मंगलवार, 12 नवंबर 2019

कल चमन था

कल चमन था

आज कल फिल्म वालों के पास सब्जेक्ट ख़त्म हो गए हैं या कुछ नया कहने की चाह में कुछ भी कहे जा रहे हैं। ऐसी फिल्में बना किसके लिये रहे हैं। जिनके चमन उजड़ गये हैं, उनका दुनिया कम मज़ाक बनाती है, जो फिल्म वाले भी उन पर पिल पड़े हैं। एक नहीं दो-दो फिल्में। भाई जिसे आप मज़ाक समझ रहे हो वो मेरे लिये गंजे लोगों का मखौल उड़ाने से कम नहीं है। दुनिया में लगभग 10 प्रतिशत लोग 50 की उम्र आते-आते गंजेपन का शिकार हो जाते हैं। भारत, जहाँ हर व्यक्ति एक भयंकर इमोशनल ज़िन्दगी जी रहा हो, वहाँ गंजे होने की सम्भावना और भी बढ़ जाती है। भारतीय पुरुषों में गंजे हो जाने का आँकलन लगभग 60 प्रतिशत है। ऐसे में किसी बदनसीब के उजड़े चमन पर हँसने से पहले ये अवश्य सोच लीजियेगा कहीं ये आप की भी मंज़िल-ए-मक़सूद तो नहीं है। ऐसे देश में ऐसे विषय को चुनना बहुत नाइन्साफ़ी है उन लोगों के प्रति जो कभी लहलहाती खेती से अब महरूम हो चुके हैं। बहरहाल फिल्म बनाने से पहले कोई पब्लिक ओपिनियन तो ली नहीं जाती वर्ना डेमोक्रेसी के मक्के हिन्दुस्तान में ये कहानी फिल्म बनने से पहले ही दफ़न हो जाती। लेकिन अब ये फिल्में बन भी गयी हैं और सिनेमा हॉल्स में चल भी रही हैं, तो क्या किया जा सकता है। इसे गंजों की शराफ़त कहें या किसी एसोशिएशन का न होना कहा जाये, इस वाहियात विषय वाली फिल्मों के विरोध में न कोई धरना हुआ न प्रदर्शन, न कोई स्वर उठा, न थियेटरों में आगजनी। और तो और गंजे ख़ुद अपने ऊपर बनी फिल्मों को देखने जा रहे हैं। 

ये बाला जो सुपर-डूपर हिट होने की कगार पर खड़ी है, उसमें गंजों के योगदान के लिये निर्माता-निर्देशकों को अपनी कमाई से एक हेयर ट्रान्सप्लांट का ट्रस्ट बनाना चाहिये, जो देश भर के उन गंजों को सुविधा मुफ़्त दे, जो इसका खर्च वहन कर सकने में असमर्थ हों। बल्कि यदि मुनाफ़े की राशि का २५% भी इस ट्रस्ट को देने का विचार अपने प्रचार माध्यमों से प्रसारित करे तो मैं ये गारंटी लेता हूँ कि शोले के सफलता को बीट नहीं लेकिन रिपीट तो किया जा सकता है। गंजों के बिहाफ़ पर मैं इसलिये बोलने का हक़ रखता हूँ कि क़ुदरत ने उम्र के साथ मुझे भी बालों के नायाब उपहार से वंचित कर दिया है। फिल्मों के नायकों से अलग मेरे लिये बालों का झड़ना चुनौती नहीं बना क्योंकि ये प्रक्रिया विवाहोपरान्त आरम्भ हुयी। कथित रूप से पुरुष प्रधान समाज में इसका श्रेय अनुवांशिकता से अधिक धर्मपत्नी को दिया जा सकता है। शायद इसीलिये श्रीमती जी ने भी बढ़ती टमी की तरह झड़ते बालों पर कभी कोई आपत्ति भी नहीं की। उन्हें भी ये भली भाँति पता है कि पुरुषों को बाँधे रखने का यह नुस्ख़ा वर्षों से आज़माया जाता रहा है। तभी तो कहते हैं पुरुष के हृदय का रास्ता पेट से हो कर गुज़रता है। इन टोटकों के बाद उन्हें वैवाहिक असुरक्षा का डर हमेशा के लिये समाप्त हो जाता है। गौर करने वाली बात ये है कि जो पुरुष अपने लुक्स पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देते हैं, वो अपना मोबाईल कभी भी बिना पासवर्ड के नहीं रखते। अपना क्या, जैसे बाहर वैसे अन्दर। किसी ने वाट्सएपिया ज्ञान भेजा था कि आज के ज़माने में वही व्यक्ति ट्रस्टवर्दी (वफ़ादार) है जिसके मोबाईल पर पासवर्ड न हो। तब मुझे लगा इससे बड़ा कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट किसी ने आजतक नहीं दिया होगा। अब सम्हलने की बारी उन महिलाओं की है जिनके बीएफ या हबी अपने बालों पर कुछ ज़्यादा कंघी किया करते हैं या टमी अन्दर करने के लिये जिम जाने को उद्दत रहते हों। यदि उनके मोबाईल पासवर्ड प्रोटेक्टेड हों तो शक़-शुबहे की कोई गुंजाईश नहीं बचती है। वो चाहें तो प्राइवेट डिटेक्टिव भी लगा सकती हैं। बाद में ये गऊ (गधे-उल्लू का कॉम्बिनेशन), सीधी-साधी, भोली-भाली होने की बात न कहना। (एक गंजा अगर अपनी पर उतर आये तो किसी के हरे-भरे चमन को वीरान करवाने का माद्दा भी रखता है।)  

जब से पीवीआर हॉल्स के किरायों में अतिशय वृद्धि हुयी है पिक्चर्स का बचा-खुचा क्रेज़ भी कम हो गया है। चूँकि ये फिल्में मेरी दुखती रग के करीब थीं, सो इन्हें देखने का निर्णय लिया गया। शादी पहले हुये गंजों की व्यथा समझने के लिये इन फिल्मों का देखना मेरे लिए ज़रूरी था। कौन सी फिल्म चलनी है, इस पर जब श्रीमती जी ने आयुष्मान खुराना वाली फिल्म का नाम लिया तो सच बतायें कसम से रोम-रोम सुलग गया। उन्होंने बहुत ही सहज तरीके से मुझे मेरे गंजे हो जाने का एहसास करा दिया। आज जब ये फिल्म हिट बतायी जा रही है तो मेरा सीना भी फ़क्र से चौड़ा हुआ जा रहा है कि मेरा भी तुच्छ योगदान है इस फिल्म के हिट होने में। यदि ये लेख मै कलाकारों की लाज़वाब एक्टिंग, डायलॉग्स, फिल्म की स्क्रिप्ट राइटिंग, एडिटिंग, सोशल मेस्सेज, बैकग्राउण्ड म्यूज़िक और मधुर गीतों की तारीफ करने के लिये लिख रहा होता, तो मेरे पास शब्द कम पड़ जाते। लेकिन मै ये लिख रहा हूँ, उनके लिये जिनके लिये इस समस्या को उठाया गया है। 

बात उन दिनों की है जब ये तो पता था कि पढ़ायी से ज़रूरी कुछ भी नहीं है लेकिन पढ़ायी में मन लगाना कठिन था। बताने वाले बताते हैं कि इसमें इंसान का कम और उम्र का दोष ज़्यादा होता है। साथ में भाँती-भाँती के लोग थे, डिग्री की रैट रेस में। जो लोग अपने लुक्स के प्रति कॉन्शस थे, दिन-रात आइना तोड़े पड़े रहते थे। एक कंघी हर समय जेब में पड़ी रहती थी। जब जरा मौका मिला या कहीं आइना दिखा, बाल संवारना चालू। (ख़ुदा गवाह है कि बन्दे ने न तब कंघी रखी, न आज रखता है। सुबह के बाद चेहरे को शायद ही कभी दुबारा देखता हो। पर्पज़ली तो कतई नहीं।)  उन फैशन परस्त तब के युवाओं के बाल आज पचासवें बसन्त के बाद भी बरकरार हैं। घोड़ों की खरहरा प्रक्रिया के बारे में तो पता ही होगा। आयरन ब्रिसल्स वाले ब्रशों से खरहरा किया जाता है ताकि उनकी त्वचा पर ब्लड सर्कुलेशन सुचारु रूप से बना रहे। जितना खरहरा उतनी चमकते बाल और त्वचा। कंघी भी एक प्रकार से उसी खरहरे का काम करती है। दूसरों की गलती से जो सीख ले वो बुद्धिमान होता है। काश कि किसी ने खरहरे पर पहले ज्ञान दिया तो आज भी चमन बरक़रार रहता। 

उन्हीं दिनों हमारे साथ एक सहपाठी थे वत्सल। जिन्हें बाकी बच्चे केएलपीडी के नाम से बुलाते थे - काला-लम्बा-पतला-दुबला। अपने लुक्स पर ध्यान न देने की वजह से उसका पढ़ाई पर ध्यान औरों की अपेक्षा ज़्यादा रहता था। इसी चक्कर में भाई को खरहरा करने का ख्याल कदाचित आता हो। शरीर में सर के बाल ही सबसे बेवफ़ा हिस्सा हैं, सबसे पहले साथ छोड़ने को आमादा रहते हैं। वत्सल की मेधा के सब कायल थे लेकिन अपने लुक्स के कारण किसी मिक्स्ड ग्रुप का हिस्सा नहीं बन पाता था। कक्षा में अव्वल और गेड़ा काटने में सबसे पीछे। काफी समय तक तो उसे ये ही पता था की शादी में सही विधि से मन्तर न पढ़े जायें तो बच्चे ही नहीं पैदा होते। भला हो छात्रावास के ज्ञानियों का जिन्होंने उसे इस ब्रह्म ज्ञान से वंचित नहीं रहने दिया। बहरहाल जब उसने २२ साल की आयु में अपने पहले प्रयास में राष्ट्रीय स्तर की सेवा स्थान बनाया। तो उसने उसी कन्या को अपनी जीवनसंगिनी चुना जिसके पीछे गेड़ा काटने में बाकि अपना समय बर्बाद कर चुके थे। कहीं से कोई विरोध के स्वर उठे हों ऐसा मुझे नहीं पता। 

बाला एक बेहतरीन फिल्म है ऐसा मै कहूंगा तो लोग कहेंगे कि गंजा सिम्पैथी चाह रहा है। लुक्स के लिये कभी ध्यान नहीं दिया। हाँ अब कभी-कभी ये लगता है कि काश बाल होते तो ठण्ड से थोड़ा बचाव हो जाता। बारिश का पानी चश्मे पर कुछ छन के आता। दूसरों को देख कर रंग न पाने की गुंजाइश का मलाल भी कभी-कभी होता है। चूँकि मेरी ये स्थिति शादी के बाद आयी थी, इसलिये विवाह से पूर्व गंजे हो जाने के दर्द को समझने के लिये इस फिल्म को देखना लाज़मी था। जिसे इस फिल्म ने खूबसूरती से दिखाया है। एक मिडल क्लास कनपुरिया इससे आगे कहाँ सोच सकता है। एक नौकरी-एक शादी। बस इतनी सी ख्वाहिश वाली ज़िन्दगी। 

स्वानुभूति से मै ये कह सकता हूँ कि खरहरे से बढ़िया कुछ भी नहीं। इसलिए खरहरा करते रहिये जब भी मौका मिले। कहीं शीशा मिल जाये तो अपने अक्स को देखने से कतई गुरेज़ न कीजिये। असलियत से कभी कोई समझौता नहीं कीजिये हर किसी के लिये कहीं न कहीं कोई न कोई बना हुआ है। इंतज़ार कीजिये अपने समय का। असलियत छुपा कर के आप, अपने आप को कष्ट देंगे। जिस समाज में लोग अपने से ज़्यादा दूसरे में इंटरेस्ट रखते हों, वहाँ वो चीज़ सबसे पहले उजागर होती है, जिसे आप छुपाना चाहते हैं। इसलिये नथिंग बेटर दैन ओरिजिनल। और हाँ वत्सल की तरह अपने पे-पैकेज पर काम कीजिये। ये एक शर्तिया इलाज है किसी भी प्रकार के कमी को छिपाने के लिये। 

