गुरुवार, 26 सितंबर 2013

सफलता की गाथा  

आजकल मीडिया में समाचार को सेंसेशनल तरीके से पेश करने का चलन ना-काबिल-ए-बर्दाश्त की हद तक पहुँच गया है। पर जैसी की एक अंग्रेजी उक्ति है 'बेगर्स आर नॉट चूज़र्स'। न्यूज़ और टी वी देखना हमारी विशुद्ध पर्सनल बीमारी या मज़बूरी, जो भी कह लें, है। किसी डॉक्टर ने तो कहा नहीं है कि देश-दुनिया का हाल अगर आप नहीं जानेंगे तो फलां रोग लग जायेगा। ना ही किसी वैद्य ने बताया कि चैनल सर्फ नहीं करोगे तो वायु-पित्त-कफ में से एक या तीनों टाइप के विकार होने की सम्भावना है। ये वन वे ट्रेफिक है। तो भाई चैनल जो भी दिखाए, देखना ही पड़ता है। चैनेल्स की प्रतिस्पर्धात्मक मजबूरियां इतनी ज्यादा हैं कि हर चैनेल अपने समाचार को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में जुटा हुआ है। और जो लोग सास-बहु, घर-उजाड़, हंसाते-भूत, सच्ची-कथाएँ टाइप के सोप ऑपेराओं का आनंद लेने में असक्षम हैं उनके लिए तो न्यूज़ चैनेल की सर्फिंग के अलावा कोई काम बचता ही नहीं। इन चैनलों पर भी न्यूज़ कम और इश्तहार ज्यादा। पर इसी को तो मज़बूरी कहा जाता है। जैसे उडि जहाज को पंछी पुनि जहाज पर आवै। टी वी के सामने बैठ कर मै सलमा सुल्तान के ज़माने को याद करते हुए दूर-दर्शन न्यूज़ और आजकल के सनसनी खेज़ समाचारों का तुलनात्मक विश्लेषण कर ही था कि एक चैनेल पर सनसनी टाइप के पत्रकार ने न्यूज़ फ्लैश की "प्याज़ की जमाखोरी से किसान ने लाखों कमाये "।

प्याज़ के बढ़ते दामों से तो पूरा देश चिंतित है। जनता परेशान तो सरकारें भी परेशान। पहले भी ऐसा होता रहा है। जब-जब प्याज़ के दाम बढ़े सरकारों की नींदें हराम हो गयीं। ये तो एक ऐसी कमोडिटी बन चुका है जो सरकार बना भी सकता है और गिरा भी। प्याज़ की राखी बन रही है, संता -बंता के चुटकुले बन रहे हैं, दहेज़ और गिफ्ट में भी प्याज़ का ज़िक्र।सोशल साइट्स पर भी ये मुद्दा छाया हुआ है। प्याज़ और प्याज़ के दाम के लिए इतनी चिल्ल-पों को देख कर लगता है जैसे ये कोई जीवन- दायनी आधारभूत खाद्य सामग्री हो। अगर ये न हो तो आदमी भूखा मर सकता है। हिंदुस्तान के कई धर्मों-सम्प्रदायों में प्याज़-लहसुन का प्रयोग निषिद्ध है। इसे तामसी प्रवृत्ति का माना गया है। पर मनुष्य ही क्या जो प्रवृत्तियों का दास न हो। नहीं तो महात्मा नहीं बन जायेगा वो। इनके खाने वाले इनके गुण गिनाते नहीं थकेंगे। पर यही बात काजू-बादाम-अखरोट पर भी लागू होती है। बहुत फायदे हैं इनके। पर हम अपनी-अपनी औकात और जेब अनुसार इन शुष्क फलों का आनंद लेते हैं या नहीं लेते हैं। लेकिन इनके बिना कोई भूखा नहीं रहता। कोई हाहाकार भी नहीं मचता। फ्री में मिल जाये तो चबैने सा चबा लें और खरीद के खाना हो तो एक-एक काजू का लुफ्त उठाएं। ये मामला पूरी तरह आर्थिक है जिसके पास पैसा हो उसकी तो रोटी भी चुपड़ी होती है। जिसके पास नहीं है वो दाल के पानी में रोटी भिगो के खाए या नमक के साथ, ये उसका अपना ऑप्शन है। तो निवेदन ये है की भाई हैसियत नहीं है तो प्याज़ क्यों खानी। प्याज़ के बिना क्या नहीं रहा जा सकता। स्वाद की बात है तो जब प्याज़ सस्ता हो जाये तब साल भर की सारी तमन्ना निकाल लीजिये।पर आजकल ऐसी आग लगी है गोया प्याज़, प्याज़ न हो कर पानी हो गया हो। जिसके बिना सारा जग सूना-सूना लग रहा हो। रहीम दास जी आज होते तो बहुत संभव है कि लिख देते -

