शनिवार, 10 जनवरी 2015

आफ्टर एफेक्ट ऑफ़ पी के 

साइड एफेक्ट्स तो बहुत देखे होंगे पर आफ्टर एफेक्ट का असर और भी बुरा होता है। ख़ास तौर पर जब आप उम्मीदों के सैलाब पर जज़्बातों की नाव खे रहे हों। शायद वाणभट्ट पहला व्यक्ति था जिसने 'पी के' के पहले पोस्टर से ही प्रभावित हो कर फिल्म की अनुशंसा इस आधार पर कर दी थी कि विधु भाई का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड, खामोश, परिन्दा, परिणीता, मुन्ना भाइज़ आदि-इत्यादि, बहुत ही उम्दा था (कृपया लिंक http://vaanbhatt.blogspot.in/2014/08/blog-post.html देखें)। सारे अख़बारों के रिव्यूज़ से ज़्यादा बच्चों की ज़िद मुझे भी हॉल तक घसीट ले गयी। अमूमन मुझे फिल्में देखना तभी अच्छा लगता है जब हॉल में हमारे अलावा कम ही लोग हों। सन्डे के दिन सारा परिवार पीछे पड़ गया कि 'पी के' दिखाओ। लिहाज़ा नेट से ही पिक्चर बुक करने बैठ गया। पर ये क्या पास के हॉल की सीटें सभी शोज़ के लिये बुक हो चुकीं थीं। अब तो मेरी इच्छा भी बलवती हो गयी। सभी अख़बारों और फेसबुकिया कमेन्ट्स ने फिल्म के काफी कसीदे पढ़ रक्खे थे। रात नौ से बारह वाला टिकट किसी दूर के हॉल में मिला तो चौरासी रुपये नेट हैंडलिंग चार्जेज़ के बाद छः सौ रुपये में बुक कर दिये। नेट से परचेज़ वालों को डिस्काउन्ट की बीमारी होती है लिहाज़ा ये चौरासी रुपये थोड़े खले भी पर विधु-आमिर-हिरानी की जोड़ी हावी थी उस पल। 

इस फिल्म का साइड एफेक्ट तो हॉल में ही शुरू हो गया था। नींद भी आ रही थी और सरदर्द भी। लॉजिकल लोगों की फिल्म में लॉजिक निकालने की कोशिश करता रहा। पर शुरू से अंत तक ऐसा कोई दृश्य मेरी समझ में नहीं आया। फिल्म शुरू होती है एक नंगे एलियन से। इस धरती पर व्याप्त सभी प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य से ज़्यादा उन्नत प्राणी की कल्पना कर पाना मेरी सहज बुद्धि से परे था और रहेगा। इतना दिमाग दिया है ऊपर वाले ने कि अपनी नस्ल को छोड़ के अन्य सभी जीव-जन्तुओं की नस्ल सुधार रहा है। जब अंतरिक्ष यान से आदमी उतरता देखा तो तसल्ली हुयी कि मेरी धारणा से ये टीम इत्तेफ़ाक़ रखती है। पर ये क्या। एलियन भाई बिना कपड़े के ही धरती पर अवतरित हो गये। अगर मानव की प्रगति के बारे में देखा जाये तो भूख-आग पर काबू पाने के बाद उसे अपने कपड़ों की ही चिंता हुयी होगी। और बाकि जो तरक्की आपको दिखाई दे रही है वो तन ढँकने के बाद ही शुरू हुयी होगी। क्योंकि सारी तरक्की के मूल में कहीं न कहीं स्त्री-पुरुष विभेद अवश्य रहा होगा। वर्ना कपड़ों की आवश्यकता ही क्यों पड़ती। पूरी की पूरी सृष्टि ही परस्पर विपरीत ध्रुवों पर टिकी है। विज्ञान के जितने नियम और तत्व अब तक हमारे साइंसदानों ने धरती पर खोजे हैं वो पूरे ब्रम्हांड के लिये अटल सत्य की तरह हैं। धरती कोई अनोखा ग्रह नहीं है जहाँ की फिसिक्ज़-केमिस्ट्री-बायोलॉजी अन्य ग्रहों से अलग होगी। अपनी वैज्ञानिक सोच के मद्देनज़र मै किसी ऐसे अनोखे ग्रह की अवधारणा कर सकने में मै सक्षम नहीं हूँ। क-ख-ग सीखे बिना कोई भाषा सीख जाये। एक-दो-तीन किये बिना कोई गणनायें करने लग जाये। तो मै ये मान सकता हूँ कि सभ्यता के न्यूनतम मानक वाला ग्रह अंतरिक्ष यान बना सकता है। जिस गोले पर लोग खुद नंगे घूम रहे हों वो रिमोट से चलने वाला यान बना लें और उसका संचालन ऐसे व्यक्ति को सौंप दें जो स्वयं किसी अनजान ग्रह पर जा रहा हो, नाकाबिल-ए-बर्दाश्त है। 

