श्रंखला में सबसे फायदे का सौदा भण्डारण और प्रसंस्करण ही है। जैसा कि हम सुनते आये हैं कि अंग्रेज कच्चा माल भारत से ले जाकर उसे संवर्धित कर पूरी दुनिया में व्यापार किया करते थे। आज भी तो यही हो रहा है। अगर भारत गाँवों में बसता है तो अंग्रेजों का काम हमारे अपने भाई कर रहे हैं। कम मूल्य का कच्चा माल गाँवों से लेकर उसे मनमाने मुनाफे के साथ वापस जनता को बेचना। जब ये काम उद्योगपति करें तो ये व्यापार और जब कभी किसान इस क्षेत्र में हाथ आजमाए तो जमाखोर। ये तो वही बात हुई कि आपका प्यार प्यार और हमारा प्यार चक्कर।

आजकल हर जगह सक्सेस स्टोरी का ज़माना है। खास तौर पर कृषि के क्षेत्र में। रोज नयी-नयी किसानों के लिए ऐसी लाभप्रद तकनीकें आ रही हैं जिनसे कृषि का मुनाफा बढाया जा रहा है। समर्थन मूल्य से किसानों को जो लाभ हो रहा है वो अभूतपूर्व है। सच भी है। शायद पहले कृषि इतनी विकसित नहीं थी। किसानों का मुनाफा बढ़ा ज़रूर है पर उनके शहरी काउंटर पार्ट की तुलना में बहुत कम। पर सक्सेस स्टोरीज़ की संख्या को देखते हुए ऐसा लगता है जैसे सारा पैसा खेती में ही फटा पड़ रहा है। रोज-रोज कृषि क्षेत्र के लोग नयी-नयी सफलता की गाथा निकाले जा रहे हैं कि उनकी उन्नत तकनीक किसानों के लिए कितनी लाभदायी है। एक भाई साहब ने अख़बार में छपवाया की तरबूजे की खेती से किसान ने १६००० रुपये पैदा किये। फोटो में भरी गर्मी में सूटधारी इन अफसर साहबान को सिर्फ अंगौछा लपेटे किसान एक तरबूजा दे रहा है। एक भाई ने बताया की पुदीने की खेती अगर किसान करे तो १.५ लाख तक प्रति हेक्टेयर उत्पन्न कर सकता है बशर्ते की वो पुदीने का तेल निकल के बेचे तब। एक भाई मूंग की खेती से दो महीने में ६०००० रुपये पैदा कर लेने का दावा करते हैं। वर्तमान उत्पादन, उत्पादकता और न्यूनतम समर्थन मूल्य को देखते हुए ये गणना कुछ ज्यादा प्रतीत होती है। अगर ये सफलता की कहानी है तो शहर के इंटर फेल बाबुओं की तनख्वाहें भी किसी सफलता से कम नहीं हैं। ये काम न करने की तो तनख्वाह लेते हैं और करने की घूस। किसी भी सूरत में इनकी मासिक आमदनी किसान की वार्षिक मेहनतकश कमाई से ज्यादा है। किसानों के उत्थान के लिए ये बंधुगण जितना पैसा अपनी देश-विदेश की यात्राओं में खर्च करते हैं, ये भी एक सक्सेस स्टोरी बन सकती है। सरकारी फण्ड को बेरहमी से सिर्फ अपने प्रमोशन के लिए कन्जूम करने में इन योजनाकर्ताओं का सानी खोजना कठिन है। सरकार ने जितने भी मदों में किसानों के लिए पैसे भेजे हैं, सब के सब एक सक्सेस स्टोरी बन गए हैं। नहीं तो ग्रांट भी रुकेगी और पदोन्नति भी। आफ्टर आल सबको अपनी-अपनी पड़ी है। 

