शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

प्रेम दिवस : श्याम सिंह की अधूरी कहानी 


तब तक बाबा वैलेंटाइन का आविर्भाव भारत की धरा पर नहीं हुआ था। ये कहना मुश्किल है कि उस दौर में देश, प्रेम के प्रभाव से मुक्त्त रहा होगा। प्रेम पर ग्रन्थ और महाकाव्य आदि काल से यहाँ लिखे जा चुके थे। वैलेंटाइन बाबा के दादा-परदादा की औकात नहीं थी कि हिंदुस्तानी प्रेम की ए-बी-सी भी समझ पाते। सोलह कला सम्पन्न भगवान यहाँ द्वापर में ही डेरा डाल चुके थे। क्यूपिड की अवधारणा भी हमारे कामदेव से चुराई हुयी लगती है। बसंत के आगमन के साथ ही शरद ऋतु में सोयी पड़ी सभी आकांक्षाएं और अपेक्षाएं अंगड़ाई लेना शुरू कर देतीं हैं। कवियों ने इस माह को ऋतुराज का सम्मान ऐवें ही नहीं दे दिया। इस मौसम का आना और प्रेमीजन का बौराना यहाँ का एक चिरंतन सत्य रहा है। 



जिस प्रकार हर भारतीय अपनी पुश्तैनी श्रेष्ठता मनोग्रन्थि से पीड़ित रहता है, इस बात को सौ फीसदी गारंटी के साथ कहा जा सकता है कि बाबा वैलेंटाइन ने कॉपीराइट का उल्लंघन करते हुये प्रेम दिवस का पूरा कॉन्सेप्ट ही हाइजैक कर लिया। अगर ये उनका ओरिजिनल आइडिया होता तो  क्या वैलेंटाइन डे बसन्त ऋतु में ही पड़ता। अक्टूबर-नवम्बर में यह दिन मनाया जाता तो कोई नयी बात होती। ये तो हमारी नयी पीढ़ी की विशेषता है कि अपने स्वर्णिम अतीत को पूरी तरह झुठला देना चाहती है। हर चीज़ के लिये पश्चिम की ओर मुँह बाये देखती रहती है। जिस देश में सुर-ताल भी नियम-कानून से आबद्ध रहता हो वहां प्रेम की मर्यादाएं भी भली-भाँति परिभाषित थीं। ये माउस- कम्प्यूटर-फेसबुक वाली जेनेरेशन अपनी विरासत को अन-डू करने पर आमादा है। पर इसमें इसका कोई दोष भी नहीं है। जवानी हमेशा दीवानी होनी ही चाहिये। सदैव नयी संभावनाओं की तलाश ही नाम है जवानी का। सपने देखने का हौसला और उन्हें पूरा करने की ज़िद। जैसे नीम-पुदीना-तुलसी-अदरक-हल्दी हमारे पेटेंट हैं वैलेंटाइन डे पर भी हमें दवा ठोंक देना चाहिये। मुझे यह कहने में कतई गुरेज़ नहीं है कि बाबा वैलेंटाइन ने हमारा ही आइडिया चुरा के कई मल्टीनेशनल कम्पनियों के माध्यम से हमें ही वापस बेच दिया। 



हर क्रिया-कलाप का सामाजिक के साथ-साथ एक आर्थिक पक्ष भी होता है। युवाओं में प्रेम का इतना बड़ा मार्केट खोज पाने में देशी उद्योग जगत पूर्णतः असफल रहा। चॉकलेट-कार्ड-गिफ्ट का सिलसिला जो पूरे हफ्ते चलता है शनै-शनै एक अच्छे-खासे व्यवसाय में परिवर्तित हो चुका है। कभी-कभी तो ये लगता है कि ये मल्टीनेशनल कंपनिया न आतीं तो हमारे युवाओं का क्या होता। अपने लिये सच्चा प्यार खोज पाना इस पीढ़ी के लिये कितना कठिन होता। 



ऐसा नहीं है कि पुराने ज़माने में लोग प्रेम-सुख से वंचित रहे हों। को-एड स्कूलों में पढने का और कोई फायदा रहा हो या न रहा हो, एक फायदा ज़रूर होता था। जितने भी प्रेमीजन हुआ करते थे उन्हें किताबों और नोट्स की अदला-बदली का बहाना मिल जाया करता। ये बात अलग है कि अक्सर इस प्रकार का प्रेम इसी अदला-बदली तक ही सीमित रहता और कोई तीसरा गिफ्ट-विफ्ट पकड़ा कर बाज़ी मार जाता। टीचर-माँ-बाप और हितैषी पड़ोसियों कारण कितने ही प्रेम असफल रह गये कहना कठिन है। आठवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते टीन तो लग ही जाता था। उस पर तुर्रा ये कि कई साल के दो-चार फेलियर लडके-लड़कियों को उभरते प्रेमीजन बतौर कंसल्टेंट रख लेते। मर्यादा का तो ये आलम था कि टीचर्स केचुओं के निषेचन का पाठ स्किप कर जातीं। लडके उन पन्नों अंकित शब्दों को समझने का प्रयास करते। लड़कियाँ बगल में बैठे गहन अध्ययन में व्यस्त लडके के उन पृष्ठों पर यूँ नज़र डालतीं मानो अश्लील साहित्य हो।     




