सोमवार, 13 जनवरी 2014

मिशन जीवन - IV

इस घटना से इतना तो तय हो गया कि जितना पिछड़ा अमर अर्थेरा वासियों को मान रहा था वो उससे आगे थे। उन्हें अयस्क से इस्पात बनाने की विधि का ज्ञान था। तलवार की तीव्र चुभन दोनों के शरीर पर बढती ही जा रही थी। अमर का हाथ त्वरित प्रतिक्रिया में अपने स्वचालित रिवॉल्वर की ओर बढ़ा ही था कि मानसी ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया। उसने लगभग चिल्ला के कहा हम यहाँ लड़ने नहीं आये हैं। प्रतिउत्तर में अमर ने कहा कि हम मरने भी तो नहीं आये हैं, प्रिये। देखो ये क्या करते हैं मानसी ने कहा। तलवार के कुछ नियंत्रित प्रहारों से अमर-मानसी के वस्त्र भूमि पर आ गिरे। ये सौभाग्य ही था कि उनके हथियार वस्त्रों के भीतर ही छिपे रह गये। दोनों के नग्न शरीर को देख कर उपस्थित जन समुदाय में हर्ष की लहर दौड़ गयी। दूसरों का नग्न शरीर धरती पर भी हास्य का विषय हो जाता है जब अन्य सभी के शरीर वस्त्रों से ढंकें हों। बच्चों के ठहाकों ने उस स्तब्ध सभा में गुंजायमान हो गए। अब अमर-मानसी ने गौर किया कि वहाँ उपस्थित सभी बच्चों की आयु १० वर्ष या उससे अधिक थी। एक वर्ष से छोटे बच्चे अपनी माँओं के गोद की शोभा बढ़ा रहे थे। दोनों ने ग्रह वासियों की नितांत मानवीय भावना को सहज स्वीकार किया। संदिग्ध व्यक्ति का स्वागत नये देश में कुछ इसी प्रकार होता आया है। इस परिस्थिति में ये अनिवार्य भी था। भवन के अंदर गयी स्त्री उनके लिये अर्थेरा वासियों जैसे वस्त्र ले कर मंच पर आ चुकी थी। उन वस्त्रों को धारण करने के बाद अमर-मानसी को आम अर्थेरा वासियों से अलग पहचान पाना कठिन था। कबीले की साम्राज्ञी ने सिपहसालार जैसे व्यक्ति को कुछ और निर्देश दिये। और सभा विसर्जित हो गयी।

सिपहसालार अमर-मानसी को मुख्य भवन के समीपस्थ एक गृह में ले गया। अपनी भाषा में उसने कुछ कहा। अमर-मानसी को लगा कि ये उनके रहने की व्यवस्था है। अमर अपने और मानसी के फटे वस्त्रों को समेट लाया था। उसे डर था कि उनके स्वचलित हथियार किसी और के हाथ न पड़ जाएँ। इस समय उनके पास पृथ्वी के सिर्फ दो चिन्ह ही रह गये थे, फटे वस्त्र और लघु हथियार। वो गृह नहीं था। घर के नाम पर मिट्टी की चार दीवारें थीं और ऊपर था फूस का छाजन। गृह के अंदर सोने के लिये उच्च स्थान पर फसलों के पुआल से यथासम्भव नर्म शैय्या बनायी गयी थी। पेड़ के तनों को काट कर बैठने की व्यवस्था थी। एक द्वार प्रवेश के लिये अग्र भाग में था। दूसरा पीछे की तरफ खुलता था जहाँ शौच और स्नानागार नियत स्थान पर प्रतिष्ठित थे। आवरण विहीन द्वारों से आता प्रकीर्णन-प्रकाश गृह के कोने-कोने को आलोकित कर रहा था। अमर ने शाम को उस गृह से बाहर निकलने का प्रयास किया तो दोनों द्वार पर दो-दो सशस्त्र व्यक्तियों ने उन्हें बाहर निकलने से रोक दिया। यानि उनकी उपस्थिति के प्रति अर्थेरा वासी अभी भी संदिग्ध थे। उनका विश्वास प्राप्त करने के लिये उन्हें यान तक जाना आवश्यक था। जहाँ से वो उनके लिये पृथ्वी से लाये उपहार ला सकें। उन्हें रात्रि की प्रतीक्षा करनी होगी। यहाँ रात भी बीस घंटे की होती थी। मानवीय स्वभाव के अनुसार रात्रि में सामान्य व्यक्ति के लिये अपनी चैतन्यता को बनाये रखना दुष्कर हो जाता है।

