रविवार, 17 नवंबर 2013

महान लोगों का देश 

पैदा होने के कुछ ही वर्षों में, जब मै होश सम्हाल रहा था, तभी मुझे ये एहसास हो गया था कि मै किसी महान देश में अवतरित हो गया हूँ। घर के अंदर पुरखों की फ़ोटो घरेलू मंदिर में भगवान के ऊपर शोभायमान हुआ करतीं थीं। स्कूल पहुंचा तो स्कूल का नाम ही महापुरुष के नाम पर रक्खा हुआ था। प्रधानाचार्य के कमरे से ले कर क्लासरूम तक हर कमरे में महापुरुष विद्यमान थे। लाइब्रेरी की सारी दीवार महापुरुषों की फोटोज़ से भरी हुई थी। सबके दैदीप्यमान चेहरे छात्रों को आकृष्ट किये बिना न रहते। सडकों के नाम महापुरुषों पर और हर चौराहे पर किसी महापुरुष की मूर्ति।इस बात में कतई शक़ नहीं की भारत भूमि ने अनेकों महापुरुष पैदा किये हैं। जिनके बारे में पढ़ कर हम उन पर और खुद पर गर्व किये बिना नहीं रह सकते। ये बात अलग है कि उनके विचारों और कृत्यों को अपने जीवन में उतारना सदैव कठिन रहा है इसलिए हम सिर्फ फ़ोटो और मूर्ति लगा कर महान लोगों को श्रद्धांजलि दे लेते हैं। उनके ऋण से उऋण होने का शायद ये ही सबसे आसान तरीका है। 

घर के पास चौराहे पर एक महापुरुष की प्रतिमा स्थापित थी। एक बार गर्मी की छुट्टियों में पिता जी के साथ प्रातःकाल टहलने निकला तो पिता जी ने एक प्रश्न किया कि यदि ये मूर्ति जीवित हो जाये तो सबसे पहले क्या करेगी। हम  भला क्या बताते। उत्तर भी उन्होंने ही दिया सबसे पहले अपने सर से चिड़िया की बीट साफ़ करेगी। यानि मूर्तियों को स्थापित तो कर दिया पर उनका रख-रखाव भगवान भरोसे ही था अर्थात उन मूर्तियों को सफाई के लिए बरसात का इंतज़ार रहता। कुछ मूर्तियां जो रूलिंग पार्टी की हुआ करतीं, वो महापुरुष के जन्म और मरण दिवस पर अवश्य धुल जातीं पर सरकार बदल जाए तो उनका भी वही हश्र हुआ करता जो अन्य मूर्तियों का होता था। कुछ महान लोग सत्ता से परे थे। शिक्षा, साहित्य, कला या लोकल कार्यकर्त्ता अपनी मूर्तियों की दुर्गति अगर खुद देख लेते तो बहुत सम्भव है महान बनने से इंकार कर देते। कहते भाई जीवन भर तो हम देश-समाज सेवा के चक्कर में अभावों में जिये अब मरने के बाद तो हमें बक्श दो। 

कालांतर में हमें बड़े होना लिखा था सो बड़े हुए भी। लगभग पचास बसंत पूरे होने को हैं। इस अवधि में बहुत लोगों को महान बनते देखा और बहुत लोगों को महान बनाते देखा। प्रजातंत्र में प्रजा ये निर्णय लेती है कि कौन सरकार बनाये और सरकार ये निर्णय लेती है कि वो किसे-किसे महान घोषित करे। इस प्रकार अंततोगत्वा ये मान लिया जाता है कि प्रजा इन्हें महान मानती रही है सरकार तो बस माध्यम मात्र है। पता नहीं विदेशों में महानता आइडेंटिफाई करने के क्या मानक हैं। हाल ही में अमेरिका में संगीतकार श्री ए. आर. रहमान के नाम पर किसी सड़क का नामकरण हुआ है। बाहर देशों में गांधी, टैगोर, लता और रविशंकर जी को भी सम्मान मिला है। ये भारत की वैश्विक पहचान बन गए हैं। यहाँ तो एक ग्रुप किसी को आइडेंटिफाई करता है तो दूसरा ग्रुप भी अपना एक महापुरुष खोज लाता है। कहता है कि एक आपका तो एक हमारा भी। अगर पावरफुल ग्रुप ने दूसरे ग्रुप का कुछ कर्जा खा रक्खा है तो मामला सेटेल वर्ना दूसरे ग्रुप को अपने पावर में आने तक इंतज़ार करना पड़ सकता है। 

