मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

संवेदनशीलता

संवेदनशीलता और भावुकता पर पिछले कुछ दिनों में बहुत कुछ कहा जा चुका है। जो भी उच्च पदों को सुशोभित कर रहे हैं उन्हें संवेदनशील अवश्य होना चाहिये। भावुकता तो संवेदनशीलता का प्रकट रूप है। यदि राजा निस्वार्थ भाव से प्रजा की सेवा करना अपना धर्म समझता हो तो संभव है उससे ज़्यादा दीन-हीन सेवक की कल्पना कर पाना असम्भव हो। राजाओं के अत्याचार और कुशासन से प्रजा को मुक्त करने के लिये प्रजातन्त्र का मॉडल प्रचलित हुआ। प्रजातन्त्र की अवधारणा बहुत ही सीधी और सपाट थी। सरकार जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिये। लेकिन मूलतः बदला तो सिर्फ राजयोग का स्वरुप। पहले सिंहासन खानदानी विरासत थी, अब येन-केन-प्रकारेण सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की होड़। विनम्रता, समाज-सेवा, देशप्रेम, सदाचार, सुशासन, गरीबी-उन्मूलन, सर्वधर्म-समभाव आदि जन-भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला राजनेता जनता के द्वारा चुनने के बाद ख़ुद सरकार बन जाता है। मतगणना किसी व्यक्ति की सामाजिक स्वीकार्यता का प्रमाण तो हो सकती है, लेकिन उसके समाज के प्रति सेवा के सन्कल्प का द्योतक नहीं। कुर्सी मिलने के बाद अमूमन नेता उनसे ही दूर हो जाता है जिन्होंने उसे चुना है। चूँकि नेतागिरी अपने-आप में एक फुलटाइम जॉब है, और जिसने नेता बनने की ठान ही ली है तो उसके पास पढ़ने-पढ़ाने के लिए समय बच जाये ऐसा बिरले ही होता है। अब सरकार चलाने के लिये हर चीज़ के बारे में विस्तृत जानकारी होनी चाहिये। जिस देश में चाकरी करने को आमादा पढ़े-लिखे लोग बहुतायत से उपलब्ध हों वहाँ पढ़ाई करना समय की बरबादी है। इतनी देर में तो काफी लोगों से जनसम्पर्क हो जायेगा, कुछ वोट पक्के हो जायेंगे। सरकार चलाने के लिये तमाम पद बनाए गये और उन पर पढ़े-लिखे लोगों को कारिन्दा रख लिया। जो अच्छा हुआ वो सरकार का किया और जो बुरा वो कारिंदों का। पढ़े-लिखे बेरोज़गार, सरकारी रोज़गार पाने के बाद जल्दी ही ये गुमान पाल लेते हैं कि वो ही सरकार हैं और शीघ्र ही राजरोग से ग्रसित हो जाते हैं। पद पर विराजने के बाद भावुकता और सम्वेदनशीलता की तिलांजलि दिए बिना राजयोग के कुर्सी प्रदत्त अधिकारों का आनन्द ले पाना संभव नहीं है। अक्सर तथाकथित सक्षम-समर्थ लोग इन मानवीय गुणों को व्यक्ति की व्यक्तिगत दुर्बलता मान लेते हैं। 