रहिमन प्याज़ राखिये बिन प्याज़ सब सून, 
फोटो चेपिये फेसबुक पर, खाते दोनों जून।  
वह-वाह, वह-वाह (अपनी दाद खुद ही देनी पड़ती है आजकल। लोगों के पास व्यस्त जीवन में ब्लॉग पढ़ने और समझने का समय ही कहाँ होता।)

चूँकि ये सिर्फ और सिर्फ स्वाद का मामला है तो बहुत संभव है कि ये हाहाकार समृद्ध लोगों ने ही मचा रक्खी हो। क्योंकि कि आम-आदमी तो रुखी-सूखी खाय के साफ़ पानी को भी तरस रहा है। ठन्डे की तो बात ही क्या करनी, उसका मतलब तो कोका-कोला होता है। लहसुन-प्याज़ के बारे में वो हो सोच सकता है जिसने दो जून के आटे-दाल-चावल-तेल-केरासिन का जुगाड़ कर लिया हो। जमाखोरी भी तो अमीरों की ही देन है। सीधा डिमांड-सप्लाई का नियम है। डिमांड बढ़ाने के लिए सप्लाई कम कर दो। फिर मुंह माँगा दाम वसूलो। ये बात सिर्फ प्याज़ पर नहीं भारत में हर चीज़ पर लागू हो सकती है और होती रही है। बचपन में मुझे याद है जब जाड़ा आता था तो बोरोलीन या तो मिलती नहीं थी या मिलती थी तो प्रिंट मूल्य से दो रुपये ज्यादा में। अमीरी ऐसे ही तो आती है। बिजनेस और राजनीति में एथिक्स का सर्वथा अभाव रहा है। एक तरफ इनका गठबंधन किल्लत बनाता है और दूसरी तरफ जनता से ज्यादा पैसा वसूल लिया जाता है। चाहे वो चीनी रही हो या गैस, दाल रही हो या गेहूं, आलू रहा हो या प्याज़। इस मामले में हमारे व्यापारी बहुत ही स्मार्ट रहे हैं और सारा सरकारी अमला तो मात्र इन्हें सपोर्ट करने के लिए ही बना है। जमाखोरी इनके सहयोग के बिना नामुमकिन है। बिजनेस और सत्ता दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।  

यदि प्याज़ कोई मूलभूत सामग्रियों (एस्सेन्शिअल कमॉडीटी) में शुमार हो तो ये हाय-तौबा समझ आती है। प्याज के बिन कौन भूखा मरा जा रहा है। हमारे यहाँ जनसँख्या विस्फोट ने एक वृहद् रूप ले लिया है। सबको सिर्फ और सिर्फ अपनी पड़ी है, देश का होना न होना गौण हो गया है। इसलिए हम हर उस काम को करने को तत्पर रहते हैं जिससे हमें थोडा भी फायदा होने वाला हो। लाइन में लग कर मूवी का टिकट लेना भी हमें गवारा नहीं। सरकार द्वारा प्रदत्त सब्सिडाइज्ड गैस से अपनी कार चलाना हमारे स्मार्ट होने की निशानी है। पैदा होने से लेकर मरने तक हमें कितनी ही सरकारी सुविधाओं के लिए उन लोगों को घूस देना पड़ता है जिनकी नियुक्ति ही जनता को सेवा देने के लिए हुयी है। और वो भी भीख नहीं, अधिकार की तरह। यहाँ तो बिना घूस के न जन्म मिलता है न मृत्यु। राजा का कर्तव्य अगर सेवा करना हो, और वो ये मानता भी हो, तो शायद उससे बड़ा नौकर खोजना मुश्किल है। पर सरकारी अमले तो बनाये ही इसलिए गए हैं कि वो जनता जनार्दन पर राज कर सकें। अगर हम सब, पूरा देश, घूस देने से मना कर दें तो कितने ही विभाग हमारे घर आयेंगे कहेंगे भैया सुविधाएं ले लो। लाइसेंस बनवालो, टैक्स दे दो, रजिस्ट्री करवा लो, मकान खरीद लो नहीं तो हमारा टारगेट नहीं मीट होगा। पर अभी तो सबको अपनी-अपनी पड़ी है। तो फिर किसी और को दोष क्यों देना। जिसे मौका मिलेगा हमारा खून चूसेगा। अरे भाई जिस चीज़ की जमाखोरी शुरू हो, जिस चीज़ का दाम अनियंत्रित-असामान्य रूप बढ़ना शुरू हो जाये उसका परित्याग शुरू कर दो। जमाखोर खुद ही घबरा जायेगा। लेकिन हम तो स्टेटस के चक्कर में पड़े हैं। अगर अभी प्याज़ नहीं खाया तो लोग क्या कहेंगे। मंहगाई के दौर में भी अगर कुछ दिखावा न कर पाए तो जनाब लानत है हमारी रईसी को।

