शनिवार, 4 जनवरी 2014

मिशन जीवन - II

मिशन जीवन प्रारम्भ हुए १५० वर्ष बीत चुके थे। लगभग ७५ वर्षों तक चन्द्र और पृथ्वी अंतरिक्ष केन्द्रों से अमर और मानसी का संवाद बना रहा। जब तक डॉ  संदीपन जीवित रहे उन्होंने चन्द्र केंद्र पर ही जीवन व्यतीत किया। ये मिशन उनका स्वप्न था जिसे वो सफल होते देखना चाहते थे। परन्तु ये उनके जीवन काल में सम्भव न था। पृथ्वी से संपर्क टूटने के बाद अमर-मानसी की स्थिति किसी ग्रह पर स्थित जीवन जैसी ही हो गयी थी। सिवाय इसके कि यह ग्रह १०००००० मी प्रति सेकेंड की गति से अंतरिक्ष में बढ़ा चला जा रहा था। जबकि अन्य सभी ग्रह और तारे अपने-अपने पूर्व निर्धारित मार्ग पर चलने को विवश थे। इस ग्रह पर जीवन था जो अन्य ग्रहों पर जीवन की खोज में निकला था। जैसा डॉ संदीपन ने बताया था इन्हें एक सीधे मार्ग का अनुसरण करना था। अंतरिक्ष में यदि कोई वाह्य बल न हो तो दिशा परिवर्तन कि सम्भावनाएं नगण्य होतीं हैं। 

अमर और मानसी का जीवन सांसों की गणित पर आधारित था। अंतः उनका मुख्य कार्य अपनी सांसों का नियंत्रण ही था। अभ्यास के द्वारा वे अब एक साँस में दो मिनट तक सहजता से रह सकते थे। इस मानसिक खेल में उनकी भाव-भंगिमा यंत्रवत हो कर रह गयी थी। कोई भी अनावश्यक गतिविधि उनके लिए वर्जित तो नहीं पर निषिद्ध थीं। अनावश्यक रूप से उन्हें पलकें न झपकाने का भी प्रशिक्षण दिया गया था। उन्हें अपनी भावनाओं पर भी नियंत्रण रखना था। किसी भी प्रकार की उत्तेजना उनकी श्वसन प्रक्रिया को बढ़ा सकती थी। उनका मुख्य शगल था साँसों को अधिकाधिक देर रोके या छोड़े रखना या इन्फ्रारेड टेलिस्कोप की सहायता से अंतरिक्ष में जीवन को तलाशना। उन्हें उम्मीद थी किसी तारे की कक्षा में अवस्थित ग्रहों पर पृथ्वी जैसे वातावरण की उपस्थिति। मुख्य रूप से उन्हें किसी नीले या हरे ग्रह की खोज करनी थी। उनकी आँखें सदैव इन्हीं रंगों की तलाश में थीं। दोनों ने अपने सोने और जागने के क्रम को इस प्रकार व्यवस्थित किया था कि दोनों में से एक हमेशा सजग रह सके। उनके लिए एक और चीज़ निषिद्ध थी एक-दूसरे का आई कॉन्टैक्ट यानि नेत्र सम्पर्क।

एक दिन मानसी ने अमर को अपनी ओर विचित्र दृष्टि से निहारते हुए पाया। वो अमर के व्यवहार में परिवर्तन कुछ दिनों से महसूस कर रही थी। उसे अमर की मनःस्थिति भाँपने में देर नहीं लगी। स्त्रियों की छठीं इंद्री लोगों के विचारों का अनुमान लगाने के लिए कुछ ज्यादा ही विकसित होती है। एक मीठी झिड़की देते हुए उसने अमर से कहा अभी बहुत ज़िंदगी पड़ी है। भावावेश में अपनी सांसों को व्यर्थ न करो। हमें अपने मिशन के अंतिम चरण तक पंहुचने का प्रयास करना होगा। नए ग्रह पर हम अपने विश्वास को मूर्त रूप दे पाएंगे। तब तक धैर्य ही हमारा अस्त्र है।

