रविवार, 19 मई 2019

साँड़

साँड़

अगल-बगल में सब बेतहाशा दौड़े चले जा रहे थे। उसने भी आव देखा न ताव भाग लिया। और सबको पछाड़ते हुये वो लक्ष्य तक सबसे पहले पहुँच गया। दौड़ तो ऐसे लगा रहे थे जैसे कोई लड्डू मिलने वाला हो। लेकिन कैद हो कर रह गया। अब पछता रहा है कि वो लोग ज़्यादा स्मार्ट थे जो रेस में धीरे-धीरे दौड़ रहे थे। लेकिन जब दौड़ लगी हो तो आम और अमरुद में यही फ़र्क रह जाता है। आम दौड़ लेता है, ख़ामख़्वाह, और अमरुद किनारे खड़ा हो कर रेस का आनन्द लेता है। एक अनार हो और तलबग़ार ज़्यादा तो खामख्वाह दौड़ना ज़रूरी भी हो जाता है और मजबूरी भी। इस प्रकार पण्डित राम नरेश ने अपनी माँ के गर्भ में प्रवेश किया। 

जब पण्डिताइन ने गुड न्यूज़ दी तो पहले से ही तीन बच्चों के पिता बन चुके पण्डित बाँके बिहारी सोच में डूब गये। यहाँ वो अपने आवा-गमन से मुक्ति के चक्कर में लगे पड़े हैं और बच्चे हैं कि एक के बाद एक लाइन लगाये खड़े हैं। लेकिन नियति के खेल में वो किसी प्रकार का व्यवधान भी नहीं डालना चाहते थे। आने वाले को भला कोई रोक पाया है। चलो एक बार फिर से डॉक्टर के चक्कर शुरू। पहले भी वो ये सब देख चुके थे। डॉक्टरनी ने कुछ झिड़कते हुये कहा - "फिर आ गये। आजकल ज़माना एक बच्चे पर पर शिफ्ट कर गया है और आप हैं कि रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। अपना नहीं तो अपनी पत्नी का ही ख्याल कर लीजिये। चार-चार बच्चों को सम्हालना कोई मज़ाक नहीं है। एनी वे मुबारक़ हो आप एक बार फिर बाप बनने वाले हैं।" पंडित जी भला क्या बोलते। गलती तो हो गयी। गर्भ में राम नरेश ये जान कर कुछ दुःख ज़रूर हुआ होगा कि उसे माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध  इस धरा पर अवतरित होना होगा। लेकिन मन को सान्त्वना देने के अलावा वो कर भी क्या सकता था। जो हुआ सो हुआ हुआ। 

पिछले चार-पाँच सालों में ये लेडी डॉक्टर पण्डित और पण्डिताइन के लिये फैमिली डॉक्टर जैसी बन चुकी थी। लेकिन डॉक्टर के लिये उसका पेशेन्ट मात्र एक पेशेन्ट ही होता है। चाहे वो उससे कितना ही प्यार से बात करे लेकिन उसके लिये पेशेन्ट एक सब्जेक्ट से अधिक नहीं होता। उसको अपनी श्रमसाध्य चिकित्सकीय ज्ञान को कहीं न कहीं तो उड़ेलना ही है।और सोने पर सुहागा ये कि इसके लिये सब्जेक्ट मोटी फ़ीस देने को तैयार बैठा है। दवाई कम्पनियाँ-पैथोलॉजी लैब्स-रेडिओलॉजी से मिलने वाला तगड़ा कमीशन इन डॉक्टरों को समाज सेवा करते रहने के लिये निरन्तर प्रेरित करता रहता है। डॉक्टरनी ने आनन -फानन में अपने पैड पर कुछ धारा प्रवाह लिखना शुरू कर दिया। लिखना समाप्त करते हुये कहा मैंने कुछ दवाइयाँ और टेस्ट लिख दिये हैं। राजेश्वरी को ये दवाइयाँ बराबर चलनी हैं। अगली बार आना तो अल्ट्रासाउंड और बाकि टेस्ट कराते लाना। अपने धीर-गंभीर चेहरे पर बिनाका स्माइल चेपते हुये बोली - "बाँके जी दिस इज़ माई बेबी। आपको राजेश्वरी का पूरा ख्याल रखना होगा। बाय राजेश्वरी विश यू ऑल थे बेस्ट, टेक केयर।" फ़ीस पहले ही रिसेप्शन पर जमा कराने के अपने लाभ हैं। एक तो अपनी बारी के इन्तज़ार में पेशेन्ट का सब्र जवाब नहीं देता और दिखाने के बाद उसका कीमती समय व्यर्थ नहीं होता। 