मुख्य ग्रह जिबेका से परावर्तित प्रकाश के कारण अर्थेरा पर रात्रि में भी अप्राकृतिक प्रकाश की आवश्यकता नहीं थी। लगभग तीन महीने से अधिक समय अर्थेरा पर व्यतीत कर लेने के पश्चात् अमर-मानसी की जैविक घड़ी ग्रह के अनुकूल हो चली थी। पूरा दिन दोनों ने भरपूर नींद का आनन्द  लिया। रात्रि होने के बाद चौथे प्रहर तक का समय दोनों ने बिना नींद के व्यतीत किया। उस समय तक सभी प्रहरी गहन निद्रा में डूब चुके थे। आदिवासी वस्त्रों में उन्हें चलने में कठिनाई का अनुभव हो रहा था। संयोग से उनके जूतों पर किसी का ध्यान नहीं गया था अन्यथा जंगल में नए मार्ग पर चलना और भी दुरूह हो जाता। आत्मसुरक्षा की दृष्टि से अमर ने अपना स्वचालित हथियार साथ ले लिया था। वे यथाशीघ्र यान से उपहार ले कर दिन निकलने से पूर्व बंदी गृह लौट आना चाहते थे। वे यान के निकट पहुंचने ही वाले थे कि एक तीर सरसराता हुआ मानसी के सर के पास से निकल गया। त्वरित प्रतिक्रिया में अमर ने रिवाल्वर से मनुष्य की सामान्य ऊंचाई से ऊपर एक गोली दाग दी। जंगल का निस्तब्ध वातावरण गोली की ध्वनि से गूँज गया। जिस व्यक्ति ने तीर चलाया था धराशायी हो गया। मानसी ने अमर को डाँटा तुम्हें ये हथियार ले कर नहीं आना चाहिए था। दोनों दौड़ते हुए उस व्यक्ति के पास पहुंचे। वो कोई और नहीं सिपहसालार था। धमाके की आवाज़ सुन कर वो दहशत से गिर गया था अन्यथा उसे कुछ भी नहीं हुआ था। अमर ने मुस्करा कर मानसी की ओर देखा। अपनी रिवॉल्वर मानसी को देते हुए उसने कहा तुम इन भाईसाहब को सम्हालो मै इनके लिए मित्रता की कुछ भेंट ले कर आता हूँ। देखना किसी भी परिस्थिति में इन्हें यान का पता नहीं लगना चाहिये।

कुछ समय बाद अमर दो बड़े-बड़े थैलों में कुछ सामान ले कर आ गया। सिपहसालार अभी तक भय से उबर  नहीं पाया था। अमर ने उसे पृथ्वी से लायी एक चॉकलेट दी। वो उसे कुछ देर तक उलटता-पलटता रहा। मानसी ने उसकी सहायता के लिए चॉकलेट का बाहरी आवरण उतार दिया। अमर ने उसे खाने का संकेत दिया। सिपहसालार ने क्षणिक दुविधा के साथ इस नये पदार्थ को सूंघा फिर अपनी जिव्हा से चखा। तुरंत ही उसके मुख पर आनंद के भाव आ गये। अमर ने उसे गले से लगा लिया। ये उनकी मैत्री का आरम्भ था। अमर-मानसी को हर्ष था कि जिस प्रथम अर्थेरावासी ने उन पर विश्वास किया वो उस कबीले का मुख्य सिपहसालार था। उन्हें आशा थी कि अब उनके लिए अर्थेरावासियों का ह्रदय परिवर्तन करना कतिपय सहज होगा। 

गाँव तक पहुंचते-पहुंचते दिन निकल आया था। मंच पर साम्राज्ञी अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ विराजमान थीं। गाँव के सभी लोग मंच के नीचे बैठे हुए थे जब इन लोगों ने सभा में प्रवेश किया। अमर-मानसी के भाग जाने का समाचार फ़ैल चुका था। सिपहसालार ने अपनी भाषा में पूरा वृतांत कह सुनाया। मंचासीन सभी के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान दौड़ गयी थी। अमर-मानसी ने सभी का हाथ हिला कर अभिवादन किया। अपने थैलों से सभी को कुछ न कुछ उपहार दिया। सुंदर आवरण में बंधे उपहारों और चॉकलेटों ने समस्त अर्थेरावासियों को आनंदित कर दिया। सभा के विसर्जित होने तक अमर-मानसी को ये विश्वास हो चला था कि वे अर्थेरावासियों के हृदय परिवर्तन के अपने अभियान में सफल हो गए थे।

