शनिवार, 8 जून 2013

भैय्ये 

फ़्रांस की वो टीम न आती तो शायद राईस मिल जाने का सौभाग्य न मिलता। वो लोग हिन्दुस्तान से बासमती इम्पोर्ट करने के इरादे से आये थे। वहां एक स्पेसिफ़िक अरोमा का बासमती पसंद किया जाता है। उन्हें इम्पोर्ट कनसाइंटमेंट बहुत सी फ्रेग्रेंसेस मिला करतीं थीं। सो उन्होंने एक्सपोर्टर कंट्री में जा कर वहीँ की वैरियेबिलीटी का अनुमान लगाना उचित समझा।

बहरहाल मेरी ड्यूटी उन्हें बासमती उत्पादक क्षेत्र की राईस मिलों के दर्शन कराने की लग गयी। हम भारतीयों की खूबी है कि गोरी चमड़ी देख कर अपना ह्रदय खोल के रख देते हैं। अमूमन किसी भारतीय टीम को किसी मिल में ले जाना हो तो हमारे मिल मालिक कुछ घबरा जाते हैं। पता नहीं कौन टैक्स वाला निकल जाए या प्रदूषण वाला। आज कल तो खोजी पत्रकारिता से भी डर लगता है। कहीं धूल से अटे पड़े प्लांट में काम करते मजदूरों की फोटो ही न छाप दें। पैरों के नीचे कुचलते चावल को खुबसूरत थैलियों में पैक करते वीडियो न बना लें। थैलियों में पैक हो कर खाद्य पदार्थ का मूल्य और उपयोगिता बढ़ जाती है। 

फ़्रांस के नाम पर कई मिलों ने हमारे मिल विजिट के आग्रह को स्वीकार कर लिया। हम भी समय की पाबन्दी दिखाते हुए सुबह-सवेरे पूरे दल-बल को ले कर चल दिए। फ्रांसीसियों को हिदायत दे दी कि भैय्या फोटो-वोटो मत खींचना, हमारे बिरादर बुरा मान सकते हैं। संभ्रांत देश शायद बातों को आसानी से मान लेते हैं। वर्ना हमें तो वही करना भाता है जिसमें रिस्ट्रिक्शन हो। आज़ाद ख्याल देश है अपना। 

जब तक हम कोहली राईस मिल पहुंचे तब तक हम कई मिलें घूम चुके थे। कोहली साहब ने स्वल्पाहार की व्यवस्था भी कर रक्खी थी। फ़्रांसिसी तो बाहर खाने-पीने के नाम से ही घबरा जाते थे। हम आतिथ्य को अस्वीकार कर कोहली साहब को नाराज़ कर दें, ऐसा कोई इरादा भी नहीं था। खाते-पीते लोगों के शहर में खाना-पीना ही आतिथ्य का विशिष्ट लक्षण है। खासे डील-डौल वाले कोहली साहब खुद ही प्लांट दिखाने अपने एसी चेंबर से बाहर आ गए थे। 

ये मिल भी हमारे द्वारा विजिट की गयी बाकि मिलों जैसी ही थी। अन्दर वातावरण में तैरती धूल से हमारे फिरंगी मित्र अब तक अभ्यस्त हो चुके थे। उस गर्द-गुबार से भरे वातावरण में तत्परता से काम करते मजदूरों को देख अब उनमें कोई कौतुहल नहीं बचा था। पहले-पहल उन्हें चावल के ऊपर जूते रखने में थोड़ी परेशानी जरुर हुई पर पूरे प्लांट को देखने के लिए इस अनिवार्यता के आगे सब विवश थे। उनकी सारी हैरानी-परेशानी अब तक ख़त्म हो चुकी थी। तभी कुछ ऐसा हुआ जो वे लोग  पिछले प्लांटों में नहीं देख पाए थे।

एक बहुत ही कृशकाय आदमी ट्रक से एक कुंतल का बोरा पीठ पर रख कर सधे कदमों से उतर रहा था। एक पतला पटरा ट्रक को जमीन से जोड़े हुए था। गोदाम भी लगभग ट्रक से बीस मीटर की दूरी पर रहा होगा। फ्रांसीसियों का मुंह खुला का खुला रह गया।

कोहली साहब ने स्थिति को भांप लिया। अंग्रेजी में बोले ये यू पी के भईये गज़ब के होते हैं। देखने में बिलकुल हड्डी पर देह में इतनी ताकत होती है कि क्या बताएं। एक-एक, दो-दो कुंतल का माल इधर-उधर कर दें अपनी पीठ पर लाद के। पैसे के लिए ये यहाँ परदेश आते हैं और इतनी दिहाड़ी इन्हें अपने देश में नहीं मिलती जितनी यहाँ मिल जाती है। हम लोग देखने में भले ही कितने हट्टे-कट्टे दिखें पर मजदूरी करने के लिए ये भइये ही काम आते हैं। अब मैंने गौर किया की प्लांट के अधिकांश मजदूर बाहरी ही थे। भैये शब्द से मै दिल्ली से ही परिचित था। और ये भी मालूम था कि ये कोई आदरसूचक शब्द तो कतई नहीं लगता।

हिंदी में मैंने सिर्फ इतना कहा भाई इस मेहनत की कीमत को समझो। अपने और अपने परिवार की दो वक्त की रोटी के लिए ये इतना भारी बोझा उठा रहा है। क्या यही काम हमारे बन्दे कनाडा और अमेरिका जैसे विकसित देशों में नहीं कर रहे। वहां के लिए हम भी तो भैये ही हैं।

- वाणभट्ट