शनिवार, 5 सितंबर 2020

स्टार्टअप

स्टार्टअप: एक कॉपीराइटेबल आइडिया

मेरे यार का जनाज़ा है जरा धूम से उठना चाहिये. मोहल्ले वालों को लगना चाहिये कि शान से जीने वाले किस शान से मरते हैं. जनाज़े को गुलाब के फूलों की चादर से ढँक दिया गया. एक के बाद एक दसियों लोगों ने मृतक के गले मालायें डाल दीं. जैसे-जैसे जनाज़ा उठा महिलाओं के रोने की आवाज़ मन्द्र सप्तक से आरम्भ हो कर तार सप्तक की ऊंचाईयां छूने लगीं. बैंड बाजे वाले भी कोई शोक धुन बजाने के प्रयास में लग गये. लेकिन बरात में बैंड बजाने वालों को मय्यत में ढोल बजाने का मौका कम मिलता है. शीघ्र ही वो अपनी रौ में आ गये. पीं-पीं-पीं झय्यम झय्यम पों-पों-पों ढम-ढम-ढम. लगा बारात में अपने कौशल का प्रदर्शन के लिये 'आई एम अ डिस्को डान्सर' की धुन की प्रैक्टिस कर रहे हों. जब सब काम पैकेज पर हो रहा हो तो सबको काम के निपटने से मतलब होता है काम की क्वालिटी से नहीं.     

मै अगर कहूँ कि ये आइडिया मेरा है, तो सरासर गलत होगा. आइडिये का क्या है, किसी को भी आ सकता है. किन्तु-परन्तु बेईमानी के इस युग में ईमानदारी का तक़ाज़ा है कि जिस आइडिया के हिट होने में थोडा भी संशय हो उसे मूल आइडिया देने वाले के नाम से ही प्रतिपादित किया जाये. आइडिया के साथ एक दिक्कत और है, यदि आपने लिख-लिखा कर पेटेंट करा लिया तो ठीक है, वर्ना कोई भी इसे अपना आइडिया बता कर छाती चौड़ी कर सकता है. चूँकि विज्ञान में ज्ञान कहाँ से उपजा उसका स्रोत देना प्लागारिज्म से बचने का आधुनिक तरीका बन गया है. इसलिये आप पूरा का पूरा पैराग्राफ़ अपनी भाषा में इस तरह चेपिये कि आप से पहले वाले चेपू को भी ये पता न चले कि आपने उसी को चेपा है. यही आज के सफल लेखन की कुंजी है. यदि मै चचा ग़ालिब का मुंह-बोला भतीजा होता, तो इसे प्रेरणा बता कर काम चला सकता था. प्रेरणा तो कहीं से भी ली जा सकती है. प्रेरणा चोरी का संभ्रांत रूप है कि आपने चोरी कर भी ली और आप को ही लगा कि नहीं की. किन्तु यदि मेरे गुरु बाणभट्ट आज जीवित होते तो मुझे ऐसा करने की इजाज़त कदापि न देते. इसलिये अपने ब्लॉगर मित्र "उड़नतश्तरी" (जाओ तो जरा स्टाइल से https://udantashtari.blogspot.com/2020/07/blog-post_25.html ) का ज़िक्र करना आवश्यक हो जाता है. (आशा है समीर जी अपने ब्लॉग के दुरूपयोग की परमिशन मेरे निस्वार्थ भाव को देखते हुये अवश्य दे देंगे).