मेरे लिखने से यदि एक भी बन्दा या बन्दी यदि हॉल की सीट तक पहुँच गया या गयी तो समझूँगा मेरा लेखन बेकार नहीं गया। कृपया मुझे सूचित करना न भूलियेगा। गंजों के लिए फ्री हेयर ट्रांसप्लांट का प्रोजेक्ट चलने के लिये सम्बल मिलेगा। 

देखने वालों ने देखा है धुआँ, 
किसने देखा दिल मेरा जलता हुआ, 
कल चमन था 



तब और अब 


- वाणभट्ट 

रविवार, 29 सितंबर 2019

एक पे एक : फ्री

एक पे एक : फ्री

पूरा का पूरा अख़बार अटा पड़ा था सेल के विज्ञापनों से। नवरात्रि क्या शुरू हुयी लोगों के लिये लुभावने प्रोडक्ट्स के साथ अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसी ऑनलाइन कम्पनियाँ जुट गयीं हैं। एक से एक लार टपकाऊ ऑफर्स ले कर। दाम इतने कम कि खरीदने का मन न भी हो तो लोग दो-चार चीज़ें खरीद ही डालें। लोगों की तमन्नायें उफान मारने लगती हैं इतने सस्ते दाम देख कर। लगता है जैसे श्राद्ध के समय में अपनी इच्छाओं को जबरदस्ती कंट्रोल किये हुये थे। अब मौका लगा है तो पूरा बाज़ार घर में घुसा पड़ रहा है। मार्किट का हाल भी ऑनलाइन मार्किट से अलग नहीं है। त्योहारों की धूम हर तरफ दिखाई दे रही है। देवी का दरबार सजाने, व्रतों को उत्सव में तब्दील करने की होड़ शुरू हो गयी है। हर कोई सस्ते और अच्छे माल को अविश्वसनीय मूल्य पर बेचने को आमादा है। मानों ग्राहक के भले के लिये सब के सब घाटा उठाने तो तत्पर हैं। ऐसा कभी हुआ है, जो अब होगा। जो लोग मन्दी का सियापा पीटते नहीं अघा रहे थे, उनके लिये दुःखख़बरी है कि बाज़ार से मन्दी दिवाली तक के लिये गायब होने वाली है। लोग घरों का रंग-रोगन करायेंगे, सोने-चाँदी-जवाहरात खरीदेंगे और पटाखों में आग लगाने के पिछले सब रिकॉर्ड ध्वस्त कर देंगे। जिन्हें ये सिद्ध करने की अदम्य लालसा है कि वाकई मन्दी छायी है वो पर्यावरण प्रदुषण का सहारा लेकर बंद कमरों में एक रुपये बोर्ड वाला जुआ खेल कर अपने ग़म को कम कर सकते हैं। 

जब पण्डित दीना नाथ शर्मा के यहाँ तीसरी लड़की हुयी तो उन्हें तृप्ति का एहसास होने लगा। पहली में लगा था कि प्रीति का फल है तो नाम रखा प्रीति। बेटे के प्रयास में जब दूसरी लड़की ने जन्म लिया तो उन्होंने उसे अपना बेटा मान लिया। सोचा अब ये ये ही मेरा यश और कीर्ति बढ़ायेगी, सो उसके नाम में भी कोई दिक्कत नहीं हुई। नाम रखा गया कीर्ति। लेकिन लड़के की ख़्वाहिश का क्या किया जाये, इस चक्कर में तृप्ति भी आ गयीं। चौथे और पाँचवें के लिये पंडिताइन ने विद्रोह कर दिया वर्ना पण्डित जी कहाँ मानने वाले थे। हिन्दुस्तानी माँ-बाप की सोच कितनी संकुचित होती है कि उन्हें एक बेटा सिर्फ इसलिए चाहये जो बुढ़ापे की लाठी बन जाये। जब चार-छः का ज़माना था तब बात और थी एक-आध बच्चा अपने निखट्टूपन के कारण माँ-बाप के पास रह जाया करता था। और माँ-बाप उसमें बिना उसकी मर्ज़ी के श्रवण कुमार देखना शुरू कर देते थे। बाकी भाई-बहन दूर से श्रवण कुमार को राय दिया करते कि माँ-बाप की देखभाल कैसे करनी है। अमूमन ये निखट्टू घर का छोटा बेटा हुआ करता था। मशहूर शायर जनाब मुनव्वर राणा तो यहाँ तक कह गये -

किसी के हिस्से में मकां आया किसी के हिस्से दुकां आयी 
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में माँ  आयी

बहरहाल जब शर्मा जी के घर तीसरी बेटी का पदार्पण हो गया, तो पहले उनसे ज़्यादा चिन्ता उनके पडोसी-नाते-रिश्तेदारों को हुयी। तीन-तीन लड़कियों को कैसे निपटायेंगे। वो ज़माना और था, तब लोग प्रेम प्रदर्शन पीठ पीछे और ताने मुँह पर दिया करते थे। लोगों के उन्नत विचार सुन-सुन के शर्मा जी डिप्रेशन की हद तक दुःखी हो गये। यही प्लानिंग करने में लगे रहते कि कैसे तीन-तीन लड़कियों की परवरिश करेंगे। इससे भी ज़्यादा चिन्ता उन्हें उनके शादी-विवाह की होती। सोच-सोच के हर तरफ़ अँधेरा-अँधेरा दिखायी देता। लेकिन बिटिया की छट्ठी आते-आते में शर्माइन में गज़ब की हिम्मत आ गयी थी। षष्ठी पूजन उन्होने पूरे विधी-विधान के साथ किया। उन्होंने पण्डित जी से साफ-साफ कह दिया बेटी का जन्म भी पूरे धूम-धाम के साथ मनायेंगे। बेटी हो या बेटा माँ लिये दोनों बराबर हैं। उठो और सब इष्ट मित्र और रिश्तेदारों को बारहवें दिन पर होने वाले बेटी के नामकरण संस्कार के लिये आमंत्रित करके आओ। दमयन्ती का ऐसा स्वरुप पण्डित दीना नाथ को पहले कभी देखने को नहीं मिला था। फोन-मोबाइल का समय तो था नहीं। थोड़ा बहुत ना-नुकुर करके पण्डित सबको आमंत्रित करने निकल गये। ये बात अलग है कि जहाँ भी गये लोग उनसे अपनी सम्वेदनायें  व्यक्त करने से नहीं चूके। पंडिताइन ने अपनी बेटी के नामकरण संस्कार उसी हर्षोल्लास से मनाया जैसे पहली दो बेटियों का मनाया था। 

हिन्दुस्तान में बेटियाँ होने के कुछ फायदे भी हैं। यदि आपके पास एक अदद नौकरी है और उसमें ऊपरी आय की कुछ भी गुंजाइश है तो आपको खुलकर भ्रष्टाचार करने का लाइसेंस मिल जाता है। यहाँ अपनी आय से तो किसी का पेट भरता नहीं। मुंशी प्रेमचन्द के समय से लोग बहते झरने की तलाश में लगे रहते। माल-गोदाम में नौकरी करते हुये पण्डित दीना नाथ के पास इसकी पूरी सहूलियत थी। तीसरी बेटी के बाद वो कुछ विरक्त से हो गये थे। घर-परिवार में मन न लगता। उनका बस चलता तो वो दिन-रात गोदाम में ही पड़े रहते। माल जमा और निकासी पर उगाही फिक्स थी। ईमानदारी इतनी कि पाई-पाई का हिसाब होता, जो हिसाब से ऊपर से नीचे तक बँटता। अपनी इस ईमानदारी की धाक पण्डित जी ने ऊपर तक जमा रखी थी। दमयन्ती अपनी बेटियों में व्यस्त हो गयी। उसका उद्देश्य था उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाना, जो उसे नहीं मिल पायी थी, और बेटियों को अपने पैरों पर खड़ा करना। बेटियों ने भी उसे निराश नहीं किया।

शर्मा जी जितने सीनियर होते जा रहे थे, घर में मुनाफ़ा बढ़ता जा रहा था। बेटियों की परवरिश में पैसा कभी आड़े आया हो ऐसी स्थिति कभी नहीं आयी। कालांतर में तीनों बेटियाँ अपने-अपने पैरों पर खड़ी हो गयीं। शर्मा जी को सुयोग्य वर की तलाश में ज़्यादा घूमना भी नहीं पड़ा। लड़कियां स्वयं सम्पन्न और समृद्ध थीं इसलिये दहेज की जिस चिन्ता में शर्मा जी आकण्ठ भ्रष्टाचार में लिप्त रहे, वो धरा का धरा रह गया। विधि का विधान है समय के साथ शर्मा जी रिटायर हो गये। अब घर पर रहना मज़बूरी बन गया था। दिन-रात गोदाम के काम में व्यस्त रहने के कारण इष्ट-मित्र भी छिटक चुके थे। लेकिन वो नाते-रिश्तेदार ही क्या जो वक़्त-बेवक़्त आपको आपकी बेबसी याद दिलाने से बाज आ जायें। कभी-कभार अपना स्नेह दिखाने आ जाते। "कोई बेटा होता तो बुढ़ापे में ख्याल रखता।" " मैंने तो एक बेटे को इसीलिये दुकान खुलवा दी कि साथ रहेगा और बुढ़ापे में सेवा करेगा।" "आप लोगों का बुढ़ापा कैसे कटेगा कोई देखने वाला भी तो नहीं है।" लोगों ने इतनी सहानुभूति जताई कि शर्मा जी एक बार फिर से डीप डिप्रेशन में चले गये। उन्हें लगता कि काश मेरे भी एक बेटा होता जो बुढ़ापे की लाठी बनता। अभी तो हाथ पैर चल रहे हैं। कहीं कुछ हो गया तो कौन हमारी देखभाल करेगा। शर्माइन बहुत समझाती कि आप हिम्मत मत हारिये। लेकिन उनकी हिम्मत जवाब दे जाती। डिप्रेशन बढ़ता ही जा रहा था। तब दमयन्ती ने बड़ी बेटी प्रीति से अपनी परेशानी का ज़िक्र किया। 

वो अगले ही दिन अपने पति साथ घर आ गयी। मै आप लोगों को ऐसे कैसे छोड़ सकती हूँ। सामान बांधिये और चलिये मेरे साथ। बेटी के ससुराल में जा के रहना उन्हें किसी भी प्रकार अच्छा नहीं लग रहा था। लेकिन दामाद जी भी पीछे पड़ गये। अब ज़माना बदल गया है आप लोग भी कितनी पुरानी बातें कर रहे हैं। बेटे और दामाद में अब कोई अन्तर नहीं है। उनके बहुत समझाने पर पंडित और पण्डिताइन, प्रीति के घर चले गये। नाती-नातिनों के साथ रह कर न सिर्फ़ डिप्रेशन दूर हुआ बल्कि सही अर्थों में उनके दिन बहुर गये। जैसे उनके दिन बहुरे वैसे उनके दिन भी बहुर पायेंगे जिनको अपने बेटों पर कभी नाज़ हुआ करता था, थोड़ा डाउटफुल है। तीनों बेटियों ने ये निर्णय लिया कि साल के तीन-तीन महीने सब पापा-मम्मी को अपने-अपने पास रखेंगे चौथे क़्वार्टर में यदि उनकी इच्छा हो तो इलाहाबाद के अपने मकान की साफ़-सफ़ाई करवा आया करें। बेटियों के समूह के आगे किस दामाद की हिम्मत कि चूँ कर सके। आज शर्मा जी से सुखी शायद ही कोई हो। साल भर नये-नये स्थान का ससम्मान भ्रमण।और क्या चाहिये था इस बढ़ती उम्र में।  

