शनिवार, 12 दिसंबर 2015

दृष्टिकोण

समय के साथ-साथ दृष्टिकोण भी बदलता जाता है। कृषि शोध में पिछले २० साल व्यतीत करने के बाद लगता है हमारी स्थिति हाथी के अंधों जैसी हो रखी है। जिसकी पकड़ में जो आया उसी के आधार पर निष्कर्ष निकालने लग गया। लेकिन ज़िन्दगी जो भी है, जितनी भी है, वो सीधी और सरल है। विज्ञान का काम है इस सरलता में व्याप्त गहन जटिलता को समझना-समझाना। और ज्ञान जितना सहज होगा उतना ही व्यापक होगा। न सिर्फ देश काल में अपितु धरती पर उपस्थित विभिन्न प्राणियों के लिये भी। जीवन का मूल आधार है उत्पत्ति, संतति एवं समाप्ति। ये बात सभी जीवों पर सामान रूप से लागू होती है। भीतर-बाहर भले कितनी ही गूढ़ रसायनिक-भौतिक-जैविक क्रियायें-प्रक्रियायें चल रहीं हों, किन्तु प्रत्यक्ष रूप से सारी गतिविधियाँ सुव्यवस्थित तरीके से चलती रहती हैं। चाहे वो अंतरिक्ष में स्थित खरबों आकाशगंगाओं की गति हो या परमाणु में अवस्थित इलेक्ट्रोन-प्रोटोन की स्थिति। ब्रम्हांड की इसी सुचारू कार्यप्रणाली को समझने का नाम विज्ञान है। विज्ञान का शाब्दिक अर्थ है अवलोकन और प्रयोग के माध्यम से प्राकृतिक दुनिया के व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन। देश और विदेशों में अवस्थित हमारे पूर्ववर्ती ऋषियों-मनीषियों (वैज्ञानिकों) ने प्रकृति के विभिन्न पक्षों का गहन अध्ययन किया। उनके अनुभवों-अवलोकनों-गणनाओं  के आधार पर ही हम आज विज्ञान का उन्नत रूप देख पा रहे हैं। विज्ञान ने समस्त जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने में अमूल्य योगदान दिया है। विज्ञान से प्राप्त ज्ञान की सहायता से विकसित उपकरणों और तकनीकों ने मनुष्य का जीवन बेहद सहज और सरल बना दिया है। वर्तमान में विज्ञान प्रदत्त सुविधाओं के बिना जीवन की कल्पना कर पाना असंभव सा लगता है। समय के साथ-साथ विज्ञान की अनेक शाखाएं, उपशाखायें और उपशाखाओं की भी उपशाखाओं का आविर्भाव होता गया। और बहुत संभव है, यहीं हमारी सोच संकीर्ण से संकीर्णतर होती चली गयी। समग्र रूप से जीवन को देख पाने की विलक्षण क्षमता का ह्रास सर्वत्र प्रत्यक्ष दिखाई देता है।

व्यवहारिक विज्ञान ने जीवन की दुरुहताओं को कम करने में एक अहम् भूमिका निभाई है। अकेले एडिसन साहब ने हज़ार से अधिक उत्पादों का पेटेंट करा रखा था। जिसमें टेलीग्राफ, टेलीफोन, ग्रामोफोन, इलेक्ट्रिक बल्ब, मोटर, डायनमो, इलेक्ट्रिक मीटर, पावर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम जैसे अनेक अविष्कार सम्मिलित हैं, जो आज भी उपयोग में लाये जा रहे हैं। रूडोल्फ डीज़ल ने इंजिन की अवधारणा को मूर्त रूप दिया। कम्प्यूटर, मोबाइल, सूचना प्रौद्योगिकी वर्तमान जगत के कुछ ऐसे अविष्कार हैं जिन्होंने जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में क्रांति का सूत्र-पात किया। वास्तव में आम मानव के लिए विज्ञान का उपयोगकारी और व्यावहारिक रूप ही महत्वपूर्ण है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने सदैव मौलिक शोध को ही श्रेष्ठतर माना। जीवन में मौलिक विज्ञान का महत्त्व कमतर नहीं आँका जा सकता, लेकिन जब तक उस ज्ञान का व्यवहारिक पक्ष मजबूत न हो, वह ज्ञान वैज्ञानिक शोध पत्रों, विवेचनाओं और समीक्षाओं तक ही सीमित रह जाता है। यहाँ अभिप्राय मौलिक या व्यवहारिक शोध की श्रेष्ठता सिद्ध करना नहीं है। लेकिन समय के साथ मौलिक विज्ञान स्वान्तः सुखाय का पर्याय भी बनता गया। यदि शोध का कोई प्रायोगिक उपयोग नहीं हो पा रहा है तो ये एक विचारणीय प्रश्न है। अधिकांशतः मौलिक और व्यावहारिक शोधकर्ताओं के बीच आपसी सामंजस्य का सर्वथा अभाव पाया जाता है। मौलिक शोध आध्यात्मिक खोज की तरह रहस्यमय बनी रहती है और कदाचित इसी कारण अधिक सराहना पाती है। गुणवत्तायुक्त शोध पत्रों का प्रकाशन मौलिक शोध का एक दूसरा उजला पक्ष है। लेकिन आज जिस तरह परिणाम आधारित शोध की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है, समय की माँग का आंकलन करते हुये, आवश्यक है कि व्यवहारिक और मौलिक शोधकर्ता वैसे ही काम करें जैसे दस्ताने में हाथ या शरीर में आत्मा। 

व्यवहारिक और मौलिक विज्ञान की तुलनात्मक श्रेष्ठता से कृषि शोध भी अछूता नहीं रह गया है। मौलिक शोध के प्रभाव और प्रभुत्व निकट भूत में अतुलनीय रूप से बढ़ा है। इस प्रक्रिया में कृषि शोध दशा और दिशा दोनों ही बदल सी गयी है। बायोटेक्नोलॉजी, मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, जेनेटिक्स तथा साइटोजेनेटिक्स आदि क्षेत्रों के आ जाने से कृषि शोध के पारम्परिक क्षेत्रों की ओर रुझान कम हुआ है। इन मौलिक क्षेत्रों का अब पारम्परिक कृषि शोधों के पुष्टिकरण के लिए भी बहुतायत से प्रयोग हो रहा है। यह एक स्वागत योग्य चलन है। किन्तु मौलिक अध्ययन का यथोचित उपयोग अभी भी व्यवहारिकता की तार्किक कसौटी पर परखा जाना बाकी है। किसी भी एक क्षेत्र को अत्यधिक महत्त्व देने से विकास की संतुलित प्रगति पर प्रश्नचिन्ह लग जाते हैं। विज्ञान का एक वर्ग मात्र समस्याओं को चिन्हित करने और विशिष्ट रूप से दर्शाने में व्यस्त है। समाधान के लिये वर्षों से जाँचे-परखे नियमों को किनारे कर के नवीन प्रविधियों के ऊपर अतिविश्वास ने एक संशय की स्थिति उत्पन्न कर दी है। जलवायु परिवर्तन, रोगाणु-कीटाणु, सूखा-बाढ़, कीट-पतंगे इत्यादि समस्याओं से निपटने के लिये निरन्तर शोध चल रहे हैं। नयी प्रविधियों के आविर्भाव से पारम्परिक तरीकों को वैज्ञानिक पुष्टि के रूप में नयी तकनीकों का उपयोग वर्तमान कृषि विज्ञान की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन विगत वर्षों में नवीन पद्यतिओं का वर्चस्व असामान्य रूप से बढ़ा है। इस प्रक्रिया में पारम्परिक शोध की प्रणालियाँ शीघ्रता अप्रचलित होती जा रहीं हैं। पारम्परिक फसल सुधार, सुरक्षा और उत्पादन शोध पद्यतियां आज पार्श्व में चली गयीं हैं। कभी-कभी लगता है कि शोध के प्रति अतिउत्साह ने उपलब्धियों की विविधता तो उत्पन्न कर दीं किन्तु उन्हें समेकित करने में पूर्णतः विफल रहा। परिणामस्वरुप गर्मी-ठण्ड-सूखा-बाढ़-कीट-जीवाणु प्रतिरोधी प्रजातियों का विकास तो बहुतायत से हो गया किन्तु एक ही प्रजाति में सभी गुणों का समावेश होना अभी भी दूर की कौड़ी लगता है। प्रयास निश्चय ही सराहनीय हैं परन्तु उनका वांछित परिणाम मिलना अभी बाकि है।

इन परिस्थितियों में व्यवहारिक शोध के माध्यम से ही देश-समाज की आवश्यकता-समस्या का निराकरण संभव है। कितना भी उन्नत शोध हो किन्तु यदि वह देश की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं की परीक्षा में यदि सफल नहीं होता है, तो सारा प्रयास व्यर्थ प्रतीत होता है। भूत और वर्तमान में अधिकतम प्रयास प्रजातियों के विकास पर ही रहा है। समस्त कृषि शोध वर्षों से वातावरण की विषमताओं के प्रति सहिष्णु और कीट-रोग रोधी प्रजातियों का विकास ही केन्द्रित रहा है। परिणाम के रूप में प्रत्येक फसल में विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के लिये अनेकानेक प्रजातियों और तकनीकों का विकास। व्यवहारिक शोध की आवश्यकता इसलिए और बढ़ जाती है कि प्रकृति, वातावरण, जैविक और अजैविक स्थितियाँ मानव के नियन्त्रण में कभी नहीं रहीं। परिस्थितियों को बदलने की अपेक्षा उपलब्ध परिस्थितियों और समस्याओं के साथ अधिकतम सम्भव उपज लेने में फसल प्रबन्धन मुख्य भूमिका निभा सकता है। सबसे पहले तो मृदा में पोषक तत्व और महत्वपूर्ण फसल चरणों पर पानी की सुनिश्चित उपलब्धता अति आवश्यक है। किसी भी उद्योग में उचित कच्चे माल की समयोचित उपलब्धता ही उद्योग की सफलता सुनिश्चित करती है किन्तु कृषि एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें बीज-खाद-पानी कुछ भी समय पर नहीं मिल पाता। इस स्थिति में व्यावसायिक या लाभदायक खेती के सभी सम्भावनायें बेमानी सी लगती हैं। सिर्फ उन्नत बीजों के आधार पर ये लड़ाई कहाँ तक सफल होगी ये कल्पना से परे है। उन्नत से उन्नत प्रजाति को उचित समय पर खाद-पानी की आवश्यकता होगी, जब ये मान लिया जाये की बीज की उपलब्धता में कोई संशय नहीं है। लेकिन स्थितियाँ एकदम विपरीत हैं। प्रत्येक कृषि-जलवायु के लिये विकसित प्रजातियों की संख्या इतनी अधिक है कि उनका बीज उत्पादन और उपलब्धता अपने आप में एक बड़ी चुनौती हैं। बीजों की समुचित उपलब्धता न होने के कारण कृषक के पास प्रजाति चयन के विकल्प भी सीमित रह जाते हैं। 