हाथ पकड़ कर जो डाटा ट्रांसफर कर लेते हों वहाँ  प्रभु की अलौकिक माया से वंचित रह जाना आश्चर्यचकित कर सकता है। बंदा हाथ भी पकड़ता था तो कन्याओं का। वेश्या का हाथ पकड़ के बन्दे ने भोजपुरी सीख ली पर हिलती कारों का रहस्य उसे समझ नहीं आया। यदि वह एलियन था तो उसकी उत्पत्ति का भी कोई कारण रहा होगा या सिर्फ विचार ट्रांसफर से ही वहाँ बच्चों का जन्म हो जाया करता हो। स्त्री-पुरुष में संभवतः फर्क वहां भी होगा। वर्ना उसके मन में अनुष्का जैसी युवती के प्रति ही अनुराग क्यों उत्पन्न हुआ। जिस बन्दे में इंसानियत हो, इमोशन हो, प्यार हो, नफरत हो वो किसी अज्ञात शक्ति (भगवान) के अनुभव से वंचित रह जाये असंभव सा लगता है। दिल्ली में इतनी हिलती कारें हैं तो हमारे नटवर लालों की इस धरती को धिक्कार है जो उतरे हुये कपड़ों के लिये भी तरसते हैं। उसे भगवान और बाबा तो दिखे किन्तु भूखे-नंगे भिखारियों की फ़ौज नहीं दिखी। क्या वे एकदमै लपू-झन्ने हैं जो बेवजह ठण्ड में कड़कड़ाते घूमते हैं।  

चूँकि भाई लोगों ने पैसा कमाने के एक मात्र उद्देश्य से धर्म को तर्क की कसौटी पर कसने का प्रयास किया है तो वाणभट्ट के विचार से 'पी के' को भी तर्कसंगत होना चाहिये। मसाला फिल्मों का तर्क से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता ये तो सिर्फ बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रख कर बनायीं जातीं हैं। भीड़तंत्र में जो भीड़ इकठ्ठा कर ले वो सफल। नेता हों या अभिनेता हों, पीर हों या बाबा हों, सब वर्षों से आम जनता को सपने ही तो बेचते आये हैं। आम आदमी दुःख-संताप में जीवन बिता रहा है। जो उसकी आँखों में हसीन सपने जगाने में सफल हो गया वो हिट हो गया। पैसा कमाने के लिये विवादित मुद्दों को उठाया जाता है। उसके पोस्टर जलाये जाते हैं। जाने-माने विश्लेषक फिल्म का विश्लेषण करते हैं। फिल्म सुपर-डुपर हिट हो जाती है। नए कीर्तिमान बनाती है। चूँकि बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों ने समीक्षा में अपनी-अपनी कलम तोड़ दी है, आम आदमी को लगता है अगर उसने फिल्म की बुराई कर दी तो बुद्धिहीनों की श्रेणी में न जाये। इसलिये कहता घूमता है वाह-वाह क्या बात है। किन्तु उसको मालूम है उसका फुद्दू खींच दिया गया है। अब ज्ञानी होने का ढोंग तो करना ही पड़ेगा। यही भगवान के घर होता है। यही भगवान के ठेकेदारों के यहाँ होता है। कॉलेज में जब लड़के किसी वाहियात फिल्म में अपना पैसा और समय बर्बाद करके आते थे तो खूब बढ़-चढ़ के उसकी तारीफ करते थे। जब बाकि भी देख आते थे तो एक दूसरे को देख-देख मुस्कराते थे और नये लडके का बकरा बनाते। 