लगभग साल भर पूरा करके शर्मा जी घर लौटे हैं। पास-पड़ोसी, नाते-रिश्तेदार, जिनको ताने न मार पाने के कारण अपच सी हो रही थी, मिलने पहुँच गये। सब उम्र के उसी दौर में थे। सबके पास बेटे-बहु होने का संतोष तो था लेकिन उतनी ख़ुशी नहीं थी जितनी पण्डित जी के चेहरे से छलकी पड़ रही थी। पंडित-पंडिताइन का प्रफुल्लित चेहरा देख कर वे लोग थोड़ा सदमे में आ गये। उन्होंने इस ख़ुशहाली का राज़ जानना चाहा तो पण्डित जी ने भी अपनी ख़ुशी छिपाने का प्रयास नहीं किया। किसी मजे हुये सेल्समैन की तरह बत्तीसी निकालते हुये बोले "भैया देखो, एक बहु के साथ एक बेटा हाथ से गया समझो, लेकिन एक बेटी के साथ एक दामाद फ्री। इसलिये बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ।"

-वाणभट्ट   

  

रविवार, 22 सितंबर 2019

ओल्ड होम

ओल्ड होम 

अम्मा-बाबू उसी दिन 
बन गये भगवान 
जिस दिन धरा पर 
हुआ मेरा पदार्पण

जन्मों भटकने के पश्चात 
मिला था मानव जीवन 
आप ही तो थे 
माध्यम  

निर्बोध शिशु की  
छोटी थी अभिलाषा  
 सामीप्य आपका
प्रेम और ममता 

जन्म लेते ही 
मिल गया विशाल ऋण 
जिससे होना है असम्भव 
उऋण 

समय के साथ शिशु 
बढ़ता गया प्रति दिन 
लग गया प्रयास में 
करने पूरे आपके स्वप्न 

शिशु के सुख छोटे थे 
वो था निर्लिप्त 
इस अवस्था में भी 
आप हैं आसक्त  

समय के साथ आप 
घटते गये 
घर-परिवार पालने में 
दुनिया से कटते गये 

अब जब आपके स्वप्न 
फड़फड़ा कर उड़ने को हैं तैयार 
आपको लगने लगा 
निवेश हो जायेगा बेकार 

कौन देखेगा वृद्ध अशक्त को   
दूध के ऋण याद दिलायेंगे 
तो उड़ते पंछी 
वापस आ जायेंगे 

आपकी आपेक्षायें बहुत बड़ी हैं 
कतिपय सम्भव नहीं उन्हें पूरा कर पाना 
आप चाहते हैं बच्चों का 
आँख, कान और घुटना बन जाना 

समय की आपा-धापी पहले भी थी 
अब भी है, कल और बढ़ेगी 
सब कुछ तो होगा 
किन्तु समय की कमी रहेगी 

आपका दिया इस जीवन में 
कैसे लौटा पाउँगा 
पीढ़ी का अन्तर 
कैसे पाटूंगा 

जो आपने दिया मुझे  
ये विश्वास दिलाता हूँ 
वो मै अपने बच्चों को 
लौटाता हूँ 

यही प्रकृति है 
जो व्यक्ति अपने पितरों से पाता है 
उन्हें नहीं 
अपने बच्चों को लौटता है 

आकाश में उड़ने से रोकने का 
अधिकार नहीं है किसी भगवान को 
उड़ने का सामर्थ्य दिया 
तो उड़ने भी दो 

मेरे बच्चों, मै मुक्त करता हूँ 
तुम्हें इस ऋण से
कभी भगवान बन के आये थे तुम भी 
मेरे जीवन में 

हम बराबर के भगवान् हैं  
और भगवान स्वार्थ से हैं परे
तुम उड़ो अपने आकाश में 
हम भी अपना आकाश बना लेंगे 

व्यस्त हो रहे जीवन में 
ये कटु सत्य अपनाना होगा 
बच्चों के पंखों को सबल करने 
हमें अपना ओल्ड होम बनाना होगा 


-वाणभट्ट 



रविवार, 21 जुलाई 2019

ब्रह्मा जी की खूँटी

ब्रह्मा जी की खूँटी

उसकी साँसें धीरे-धीरे कम होती जा रहीं थीं। नब्ज़ का भी पता नहीं लग रहा था। तभी उसे दुमची (टेल बोन) के अंतिम बिन्दु पर एक तीव्र प्रकाश का अनुभव हुआ जो ऊपर की ओर उठता चला आ रहा था। देखते ही देखते वो प्रकाश शरीर के उच्चतम शिखर तक पहुँच गया था। अन्तर में पूरा का पूरा शरीर दैदीप्यमान होकर चमक रहा था। उस ज्योति का अनुसरण करते करते उसकी आँखे भ्रूमध्य ऊपर कहीं जा कर अवस्थित हो गयी थीं। ब्रह्मकमल सामने था। वो पूर्णतः आकाश तत्व में विलीन हो गया था। उसका शरीर बोध समाप्त हो चुका था।

मेडिसिन में एम.डी., डॉ. दिनकर शर्मा को कानपुर आये हफ़्ता नहीं बीता होगा। नया शहर - नये लोग। जानने - समझने में  जीवन के कुछ साल और निकल जायेंगे। ट्रांस्फरेबल पोस्ट का यही एक फ़ायदा है। जगह बदल जाती है। हर स्थान पर एक नया जन्म। और वो भी पिछले जन्म (पोस्टिंग) के कर्म-अकर्म से निर्लिप्त। ये उनकी वृहद सरकारी सेवा की आखिरी पोस्टिंग थी। हर बार की तरह इस बार भी शुरुआत शहर के दर्शनीय स्थलों के भ्रमण से ही होनी थी।

किसी ने उन्हें ब्रह्मावर्त जाने के लिये बता दिया। बहुत ही पवित्र जगह है। बिठूर का ऐतिहासिक महत्त्व होने के साथ साथ पौराणिक महत्त्व भी है। रानी लक्ष्मीबाई का बाल्यकाल यहीं पर बीता था। स्वतंत्रता सेनानी नाना साहब और तात्याटोपे की ये कर्मस्थली भी रही है। सीता माता के भगवान राम द्वारा परित्याग के पश्चात बिठूर स्थित वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में लव-कुश का जन्म हुआ था। ध्रुव ने यहीं पर अपनी तपस्या से दैवीय तारे के रूप में चमकने का वरदान पाया था।

विज्ञान और चिकित्सा के परा-स्नातक होने के नाते शर्मा जी के धर्म-कर्म का ज्ञान बस वहीं तक सीमित था जितना एक पण्डित परिवार के परिवेश में बिन प्रयास के मिल जाता है। श्लोक-दोहे-चौपाइयाँ उन्हें कंठस्थ थे। लेकिन उसी तरह जैसे तोता रट तो लेता है लेकिन उसके अर्थ और भाव से अनजान रहता है। पढ़ाई के दौरान घर से दूर रहने के कारण उनका दृष्टिकोण दकियानूसी नहीं रह गया था। देश-विदेश की यात्राओं ने भी उनके ज्ञान चक्षुओं को और खोल दिया था। आस्था-आत्मा-परमात्मा से उनका ज़्यादा लेना-देना नहीं था। हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर परखने की आदत, बीमारी की हद तक उनमें प्रवेश कर चुकी थी। क्यों-कहाँ-कैसे किये बिना उन्हें संतोष न मिलता। बिठूर के बारे में भी उनका विचार था कि पत्नी शारदा देवी के साथ एक आउटिंग हो जायेगी और गंगा स्नान भी। जैसे इतनी जगह देखी हैं, ये भी सही। 

स्नान के पश्चात ब्रह्मावर्त घाट की सीढियाँ चढ़ते हुये उनका ध्यान छोटे से मन्दिर की ओर अनायास चला गया। लिखा था "ब्रह्मा जी की खूँटी"। उत्सुकता वश वो उस मन्दिर के पास पहुंच गये। मन्दिर में बैठे बच्चे टाइप के पुजारी ने बिना किसी भूमिका के कहना शुरू कर दिया - दर्शन कर लो। यहाँ तक आने के बाद यदि इसका दर्शन नहीं किया तो क्या लाभ। 

किसी भी तीर्थ स्थान या मन्दिर जाने पर ये फिलिंग हर पढ़े-लिखे इंसान में आती है कि धर्म के नाम पर बेवकूफ़ बना कर हर कोई पैसा वसूलना चाहता है। खूँटी पूरी तरह से फूलों से ढँकी हुयी थी। चूँकि पहली बार बिठूर आना हुआ था इसलिये शर्मा जी के लिये - ये क्या बला है - जानना ज़रूरी था। बीस का नोट उन्होंने बच्चे के सामने ही पुष्प के ऊपर रख दिये। उसने छोटी सी छड़ी से फूलों को एक ओर सरका दिया। बमुश्किल आधे इंच की चाँदी जड़ित एक खूँटी फूलों के नीचे से निकल आयी। उस पुजारी रूपी बच्चे ने रटे-रटाये शब्दों में उस खूँटी का महात्म्य बताना शुरू कर दिया।

यही वो जगह है जहाँ ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना करने से पूर्व 99 साल तक तपस्या की थी। तपस्या करके जब वो उठने लगे तो उनके दाहिने पैर की खड़ाऊँ इसी जगह धँस कर पाताल तक पहुँच गयी और उनके अनेक प्रयासों के बाद भी नहीं निकल पायी। ये जो चाँदी की परत में लिपटी आधे इन्च का खूँटी जैसी चीज़ दिखायी दे रही है, ये उसी खड़ाऊँ का अँगूठा है। ये खूँटी ही समस्त ब्रह्माण्ड का केन्द्र है। इसके दर्शन मात्र से आपकी सभी मनोकामनायें पूरी हो जायेंगी। 

चित्र : सौ. भास्कर.कॉम
जल्दी शादी के कुछ फ़ायदे भी होते हैं। शर्मा जी का विवाह तभी हो गया था जब वो बीएससी कर रहे थे। उसके बाद एमबीबीएस व एम.डी. की पढ़ाई उन्होंने मैरिड हॉस्टल से ही की। आज उनके दोनों बेटा-बेटी अपनी-अपनी शिक्षा लेकर विवाहोपरान्त यूएस में सेटल थे। पत्नी के साथ जीवन सकुशल व्यतीत हो रहा था। ऐसे में उनके पास माँगने के लिये कोई ख़ास मनोकामना नहीं बची थी। उन्होंने खूँटी को मस्तक नवाया और बढ़ लिये। मन ही मन वो मुस्कुरा रहे थे कि हमारे देश में आस्था के नाम पर किस तरह अंध-विश्वास फैलाया जाता है।  

जीवन अपनी रफ़्तार से चलता रहता है। डॉक्टर साहब तो हर जगह व्यस्त हो जाते अपने काम में लेकिन उनकी पत्नी शारदा के लिये समय काटना थोड़ा मुश्किल हो जाता। ऑफिसर्स कॉलोनी की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि कोई आपके ऊपर है या कोई आपके नीचे। हर किसी से खुल कर घुल-मिल भी नहीं पाते। ऐसे में आदमी कितना टीवी देखे। वैसे भी आधा जीवन तो व्यतीत ही हो चुका था। दिन पर दिन रोज-रोज उफ़ान मारने वाले शौक़ भी कम होते जा रहे थे। बगल के वर्मा जी और उनकी मिसेज़ हर सन्डे किसी सत्संग में जाया करते थे। मिसेज़ वर्मा थोड़ी सात्विक प्रवृत्ति की महिला थीं। इसलिये जब भी मिलती थीं तो शर्माइन से ध्यान-योग की बातें किया करतीं थीं। ये बातें शारदा जी की समझ से परे थीं। उनके लिए तो घर में स्थापित मंदिर को फूल-धूप दिखा देना, हनुमान चालीसा और सुन्दर काण्ड पढ़ लेना, आरती गा लेना ही अल्टीमेट पूजा थी। एक बार जब शर्मा जी टूर पर थे तो उन्हें वर्माइन के साथ उनके सत्संग जाने का मौका मिला। बेसिकली वो एक ध्यान केन्द्र था। जहाँ कोई चेला गुरु के उद्बोधन को पढता फिर सब लोग ईश ध्यान के प्रयास में लग जाते। ध्यान, आत्म-साक्षात्कार की दिशा में पहला सोपान माना जाता है। इस गहरे गूढ़ शब्द का मतलब शर्माइन को ज़्यादा तो समझ नहीं आया लेकिन स्थिर होकर ध्यान में बैठने का आनन्द अनिर्वचनीय था। यदा-कदा जब भी उन्हें मौका मिलता वो वर्मा परिवार के साथ हो लेतीं। लेकिन धीरे-धीरे वो इस ग्रुप की नियमित सदस्या बन गयीं।   

