बुधवार, 8 जनवरी 2014

मिशन जीवन - III

अर्थेरा पर उतरने से पूर्व अमर-मानसी ने ग्रह की एक पूरी परिक्रमा कर लेना उचित समझा। इस परिक्रमा के दौरान यान में लगे संवेदी उपकरणों ने दर्शा दिया कि पानी की वाष्प और ऑक्सीजन वातावरण में  प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। संवेदनशील कैमरों ने ग्रह के तीन -चौथाई हिस्से पर पानी जैसे पदार्थ की पुष्टि भी कर दी। इस ग्रह पर भी भूमि महाद्वीपों और द्वीपों के रूप में अवस्थित थी। ऊँचे हिम आच्छादित पर्वत थे, घने जंगल थे, झील और नदियां भी। जीवन की सारी सम्भावनाओं से भरा हुआ था अर्थेरा। धीरे-धीरे यान ने ग्रह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश किया। गणनाओं के आधार पर तय हो गया कि ग्रह का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में दोगुना ज्यादा था। इस कारण यान की गति अपेक्षा से अधिक रूप से बढ़ती जा रही थी। सिर्फ अर्थेरा का वातावरण ही यान की गति के विरुद्ध कार्य कर रहा था। वातावरण के प्रतिरोध के कारण यान का वाह्य तापमान बढ़ता जा रहा था। वाह्य तापमान १६५० डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया। वाह्य तापमान का प्रभाव दोनों यान के भीतर भी महसूस कर सकते थे। यान की ताप अवरोधी सतह को १८०० डिग्री के लिए डिज़ाइन किया गया था। उन्हें डर था कि इस सीमा के बाद यान एक अग्नि के गोले में ना परिवर्तित हो जाये। इसलिए तापमान की उच्चतम सीमा तक पहुंचने से पहले उनके लिए यान को अर्थेरा पर सकुशल उतारना आवश्यक था। अंतः न्यूनतम दूरी वाले मार्ग का चयन किया गया। मानसी ने यान को उस दिशा में मोड़ दिया जिधर यान का अल्ट्रासोनिक उपकरण जल की अधिकतम गहराई प्रदर्शित कर रहा था। यान अब पूरी तरह गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में था। उसकी गति को किसी भी तरह नियंत्रित कर पाना अब उनके हाथ में नहीं था। एक दहकते हुये उल्का पिंड की तरह लघु यान अर्थेरा के समुद्र की अथाह गहराइयों में समा गया। लघु यान का निर्माण ऐसे कम्पोज़िट मैटेरियल से किया गया था, जिसका घनत्व जल से कम था। इसलिये यान के जल में डूबने की सम्भावना नहीं थी। बस भय था उच्च तापमान पर इस पदार्थ का पानी से किसी भी प्रकार संपर्क यान को पिघला देता। तापमान वृद्धि से यान की बाहरी परत में दरार पड़ने की सम्भावना थी। डर जल के नीचे स्थित किसी अदृश्य चट्टान का भी था। संयोग से यान की बाहरी सतह पर कोई दरार नहीं आयी, ना ही जल प्रवेश में कोई अवरोध। 

कुछ ही समय में यान जल की सतह पर आ गया। अब वह यान एक जलपोत के रूप में कार्य कर रहा था। बाहर का तापमान २५ डिग्री सेल्सियस था। अमर और मानसी शीघ्रातिशीघ्र अर्थेरा के वातावरण में साँस लेने को लालायित थे। पोत के कक्ष से बाहर निकल कर उन्होंने धीरे से नए वातावरण में पहली साँस ली। उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब एकदम शुद्ध ऑक्सीजन ने उनके शरीर में प्रवेश किया। हर्षातिरेक में अमर ने मानसी को आलिंगनबद्ध कर लिया। पृथ्वी और अर्थेरा के वातावरण में कोई विशेष अंतर भी महसूस नहीं हो रहा था। सिवाय इसके कि यहाँ आकाश के हरा होने का आभास होता था। वातावरण में उपस्थित वायु कण प्रकाश अपवर्तन और प्रकीर्णन का निर्धारण करते हैं।  आकाश के प्रतिबिम्ब के कारण समुद्र का जल भी हरा दिखाई देता था। समुद्र के जल में हरित शैवालों की उपस्थिति इस विशाल जल राशि को गहन हरीतिमा प्रदान कर रही थी। पोत को समीपस्थ भूमि की दिशा में मोड़ दिया गया। मिशन का मुख्य कार्य जीवन की खोज संपन्न हो गया था। अमर-मानसी ने ऐसे ग्रह पर पदार्पण कर दिया था जिस पर जीवन की सारी सम्भावनायें विद्यमान थीं। मन ही मन दोनों ने डॉ संदीपन को नमन किया। उनकी प्रेरणा और इस मिशन के प्रति उनका विश्वास आज पृथ्वी के ३०० वर्षों बाद फलीभूत हुआ। उन्हें इस बात के लिए गर्व की अनुभूति भी हुयी कि यह महती कार्य उनके द्वारा संपन्न हुआ।