डॉक्टर के कम्पाउंड में स्थित दवाइयों का जब भरी-भरकम बिल मिला तो पण्डित जी को आभास हो गया कि ये बच्चा बाकि बच्चों से मँहगा पड़ने वाला है। पहली बार उन्हें लगा कि डॉक्टरों ने प्रजनन की एक समान्य प्रक्रिया, प्रेगनेंसी को भी बिमारी बना डाला है। कई तरह के इंजेक्शंस, मल्टीविटामिन कैप्सूलों के पत्ते और सिरप जब पण्डिताइन को मिले तो उन्हें कुछ ख़ुशी सी महसूस हुयी। चलो परमेश्वर के पापा कुछ महीने तो उसका ख्याल ठीक से रखेंगे। बच्चे इधर-उधर से आ-आ कर उन दवाइयों के चमकते फॉइल्स से खेलना चाह रहे थे। इसलिये दवाइयों को सुरक्षित रखना ज़्यादा ज़रूरी था। पति-पत्नी बिना नागा जाँच के डॉक्टरनी दीदी के यहाँ जाते रहे। पण्डित जी ने राजेश्वरी के रख-रखाव की पूरी जिम्मेदारी को सहजता से वहन कर लिया था। क्या घर क्या बाहर सब उन्ही ने सम्हाल लिया। बाहर तो कोई भी सम्हाल ले लेकिन तीन बच्चों और एक प्रेगनेंट पत्नी को सम्हालना कोई हंसी खेल तो था नहीं। लेकिन पण्डित जी इस कार्य का निर्वहन भी बखूबी करने लगे। डॉक्टरनी ने भी पूरा ठेका ले रखा था। कब अल्ट्रासाउंड होना है, कब दवाइयों और इंजेक्शन का डोज़ बढ़ाना है। दिन नज़दीक आते जा रहे थे और पण्डित जी की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। अन्तिम तीन महीनों में जब कम्प्लीट बेड रेस्ट बताया तो पण्डिताइन को खुद लगने लगा कि वो बीमार हो गयी हैं।

चाक़ू-कैंची की आवाज़ सुन कर राम नरेश का मन बाहर निकलने का नहीं हो रहा था जबकि वो इस घडी का महीनों से इंतज़ार कर रहा था। डॉक्टरनी ने पण्डित जी को बता दिया था कि पोथा-पत्रा बिचरवा लीजिये बच्चा तो सिज़ेरियन ही होगा इसलिये एकदम मुहूर्त के हिसाब से डिलीवरी करा देंगे। अमूमन इंसान के पास चॉइस सिर्फ़ हाँ और ना की ही होती है लेकिन डॉक्टर के सामने तो ना की गुंजाईश भी नहीं बचती। मुहूर्त के अनुसार तमाम अनिच्छा के बावज़ूद राम नरेश को बाहर आना पड़ा। आते ही पता चला बच्चा अंडरवेट है इसलिये इन्क्यूबेटर में रखना है थोड़ा बहुत पीलिया के लक्षण भी हैं इसलिये आर्टिफिशियल लाइट एक्सपोज़र भी दिया जायेगा। बच्चे को पता नहीं कौन-कौन से इंजेक्शन लगा दिए गये। राजेश्वरी जब राम नरेश को गोद में लेकर अस्पताल से बाहर निकलीं तब तक बांके बिहारी 15-20 हज़ार के लपेटे में आ चुके थे। टीकाकरण की एक पूरी फ़ेहरिश्त पकड़ा दी गयी थी जिसमें डिटेल था कि कब-कब कौन सा टीका कितनी बार उस छोटे से बच्चे को लगना है। और एक भी टीका छूटा तो ये देश और समाज के प्रति विश्वासघात से कम नहीं माना जायेगा। एक जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिये माँ-बाप का ज़िम्मेदार होना ज़रूरी है। ये बात अलग है कि माँ-बाप ज़िम्मेदार ही होते तो चौथे की नौबत ही क्यों आती। 