जो भी सत्ता में आया उसके सभी पुरखे महान हो गए। विश्व बंधुत्व का सन्देश देने वाला देश शुरूआत अपने परिवार से ही करता है। इस मामले में वो अंग्रेजी कहावत 'चैरिटी बिगिन्स ऐट होम' को अपना ब्रम्हवाक्य मान लेता है। ये तो गनीमत है कि भाई-चारे वाले इस देश और इस देश के प्रदेशों में कुछ गिने-चुने परिवारों का ही राज रहा है। इसलिए महान लोगों की संख्या भी सीमित रह गयी। भला हो जनता का जो उन्हीं लोगों को बार-बार चुनती रही वरना महानता की फेहरिश्त कहाँ रुकती कहना मुश्किल है। हर साल सत्ता पक्ष कुछ महान लोगों को चिन्हित करता है तुरंत प्रतिपक्ष वाले कुछ और नाम उछाल देते हैं। सीधा सवाल होता है कि अगर आप अपने वाले को महान समझते हैं तो हमारे वाले महानता में किससे कम हैं। अभी एक निर्विवाद रूप से महान व्यक्ति को देश ने सम्मान दिया। पर विवाद करने वालों का क्या वो तो इसी ताक में रहते हैं उन्होंने कहना शुरू कर दिया इनसे पहले इन्हें अवार्ड दिया जाना चाहिए था।   

जिन लोगों ने देश, प्रदेश, जनता के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में कुछ किया उनका महान हो जाना वाकई गौरव की बात है। पर जो लोग सिर्फ इसलिए महान हो गए कि उनके पोते या पर-पोते पावर में आ गए तो अफ़सोस होता है। परन्तु मै  इस व्यवस्था का विरोध नहीं करता। कल का क्या पता। हमारे भी पोते या पर-पोते या उनके बच्चे कभी पावर में आ जाएं तो मेरे नाम पर एक सड़क, एक मोहल्ला या एक शहर बन जाए और महान ब्लॉगर वाणभट्ट भी अमर हो जाए। पर मै अपनी वसीहत में लिख जाउंगा कि अगर किसी चौराहे पर मेरी मूर्ति लगवाना तो मूर्ति नॉन-स्टिक मटेरियल की होनी चाहिए ताकि चिड़िया की बीट न चिपके।  

- वाणभट्ट 

शनिवार, 9 नवंबर 2013

चिंता

चिंता, चिता के सामान है, ऐसा मै नहीं लोग कहते हैं। चिंता की बिंदी भी वहीँ जा के हटती है। चूँकि लोकतंत्र में संख्याबल का महत्त्व है इसलिए ये मानने  में कतई गुरेज़ नहीं है कि चिंता का दुष्प्रभाव अंततः चिता तक ले जा सकता है। वहाँ तक पहुंचने के अनेक कारक हो सकते हैं, उनमें चिंता को भी जोड़ लेना उचित होगा। चिंता को शब्दों में व्यक्त करना थोडा कठिन है पर इस धरती पर जिसने भी मानव योनि में जन्म लिया, उसका इस आपदा से बच पाना कतिपय असम्भव है। इसे आप व्यथित या व्याकुल करने वाले विचार के रूप में परिभाषित कर सकते हैं। जैसे हर चीज़ के आकर-प्रकार होते हैं चिंता भी कई आकर-प्रकार की हो सकती है। आकर के अनुसार चिंता को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है - छोटी चिंता और बड़ी चिंता। और प्रकार के हिसाब से ये व्यक्तिगत या सार्वजनिक या सार्वभौमिक हो सकती है। अब अगर हम आकर-प्रकार को क्लब करें तो निम्न प्रकार कि चिंताएं पायी जा सकतीं हैं -