अर्थेरा के तीन माह की अनवरत जल यात्रा के पश्चात दोनों ने स्वयं को अर्थेरा की धरती पर पाया। इस यात्रा में उन्होंने स्वग्रहित सभी प्रतिबंधों से स्वयं को मुक्त कर लिया। साँसों का नियंत्रण अब तक उनकी मूल प्रवृत्तियों में रच-बस गया था। नव ग्रह पर संसर्ग-सुख उनकी इस चरम तपस्या की अंतिम परिणति नहीं था। उन्हें इस ग्रह पर ऑपरेशन संतति पर भी कार्य करना था। लक्ष्य के अनुसार उन्हें अगले २०-२५ वर्षों में प्रजनन और संतति को स्थापित करके वापस पृथ्वी की ओर लौटना था। अन्यथा इस खोज का पृथ्वी वासियों के लिए कोई महत्त्व न होता। ये एक एकल मार्ग यात्रा मात्र रह जाती।  छः - सात सौ वर्षों की अवधि में २०-२५ वर्ष का महत्त्व कुछ घंटों से अधिक नहीं था। इस युगल के पास व्यर्थ करने के लिए समय नहीं था।

लघु यान या पोत  ही अमर-मानसी का स्थायी घर बन गया था। मौका मिलते ही ये यान सहित अगले ठिकानों पर बढ़ते जाते। अर्थेरा की धरती पर जीवन के सभी लक्षण विद्यमान थे। समुद्री जीव-जंतु के दर्शन तो पहले ही हो चुके थे। भूमि पर पशु-पक्षी भी बहुतायत में थे। किसी भी अद्भुत या विचित्र प्राणी से इनका सामना अब तक नहीं हो पाया था। अंतिम आशा मानव पर ही टिकी हुयी थी। पृथ्वी पर अधिकांश सभ्यताओं का विकास नदियों के तट पर ही हुआ था। इस परिकल्पना के आधार पर उन्होंने नदियों की तलाश आरम्भ कर दी। यहाँ २० घंटों का दिन उन्हें अपने खोज अभियान में भरपूर सहयोग देता महसूस होता था। एक दिन उन्हें समुद्र की क्षितिज पर कुछ गतिविधि दिखायी दी। दूरबीन से उन्हें एक जहाज़ जैसी आकृति का आभास हुआ। अथक प्रयास के बाद वे एक नदी के मुहाने पर थे। यहाँ से उन्होंने धारा के विपरीत दिशा अपना ली। वे दिन प्रति दिन मुख्य भूमि  भीतर चलते चले जा रहे थे। उन्हें मानव जीवन की पुष्टि के संकेत भी मिलने लगे। कभी एकांत जंगल में पर पताकाओं का होना। कभी नदी के जल में अप्राकृतिक वस्तुओं की उपस्थिति उनकी अवधारणा को बल देती थी। एक टूटी नौका का कुछ हिस्सा उनके यान के निकट से बह निकला था। उन्हें ये विश्वास भी हो रहा था कि यदि इस ग्रह पर मानव है तो मानवीय भावनायें भी होंगी। कहीं किसी ने अनायास हमें अपना शत्रु समझ लिया तो अकारण युद्ध की स्थिति बन जायेगी। ये तो तय था कि इस ग्रह की सभ्यता पृथ्वी जैसी विकसित नहीं जान पड़ रही थी। अमर-मानसी के स्वचालित हथियारों का सामना करना इस ग्रह के वासियों के लिए सम्भव न होता।