व्यवहारिक कृषि में मृदा और जल संरक्षण और उपलब्धता की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। किसी भी प्रकार से लाभदायक कृषि का पहला लक्ष्य भूमि को बारम्बार, प्रत्येक फसल के बाद कृषि योग्य बनाये रहने का होना चाहिये। 'सुबीजम् सुक्षेत्रे जायते'। बहुधा इसका अर्थ 'अच्छा बीज अच्छे क्षेत्र में ही जन्म लेता है' माना गया है। किन्तु संस्कृत में शब्दों के स्थान परिवर्तन से अधिक अन्तर नहीं पड़ता। इसलिए इसे 'सुक्षेत्रे सुबीजम् जायते' भी लिखा जा सकता है। अर्थात 'अच्छी भूमि में ही अच्छे बीज का जन्म होता है'। यानि हमारे विद्वतजनों ने भूमि और बीज की बराबर महत्ता आँकी थी। किन्तु कालान्तर में कृषि विज्ञान ने बीज की श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया। सम्भवतः भूमि और वातावरण को नियन्त्रित करने की अपेक्षा विभिन्न परिस्थितियों में नयी प्रजातियों का विकास और चयन की सहजता के कारण विद्वानों ने बीज की प्रधानता पर बल दिया हो। व्यवहारिक कृषि में सम्मिलित सभी अवयवों का बराबर योगदान है। लेकिन सर्वप्रथम है भूमि की गुणवत्ता और विशेष चरणों में जल की उपलब्धता। 

वर्तमान परिदृश्य में कृषि का विचलित कर देने वाला स्वरुप सामने आया है। उत्पादन-उत्पादकता बढ़ने के बाद भी कृषकों की दशा शोचनीय बनी हुई है। कृषि में लागत के अनुपात में लाभ निरन्तर घटता जा रहा है इस कारण किसान और विशेषरूप से नयी पीढ़ी का खेती से मोहभंग होता जा रहा है। चूँकि वर्तमान कृषि शोध विभिन्न शाखाओं और उपशाखाओं में इस कदर बँट गया है कि उसे समेटना दुरूह होता जा रहा है। विज्ञान चाहे कितना भी जटिल हो, जीवन सदैव सरल और सहज ही होता है। उचित आहार से पोषित स्वस्थ बच्चे में बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है, यही बात वनस्पतियों के लिए भी लागू होनी चाहिये। स्वस्थ बच्चा भी बीमारियों से बच नहीं सकता यदि उचित पोषण समय पर न मिले। यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि जिन वनस्पतियों और जीवों के सुधार पर कोई शोध नहीं हो रहा है, वो दिन पर दिन और सशक्त होते जा रहे हैं। चाहे वो खर-पतवार हों या कीट-पतंगे। सम्भवतः त्वरित विकास की अपेक्षा क्रमिक विकास अधिक स्थाई और ग्रहणीय है। 

निरंतर बढ़ती जनसंख्या की लिए भोजन की उपलब्धता बढ़ाने के लिये सम्भवतः मौलिक शोध त्वरित योगदान देने में सक्षम न हो, किन्तु शोध की व्यापक स्वीकार्यता, लाभप्रदता और कृषि के विकास के लिये मौलिक और व्यवहारिक शोध का समन्वयन वर्तमान भारतीय कृषि की महती आवश्यकता है।  


- वाणभट्ट  

बुधवार, 25 नवंबर 2015

रोज़गार 

कोषागार के सामने भीड़ लगी हुयी थी। नवम्बर के माह में प्रदेश सरकार से अवकाश प्राप्त वृद्ध लोगों को पेंशन हेतु अपने जीवित होने का प्रमाण देना पड़ता है। एक से एक वृद्ध महिला और पुरुष अपने बच्चों-नाती-पोतों के साथ इस वार्षिक मेले में शामिल थे। कुछ लोग खोया-पाया वाली स्थिति में अपने पुराने मित्रों से मिल के खुश थे। ये वो थे जिन्हें अवकाश प्राप्त किये सम्भवतः अधिक समय नहीं हुआ था। कुछ ख़ुशी और गम की मानवीय सम्वेदनाओं से ऊपर उठ चुके थे। उनके शरीर का सम्बन्ध मानो सिर्फ श्वांस-प्रश्वांस तक ही सीमित रह गया था। शून्य में ताकती आँखे लिये वो अपने नाते-रिश्तेदारों के लिये शायद एक नियमित आय का जरिया मात्र रह गए थे। कोई व्हील चेयर पर तो कोई गोद में। कोई स्ट्रेचर पर और कोई एम्बुलेंस में, सीधे अस्पताल से। हँसते-मुस्कुराते अधिकांश बुजुर्गों के ऊपर हावी बीमार और लाचार लोगों की बेबसी से ये रेला-मेला कुछ बोझिल सा लग रहा था।

अपनी माता जी को लेकर जैसे ही प्रांगण में घुसा, एक युवा ने स्वतः सहायता अर्पित कर दी - "भाईसाहब वहां कोने में फॉर्म मिल रहा है"। देखा तो जैसे पुराने ज़माने में फर्स्ट-डे, फर्स्ट-शो का टिकट निकलता था, वैसे ही भीड़ लगी हुयी थी। लाइन लगाना इस स्वतंत्र देश में परतंत्रता का लक्षण है, सो लोग सूर्य-किरणों की भाँति एक मेज़ को घेरे खड़े थे। मै भी उस भीड़ में लग गया और धीरे-धीरे मेज़ के करीब भी पहुँच गया। जो बन्दा फॉर्म बाँट रहा था, उसे चेहरे पर व्याप्त शान्ति को देख कर लग रहा था, लोग नाहक ध्यान-धारणा के लिये हिमालय की ओर पलायन करते हैं। यदि चित्त शांत हो तो आप कभी भी, कहीं भी मेडिटेट कर सकते हैं। फॉर्म लेते हुये आदतन मैंने पूछ लिया - "भाई कोई सेवा"। उसने उसी शांत भाव से मुस्कुराते हुये नकारात्मक जवाब सर हिला के दे दिया। ऐसी स्वार्थ रहित सेवा पर यकीन करना मुश्किल है, लेकिन ऐसा हुआ।

फॉर्म ले कर लौटा तो वालेंटियर भाई ने बताया की सड़क के पार से पेन्शन कागज़ात की छायाप्रति भी निकाल लाइये। जबतक माँ उस फॉर्म को भरतीं मैं फोटोकॉपी निकलवा के आ गया। फोटोकॉपी वाले के यहाँ भी भीड़ लगी थी। उसने सामान्य से दुगना दाम लिया। अब भाई ने पूछा - "फोटो लाये हैं क्या"। माँ  ने कहा - "फोटो पहले तो कभी लगी नहीं"। उसने बताया - "इस बार ज़रूरी है। नहीं है तो खिंच जायेगी, परेशान मत होइये। भैया आप बाहर फोटोग्राफर से बात कर लीजिये। माता जी को चलने में परेशानी है, वो खुद यहाँ आ जायेगा।" इतनी भीड़ के बावजूद वो फोटोग्राफर आया और तुरंता-विधि से फोटो खींच-खाँच के प्रिंट भी ले आया। इस सुविधा के लिये मात्र बीस रुपये लिये जो इस विषम परिस्थिति में मुझे कम ही लग रहे थे। सरकारी दफ्तरों के बाहर-अन्दर अगर थोड़ी सी साठ-गांठ हो जाये तो रोज़गार की समस्या का समाधान बिना किसी सरकारी निवेश के भी संभव है। और ऐसे कई सरकारी कार्यालय इस तथ्य के जीते-जागते प्रमाण हैं। 
  
अब फोटो चिपकाने लिये गोंद तो थी नहीं हमारे पास। मैंने इर्द-गिर्द नज़र घुमाई की शायद किसी के पास गम स्टिक मिल जाये। तभी नीचे से एक बच्चे की आवाज़ आयी - "अंकल फोटो चिपकानी है क्या ? दो रुपये लगेंगे"। लक्ष्मण जी के लिए संजीवनी बूटी मिलने पर शायद उतना हर्ष वैद्य सुषेण को नहीं हुआ होगा जितना मुझे उस पल में हुआ। मेरा दिमाग बस यही गणना कर रहा था कि आस-पास कोई दुकान तो है नहीं, माँ के बैठने को भी जगह नहीं थी, उन्हें छोड़ के कितनी दूर जाना पड़ेगा, कितना समय लगेगा, आदि-इत्यादि। मैंने नीचे देखा तो एक सात-आठ वर्षीय बालक बोरे पर गोंद की ट्यूब लिए बैठा था। उसके हाथ में पांच का सिक्का रखते हुये मुझे ख़ुशी हुयी और बच्चा भी खुश हो गया। 

- वाणभट्ट   

      

शनिवार, 12 सितंबर 2015

किम्वदन्ती


कानपुर से लखनऊ बीच एमएसटी करते-करते तक़रीबन साल भर हो गए हैं। कार्यक्षेत्र के इतर रोज़ नए लोगों के जीवन में झाँकना एक सुखद एहसास है। एमएसटी करने वालों की एक अलग दुनिया है। सारी यारी ट्रेन तक सीमित। ट्रेन से उतरने के बाद सभी को अपने-अपने गन्तव्य की ओर बेतहाशा भागते देखा जा सकता है। सुबह ऑफिस को देर हो रही होती है तो शाम को टेम्पो फुल हो जाने का खतरा रहता है। इस ग्रुप ने मेरे ईको पार्क के मॉर्निंग वॉकर्स ग्रुप की कमी को कुछ हद तक पूरा कर दिया है। अब सारा टहलना सुबह-शाम ट्रेन पकड़ने तक ही सीमित है। हर वैरायटी के लोगों का अलग और चुनिन्दा ग्रुप है। ताश वालों का अलग, खैनी वालों का अलग और शौक़ीन लोगों का अलग। इसमें कुछ ऐसे लोग भी हैं जो सबसे अलग हैं। अकेले चलते हैं। यही विशिष्टता उनकी पहचान बन जाती है। 

