मंगलवार, 3 मार्च 2015

विज्ञान दिवस



तीसरा अलार्म बज रहा था। राबिया बेगम ने करवट बदलते हुये लिहाफ में सर घुसेड़ दिया। फ़रमाया - "आ गया कमबख्त"। राशिद मियां को बिस्तर से उठना पड़ा। पहला अलार्म पाँच बजे का था और दूसरा साढ़े-पाँच का। इन दोनों को बंद किया जा सकता था। किन्तु तीसरा तब तक बजता था जब तक राशिद मियाँ बिस्तर से उठने को मज़बूर न हो जायें। ये दूधिया अपने दूध के चक्कर में जाड़ा-गर्मी-बरसात 365 दिन छः बजते-न-बजते घंटी बजा ही देता। राबिया बहुत झल्लाती - "दूध नहीं पानी पिला रहा है, ना चाय में रंगत आती है, ना दही ही जमता है। सुबह-सुबह नींद खराब होती है सो अलग से।" लेकिन राशिद मियां का मानना था अगर राधे न आता तो पूरा घर सोता ही रह जाता। बेगम साहिबा के चक्कर में बच्चों का स्कूल भी छूट जाता। ये तीसरा अलार्म था जिस पर राशिद को पूरा भरोसा था। ये बात अलग है कि राबिया ने इस काम में उसका सहयोग देने से मना कर दिया था। चूँकि ये सुझाव राशिद भाई का था लिहाज़ा सभी मौसम में दूध लेने की ज़िम्मेदारी उन्हीं के कन्धों पर थी। 


भगोना ले कर बाहर निकले तो देखा फाटक पर पाठक जी खड़े हुए थे। मुस्कराते हुये बोले - "गुड मॉर्निंग राशिद भाई। ज़्यादा सुबह तो नहीं आ गया। आप लोग तो अर्ली राइज़र हैं इसलिए सुबह-सुबह घंटी बजा दी। डिस्टर्ब तो नहीं कर दिया।" राशिद को कभी-कभी अपने हद से ज़्यादा ज़हीन होने पर अफ़सोस होता था। ऐसे लोगों के लिये राबिया ही सही है, मुंह-तोड़ जवाब तो देती। पाठक जी निकट के साइन्स कॉलेज में रसायन शास्त्र के प्रवक्ता पद पर नियुक्त थे। एक कार्ड निकलते हुए बोले - "आज हमारे यहाँ साइंस-डे मनाया जा रहा है। ऊपर से आदेश है।बजट भी आया है। एक छोटा सा प्रोग्राम रखा है। ग्यारह से एक बजे तक। दो-चार वक्ता हैं। उसके बाद हाई-टी का आयोजन भी है। आप आयेंगे तो अच्छा लगेगा। मुस्लिम रिप्रेसेंटेशन भी हो जायेगा। लोग मानते हैं कि मुसलमानों की विज्ञान में कम दिलचस्पी होती है।" अभियांत्रिकी में आईआईटी से पीएचडी करने के बाद राशिद ने सपने  नहीं सोचा होगा कि उसे कभी इस प्रकार का कॉम्पलिमेंट सुनने को मिलेगा। परन्तु प्रत्यक्ष रूप से उसने पूरी कोशिश करने का वादा कर लिया। तब तक राधे भी आ गया। पाठक जी को और भी कार्ड बांटने थे इसलिये इस मुलाकात का अन्त हो गया।

राशिद नियत समय पर कॉलेज के रसायन शास्त्र विभाग के सेमीनार रूम में पहुँच गया। तैयारियाँ अभी चल रहीं थीं। डायस के किनारे दीप प्रज्वलन की तैयारी थी। साफ़-सफाई में लगे थे सभी विभाग के कर्मचारी। पाठक जी ने मुस्कराते हुये स्वागत किया - "प्राचार्य जी आते ही होंगे। वही कार्यक्रम चीफ गेस्ट भी हैं। तब तक और गैदरिंग हो जायेगी।" हॉल की स्थिति देखते हुये ये समझ आ रहा था कि पूरी गैदरिंग में 50-60 से ज़्यादा लोगों के आने की उम्मीद नहीं थी। आयोजन की ज़िम्मेदारी पाठक जी पर ही थी। वो अपने काम में व्यस्त हो गये। राशिद ने कोने की एक सीट पकड़ ली। 