एक स्थान पर पहुँच कर दोनों ने पैदल यात्रा करना उचित समझा। यान को नदी के किनारे उच्च स्थान पर छिपा कर रख दिया। वे संभल-संभल नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़ रहे थे। हर आहट के प्रति सजग और चौकन्ने। मानव की उपस्थिति के संकेत बढ़ते ही जा रहे थे। फलों के बाग और खेतों को देख कर कहना कठिन हो रहा था कि वे किसी अन्य ग्रह पर हैं सिर्फ आकाश और जल की हरीतिमा उन्हें याद दिलाती थी कि वे पृथ्वी पर नहीं हैं। शीघ्र ही उन्हें एक मंदिर जैसे भवन के दर्शन हुए। ये भवन ज्यादा बड़ा तो नहीं था परन्तु उस पर विद्यमान पताकाओं ने उसे एक पूजनीय स्थल का रूप दे रक्खा था। दोनों ने अपनी हिन्दू प्रवृत्ति के अनुसार चरण पादुकाएं उतार कर मंदिर में प्रवेश किया। अंदर एक मूर्ति स्थापित थी। उसके निकट पूजन सामग्री रक्खी थी। एक फूस की चटाई मूर्ति के सामने बिछी हुई थी। मंदिर की साफ़-सफाई वहाँ लोगों के नियमित आने की पुष्टि कर रही थी। दोनों ने श्रद्धा भाव से हाथ जोड़ कर अर्थेरा के प्रथम देव का आराधन किया। फिर दोनों अपनी प्रवृत्ति के अनुसार ही दरी पर ध्यानावस्थित हो कर बैठ गए। श्वांस-प्रश्वांस का उनका मानसिक खेल प्रारंभ हो चुका था।

कितनी देर वे इस अवस्था में रहे ये भान उन्हें नहीं रहा। सहसा अमर ने अपने मस्तक पर मानसी के स्पर्श का अनुभव किया। उसने धीरे से अपनी आँखें खोल कर मानसी की ओर देखा। मानसी ने उसे चारों ओर देखने का संकेत किया। कई लोगों ने उनको घेर रक्खा था। उसने द्वार की दिशा में दृष्टि डाली। द्वार के बाहर भी उसे लोगों की गतिविधि का अनुभव हुआ। वहाँ से निकल भागने का कोई अवसर नहीं था। और वे लोग मानव खोज के लिए आये थे इसलिए उनको भागने की आवश्यकता भी नहीं थी। दोनों ने सहज रूप से हाथ ऊपर उठा दिये। किसी भी प्रकार कि हड़बड़ी नये लोगों में अविश्वास उत्पन्न कर सकती थी। उनमें से एक व्यक्ति ने इन्हें बाहर निकलने का संकेत किया। दोनों ने बाहर निकल कर अपनी पादुकाओं को पहन लिया। उन्हें इन व्यक्तियों और स्वयं में कोई विशेष अंतर नहीं दिख रहा था सिवाय इसके कि इनकी सभ्यता पृथ्वी से हज़ारों वर्ष पुरानी लग रही थी। एक जो सबसे बड़ा अंतर था वो थी उनकी वेशभूषा। इनके कपड़े पृथ्वी के सामान्य कपडे थे, पैंट-शर्ट परन्तु अर्थेरा वासियों ने भिन्न प्रकार के पत्र-वस्त्रों से अपने शरीर को ढँक रखा था। एक व्यक्ति आगे चल रहा था और १५ -२० लोग इनके पीछे।

जैसे ही इस दल ने आवासीय क्षेत्र में प्रवेश किया, अन्य सामान्य जन भी इस दल में शामिल होते गए। स्त्रियां, पुरुष और बच्चे कच्चे मार्ग के किनारे खड़े इन्हें कौतूहल से देख रहे थे। मार्ग के दोनों ओर कतारबद्ध तरीके से घरों का निर्माण किया गया था। प्रत्येक घर के बीच एक निश्चित दूरी थी। मकान कच्चे थे और मिटटी के बने हुए थे। छत के लिए घास-फूस का प्रयोग किया गया था। सभी घर एक ही प्रकार के थे। घरों के द्वार पर जूट के परदे लगे हुए थे। घरों के पिछले हिस्से में स्नानागार तथा शौचालय की व्यवस्था दिखाई दे रही थी। उनके भी पीछे खेती के संकेत भी मिल रहे थे। इतने साधारण रहन-सहन में भी एक असाधारण बात थी, वहाँ की साफ़ सफाई। सभी घर असामान्य रूप से स्वच्छ लग रहे थे। पत्र-वस्त्र भी मानो नए हों। मार्ग के अंत में एक वृहद् आकार का भवन था। ये भी मिटटी से ही निर्मित था परन्तु इसकी ऊंचाई और आकार इसे अन्य भवनों से विशिष्ट बनता था। भवन का मुख्य द्वार ५ फिट की ऊंचाई पर था। मुख्य द्वार के सामने एक सिंघासन नुमा तख़्त पड़ा था। उसके बगल में तीन छोटे सिंघासन दाईं और बायीं ओर लगे हुये थे। अमर-मानसी को लगा कि ये यहाँ के राजा का घर हो सकता है।  