          1 . छोटी व्यक्तिगत चिंता 
          2 . छोटी सार्वजनिक चिंता
          3 . छोटी सार्वभौमिक चिंता
          4 . बड़ी व्यक्तिगत चिंता
          5 . बड़ी सार्वजनिक चिंता
          6 . बड़ी सार्वभौमिक चिंता

अगर इनका आर्थिक विश्लेषण किया जाये तो निश्चय ही हम इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे चिंताओं का आर्थिक पक्ष भी हो सकता है। गरीब की चिंता और अमीर की चिंता। अमूमन ये देखा गया है कि छोटी चिंता छोटे लोग करते हैं और बड़े लोग बड़ी चिंता। छोटी चिंता करने वाला सिकुड़-सिकुड़ के छोटा होता चला जाता है और अंततोगत्वा चिता तक पहुँच ही जाता है। छोटी चिंता करने वाला चिंताओं को पोषित करता है पर उनका निराकरण न कर पाने के कारण उन्हीं में उलझता जाता है। पर बड़ी चिंता करने वाला दिन प्रति दिन बड़ा होता चला जाता है। चिंता जितनी बड़ी और सार्वभौमिक होगी आदमी उनता है महान और समृद्ध होता चला जायेगा। इसलिए इन सभी प्रकार की चिंताओं में मै बड़ी-सार्वभौमिक-चिंता को सर्वोपरि रखता हूँ।

समाधान तो बड़ी चिंता करने वाला भी नहीं खोज पाता। वो एक समस्या क्रिएट करता है। फिर उस चिंता को एन्लार्ज करना शुरू कर देता है। फिर उसका ब्रांड एम्बेस्डर बन जाता है। फिर धीरे-धीरे अपनी चिंता कि लॉबीइंग करने लगता है। धीरे-धीरे उसकी चिंता समाज-देश-दुनिया की चिंता बन जाती है। सोते-जगते वो उसी समस्या को तब तक जीता है जब तक उसे एन्जॉय करना न शुरू कर दे। इसके लिए देश-विदेश में जन-जागरण के लिए पंचतारा होटलों में वृहद् सेमिनार्स होंगे। देश-विदेश के विद्वत जन जो हर समय सम्भावित सार्वभौमिक समस्याओं पर अपनी तिरछी नज़र गड़ाए रखते हैं, वो अपने-अपने देश की सरकारों को ये विश्वास दिलाने में जुट जाते हैं कि ये आज अमरीका की समस्या है तो कल हमारी समस्या भी बन सकती है। इसलिए फलाँ कॉन्फ्रेन्स में उनकी मौजूदगी नितांत आवश्यक है। भारत पहले से ही 'पार्टिसिपेशन इस मोर इम्प्रोटंट दैन विनिंग' के सिद्धांत पर काम करता आया है। इसलिए हर फोरम पर अपना नुमाइंदा न भेजे ऐसा सम्भव नहीं है। समस्या से समाधान के लिए आवश्यकता होती है फंड्स की। और अधिक से अधिक धन उगाही के लिए समस्या जितनी बड़ी और सार्वभौमिक होगी उतने ही अधिक देश समाधान के लिए दिल और जेब खोल के खर्च करेंगे। पृथ्वी के समस्त देशों ने कुछ देशों को हर क्षेत्र में लीडर मान ही रक्खा है सो अधिकांश धन तो उन्हीं की झोली में जाना है और बाकि एसोशिएटेड देश ये मान कर ही खुश हो लेते हैं कि हम एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में महान देशों के साथ हैं या हम भी इस मिशन में शामिल हैं।    