ऐसे ही एक शख़्स हैं शर्मा जी। चलती-फिरती किम्वदन्ति। जाड़ा-गर्मी-बरसात क्रीम कलर की हाफ़ शर्ट और डार्क ब्राउन कलर की पैंट। शायद उनकी कम्पनी का ड्रेस कोड हो। सर पर बाल कुछ कम हैं, जिनकी कमी पूरा करती गुलज़ार स्टाइल की दाढ़ी। चेहरे को देख के ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण संरक्षण का ध्यान अनायास आ जाता है। हाथ में मुस्तैदी से टंगा ब्रीफकेस। चाल-ढाल में गज़ब का फुर्तीलापन। एमएसटी का लम्बा अनुभव जो एक दशक से ऊपर ही रहा होगा। लेकिन इतनी भीड़ में भी एकदम अकेला नज़र आने वाला व्यक्ति। न कोई संगी न कोई साथी। चेहरे पर संजीदगी। सबसे अलग,सबसे जुदा है उनकी शैली। 

पहली बार उनके दर्शन कड़कड़ाती ठण्ड में हुये। पिछले पैराग्राफ में आपने सही पढ़ा था "जाड़ा-गर्मी-बरसात क्रीम कलर की हाफ़ शर्ट और डार्क ब्राउन कलर की पैंट"। अधिकांश लोग सर्द हवाओं से सिसिया रहे थे। हम सभी टोप-कनटोप लगाये, दस्तानों और मफलर के सहारे जैकेट में घुसती सर्द हवा को रोकने का प्रयत्न कर रहे थे। जब मेरी उन पर नज़र पड़ी। हाथ में ब्रीफकेस लिये एकदम सीधे खड़े व्यक्ति को नज़रअंदाज़ कर पाना असंभव था। मैंने अपने मित्र लोहानी जी, जो हमारे ग्रूप में एमएसटी करने वाले सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं, से पूछा भाई ये आइटम क्या है। उन्होंने शर्मा जी के बारे में उतना ही बताया जितना मै पहले बता चुका हूँ। पता नहीं क्यों मुझे कॉमिक्स में पढ़े फैन्टम का ख्याल आ गया। वो भी तो सिर्फ स्किन टाइट कपड़े पहनता था। सम्भव है ये व्यक्ति भी फैन्टम की तरह ही एक किंवदंती न हो।

स्टेशन पर लगभग हर ग्रूप के इकठ्ठा होने का एक अड्डा होता है। अकेले आदमी को ट्रेस कर पाना संभव भी नहीं है इतनी भीड़ में। मेरे लेखक की जिज्ञासा शर्मा जी में जग चुकी थी। लेकिन कभी मुलाकात का मौका नहीं मिल पा रहा था। एक दिन मौका मिल गया। गर्मी बहुत थी उस दिन। जब लखनऊ से लौटते समय मैंने देखा शर्मा जी के बगल की सीट खाली है। मै कई अन्य खाली सीटों को छोड़ता हुआ उनके बगल वाली सीट पर लपक के काबिज हो गया। बात छेड़ने की ग़रज़ से मैंने कुछ बातें शुरू कीं। तब पता चला वो अत्यंत अल्पभाषी भी हैं। हूँ-हाँ से बखूबी काम चला गये। उनके बारे में जानने की मेरी जिज्ञासा और तमन्ना धरी की धरी रह गयी। अमूमन हम हिन्दुस्तानियों को अपने बारे में दिल खोल के बातें करना पसन्द है। बात करने के मुद्दे हों या न हों, किन्तु रास्ते भर पडोसी के इंटरटेनमेंट का पूरा ख्याल रखा जाता है। अगर ट्रेन ज़्यादा लेट हो गयी तो आप सुबह के नाश्ते में क्या खाया था और रात डिनर में क्या खाने वाले हैं जैसी महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी हासिल कर सकते हैं। लेकिन यहाँ दाल गलती नहीं दिख रही थी। 

चलने से पहले धीरे-धीरे कोच भर गया। दो की सीट पर तीन और तीन पर चार लोगों का बैठना तो मानक है। चार से ऊपर यदि किसी ने अटकने की कोशिश की नॉन एमएसटी वाले आपत्ति करने लगते हैं। हवाबाज टाइप के नौजवान गेट पर ही खड़े रहना पसंद करते। खड़े रहने के अपने फायदे हैं पूरे कोच में आप आगे से पीछे तक सब पर नज़र रख सकते हैं। ये बात अलग है कि कुछ लोग उन्हें शोहदे या लफंगे या लुच्चे समझने की गुस्ताखी कर सकते हैं। लेकिन यहाँ मेरे विचार 'जाकी रही भावना जैसी' टाइप की है। तो जनाब खुशकिस्मती से उस दिन हमारी सीट पर किसी चौथे आदमी का पदार्पण नहीं हुआ। ऐसा कम होता है जिस दिन ठीक से बैठने को मिले।

अब तीन लोगों की सीट पर खिड़की की तरफ एक अनजान आदमी था, उसके बगल में शर्मा जी और उनके बगल में मै यानि वर्मा जी और मेरे बगल में गलियारा। बात बनती न देख कर मै अपने स्मार्ट फ़ोन में घुस गया। उन्नाव आने पर सवारियों का एक रेला अंदर आ गया। एक महिला जिन्हें किस भी लिहाज़ से वृद्ध नहीं कहा जा सकता था, मेरे बगल में आ कर खड़ी हो गयीं। उन्हें अनदेखा कर के मै अपने फ़ोन में और अंदर उत्तर गया। एकाएक शर्मा जी उठ के खड़े हो गये अपनी सीट उन महिला को ऑफर कर दी। शर्माने की बारी अब मेरी थी। झेंप मिटाते हुये मैंने कहा शर्मा जी आप बैठिये मै खड़ा हो जाता हूँ। वो बस मुस्करा के रह गये। मुझे लगा किम्वदन्तियाँ ऐसे ही नहीं बन जातीं।   

- वाणभट्ट 

रविवार, 26 जुलाई 2015

ब्लेम इट टू ब्रिट्स 

हम सभी, जो अपने आप को थोड़ा बहुत बुद्धिजीवी समझते होंगे, ने थरूर साहब का वायरल हुआ वीडियो ज़रूर देखा होगा। बहुत ही सलीके से उन्होंने, सधी हुयी अंग्रेजी में, उन्हीं के देश में, उन्हीं लोगों के सामने, उनकी जिस तरह से धज्जी उड़ाई है, वो काबिल-ए-तारीफ है। उससे पूरा प्रबुद्ध भारत एक फील गुड फैक्टर का शिकार हो गया। जो लोग आज भी अंग्रेजों के राज में अंग्रेजों के साथ होते वो भी देश प्रेम की इस आंधी में कूद पड़े हैं। हर तरफ वाह-वाह होनी भी चाहिये। इतने सालों बाद ही सही किसी ने आइना पूरी ईमानदारी के साथ दिखने की कोशिश तो की। अंग्रेज़ी जानने और बोलने वालों की इस देश में ब्रिटिश शासन के दौर से ही कोई कमी नहीं रही। लेकिन उनमें से अधिकतर की सोच पर भी ब्रितानी भाषा और संस्कृति का प्रभाव छाया रहा। वो अंग्रेज़ों की भारत में छूट गयी औलादों की तरह ही बर्ताव करते रहे। और यदि हम सभी अपने आस-पास पर सूक्ष्म दृष्टि डालें तो आज भी हम अंग्रेज़ी संस्कार और शिष्टाचार की ही नक़ल करते दिखाई देते हैं। वर्षों की गुलामी ने हमारी नींव को हिला के रख दिया है। नेता जी, इस शब्द से हम पुराने लोगों के जेहन में सिर्फ आदरणीय सुभाष चन्द्र बोस की ही तस्वीर आती है, ने अपनी एक पुस्तक में आज़ादी के बाद कुछ वर्षों की लिमिटेड डिक्टेटरशिप का ज़िक्र किया था। उनका मानना था कि सैकड़ों सालों की गुलामी के कारण भारतवासी अपनी अस्मिता को भूल चुका है। उसके ह्रदय में देश प्रेम, देश भक्ति, आत्मगौरव, स्वदेश और स्वाभिमान की अलख जगाना प्राथमिकता होनी चाहिये तभी देश सही दिशा में विकास कर पायेगा।   

थरूर साहब का भाषण ऑक्सफ़ोर्ड सोसाइटी द्वारा आयोजित वाद-विवाद का एक हिस्सा था। बाकी वक्ताओं के विचारों को सुनाने-समझने के लिये पूरा प्रोग्राम वायरल होना चाहिये। पक्ष-विपक्ष दोनों ही ने अपनी बात को दमदार तरीके से रखने के लिये तथ्यों का सहारा लिया होगा। हमारी दिक्कत ये हैं की हम वही सुनते हैं जो हम सुनना चाहते हैं। ताली बजाना शायद सबसे आसान काम है। दूसरे करें और हम सिर्फ तमाशा देखें। इस देश में ऐसे वक्ताओं की कमी नहीं है जिनके भाषण में देश प्रेम न झड़ता हो लेकिन उनके आचरण में इस चरित्र का सर्वथा अभाव रहता है। पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को तो भ्रष्ट से भ्रष्ट नेता-अधिकारी-कर्मचारी इस प्रेम में सराबोर दिखाई देता है। राजनीति में जब सत्ता और प्रतिपक्ष दोनों देश प्रेमी हैं तो देश को विकसित होने से कौन रोक सकता है। लेकिन ये सब जानते हैं कि पिछले छः दशकों हमें जहाँ होना चाहिए था हम वहां नहीं पहुँच पाये। इतिहास के पन्नों में दर्ज़ किन-किन विसंगतियों का हिसाब हम किन-किन देशों से मांगेंगे। चंगेज़ खां से लेकर महमूद ग़ज़नवी, मोहम्मद गोरी से लेकर सिकंदर, फ्रांसीसियो पुर्तगालियों और अंग्रेज़ों, जिसे देखो मुँह उठाया और चला आया। किस-किस से हिसाब माँगते फिरेंगे हम। इतने वर्षों की गुलामी के बाद भी जो हम नहीं सीखने को तैयार हैं वो है इतिहास से सबक। अगर आप में एका नहीं है तो बाहर वाला तो इस फ़िराक़ में बैठा ही है कि आपके घर में घुसा जाये। देश का विकास सत्ता पक्ष भी करना चाहता है और प्रतिपक्ष भी। लेकिन किसी भी मुद्दे पर ये एकजुट नहीं हैं। मामला क्रेडिट लूटने का है। वो भी देश की बलि दे कर। 