अमर और मानसी की मित्रता एवियोनिक्स में डिग्री के प्रथम वर्ष में ही आरम्भ हो गयी थी। उसी समय डॉ संदीपन ने अपने छात्रों के सम्मुख मिशन जीवन का जिक्र किया और आह्वाहन किया ऐसे युगलों का जो इस मिशन में काम करने के इच्छुक हों। पूरे एवियोनिक्स और एरोस्पेस इंजीनियरिंग के छात्रों में तीन युगलों ने अपने नाम इस मिशन के लिए दिये। इसके बाद उन्हें चार सालों के अंतरिक्ष अभियांत्रिकी, वैमानिकी, योग और श्वसन क्रिया पर कड़े और कठिन प्रशिक्षण कार्यक्रम में सम्मिलित कर लिया गया। प्रथम मिशन के लिए अमर और मानसी की जोड़ी ने सभी परीक्षाओं में उच्चतम अंक प्राप्त किये। इस चयन में श्वसन क्रिया और स्वास्थ्य को सबसे महत्वपूर्ण माना गया। मिशन का मुख्य उद्देश्य लोंजिविटी यानि दीर्घ आयु प्राप्त करना था। इसलिए डॉ संदीपन ने मिशन जीवन के प्रथम अभियान में इनको स्थान दिया। अन्य दो टीमों के लिये इस मिशन में सम्भावनाओं का पटाक्षेप हो गया। सभी प्रतियोगियों ने चन्द्रमा पर स्थानांतरित होने से पूर्व इस मिशन की कामयाबी के लिये अमर-मानसी को बधाई और शुभकामनाएं दीं।

यान अपनी गति से बढ़ा जा रहा था। कई बार यान उल्काओं से टकराने वाला था। परन्तु दोनों ने उसे अपनी सहज व त्वरित बुद्धि से बचा लिया। एक बार तो यान एक श्याम विवर यानि ब्लैक होल की चपेट में लगभग आ ही गया था। अमर और मानसी ने प्रणोदन यानि प्रोपल्शन यूनिट की सारी शक्ति उस विवर के गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध झोंक दी। ये सन्योग ही था कि यान के संवेदी यंत्र ने जब वाह्य गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की चेतावनी दी उस समय दोनों जागृत अवस्था में थे। स्पेस एविएशन सेण्टर पर उन्हें सेकण्ड के हज़ारवें हिस्से से भी कम समय में निर्णय लेने के लिए प्रशिक्षित था। वैमानिकी के सभी गुर उनकी मूल प्रवृत्ति यानि बेसिक इंस्टिंक्ट में आत्मसात कर चुके थे। अन्यथा १०००००० मी/सेकेण्ड की गति पर चालकों की जरा सी भूल इस पूरे मिशन पर पानी फेर सकती थी। 

दो-ढाई सौ साल से नीरस जीवन व्यतीत करना किसी आम इंसान के बस की बात नहीं थी। मिशन के प्रति प्रतिबद्धता, संयमित दिनचर्या और कड़ा प्रशिक्षण इन दोनों को विशिष्ट बनाती थी। विशिष्ट मिशन के लिए विशिष्ट व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। पृथ्वी से संपर्क टूटने के बाद भी दोनों के लिये मन में कोई नकारात्मक विचार लाने की सम्भावना नहीं थी। नकारात्मक ऊर्जा उनकी आयु को प्रभावित कर सकती थी। उनका मानसिक खेल सदैव उन्हें व्यस्त रखता। उन्हें विश्वास था कि वे धरती के अलावा किसी अन्य ग्रह पर जीवन खोजने में सक्षम होंगे। डॉ संदीपन का मिशन अब उनका मिशन था। मंद मेटाबोलिक रेट के कारण उनके शरीर में किसी भी प्रकार के जीर्णन का प्रभाव गोचर नहीं था। जबकि उतने ही समय में धरती पर दो-तीन पीढ़ियाँ अपना अस्तित्व खो चुकीं थीं। इस बात का संज्ञान अमर और मानसी के लिए संजीवनी का काम करता। आचार-विचार और श्वसन तन्त्र का सदुपयोग कैसे जीवनी शक्ति को विकसित  कर सकता है ये भारत के ऋषि-मुनियों को सदियों से ज्ञात था। विज्ञान और वैदिक ज्ञान इस मिशन के मूलभूत आधार थे। डॉ संदीपन और इसरो के प्रमुख वैज्ञानिकों को इसका सम्पूर्ण श्रेय दिया जाना चाहिये। अंतरिक्ष शोध में पृथ्वी के कई देश भारत की तकनीकी क्षमता के समतुल्य अवश्य थे, परन्तु दीर्घ आयु प्राप्त करने के लिये उनके पास कोई प्रणाली नहीं थी। आयु संवर्धन के वैदिक ज्ञान ने भारत को अन्य विकसित देशों से अग्रणी कर दिया।