बिस्तर पर लाश वैसे ही पड़ी हुयी थी जैसे कल रात को मृत्यु हुयी थी. जब शरीर की हरकत बंद हो गयी तो घर वालों ने किसी डॉक्टर को बुला भेजा. डेथ सर्टिफिकेट की फॉर्मैलिटी ज़रुरी होती है. जायजाद पर काबिज होने के लिये. सुबह भी घर के सब लोग निश्चिन्त से दिख रहे थे. किसी को किसी तरह की कोई ज़ल्दी नहीं थी. पूरा का पूरा फ्यूनरल पैकेज पर था. पैकेज भी कई तरह के थे. सिल्वर, गोल्ड और डायमण्ड. जनाब ने किफ़ायती गोल्ड पैकेज ले रखा था. जनाज़ा निकलने से पहले रोने वालियाँ आयेंगी जो पूरे घर को अपने सियापे से हिला देंगीं. कितने आदमी जुलुस में शामिल होंगे, ये भी कॉन्ट्रैक्ट में लिखा था. बैंड-बाजे का अपना अलग चार्ज है. फ़ोटोग्राफ़ी और विडियोग्राफ़ी ऑप्शनल होती है. लेकिन जब एक ने करवा ली है तो दूसरा भला कहाँ पीछे रहने वाले. जैसे टर्म या हेल्थ इंश्योरेंस हुआ करता है, वैसे ही हर वर्ष अपने मरने का प्रीमियम जमा किया जाता है. साल भर में मर गये तो ठीक, नहीं तो अगला प्रीमियम भरने की तैयारी करो. ट्रांसफर के बाद सामान शिफ्ट करने के लिये मूवर्स एंड पैकर्स जैसी अनेक कम्पनियाँ बाज़ार में आ चुकी हैं. वैसे ही मरने के बाद जलाने या दफ़नाने तक के लिये भी पैकेज की बुकिंग करायी जा सकती है. एक ज़माना था जब अड़ोसी-पड़ोसी मिल-मिला कर शमशान या कब्रिस्तान तक पहुँचा ही आते थे. लेकिन तब कान्धा देना पुण्य का काम समझा जाता था. लेकिन जब से पे-कमिशंस लग गये और लोगों की आय उनके अनुमान और औकात से अधिक हो गयी, तब कोई अपना रौब किसको दिखाये. पास-पड़ोस, नाते-रिश्तेदार यही बचे थे देखने-दिखाने के लिये. लेकिन कोई किसी से पतला मूत रहा हो तो वो इधर-उधर देखे. जैसे-जैसे लोग समझदार होते गये, उनका सरोकार अड़ोसी-पड़ोसी के दुःख-दर्द से कम होता गया. नतीजा ये है कि पैकेज पर इलाज़ हो रहे हैं. अस्पताल में होटल जैसी सुविधायें हैं बीमार के लिये अलग और तीमारदार के लिये अलग. बस एक नयी दिक्कत आ गयी थी. बच गये तो ठीक और नहीं बचे तो जिन रिश्तेदारों और पड़ोसियों को अपनी पोस्ट और पे-पैकेज दिखा रहे थे, उनसे किस मुँह से चार काँधे माँगोगे. छोटे परिवार में अमूमन बच्चे इतनी दूर चले जाते हैं कि राम-नाम-सत्य बोलने वालों के लाले पड़ जाते हैं. चार कहार की डोली पैसा लिये खड़े रहो तो भी नसीब नहीं होती. 

ऐसे ही समय और इन्हीं परिस्थितियों के लिये 'स्वर्गारोहण' स्टार्टअप कम्पनी को स्टार्ट किया गया है. कम्पनी ने जीवन बीमा की तर्ज पर लोगों की दुखती राग पर प्रहार किया. राईट टू डाई विथ डिग्निटी. कब आप मर जायें और आपकी बॉडी को ढंग से अन्तिम संस्कार भी न मिले तो जीवन भर जो आपने येन-केन-प्रकारेण धन-दौलत अर्जित की उसका क्या लाभ. और जिन्हें आपने अपनी बढ़ती चल-अचल सम्पदा से जलाया है वो तो इसी दिन का इंतज़ार कर रहे होते हैं. "देखो दो-दो बेटे थे, दोनों माँ-बाप को अकेले मरने के लिये छोड़ कर विदेश निकल लिये. इससे तो अच्छा तो मेरा नालायक है, कम से कम बुढापे का सहारा तो बना हुआ है". इम्पोर्टेड पेपर पर इतना बढ़िया ब्रोशर छपा है कि उसे देख कर किसी का भी अनायास बार-बार मरने का मन करने लग जाये. हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, सभी के लिये उनके रीति-रिवाजों के अनुसार अन्तिम यात्रा के पैकेज हैं. हिन्दुओं के लिये अस्थि विसर्जन से लेकर दसवीं और तेरहवीं तक के लिये विशेष व्यवस्था है. गया में पिण्डदान करने का भी प्रयोजन है. जैसा ब्रोशर में लिखा है वैसा अन्तिम संस्कार अमरीका-कनाडा  में रह रहे बेटों के द्वारा समयाभाव के कारण करना कतिपय संभव नहीं है. 