फिल्म वालों की बेसिरपैर की गल्प के पीछे  है तर्क ये है कि भाई हम तो सिर्फ और सिर्फ इंटरटेन करने के लिये फिल्में बनाते हैं। कम से कम आम आदमी तीन घंटे के लिए अपने दुःख-दर्द भूल कर सपनों की दुनिया में खो जाता है। यही काम तो भगवान और उनके एजेंट भी करते हैं। एक बाबा ने कहा सत्य ही ईश्वर है। एक ने कहा शांति में ईश्वर का वास है। अगर उनकी मान लो तो तीन घण्टे क्या पूरे दिन-महीने-साल गुज़र जायेंगे वो भी बिना पैसा खर्च किये। फ्री का इंटरटेनमेंट और रंग भी चोखा। हिलती कार और स्ट्रॉबेरी कंडोम में फूहड़ हास्य खोज पाना मेरे बस की बात नहीं थी। हर प्राणी में ज्ञान का आविर्भाव तो अंतर से ही होगा। तब तक इसे चाहे कोई भी मूर्ख बना ले। चाहे बाबा, चाहे फिल्म वाले। जब कथानक में दम होता है तो पब्लिसिटी की ज़रूरत नहीं  होती। इस टीम ने अपनी किसी पूर्व फिल्म की मार्केटिंग में इतना व्यय नहीं किया होगा जितना 'पी के' के प्रमोशन में। करोड़ों कमा लिये इसके लिए बधाई। सवा सौ करोड़ लोगों के देश में एक करोड़ बेवकूफ बना लो तो सौ करोड़ हो जाता है। सीधी गणित है। आपने तीन करोड़ लोगों को इंटरटेन दिया तो सारे रिकॉर्ड टूट गये। वो फुद्दू दुबारा आपके बहकावे में अगली बार न भी आएं तो मार्किट बहुत बड़ा है। भविष्य में मै इस टीम से लॉजिकल इंटरटेनमेंट की उम्मीद करता हूँ। भगवान बहुत पर्सनल अनुभूति हैं। जहाँ कहीं भी मानव सभ्यता होगी कुछ न कुछ मान्यतायें भी अवश्य होंगी। हाँ जिस सभ्यता ने न्याय-व्यवस्था, नियम-कानून का मानकों के रूप में अनुपालन कर लिया वहाँ सब भगवान हो जाएंगे और फिर भगवान को पूछेगा कौन? 

सच्चे फाँसी चढ़ते वेखे, झूठा मौज़ उड़ाये,
लोकी कहिन्दे रब दी माया, मै कहन्दा अन्याय,
ते कि मै झूठ बोल्याँ…  

- वाणभट्ट 

17 टिप्‍पणियां:

  1. आपने अलग अंदाज़ से इस फिल्म को देखा और आपका अंदाज भाया भी ....
    कई तरह की तार्किक बातें इस फिल्म की तार्किकता को सच बताते हुए भी अतार्किक लगती हैं ... जिनको आपने बाखूबी लिखा है ... एक एवरेज से ज्यादा नहीं लगी ये फिल्म मुझे भी ...

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  2. मुझे ख़ुशी हुई कि आपने फ़िल्म की बखिया उधेड़ने में कोई कोताही नहीं बरती लेकिन ये देख कर थोड़ा दुख ज़रूर हुआ कि आपने इसके उज्जवल पक्ष को सिरे से नकार दिया । समीक्षक की दृष्टी फिल्म के अच्छे बुरे पक्ष पर समान रूप से पढ़नी चाहिये । आपने जो लिखा वो सच है लेकिन पूरा सच नहीं । फ़िल्म में ईश्वर पर नहीं उसके ठेकेदारों पर सवाल उठाये गये हैं इसके अलावा इन्सानी फ़ितरत पर भी चिकोटी काटी गई है ।
    आपको पढ़ना हमेशा अच्छा लगता है इस बार भी लगा ।

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  3. मैं फिल्में नहीं देखती पर आपका आलेख मुझे अच्छा लगा । दृष्टि - कोण की बात हे ।सुन्दर - प्रस्तुति ।

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  4. मैंने ये फिल्म नहीं देखी है । आपके विचार बहुत स्पष्ट और सधे हुए है । तार्किकता के भी कई रंग हो सकते हैं ।

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  5. फिल्म के दूसरे पक्ष पर आपकी राय भी अच्छी लगी...