जिन देशों से हम मुकाबला करना चाहते हैं उनमें कई साझा बातें हैं। देश के प्रति प्रेम, नियम-कानून का पालन, अपने वैधानिक पदों की गरिमा और त्वरित न्याय प्रक्रिया कुछ ऐसी ही बातें हैं। और ख़ास बात ये है कि ये सब मूल्य में दो-ढाई साल की उम्र से ही घुट्टी में पिलाये जाते हैं। जब हम अपने बच्चों को पापा - मम्मा सीखा रहे होते हैं वो था-था सीखा रहे होते हैं। जिससे बच्चे को थैंक यू कहने में आसानी हो। जिस देश में सत्य, अहिंसा, न्याय, देश प्रेम सिर्फ भाषणों तक सीमित हो गया हो और इनका पालन करने वाला स्वयं को अल्पसंख्यक और असहाय समझता हो, उस देश में क्रांतियाँ सिर्फ कागज़ों में आती है। हक़ीक़त में आते - आते पीढ़ियां गुज़र जातीं हैं। समस्यायेँ अनंत हैं। उतने ही वादे, उतने ही नारे। बेटी बचाओ, पर्यावरण बचाओ, बिजली बचाओ, पानी बचाओ। क्लीन इण्डिया, ग्रीन इण्डिया, मेक इन इण्डिया। खासियत ये कि सारा देश भी यही चाहता है। पक्ष-विपक्ष, अमीर-गरीब, सरकारी-गैरसरकारी सब। लेकिन यक्ष प्रश्न है करेगा कौन। प्रधानमन्त्री कहेगा कि सफाई रक्खो तो हम गन्दगी फैलाएंगे। हम वो सब करेंगे जो एक संभ्रांत नागरिक को नहीं करना चाहिये। इसी से हमें आज़ादी का एहसास होता है। और आज़ादी का सम्बन्ध मन से है, तन भले ही कीचड़ में लोट रहा हो। आमिर खान को सत्यमेव जयते के एक भी एपिसोड करने की ज़रूरत नहीं पड़ती अगर हम प्राइमरी शिक्षा में मॉरल-एथिक्स पर जोर देते और बच्चों के सामने वो नज़ीर रखते जो सिर्फ लफ़्फाज़ियों में बर्बाद कर देते हैं। बच्चा अपने बड़ों से ही सब सीखता है। घर-परिवार-समाज का रोल भले दिखाई न दे किन्तु हमारे अंदर तक पैठ जाता है। सदियों की गुलामी ने हमारे डीएनए को बदल डाला है। हम अभी भी आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं। पहले फिरंगी थे अब अपने ही रंग वाले। पान-गुटका खा के हमारा नागरिक जब पाव लीटर फेचकुर सड़क पर फेंकता है तो निश्चय ही उसके ह्रदय में क्रांतिकारी भाव होता होगा। मानो लार्ड क्लाइव के मुँह पर उसका पीक पड़ने वाला हो। कोई नागरिक अपने ही देश-स्थान को कैसे गन्दा कर सकता है।

हमारी एक आदत सी बन गयी है। हर बुराई का आरोप दूसरों पर मढ़ देना। अंग्रेज़ों के माफ़ी मांग लेने से हमारा अतीत नहीं बदलने वाला। किसी को नीचा दिखा कर हम ऊँचे नहीं हो जाएंगे। सेल्फ इम्प्रूवमेंट की कोई भी किताब पढ़ लें। वो पहले ही आगाह करते हैं  वर्तमान परिस्थितियों के लिए स्वयं जिम्मेदार बनिये। दूसरों को दोष देने से कुछ नहीं होने वाला। मुझे स्वामी विवेकानन्द की कुछ पंक्तियाँ, जो कभी बहुत पहले आँखों के सामने से गुज़रीं थीं, प्रेरणा देतीं हैं - और किसी का नहीं दोष तो मेरा ही है … मै ही तो अपना साकार अतीत हूँ …। हम आज़ादी के साठ साल बाद भी अपनी कमज़ोरियों का ठीकरा दूसरों के सर फोड़ने में लगे हैं। यदि हम भारत को उन्नत राष्ट्रों  देखना चाहते हैं तो ये काम आदर्श नागरिकों के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। और आदर्श नागरिक की बुनियाद दो -ढाई साल के बच्चे से तो सम्भव है लेकिन पचीस साल के नवजवान को सही गलत भेद समझा पाना कठिन है। देर कभी नहीं होती। जब जागो तभी सवेरा। चंग़ेज़ों, ग़ज़नवियों, गोरियों और अंग्रेज़ों के समय हमने जो गलतियां की थीं कम से कम उन्हें तो न दोहरायें। बँधी मुट्ठी ही ताक़त है। 

हमें अपनों ने लूटा गैरों में कहाँ दम था  
मेरी कश्ती वहां डूबी जहाँ पानी कम था  

(मुझे शक है, ऐसा शेर ग़ालिब नहीं लिख सकते। असली लेखक को आभार सहित)  

- वाणभट्ट 

रविवार, 3 मई 2015

फकीरा चल चला चल

इस देश में कभी भी विचारकों की कमी नहीं रही होगी। जब बाकी दुनिया वैज्ञानिक प्रगति के लिए प्रयास कर रही थी, हम इह और उह लोक की गुत्थी सुलझाने में लगे थे। लेकिन विचारों का क्या है कब आये कब चला जाये। इसलिये इनको लिपिबद्ध करना आवश्यक है। इतने ग्रन्थ और पुराण ऐसे ही नहीं लिख गये। भाषा जितनी गूढ़ हो विचारक उतना ही महान। शायद इसीलिये ज्ञानी जनों ने संस्कृत को अपना माध्यम बनाया।आम आदमी व्याकरण की जटिलता और शब्दों की क्लिष्टता से ही विचारक ऑब्लिक लेखक को विद्वान मान लेता था। सूर-तुलसी-मीरा-रहीम-रसखान की सीधी सच्ची बातें हर किसी की समझ आ जातीं थीं, लिहाजा ये जन कवि बन गये। इनकी ज्ञान-गंगा सुनने-पढने वालों से सीधा सम्वाद करतीं थीं। इन्हें अपनी बात पाठकों तक पहुंचनी थी, अतः इन्होने भाषा का आडम्बर नहीं अपनाया। आज भी इनकी रचनाओं का घर-घर में पठन-पाठन होता है। पर तब भी ग्रन्थ-वेद-पुराण केसरिया कपड़ों में लिपटे पूजा स्थल की शोभा बढ़ाते रहे होंगे। इनको पढ़ पाना भी छोटे-मोटे विद्वानों के बस की ही बात रही होगी। नतीजा ये कि संस्कृत जानने वाला हर व्यक्ति पंडित-ज्ञानी बन गया।        

आज ज़माना बदल गया है। कलियुग के आसार तो भारतीय साहित्य के आरब्ध से ही परिलक्षित होने लगा था। आज वो अपने चरम पर है। मुगलों और अंग्रेजों की लम्बी गुलामी ने संस्कृत के मूल पर ही प्रहार किया। ज्ञानी पहले अरबी-फारसी को तवज्जो देने लगे बाद वही पदवी अन्ग्रेज़ी को सौंप दी गयी। अँगरेज़ तो चले गये पर अंग्रेजी के यहाँ से टलने के आसार कम ही दिख रहे हैं। आज संस्कृत के जानकार खोजे नहीं मिलते और जो मिलते हैं वो उसका सार काम-व्यापार की नीयत से ज़्यादा समझते हैं।ज्ञान कल भी आम आदमी की पहुँच से दूर था और आज भी दूर है। और यही गति रही तो कल भी रहेगा। 

संस्कृत की जगह अंग्रेजी ने ले ली है। पहले किताबी शिक्षा आश्रमों और गुरुकुलों में कुलीन परिवारों तक ही सीमित थी। भला हो अंग्रेज़ों का जिन्होंने क्लर्क तैयार करने के लिये स्कूली शिक्षा को बढ़ावा दिया। शिक्षा को रोजगार गारंटी स्कीम की तरह देखा जाने लगा। गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले, गाँव-गाँव पाठशालाएँ खुल गयीं। सब वन टू का फोर करने में लग गये। विचारकों के विचारों को चैलेंज किया जाने लगा। आज लोग सिर्फ इसलिए कि पुराणों में जो कुछ कहा गया है, वो मानने योग्य है, ये मानने को तैयार नहीं। देश काल के साथ ज्ञान को परिमार्जित होते रहना चाहिए। पर हम धर्म के नाम पर अपने-अपने ग्रंथों की परिपाटी को ढोने को विवश हैं। हज़ारों साल पहले कही चीज़ों को हर परिस्थिति में, सदैव मान्य, ब्रम्ह-वाक्य की तरह स्वीकार कर लिया गया है। इसमें कोई रद्दो-बदल की गुंजाईश देखने वाला नास्तिक करार दिया जा सकता है। मानवता, परम्परा और संस्कार की भले ही सबने तिलांजली दे दी हो। भौतिकतावादी युग में जीवन और आचरण सब बदल गया है। नहीं बदले हैं तो हमारे ग्रन्थ। आज सही-गलत में अंतर कर पाने की दुविधा संभवतः पहले से कहीं ज़्यादा है। और फेस बुकिया और व्हाट्सऐप्पिया ज्ञान का आलम ये है कि ज्ञानीजन अपने विचारों को चाणक्य और सुकरात के विचार बता कर चेप  रहे हैं। कोई ऑथेन्टिसिटी चेक तो है नहीं। किसी ने अपनी घटिया शायरी बच्चन जी के नाम से चेप दी। सैकड़ों लाइक भी मिल गये। आपत्ति करने पर जनाब फरमाते हैं कि आप कथ्य पर जाइये। किसने कहा है इससे क्या फर्क पड़ता है। अपने नाम से बंधु ने ठोंका होता तो मुमकिन है अपना मिला के दो लाइक भी न मिलते।