श्याम सिंह। हाँ यही नाम था उसका। आठवीं कक्षा में चार बार फेल होने के कारण उन्हें हमारी कक्षा की शोभा बढ़ाने का मौका मिला। बताने वाले बताते थे श्याम सिंह किसी रईस बाप की औलाद है और कहने वाले कहते कि श्याम सिंह का दिल हमारी क्राफ्ट टीचर पर आ गया है। इसलिये पास होना नहीं चाहता। आठवीं तक ही था हमारा स्कूल। उसके बाद लड़कों के जीआईसी में एडमिशन लेना होता। जिसका हौवा उसी तरह था जैसे इण्टर के बाद आईआईटी का। उस समय दिल के आने का मतलब भी समझ से परे था। गाहे-बगाहे जो फिल्में देखने का मौका मिलता उनमें भी मर्यादा का समवेश मर्यादा की पराकाष्ठा तक रहता। प्रेमी युगल दूर-दूर खड़े हो कर गाना गाते, तो फूल टकराते, तोते चोंच लड़ाते। ऐसे में केचुए के बारे में ना पढ़ा कर हमारे गुरुजनों ने हमारे साथ जो अन्याय किया उसकी नयी शिक्षा व्यवस्था में गुंजाईश नहीं है। 



एक दिन बरखा मैम बहुत गुस्से में थीं। "श्याम सिंह हाथ निकालो"। श्याम सिंह ने दाहिना हाथ सामने कर दिया। मैम ने आव देखा न ताव लकड़ी के स्केल से तड़ातड़ मारना शुरू कर दिया। श्याम सिंह का हाथ लाल हो गया लेकिन बन्दे ने उफ़ तक नहीं की। अमूमन एक-दो स्केल खाने के बाद आम छात्र अपना हाथ दायें-बायें-पीछे खींचने लगता। लेकिन श्याम सिंह ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। हाथ के ऊपर स्केल पड़ते रहे पर उसके चेहरे पर शिकन का नामोनिशान भी न था। वो बेख़ौफ़ चेहरा जेहन में अभी भी ज़िंदा है। हमेशा शांत-संयत और मधुर स्वभाव वाली बरखा मैम को वैसे गुस्से में किसी ने नहीं देखा था। वो श्याम सिंह को घसीटते हुये प्रिंसिपल के रूम में घुस गयीं। 



उस दिन के बाद श्याम सिंह को किसी ने नहीं देखा। कक्षा के खोजी पंडितों ने बताया कि अगले दिन डस्टबिन में लिपस्टिक-पाउडर-चूड़ी-बिंदी-माला पड़े मिले थे। चॉकलेट-कार्ड्स का प्रचलन उस ज़माने में होता तो श्याम सिंह उसी क्लास में दो-चार साल और फेल हो सकता था। 



- वाणभट्ट   

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

केजरीवाल का होना 

इस लेख को आज लिखा जाना ज़रूरी है। क्योंकि यहाँ कल क्या हो किसने जाना। बीजेपी का एग्जिट पोल को अतिविश्वास के साथ नकारना ईवीएम की विश्वसनीयता को कम कर रहा है। कोई भी बटन दबाओ और कमल खिलाओ। खैर आज तो आप के लिये जश्न का दिन है। 

बीजेपी की लहर में आप का ये प्रदर्शन कहीं न कहीं भारत में प्रबुद्ध होते प्रजातंत्र की ओर इशारा कर रहा है। जब वोट की बात हो तो सभी पार्टियों को भारत के मज़दूर-किसान याद आने लग जाते हैं। और चुनाव बीतते ही विकास का वो मॉडल दिखाया जाता है जो उद्योग और पूँजी पतियों के लिए ज़्यादा मुफ़ीद होता है। आम आदमी अपने को ठगा सा महसूस करता है। पूंजीवादी मॉडल में गरीब को उतना ही मिलता है जितना पूंजीवादी के हाथ में सिमट नहीं पाता। जैसे बाँध से छलकता पानी। स्थिति वही बनी रहती है क्या नहायें और क्या निचोड़ें। और पूंजीपति पांच सितारा होटलों में भारत की ग्रामीण-कृषि-सामाजिक अर्थव्यवस्था पर अपने उदगार व्यक्त करते नज़र आते हैं।  

