गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

मजमा  

साढ़े ग्यारह बजने को थे। इलाहाबाद के चौक में घंटाघर के पास गहमा गहमी का माहौल अपने शबाब की ओर बढ़ रहा था। असली भीड़ तो एक-दो बजे के बाद होती है। जब घर-गृहस्थी से फुर्सत पा कर महिलायें पूरे बाज़ार पर हावी हो जातीं हैं। घंटाघर के पीछे छिपे मीनाबाजार की रौनक अभी इक्का-दुक्का ग्राहकों तक ही सीमित थी। कुछ लोग भीड़ बढ़ने से पहले चौक की संकरी गलियों से निकल लेना उचित समझते हैं। ये ऐसे ही लोगों की जमात थी। सेल्स मैनों की संख्या दुकान पर खरीददारों पर भारी जान पड़ रही थी। मालिक भगवानों की खुशामद में लगे थे और उनके कारिंदे काम बढ़ने के पहले एक-दूसरे से अटखेलियों का पूरा लुफ्त उठा लेना चाहते थे।

एक मौलाना ऐनक लगाए ठठेरी बाज़ार की तरफ से कब निकल आये किसी ने ध्यान भी न दिया। वो परम आदरणीय छुन्नन गुरु की प्रतिमा की ओर मुंह करके घंटाघर की घडी की ओर एकटक निहारने लग गये। उनके चेहरे की परेशानी-चिंता साफ़ पढ़ी जा सकती थी। लग रहा था कोई जिन्न घडी से प्रकट होने वाला हो। उनकी देखा देखी कुछ चिल्लर पार्टी भी मुंह उठाये घडी की ओर देखने में मशगूल हो गयी। एक बच्चे से रहा नहीं गया। पूछा ही लिया कि मियां जी क्या देख रहे हो। उन्होंने मुंह पर उंगली लगा कर उसे चुप रहने का इशारा कर दिया। बच्चों में कौतूहल कुछ और बढ़ गया। वो भी टकटकी लगा कर उधर देखने लग गए जिधर मौलाना देख रहे थे। 

एक सायकिल वाला उधर से गुज़र रहा था, वो भी इन्हें अजीबोगरीब अवस्था में देख कर रुक गया। पूछा क्या हो रहा है तो बच्चों ने उसे भी चुप रहने का इशारा कर दिया। वो भी बड़ी हसरत के साथ उस ग्रुप में शामिल हो गया। एक स्कूटर वाले भाई साहब ने अपना स्कूटर स्टैंड पर लगा दिया। और उस समूह का हिस्सा बन गए।जो लोग मार्किट में आ जा रहे थे उनकी भी उत्सुकता कुछ बढ़ गयी। धीरे-धीरे करके समूह बढ़ता ही जा रहा था और कोई भी किसी को कुछ भी बता पाने की स्थिति में नहीं था। संयोग से मेरे पास भी कुछ समय था। अटैची की चेन ठीक करने वाले के आने का समय तो हो चला था पर वो अभी आया नहीं था। उसकी दुकान ठीक घंटाघर के नीचे फुटपाथ पर हुआ करती थी। लिहाज़ा मै भी उस भीड़ में शामिल हो गया। समय बीतने के साथ-साथ लोगों के चेहरे पर उत्सुकता के भाव आ जा रहे थे। पर मौलाना थे कि भीड़ से बेफिक्र घड़ी की ओर देखे जा रहे थे। दुकानों से लोग भी निकल के बाहर आ गए। लगभग जाम की सी स्थिति बन गयी थी।   