कभी-कभी अपने इस आनन्द का वर्णन वो पंडित जी से भी कर देतीं। शर्मा जी पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। पत्नी के आनन्द को टाइम-पास का तरीका मान कर हलके से उड़ा दिया। पढ़ने-लिखने के बाद लोगों को जबानी बातें समझ नहीं आतीं। कुछ भी लिख कर या छाप कर दे दीजिये, तो वो पढ़ डालेंगे। मानें शायद फिर भी नहीं, लेकिन उसकी समीक्षा जरूर करेंगे। शारदा देवी सतसंग में उपलब्ध लाइब्रेरी की पुस्तक/पत्रिकायें अक्सर घर ले आतीं। जिन्हें शर्मा जी भी कभी-कभार पलट लेते। हर खोज की जड़ क्यूरॉसिटी से शुरू होती है। शर्माइन ने शर्मा जी में जिज्ञासा तो जगा दी थी। एक दिन उन्होंने भी साथ चलने की इच्छा जता दी। 

नशा चाहे अफीम का हो या आध्यात्मिकता का, सर चढ़ के ही बोलता है। नया मुल्ला वैसे भी प्याज ज़्यादा खाता है। शर्मा जी ने ध्यान को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बना लिया। सुबह-शाम बिना ध्यान के उन्हें अधूरा सा लगता। अपने व्यस्त शेडयूल में भी जब मौका मिलता वो ध्यान के लिए समय निकालने लगे। अब उनके अध्ययन कक्ष में सिर्फ आश्रम की पुस्तकें ही होतीं। उन में दिये निर्देशों को आत्मसात करने में वो लगे रहते। उनकी दिनचर्या में आये परिवर्तन से पंडिताइन भी परेशान हो जातीं। उन्हें लगता कहीं ये घर-बार से विरक्त न हो जायें। लेकिन शर्मा जी के मन में ऐसा विचार शायद ही आया हो। दिन-रात जब भी मौका मिल जाये शर्मा जी अपनी आत्मसाक्षात्कार की पद्यति को आरम्भ कर देते। उनके गुरु का कहना था - जिस व्यक्ति को भगवान के होने पर भी संदेह है आत्मसाक्षात्कार की स्थिति में वो अपने ही भगवत स्वरुप के दर्शन करेगा। बस निरन्तर भगवान की प्रार्थना करते रहना चाहिये।     

रात तीन बजे उनकी निन्द्रा अचानक टूट गयी थी। अन्दर से ध्यान की तीव्र इच्छा हो रही थी। वो अपनी ध्यान की आसनी पर स्थिर हो बैठ गये। मानो आज बिना दर्शन के नहीं उठेंगे। उन्होंने गुरु की बतायी प्रक्रिया पर अपना ध्यान लगा दिया।  

धीरे-धीरे उनकी साँसें कम होने लगीं। नब्ज़ भी गिरने लगी। तभी उन्हें मेरुदंड के सबसे निचले हिस्से में एक लाल रंग का तीव्र प्रकाश दिखा जो निरन्तर ऊपर की ओर उठता चला आ रहा था। विभिन्न चक्र इंद्रधनुषी रंग के प्रकाश से दैदीप्यमान हो गये। उनके चक्षु सहस्रार पर स्थित तीक्ष्ण श्वेत प्रकाश का अनुसरण करते हुये ऊपर कूटस्थ में टिक गयी थी। पहली बार उन्हें पाँच पंखुड़ियों वाले ब्रह्मकमल के दर्शन हुये। शरीर का बोध एकदम समाप्त हो चुका था। उनका शरीर पूर्णतः आकाश तत्व के साथ एकाकार हो चुका था। समस्त ब्रह्मांड उनके चारों ओर विस्तारित होता दिखायी दे रहा था। वो पुनः अपने सभी चक्रों का निरिक्षण कर सकते थे। टेल बोन, जो बमुश्किल आधा इंच की रही होगी, से ही सभी चक्रों का उद्भव हुआ था। इस स्थिति में पता नहीं कहाँ से उनके अवचेतन मन में ब्रह्मा जी की खूँटी प्रकट हो गयी। बच्चा बोल रहा था - ये खूँटी ही ब्रह्माण्ड का केन्द्र है। हर व्यक्ति के पास ये खूँटी है, हर व्यक्ति सेंटर ऑफ़ यूनिवर्स है। जहाँ स्थिर हो कर बैठ गया, वहीं ब्रह्माण्ड का केन्द्र बन जायेगा। 

प्रातः होते ही उन्होंने शारदा देवी से कहा - चलो बिठूर चलते हैं। ब्रह्मा जी की खूँटी के दर्शन करने हैं। 

- वाणभट्ट 

रविवार, 30 जून 2019

ठीकरा

ठीकरा

यदि आप के पास समाधान नहीं है तो आप समस्या का हिस्सा हैं। लेकिन आज के युग में ये भी सच है कि यदि आपने किसी सही समस्या को चुन लिया और कस कर जकड़ लिया तो आपका जीवन तर गया समझिये। बाकी दुनिया के लिये आपने जिस समस्या को पैदा कर दिया वो उसी में उलझ के रह जायेगी। यदि आपको देश-दुनिया में आगे बढ़ना है और नाम कमाना है तो आप का काम है एक समस्या को आइडेंटिफाई करना। फिर अपने विचारों-लेखों-व्याख्यानों द्वारा उसके आयाम को इतना विस्तारित करना कि वो समस्या समस्त विश्व की समस्या बन जाये। यदि आप स्वयं समस्या बनाने की क्षमता न रखते हों तो बहुत से ऐसे ग्रूप्स हैं, जिनका काम ही है समस्या खड़ी करना। उनमें शामिल हो जाइये, आपका भव-सागर पार। हर व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य है, अपनी आजीविका की व्यवस्था करना। जब चिंता करना ही आजीविका का साधन बन जाये तो समस्या के समाधान में भला किसकी दिलचस्पी हो सकती है। बात चाहे ग्लोबल वार्मिंग की हो या क्लाइमेट चेंज की। एशिआ-अफ्रीका की बढ़ती जनसंख्या की हो या अतिवंचितों के अधिकार संरक्षण की। गंगा सफाई की हो या शहरों से निकलने वाले कचरे की। ये सब ऐसे मुद्दे हैं जो जग-जाहिर हैं। 

दर्द दो प्रकार के होते हैं - आम और खास। आम दर्द और ख़ास दर्द में बड़ा अंतर होता है। आम दर्द आपका अपना होता है, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ आपको दर्द देता है। जिसके लिये तथाकथित हमदर्द च-च-च करके आनन्दित हो लेते हैं। लेकिन यदि आप अपने दुःख का आयाम बड़ा करने में सफल हो गये तो समझ लीजिये आपने अपनी तरक्की का जैकपॉट हिट कर दिया है। आपकी श्वास समस्या आपकी अपनी समस्या हो सकती है लेकिन उसे वायु प्रदूषण-पर्यावरण से लिंक करके आप उस समस्या को क्षेत्रीय, राष्ट्रीय या वैश्विक बना सकते हैं। समस्या का दर्द इस कदर होना चाहिये कि वो आपकी शख़्सियत से चिपक जाये। लोग देखते ही समझ जायें कि अलां बन्दा वॉटर-सॉयल कंजर्वेशन मैन है या फलां ग्राउंड-वॉटर रिचार्ज के लिए तन-मन से समर्पित है। धन की आवश्यकता न होती तो शायद कोई समस्या भी न होती। दर्द का परिमाण इतना व्यापक होना चाहिये कि आप गर्व से कह सकें  - 

खंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम अमीर 
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है 

अमूमन ऐसा हर समस्या के साथ होता है। समस्या पर आप जितना ध्यान लगाते हैं वो समस्या उतनी ही बड़ी और विकराल होने लगती। समस्या जितनी बड़ी होगी नीति-नियन्ताओं का उतना ही अधिक ध्यान खींचेगी। ये एक अन्तहीन विशियस सर्किल की तरह है। वो समस्या कभी बड़ी नहीं हो सकती जिसका समाधान हो। यदि समस्या का समाधान हो गया तो बेरोज़गारी, जो अभी भी कम नहीं है, सारे रिकॉर्ड तोड़ डालेगी। समस्याओं पर चिन्ता करने से बड़ा कोई रोज़गार नहीं हो सकता। ज़िन्दगी बहुत बड़ी है। यदि समाधान निकाल लिया तो नयी समस्या पैदा करनी पड़ेगी। ऐक्सपर्टाइज़ हासिल करने में जब उम्र जाया हो गयी तो नयी समस्या भला हम क्यों खोजें। नये लोग भी अपनी रोजी-रोटी के लिये नयी समस्या की खोज करें या हमारे पिछलग्गू बन कर अपनी गुजर-बसर का इंतज़ाम करें। कोई आपकी विशेज्ञता को चुनौती न दे दे इसलिये कुछ आधे-अधूरे समाधान आपकी पोटली में होने चाहिये। लेकिन उतना ही जो कुछ आशा की किरण तो दिखाते हों लेकिन पूर्ण समाधान नहीं। यदि आप थोड़ी बहुत पूजा करते हैं तो अपने पूजाघर में ऐसे महापुरुषों के चित्र ज़रूर लगाइये जो ताउम्र समस्या को कलेजे से लगाये, सीने पर चिपकाये जीते रहे और जिस दिन रिटायर हुये अपना सारा रिव्यू ऑफ़ लिटरेचर अलमारियों में भरा छोड़ कर निकल लिये। और तुर्रा ये कि आने वाली नस्लों के लिये जैसे कोई धरोहर छोड़ के जा रहे हों। इनके उत्तराधिकारी समझ नहीं पा रहे हैं उस कबाड़ का करें क्या। इनके इलाज़ करने के तरीक़े का आलम कुछ इस प्रकार रहा -

मरीज़-ए -इश्क़ पर रहमत ख़ुदा की 
मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की 

इस धरती पर एक जीव ऐसा भी है जिसे इंजीनियर कहा जाता है। जब से फ़र्जी कॉलेजों की भरमार हो गयी है हर सड़क चलता व्यक्ति इंजीनियर का मज़ाक उड़ा सकता है। लेकिन यदि दुनिया में कहीं भी कोई समस्या है तो उस समस्या के समाधान के अन्त में अमूमन कहीं न कहीं कोई न कोई टेक्निकल या इन्जीनियर बन्दा खड़ा मिलेगा। दुर्योग से पेट्रीडिश समाधानों के शोध तो हाई रेटिंग इम्पैक्ट फैक्टर वाले जर्नल्स में छप जाते हैं, लार्ज स्केल पर समस्या का निराकरण करने वाले कामों को शायद ही कभी अख़बारों की हेडलाइन नसीब होती हो। प्रॉब्लम खोजुओं का काम है समस्या को उठाना और उठाये रहना। जब कि इन्जीनियर सोल्यूशन ओरिएंटेड होता है। कारण समझ कर उसका निवारण करने के प्रयास में सदैव तत्पर। वो भी सिर्फ़ प्रयोगशाला स्तर पर नहीं। गौर से देखा जाये तो गौर करने वाली बात ये है कि वर्षों से समस्यायें वही की वही हैं, समस्या के समाधान खोजने के तरीक़े आधुनिक होते जा रहे हैं। आधुनिक भी इसलिए हो रहे हैं कि विकसित देशों ने शोध के लिये बहुत से प्रायोगिक उपकरणों का विकास कर लिया है। उनसे टक्कर लेने के लिये वैसे ही उपकरण चाहिये नहीं तो विदेशी शोध पत्रिकाओं में शोधपत्र कैसे छपेगा। जो काम पहले सिर्फ माइक्रोस्कोप से हो लिये उनके लिये अब इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की ज़रूरत पड़ती है। कभी लोग हरकतों से बेटे का बाप पहचान लेते थे अब उसके लिये डीएनए फ़िंगर प्रिन्टिंग कराने की सुविधा है। इन बातों का लब्बोलबाब ये है कि आज भी हमें विकसित देशों का बाज़ार बनना स्वीकार्य है। चाहे वो उन्नत यन्त्र-उपकरण का इम्पोर्ट हो या अपने शोध का विदेशी शोध पत्रिकाओं में प्रकाशन (अक्सर मुद्रा खर्च करके भी)। 