आज का युग अर्थ युग है। पैसा ही धर्म है और पैसा ही रिश्ते और समाज। कोई ये नहीं पूछ रहा की पैसा कहाँ से आ रहा है और कैसे आ रहा है। चाहो तो गुटका बेच कर करोड़ों का साम्राज्य खड़ा कर लो या अफीम बेच कर। घूस से कमाओ या ज़मीर बेच कर। पैसे की अपनी भाषा है।ऐसे में किसान से देश के लिए चैरिटी की उम्मीद का कोई मतलब नहीं है। कृषि क्षेत्र में सक्सेस स्टोरीज़ का जिस तरह से प्रचलन बढ़ा है उसे देख के लगता है विज्ञानं के अन्य क्षेत्र ढक्कन हो गए हैं। सबसे ज्यादा मुनाफा कृषि में ही हो रहा है। ये बात अलग है कि हम किसी भी किसान आज उद्योगपति के रूप में नहीं जानते। ऐसे में ये खबर कि प्याज़ की जमाखोरी से किसान ने लाखों कमाए ये मेरे विचार से एक वास्तविक सक्सेस स्टोरी है। गौर कीजिये लाखों। देश के सबसे बड़े उद्योग कृषि,  जो सौ करोड़ को खाना दे सकता है और रोज़गार भी, को हमने अपाहिज सा बना रक्खा है। सरकार के सहयोग से रेंगने वाला उद्यम। जबकि उसी से सम्बद्ध बीज-खाद-केमिकल्स-प्रसंस्करण उद्योग बन गए। यदि भारत का किसान फसल उत्पादन के साथ-साथ भण्डारण और प्रसंस्करण का कार्य करने लगेगा, कृषि भी एक संपूर्ण उद्योग का रूप ले लेगी। अभी कृषक के उत्पादन का मूल्य सरकार नियत करती है। जबकि अन्य किसी उद्योग में ऐसा नियंत्रण नहीं है। फिक्स्ड, वैरिएबल और विज्ञापन को जोड़ कर मुनाफा तय किया जाता है और कम्पनियाँ ही अपने उत्पाद का मूल्य निर्धारण करतीं हैं। यहाँ तक की तेंदुलकर और कैटरिना कैफ का पैसा भी ग्राहकों से वसूला जाता है। जिस दिन भारतीय कृषक के हाथ में भण्डारण और प्रसंस्करण की जादुई छड़ी आ जाएगी उस दिन उसकी ही नहीं पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दशा और देश की दिशा दोनों बदल जाएगी। खाद्य सुरक्षा को कृषक सुरक्षा से जोड़ कर देखा जाना चाहिए। खेती की सफलता गाथाएं जब अम्बानीज़, टाटाज़, बिरलाज़ के साथ बिजनेस टुडे, फ़ोर्ब्स इंडिया, इकनोमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैण्डर्ड में स्थान पाएंगी तभी कृषि को एक उद्योग का दर्ज़ा मिल पायेगा। संपन्न किसान ही समृद्ध भारत नीवँ है। 

हे ब्रम्हा! हे विष्णु! हे महेश! वाणभट्ट आप सबका आह्वाहन करता है। ये मनोकामना पूरी कीजिये। सवा रुपये का प्रसाद…  

तीनो देव एक साथ बोल उठे "वत्स यहाँ भी…घूस…सुधर जाओ"  

- वाणभट्ट  

बुधवार, 11 सितंबर 2013

रेंड़ के पेंड़

सावन के अंधे को हर तरफ हरा ही हरा दिखाई देता है। ये कहावत आजकल चरितार्थ होती दिख रही है। सावन ख़त्म हुए कई दिन हो गए हैं पर हरियाली का सर्वत्र वास है। घर के सामने बने गंगा बैराज के मैदान में पूरा का पूरा एक नेचुरल रेन फ़ॉरेस्ट ही तैयार हो गया है। वैसे तो यहाँ से मोहल्ले में पीने के पानी की आपूर्ति की जाती है। पर जब से वर्ल्ड बैंक ने इस परियोजना से अपना हाथ खींच लिया है, तब से जल विभाग के लिए इस प्रांगण की रख-रखाव कर पाना भी संभव नहीं रह गया है। भरी आबादी के बीचोंबीच जंगल का होना, सोशल फोरेस्ट्री का एक नायब नमूना है। निगम के महानुभावों ने शायद इस सन्दर्भ में सोचा नहीं होगा, नहीं तो एक सक्सेस स्टोरी तो छाप ही लेते। वो बेचारे तो बस बजट को हिल्ले लगाने की फिराक में लगे रहते हैं। उनकी इस प्रक्रिया में किसी का भला हो जाये तो हो जाये। 