बात की बात में विषयांतर हो गया। बात थी किसान के द्वारा प्याज़ जमाखोरी से लाखों कमाए जाने की। रिपोर्टर ने जिस तरह बताया उससे लगा इस कानून के पालन करने वालों के महान देश में किसान ने कोई भयंकर अपराध कर दिया हो। जिस देश में आदर्श  बच्चों के लिए हैं और उसूल दूसरों को प्रवचन देने के लिए, वहां किसान पर ऐसा आरोप सुन कर मै स्तंभित रह गया। मुझे ध्यान आया की एक नामी ब्रेड कंपनी ने अपनी ब्रेड को लोकप्रिय बनाने के लिए मैदे में स्किम्ड मिल्क पाउडर की मिक्सिंग करवा दी। ब्रेड इतनी स्वदिष्ट थी कि मक्खन लगाये बिना आप खा सकते थे। शीघ्र की बाकि छोटी कम्पनियाँ बंद हो गयीं। एक बहुराष्ट्रीय कोल्ड ड्रिंक कंपनी ने अपना मार्केट बनाने के लिए दूसरी देसी कंपनी की खाली बोतलें ही खरीद डालीं और उन्हें तुडवा डाला। १२ रुपये किलो का गेहूं जब आटा बन कर २५ रुपये में बिकता है तो कोई हाय-तौबा नहीं मचती। जबकि अधिकांश मुनाफा तो बिचौलिए और प्रसंस्करणकर्ता ही ले जाते हैं। ज़मीन-बीज-खाद-पानी-मेहनत सब किसान की और मुनाफा बिजनेसमैन का। उत्पादन से पहले बीज, खाद, कीटनाशक सब के सब बिलियन डॉलर इंडस्ट्री बन गये हैं। और उत्पादन के बाद फ़ूड प्रोसेस्सिंग इंडस्ट्री खड़ी हो गयी है। पर लकवे-पाले-बीमारी का जोखिम किसान के सर पर। तिस पर बेचने के लिए मंडियों के चक्कर। कोई किसान को ही बिजनेस क्यों नहीं सिखाता। उत्पादन की पूरी लागत, ज़मीन का किराया, सभी फिक्स्ड और वैरियेबल कॉस्ट, पूरे परिवार की दिन-रात की मेहनत का मोल जोड़ कर किसान अपनी उपज की कीमत तय कर सकता है। जैसा कार, साबुन, तेल, कंघी, कपडा, आटा, कंप्यूटर, मोबाईल, सीमेंट, चॉकलेट, नूडल इत्यादि-इत्यादि कम्पनियाँ करतीं हैं। जिस आदमी को गप्प मारने के लिए एक पैसे प्रति सेकेण्ड की टॉक वैल्यू सस्ती लगती है, उसी आदमी को एक रोटी का दस रुपये देना खलता है। पूरा देश आजकल फ़ूड सिक्योरिटी की बात कर रहा है। किसके भरोसे? किसान के भरोसे देश को खाद्य सुरक्षा का भरोसा दिलाया जा रहा है। पर किसान सुरक्षा की कोई बात नहीं कर रहा है। इस विषय पर हम संवेदनहीनता की हद तक लापरवाह हो गए हैं। किसान को भी उन सभी तकनीकी सुख-सुविधाओं का लाभ लेने का हक है जिनका लाभ शहरी भाई उठाने की आदी हो गए हैं। पर इनके लिए चाहिए पैसा। जो किसान के पास अक्सर नहीं होता। वहीँ खाद्य सामग्री के भण्डारण और प्रसंस्करण से जुड़े उद्योग फल-फूल रहे हैं। भण्डारण और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का मूल उद्देश्य ही है कृषि उपज का मूल्य सम्वर्धन। कृषि उत्पादन से उत्पाद के उपभोग तक की सारी श्रंखला में सबसे फायदे का सौदा भण्डारण और प्रसंस्करण ही है। जैसा कि हम सुनते आये हैं कि अंग्रेज कच्चा माल भारत से ले जाकर उसे संवर्धित कर पूरी दुनिया में व्यापार किया करते थे। आज भी तो यही हो रहा है। अगर भारत गाँवों में बसता है तो अंग्रेजों का काम हमारे अपने भाई कर रहे हैं। कम मूल्य का कच्चा माल गाँवों से लेकर उसे मनमाने मुनाफे के साथ वापस जनता को बेचना। जब ये काम उद्योगपति करें तो ये व्यापार और जब कभी किसान इस क्षेत्र में हाथ आजमाए तो जमाखोर। ये तो वही बात हुई कि आपका प्यार प्यार और हमारा प्यार चक्कर।