एलार्म की आवाज़ साथ सुबह होने से पहले उठ जाना तापस की आदत सी बन गयी थी। ब्रश करते हुये प्रत्यक्ष रूप से दर्पण में अपनी भाव-भंगिमायें निहार रहा था। लेकिन वास्तविकता में वो अल्ट्राथिन सुपर सॉफ्ट ब्रिसल्स वाले टूथब्रश बनाने की मशीन के बारे में सोच रहा था। इंजीनियर होने के नाते उसकी दिलचस्पी मानव निर्मित हर उस चीज़ में थी जिसने मानव के जीवन को आसान बना दिया हो। आविष्कारों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिसे देखने के लिये सिर्फ़ अपनी दृष्टि को 360 डिग्री घुमाना होगा। एक बार नज़र घुमा कर देखिये, जितनी भी चीज़ दिखेंगी उसमें किसी न किसी इंजीनियर का योगदान अवश्य होगा। यदि सभी चीज़ें ठीक काम कर रही हैं तो भी उसके पीछे कोई न कोई इंजीनियर खड़ा नज़र आयेगा। जहाँ बाकि सब समस्याओं का सलीब उठाये घूम रहे हों वहाँ इंजीनियर ही एक ऐसा प्राणी है जो समस्या से  ज़्यादा समाधान की बात करता है। बॉक्स के अन्दर-बाहर दोनों बातें सोच सकता है।  

कहने को तो तापस एक शोध संस्थान में अभियांत्रिकी वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत था, लेकिन उसकी योग्यता का अधिकतम उपयोग सिविल-इलेक्ट्रिकल-मेकैनिकल कार्यों के लिये किया जा रहा था। आउट ऑफ़ बॉक्स थिंकिंग, जिसका ज्ञान आज का हर मैनेजर दिन में चार बार देता है, तापस में कूट-कूट के भरा था। हर चिरंजीवी समस्या के लिये उसके पास कुछ न कुछ समाधान भी रहता था, लेकिन जब लोगों की समाधान से ज़्यादा समस्या फायदेमन्द हो तो उनके लिये उसका उपयोग सिर्फ़ खिड़की-दरवाज़ा-पाइप-सीवर-लाइट-फैन-एसी रिपेयर कराने से ज़्यादा नहीं था। 

जब तक नौ मन तेल नहीं होता राधाओं की परफॉर्मेंस बिगड़ जाती है। वातानुकूलित कमरों में ही उच्च गुणवत्ता के शोध संभव हैं। कम्प्यूटर और इंटरनेट आज इन्फॉर्मेशन का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है। दैवयोग से अधिकतर आधुनिक उपकरणों को बिजली की आवश्यकता होती है। जिसे मुहैया कराने के लिये बिजली बोर्ड की सप्लाई थी और बैकअप लिये जनरेटर भी लगा था। बिजली एक ऐसा तेल था जो अनेक प्रयोजनों के बाद भी कभी न कभी साथ छोड़ सकता है। जैसे इंजन को ठण्डा लिये कूलेंट की दरकार होती है, वैसे ही ग्लोबल वार्मिंग के ज़माने में दिमाग़ को ठण्डा रखने के लिये एसी की रिक्वॉयरमेंट होती है। दिमाग़ के लिये रूरी है इसका ठण्डा रहना। नहीं तो गर्मी निकालने के लिये लोग जो करेंगे उससे उनके सहकर्मियों लिये नयी समस्या खड़ी हो सकती है। इंजीनियर की ज़रूरत सभी को है लेकिन एक सपोर्टिंग रोल में। एक सहयोगी की तरह नहीं, एक तुरन्त हुक़्म मानने वाले जिन्न की तरह। पे-कमीशनों से समृद्धि इस कदर बढ़ गयी हो कि लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि पैसा म्युचुअल फंड में डालें या जीपीएफ में या कोई ज़मीन ही खरीद डालें। इस चक्कर में पूरा घर गैजेट्स से भर चुका है। पुनः इनको मेंटेन करने के लिये टेक्निकल आवश्यकतायें होंगी। जो लोग जीवनदायक डॉक्टरों की इज़्ज़त नहीं कर सकता वो भला इंजीनियर को क्या भाव देगा। डॉक्टर-इंजीनियर से कर्तव्य निर्वहन की उम्मीद रखना गलत नहीं है। लेकिन गुज़ारिश कुछ अदद इज़्ज़त की है। डॉक्टर को तो इज़्ज़त फिर भी मिल जाती है क्योंकि बीमारियों और दवाइयों के नाम बड़े कठिन और टेढ़े होते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान का हर बन्दा पैदायशी इंजीनियर होता है। सड़क-पुल-बिजली-मकान हर चीज़ पर इंजीनियर को राय दे सकता है। कुछ लोग तो एक मकान बनवा कर ही सिविल इंजीनियर से ज़्यादा जान गये। कुछ कार की सर्विसिंग करा कर ही ऑटो एक्सपर्ट बन गये। लेकिन यकीन मानिये यदि इंजीनियर एक दिन की हड़ताल कर दे तो स्थिति डॉक्टरों की हड़ताल से भी बदतर हो जाये। पैसों से सुख-सुविधाओं के जितने टंटे इकठ्ठा कर रखे हैं सब घंटा हो जायेंगे।  

अपनी पीएचडी के विषय को लेकर तापस अपने एक सीनियर शर्मा जी से मिला। इंजीनियर बन्दा सोच भी क्या सकता है। एक समस्या और उस समस्या के समाधान हेतु मशीन बनाने की बात थी। सीनियर ने जता दिया कि उसके बाल धूप की वजह से नहीं झड़े हैं, कुछ तजुर्बा भी हासिल किया है। वे बोले - "देख भई मशीन बनायेगा तो दो बातें होंगी। या मशीन चलेगी या नहीं चलेगी। चल गयी तो ठीक, लेकिन यदि नहीं चली तो तेरी पीएचडी लटक जायेगी। कुछ ऐसी प्रॉब्लम उठाओ जो सार्वभौमिक टाइप की हो। सारी दुनिया उसी समस्या पर लगी पड़ी हो। तुम भी उसी पर लग जाओ। वो सारे मिल कर इतने सालों से कद्दू में तीर नहीं मार पाये तो तुम क्या ख़ाक तीर मारोगे। बस पीएचडी हो जायेगी। शोध के लिये तो ज़िन्दगी पड़ी है। ग्लोबल वार्मिंग मेरा एक पसंदीदा मुद्दा है। जिसका समाधान एक न एक दिन शायद प्रकृति से ही निकल कर आयेगा। जब तक ये मुद्दा ज़िन्दा रहेगा हमारे शोधपत्र 10-12 रेटिंग के जरनल में छपते रहेंगे, पीएचडियाँ होती रहेंगी और इस मिशन में जुटे लोग वैश्विक स्तर पर चिंता की अभिव्यक्ति के लिये देश-दुनिया के खूबसूरत शहरों के खूबसूरत रिसॉर्ट्स में सेमीनार और सिम्पोजियाज़ के बाद ख़ुशनुमा शाम के लिये मिलते-जुलते रहेंगे। तुम्हें भी कुछ इस प्रकार की समस्या लेनी चाहिये। थोड़ी मैथेमैटिकल मॉडलिंग लगा देना, काम हो गया। अर्जुन ने जिस तरह मछली की आँख पर निशाना साधा था, तुम्हारा ध्यान बस पीएचडी पर होना चाहिये। बाकि होइहैं वही जो राम रची राखा।" आखिरी वाक्य ने वैज्ञानिक सोच पर आध्यात्मिकता का जामा चढ़ा दिया। विज्ञान चाहे कहीं पहुँच जाये भगवान के बिना यहाँ कुछ नहीं हो सकता। भला बताइये ऐसी महान सोच रखने वाले महापुरुषों के प्रति कोई ख़ुद को साष्टांग दण्डवत करने से कैसे रोक सकता है। 

इस विषय पर शोध करते-करते तापस को इतना तो पता चल गया था कि ये मानव निर्मित समस्या है और इसका निदान भी इंसान के हाथ में है। ग्लोबली चिन्ता करना छोड़ कर कुछ-कुछ लोकली एक्ट करना पड़ेगा और सबको करना पड़ेगा। ईटिंग-मीटिंग-चीटिंग से कुछ होने वाला नहीं। क्लाइमेट चेंज पर आप अनुसन्धान कर सकते हैं, पेपर छाप सकते हैं लेकिन समाधान के लिये हक़ीक़त की जमीन पर कुछ करना पड़ेगा। पेड़ लगाना, वॉटर कन्ज़र्वेशन, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, ग्रांउड वॉटर रिचार्ज, हरनेसिंग रिवर वॉटर आदि सोल्यूशन सबको मालूम हैं लेकिन अमल में लाने को हर कोई तैयार नहीं है। यदि आपने पानी समुचित संरक्षण कर लिया तो समझिये ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ आपने एक बड़ी जंग जीत ली। पानी की उपलब्धता से प्रकति के कोप को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। कम से कम जो लोग इस विषय के प्रति सजग हैं उन्हें तो अनुकरणीय उदाहरण पेश करना चाहिये। 

अनुभवी सीनियर शर्मा जी ने अक्सर मुलाकातें हो जाया करती थीं। एक दिन उन्होंने सूचित किया - भाई अपना रिटायरमेंट अब नज़दीक है, सो जितनी कॉन्फ्रेंस ग्लोबल वार्मिंग या क्लाइमेट चेंज पर होनी हैं उनमें मेरी सहभागिता ज़रूरी है। बाद में अपना योगदान देने का पुनीत अवसर मिले न मिले। तुम्हें तो अभी बहुत नौकरी करनी है तब तक शायद मौसम अपना सायकिल पूरा करके वापस लौट आये। हो सकता है एक बार फिर आइस-एज आ जाये बस पृथ्वी के अक्ष में हल्का टिल्ट चाहिये। वैसे अपने प्रयास जारी रखने में कोई बुराई नहीं है। कुछ पेपर आ जायेंगे तो प्रमोशन में फायदा ही देंगे। हाल ही में मुझे एक प्रोजेक्ट मिल गया है। कुछ ऐसी प्रजातियों का विकास करेंगे जिन पर ग्लोबल वार्मिंग का असर न हो। चाहो तो तुम भी इसमें शामिल हो जाओ। 

तापस को ये भली भाँति मालूम है कि यदि इन्वेस्टमेंट पानी और भूमि के संरक्षण पर किया जाये तो ग्लोबल वार्मिंग से तो नहीं लेकिन उसके प्रभाव से जरूर बचा जा सकता है। बहुत से प्रैक्टिकल सोल्यूशंस हैं। कुछ तथाकथित रूप से पिछड़े देशों ने बिजली की खपत कम करने और डे लाइट का अधिक उपयोग करने के लिये ऑफिस का टाइम ही बदल कर सुबह सात बजे का कर दिया। चाहे कोई कितनी भी उन्नत प्रजाति विकसित कर ले, बिना जल और मृदा प्रबन्धन के उनका भविष्य व्यक्तिगत उपलब्धियों तक ही सीमित है। लेकिन एकांगी सोच ने पूरे शोध की दिशा ही पलट रखी है। हर कोई अपनी-अपनी विशेषज्ञता लिये घूम रहा है। एक मेज़ पर बैठने का न तो किस के पास समय है, न मौका, न दस्तूर। सबको अपनी-अपनी पड़ी है। तुर्रा ये है कि बढ़ती आबादी को खाना खिलाना है, वो भी कम पैसे में। साथ ही किसान की आय को भी बढ़ाना है। बिना माँगे राय देना भी इंजीनियरों की एक बीमारी ही है। तापस ने राय दी कि सर आपका ये काम अत्यंत महत्वपूर्ण है इसलिये आप अपना एक इंडिपेंडेंट पावर बैकअप रखिये। ताकि बिजली की समस्या न हो। स्टेट बोर्ड की बिजली या सेंट्रल जनरेटर पर कुछ हद तक तो निर्भर किया जा सकता है लेकिन डबल अश्योर के लिये अपनी लैब के लिये भी एक जनरेटर होना चाहिये। 