कुछ पुलिसिया भी वहाँ आ गये। और तहकीकात में जुट गए कि क्या हो रहा है। पर किसी को कुछ मालूम हो तो बताये भी। वो भी घडी की ओर सर उठा के खड़े हो गए। अजीब माहौल बन गया कि पता नहीं घंटाघर में क्या होने वाला है। जो आये वहीं पर थम जाए। कुछ लोग दूरबीन ले आये ताकि सही-सही देख सकें। वहाँ होने वाली वाली किसी घटना से वो चूक न जायें। भीड़ में कुछ प्रेस फोटोग्राफर भी आ गये और विभिन्न एंगल से भीड़ की फ़ोटो लेने में लग गए। पुलिस वालों को काम मिल गया। वो भीड़ को हांकने में जुट गए। पर भीड़ थी कि एक तरफ से हटती तो दूसरी तरफ जा खड़ी होती। सबकी निगाह घड़ी की टिक-टिक करती सुइयों पर टिकी थी। 

मौलाना भीड़ से बेफिक्र ही रहे और धीरे से वापस ठठेरी बाज़ार की ओर चल दिये। किसी का उनकी ओर ध्यान भी नहीं गया। सब तन्मय हो कर ऊपर देखने में व्यस्त थे। कोने पर बैठे तमोली ने मौलाना को भीड़ से निकलते देख लिया। पूछा ये क्या मज़मा लगा दिया मियाँ। मियाँ बोले बारह बजे पोती को स्कूल से लेने जाना होता है। आज मेरी घड़ी ख़राब हो गयी थी इसलिए घंटाघर आ गया। बारह बज गए हैं मै जा रहा हूँ पोती को लेने। तमोली ने कहा कल फिर आइयेगा। आप के फ़ज़ल से खूब पान बिक गए सुबह-सुबह।

घंटाघर पर भीड़ बढती ही जा रही थी। मेरी अटैची वाले का अभी तक कोई अता-पता नहीं था।   

- वाणभट्ट 

अंत में : ये घटना विनय भाई ने सुनाई थी। ये भाई टाइप के भाई नहीं हैं। ये वाकई भाई हैं। इस कथानक का कॉपीराइट उनका ही है। मेरी तरफ से ये कहानी कॉपीलेफ्ट है। दिल खोल के कॉपी कीजिये, पेस्ट कीजिये।  
   

21 टिप्‍पणियां:

  1. जय हो मौलाना साहब की ... और भीड़ को तो वैसे भी कोई काम है नहीं ...

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  2. बहुत हँसी आ रही है । बढिया लिखते हैं आप \

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  3. विनय भाई को हमारे बारे में इतना सब कैसे मालुम हुआ ?

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    1. आप भी इलाहाबादी तो नहीं...हा...हा...हा...

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  4. मियांजी की काठ की हांडी एक बार चढ़ गई। दूसरे दिन फिर नया तमाशा ही करना पड़ेगा। वरना पान कैसे बिकेगा ;)

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  5. तमासबीनों की कोई कमी नहीं .....
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति ...

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  6. मजमा लगाने वालों के दिमाग के बारे में अक्सर सोचती हूँ, दूसरा क्या कर रहा है,इसकी खोज में वे कितना समय बर्बाद करते हैं !

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  7. तमाशा बनाने और देखने में जाता ही क्या है ...?

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  8. जबरदस्त ऑबजर्वेशन...खासकर उन मीनाबाजारियों का.. :) सटीक!!

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  9. कुछ पल के लिए हम भी वहीं खड़े हो लिए..

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  10. खूब मन भाया व्यंग्य का यह रूप.

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  11. भीड़ बढ़ाने का अच्छा तरीका है कृषि प्रसार की यह एक एप्रोच हो सकती है

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  12. हा हा, ऐसा ही मजमा लोग लगाये बैठे रहते हैं टीवी पर।

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  13. हमारे यहां ऐसे मजमें जब-तब ही लग जाते हैं..

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  14. मज़मा लगाने वाले कहीं भी बिना कारण के मज़मा लगा सकते हैं...बहुत सटीक व्यंग...

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  15. मजमे का सच तो यही है ----पर इस कहानी में जो मजमा है
    वह जीवन को भावनाप्रधान बनता है ---
    उत्कृष्ट प्रस्तुति

    सादर
    ज्योति

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  16. भीड़ की कोई अपने विचार नहीं होते...सिर्फ़ सैलाब होता है.....

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यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...