मानसी ने लगभग झकझोरते हुए अमर को योग निद्रा से जगा दिया। अमर उठो और जल्दी देखो हरा ग्रह। हमें तुरंत यान की दिशा को मोड़ना होगा। वे अब तक तीसरे तारे की परिक्रमा कक्ष में प्रवेश कर चुके थे। एस्ट्रोनॉमी के अनुसार यह खगोलीय पिण्ड सूर्य के निकटस्थ तीसरे तारे अल्फा सेंटिनो के चौथे ग्रह जिबेका का एक उपग्रह था। जैसे धरती के लिए चाँद परन्तु ये अपनी धूरी पर घूम रहा था। अमर के निर्देश पर यान में लगे परम संगणक ने गणनाएं प्रारम्भ कर दीं। आकार में ये पृथ्वी से १.५ गुना बड़ा था। ये पिण्ड ४० घंटे में अपने स्थान पर एक चक्कर लगा लेता है। यानि यहाँ दिन-रात २० घंटे के होंगे। अपने मूल ग्रह जिबेका की परिक्रमा ये पिण्ड ३७५ दिन में पूरी कर लेता है। और जिबेका अपने सूरज अल्फा सेंटिनो के चारों ओर परिक्रमा ७२५ दिन में पूरी कर लेगा। अमर और मानसी के लिये ये क्षण यूरेका मोमेंट से कम नहीं था। तुरंत उन्होंने अपने यान कि दिशा उस हरे ग्रह की ओर मोड़ दी। इस पिंड का नाम रखा गया - अर्थेरा। 


Green Planet
अर्थेरा 
(चित्र साभार : http://www.zastavki.com/eng/Space/wallpaper-31236.htm) 

पचास सालों की यात्रा में अमर-मानसी ने उस हरे खगोल पिण्ड, अर्थेरा, को टेलिस्कोपिक आई से एक पल भी ओझल नहीं होने दिया। जैसे-जैसे वो इस पिंड के निकट आते जा रहे थे उनका विश्वास उस ग्रह  पर जीवन की सम्भावनाओं को लेकर बढ़ता ही जा रहा था। टेलिस्कोप से उन्होंने उस ग्रह पर समुद्र और धरती दोनों की उपस्थिति का भान हो चुका था। उस ग्रह में हरे रंग की उपस्थिति वनस्पतियों की उपलब्धता की ओर इंगित कर रही थी। अब बस ये देखना था कि यहाँ भी पानी जैसे पदार्थ की रासायनिक संरचना H2O ही है। ऑक्सीजन ही यहाँ प्राणवायु है या नहीं। पृथ्वी पर जितने तत्वों और यौगिकों की उपस्थिति ज्ञात की जा चुकी है, ब्रम्हांड में उससे अधिक अवयवों की सम्भावनाएं नगण्य हैं। परन्तु नए ग्रह के जीवन के विषय में मात्र अनुमान ही लगाया जा सकता है। हो सकता है वहाँ जीवन नाइट्रोजन से चलता हो। और वनस्पतियाँ अम्लीय या क्षारीय माध्यम में जीवित रहतीं हों। अमर-मानसी के अंतःकरण में इस उलटी अवस्था की  सम्भावना नगण्य थी किन्तु सुरक्षा की दृष्टि से ये तय करना आवश्यक था। 

यान को अर्थेरा की वाह्य कक्षा में स्थापित करने के पश्चात अमर और मानसी ने लघु यान के द्वारा अर्थेरा पर जाने का निर्णय लिया। मुख्य यान ग्रह की वाह्य कक्षा में परिक्रमा करता रहेगा, जबकि छोटे यान की सहायता से वे लोग अर्थेरा की धरती पर उतरेंगे। यदि जीवन की संभावनाएं मिलतीं हैं तो वे वहाँ २०-२५ साल जीवन व्यतीत करके अपनी वापसी यात्रा पर लौट चलेंगे। दोनों ने छोटे यान में बैठने के बाद तीन सौ सालों में पहली बार एक-दूसरे की आँखों में डूब कर देखा। उन्हें ये एहसास था कि यह यात्रा या तो एक नए जीवन की शुरुआत हो सकती है या इस जीवन का अंत। 


लघु यान 


(क्रमशः)


 - वाणभट्ट

6 टिप्‍पणियां:

  1. रुचिकर वैज्ञानिक पटकथा एवम् परिदृश्य । मज़ा आ गया ।

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  2. सुन्दर प्रस्तुति -
    आभार आपका-
    सादर -

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  3. दोनों किश्त पढ़े. आगे की उत्सुकता है. सुन्दर खगोलीय यात्रा है.

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  4. वाह...बहुत बढ़िया और रोचक प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो

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