तापस के पास समस्या को गहरे देखने की क्षमता थी। उसका ध्यान समस्या से ज़्यादा समाधान की ओर लगा रहता था। उसके अधिकारियों, जिनका मुख्य ध्येय बजट को हिल्ले लगाना होता था, के लिये ये एक बड़ी समस्या थी। उन्हें राय देने वाले इंजीनियर कतई पसंद नहीं। इंजीनियर का उपयोग वहीं तक ठीक है जब तक वो हुक़्म बजाता रहे। वर्ना ये फील्ड इतनी विस्तृत और अप्प्लाईड है कि किसी भी कारण से किसी को फेल सिद्ध किया जा सकता है। शोध बिजली की कमी से बाधित हो सकता है, मुख्य वक्ता के अभिभाषण वक़्त ऑडिटोरियम का पीए सिस्टम दग़ा दे सकता है। ऐसे कोई भी कारक काफी हैं। हर कोई समाधान की खोज में लगा है बगैर इंजीनियर के। ख़ास बात ये है कि शोध की समस्याओं का समाधान इंजीनियरिंग के बिना असंभव है, लेकिन इतिहास गवाह है, इंजीनियर कभी भी किसी भी मौलिक शोध का हिस्सा नहीं होता है। उसका काम है बस बाकी शोधकर्ताओं के लिए नौ मन तेल का इंतज़ाम करना।  

शर्मा जी ने मुखर होते हुये कहा - बेटा तापस कुछ सुधर जाओ। जब तीस साल में कुछ नहीं निकला तो अब तीन साल में क्या ख़ाक निकलेगा। अभी का टारगेट है प्रोजेक्ट का बजट कन्ज़्यूम करना। कुछ टूर-वूर करने हैं। देश-दुनिया में क्या हो रहा है इसकी जानकारी लेते-लेते तीन साल भी निकले समझो। यदि सहयोगियों की सहायता से कुछ शोध हो गया तो दो बातें होंगी। या तो कुछ कंक्रीट निकल के आयेगा या नहीं निकलेगा। निकल गया तो ठीक। नहीं निकला तो कुछ न कुछ तो होना चाहिये ठीकरा  फोड़ने के लिये। लैब के जेनरेटर के बारे में सोचना भी मत। बिजली से अच्छा कोई ठीकरा है भला हमारे प्रदेश में?

- वाणभट्ट  

रविवार, 19 मई 2019

साँड़

साँड़

अगल-बगल में सब बेतहाशा दौड़े चले जा रहे थे। उसने भी आव देखा न ताव भाग लिया। और सबको पछाड़ते हुये वो लक्ष्य तक सबसे पहले पहुँच गया। दौड़ तो ऐसे लगा रहे थे जैसे कोई लड्डू मिलने वाला हो। लेकिन कैद हो कर रह गया। अब पछता रहा है कि वो लोग ज़्यादा स्मार्ट थे जो रेस में धीरे-धीरे दौड़ रहे थे। लेकिन जब दौड़ लगी हो तो आम और अमरुद में यही फ़र्क रह जाता है। आम दौड़ लेता है, ख़ामख़्वाह, और अमरुद किनारे खड़ा हो कर रेस का आनन्द लेता है। एक अनार हो और तलबग़ार ज़्यादा तो खामख्वाह दौड़ना ज़रूरी भी हो जाता है और मजबूरी भी। इस प्रकार पण्डित राम नरेश ने अपनी माँ के गर्भ में प्रवेश किया। 

जब पण्डिताइन ने गुड न्यूज़ दी तो पहले से ही तीन बच्चों के पिता बन चुके पण्डित बाँके बिहारी सोच में डूब गये। यहाँ वो अपने आवा-गमन से मुक्ति के चक्कर में लगे पड़े हैं और बच्चे हैं कि एक के बाद एक लाइन लगाये खड़े हैं। लेकिन नियति के खेल में वो किसी प्रकार का व्यवधान भी नहीं डालना चाहते थे। आने वाले को भला कोई रोक पाया है। चलो एक बार फिर से डॉक्टर के चक्कर शुरू। पहले भी वो ये सब देख चुके थे। डॉक्टरनी ने कुछ झिड़कते हुये कहा - "फिर आ गये। आजकल ज़माना एक बच्चे पर पर शिफ्ट कर गया है और आप हैं कि रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। अपना नहीं तो अपनी पत्नी का ही ख्याल कर लीजिये। चार-चार बच्चों को सम्हालना कोई मज़ाक नहीं है। एनी वे मुबारक़ हो आप एक बार फिर बाप बनने वाले हैं।" पंडित जी भला क्या बोलते। गलती तो हो गयी। गर्भ में राम नरेश ये जान कर कुछ दुःख ज़रूर हुआ होगा कि उसे माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध  इस धरा पर अवतरित होना होगा। लेकिन मन को सान्त्वना देने के अलावा वो कर भी क्या सकता था। जो हुआ सो हुआ हुआ। 

पिछले चार-पाँच सालों में ये लेडी डॉक्टर पण्डित और पण्डिताइन के लिये फैमिली डॉक्टर जैसी बन चुकी थी। लेकिन डॉक्टर के लिये उसका पेशेन्ट मात्र एक पेशेन्ट ही होता है। चाहे वो उससे कितना ही प्यार से बात करे लेकिन उसके लिये पेशेन्ट एक सब्जेक्ट से अधिक नहीं होता। उसको अपनी श्रमसाध्य चिकित्सकीय ज्ञान को कहीं न कहीं तो उड़ेलना ही है।और सोने पर सुहागा ये कि इसके लिये सब्जेक्ट मोटी फ़ीस देने को तैयार बैठा है। दवाई कम्पनियाँ-पैथोलॉजी लैब्स-रेडिओलॉजी से मिलने वाला तगड़ा कमीशन इन डॉक्टरों को समाज सेवा करते रहने के लिये निरन्तर प्रेरित करता रहता है। डॉक्टरनी ने आनन -फानन में अपने पैड पर कुछ धारा प्रवाह लिखना शुरू कर दिया। लिखना समाप्त करते हुये कहा मैंने कुछ दवाइयाँ और टेस्ट लिख दिये हैं। राजेश्वरी को ये दवाइयाँ बराबर चलनी हैं। अगली बार आना तो अल्ट्रासाउंड और बाकि टेस्ट कराते लाना। अपने धीर-गंभीर चेहरे पर बिनाका स्माइल चेपते हुये बोली - "बाँके जी दिस इज़ माई बेबी। आपको राजेश्वरी का पूरा ख्याल रखना होगा। बाय राजेश्वरी विश यू ऑल थे बेस्ट, टेक केयर।" फ़ीस पहले ही रिसेप्शन पर जमा कराने के अपने लाभ हैं। एक तो अपनी बारी के इन्तज़ार में पेशेन्ट का सब्र जवाब नहीं देता और दिखाने के बाद उसका कीमती समय व्यर्थ नहीं होता। 

डॉक्टर के कम्पाउंड में स्थित दवाइयों का जब भरी-भरकम बिल मिला तो पण्डित जी को आभास हो गया कि ये बच्चा बाकि बच्चों से मँहगा पड़ने वाला है। पहली बार उन्हें लगा कि डॉक्टरों ने प्रजनन की एक समान्य प्रक्रिया, प्रेगनेंसी को भी बिमारी बना डाला है। कई तरह के इंजेक्शंस, मल्टीविटामिन कैप्सूलों के पत्ते और सिरप जब पण्डिताइन को मिले तो उन्हें कुछ ख़ुशी सी महसूस हुयी। चलो परमेश्वर के पापा कुछ महीने तो उसका ख्याल ठीक से रखेंगे। बच्चे इधर-उधर से आ-आ कर उन दवाइयों के चमकते फॉइल्स से खेलना चाह रहे थे। इसलिये दवाइयों को सुरक्षित रखना ज़्यादा ज़रूरी था। पति-पत्नी बिना नागा जाँच के डॉक्टरनी दीदी के यहाँ जाते रहे। पण्डित जी ने राजेश्वरी के रख-रखाव की पूरी जिम्मेदारी को सहजता से वहन कर लिया था। क्या घर क्या बाहर सब उन्ही ने सम्हाल लिया। बाहर तो कोई भी सम्हाल ले लेकिन तीन बच्चों और एक प्रेगनेंट पत्नी को सम्हालना कोई हंसी खेल तो था नहीं। लेकिन पण्डित जी इस कार्य का निर्वहन भी बखूबी करने लगे। डॉक्टरनी ने भी पूरा ठेका ले रखा था। कब अल्ट्रासाउंड होना है, कब दवाइयों और इंजेक्शन का डोज़ बढ़ाना है। दिन नज़दीक आते जा रहे थे और पण्डित जी की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। अन्तिम तीन महीनों में जब कम्प्लीट बेड रेस्ट बताया तो पण्डिताइन को खुद लगने लगा कि वो बीमार हो गयी हैं।

चाक़ू-कैंची की आवाज़ सुन कर राम नरेश का मन बाहर निकलने का नहीं हो रहा था जबकि वो इस घडी का महीनों से इंतज़ार कर रहा था। डॉक्टरनी ने पण्डित जी को बता दिया था कि पोथा-पत्रा बिचरवा लीजिये बच्चा तो सिज़ेरियन ही होगा इसलिये एकदम मुहूर्त के हिसाब से डिलीवरी करा देंगे। अमूमन इंसान के पास चॉइस सिर्फ़ हाँ और ना की ही होती है लेकिन डॉक्टर के सामने तो ना की गुंजाईश भी नहीं बचती। मुहूर्त के अनुसार तमाम अनिच्छा के बावज़ूद राम नरेश को बाहर आना पड़ा। आते ही पता चला बच्चा अंडरवेट है इसलिये इन्क्यूबेटर में रखना है थोड़ा बहुत पीलिया के लक्षण भी हैं इसलिये आर्टिफिशियल लाइट एक्सपोज़र भी दिया जायेगा। बच्चे को पता नहीं कौन-कौन से इंजेक्शन लगा दिए गये। राजेश्वरी जब राम नरेश को गोद में लेकर अस्पताल से बाहर निकलीं तब तक बांके बिहारी 15-20 हज़ार के लपेटे में आ चुके थे। टीकाकरण की एक पूरी फ़ेहरिश्त पकड़ा दी गयी थी जिसमें डिटेल था कि कब-कब कौन सा टीका कितनी बार उस छोटे से बच्चे को लगना है। और एक भी टीका छूटा तो ये देश और समाज के प्रति विश्वासघात से कम नहीं माना जायेगा। एक जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिये माँ-बाप का ज़िम्मेदार होना ज़रूरी है। ये बात अलग है कि माँ-बाप ज़िम्मेदार ही होते तो चौथे की नौबत ही क्यों आती। 