छापाखाना के निर्वचनीय सुख का आनंद वो ही अनुभव कर सकता है जो करता कम है और छापता ज्यादा। दरअसल इस मामले में निगम का नजरिया वैज्ञानिक नहीं है। और उनके यहाँ प्रमोशन में छापने का कोई नम्बर भी नहीं है। थोडा प्रचार-प्रसार कर दें तो ये एक आइडियल मॉडल बन सकता है। हर मोहल्ले में एक मैदान खाली छोड़ दीजिये उसमें सारे पेड़-पौधे, खर-पतवार जो भी निकल आये उगने दीजिये। दो-चार साल में एक फारेस्ट तैयार हो जायेगा। देश में फ़ॉरेस्ट का रकबा भी बढ़ जायेगा , वो भी बिना कुछ किये। हर्र भी नहीं, फिटकरी भी नहीं, और रंग चोखा। शहरवासियों को शुद्ध हवा के लिए ज्यादा मशक्कत भी नहीं करनी पड़ेगी। खुले परिवेश में दिशा-मैदान जाने और सॉलिड वेस्ट के निस्तारण में जो सुविधा होगी वो एडिशनल बेनिफिट है।  

हाँ तो आजकल हर तरफ हरियाली ही हरियाली है। ग्रह-दशा अनुरूप इधर लखनऊ के चक्कर बढ़ गए हैं। कानपुर सेंट्रल से लेकर चारबाग़ तक हर जगह पूरी प्रकृति हरियाली की चादर ओढ़े हुए है। ऐसी ताबड़तोड़ हरियाली है जिस पर अब तक ध्यान देने का अवसर नहीं मिला था। ना-ना प्रकार की वनस्पतियों ने जैसे धरा का अधिग्रहण कर लिया हो। एक-एक चप्पे, एक-एक कोने पर प्रकृति की छटा रोम-रोम को मस्त कर देती है। भांति-भांति के खर-पतवार अपने पूरे शबाब पर हैं। सभी खर-पतवारों में सबसे खूबसूरत और आकर्षित करने वाला कोई पेंड़ है तो वो हैं रेंड़ के पेंड़। गर्व से उन्मत्त इसके लहलहाते-झूमते  बड़े-बड़े पत्ते बरबस आपको आकृष्ट कर लेंगे बशर्ते आप इनकी ओर नज़र डाल सकें। इन्हें देख कर जीवन की अदम्य इच्छाशक्ति परिलक्षित होती है। ये स्लम डॉग टाइप के पौधे हैं जिनके जीने-मरने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। पर ये इनकी जिजीविषा है कि बिना किसी पालन-पोषण के ये न सिर्फ पैदा होते हैं बल्कि फलते-फूलते भी हैं। इनके बीजों का डिसपर्शअन भी इतना सुव्यवस्थित है कि कानपुर से लखनऊ के बीच रेंड से वंचित स्थान खोजना कदाचित ही संभव हो।    

इस तरह की अनचाही हरियाली को विशेषज्ञों ने वीड्स यानि खर-पतवार की संज्ञा दे रक्खी है। मान ना मान मै तेरा मेहमान। एक तरफ पूरा विश्व अपनी और अपने पशुओं की खाद्य समस्या से जूझ रहा है। उपजाऊ ज़मीन का रकबा प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष घटता जा रहा है। और ये अवांछित वीड्स धरती पर ऐसे फैलते हैं जैसे कभी साहिर साहब ने फ़रमाया था :