चिंताएं कैसे ग्लोबल हो जातीं हैं ये हम सबने देखा है। पहले चिंता थी कि कैसे अपना पेट भर जाये। फिर चिंता हुई कि हमारे परिवार और इष्ट-मित्र भी ठीक-ठाक खाते पीते रहें। फिर चिंता हुई कि पूरे देश का एक भी व्यक्ति भूखा नहीं रहना चाहिए। जब इसी समस्या को ग्लोबल कर दिया गया तो इसका आयाम खरबों रुपये तक पहुँच गया। इस समस्या के समाधान में लाखों लोग जुट गए। कितने ही अलाइड सेक्टर खुल गए। सेमिनार, सिम्पोसिआ, ट्रेवल, हॉस्पिटैलिटी आदि अनेक अवसर रोजगार के बन गए। एक समस्या कैसे लाखों लोगों का पेट भर सकती है, रोजगार दे सकती है ये इसका एक नायब उदाहरण है। 

आज कल ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज का मुद्दा दुहा जा रहा है। बढती जनसंख्या को खाना खिलाना एक बड़ी समस्याओं है और जब तक क्लाइमेट पर मानव जाति का कंट्रोल नहीं हो जाता तब तक इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इसलिए हम ऐसी उन्नत फसल तैयार करने में लगें हैं जो गर्मी-सर्दी झेल ले। कीटों के प्रकोप से बेअसर रहे। बिना पानी के जीवित रहे। और उत्पादन प्रति व्यक्ति आवश्यकता को पूरा कर सके। अगर ये ख्वाब आपको सोने नहीं दे तो ये समस्या स्वागत योग्य है। पर इस ख्वाब को देखने और दिखाने वाले गहन निद्रा में डूबे हुए हैं और जागने को तैयार भी नहीं लगते। आज के उपलब्ध संसाधनों का सदुपयोग करके हम समस्याओं से कुछ हद तक निजात पा सकते हैं। कुशल प्रबंधन के द्वारा वैज्ञानिकों और किसानों ने विपरीत परिस्थितियों में उत्कृष्ट उत्पादन लिया है। उन मॉडलों को दोहरा कर उत्पादन बढ़ाना कदाचित आसान तरीका हो सकता है। रिवर लिंकिंग और भूमि जल रिचार्ज के द्वारा रेनफेड क्षेत्रों में जल की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है। एक कहावत है थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली। यदि उन बातों का ध्यान रक्खें तो हम सब विश्वव्यापी समस्याओं के निदान में भागीदार हो सकते हैं। 

यहाँ एक ख़ास बात है कि सपना या तो दिल्ली में देखा जाता है या अमेरिका में। बड़े देशों की देखा-देखी छोटे देश भी उन्हीं समस्याओं को महसूस करने लगते हैं। यहाँ समस्याएं और समाधान केंद्र से आते हैं। उनके लिए अरबों-खरबों का वित्तीय प्रावधान कर दिया जाता है। और ग्राउंड लेवल पर तरक्की जीरो बटा सन्नाटा। छोटी-छोटी समस्याओं को इंटीग्रेट कर के हम बड़ी समस्याएं बना लेते हैं। बड़ी समस्याओं का समाधान बहुत फण्ड मांगता है। फिर हर गांव, हर शहर, हर समुदाय की समस्याएं एक नहीं हो सकतीं तो समाधान एक कैसे हो सकता है। अक्सर ये भी देखा गया है कि फण्ड तो उपलब्ध करा दिया जाता है पर उस कार्य का क्रियान्वयन उन लोगों के हाथ सौंप दिया जाता है जो तकनीकी और प्रशासनिक रूप से या तो समस्या से जुड़े ही नहीं हैं या अक्षम हैं। मेरे विचार से समस्याओं को इंटीग्रेट करके समाधान खोजने के बजाय हर छोटी-छोटी समस्या का निदान करना चाहिए। और ये निदान उन्हीं के सहयोग से करना चाहिए जिनकी ये समस्या है। इससे न सिर्फ जन-सहयोग मिलेगा बल्कि लोग भी उन समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनेंगे जो उनसे सम्बन्ध रखतीं हैं।किसी भी समाधान को चुनिंदा जगहों पर मॉडल के रूप में विकसित करना चाहिए फिर उन्हीं प्रूवेन तरीकों को अन्य जगहों पर रिपीट करना कारगर सिद्ध हो सकता है। 