इस तरह राम नरेश का धरती पर पदार्पण तो हो गया। भगवान या अल्लाह या जीसस को ज़रूरत से ज़्यादा मानने वाले देश में हर किसी को ये भरम पालने का अधिकार है कि उनके अवतरण का कोई न कोई विशिष्ठ प्रयोजन पहले ही नियत कर रखा है। जिंदगी के पचास बसन्त गुजरने के बाद पण्डित राम नरेश को ये आभास हो चुका है कि और कोई सार्थक प्रयोजन प्रभु ने आपके लिए भले ही न सोच रखा हो लेकिन जाने-अनजाने आपके जीवन का एक उद्देश्य बन गया है - देश के डॉक्टरों की दुकान चलाना। ये डॉक्टर अंग्रेजी से लेकर देशी तक कुछ भी हो सकता है। फर्क बस इतना है कि यदि बीमारी का नाम अंग्रेजी में हो तो जेब कुछ ज़्यादा ढीली करनी पड़ सकती है, डॉक्टर के लिए भी और दवाई के लिए भी। वर्ना ऐसे डॉक्टरों की कमी भी नहीं है जिन्होंने किचन में रखे मसालों (जड़ी-बूटियों) से कैंसर तक का इलाज़ कर डाला है। अपने माता-पिता, श्रीमति राजेश्वरी और श्री बांके बिहारी, के इलाज़ के चक्कर में पण्डित राम नरेश का पूरे शहर के हर विधा में नामी-गिरामी (कुछ कम नामी-गिरामी भी) डॉक्टरों से सबाका पड़ चुका था। माता-पिता जी को विभाग की ओर से हर प्रकार के मेडिकल खर्च के रिम्बरस्मेंट सुविधा सुनिश्चित थी। इसलिये उन्होंने कभी सरदर्द के ठीक होने का इंतज़ार नहीं किया। जब भी दर्द उठा, सर उठाया और डॉक्टर के सामने खड़े हो गये। अब इतना हाइली क़्वालिफ़ाइड डॉक्टर इलाज न करे तो लानत है उसके एनाटॉमी-फिजिओलॉजी-मेडिसिन के ज्ञान पर। ये बात अलग है कि अक्सर दवाइयों के डोज़ को देख कर सरदर्द अपने आप भाग जाया करता था। डॉक्टर को भी ये भान था कि पैसा इनकी जेब में वापस आ जायेगा इसलिये उसने भी कभी फ़ीस लेने और दवाई लिखने में कोई कोताही नहीं की। 

इलाज़ कराते-कराते पंडित राम नरेश को भी ये ज्ञात हो गया था कि आज सर में दर्द होगा तो कल पेट में, फिर आँख में, फिर कान में, फिर दाँत में, फिर नाक में, फिर गले में, फिर हार्ट में। और फिर कुछ और ऐसे ही फिरों के बाद फिर सर में दर्द होना शुरू हो जायेगा। पूरा एक चक्र है जो छः महीने में पूरा हो जाता है। लेकिन सब डॉक्टरों के लिये ये नियमित ग्राहक थे। यदि छः महीनों में किसी के यहाँ न पहुंचो तो उनका चिन्तित हो जाना लाज़मी था। जैसे मोहल्ले में परचून की दूकान वाले को पूरा पता होता है कि पण्डित जी के यहाँ आटा पन्द्रह दिन चलता है। सोलहवां दिन आते न आते उसका इन्तज़ार शुरू हो जाता है। यदि गलती से आटा अट्ठारह दिन चल गया तो वो पूछ लेता है पंडित जी कहीं बाहर गए थे क्या? कहने का आशय सिर्फ इतना है कि डॉक्टरों के लिये ये फैमिली मेंबर की तरह हो गए थे। और तो और दवाई की दुकान वाला भी डिस्काउंट के साथ दवाई घर तक पहुँचा जाता। लेकिन पण्डित राम नरेश को सदैव ये संशय रहा कि इतने नामी-गिरामी डॉक्टर्स बीमारी का इलाज़ कर रहे हैं या बुढ़ापे का। बुजुर्गों के मेडिकल पैरामीटर्स वयस्कों से मैच करें ये शायद संभव कभी न हो। लेकिन मामला पेरेंट्स का था इसलिये वो कुछ कह भी न पाते। पेरेंट्स को उनके नालायक होने का जो संशय बचा था वो बना रहना ज़रूरी था।  

दिन ऐसे ही हंसी-ख़ुशी मज़े में कट रहे थे। जब पण्डित राम नरेश के मोहल्ले में एक साँड़ ने प्रवेश किया। चूँकि उनके मोहल्ले में अधिकांश लोगों ने घर क्या फुटपाथ तक के एक-एक इंच हिस्से को सीमेंट-कंक्रीट से कवर कर रखा था, इसलिये उस साँड़ को दिन में दरकार होती थी एक छाँव की। पण्डित जी ने घर के बाहर फुटपाथ पर कुछ पेड़ लगा रखे थे इसलिये वो साँड़ जब घूम-फिर के थक जाता तो उन स्थापित पेड़ों की छाया में बैठ जाता। निराश्रित गायों को कुछ लोग रोटी भले डाल देते हों लेकिन साँड़ को कभी किसी ने रोटी डालते न देखा था। साँड़ की चाल-ढाल बहुत ही गरिमामय थी। उसे किसी बात की जल्दी नहीं होती थी। उसे मालूम था कि पूरा दिन पड़ा है टहलने को। जल्दी या तेज़ चलने से कुछ नहीं होने वाला। समय अपने हिसाब से ही चलेगा। इसलिये जब मर्ज़ी होती चलने लगता और जब मर्ज़ी हो बैठ जाता। अक्सर वो इन्हीं के घर के सामने बैठता।  निर्विकार भाव, न सुक्खम न दुःक्खम, उसके चेहरे पर सदैव व्याप्त रहता। इसी लिये मानव जीवन में लोग भीषण से भीषण योग साधना करने को तत्पर रहते हैं। उसे देख कर ऐसा लगता मानो कोई तपस्वी निरन्तर अपनी साधना में लीन हो। पण्डित राम नरेश को साँड़  की ये निर्लिप्त पर्सनालिटी प्रेरणा देती।

पण्डित राम नरेश के ऑफिस में भी वार्षिक हेल्थ चेकअप कम्पलसरी कर दिया गया था। कम्पनी जब अपने अधिकारी पर प्रति माह इतने रुपये इन्वेस्ट कर रही है तो उनको भी तो ये मालूम होना चाहिए कि ये घोडा दाँव लगाने लायक बचा भी है या नहीं। देश-विदेश की ट्रेनिंग और सुविधाएं देने के बाद यदि बन्दा समय से पहले टाँय बोल गया तो सारा इन्वेस्टमेंट बेकार। बहरहाल टेस्ट के नाम से पण्डित जी के शरीर से इतना खून निकाल लिया गया कि पण्डित जी कुछ दिनों तक खुद को साइक्लॉजिकली कमज़ोर समझने को विवश हो गये। अल्ट्रासाउण्ड से उन-उन बीमारियों को चुन-चुन के खोजा गया जिनकी पण्डित जी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। जैसे मैकेनिक के पास जाइये तो वो नयी से नयी कार में भी डिफेक्ट निकालने का माद्दा रखता है। वैसे ही मेडिकल टेस्ट की कोई रिपोर्ट सही आ जायेगी इसकी गुंजाईश कम ही रहती है। क्या जवान क्या बूढ़े, कोई भी इम्प्लॉयी 'ए' ग्रेड में नहीं पास हो सका। जिन्हें 'बी' ग्रेड मिला था वो 'डी ' और 'ई'  ग्रेड वालों को ऐसे देख रहे थे जैसे उन्होंने इसके लिये कोई कॉम्पटीटिव एग्जाम दिया हो। 

कंसल्टेशन के दिन डॉक्टर के सामने जाने में पण्डित जी को उसी तरह घबराहट हो रही थी जैसी किसी एग्जाम के रिज़ल्ट के निकलते समय हुआ करती थी। रैगिंग के दौरान मुस्कान काटने की भी एक ट्रेनिंग हुआ करती थी। पण्डित जी को अब समझ आया कि ये ट्रेनिंग क्यों दी जाती थी। यदि आप मुस्कुरा कर कोई गंभीर बात बोलेंगे तो लोग उसे हल्के में लेंगे। केबिन के अन्दर डॉक्टर ने जब सीरियसली बोलना शुरू किया तो एक पल के लिये पण्डित जी को लगा कि ये वचन स्वयं यमराज जी के श्रीमुख से फूट रहे हैं। "देखिये राम नरेश जी आपके पिता जी को हाइपरटेंशन था, डायबिटीज़ थी इसलिये आपको भी ये सब होने की सम्भावनायें हैं। आपका ब्लडप्रेशर भी हायर साइड में है। इसलिये आपको अभी से प्रिकॉशन्स लेने पड़ेंगे। ब्लडप्रेशर की एक दवाई आपको लिखनी ही पड़ेगी।" पण्डित जी को मालूम था कि डॉक्टरों के चक्कर व्यर्थ नहीं जाते। वो इलाज़ ऐसे ही शुरू करेंगे। आज एक गोली फिर धीरे-धीरे पन्द्रह कैप्सूल। उन्होंने पेरेन्ट्स के इलाज़ का अच्छा-खासा तजुर्बा हो रखा था। जब डॉक्टर ने बताया कि उनकी रिपोर्ट 'बी' है, तो पण्डित जी के चेहरे पर एक मुस्कान सी तैर गयी। डॉक्टर बुरा मान गया। उसे लगा राम नरेश उसकी बात को संजीदगी से नहीं ले रहा है। "देखिये आप पचास के ऊपर हैं। थोड़ा हाइपरटेंसिव भी। उम्र के साथ नसें कमज़ोर हो जाती हैं। जैसे गार्डेन वाला रबर का पाइप स्टिफ हो जाता है वैसा ही धमनियों के साथ भी होता है। प्रेशर बढ़ गया तो कौन सी नस कहाँ से फटेगी पता भी नहीं चलेगा।" डॉक्टर ने कुछ दवाइयाँ लिख कर पर्चा पण्डित जी को थमा दिया। 

पण्डित जी बालकनी में बैठे थे जब उन्हें पेड़ के नीचे साँड़ के बैठे होने की आहट हुयी। उन्होंने सोचा इस साँड़ ने भी अपनी माँ के गर्भ तक पहुँचने के लिये तेज दौड़ लगायी होगी। इसका और इसकी माँ के इलाज़ के लिये पता नहीं कोई डॉक्टर था भी या नहीं। इसके भी कोई टीका लगा या नहीं। दिन भर चलते-चलते इसको भी दर्द होता होगा। न कोई बाम या न कोई एनासिन। किसी को तो इसकी भूख की चिन्ता भी नहीं। न कोई ठाँव न कोई ठौर। यहाँ डॉक्टर आदमी का इलाज़ कर-कर के परेशान हो रखे हैं। उन्हें ये भी पता नहीं कि बीमारी का इलाज़ कर रहे हैं या उम्र का। कोई ये नहीं कहता कि बाल जो झड़ गये हैं वो उम्र का तकाज़ा है, वो नया उगाने के नुस्ख़े बताने में व्यस्त हैं। पाइप स्टिफ भी होगा और फटेगा भी, लेकिन पाइप की उम्र के बाद। यहाँ इलाज़ कराने के लिये पैसा है, ख्याल करने के लिए परिवार में सदस्य हैं, तो डॉक्टर्स का प्रोफ़ेशन फल-फूल रहा है। इस साँड़ के न तो आगे कोई है न पीछे। न उसके पास पैसा है इलाज़ के लिये। यदि साँड़ को बोलने का सौभाग्य भगवान एकाएक दे दे तो यकीन मानिये उसका दर्द बयां करने को लिए शब्द कम पड़ जायें। 

पण्डित राम नरेश बालकनी से उठे और फ्रिज से ब्रेड का पूरा पैकेट लेकर नीचे उतर आये। शायद ये पहली बार होगा जब किसी ने किसी लावारिस साँड़ को रोटी डाली होगी। 

-वाणभट्ट 


रविवार, 21 अप्रैल 2019

बेचारा

बेचारा

जब से चारा चोरी का घोटाला सामने आया है यकीन मानिये दुनिया से यकीन उठ सा गया है। चारा चोर अब बेचारे से बने घूम रहे हैं। गोया घोटाले तो हर विभाग में वर्षों से होते रहे हैं और होते रहेंगे। इसके पहले तो किसी को सजा मिली नहीं। ये विपक्षी सरकार क्या बनी हमको टारगेट करके फँसा दिया गया। ये अन्याय  पराकाष्ठा है। अब तो तभी दोषमुक्ति मिलेगी जब कोई लंगड़ी-लूली सरकार सत्ता में आयेगी। प्रायश्चित करना तो अपनी फितरत में नहीं है। मुझे दण्डित करना है तो जाओ उन सबको पकड़ के लाओ जिन्होंने अब से पहले इस भ्रष्टाचार की परिपाटी को सिंचित और पोषित किया। यदि वो छुट्टे घूम रहे हैं या उहलोक गमन कर चुके हैं तो थोड़ा सब्र मेरे लिये भी रख सकते हैं। 