ये पीड़ा हर उस व्यक्ति की है, जो देश को बुलंदियों पर देखना चाहता हो लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में खुद को असहाय पाता हो। मुकदमों का निरन्तर बढते जाना न्यायपालिका को ही कटघरे में खड़ा कर रहा है। न्यायपालिका धन-बल के आगे बेबस नज़र आती है। बिना दांत और नाख़ून के शेर का शिकार कोई भी कर सकता है। कुछ-कुछ वैसा ही हाल है। अपराधी प्रवृत्ति के लोग अपनी जेब में कानून रखते हैं। उन्हें सजा दिलवा पाने की प्रक्रिया इतनी जटिल और लम्बी है कि अंतिम निर्णय से पहले ही पीड़ित व्यक्ति हताश और निराश हो जाता है। अक़्सर कानून की पेंचीदगी का लाभ उठा कर अपराधी मुक्त भी हो जाता है। न्याय कम या अधिक फ़ीस वाले वकीलों के अनुसार बदल जाए तो न्याय कहाँ रहा? और इस व्यवस्था पर विश्वास कर पाना कहाँ तक न्यायोचित है। दिनोदिन बढ़ते मुकदमों के कारण आज न्यायालयों और न्यायाधीशों की कमी महसूस की जाने लगी है। लेकिन समय से मुकदमों के निस्तारण के लिये न्यायधीशों की कमी ही एक मात्र कारण नहीं है। आवश्यकता इस बात पर ध्यान देने की है कि मुकदमों की संख्या में भारी इज़ाफ़े की वजह क्या है। न्याय की आवश्यकता वहीं पड़ती है जहाँ अन्याय हुआ हो। अन्याय बढ़ा है इसलिए मुक़दमों की संख्या बढ़ी है। अन्याय करने वाले अधिकांशतः सक्षम-समर्थ-शक्तिशाली लोग होते हैं। आम आदमी भी अन्याय को अपने सब्र भर सहने के बाद ही कोर्ट-कचहरी के विकल्प को आजमाता है। कोई भी व्यक्ति इन चक्करों से दूर ही रहना चाहता है। इसमें समय-धन-ऊर्जा सभी की हानि है। कुछ लोगों को इसकी ख़ानदानी लत हो सकती है। अमूमन पीड़ित व्यक्ति न्याय के लिये अपनी क्षमता और सामर्थ्य के सारे अवसरों के चुक जाने के बाद न्यायालय की शरण में आता है। इतिहास गवाह है कि सीधे-सच्चे-ईमानदार लोगों का जीवन भ्रष्टाचार-अन्याय-अराजकता से लड़ते बीता है। मुग़लों और अंग्रेज़ों के कार्यकाल में भी कारिंदों ने पूरे राजसी ठाठ का जीवन जिया है। अन्याय और अत्याचार समर्थ लोगों का शगल है।शिक्षण और शिक्षा के विकास के साथ ही लोगों में, देश के प्रति कर्तव्य बोध भले ही न विकसित हुआ हो, लेकिन अधिकार-बोध अवश्य बढ़ा है।

अन्याय और अत्याचार किसी भी देश या देशकाल में कोई नयी या अनोखी घटना नहीं है। इससे बचने के लिये लोगों ने धर्म का छद्म सहारा भी ले कर देखा। कभी लोगों ने भरोसा किया - 'निर्बल के बल राम'। कबीर साहब जी ने भी सशक्तों को समझाने की कोशिश की कि - 


निर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।
मरी खाल की सांस से, लोह भसम हो जाय।


इन बातों से ये पता चलता है कि अन्याय-अत्याचार की बीमारी युगों पुरानी है और सदैव दीन-दुर्बल लोग ही इससे पीड़ित रहे। धर्म की शरण में भी उन्हें ही जाना पड़ता था। और वो सारा जीवन इसी उम्मीद में बिता देते थे कि भगवान के रजिस्टर में कर्मों का लेखा दर्ज़ हो रहा है। समय आने पर अन्यायी-आततायी का हिसाब होगा। और इस नहीं तो अगले जन्मों में सत्य और न्याय की स्थापना होगी। पोएटिक जस्टिस। इस विश्वास को ही जीवन का सम्बल बना के बहुत लोग इस भवसागर को तर गये। समय के साथ वैज्ञानिक सोच और समझ विकसित हुयी। लोगों को लगा ये शक्तिशाली लोग धर्म-धन-बल का दुरुपयोग करके बाकि लोगों को नारकीय जीवन जीने को विवश कर देते हैं। आज ज़िन्दगी भी फ़ास्ट फ़ूड की तरह हो गयी है। सब्र का फैक्टर गायब है। इसी जीवन में सबको सब कुछ चाहिये। अगले जन्म की कोई क्यों सोचे। सोते हुये लोगों को दिन-रात जगाने का प्रयत्न ही कुछ लोगों का पूर्णकालिक व्यवसाय बन गया है। इस प्रक्रिया में माल भी कमा लिया तो हर्ज़ क्या है। हम नहीं करेंगे तो दूसरे उनका शोषण कर डालेंगे तो फिर हम ही ये नेक काम क्यों न करें। शोषित-पीड़ित लोगों को न्याय दिलाने में कितनी सरकारें आईं और चली गईं। जिन्हें न्यायपालिका से उम्मीद थी वो तारीखों के चक्कर में पड़ गये, और जिन्हें नहीं थी वो बाबाओं के। हर किसी के जीवन का एक मक़सद तो होना ही चाहिये। इन दोनों ही चक्करों में घर-जमीन-जायदाद का बिक जाना कोई अजूबा नहीं है। न्याय सिद्धांततः जितना सरल है उसका व्याकरण उतना ही कठिन। विधि की मोटी-मोटी किताबों में न्याय का कहीं ग़ुम हो जाना बड़ी बात नहीं लगती। ये बात समझ से परे है कि बड़े और छोटे वकील के होने से न्याय बदल कैसे सकता है। पैसे वाले और ग़रीब के न्याय में अंतर क्यों। आम आदमी सही होकर भी पैसे के अभाव में जेल में जीवन काट दे और अमरुद आदमी गुनाह करके भी बेल पर बाहर खुली हवा का मज़ा लूटे।