चीन-ओ-अरब हमारा, हिन्दोस्तान हमारा 
रहने को घर नहीं है सारा जहाँ हमारा

इनका बस चले तो कोई भी फसल पनप ही न सके। कृषि का अधिकतम श्रम इन खर-पतवारों को नियंत्रित करने में लग जाता है। खाद और पानी मिल जाये तो ये मुख्य फसल के ऊपर हावी होने का कोई मौका नहीं छोड़ते। इनकी जिजीविषा और परजीवी प्रवृत्ति इतनी सशक्त है कि ये फसलों का पोषण सोख लेते हैं। खेतों में इनका नियंत्रण एक वृहद् समस्या बन गया है।  रक्तबीज की तरह ये फैलते हैं और भस्मासुर की तरह सब नष्ट करने को आतुर। एक तरफ जहाँ फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए अरबों-खरबों खर्च किये जा रहे हैं, वहां वीड्स का अनियंत्रित स्वतः विकास और प्रसार सारे फसल सुधार शोध को चुनौती देते हुए प्रतीत होते हैं। अधिक उत्पादन वाली उन्नत प्रजातियों पर कितने संसाधन खर्च कर दिए गए और ये राशि दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है। पर वीड्स का उत्पादन, उत्पादकता और क्षेत्रफल बिना किसी शोध के दिन पर दिन उन्नत होता चला जा रहा है। एक तरफ ज्ञानियों-विज्ञानियों का विश्वव्यापी समूह और दूसरी तरफ निपट अनपढ़, गंवार, जंगली और जाहिल वीड्स। संभवत: इसे ही कहते हैं सेल्फ इम्प्रूवमेंट या स्वतः सुधार। और सेल्फ इम्प्रूवमेंट सदैव बाहर से थोपे सुधार से ज्यादा प्रभावी और शक्तिशाली होता है। वीड्स इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। 

एक फसल सुधारक मित्र का ध्यान मैंने इस ओर आकृष्ट करना चाहा। यार तुम लोग इतने रिसोर्सेज वैरायटी डेवलपमेंट में लगा देते हो और ये वीड्स देखो दिन पर दिन अपने आप इम्प्रूव हुए जा रहे हैं, बिना संसाधन के। भाई साहब संजीदा हो गए। बोले सदैव से प्रकृति में अच्छे-बुरे की जंग चल रही है। हम उत्पादन और उत्पादकता बढ़ने में लगे हैं। संसाधन कम हैं और ये खर-पतवार मुख्य फसलों का पोषण ले लेते हैं। ये ना तो पशुओं के काम आते हैं ना आदमी के। अच्छाई और बुराई की होड़ में अक्सर बुराई आगे निकल जाती है। बुराई को अगर छूट दे दो तो वो भलाई पर हावी हो जाती है। खर-पतवार अनचाहे उग आते हैं जबकि फसल को रोपना पड़ता है, संरक्षित और संवर्धित करना पड़ता है। तब जा कर हम आदमी और पशुओं का भरण-पोषण कर पाते हैं। उनकी बात में दम था और दर्द भी। उनकी बातें वनस्पति जगत के लिए ही नहीं प्राणी जगत के लिए भी सत्य जान पड़ीं। वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक परिपेक्ष्य में ये व्यवस्था मानव जाति  के लिए तो शत-प्रतिशत सही लगी। हर युग में द्वैत रहा है। बुराई के बिना अच्छाई की कद्र भी तो नहीं है।    

पर मै ये लेख तो रेंड़ के पेंड़ के फेवर में लिख रहा हूँ। आदमी जब हरियाली के क्षेत्र को दिन पर दिन कम करता जा रहा है। जंगल कटते जा रहे हैं। ग्रीन कवर घटता जा रहा है। आदमी और जानवरों की संख्या पृथ्वी पर बढ़ती ही जा रही है। सबको अपनी-अपनी ही पड़ी है। तो प्रकृति बेचारी क्या करे। हरियाली भी ज़रूरी है पर्यावरण संरक्षण के लिए। आदमी हो या जानवर, सब प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में लगे हैं। ये प्रकृति का सेल्फ-डिफेन्स मैकेनिज्म है कि ऐसे पेड़-पौधे पैदा करो जिसे कोई छू भी न सके। कुछ तो हवा बदलेगी। कुछ तो वातावरण साफ़ होगा। 