इसका प्रमाण भी उन्हें शीघ्र मिल गया। उनके द्वारों पर यवनिका लगा दी गयी थी और प्रहरियों को भी हटा लिया गया। अब वे एक आम अर्थेरा वासी की तरह जीवन जीने को स्वतन्त्र थे। वहाँ की भाषा सीखना अब उनका मुख्य लक्ष्य था। कुछ महीनों के मेलजोल में ही वे लोग कबीलों की स्थानीय भाषा में दक्ष हो गए। इन कबीलों का जीवन पृथ्वी के किसी सामान्य आदिवासी जीवन से अलग नहीं था अपितु वे कुछ विषयों में पृथ्वी के आदिवासियों से अधिक समृद्ध और संस्कारवान थे। वहाँ स्त्रियों और पुरुषों को सामान रूप से देखा जाता था। प्रत्येक कार्य क्षेत्र में स्त्री-पुरुष को सामान प्रशिक्षण दिया जाता था। स्त्रियां शिकार और खेती में उसी प्रकार प्रवीण थे जैसे पुरुष गृहकार्यों में। सभी काम मिल-जुल कर किया जाता। हर्ष-उल्लास के आयोजनों में भी दोनों की भागीदारी होती। ये भी पता चला कि अर्थेरा पर अन्य कबीले भी हैं। आपस में संघर्ष न हो इसलिये ये आपस में एक निश्चित दूरी नियत रखते हैं। इस लक्ष्मण रेखा का सभी कबीले सम्पूर्ण पालन करते थे। ग्रह पर जगह की कमी नहीं थी इसलिए आपसी सामंजस्य को बनाये रखने के लिये एक कबीला किसी दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करता था। सभी कबीलों पर महिलाओं का शासन था। अमर ने अनुभव किया कि महिला प्रशासक अपनी प्रजा के लिये अधिक संवेदनशील होती है। सम्भवतः अर्थेरा पर जीवन इसीलिए बहुत सौहार्दपूर्ण था। 

एक से दस वर्ष आयु तक के बच्चों की देखरेख कुछ महिलाये एक पृथक स्थान पर करतीं। दस वर्ष की आयु पूरी कर लेने के बाद बच्चे बड़े लोगों के साथ काम करके जीवन के लिए आवश्यक गतिविधियों में निपुणता पाते। वयस्क अवस्था तक आते-आते सभी स्त्री-पुरुष भवन निर्माण, पत्र -वस्त्र बनाने, अन्न उत्पादन, शिकार, आत्म रक्षा, हथियार और औजार बनाने की कला में पारंगत हो जाते। यहाँ एक मुख्य बात थी कि बच्चों में किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं था।बच्चे कबीले के होते थे और उनका लालन-पालन का उत्तरदायित्व भी कबीले का होता। उनका विवाह अपनी पसंद से होता केवल सम्पूर्ण सभा में स्त्री-पुरुष को एक बार एक-दूसरे का सानिध्य स्वीकार करना होता। इसके बाद पूरा कबीला उन्हें घर बनाने में सहायता करता। द्वार पर लगी यवनिका उस गृह में विवाहित युगल के होने का द्योतक था। अतिशय वृद्ध लोगों के लिए भी पृथक व्यवस्था थी। रोगियों के लिये रुग्णालय था। बाल आश्रम, वृद्धाश्रम और रुग्णालय सभी का कार्यभार पूरा कबीला वहाँ करता।   

अमर-मानसी ने कबीलों के इस समूह की भाषा को लिपिबद्ध करना सिखाया। उन्हें अंक ज्ञान, कैलेण्डर और गणनाओं को अवधारणा से परिचित कराया। पृथ्वी पर प्राप्त किये अपने ज्ञान को उन्होंने कबीलाई भाषा में समझाया और लिपिबद्ध किया। इस समूह के साथ वो अपना सम्पूर्ण ज्ञान साझा कर लेना चाहते थे। कपास के बीज, जो वे पृथ्वी से लाये थे, से कपास की खेती और उसके रेशों से कपडे बनाना सिखाया।लकड़ी की लुगदी से कागज़ का उत्पादन कि विधि भी सिखायी। अगले अर्थेरा के चार वर्षों में मानसी ने दो स्वस्थ पुत्रियों को जन्म दिया। जिन्हें एक वर्ष की अवधि के पश्चात् बाल गृह में भेज दिया गया। बीस वर्ष की आयु होने पर के होने पर दोनों उसी काबिले में अपना विवाह करके जीवन व्यतीत करने लगीं। प्रायः अमर-मानसी बातें करते कि अर्थेरा के अन्य किसी भाग पर विकसित जीवन भी हो सकता है। उन्होंने अर्थेरा का मात्र एक जीवन देखा था। यदि कोई पृथ्वी के आदिवासी क्षेत्र में पहुँच जाये तो बहुत सम्भव है वो पूरी पृथ्वी को उतना ही पिछड़ा मानने की भूल कर बैठे। कभी-कभी अमर उस जहाज का उल्लेख भी करता जिसे उसने अर्थेरा पर उतरने के बाद दूरबीन से देखा था। अर्थेरा की धरती पर कदम रखे हुये अमर-मानसी को २५ वर्ष हो चुके थे। उनके जीर्णन की गति ऑक्सीजन के आधिक्य से प्रभावित होने लगी थी। अभी उन्हें अभियान का अंतिम चरण पूरा करना बाकी था। 


(क्रमशः )

- वाणभट्ट 

3 टिप्‍पणियां:

  1. कबीलों के जो रूप आपने प्रस्तुत किया है उससे काफी मिलता जुलता अमेज़न के जंगलों में आज भी रहता है.

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  2. रोचक ... जानकारी के साथ आनंद भी भरपूर ...

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