वकील और जजों की संख्या बढ़ाना शायद समस्या का समाधान नहीं है। समाधान है सक्षम और सशक्त लोगों को अन्याय करने से रोकना। कार्यपालिका को अधिक संवेदनशील और ज़िम्मेदार बनाने से आम इन्सान के असंतोष में भी कमी अवश्य आयेगी। लचर कानून-व्यवस्था बढ़ते हुये मुकदमों के लिए कुछ हद तक ज़िम्मेदार है। एक व्यक्ति पडोसी की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेता है। न्यायपालिका की भूमिका तो बहुत बाद में आती है। उससे जुड़े सारे विभागों और अफसरों से निराश होने के बाद ही कोई न्यायालय का द्वार खटखटाता है। सरकारी नौकरी में तो और फजीहत है। एक भ्रष्ट अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारी का प्रमोशन रोक देता है और तुर्रा ये कि हम सरकार हैं। जाओ कोर्ट, मेरी लड़ाई का खर्च तो विभाग वहन करेगा। चार पेशी में पतलून सरक जायेगी। पुलिस एफआईआर लिखने में कोताही करती है, तफ्तीश में ढिलाई बरतती है, और बलात्कारी चौड़ा हो के घूमता है। या तो पीड़ित आत्महत्या कर ले या न्यायालय की शरण में जाये। क़ानून अपने हाथ में लेने का माद्दा उसमें होता तो शायद अन्यायी-आततायी लोगों में कुछ खौफ होता। गुंडे-मवालियों की संख्या में निश्चय कमी आती। दुबई में एक मित्र ज्वैलरी खरीद रहे थे। नमाज़ का समय हो गया था। दुकानदार ने कहा - आप लोग रुकिये मैं नमाज़ पढ़ के आता हूँ। मित्र ने कौतुहल से पूछा - यदि मैं कुछ सामान पार कर दूँ तो। दूकानदार मुस्कराया, बोला - कर के देख लीजिये। और वो नमाज़ पढ़ने चला गया। उसे मालूम है कि चोर को २४ घण्टे में सज़ा मिल जायेगी। धर्म-भीरु समाज में कभी लोगों को डर था कि भगवान देख रहा है। आज सीसीटीवी फुटेज को बड़े आराम से डॉक्टर्ड बता कर दसियों साल मुकदमें में निकले जा सकते हैं। न्याय प्रणाली सम्भवतः भ्रष्टाचारियों-अन्यायियों में वो ख़ौफ़ पैदा करने में अक्षम रही है कि सक्षम-शक्तिशाली अन्याय करने से पहले दस बार सोचे की इसका अंजाम क्या होगा। ये समय किसी दूसरे में दोष खोजने का नहीं है।  ये समय है आत्मनिरीक्षण का। कम से कम हम स्वयं किसी पर अन्याय ना करें। व्यक्तिगत आकांक्षाओं के कारण यदि न्याय का साथ न दे सकें तो कम से कम अन्यायी का तिरस्कार तो करें। समय है कार्यपालिका को और जवाबदेह बनने की ताकि अन्याय न हो और यदाकदा अन्जाने में अन्याय हो भी जाए तो निष्पक्ष न्याय एक मिसाल बने, नज़ीर बने। इसके बिना अगर मुकदमें बढ़ते जाएँ तो यक़ीन मानिये दुनिया के सारे जज और सारी अदालतें मिल कर भी निरन्तर बढ़ते लम्बित मुकदमों को निपटा पायेंगी संभव नहीं है।        