इस तरह राम नरेश का धरती पर पदार्पण तो हो गया। भगवान या अल्लाह या जीसस को ज़रूरत से ज़्यादा मानने वाले देश में हर किसी को ये भरम पालने का अधिकार है कि उनके अवतरण का कोई न कोई विशिष्ठ प्रयोजन पहले ही नियत कर रखा है। जिंदगी के पचास बसन्त गुजरने के बाद पण्डित राम नरेश को ये आभास हो चुका है कि और कोई सार्थक प्रयोजन प्रभु ने आपके लिए भले ही न सोच रखा हो लेकिन जाने-अनजाने आपके जीवन का एक उद्देश्य बन गया है - देश के डॉक्टरों की दुकान चलाना। ये डॉक्टर अंग्रेजी से लेकर देशी तक कुछ भी हो सकता है। फर्क बस इतना है कि यदि बीमारी का नाम अंग्रेजी में हो तो जेब कुछ ज़्यादा ढीली करनी पड़ सकती है, डॉक्टर के लिए भी और दवाई के लिए भी। वर्ना ऐसे डॉक्टरों की कमी भी नहीं है जिन्होंने किचन में रखे मसालों (जड़ी-बूटियों) से कैंसर तक का इलाज़ कर डाला है। अपने माता-पिता, श्रीमति राजेश्वरी और श्री बांके बिहारी, के इलाज़ के चक्कर में पण्डित राम नरेश का पूरे शहर के हर विधा में नामी-गिरामी (कुछ कम नामी-गिरामी भी) डॉक्टरों से सबाका पड़ चुका था। माता-पिता जी को विभाग की ओर से हर प्रकार के मेडिकल खर्च के रिम्बरस्मेंट सुविधा सुनिश्चित थी। इसलिये उन्होंने कभी सरदर्द के ठीक होने का इंतज़ार नहीं किया। जब भी दर्द उठा, सर उठाया और डॉक्टर के सामने खड़े हो गये। अब इतना हाइली क़्वालिफ़ाइड डॉक्टर इलाज न करे तो लानत है उसके एनाटॉमी-फिजिओलॉजी-मेडिसिन के ज्ञान पर। ये बात अलग है कि अक्सर दवाइयों के डोज़ को देख कर सरदर्द अपने आप भाग जाया करता था। डॉक्टर को भी ये भान था कि पैसा इनकी जेब में वापस आ जायेगा इसलिये उसने भी कभी फ़ीस लेने और दवाई लिखने में कोई कोताही नहीं की। 

इलाज़ कराते-कराते पंडित राम नरेश को भी ये ज्ञात हो गया था कि आज सर में दर्द होगा तो कल पेट में, फिर आँख में, फिर कान में, फिर दाँत में, फिर नाक में, फिर गले में, फिर हार्ट में। और फिर कुछ और ऐसे ही फिरों के बाद फिर सर में दर्द होना शुरू हो जायेगा। पूरा एक चक्र है जो छः महीने में पूरा हो जाता है। लेकिन सब डॉक्टरों के लिये ये नियमित ग्राहक थे। यदि छः महीनों में किसी के यहाँ न पहुंचो तो उनका चिन्तित हो जाना लाज़मी था। जैसे मोहल्ले में परचून की दूकान वाले को पूरा पता होता है कि पण्डित जी के यहाँ आटा पन्द्रह दिन चलता है। सोलहवां दिन आते न आते उसका इन्तज़ार शुरू हो जाता है। यदि गलती से आटा अट्ठारह दिन चल गया तो वो पूछ लेता है पंडित जी कहीं बाहर गए थे क्या? कहने का आशय सिर्फ इतना है कि डॉक्टरों के लिये ये फैमिली मेंबर की तरह हो गए थे। और तो और दवाई की दुकान वाला भी डिस्काउंट के साथ दवाई घर तक पहुँचा जाता। लेकिन पण्डित राम नरेश को सदैव ये संशय रहा कि इतने नामी-गिरामी डॉक्टर्स बीमारी का इलाज़ कर रहे हैं या बुढ़ापे का। बुजुर्गों के मेडिकल पैरामीटर्स वयस्कों से मैच करें ये शायद संभव कभी न हो। लेकिन मामला पेरेंट्स का था इसलिये वो कुछ कह भी न पाते। पेरेंट्स को उनके नालायक होने का जो संशय बचा था वो बना रहना ज़रूरी था।  