आज के युग में विचारकों ने अपने महान विचारों के लिये अंग्रेजी भाषा को पकड़ रखा है। कभी ये सौभाग्य संस्कृत को मिला हुआ था। अच्छा हुआ सूर-तुलसी-मीर-ग़ालिब आज नहीं पैदा हुए वर्ना फ्रस्ट्रेशन से मर जाते कि कितने जतन से हम अपनी बात कह रहे हैं और सुनने वाले हैं कि हिज़ मास्टर्स वॉइस के प्राणी की तरह कुछ और सुनने को राज़ी नहीं हैं। अच्छे विचारकों का शगल है कि दूसरों के विचारों से अवगत रहें। हिंदी या जनसामान्य की भाषा में जो कहा-सुना-लिखा जा रहा है वो निंदनीय है भर्त्सनीय है। अंग्रेजी अखबार, पत्रिका या चैनल जो भी कह रहा है उसे पढ़िये-सुनिये-गुनिये और उसे इस अंदाज़ में पुनः लिखिये-कहिये जैसे इस विचार की उद्गमस्थली आप ही हैं। इतनी विवेचना कर डालिये कि ओरिजिनल लेखक को भी शक होने लगे कि ये उसके नहीं आप के ही विचार हैं। वैसे भी कॉपीचोर समाज में कॉपीराइट के लिए लड़ने में समय व्यर्थ करना मूर्खता नहीं तो मूर्खता जैसा तो है ही। दूसरी भाषा में लिखिये और पहली भाषा को ज्यों का त्यों भी चेप दीजिये तो कोई माई का लाल ये नहीं कह सकता कि ओरिजिनल माल किसका है। एक राज़ आज आप सबसे बाँट रहा हूँ। किसी से कहना नहीं। चूँकि मैं हिंदी में लिखता हूँ इसलिये अंग्रेजी के दो-एक अखबार भी पलट लेता हूँ। अमूमन मसाला मिल जाता है जिसें हिंदी में चिटका देता हूँ। हिंदी वाले ज्ञानी भले न माने (क्योंकि हिंदी पत्रिका या ब्लॉग पढ़ना समय व्यर्थ करने के सामान समझा जाता है) पर  अंग्रेजी वालों को शक नहीं होता। खबर तो हिंदी में ही चटखारे ले ले के पढता हूँ पर मौका मिले तो अंग्रेजी एडिटोरियल पर नज़र मार लेता हूँ। यही वो जगह है जहाँ से आप ओरिजिनल विचारों का चोर्यीकरण कर सकते हैं। अंग्रेजी अख़बारों के विचारकों को जब देश के गण्यमान्य लोग ज़्यादा तरजीह देते हैं तो मेरे जैसे सामान्य व्यक्ति को विचारों के लिए विभिन्न स्रोतों को तलाशना नितांत अनुचित है। कुछ जेब, कुछ समय अगर इज़ाजत दे देते तो शायद मै भी बैठकबाजी करके हिंदी के गण्यमान विचारकों में शामिल हो गया होता। कोई बात नहीं।

इस ग़रज़ से जब रविवार का एडिटोरियल पलटा तो पाया अंग्रेजी के एक ज्ञानी विचारक जी फरमा रहे हैं "डिप्रेशन इज़ मेन कॉज़ ऑफ़ फार्म सुसाइड।" इन महानुभाव ने लैंसेट जरनल में छपे एक शोध पत्र के आधार पर सांख्यकीय माध्यम से बहुत ही तर्कपूर्ण ढंग से ये समझाने का प्रयास किया था कि आत्महत्या की प्रवृत्ति एक मानसिक बीमारी है। जिसका मूल कारण अवसाद है। मानसिक तनाव है न कि वित्तीय तनाव। भारत में आत्महत्या की दर ११ प्रति एक लाख व्यक्ति है। जो विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। ये भी माना गया है कि वास्तविक दर, प्रतिवेदित दर ३० से ४० प्रतिशत अधिक हो सकती है। वैश्विक आत्महत्या पैटर्न का खेती आत्महत्या से कोई सीधा सरोकार नहीं है। लैंसेट अध्ययन ने अनौपचारिक स्रोतों से बताया है कि किसान की संख्या गैर-खेती लोगों की तुलना में कम है। फार्म सुइसाइड्स की दर नॉन-फार्म की तुलना में घटी है। पढ़े-लिखे और संपन्न लोगों में आत्महत्या का प्रतिशत अधिक है। आक्षेप ये लगाया है कि प्रेस और मीडिया अपनी टी आर पी बढ़ाने के लिये फार्म सुइसाइड्स को बढ़ा-चढ़ा के दिखाता है। पत्रकार मेडल और अवार्ड की चाहत में इन खबरों को ज़रूरत से ज़्यादा हवा देते हैं। लेखक ने तो यहाँ तक कह दिया कि जेनेटिकली मॉडिफाइड क्रॉप्स का जो लोग विरोध कर रहे हैं वो वास्तव में आत्महत्या को बढ़ावा दे रहे हैं। 

देश-दुनिया में हज़ारों शोध हो रहे हैं, हज़ारों शोध पत्र छप रहे हैं। एक प्रतिवेदन के आधार पर समस्त पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा करना कहाँ तक जायज है ये समझ से पर है। शोध से पूर्व ही शोधकर्ता एक परिकल्पना, एक अवधारणा बना कर प्राथमिक या द्वितीयक आँकड़े एकत्र करता है। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ़ इंडिया २००१-०३ तथा यू एन के २०१० के सर्वे पर आधारित है ये पत्र। जिस देश में एक लाख सत्तर हज़ार आत्महत्यायें दर्ज होतीं हों वहाँ इस प्रकार के अध्ययन का महत्त्व बढ़ जाता है। ये प्रयास अनूठा और सराहनीय है। लेकिन हर अध्ययन का सीधा-सपाट निष्कर्ष भ्रामक हो सकता है। इसको सूखे, बाढ़, बढ़ती खेती लागत और बढ़ते कृषि ऋण से जोड़ कर भी देखा जाना चाहिये। जिन वर्षों में प्राकृतिक आपदा आई उन वर्षों में कितने किसान प्रभावित हुये। 

जो लोग आत्महत्या करते हैं अमूमन उनके सपने, उनके यथार्थ से बड़े होते हैं। और ये बात पढ़े लिखे और अनपढ़ दोनों पर लागू होती है। चिंता का विषय ये है कि विकास के साथ-साथ आत्महत्या की प्रवृति भी पहले से अधिक विकसित हुयी है। एक ही जीवन में  भौतिक सुख के सभी साधन पा लेने के लिए आदमी बड़े-बड़े दांव खेलने से नहीं चूक रहा है। आसानी से उपलब्ध ऋण व्यवस्था लोगों को ज़मीन -जायजाद गिरवी रख कर क़र्ज़ लेने को प्रेरित करती है। शहरों और दूरदर्शन की चकाचौंध आम आदमी को वो सपने दिखाती है कि वो आर-पार की लड़ाई में कूद जाता है। चाहे वो क्रिकेट की दुनिया हो या फ़िल्मी सितारों की। जितना बड़ा जुआ उतना बड़ा लाभ। जो आदमी नहीं सीख पा रहा है वो है सब्र। विकेट पर खड़े रहना ही जीत है। एक आशा तो बनी रहती है। समाज का एक भी व्यक्ति यदि समाज को अपनी मर्ज़ी से त्यागता है तो ये समाज की मौत है उसकी नहीं। क्या फर्क है कि वो किसान है या नहीं। 

- वाणभट्ट               

मंगलवार, 3 मार्च 2015

विज्ञान दिवस



तीसरा अलार्म बज रहा था। राबिया बेगम ने करवट बदलते हुये लिहाफ में सर घुसेड़ दिया। फ़रमाया - "आ गया कमबख्त"। राशिद मियां को बिस्तर से उठना पड़ा। पहला अलार्म पाँच बजे का था और दूसरा साढ़े-पाँच का। इन दोनों को बंद किया जा सकता था। किन्तु तीसरा तब तक बजता था जब तक राशिद मियाँ बिस्तर से उठने को मज़बूर न हो जायें। ये दूधिया अपने दूध के चक्कर में जाड़ा-गर्मी-बरसात 365 दिन छः बजते-न-बजते घंटी बजा ही देता। राबिया बहुत झल्लाती - "दूध नहीं पानी पिला रहा है, ना चाय में रंगत आती है, ना दही ही जमता है। सुबह-सुबह नींद खराब होती है सो अलग से।" लेकिन राशिद मियां का मानना था अगर राधे न आता तो पूरा घर सोता ही रह जाता। बेगम साहिबा के चक्कर में बच्चों का स्कूल भी छूट जाता। ये तीसरा अलार्म था जिस पर राशिद को पूरा भरोसा था। ये बात अलग है कि राबिया ने इस काम में उसका सहयोग देने से मना कर दिया था। चूँकि ये सुझाव राशिद भाई का था लिहाज़ा सभी मौसम में दूध लेने की ज़िम्मेदारी उन्हीं के कन्धों पर थी। 