ये सब लिखना शायद बहुत आसान है और कर पाना मुश्किल। किन्तु किसी उच्चपदस्थ व्यक्ति के आंसुओं ने देश को झकझोरा तो। ऐसे संवेदनशील और भावुक हृदय को हृदय से प्रणाम। 

- वाणभट्ट 

रविवार, 17 अप्रैल 2016

आध्यात्मिकता

उन्हें एकाएक लगने लगा कि अब उन्हें आध्यात्मिक हो जाना चाहिये। उम्र पचास पार कर चुकी थी। ब्लॅड प्रेशर और डॉयबिटीज की दस्तक सुनाई देने लगी थी। दारु-मुर्गा-अंडा डॉक्टर ने मना कर दिया। एक दौर वो भी था जब वो शाकाहार को घासाहार का पर्याय मानते थे। मुश्किल से मिला मानव जीवन व्यर्थ न चला जाये इसलिये हर चीज़ जिसे तथाकथित संस्कारी लोग रिकमेंड करते थे, उन्होंने रिजेक्ट करना श्रेयस्कर समझा। व्यायाम-योग-ध्यान को बीमारी का इलाज मानने से उन्हें कोई परहेज़ न था। पूजा-पाठ उनके लिये 'हारे को हरि नाम' कहावत को चरितार्थ करता। इस मानव जीवन की यही विडम्बना है कि जब जवानी चढ़ रही होती है तो लगता है बुढ़ापा तो सिर्फ दूसरों को आना है। भगवान द्वारा प्रदत्त सभी इन्दिर्यों में ज़ुबान का बहुत महत्त्व है। ये जो न कराये वो कम। स्वाद का मजा तो ये लेती है और नतीजा बाकि शरीर को भुगतना पड़ता है। करे कोई और भरे कोई। वर्मा जी को जब डॉक्टर ने पहली बार चेताया था तब उन्हें लगा वो खामख्वाह डरा रहा है। लेकिन अब शरीर ही बोलने लगा तो मौका भी बन गया और दस्तूर भी। छत्तीस चूहे खा के जब बिलैया हज जा सकती है तो उनके लिए भी गंगा में डुबकी लगाना कहाँ मना था। इस देश में जन्म ले कर जो धर्म और अध्यात्म से अछूता रह गया उसका अवतरण अकारथ ही गया। वर्मा जी के जीवन में एक नए फेज का आरम्भ होने को था।  

जब सब खान-पान छूट ही गया, संयमित जीवन शैली की मज़बूरी के कारण उनकी स्थिति 'अब जी के क्या करेंगे' टाइप की हो रही थी। लेकिन उनके पास जीने की कुछ वजहें भीं थीं। एक सुंदर-सुशील पत्नी, जो वर्मा जी की ख़ुशी को अपनी नियति मान कर खुश थी। दो प्यारे बच्चे और उनकी परवरिश को एक रसूख और मलाईदार पद। इन सबके होते हुये उन्हें कभी भगवान की याद आई हो ऐसा याद नहीं आता। मन में कहीं ये विश्वास था कि भगवान की ज़रूरत कमज़ोर और असहाय लोगों को पड़ती है। उन्हें शायद भगवान की ज़रूरत ही न पड़े। लेकिन प्रभु की लीला लॉ ऑफ़ एवरेज पर चलती है। सुख-दुःख का सम-टोटल आरम्भ और अंत में है, जीरो बटा सन्नाटा। सारी कबड्डी बीच की है। ऊपर वाला अपनी बात बन्दों के माध्यम से कहलाता है। डॉक्टर ने इशारा कर दिया था। वर्मा जी भी इरादे के पक्के थे। जीवन में जब इतना सब छोड़ना था तो कुछ तो पकड़ना ही था। उन्होंने किसी योग गुरु की शरण में जाने का निर्णय ले लिया। अब बस कमी थी तो एक अदद गुरु की जो महर्षि पतंजलि की योग विद्या का सार उन्हें सहज-सुलभ तरीके से उपलब्ध करा सके। इस देश का सौभाग्य रहा है कि यहाँ की पवित्र धरती पर गुरुओं और गुरुघंटालों की कभी भी कोई कमी नहीं रही है। समस्या है आम आदमी के लिये जो इन दोनों में फर्क नहीं कर पाता। पहले दर -दर भटकना पड़ता था, घाट-घाट का पानी पीना पड़ता था तब जा के पता चलता था गुरु, गुरु है या घंटाल।टीवी पर बहुत से धार्मिक चैनेल्स के आ जाने से ये काम थोड़ा आसान हो गया है। जिस गुरु की टीआरपी ज्यादा हो उसी को पकड़ लो। लोकतंत्र वैसे भी संख्याबल पर निर्भर करता है। जिसके ज्यादा अनुयायी हैं उसे फॉलो करो। एक ऐसे बाबा को खोज पाना अब कठिन काम नहीं था।