गर्व से लहलहाते, हरे-भरे और खूबसूरत  रेंड़ के पेंड़ों के प्रति मेरे मन में अनायास एक आभार का भाव तैर गया। मन में एक भाव ये भी आया की काश गेंहूँ और धान भी वीड्स की तरह बिना संसाधन के सर्वत्र फ़ैल जाते, फूलते-फलते तो खाद्यान्न समस्या कम हो जाती, शायद आदमी की भूख भी।  


अब हवाएं ही करेंगी रौशनी का फैसला 
जिस दिये में जान होगी वो दिया रह जायेगा 
(मेरा नहीं है, बस यूँ ही चेप दिया) 



सोशल फॉरेस्ट्री का नायाब नमूना


रेंड़ के पेंड़

- वाणभट्ट  


सोमवार, 2 सितंबर 2013

सूखे फूल 

रोज सुबह शुक्ल जी के मिलने का स्थान और समय नियत है। केशव वाटिका में जहाँ 'फूल तोडना सख्त मना है' का बोर्ड लगा है वहीँ प्रातः शुक्ल जी पूर्ण तन्मयता के साथ फूल तोड़ते मिल जायेंगे। कहीं कोई और फूल तोड़ न ले जाये इसलिए उन के लिए अलसुबह बाकि पुष्प प्रेमियों के आने से पहले वाटिका पहुंचना नितांत आवश्यक है। जब तक मै  पहुँचता हूँ उनकी दोनों जेबें फुल हो चुकी होतीं हैं। वाटिका के चौकीदारों ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया पर सठियाने का भी कोई लाभ होता है तो वो ये है कि आप को कोई कुछ समझा नहीं सकता।  सफ़ेद बालों और उम्र का लिहाज़ अभी भी बुजुर्गों को हमारे देश में नियम-कानून से ऊपर रखता है। और फूल तोडना कौन सा जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है। और वाटिका के चौकीदार भी कौन से पुलिस वाले थे। और होते भी तो क्या कुछ ले-दे के मान न जाते।  पर अगर ले-दे के ही शुक्ल जी को फूल हासिल करने होते तो मोहल्ले में कई मालिनें ये काम कर रहीं हैं। सिर्फ ३०-४० रुपये में महीने भर फूलों की आपूर्ति।

शुक्ल जी सरीखे अन्य लोग भी देर-सबेर वाटिका पहुँच ही जाते और फूल तोड़ने की प्रक्रिया में यथाशक्ति अपना-अपना योगदान देने में कोई कोर-कसर ना  छोड़ते।  इस कारण वाटिका सिर्फ नाम की वाटिका रह गयी थी। खिले हुए फूलों को देखना तो केवल इन पुष्प तोड़कों  और उनकी जेबों के नसीब तक ही सीमित रह गया है। मैंने भी कई बार अपनी मित्रता का हवाला देते हुए शुक्ल जी से निवेदन किया कि प्रभु इतने सारे फूल भी इतनी खुशबु नहीं दे पाते जितनी एक अगरबत्ती दे देती है। पर उनका कहना था कि भगवान को बासी सुगंध कैसे अर्पित की जा सकती है और वो भी तब जब वाटिका में फूल सहज उपलब्ध हैं।

आजकल मिडिल क्लास तबके में एक बयार आई है।  सब अपने एम आई जी मकानों की एक इंच जगह भी खाली नहीं छोड़ते। पूरा का पूरा मकान पक्की फर्श से ढँक जाता है। कुछ तो पूरे फर्श के ऊपर पूरी छत भी तान देते हैं। पूरे घर में मार्बल की फ्लोरिंग करने के बाद गेट तक कलेजी लगाने का प्रचलन बढ़ गया है। कच्ची ज़मीन रखने से मार्बल के गन्दा होने की प्रोबेबिलिटी बढ़ जाती है। हाँ, इस प्रजाति के लोगों में कुछ पर्यावरण प्रेमी भी हैं। वो सड़क के फुटपाथ को घेर कर बगीचा टाइप की चीज़ बना लेते हैं। कुछ वृक्षारोपण कर अपने को प्रकृति और सौदर्य प्रेमी की संज्ञा देने से नहीं चूकते। सरकार के बस का तो फुटपाथ मेंटेन करना है नहीं लिहाज़ा इस काम को समाज सेवा का दर्ज़ा भी दिया जा सकता है। ये बात अलग है की सडकों का पानी नालियों तक न पहुँच पाए तो जलभराव की स्थिति बन जाती है। और तारकोल से बनी सड़कें पानी का रुकना बर्दाश्त नहीं कर पातीं इसलिए दस साल की जगह दो साल में ही जवाब दे देतीं हैं।