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  6. हमने तो यही चक्कर में फिलम नहीं देखी कि ये ढोंगी मार्केटिंग कर के लोगों का उल्लू सीधा करते हैं.. और उसके ऊपर फिलम की कहानी पर इतनी बहस और हंगामा.. सब इस मार्केटिंग प्लान के अंतर्गत ही लगता है..

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  7. illogical logic ... हमने तो
    न देखी है, न देखने का कोई इरादा है
    इतनी फुर्सत नहीं, सर्दी भी ज़्यादा है

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  8. आपके अनुसार मूवी देख ली। आपने जबर्दस्‍त तर्क दिए हैं, इसे निराधार सिद्ध करने के। आलेख ईश्‍वर को नकारनेवालों को अच्‍छी पटकनी देता है। बहुत सुन्‍दर आलेख।

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  9. उसे भगवान और बाबा तो दिखे किन्तु भूखे-नंगे भिखारियों की फ़ौज नहीं दिखी। क्या वे एकदमै लपू-झन्ने हैं जो बेवजह ठण्ड में कड़कड़ाते घूमते हैं।
    ..अगर ये सब लोग दिखने लगे तो फिल्म को व्हाट लग जायेगी न .....
    सीरियल हो या फिल्म में भिखमंगा भी हाई फाई न हो तो देखेगा कौन आज उसे ..रील लाइफ और रियल लाइफ में यही तो फर्क कचोटता है मन को ..

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  10. यह फिल्म अभी नहीं देखी है, लेकिन आपके तर्कों में वज़न है. वैसे हिंदी फ़िल्में केवल मनोरंजन के लिए देखी जा सकती हैं और यह आशा करना की वे तर्क की कसौटी पर खरी उतरेंगी केवल दिवा स्वप्न होगा.

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  11. फिल्म ने आस्था के नाम पर जो लूटमार चल रही है उससे सावधान रहने का सन्देश दिया है और उसके लिए अपने ढंग से तर्क दिए. यही फिल्म का एक बहुत अच्छा पक्ष है. जहाँ तक ईश्वर की बात है...जैसे आपने लिखा है. यह बेहद निजी अनुभूति है. जैव विकासवाद का सिद्धांत उसे सिरे से खारिज करता है. लेकिन ऐसे मौकों पर जब कोई उत्तर नहीं दिखता है ..लोग ईश्वर के स्मरण में शान्ति पाते हैं. बात वही है- अपनी-अपनी आस्था. लेकिन आस्था की आड़ में धंधा चले तो लोगों को जागरूक जरूर करना चाहिए. मेरे ख़याल से फिल्म का वही उद्देश्य है.

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  12. अब तो 'मैसेंजर ऑफ गॉड ' भी जल्द आ रही है। बाबा भी विवादास्पत होकर प्रसिद्धि पाना चाह रहे है. मैंने भी कई सालों बाद सिनेमा में जाकर आगे की सीट पर बैठकर गर्दन टेढ़ी रखके मूवी देखी। आखिर फिल्म का ट्रेलर जो खास था एवं विवादास्पत भी।

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  13. अपना-अपना दृष्टिकोण होता है। मुझे फिल्म संदेश के लिहाज से ठीक लगी। भगवान के मैनैजरों पर फिल्म में सवाल उठाया गया है। वो कैसे लोगों को बेवकूफ बनाते हैं। फिल्म ये मैसेज लोगों तक पहुंचाती है। मैंने तो दफ्तर के लोगों, चाय के ठेले पर फिल्म के बारे में पॉजीटिव बात करते सुना। मास को कैसे कनवेंस करना है ये हिरानी बखूबी जानते हैं। और आखिर में उन्होंने एक फिल्म ही तो बनायी है।

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  14. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.....

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  15. सार्थक आलेख...
    आमतौर पर बॉलीवुड में हॉलीवुड की घटिया नकल ही की जाती है...
    लंचबॉक्स जैसी कम ही फिल्में हैं...

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  16. अपना एलियन तो है ना , जो हिलती कारों से कपडे चुरा के पहनता है चोर भिखारी। आपका लेख अच्छा लगा पर बाबाओं का भंडाफोड तो होना ही चाहिये।

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यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...