उनके 'योगा' सेंटर लगभग हर शहर, हर मोहल्ले में उपलब्ध थे। वर्मा जी ने बाबा जी के लोकल चैप्टर में रजिस्ट्रेशन करा लिया। केंद्र का परिवेश और वातावरण अध्यात्म से ओत-प्रोत था। सभी भक्तगण सप्ताह में एक दिन नियत समय पर एकत्र होते और साथ-साथ योग-ध्यान करते। केंद्र संचालक के कहने पर वर्मा जी ने मुख्य केन्द्र पर 15 दिन का क्रैश कोर्स भी कर डाला। अब वो माइक्रोसॉफ्ट सर्टिफाइड इंजीनियर्स की तरह सर्टिफाइड रूप से आध्यात्मिक हो गए थे। वर्मा जी बहुत ही रेगुलर और पंक्चुअल थे। नए मुल्ले वाला हाल था। उनके जीवन का कायाकल्प हो गया। लेकिन अफ़सोस इस बात का था कि वो आध्यात्मिक हो गये ये बात सिर्फ खुद वो जानते थे। इतने जतन से कोई आध्यात्मिक बने और पडोसी को हवा भी न लगे तो मज़ा नहीं आता। दूसरे उन्हें अभी भी पुराने नज़रिये से देखते। पुराने यार-दोस्त उनके त्याग का मज़ाक उड़ाते। इंसान भी अपना सारा जीवन दूसरों को देखने-दिखाने में ही गुज़ार देता है। लोगों का नजरिया बदलने के लिये उन्होंने भी वही करना शुरू कर दिया जो और लोग किया करते थे। गुरु जी की एक बड़ी फोटो घर के मुख्यद्वार पर लटका दी और सोने की चेन हटा कर एक रुद्राक्ष की माला अपने गले में टांग ली। ब्राण्डेड कपड़े सिर्फ ऑफिस के लिये, बाकि समय वर्मा जी ने सफ़ेद कुर्ता-पायजामा धारण कर लिया। रही सही कसर माथे पर लगे टीके ने पूरी कर दी। अब उन्हें खुद लगने लगा कि वो पूरी तरह आध्यात्मिक हो गए हैं। उन्हें उम्मीद थी कि अब दूसरे भी उन्हें हलके में नहीं लेंगे।  