आजकल हर जगह सक्सेस स्टोरी का ज़माना है। खास तौर पर कृषि के क्षेत्र में। रोज नयी-नयी किसानों के लिए ऐसी लाभप्रद तकनीकें आ रही हैं जिनसे कृषि का मुनाफा बढाया जा रहा है। समर्थन मूल्य से किसानों को जो लाभ हो रहा है वो अभूतपूर्व है। सच भी है। शायद पहले कृषि इतनी विकसित नहीं थी। किसानों का मुनाफा बढ़ा ज़रूर है पर उनके शहरी काउंटर पार्ट की तुलना में बहुत कम। पर सक्सेस स्टोरीज़ की संख्या को देखते हुए ऐसा लगता है जैसे सारा पैसा खेती में ही फटा पड़ रहा है। रोज-रोज कृषि क्षेत्र के लोग नयी-नयी सफलता की गाथा निकाले जा रहे हैं कि उनकी उन्नत तकनीक किसानों के लिए कितनी लाभदायी है। एक भाई साहब ने अख़बार में छपवाया की तरबूजे की खेती से किसान ने १६००० रुपये पैदा किये। फोटो में भरी गर्मी में सूटधारी इन अफसर साहबान को सिर्फ अंगौछा लपेटे किसान एक तरबूजा दे रहा है। एक भाई ने बताया की पुदीने की खेती अगर किसान करे तो १.५ लाख तक प्रति हेक्टेयर उत्पन्न कर सकता है बशर्ते की वो पुदीने का तेल निकल के बेचे तब। एक भाई मूंग की खेती से दो महीने में ६०००० रुपये पैदा कर लेने का दावा करते हैं। वर्तमान उत्पादन, उत्पादकता और न्यूनतम समर्थन मूल्य को देखते हुए ये गणना कुछ ज्यादा प्रतीत होती है। अगर ये सफलता की कहानी है तो शहर के इंटर फेल बाबुओं की तनख्वाहें भी किसी सफलता से कम नहीं हैं। ये काम न करने की तो तनख्वाह लेते हैं और करने की घूस। किसी भी सूरत में इनकी मासिक आमदनी किसान की वार्षिक मेहनतकश कमाई से ज्यादा है। किसानों के उत्थान के लिए ये बंधुगण जितना पैसा अपनी देश-विदेश की यात्राओं में खर्च करते हैं, ये भी एक सक्सेस स्टोरी बन सकती है। सरकारी फण्ड को बेरहमी से सिर्फ अपने प्रमोशन के लिए कन्जूम करने में इन योजनाकर्ताओं का सानी खोजना कठिन है। सरकार ने जितने भी मदों में किसानों के लिए पैसे भेजे हैं, सब के सब एक सक्सेस स्टोरी बन गए हैं। नहीं तो ग्रांट भी रुकेगी और पदोन्नति भी। आफ्टर आल सबको अपनी-अपनी पड़ी है। 