दिन ऐसे ही हंसी-ख़ुशी मज़े में कट रहे थे। जब पण्डित राम नरेश के मोहल्ले में एक साँड़ ने प्रवेश किया। चूँकि उनके मोहल्ले में अधिकांश लोगों ने घर क्या फुटपाथ तक के एक-एक इंच हिस्से को सीमेंट-कंक्रीट से कवर कर रखा था, इसलिये उस साँड़ को दिन में दरकार होती थी एक छाँव की। पण्डित जी ने घर के बाहर फुटपाथ पर कुछ पेड़ लगा रखे थे इसलिये वो साँड़ जब घूम-फिर के थक जाता तो उन स्थापित पेड़ों की छाया में बैठ जाता। निराश्रित गायों को कुछ लोग रोटी भले डाल देते हों लेकिन साँड़ को कभी किसी ने रोटी डालते न देखा था। साँड़ की चाल-ढाल बहुत ही गरिमामय थी। उसे किसी बात की जल्दी नहीं होती थी। उसे मालूम था कि पूरा दिन पड़ा है टहलने को। जल्दी या तेज़ चलने से कुछ नहीं होने वाला। समय अपने हिसाब से ही चलेगा। इसलिये जब मर्ज़ी होती चलने लगता और जब मर्ज़ी हो बैठ जाता। अक्सर वो इन्हीं के घर के सामने बैठता।  निर्विकार भाव, न सुक्खम न दुःक्खम, उसके चेहरे पर सदैव व्याप्त रहता। इसी लिये मानव जीवन में लोग भीषण से भीषण योग साधना करने को तत्पर रहते हैं। उसे देख कर ऐसा लगता मानो कोई तपस्वी निरन्तर अपनी साधना में लीन हो। पण्डित राम नरेश को साँड़  की ये निर्लिप्त पर्सनालिटी प्रेरणा देती।

पण्डित राम नरेश के ऑफिस में भी वार्षिक हेल्थ चेकअप कम्पलसरी कर दिया गया था। कम्पनी जब अपने अधिकारी पर प्रति माह इतने रुपये इन्वेस्ट कर रही है तो उनको भी तो ये मालूम होना चाहिए कि ये घोडा दाँव लगाने लायक बचा भी है या नहीं। देश-विदेश की ट्रेनिंग और सुविधाएं देने के बाद यदि बन्दा समय से पहले टाँय बोल गया तो सारा इन्वेस्टमेंट बेकार। बहरहाल टेस्ट के नाम से पण्डित जी के शरीर से इतना खून निकाल लिया गया कि पण्डित जी कुछ दिनों तक खुद को साइक्लॉजिकली कमज़ोर समझने को विवश हो गये। अल्ट्रासाउण्ड से उन-उन बीमारियों को चुन-चुन के खोजा गया जिनकी पण्डित जी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। जैसे मैकेनिक के पास जाइये तो वो नयी से नयी कार में भी डिफेक्ट निकालने का माद्दा रखता है। वैसे ही मेडिकल टेस्ट की कोई रिपोर्ट सही आ जायेगी इसकी गुंजाईश कम ही रहती है। क्या जवान क्या बूढ़े, कोई भी इम्प्लॉयी 'ए' ग्रेड में नहीं पास हो सका। जिन्हें 'बी' ग्रेड मिला था वो 'डी ' और 'ई'  ग्रेड वालों को ऐसे देख रहे थे जैसे उन्होंने इसके लिये कोई कॉम्पटीटिव एग्जाम दिया हो। 

