गुरुवार, 6 मार्च 2014

दंश 

नारी 
जब माँ बनती है 
तो बड़े गर्व से कहती है 
मैंने बेटा जना

जनखों की 
बलैयों पे
देती है सब लुटा 

कभी  
अंदर गहरे 
उतर जाती है 
ये विडम्बना 

पर माँ खुश है 
कि  
नारी होने का दंश
जो  
इस देश में उसने भोगा 
उसकी संतति को 
न भोगना होगा

- वाणभट्ट


10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.03.2014) को "साधना का उत्तंग शिखर (चर्चा अंक-१५४४)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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    1. शीर्षक हटा दिया...धन्यवाद...

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  3. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट DREAMS ALSO HAVE LIFE पर आपके सुझावों की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद।

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  4. सबला होकर भी अबला है नहीं जानती जो अधिकार ।

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    1. बिलकुल सत्य...किन्तु अपने ही घर में अधिकार के लिए लड़ना पड़ता है... बेटी, बहन और माँ को...

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  5. दुखद स्थिति से बाहर निकलना होगा हम सबको।

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  6. ये विडंबना है या कोई ग्रंथि .... समाज या पुरुष सत्ता का दर जिसने कुंद कर दिया है नारी सोच को भी ... प्रभावी रचना ...

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  7. इस स्थिति से बाहर निकलना होगा हम सबको।

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यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...