लोग आ रहे थे और अधिकांश झाँक-झाँक के लौट जा रहे थे। कुछ बैठ गए थे। संभवतः दूसरे डिपार्टमेंट के लोग हों। कुछ स्नातकोत्तर छात्र लग रहे थे। सीटें खाली दिख रही थीं इसलिये पाठक जी ने कार्ड की औपचारिकता त्यागते हुये किसी को भी पकड़ लाने का विचार अपने सहकर्मियों के सामने रख दिया। धीरे-धीरे 30-40 लोगों को इकठ्ठा कर पाने में आयोजक सफल हुये। प्राचार्य और वक्ता लोग मंचासीन हो गये। संचालन का जिम्मा भी श्रीमान पाठक जी पर ही था। कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप-प्रज्वलन से हो गया। उसके बाद विभाग के प्रथम विभागाध्यक्ष के चित्र पर माल्यार्पण होना था। पोडियम से पाठक जी ने मुख्य अतिथि और वक्ताओं से चित्र पर मल्यार्पण करने का आग्रह भी कर दिया। पर ये क्या मन्च पर फोटो नदारद थी। पाठक जी के चेहरे पर कई रंग आ-जा रहे थे। 

प्राचार्य महोदय ने बात सम्हाल ली - "पाठक जी फोटो मंगवा लीजिये। ये तो इन-हाउस कार्यक्रम है।" एक आदमी फोटो लाने के लिए लपका। आनन-फानन में वही आदमी फोटो झाड़ता हुआ मंच पर आ गया। पर फोटो रखने के लिये वहां कोई व्यवस्था नहीं थी। लिहाजा एक कुर्सी के ऊपर उसे स्थापित करने का प्रयास किया जाने लगा। कुर्सी के हत्थों पर फोटो को टिकाया गया। पर हत्थों का आकर या फोटो की सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी या दोनों ही, कुछ ऐसी थी कि जैसे ही फोटो को छोडो वो नीचे की ओर सरकने लगती। व्यवहारिक ज्ञान के लिए विज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। विभाग के चपरासी ने कहीं से एक चादर ला कर उसे कुर्सी पर बिछा दिया तब जा कर फोटो टिक सकी। अब माला पहनाने की बारी थी। लेकिन जैसा हमारी मानक टीमों में होता है दायें हाथ को ये खबर नहीं होती कि बायाँ हाथ क्या कर रहा है। बायेँ को फोटो लाने को बोला गया और दायें को माला। और दायें-बाएं की आपस में कभी बात भी नहीं हुयी। माला फोटो की तुलना में छोटी थी सो अपनी सहज बुद्धि का परिचय देते हुये प्राचार्य महोदय ने माला फोटो के इमैजिनरी चरणों में अर्पित कर दी।      

कार्यक्रम शुरू हो गया। वक्ताओं में विज्ञान और वैज्ञानिक सोच के प्रति अपने प्रबुद्ध उद्बोधनों से उपस्थित श्रोताओं को मुग्ध करने की होड़ सी मच गयी। पाठक जी बचे-खुचे कार्यक्रम को सकुशल निपटाने में व्यस्त हो गये। कार्यक्रम अपने अंतिम चरण पर था जब पाठक जी का ध्यान राशिद की ओर गया। वो पिछली कुर्सी पर निढ़ाल पड़ा था। आँखें पलट कर कूटस्थ में टिकीं हुयी थीं। हाथ-पैर पसारे बेहोश पड़े राशिद को देख पाठक जी के हाथ-पैर फूल गये। आज का दिन किसी भी तरह से उनके अनुकूल नहीं था। किसी तरह आयोजन निपटा कर वो मंच से राशिद भाई की ओर भागे। "राशिद भाई - राशिद भाई आप ठीक तो हैं।" मियां राशिद की तन्द्रा टूट गयी।  बोले - "बड़े ही ज्ञानवर्धक और ओजपूर्ण व्याख्यान चल रहे हैं।" पाठक जी को आज पता चला कि जान में जान आना किसे कहते हैं। बोले - "व्याख्यान तो ख़त्म हो गए हैं। चलिये हाई -टी का आनन्द लेते हैं। आपके आगमन के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद।" 

सभी के साथ वो दोनों भी उस दिशा में बढ़ लिये जहाँ हाई-टी सर्व की जा रही थी। 

- वाणभट्ट