कंसल्टेशन के दिन डॉक्टर के सामने जाने में पण्डित जी को उसी तरह घबराहट हो रही थी जैसी किसी एग्जाम के रिज़ल्ट के निकलते समय हुआ करती थी। रैगिंग के दौरान मुस्कान काटने की भी एक ट्रेनिंग हुआ करती थी। पण्डित जी को अब समझ आया कि ये ट्रेनिंग क्यों दी जाती थी। यदि आप मुस्कुरा कर कोई गंभीर बात बोलेंगे तो लोग उसे हल्के में लेंगे। केबिन के अन्दर डॉक्टर ने जब सीरियसली बोलना शुरू किया तो एक पल के लिये पण्डित जी को लगा कि ये वचन स्वयं यमराज जी के श्रीमुख से फूट रहे हैं। "देखिये राम नरेश जी आपके पिता जी को हाइपरटेंशन था, डायबिटीज़ थी इसलिये आपको भी ये सब होने की सम्भावनायें हैं। आपका ब्लडप्रेशर भी हायर साइड में है। इसलिये आपको अभी से प्रिकॉशन्स लेने पड़ेंगे। ब्लडप्रेशर की एक दवाई आपको लिखनी ही पड़ेगी।" पण्डित जी को मालूम था कि डॉक्टरों के चक्कर व्यर्थ नहीं जाते। वो इलाज़ ऐसे ही शुरू करेंगे। आज एक गोली फिर धीरे-धीरे पन्द्रह कैप्सूल। उन्होंने पेरेन्ट्स के इलाज़ का अच्छा-खासा तजुर्बा हो रखा था। जब डॉक्टर ने बताया कि उनकी रिपोर्ट 'बी' है, तो पण्डित जी के चेहरे पर एक मुस्कान सी तैर गयी। डॉक्टर बुरा मान गया। उसे लगा राम नरेश उसकी बात को संजीदगी से नहीं ले रहा है। "देखिये आप पचास के ऊपर हैं। थोड़ा हाइपरटेंसिव भी। उम्र के साथ नसें कमज़ोर हो जाती हैं। जैसे गार्डेन वाला रबर का पाइप स्टिफ हो जाता है वैसा ही धमनियों के साथ भी होता है। प्रेशर बढ़ गया तो कौन सी नस कहाँ से फटेगी पता भी नहीं चलेगा।" डॉक्टर ने कुछ दवाइयाँ लिख कर पर्चा पण्डित जी को थमा दिया। 

पण्डित जी बालकनी में बैठे थे जब उन्हें पेड़ के नीचे साँड़ के बैठे होने की आहट हुयी। उन्होंने सोचा इस साँड़ ने भी अपनी माँ के गर्भ तक पहुँचने के लिये तेज दौड़ लगायी होगी। इसका और इसकी माँ के इलाज़ के लिये पता नहीं कोई डॉक्टर था भी या नहीं। इसके भी कोई टीका लगा या नहीं। दिन भर चलते-चलते इसको भी दर्द होता होगा। न कोई बाम या न कोई एनासिन। किसी को तो इसकी भूख की चिन्ता भी नहीं। न कोई ठाँव न कोई ठौर। यहाँ डॉक्टर आदमी का इलाज़ कर-कर के परेशान हो रखे हैं। उन्हें ये भी पता नहीं कि बीमारी का इलाज़ कर रहे हैं या उम्र का। कोई ये नहीं कहता कि बाल जो झड़ गये हैं वो उम्र का तकाज़ा है, वो नया उगाने के नुस्ख़े बताने में व्यस्त हैं। पाइप स्टिफ भी होगा और फटेगा भी, लेकिन पाइप की उम्र के बाद। यहाँ इलाज़ कराने के लिये पैसा है, ख्याल करने के लिए परिवार में सदस्य हैं, तो डॉक्टर्स का प्रोफ़ेशन फल-फूल रहा है। इस साँड़ के न तो आगे कोई है न पीछे। न उसके पास पैसा है इलाज़ के लिये। यदि साँड़ को बोलने का सौभाग्य भगवान एकाएक दे दे तो यकीन मानिये उसका दर्द बयां करने को लिए शब्द कम पड़ जायें। 

पण्डित राम नरेश बालकनी से उठे और फ्रिज से ब्रेड का पूरा पैकेट लेकर नीचे उतर आये। शायद ये पहली बार होगा जब किसी ने किसी लावारिस साँड़ को रोटी डाली होगी। 

-वाणभट्ट