एक पर्यावरण प्रेमी कि दिनचर्या पर अगर नज़र डालें तो शीघ्र समझ आ जाता है कि चिंता करने वाले चिंता करने के लिए ही पैदा हुए हैं और उनका समाधान दूसरे कैसे कर सकते हैं ये उनके भाषण कि प्रिय विषयवस्तु है। पर्यावरण संरक्षण पर भाषण देने वाला दस लीटर पानी अपने फ्लश में बहा देता है। ब्रश करते और दाढ़ी बनाते समय नल खुला ही रखता है। आर ओ का प्यूरीफाइड पानी पीता है, एसी कमरे में सोता है, लम्बी शोफर ड्रिवेन गाड़ी में पीछे बैठ कर पाँच अख़बारों की सहायता से दिल्ली के जाम से निपटता है। एसी गाड़ी से निकल कर ए सी कमरे में शोभायमान हो जाते हैं। मीटिंग में एसी खराब हो जाये तो साहब का पारा गरम होने की आशंका होती है। जैसे कम्प्यूटर के प्रोसेसर को ठंडा रखना अनिवार्य है वैसे ही इन साहिबानों का दिमाग। आखिर इनका ये ही पार्ट सबसे ज्यादा काम करता है। देश-विदेश में कहीं भी पर्यावरण पर परिचर्चा होगी तो साहेबान का हवाई टिकट कटा होगा। भाषण के अलावा इनके किसी कृत्य से पर्यावरण प्रेम खोज पाना शायद मुश्किल हो। मेरे इस कथ्य के अपवाद हो सकते हैं पर यदि उनकी संख्या ज्यादा होती तो सुधार अब तक महसूस होने लगता।    

प्रत्येक देश-काल में ऐसी सार्वभौमिक चिंताएं शामिल रहीं हैं। एड्स, कैंसर, नशा मुक्ति, पर्यावरण, जैव विविधता, ग्लोबल वार्मिंग, क्लाइमेट चेंज, भूमि जल संरक्षण, पॉपुलेशन एक्सप्लोजन, मॉल न्यूट्रीशन इत्यादि-इत्यादि ऐसे मुद्दे रहे हैं जो युगों से छाये रहे हैं। आशा है युगों तक छाये रहेंगे। उसकी चिंता करने वाले दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की करते रहे हैं और करते रहेंगे। समस्या के समाधान से ज्यादा तरज़ीह उन्होंने समस्या को पोषित करने में दी है। क्योंकि अगर समस्या ख़तम हो गई तो धरती पर उनकी आवश्यकता भी कम हो जायेगी। कोई संस्था जानवरों के प्रति एथिकल ट्रीटमेंट के लिए काम कर रही है, कोई मानव से मानवोचित व्यवहार के लिए. समस्याओं की कमी नहीं है बस वो नज़र चाहिए जो मुद्दे खोज ले, बना ले। वो दिन अब लद गए जब काजी जी शहर के अंदेशे में दुबले हो जाया करते थे। अब तो जो जितना बड़ा काजी है उतना ही हट्टा-कट्टा नजर आता है। एयर कंडीशन कमरों में मीटिंग, गरिष्ठ काजू-बादाम के स्नैक्स और लज़ीज़ व्यंजन, आरामदायक पाँच सितारा होटलों की हॉस्पिटैलिटी मज़बूर कर देतीं हैं कि समस्याएं ऐसे ही पनपती रहे और समाधान के लिए बैठकें दुनिया के जाने-माने शहरों के आलिशान होटलों में होती रहें। जिनकी समस्याओं में जीने कि आदत पड़ गयी है वो चाहते हैं कि ये सपना चलता रहे, पलता रहे और समाधान कभी न निकले, काश। कम से कम इस जीवन में तो नहीं।  

बड़ी विश्वव्यापी चिंता, चिता कतई नहीं है। अपनी चिंताओं का आयाम बढाइये। इसलिए जब भी चिंता कीजिये देश-दुनिया की कीजिये। बड़ी चिंताएं कीजिये हुज़ूर, छोटी-छोटी चिंताएं स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। 


- वाणभट्ट