आध्यात्मिकता की शुरुआत शायद यहीं से होती है। वेशभूषा देखते ही ये लगना चाहिए कि बन्दा स्पिरिचुअल टाइप का है। बहुत से लोग तो दूसरों को देखने-दिखाने में ही आध्यात्मिक बन गये। विगत कुछ वर्षों में ये देश भयंकर रूप से स्पिरिचुअलिटी की चपेट में आ गया है। नए-नए धर्मों-पंथों-गुरुओं-देवी-देवताओं का अनवरत आविर्भाव हो रहा है। हर कोई अपनी पूजा-पद्यति के दिखावे के लिये हर संभव प्रयत्न कर रहा है। टीका-टोपी-दाढ़ी-वेशभूषा सिर्फ इसलिये कि लोगों को पता चल सके कि भाई धार्मिक हो गया है। आध्यात्मिक व्यक्ति जिस पूजा पद्यति को अपनाता है अमूमन उसी को धर्म मान लेता है। इसलिए धर्म और अध्यात्म आपस में वैसे ही घुल-मिल गए हैं जैसे दूध और पानी। दोनों ही एक दूसरे में मिलावट। आदमी अपनी सुविधा के अनुसार दोनों की मात्रा घटा-बढ़ा लेता है। लेकिन धर्म और आध्यात्मिकता दोनों अटल सत्य की तरह हैं। पूजा-पद्यति या देश-काल के बदल जाने से इनमें कोई फर्क नहीं पड़ता। प्रेम-दया-करुणा-क्षमा, धर्म की धुरी हैं जबकि आध्यात्मिकता को धर्म-फल यानि शान्ति और परमानन्द के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। हमारे देश के लिए आध्यात्मिकता कोई नई चीज़ नहीं है। हर जिले, हर गांव, हर कस्बे यहाँ तक की हर गली-मोहल्ले में हर तीसरा आदमी धार्मिक मिल जाएगा। हर दूसरा आदमी जो धार्मिक तो नहीं होगा लेकिन कर्म-कांड ज़रूर जानता होगा। और हर पहला आदमी कर्म-कांड को ही धर्म समझ कर उसे पाखण्ड सिद्ध करने में लगा होगा। हमारे देश का एक व्यक्ति जो सभ्य नागरिक भले न बन पाया हो धर्म के बारे में खुद को अज्ञानी नहीं मान सकता। जिस देश में कोस-कोस पर पानी बदल जाता हो वहाँ हर गली में देवी-देवताओं-ऋषि-मुनियों-गुरुओं-पीर-पैगम्बरों का बदल जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। कोई भी व्यक्ति जो सौ-पचास पढ़-अनपढ़ को हाँक ले उसमें महानता के गुण परिलक्षित होने लगते हैं। शुरुआत तो चेलागिरी से होती है लेकिन कब चेला गुरु का गुड़-गोबर कर के शक्कर बन जाये, पता नहीं चलता। आरम्भ में बाहर फोटो गुरु की ही होती है और दुकान चेले की, बाद में गुरु नेपथ्य में चले जाते हैं। बेरोजगारों के लिए स्वरोजगार एक उत्कृष्ट उदाहरण है, ये बाबागिरी।         

जहाँ हर कोई भूतकाल में अपने साथ हुये अन्याय और असहिष्णुता की सलीब ढ़ो रहा हो, न्याय-व्यवस्था फाइलों में दम तोड़ रही हो, मानवता-सज्जनता-सभ्यता सिर्फ फेसबुक और व्हाट्सप्प पर दिखाई देती हो, वहाँ रियल वर्ल्ड में कोई सिर्फ रोने के लिए अपना कन्धा ही दे-दे तो सौ-पचास लोग अपना सर्वस्व न्योछावर करने को उद्दत हो ही जाएंगे। सामाजिक और आर्थिक विषमताओं को दूर करने की सद्इच्छा में आपके महान और संपन्न होने का समय-सिद्ध नुस्खा छिपा है। समृद्ध और संपन्न सदैव अल्प संख्या में ही होते हैं । ऐसे ही कुछ अल्पसंख्यक संपन्न लोगो को भरे चौराहे पर पानी पी-पी के कोसना आपकी आर्थिक सम्पन्नता के द्वार खोल सकता है। भारतीय राजनीति और सिनेमा इस बात के प्रमाण हैं। हिन्दी सिनेमा को हिट करने में दूसरों की गरीबी-दुःख-दर्द को दूर करने वाले रॉबिनहुड टाइप के किताबी मसीहा वास्तविक जीवन में सुपरस्टार बन गये। धर्म और अध्यात्म की आवश्यकता सुविधा और साधन विहीन विकासशील देशों में विकसित देशों की अपेक्षा अधिक रही है। 'परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम' की महती भावना हृदय में लिये अनेकानेक महान लोगों ने समस्त विश्व में भारत की पावन धरा को ही चुना ये अपने आप में गर्व का विषय है। 