शुक्ल जी ने भी सरकारी जमीं पर अतिक्रमण कर एक लघु वाटिका बना ली थी। पर उन्हें शिकायत थी कि वो इतनी मेहनत से पौधे लगाते हैं, उनकी देख-भाल करते पर जब फूलों का मौसम आता तो ज़ालिम ज़माने वाले एक फूल भी उनके लिए नहीं छोड़ते। दुखी हो कर उन्होंने बिना फूलों वाले पेड़-पौधे लगा लिए और अब फूलों के लिए उनको केशव वाटिका पर निर्भर रहना पड़ता। जब आप किसी भी आदमी के गलत से गलत कृत्यों के जेनेसिस में जायें तो लगता है वो आदमी जो भी कर रहा है वह शत-प्रतिशत सही है। किसी की बहन की कोई नाक काट ले तो उसका रावन बन जाना संभव है। किसी के बाप को राज-पाठ सिर्फ इसलिए ना मिले की वो नेत्रहीन है तो उसे दुर्योधन होने का पूरा अधिकार है। चूँकि शुक्ल जी मेरे मित्र हैं और मै उनकी पुष्प-व्यथा से वाकिफ भी हूँ इसलिए उनके फूल तोड़ने को ले कर मै ज्यादा क्रिटिकल नहीं हूँ, यद्यपि मै फूलों को शाखाओं पर देखना ही अधिक पसंद करता हूँ।  

उस शाम शुक्ल जी अपनी स्कूटी पर एक भारी-भरकम पौलीथीन बैग लिए कहीं जा रहे थे जब मै  उनसे टकराया।  हेलमेट पहन रक्खी थी उन्होंने जिससे ये जाहिर था कि वो कहीं सुदूर क्षेत्र के भ्रमण के इरादे से निकले हैं। टोकना तो हिंदुस्तानी हितैषियों का परम कर्तव्य है सो मैंने पूछ ही लिए "बन्धु कहाँ प्रस्थान का विचार है"।  "आ जाओ वर्मा जी तुम्हें गंगा जी तक घुमा लायें" ऐसा कह कर उन्होंने स्कूटी रोक ली। मै तो सैर करने के इरादे से निकला ही था इसलिए इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। कुछ पलों में मै उनके पीछे वाली सीट पर विद्यमान था और लगभग एक घंटे की यात्रा कर के जाजमऊ पुल के ऊपर। रास्ते में शुक्ल जी ने बताया की घर में बहुत सूखे फूल इकट्ठे हो गए थे चूँकि भगवान को चढ़ाये फूल हैं इसलिए उन्हें इधर-उधर तो फेंक नहीं सकते। इसलिए यहाँ तक आना हुआ इसी बहाने गंगा मैया के दर्शन भी हो जायेंगे। एक पंथ दो काज। 

गंगा पुल पर शाम की सोंधी हवा के आनंद में मै खो सा गया था जब छपाक की आवाज़ हुई। लगा किसी ने बोरे में भर के लाश को फेंक दिया हो पानी में। मैंने चौंक के नीचे देखा तो शुक्ल जी के द्वारा लाया बैग पानी में डूबता-उतराता बहा जा रहा था। बगल में शुक्ल जी असीम श्रद्धा भाव से हाथ जोड़े गंगा मैया को प्रणाम कर रहे थे। 

लौटते समय रास्ते भर मेरा कुछ भी बोलने का मन नहीं हुआ। बहुत थकान लग रही थी। ऐसा लग रहा था मानो किसी सम्बन्धी की शव-यात्रा में कन्धा दे कर लौट रहा हूँ।   

वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम 
दगा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे   

- वाणभट्ट