आज का युग अर्थ युग है। पैसा ही धर्म है और पैसा ही रिश्ते और समाज। कोई ये नहीं पूछ रहा की पैसा कहाँ से आ रहा है और कैसे आ रहा है। चाहो तो गुटका बेच कर करोड़ों का साम्राज्य खड़ा कर लो या अफीम बेच कर। घूस से कमाओ या ज़मीर बेच कर। पैसे की अपनी भाषा है।ऐसे में किसान से देश के लिए चैरिटी की उम्मीद का कोई मतलब नहीं है। कृषि क्षेत्र में सक्सेस स्टोरीज़ का जिस तरह से प्रचलन बढ़ा है उसे देख के लगता है विज्ञानं के अन्य क्षेत्र ढक्कन हो गए हैं। सबसे ज्यादा मुनाफा कृषि में ही हो रहा है। ये बात अलग है कि हम किसी भी किसान आज उद्योगपति के रूप में नहीं जानते। ऐसे में ये खबर कि प्याज़ की जमाखोरी से किसान ने लाखों कमाए ये मेरे विचार से एक वास्तविक सक्सेस स्टोरी है। गौर कीजिये लाखों। देश के सबसे बड़े उद्योग कृषि,  जो सौ करोड़ को खाना दे सकता है और रोज़गार भी, को हमने अपाहिज सा बना रक्खा है। सरकार के सहयोग से रेंगने वाला उद्यम। जबकि उसी से सम्बद्ध बीज-खाद-केमिकल्स-प्रसंस्करण उद्योग बन गए। यदि भारत का किसान फसल उत्पादन के साथ-साथ भण्डारण और प्रसंस्करण का कार्य करने लगेगा, कृषि भी एक संपूर्ण उद्योग का रूप ले लेगी। अभी कृषक के उत्पादन का मूल्य सरकार नियत करती है। जबकि अन्य किसी उद्योग में ऐसा नियंत्रण नहीं है। फिक्स्ड, वैरिएबल और विज्ञापन को जोड़ कर मुनाफा तय किया जाता है और कम्पनियाँ ही अपने उत्पाद का मूल्य निर्धारण करतीं हैं। यहाँ तक की तेंदुलकर और कैटरिना कैफ का पैसा भी ग्राहकों से वसूला जाता है। जिस दिन भारतीय कृषक के हाथ में भण्डारण और प्रसंस्करण की जादुई छड़ी आ जाएगी उस दिन उसकी ही नहीं पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दशा और देश की दिशा दोनों बदल जाएगी। खाद्य सुरक्षा को कृषक सुरक्षा से जोड़ कर देखा जाना चाहिए। खेती की सफलता गाथाएं जब अम्बानीज़, टाटाज़, बिरलाज़ के साथ बिजनेस टुडे, फ़ोर्ब्स इंडिया, इकनोमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैण्डर्ड में स्थान पाएंगी तभी कृषि को एक उद्योग का दर्ज़ा मिल पायेगा। संपन्न किसान ही समृद्ध भारत नीवँ है। 

हे ब्रम्हा! हे विष्णु! हे महेश! वाणभट्ट आप सबका आह्वाहन करता है। ये मनोकामना पूरी कीजिये। सवा रुपये का प्रसाद…  

तीनो देव एक साथ बोल उठे "वत्स यहाँ भी…घूस…सुधर जाओ"  

- वाणभट्ट  

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार - 27/09/2013 को
    विवेकानंद जी का शिकागो संभाषण: भारत का वैश्विक परिचय - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः24 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


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  2. बाज़ार के हिचकोले बड़े झटका देते हैं, कुछ तो सह जाते हैं, कुछ बिखर जाते हैं।

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  3. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    http://madan-saxena.blogspot.in/
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  4. कुछ दिनों पहले ...मुंबई में मैने लीची के दाम पूछे...बेचनेवाले ने बताया 4 की एक ... मैं समझ नही पाया ... मेरे हैसियत घट गयी या लीची के बढ़ गये !?!
    आपके लिखे ने लिखने के लिए मजबूर कर दिया ...यही तारीफ़ है आपके लिखे की... आपका नीलेश जैन, मुंबई

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  5. रहिमन प्याज़ राखिये बिन प्याज़ सब सून,
    फोटो चेपिये फेसबुक पर, खाते दोनों जून।

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  6. आपकी कुछ बातें जैसे गेहूं का मूल्य निर्धारण सरकार करे और आशीर्वाद आट्टे का भाव टाटा कंपनी करे, का सवाल मैंने भी ट्रेन में सफ़र करते हुए कई महानुभाओं से किया है. परन्तु जो खेती नहीं करते वोह लोग समझने को राजी नहीं है. मैंने तोह अपने गाँव के युवाओं को कहा है कि खेती मत करना चाहे ट्रक चला लेना या जयपुर में चोख्टी पर काम करना या परदे सिलाई करके मजदूरी करना बेहतर है. येही हो रहा है की मेरे गाँव में ४० वर्ष से कम उम्र का नौजवान खेती नहीं करता है. केवल बुजुर्ग लोग संभल लेते है खेतो को. युवाओं की जिंदगी खुशहाल बन रही है.
    किसान का भला तभी होगा तब किसान अपने खाने जितना ही पैदा करें

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    1. मेरा दूध वाला बच्चों की स्कूल वैन चला के ज्यादा पैसे कमा रहा है...जब टैक्सी चला के ज्यादा आराम है...तो खेती से दूर सब भागेंगे ही...

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  7. सटीक ओर सार्थक लिखा है ... सरकार बस जाने पहचाने लोगों (बिचोलिये, जमाखोर, किसान) को ही जिम्मेवार समझ कर ठीकरा फोड़ने का काम करती है ... ये जो इतनी बड़ी फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री है उसको कुछ नहीं कहती ... क्योंकि पासा जो इनसे मिलता है ...

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यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...