सत्तर की उम्र बीत जाने और बच्चों के बच्चों के अमरीका में सेटेल हो जाने के बाद सिन्हा जी को ये लगा कि ये स्टार्टअप उन्हीं के लिये किसी ने खोला है. ब्रोशर देखते ही उन्होंने फर्म से सम्पर्क किया. उन्हें ख़ुशी है कि मियाँ-बीवी, दो लोगों के पैकेज पर डिस्काउंट भी मिलेगा. लेकिन हिन्दुस्तान में भरोसा नाम की चीज़ पर भरोसा करना थोडा कठिन है. मरने के बाद कम्पनी ने अपना वादा नहीं निभाया तो कोई क्या कर लेगा. इसलिये मिसेज़ सिन्हा ने फर्म के रिप्रेजेंटेटिव के सामने शर्त रखी - "कोई अंत्येष्टि हो तो हम भी उसमें शामिल होना चाहते हैं". "अरे माता जी क्या बात कर दी आपने. हमारी फ़र्म तो यहाँ तक एंश्योर करती है कि आपकी ज़ायजाद आपके बच्चों को ही मिले. कोई अगली डेथ होती है तो आपको ज़रूर ले चलेंगे. पूरा पैकेज देख कर तसल्ली कर लीजियेगा. अभी आप लोग बस फॉर्म पर यहाँ दस्तख़त कर दीजिये और पच्चीस हज़ार के बेस प्राइस का चेक काट दीजिये". मार्केटिंग वाले तो बस पॉलिसी टिकाने में विश्वास रखते हैं. सर्विस तो किसी और को देनी होती है. टर्म और कंडीशंस बहुत ही छोटे-छोटे अक्षरों में स्टार बना कर लिखी होती हैं. लेकिन मुझ अकिंचन की राय में यदि फर्म को लम्बे समय तक बिजनेस करने है तो उसे मूवर्स और पैकर्स की तरह अपनी संतोषप्रद सेवायें देनी होंगी. 

बेरोजगारी के इस ज़माने में, बिना हर्र-फिटकरी वाला, सेवा ही सबसे बड़ा उद्योग है. विदेशों में तो अपने जनाज़े का इंतज़ाम स्वयं करना पड़ता है. देश में हो रही आर्थिक तरक्की और गिरते मानव मूल्यों की बयार को देखते हुये इस बिजनेस में अपार संभावनाएं हैं. स्वर्गारोहण कम्पनी के इस आइडिया अभी पेटेंट नहीं कराया गया है. कोई चाहे तो इससे प्रेरणा ले सकता है. इस कम्पनी की फ्रेंचाइजी देश के गाँव-गाँव, गली-गली तक उसी तरह आवश्यक है जैसे कुरियर सेवा. देर-सवेर समृद्धि गाँवों तक भी पहुँच ही जायेगी. अर्ली बर्ड कैचेज़ द वर्म. शुभस्य शीघ्रम. फिर ये न कहना कि वाणभट्ट ने बताया नहीं.

- वाणभट्ट