इस देश में कांग्रेस से आज़ादी में अन्ना हज़ारे-रामदेव-केजरीवाल की तिकड़ी का बड़ा योगदान रहा है। कई साल इस तिकड़ी ने कांग्रेस के लिए ताबूत बनाने का काम किया। किन्तु अफ़सोस इस बात का है कि सत्ता में आने के बाद एक जोड़ी सारा क्रेडिट लूटने पर आमादा है। तत्कालीन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी श्रेय देना होगा कि उन्होंने जनमानस और आरएसएस की इबारतों को पढ़ा-समझा। कठिन दौर था वो भी जब कांग्रेस सत्ता के मद में चूर थी। मोदी पर उनके व्यक्तिगत आक्षेप जितना बढे, मोदी का कद उतना ही बढ़ता गया। समीकरण कुछ ऐसे बने कि पार्टी एक मज़बूत सरकार बनाने में सफल हो गयी। परन्तु पार्टी ने जिस तरह गैर विचारधारा वालों के लिए अपने द्वार खोल दिये उससे तय हो गया मानो सत्ता पाने के लिए मूल्यों से समझौता ही एक मात्र विकल्प रह गया हो। भारतवर्ष में इकलौती दूसरी राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण लाभ ज़रूर मिला, जो पार्टी को जनता ने प्रचंड बहुमत से जिताया। ऐसा ही कुछ दिल्ली के चुनाव में होता नज़र आ रहा है। केजरी को लक्ष्य करके चलाये तीर बूमरैंग करते प्रतीत हो रहे हैं।

बी पॉजिटिव। हाँ जी, आज के ही नहीं, पूरे और पुराने भारत में भी इस देश का ब्रह्मवाक्य रहा होगा। अन्यथा इतने विशाल जनमानस वाला देश इतने लम्बे अरसे तक गुलाम न रहता। ये निगेटिव लोग ही थे जो हर बात पर पूछते रहते कि यूँ होता तो क्या होता। उन्होंने सत्ताओं को चुनौती दी। उन्होंने व्यवस्था में सुधार की गुंजाइशों को तलाशा। ये राइट टु इनफार्मेशन, राइट टु एजुकेशन, राइट टु वर्क, राइट टु फ़ूड इत्यादि-इत्यादि मुददे यूँ ही नहीं उछले। किसी ने थाली में परोस के नहीं दे दिया इनको। बहुतों ने इन विचारों के लिये आहुतियां दीं। उनके नाम हम जान पाएं या न जान पायें। पर निश्चय ही ये लोग पॉजिटिव एटीट्यूड लोग नहीं थे। यह वर्ग अंग्रेज़ों के समय उनका वफादार था और कांग्रेस के समय उसका। हमेशा सत्ता और पद के साथ। ये निगेटिव लोग ही थे जिन्होंने संस्था की कमियों की ओर इंगित किया। उन्हें इस धृष्टता का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। ये वो सनकी सोल्जर्स थे जो अपनी विचारधारा के प्रति कृतसंकल्प थे। हमारी पुरानी आदत है कि हम तभी प्रतिभा पहचान पाते हैं जब उसे ब्रूकर-मैग्सेसे-नोबल मिल जाता है। कैलाश सत्यार्थी के विचारों से सम्मत लोगों की संख्या में रातों-रात इज़ाफ़ा हो गया। नोबल ने उन्हें ही नहीं देश को भी एक नयी पहचान दी। लेकिन उनके संघर्ष की दास्ताँ रोंगटे खड़े कर देती है। बच गए सो नोबल मिला वर्ना नाते-रिश्तेदार भी यह कहते फिरते कि सर-फ़िरा था।  

ऐसा ही एक सिपहसालार है केजरी। अमिताभ की फिल्में में एक आदमी पूरी व्यवस्था पलटने का माद्दा रखता था। सत्ता और ताकत से लूटा-पिटा आम आदमी उसे हिट करा देता था। ऐसा ही कुछ भारतीय राजनीति में होने को है। यहाँ से ये भी तय होगा कि राजनीति मुद्दों पर होगी, व्यक्तियों पर नहीं। 

कुछ लोग थे कि वक़्त के साँचे में ढल गये 
कुछ लोग थे कि वक़्त के साँचे बदल गये
                                                                                          (मेरा नहीं है)

- वाणभट्ट