भगोना ले कर बाहर निकले तो देखा फाटक पर पाठक जी खड़े हुए थे। मुस्कराते हुये बोले - "गुड मॉर्निंग राशिद भाई। ज़्यादा सुबह तो नहीं आ गया। आप लोग तो अर्ली राइज़र हैं इसलिए सुबह-सुबह घंटी बजा दी। डिस्टर्ब तो नहीं कर दिया।" राशिद को कभी-कभी अपने हद से ज़्यादा ज़हीन होने पर अफ़सोस होता था। ऐसे लोगों के लिये राबिया ही सही है, मुंह-तोड़ जवाब तो देती। पाठक जी निकट के साइन्स कॉलेज में रसायन शास्त्र के प्रवक्ता पद पर नियुक्त थे। एक कार्ड निकलते हुए बोले - "आज हमारे यहाँ साइंस-डे मनाया जा रहा है। ऊपर से आदेश है।बजट भी आया है। एक छोटा सा प्रोग्राम रखा है। ग्यारह से एक बजे तक। दो-चार वक्ता हैं। उसके बाद हाई-टी का आयोजन भी है। आप आयेंगे तो अच्छा लगेगा। मुस्लिम रिप्रेसेंटेशन भी हो जायेगा। लोग मानते हैं कि मुसलमानों की विज्ञान में कम दिलचस्पी होती है।" अभियांत्रिकी में आईआईटी से पीएचडी करने के बाद राशिद ने सपने  नहीं सोचा होगा कि उसे कभी इस प्रकार का कॉम्पलिमेंट सुनने को मिलेगा। परन्तु प्रत्यक्ष रूप से उसने पूरी कोशिश करने का वादा कर लिया। तब तक राधे भी आ गया। पाठक जी को और भी कार्ड बांटने थे इसलिये इस मुलाकात का अन्त हो गया।

राशिद नियत समय पर कॉलेज के रसायन शास्त्र विभाग के सेमीनार रूम में पहुँच गया। तैयारियाँ अभी चल रहीं थीं। डायस के किनारे दीप प्रज्वलन की तैयारी थी। साफ़-सफाई में लगे थे सभी विभाग के कर्मचारी। पाठक जी ने मुस्कराते हुये स्वागत किया - "प्राचार्य जी आते ही होंगे। वही कार्यक्रम चीफ गेस्ट भी हैं। तब तक और गैदरिंग हो जायेगी।" हॉल की स्थिति देखते हुये ये समझ आ रहा था कि पूरी गैदरिंग में 50-60 से ज़्यादा लोगों के आने की उम्मीद नहीं थी। आयोजन की ज़िम्मेदारी पाठक जी पर ही थी। वो अपने काम में व्यस्त हो गये। राशिद ने कोने की एक सीट पकड़ ली। 

लोग आ रहे थे और अधिकांश झाँक-झाँक के लौट जा रहे थे। कुछ बैठ गए थे। संभवतः दूसरे डिपार्टमेंट के लोग हों। कुछ स्नातकोत्तर छात्र लग रहे थे। सीटें खाली दिख रही थीं इसलिये पाठक जी ने कार्ड की औपचारिकता त्यागते हुये किसी को भी पकड़ लाने का विचार अपने सहकर्मियों के सामने रख दिया। धीरे-धीरे 30-40 लोगों को इकठ्ठा कर पाने में आयोजक सफल हुये। प्राचार्य और वक्ता लोग मंचासीन हो गये। संचालन का जिम्मा भी श्रीमान पाठक जी पर ही था। कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप-प्रज्वलन से हो गया। उसके बाद विभाग के प्रथम विभागाध्यक्ष के चित्र पर माल्यार्पण होना था। पोडियम से पाठक जी ने मुख्य अतिथि और वक्ताओं से चित्र पर मल्यार्पण करने का आग्रह भी कर दिया। पर ये क्या मन्च पर फोटो नदारद थी। पाठक जी के चेहरे पर कई रंग आ-जा रहे थे। 

प्राचार्य महोदय ने बात सम्हाल ली - "पाठक जी फोटो मंगवा लीजिये। ये तो इन-हाउस कार्यक्रम है।" एक आदमी फोटो लाने के लिए लपका। आनन-फानन में वही आदमी फोटो झाड़ता हुआ मंच पर आ गया। पर फोटो रखने के लिये वहां कोई व्यवस्था नहीं थी। लिहाजा एक कुर्सी के ऊपर उसे स्थापित करने का प्रयास किया जाने लगा। कुर्सी के हत्थों पर फोटो को टिकाया गया। पर हत्थों का आकर या फोटो की सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी या दोनों ही, कुछ ऐसी थी कि जैसे ही फोटो को छोडो वो नीचे की ओर सरकने लगती। व्यवहारिक ज्ञान के लिए विज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। विभाग के चपरासी ने कहीं से एक चादर ला कर उसे कुर्सी पर बिछा दिया तब जा कर फोटो टिक सकी। अब माला पहनाने की बारी थी। लेकिन जैसा हमारी मानक टीमों में होता है दायें हाथ को ये खबर नहीं होती कि बायाँ हाथ क्या कर रहा है। बायेँ को फोटो लाने को बोला गया और दायें को माला। और दायें-बाएं की आपस में कभी बात भी नहीं हुयी। माला फोटो की तुलना में छोटी थी सो अपनी सहज बुद्धि का परिचय देते हुये प्राचार्य महोदय ने माला फोटो के इमैजिनरी चरणों में अर्पित कर दी।      

कार्यक्रम शुरू हो गया। वक्ताओं में विज्ञान और वैज्ञानिक सोच के प्रति अपने प्रबुद्ध उद्बोधनों से उपस्थित श्रोताओं को मुग्ध करने की होड़ सी मच गयी। पाठक जी बचे-खुचे कार्यक्रम को सकुशल निपटाने में व्यस्त हो गये। कार्यक्रम अपने अंतिम चरण पर था जब पाठक जी का ध्यान राशिद की ओर गया। वो पिछली कुर्सी पर निढ़ाल पड़ा था। आँखें पलट कर कूटस्थ में टिकीं हुयी थीं। हाथ-पैर पसारे बेहोश पड़े राशिद को देख पाठक जी के हाथ-पैर फूल गये। आज का दिन किसी भी तरह से उनके अनुकूल नहीं था। किसी तरह आयोजन निपटा कर वो मंच से राशिद भाई की ओर भागे। "राशिद भाई - राशिद भाई आप ठीक तो हैं।" मियां राशिद की तन्द्रा टूट गयी।  बोले - "बड़े ही ज्ञानवर्धक और ओजपूर्ण व्याख्यान चल रहे हैं।" पाठक जी को आज पता चला कि जान में जान आना किसे कहते हैं। बोले - "व्याख्यान तो ख़त्म हो गए हैं। चलिये हाई -टी का आनन्द लेते हैं। आपके आगमन के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद।" 

सभी के साथ वो दोनों भी उस दिशा में बढ़ लिये जहाँ हाई-टी सर्व की जा रही थी। 

- वाणभट्ट   

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

प्रेम दिवस : श्याम सिंह की अधूरी कहानी 


तब तक बाबा वैलेंटाइन का आविर्भाव भारत की धरा पर नहीं हुआ था। ये कहना मुश्किल है कि उस दौर में देश, प्रेम के प्रभाव से मुक्त्त रहा होगा। प्रेम पर ग्रन्थ और महाकाव्य आदि काल से यहाँ लिखे जा चुके थे। वैलेंटाइन बाबा के दादा-परदादा की औकात नहीं थी कि हिंदुस्तानी प्रेम की ए-बी-सी भी समझ पाते। सोलह कला सम्पन्न भगवान यहाँ द्वापर में ही डेरा डाल चुके थे। क्यूपिड की अवधारणा भी हमारे कामदेव से चुराई हुयी लगती है। बसंत के आगमन के साथ ही शरद ऋतु में सोयी पड़ी सभी आकांक्षाएं और अपेक्षाएं अंगड़ाई लेना शुरू कर देतीं हैं। कवियों ने इस माह को ऋतुराज का सम्मान ऐवें ही नहीं दे दिया। इस मौसम का आना और प्रेमीजन का बौराना यहाँ का एक चिरंतन सत्य रहा है। 



जिस प्रकार हर भारतीय अपनी पुश्तैनी श्रेष्ठता मनोग्रन्थि से पीड़ित रहता है, इस बात को सौ फीसदी गारंटी के साथ कहा जा सकता है कि बाबा वैलेंटाइन ने कॉपीराइट का उल्लंघन करते हुये प्रेम दिवस का पूरा कॉन्सेप्ट ही हाइजैक कर लिया। अगर ये उनका ओरिजिनल आइडिया होता तो  क्या वैलेंटाइन डे बसन्त ऋतु में ही पड़ता। अक्टूबर-नवम्बर में यह दिन मनाया जाता तो कोई नयी बात होती। ये तो हमारी नयी पीढ़ी की विशेषता है कि अपने स्वर्णिम अतीत को पूरी तरह झुठला देना चाहती है। हर चीज़ के लिये पश्चिम की ओर मुँह बाये देखती रहती है। जिस देश में सुर-ताल भी नियम-कानून से आबद्ध रहता हो वहां प्रेम की मर्यादाएं भी भली-भाँति परिभाषित थीं। ये माउस- कम्प्यूटर-फेसबुक वाली जेनेरेशन अपनी विरासत को अन-डू करने पर आमादा है। पर इसमें इसका कोई दोष भी नहीं है। जवानी हमेशा दीवानी होनी ही चाहिये। सदैव नयी संभावनाओं की तलाश ही नाम है जवानी का। सपने देखने का हौसला और उन्हें पूरा करने की ज़िद। जैसे नीम-पुदीना-तुलसी-अदरक-हल्दी हमारे पेटेंट हैं वैलेंटाइन डे पर भी हमें दवा ठोंक देना चाहिये। मुझे यह कहने में कतई गुरेज़ नहीं है कि बाबा वैलेंटाइन ने हमारा ही आइडिया चुरा के कई मल्टीनेशनल कम्पनियों के माध्यम से हमें ही वापस बेच दिया। 



हर क्रिया-कलाप का सामाजिक के साथ-साथ एक आर्थिक पक्ष भी होता है। युवाओं में प्रेम का इतना बड़ा मार्केट खोज पाने में देशी उद्योग जगत पूर्णतः असफल रहा। चॉकलेट-कार्ड-गिफ्ट का सिलसिला जो पूरे हफ्ते चलता है शनै-शनै एक अच्छे-खासे व्यवसाय में परिवर्तित हो चुका है। कभी-कभी तो ये लगता है कि ये मल्टीनेशनल कंपनिया न आतीं तो हमारे युवाओं का क्या होता। अपने लिये सच्चा प्यार खोज पाना इस पीढ़ी के लिये कितना कठिन होता। 