जब चारे का ज़िक्र हो ही गया है तो ये बताना भी ज़रूरी है कि पूरे देश कि अर्थव्यवस्था तो बेचारे लोगों पर ही टिकी है। सरकारों को टैक्स चाहिये ताकि बेचारों को रोटी-कपडा-मकान मिल सके। ये बात अलग है कि देश के अन्तिम बेचारे की फ़िक्र में सरकारी महकमों के लोग दिन-दूनी रात चौगुनी तेज़ी से फल भी रहे हैं और फूल भी। ये फूल फ्लावर वाला फूल नहीं है।  ये फूल वो फूल है जो बेल्ट के बाहर लटकते पेटों से झलकता है। कुछ लोग उसे तोंद कहने की गुस्ताख़ी भी कर देते हैं। दरअसल देश के बेचारों की सेवा में ये तन-मन से इस कदर लगे हुये हैं कि अपनी सुध-बुध ही नहीं रहती। धन तो बरसता ही रहता है। सेवा करोगे तो मेवा मिलेगा ये शाश्वत नियम है। जब देश सेवा का संकल्प ले लिया और उसके लिये एक ऑल इण्डिया इम्तहान पास कर कुर्सी पर कब्ज़ा कर लिया तो अब दस्तूर भी है उस पर बैठे रहने का। इस प्रॉसेस में अपने लिये समय कहाँ मिलता है वर्ना हम भी नब्बे साल के मिल्खा सिंह की तरह कुलाँचे मार रहे होते। इससे महान त्याग कोई हो सकता है भला। 

जरा सा गौर कीजिये तो साफ दिखायी देता है कि देश में हर कोई शिक्षा सिर्फ इसलिये पाना चाहता है ताकि वो देश और देशवासियों की सेवा कर सके। कामों की कमी तो कहीं नहीं है लेकिन हमें नौकरी करनी है। वो भी सरकारी तभी हम जन-जन की सेवा कर पायेंगे अन्यथा कोई अम्बानी-अडानी हमारी योग्यता का नाज़ायज़ लाभ उठा के अमीर बन जायेगा। अब जिन्हें देश की चिंता नहीं हो, जिन्हें पैसे की ज़्यादा भूख हो वो टाटा-बिरला के लिये काम करे, हम तो इतना रगड़-घिस के जो डिग्री लिये हैं वो पैसा कमाने के लिये थोड़ी न है। हमें सेवा का अवसर देना सरकार का कर्तव्य है और हमारा अधिकार। हमें सरकारी नौकरी मिले तभी हम अपने और देश के दरिद्दर दूर कर पायेंगे। यूंकि गौर करने वाली बात ये है कि जिन्हें दूसरों के दरिद्दर दूर करने हैं पहले वो अपने दरिद्दर दूर करने पर आमादा हैं। ये बात अलग है कि अपने दरिद्दर दूर करते-करते अपनी भावी सात पुश्तों की चिन्ता करना भी आवश्यक हो जाता है। अपने भाई-बन्धु का भला कर भी दिया तो वो इस जन्म उस एहसान को तो उतार नहीं सकते। तो फिर अपनी अगली पीढ़ी के बारे में कुछ करने में क्या बुराई है।

देश सेवा का ऐसा ज्वर हर दिशा में देखा जा सकता है। चाहे वो शिक्षा हो, अभियांत्रिकी हो, स्वास्थ्य हो, राजनीति हो या कृषि। चूँकि मै कृषि से जुड़ा हुआ हूँ तो मै देखता हूँ यहाँ समाज और देश सेवा की अपरिमित सम्भावनायें हैं। 60 प्रतिशत लोग मिल कर देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में मात्र 15 प्रतिशत का योगदान कर पाते हैं। देश में स्माल और मार्जिनल (लघु और सीमान्त) किसानों की संख्या लगभग 85% है जिनके हिस्से खेती योग्य भूमि का मात्र 45% भाग ही आता है। स्थिति और चिंताजनक हो जाती है जब पता चलता है कि 85% कृषक परिवार कृषि आय का मात्र 9% ही अर्जित कर पाते हैं जबकि बाकी 15% के हिस्से 91% आय आती है। ऐसे में देश के लघु और सीमान्त किसानों की चिंता करना सभी समाज और देश प्रेमियों का परम कर्तव्य बन जाता है। चूँकि यही वो लोग हैं जिनकी चिन्ता नेता चुनाव आते ही और अफसर चुनाव जाते ही करनी शुरू कर देते हैं। विश्व में भी बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय संस्थायें सिर्फ़ अफ्रीका और एशिया के लघु सीमान्त किसानों की समस्याओं का निदान और उनकी आय में वृद्धि के लिये वर्षों से कृतसंकल्प हैं। इस पुनीत कार्य में उन्होंने देश-दुनिया के कितने ही कोने-अतरों में न जाने कितने सेमीनार-सिम्पोजिया कर डाले। ये बात उन बेचारे कृषकों को शायद ही पता चल सके। बेचारा शब्द किसी को कह दो तो उसे खुद अपने ऊपर दीनता की फिलिंग आने लगती है। लेकिन हर वह शख़्श बेचारा है जिसके चारे की चिन्ता दूसरे करने लगें। बेचारा इसलिये भी कि उन्हें नहीं मालूम कि उनके उत्थान की ख्वाहिश लिये कितने लोग दिल-औ -जान से वर्षों से लगे हुये अपनी-अपनी रोटियाँ (टू बी मोर करेक्ट, पकवान) तोड़ रहे हैं। 

समस्या ये नहीं है कि लघु और सीमान्त किसानों की सेवा में समर्पित लोगों ने उनकी समस्याओं के समाधान हेतु प्रयासों में कोई कसर रख छोड़ी हो। समस्या ये है कि कोई पूरे परिदृश्य पर फोकस नहीं करता या करना चाहता। सब विषय वस्तु विशेषज्ञ (सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट) अपने-अपने हिसाब से समाधान खोजने और उसे प्रचारित करने में लगे हैं। सक्सेस स्टोरीज़ (सफलता गाथाओं) की बाढ़ आ रखी है। उसकी आड़ में हर कोई अपनी सफलता की गाथा लिख रहा है। कोई ऐसा काम जो पेपर या पेटेंट में परिवर्तित न हो वो आपके किसी काम का नहीं। दूसरों के उत्थान का बीड़ा उठाने वाले यदि अपना ही उत्थान न कर पाये तो जीवन व्यर्थ गया समझो। और सबसे बड़ी बात ये है कि यह बीमारी सार्वभौमिक  है। जो व्यक्ति या देश जितना अधिक संपन्न या विकसित है, उसे दुनिया के साधनविहीन और विपन्न लोगों की उतनी ही अधिक चिंता है। कोई उन सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट्स को बताये कि दस लाख को सौ लाख बनाना आसान है लेकिन दस रुपये को सौ रुपया बनाना नामुमकिन। एक या दो हेक्टेयर से कम खेत से अनाज उगा कर के चार लोगों का परिवार वैसे ही पल सकता है जैसे पल रहा है। एक तरफ तो बीज-खाद-कीटनाशक आदि कंपनियों ने किसान को उपभोक्ता बना के रख छोड़ा है तो दूसरी तरफ़ किसान प्रसंस्करण कंपनियों के लिये सस्ते उत्पाद का माध्यम बन गया है। ग़ौर करने वाली बात ये है कि सभी का फायदा किसान के किसान बने रहने में निहित है। यदि किसान वाकई सम्पन्न हो गये तो इन सबके मुनाफ़े का क्या होगा। इसलिये किसान का किसान बने रहना ज़रूरी है और उनकी चिन्ता का स्वांग भी उतना ही ज़रूरी है

आजकल एक नया ट्रेन्ड प्रचलन में है समस्या को हाइलाइट करो और पैसा पाओ। बहुत सी देसी और अन्तर्देशी संस्थायें हैं जो समस्या के समाधान पर पूँजी लगाने के लिये उद्धत हैं। समस्या जितनी व्यापक होगी उतना बड़ा नेटवर्क और उतना ही बड़ा निवेश। समाधान तो वहीं से निकलेगा जहाँ से समस्या। अब तक सारा फोकस उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने पर ही लगा हुआ था। लेकिन ये समझने में बहुत देर लग गयी कि उत्पादन दुगना कर दिया तो मुनाफ़ा आधा। पूंजीवादी व्यवस्था कमज़ोर के लिये नहीं होती। यदि किसान सिर्फ़ भण्डारण की क्षमता विकसित कर ले तो बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ उनके इशारे पर नाचती नज़र आयें। लेकिन लघु और सीमांत किसान के पास न तो इतना उत्पादन है न ही इतनी क्षमता। एक तरीक़ा ये भी है की कृषि कार्य में उतने ही लोग लगें जितना उनका सकल घरेलू उत्पाद में योगदान है। इस हिसाब से यदि सिर्फ 15% जनसँख्या यदि खेती करें तो खेती भी उद्योग बन सकता है। आज बीज से लेकर मशीन तक तकनीकों की कोई कमी नहीं है लेकिन किसानों के हित में सफलता गाथा लिखने के लिये छोटी-छोई सफलताओं को विस्तार देने की आवश्यकता है, जो शायद व्यावहारिक शोध और अभियांत्रिकी के सहयोग के बिना संभव नहीं है। लेकिन हमारी शोध की दिशा और उनकी फ़ंडिंग मौलिक शोध तक सीमित हो कर रह गयी है। इसरो की सतत सफलता ये दर्शाती है कि दुनिया लैब के बाहर है जो आप का इन्तज़ार कर रही है। जिसका लाभ समस्त देश और दुनिया को होना चाहिये।  

देर से ही सही वैल्यू चेन की बात शुरू होना एक खुशखबरी से कम नहीं है। ग्रीन रिवोल्यूशन (हरित क्रांति) में उन्नत बीज की उपलब्धता के अलावा अनेक कारकों जैसे सिंचाई की सुविधा, खाद-कीटनाशक का प्रयोग, संपन्न किसान, सरकार द्वारा क्रय,भण्डारण और सार्वजानिक वितरण प्रणाली का भी अमूल्य योगदान था। जब उत्पादन थाली तक पहुँचा तब हरित क्रांति कम्प्लीट हुयी। लेकिन हम बीज पकड़ कर बैठ गये। दुग्ध क्रांति में भी पूरी वैल्यू चेन विकसित की गयी। कोई भैंस विकसित करने लग जाता तो शायद दुग्ध उत्पादन तो बढ़ जाता लेकिन क्रांति न हो पाती। शहर के हर गली-कोने पर अण्डों के ठेले एक अघोषित क्रांति की ओर इशारा कर रहे हैं। वैल्यू चेन एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोशिश होती है कि उत्पादक से उपभोक्ता तक की सभी कड़ियों के लिये विन-विन स्थिति हो। पूरी वैल्यू चेन में सबसे मजबूत कड़ी सबसे कमज़ोर कड़ी ही होती है। फ़ूड वैल्यू चेन में किसान ही सबसे कमज़ोर कड़ी बनता है। जबकि सारी चेन किसान के उत्पादन के बलबूते फलती-फूलती है। चेन की अन्य कड़ियों की ये नैतिक और आर्थिक मज़बूरी होनी चाहिये कि सबसे कमज़ोर कड़ी को मज़बूत करें। सब अपने-अपने चारे यानि मुनाफ़े का कुछ हिस्सा कमज़ोर कड़ी को मज़बूत करने में लगायें ताकि कोई भी किसान बेचारा न रह जाये। और उसका मूल्य बस एक वोट भर बन के न रह जाये। 

- वाणभट्ट