धर्म और आध्यात्मिकता का दिखावा आजकल अपने चरम पर है। हर धर्म-सम्प्रदाय के लोगों द्वारा अपने-अपने महापुरुषों को महान बताने की होड़ में देश कहीं पिछड़ता जा रहा है। महान लोगों का अनुयायी होने के कारण अनुयायी स्वयं को भी महान मानने लग जाये, ये संभव है। शहरों, मोहल्लों, चौराहों का नया नामकरण हो रहा है। नित्य प्रति गली-मोहल्लों-पार्कों में मूर्तियों की स्थापना में फ्री का लंगर लग रहा है। तीज-त्यौहार जो पहले घरों में सीमित थे, आज ड्योढ़ी के बाहर निकल आये हैं। हर सम्प्रदाय अपने-अपने समारोहों में जनशक्ति और धार्मिकता का फूहड़-भौंडा प्रदर्शन करने से बाज नहीं आता। धार्मिक आयोजनों के शोर में धर्म-अध्यात्म गौण हो कर रह गए हैं। आये दिन धर्म परिवर्तन की ख़बरें सुर्खियां बन रहीं हैं। परिवर्तन का कारण आर्थिक, राजनितिक या सामाजिक कुछ भी हो सकता है। कुछ लोगों की धार्मिक आस्था मात्र वैधानिक रूप से दूसरी बीवी के लिए भी बदल जाती है। सम्प्रदाय बदलना सम्भवतः स्वयं को बदलने से ज़्यादा आसान है। इससे पूजा पद्यति तो बदल सकती है, लेकिन धर्म जो शाश्वत सत्य है, नहीं। उसे भला कौन बदल सकता है।भगवान बुध्द के एक अनुयायी ने अपनी पुस्तक में लिखा था कि जब-जब समाज में अन्धकार बढ़ा, महापुरुषों ने मशाल बन कर पथप्रदर्शक का काम किया। एक मशाल से अनगिनत मशाल जलाई जा सकतीं हैं। जलने के बाद, पहली हो या आखिरी, हर मशाल गुण-धर्म के मामले में सामान हो जातीं हैं। अब जब उन मशालों को बुझे हुए अरसा बीत गया है, तब लड़ाई हो रही है कि मेरी मशाल का डंडा तुम्हारे डंडे से बड़ा और ज्यादा मजबूत है। और अनुयायी लोग स्वयं में महान लोगों के गुण विकसित करने के बजाय उनकी फोटो या मूर्ति से सन्तुष्ट हो जाते हैं। वाह्य आडम्बर और दिखावे ने धर्म का स्वरुप बदल दिया है। ऊपर भगवान तक आवाज़ पहुँचाने के लिये अत्याधुनिक तकनीकें हैं। धर्म जो कभी व्यक्तिगत एकाकी अनुभूति थी, भीड़-तन्त्र में बदल गया है। 

हर किसी को अपने स्तर पर देर-सवेर शुरुआत करनी होती है। कारण चाहे ऊपर वाले की पिछवाड़े पर पड़ी लात हो, शारीरिक स्वास्थ्य हो या उम्र का तक़ाज़ा। वर्मा जी ने मज़बूरी में ही सही शुरुआत कर दी है, भले ही दिखावे से। बिज बो दिया है, समय आने पर अध्यात्म के अंकुर भी अवश्य फूटेगा। वर्मा जी को शुभकामनायें। लेकिन भगवान को सूखे-मुरझाये फूल कोई अर्पित करता है क्या? नहीं न। फिर धर्म-अध्यात्म के लिए बुढ़ापे का इंतज़ार क्यूँ? 

धर्म की एक सीधी-सच्ची परिभाषा गोस्वामी तुलसीदास जी ने दी थी -
"परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई।"

किसी शायर ने भी ये बात बखूबी कही है -
"आदमी लाख सम्हलने पर भी गिरता है,
जो झुक के उठा ले, वो ख़ुदा होता है। "

आज के लिए इतना ही। कुछ ज़्यादा हो गया।      

- वाणभट्ट