ऐसा नहीं है कि पुराने ज़माने में लोग प्रेम-सुख से वंचित रहे हों। को-एड स्कूलों में पढने का और कोई फायदा रहा हो या न रहा हो, एक फायदा ज़रूर होता था। जितने भी प्रेमीजन हुआ करते थे उन्हें किताबों और नोट्स की अदला-बदली का बहाना मिल जाया करता। ये बात अलग है कि अक्सर इस प्रकार का प्रेम इसी अदला-बदली तक ही सीमित रहता और कोई तीसरा गिफ्ट-विफ्ट पकड़ा कर बाज़ी मार जाता। टीचर-माँ-बाप और हितैषी पड़ोसियों कारण कितने ही प्रेम असफल रह गये कहना कठिन है। आठवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते टीन तो लग ही जाता था। उस पर तुर्रा ये कि कई साल के दो-चार फेलियर लडके-लड़कियों को उभरते प्रेमीजन बतौर कंसल्टेंट रख लेते। मर्यादा का तो ये आलम था कि टीचर्स केचुओं के निषेचन का पाठ स्किप कर जातीं। लडके उन पन्नों अंकित शब्दों को समझने का प्रयास करते। लड़कियाँ बगल में बैठे गहन अध्ययन में व्यस्त लडके के उन पृष्ठों पर यूँ नज़र डालतीं मानो अश्लील साहित्य हो।     




श्याम सिंह। हाँ यही नाम था उसका। आठवीं कक्षा में चार बार फेल होने के कारण उन्हें हमारी कक्षा की शोभा बढ़ाने का मौका मिला। बताने वाले बताते थे श्याम सिंह किसी रईस बाप की औलाद है और कहने वाले कहते कि श्याम सिंह का दिल हमारी क्राफ्ट टीचर पर आ गया है। इसलिये पास होना नहीं चाहता। आठवीं तक ही था हमारा स्कूल। उसके बाद लड़कों के जीआईसी में एडमिशन लेना होता। जिसका हौवा उसी तरह था जैसे इण्टर के बाद आईआईटी का। उस समय दिल के आने का मतलब भी समझ से परे था। गाहे-बगाहे जो फिल्में देखने का मौका मिलता उनमें भी मर्यादा का समवेश मर्यादा की पराकाष्ठा तक रहता। प्रेमी युगल दूर-दूर खड़े हो कर गाना गाते, तो फूल टकराते, तोते चोंच लड़ाते। ऐसे में केचुए के बारे में ना पढ़ा कर हमारे गुरुजनों ने हमारे साथ जो अन्याय किया उसकी नयी शिक्षा व्यवस्था में गुंजाईश नहीं है। 



एक दिन बरखा मैम बहुत गुस्से में थीं। "श्याम सिंह हाथ निकालो"। श्याम सिंह ने दाहिना हाथ सामने कर दिया। मैम ने आव देखा न ताव लकड़ी के स्केल से तड़ातड़ मारना शुरू कर दिया। श्याम सिंह का हाथ लाल हो गया लेकिन बन्दे ने उफ़ तक नहीं की। अमूमन एक-दो स्केल खाने के बाद आम छात्र अपना हाथ दायें-बायें-पीछे खींचने लगता। लेकिन श्याम सिंह ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। हाथ के ऊपर स्केल पड़ते रहे पर उसके चेहरे पर शिकन का नामोनिशान भी न था। वो बेख़ौफ़ चेहरा जेहन में अभी भी ज़िंदा है। हमेशा शांत-संयत और मधुर स्वभाव वाली बरखा मैम को वैसे गुस्से में किसी ने नहीं देखा था। वो श्याम सिंह को घसीटते हुये प्रिंसिपल के रूम में घुस गयीं। 



उस दिन के बाद श्याम सिंह को किसी ने नहीं देखा। कक्षा के खोजी पंडितों ने बताया कि अगले दिन डस्टबिन में लिपस्टिक-पाउडर-चूड़ी-बिंदी-माला पड़े मिले थे। चॉकलेट-कार्ड्स का प्रचलन उस ज़माने में होता तो श्याम सिंह उसी क्लास में दो-चार साल और फेल हो सकता था। 



- वाणभट्ट   

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

केजरीवाल का होना 

इस लेख को आज लिखा जाना ज़रूरी है। क्योंकि यहाँ कल क्या हो किसने जाना। बीजेपी का एग्जिट पोल को अतिविश्वास के साथ नकारना ईवीएम की विश्वसनीयता को कम कर रहा है। कोई भी बटन दबाओ और कमल खिलाओ। खैर आज तो आप के लिये जश्न का दिन है। 

बीजेपी की लहर में आप का ये प्रदर्शन कहीं न कहीं भारत में प्रबुद्ध होते प्रजातंत्र की ओर इशारा कर रहा है। जब वोट की बात हो तो सभी पार्टियों को भारत के मज़दूर-किसान याद आने लग जाते हैं। और चुनाव बीतते ही विकास का वो मॉडल दिखाया जाता है जो उद्योग और पूँजी पतियों के लिए ज़्यादा मुफ़ीद होता है। आम आदमी अपने को ठगा सा महसूस करता है। पूंजीवादी मॉडल में गरीब को उतना ही मिलता है जितना पूंजीवादी के हाथ में सिमट नहीं पाता। जैसे बाँध से छलकता पानी। स्थिति वही बनी रहती है क्या नहायें और क्या निचोड़ें। और पूंजीपति पांच सितारा होटलों में भारत की ग्रामीण-कृषि-सामाजिक अर्थव्यवस्था पर अपने उदगार व्यक्त करते नज़र आते हैं।  

इस देश में कांग्रेस से आज़ादी में अन्ना हज़ारे-रामदेव-केजरीवाल की तिकड़ी का बड़ा योगदान रहा है। कई साल इस तिकड़ी ने कांग्रेस के लिए ताबूत बनाने का काम किया। किन्तु अफ़सोस इस बात का है कि सत्ता में आने के बाद एक जोड़ी सारा क्रेडिट लूटने पर आमादा है। तत्कालीन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी श्रेय देना होगा कि उन्होंने जनमानस और आरएसएस की इबारतों को पढ़ा-समझा। कठिन दौर था वो भी जब कांग्रेस सत्ता के मद में चूर थी। मोदी पर उनके व्यक्तिगत आक्षेप जितना बढे, मोदी का कद उतना ही बढ़ता गया। समीकरण कुछ ऐसे बने कि पार्टी एक मज़बूत सरकार बनाने में सफल हो गयी। परन्तु पार्टी ने जिस तरह गैर विचारधारा वालों के लिए अपने द्वार खोल दिये उससे तय हो गया मानो सत्ता पाने के लिए मूल्यों से समझौता ही एक मात्र विकल्प रह गया हो। भारतवर्ष में इकलौती दूसरी राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण लाभ ज़रूर मिला, जो पार्टी को जनता ने प्रचंड बहुमत से जिताया। ऐसा ही कुछ दिल्ली के चुनाव में होता नज़र आ रहा है। केजरी को लक्ष्य करके चलाये तीर बूमरैंग करते प्रतीत हो रहे हैं।

बी पॉजिटिव। हाँ जी, आज के ही नहीं, पूरे और पुराने भारत में भी इस देश का ब्रह्मवाक्य रहा होगा। अन्यथा इतने विशाल जनमानस वाला देश इतने लम्बे अरसे तक गुलाम न रहता। ये निगेटिव लोग ही थे जो हर बात पर पूछते रहते कि यूँ होता तो क्या होता। उन्होंने सत्ताओं को चुनौती दी। उन्होंने व्यवस्था में सुधार की गुंजाइशों को तलाशा। ये राइट टु इनफार्मेशन, राइट टु एजुकेशन, राइट टु वर्क, राइट टु फ़ूड इत्यादि-इत्यादि मुददे यूँ ही नहीं उछले। किसी ने थाली में परोस के नहीं दे दिया इनको। बहुतों ने इन विचारों के लिये आहुतियां दीं। उनके नाम हम जान पाएं या न जान पायें। पर निश्चय ही ये लोग पॉजिटिव एटीट्यूड लोग नहीं थे। यह वर्ग अंग्रेज़ों के समय उनका वफादार था और कांग्रेस के समय उसका। हमेशा सत्ता और पद के साथ। ये निगेटिव लोग ही थे जिन्होंने संस्था की कमियों की ओर इंगित किया। उन्हें इस धृष्टता का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। ये वो सनकी सोल्जर्स थे जो अपनी विचारधारा के प्रति कृतसंकल्प थे। हमारी पुरानी आदत है कि हम तभी प्रतिभा पहचान पाते हैं जब उसे ब्रूकर-मैग्सेसे-नोबल मिल जाता है। कैलाश सत्यार्थी के विचारों से सम्मत लोगों की संख्या में रातों-रात इज़ाफ़ा हो गया। नोबल ने उन्हें ही नहीं देश को भी एक नयी पहचान दी। लेकिन उनके संघर्ष की दास्ताँ रोंगटे खड़े कर देती है। बच गए सो नोबल मिला वर्ना नाते-रिश्तेदार भी यह कहते फिरते कि सर-फ़िरा था।  

ऐसा ही एक सिपहसालार है केजरी। अमिताभ की फिल्में में एक आदमी पूरी व्यवस्था पलटने का माद्दा रखता था। सत्ता और ताकत से लूटा-पिटा आम आदमी उसे हिट करा देता था। ऐसा ही कुछ भारतीय राजनीति में होने को है। यहाँ से ये भी तय होगा कि राजनीति मुद्दों पर होगी, व्यक्तियों पर नहीं। 

कुछ लोग थे कि वक़्त के साँचे में ढल गये 
कुछ लोग थे कि वक़्त के साँचे बदल गये
                                                                                          (मेरा नहीं है)

- वाणभट्ट 

            