सबसे आगे चल रहे व्यक्ति ने सिंघासन के बगल में रखे एक ढोल नुमा यंत्र से कुछ सन्देश भेजा। थोड़ी ही देर में लगता है सारे गाँव के निवासी उस स्थान पर एकत्र हो गए। कुल जमा संख्या सभी पुरुषों, महिलाओं बच्चों को मिला कर १०० -१५० की रही होगी। सभी आयु वर्ग के लोग इस समूह में उपस्थित थे। अमर-मानसी इस बात से प्रसन्न थे कि उन्होंने एक अन्य जीवित ग्रह की खोज कर ली है। इंसान एक सामाजिक प्राणी है तो अन्य ग्रह पर भी उनके कुछ चाल-चलन होंगे, कुछ मान्यताएं और रिवाज़ भी होंगे। उन्हें ख़ुशी इस बात की भी थी उनका सामना किसी अजीबोगरीब एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल प्राणी, जैसे हॉलीवुड फिल्मों में दिखाये गए थे, से नहीं हुआ था। किसी विदेशी को देख कर जैसा धरती के लोग व्यवहार करते उससे भिन्न नहीं था इस अर्थेरावासियों का व्यवहार। उसी व्यक्ति ने पुनः ढोल पर भिन्न तरह की थाप दी। लोग कुछ सावधान सी मुद्रा में खड़े हो गये। भवन के द्वार से छः स्त्रियाँ बाहर निकल आयीं। और मुख्य सिंघासन के समीप स्थित छोटे सिंहासनों के सामने आ कर खड़ीं हो गयीं। अंत में एक अत्यंत गरिमा से युक्त स्त्री का पदार्पण हुआ। निसंदेह वो इस कबीले की साम्राज्ञी लग रही थी। उसके आसन पर बैठते ही मंचासीन सभी स्त्रियाँ यथास्थान बैठ गयीं। जनता भी अपने-अपने स्थान पर बैठ गयी। जिस व्यक्ति के नेतृत्व में अमर -मानसी को यहाँ लाया गया था उसने अपनी भाषा में साम्राज्ञी से कुछ कहना शुरू कर दिया। सभी के चेहरे पर गम्भीर भाव  थे। रानी ने अपनी ही भाषा में अमर-मानसी से कुछ पूछा। फिर उसने अपने प्रश्न को पुनः दोहराया। अमर ने अपनी अनभिज्ञता दिखाते हुये आकाश की ओर इशारा किया। सभी लोग ऊपर देखने लगे। फिर वो ऊपर कभी इन दोनों को देखते। अमर को लगा हर भाषा में घुटने टेकना समर्पण की ही निशानी होगी। उसने मानसी से घुटने के बल बैठते हुये साम्राज्ञी के सामने नतमस्तक होने के लिये कहा। और स्वयं नतमस्तक हो गया। उसकी देखा-देखी मानसी ने भी वही मुद्रा दोहरा दी। साम्राज्ञी ने अपने दायें और बायीं ओर बैठी औरतों को कुछ आदेश दिया। फिर उसने पुरुष सिपहसालार को भी कुछ आदेश दिया। एक स्त्री भवन के भीतर चली गयी और दूसरी स्त्री व पुरुष तलवार नुमा अस्त्र लेकर अमर-मानसी की ओर बढ़ गए। उन्होंने तलवार की नोक अमर और मानसी के सीने पर रख दी। 

(क्रमशः)

- वाणभट्ट



    

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