शनिवार, 10 जनवरी 2015

आफ्टर एफेक्ट ऑफ़ पी के 

साइड एफेक्ट्स तो बहुत देखे होंगे पर आफ्टर एफेक्ट का असर और भी बुरा होता है। ख़ास तौर पर जब आप उम्मीदों के सैलाब पर जज़्बातों की नाव खे रहे हों। शायद वाणभट्ट पहला व्यक्ति था जिसने 'पी के' के पहले पोस्टर से ही प्रभावित हो कर फिल्म की अनुशंसा इस आधार पर कर दी थी कि विधु भाई का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड, खामोश, परिन्दा, परिणीता, मुन्ना भाइज़ आदि-इत्यादि, बहुत ही उम्दा था (कृपया लिंक http://vaanbhatt.blogspot.in/2014/08/blog-post.html देखें)। सारे अख़बारों के रिव्यूज़ से ज़्यादा बच्चों की ज़िद मुझे भी हॉल तक घसीट ले गयी। अमूमन मुझे फिल्में देखना तभी अच्छा लगता है जब हॉल में हमारे अलावा कम ही लोग हों। सन्डे के दिन सारा परिवार पीछे पड़ गया कि 'पी के' दिखाओ। लिहाज़ा नेट से ही पिक्चर बुक करने बैठ गया। पर ये क्या पास के हॉल की सीटें सभी शोज़ के लिये बुक हो चुकीं थीं। अब तो मेरी इच्छा भी बलवती हो गयी। सभी अख़बारों और फेसबुकिया कमेन्ट्स ने फिल्म के काफी कसीदे पढ़ रक्खे थे। रात नौ से बारह वाला टिकट किसी दूर के हॉल में मिला तो चौरासी रुपये नेट हैंडलिंग चार्जेज़ के बाद छः सौ रुपये में बुक कर दिये। नेट से परचेज़ वालों को डिस्काउन्ट की बीमारी होती है लिहाज़ा ये चौरासी रुपये थोड़े खले भी पर विधु-आमिर-हिरानी की जोड़ी हावी थी उस पल। 

इस फिल्म का साइड एफेक्ट तो हॉल में ही शुरू हो गया था। नींद भी आ रही थी और सरदर्द भी। लॉजिकल लोगों की फिल्म में लॉजिक निकालने की कोशिश करता रहा। पर शुरू से अंत तक ऐसा कोई दृश्य मेरी समझ में नहीं आया। फिल्म शुरू होती है एक नंगे एलियन से। इस धरती पर व्याप्त सभी प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य से ज़्यादा उन्नत प्राणी की कल्पना कर पाना मेरी सहज बुद्धि से परे था और रहेगा। इतना दिमाग दिया है ऊपर वाले ने कि अपनी नस्ल को छोड़ के अन्य सभी जीव-जन्तुओं की नस्ल सुधार रहा है। जब अंतरिक्ष यान से आदमी उतरता देखा तो तसल्ली हुयी कि मेरी धारणा से ये टीम इत्तेफ़ाक़ रखती है। पर ये क्या। एलियन भाई बिना कपड़े के ही धरती पर अवतरित हो गये। अगर मानव की प्रगति के बारे में देखा जाये तो भूख-आग पर काबू पाने के बाद उसे अपने कपड़ों की ही चिंता हुयी होगी। और बाकि जो तरक्की आपको दिखाई दे रही है वो तन ढँकने के बाद ही शुरू हुयी होगी। क्योंकि सारी तरक्की के मूल में कहीं न कहीं स्त्री-पुरुष विभेद अवश्य रहा होगा। वर्ना कपड़ों की आवश्यकता ही क्यों पड़ती। पूरी की पूरी सृष्टि ही परस्पर विपरीत ध्रुवों पर टिकी है। विज्ञान के जितने नियम और तत्व अब तक हमारे साइंसदानों ने धरती पर खोजे हैं वो पूरे ब्रम्हांड के लिये अटल सत्य की तरह हैं। धरती कोई अनोखा ग्रह नहीं है जहाँ की फिसिक्ज़-केमिस्ट्री-बायोलॉजी अन्य ग्रहों से अलग होगी। अपनी वैज्ञानिक सोच के मद्देनज़र मै किसी ऐसे अनोखे ग्रह की अवधारणा कर सकने में मै सक्षम नहीं हूँ। क-ख-ग सीखे बिना कोई भाषा सीख जाये। एक-दो-तीन किये बिना कोई गणनायें करने लग जाये। तो मै ये मान सकता हूँ कि सभ्यता के न्यूनतम मानक वाला ग्रह अंतरिक्ष यान बना सकता है। जिस गोले पर लोग खुद नंगे घूम रहे हों वो रिमोट से चलने वाला यान बना लें और उसका संचालन ऐसे व्यक्ति को सौंप दें जो स्वयं किसी अनजान ग्रह पर जा रहा हो, नाकाबिल-ए-बर्दाश्त है। 

हाथ पकड़ कर जो डाटा ट्रांसफर कर लेते हों वहाँ  प्रभु की अलौकिक माया से वंचित रह जाना आश्चर्यचकित कर सकता है। बंदा हाथ भी पकड़ता था तो कन्याओं का। वेश्या का हाथ पकड़ के बन्दे ने भोजपुरी सीख ली पर हिलती कारों का रहस्य उसे समझ नहीं आया। यदि वह एलियन था तो उसकी उत्पत्ति का भी कोई कारण रहा होगा या सिर्फ विचार ट्रांसफर से ही वहाँ बच्चों का जन्म हो जाया करता हो। स्त्री-पुरुष में संभवतः फर्क वहां भी होगा। वर्ना उसके मन में अनुष्का जैसी युवती के प्रति ही अनुराग क्यों उत्पन्न हुआ। जिस बन्दे में इंसानियत हो, इमोशन हो, प्यार हो, नफरत हो वो किसी अज्ञात शक्ति (भगवान) के अनुभव से वंचित रह जाये असंभव सा लगता है। दिल्ली में इतनी हिलती कारें हैं तो हमारे नटवर लालों की इस धरती को धिक्कार है जो उतरे हुये कपड़ों के लिये भी तरसते हैं। उसे भगवान और बाबा तो दिखे किन्तु भूखे-नंगे भिखारियों की फ़ौज नहीं दिखी। क्या वे एकदमै लपू-झन्ने हैं जो बेवजह ठण्ड में कड़कड़ाते घूमते हैं।  

चूँकि भाई लोगों ने पैसा कमाने के एक मात्र उद्देश्य से धर्म को तर्क की कसौटी पर कसने का प्रयास किया है तो वाणभट्ट के विचार से 'पी के' को भी तर्कसंगत होना चाहिये। मसाला फिल्मों का तर्क से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता ये तो सिर्फ बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रख कर बनायीं जातीं हैं। भीड़तंत्र में जो भीड़ इकठ्ठा कर ले वो सफल। नेता हों या अभिनेता हों, पीर हों या बाबा हों, सब वर्षों से आम जनता को सपने ही तो बेचते आये हैं। आम आदमी दुःख-संताप में जीवन बिता रहा है। जो उसकी आँखों में हसीन सपने जगाने में सफल हो गया वो हिट हो गया। पैसा कमाने के लिये विवादित मुद्दों को उठाया जाता है। उसके पोस्टर जलाये जाते हैं। जाने-माने विश्लेषक फिल्म का विश्लेषण करते हैं। फिल्म सुपर-डुपर हिट हो जाती है। नए कीर्तिमान बनाती है। चूँकि बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों ने समीक्षा में अपनी-अपनी कलम तोड़ दी है, आम आदमी को लगता है अगर उसने फिल्म की बुराई कर दी तो बुद्धिहीनों की श्रेणी में न जाये। इसलिये कहता घूमता है वाह-वाह क्या बात है। किन्तु उसको मालूम है उसका फुद्दू खींच दिया गया है। अब ज्ञानी होने का ढोंग तो करना ही पड़ेगा। यही भगवान के घर होता है। यही भगवान के ठेकेदारों के यहाँ होता है। कॉलेज में जब लड़के किसी वाहियात फिल्म में अपना पैसा और समय बर्बाद करके आते थे तो खूब बढ़-चढ़ के उसकी तारीफ करते थे। जब बाकि भी देख आते थे तो एक दूसरे को देख-देख मुस्कराते थे और नये लडके का बकरा बनाते। 

फिल्म वालों की बेसिरपैर की गल्प के पीछे  है तर्क ये है कि भाई हम तो सिर्फ और सिर्फ इंटरटेन करने के लिये फिल्में बनाते हैं। कम से कम आम आदमी तीन घंटे के लिए अपने दुःख-दर्द भूल कर सपनों की दुनिया में खो जाता है। यही काम तो भगवान और उनके एजेंट भी करते हैं। एक बाबा ने कहा सत्य ही ईश्वर है। एक ने कहा शांति में ईश्वर का वास है। अगर उनकी मान लो तो तीन घण्टे क्या पूरे दिन-महीने-साल गुज़र जायेंगे वो भी बिना पैसा खर्च किये। फ्री का इंटरटेनमेंट और रंग भी चोखा। हिलती कार और स्ट्रॉबेरी कंडोम में फूहड़ हास्य खोज पाना मेरे बस की बात नहीं थी। हर प्राणी में ज्ञान का आविर्भाव तो अंतर से ही होगा। तब तक इसे चाहे कोई भी मूर्ख बना ले। चाहे बाबा, चाहे फिल्म वाले। जब कथानक में दम होता है तो पब्लिसिटी की ज़रूरत नहीं  होती। इस टीम ने अपनी किसी पूर्व फिल्म की मार्केटिंग में इतना व्यय नहीं किया होगा जितना 'पी के' के प्रमोशन में। करोड़ों कमा लिये इसके लिए बधाई। सवा सौ करोड़ लोगों के देश में एक करोड़ बेवकूफ बना लो तो सौ करोड़ हो जाता है। सीधी गणित है। आपने तीन करोड़ लोगों को इंटरटेन दिया तो सारे रिकॉर्ड टूट गये। वो फुद्दू दुबारा आपके बहकावे में अगली बार न भी आएं तो मार्किट बहुत बड़ा है। भविष्य में मै इस टीम से लॉजिकल इंटरटेनमेंट की उम्मीद करता हूँ। भगवान बहुत पर्सनल अनुभूति हैं। जहाँ कहीं भी मानव सभ्यता होगी कुछ न कुछ मान्यतायें भी अवश्य होंगी। हाँ जिस सभ्यता ने न्याय-व्यवस्था, नियम-कानून का मानकों के रूप में अनुपालन कर लिया वहाँ सब भगवान हो जाएंगे और फिर भगवान को पूछेगा कौन? 

सच्चे फाँसी चढ़ते वेखे, झूठा मौज़ उड़ाये,
लोकी कहिन्दे रब दी माया, मै कहन्दा अन्याय,
ते कि मै झूठ बोल्याँ…  

- वाणभट्ट