सोमवार, 2 सितंबर 2013

सूखे फूल 

रोज सुबह शुक्ल जी के मिलने का स्थान और समय नियत है। केशव वाटिका में जहाँ 'फूल तोडना सख्त मना है' का बोर्ड लगा है वहीँ प्रातः शुक्ल जी पूर्ण तन्मयता के साथ फूल तोड़ते मिल जायेंगे। कहीं कोई और फूल तोड़ न ले जाये इसलिए उन के लिए अलसुबह बाकि पुष्प प्रेमियों के आने से पहले वाटिका पहुंचना नितांत आवश्यक है। जब तक मै  पहुँचता हूँ उनकी दोनों जेबें फुल हो चुकी होतीं हैं। वाटिका के चौकीदारों ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया पर सठियाने का भी कोई लाभ होता है तो वो ये है कि आप को कोई कुछ समझा नहीं सकता।  सफ़ेद बालों और उम्र का लिहाज़ अभी भी बुजुर्गों को हमारे देश में नियम-कानून से ऊपर रखता है। और फूल तोडना कौन सा जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है। और वाटिका के चौकीदार भी कौन से पुलिस वाले थे। और होते भी तो क्या कुछ ले-दे के मान न जाते।  पर अगर ले-दे के ही शुक्ल जी को फूल हासिल करने होते तो मोहल्ले में कई मालिनें ये काम कर रहीं हैं। सिर्फ ३०-४० रुपये में महीने भर फूलों की आपूर्ति।

शुक्ल जी सरीखे अन्य लोग भी देर-सबेर वाटिका पहुँच ही जाते और फूल तोड़ने की प्रक्रिया में यथाशक्ति अपना-अपना योगदान देने में कोई कोर-कसर ना  छोड़ते।  इस कारण वाटिका सिर्फ नाम की वाटिका रह गयी थी। खिले हुए फूलों को देखना तो केवल इन पुष्प तोड़कों  और उनकी जेबों के नसीब तक ही सीमित रह गया है। मैंने भी कई बार अपनी मित्रता का हवाला देते हुए शुक्ल जी से निवेदन किया कि प्रभु इतने सारे फूल भी इतनी खुशबु नहीं दे पाते जितनी एक अगरबत्ती दे देती है। पर उनका कहना था कि भगवान को बासी सुगंध कैसे अर्पित की जा सकती है और वो भी तब जब वाटिका में फूल सहज उपलब्ध हैं।

आजकल मिडिल क्लास तबके में एक बयार आई है।  सब अपने एम आई जी मकानों की एक इंच जगह भी खाली नहीं छोड़ते। पूरा का पूरा मकान पक्की फर्श से ढँक जाता है। कुछ तो पूरे फर्श के ऊपर पूरी छत भी तान देते हैं। पूरे घर में मार्बल की फ्लोरिंग करने के बाद गेट तक कलेजी लगाने का प्रचलन बढ़ गया है। कच्ची ज़मीन रखने से मार्बल के गन्दा होने की प्रोबेबिलिटी बढ़ जाती है। हाँ, इस प्रजाति के लोगों में कुछ पर्यावरण प्रेमी भी हैं। वो सड़क के फुटपाथ को घेर कर बगीचा टाइप की चीज़ बना लेते हैं। कुछ वृक्षारोपण कर अपने को प्रकृति और सौदर्य प्रेमी की संज्ञा देने से नहीं चूकते। सरकार के बस का तो फुटपाथ मेंटेन करना है नहीं लिहाज़ा इस काम को समाज सेवा का दर्ज़ा भी दिया जा सकता है। ये बात अलग है की सडकों का पानी नालियों तक न पहुँच पाए तो जलभराव की स्थिति बन जाती है। और तारकोल से बनी सड़कें पानी का रुकना बर्दाश्त नहीं कर पातीं इसलिए दस साल की जगह दो साल में ही जवाब दे देतीं हैं।

शुक्ल जी ने भी सरकारी जमीं पर अतिक्रमण कर एक लघु वाटिका बना ली थी। पर उन्हें शिकायत थी कि वो इतनी मेहनत से पौधे लगाते हैं, उनकी देख-भाल करते पर जब फूलों का मौसम आता तो ज़ालिम ज़माने वाले एक फूल भी उनके लिए नहीं छोड़ते। दुखी हो कर उन्होंने बिना फूलों वाले पेड़-पौधे लगा लिए और अब फूलों के लिए उनको केशव वाटिका पर निर्भर रहना पड़ता। जब आप किसी भी आदमी के गलत से गलत कृत्यों के जेनेसिस में जायें तो लगता है वो आदमी जो भी कर रहा है वह शत-प्रतिशत सही है। किसी की बहन की कोई नाक काट ले तो उसका रावन बन जाना संभव है। किसी के बाप को राज-पाठ सिर्फ इसलिए ना मिले की वो नेत्रहीन है तो उसे दुर्योधन होने का पूरा अधिकार है। चूँकि शुक्ल जी मेरे मित्र हैं और मै उनकी पुष्प-व्यथा से वाकिफ भी हूँ इसलिए उनके फूल तोड़ने को ले कर मै ज्यादा क्रिटिकल नहीं हूँ, यद्यपि मै फूलों को शाखाओं पर देखना ही अधिक पसंद करता हूँ।  

उस शाम शुक्ल जी अपनी स्कूटी पर एक भारी-भरकम पौलीथीन बैग लिए कहीं जा रहे थे जब मै  उनसे टकराया।  हेलमेट पहन रक्खी थी उन्होंने जिससे ये जाहिर था कि वो कहीं सुदूर क्षेत्र के भ्रमण के इरादे से निकले हैं। टोकना तो हिंदुस्तानी हितैषियों का परम कर्तव्य है सो मैंने पूछ ही लिए "बन्धु कहाँ प्रस्थान का विचार है"।  "आ जाओ वर्मा जी तुम्हें गंगा जी तक घुमा लायें" ऐसा कह कर उन्होंने स्कूटी रोक ली। मै तो सैर करने के इरादे से निकला ही था इसलिए इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। कुछ पलों में मै उनके पीछे वाली सीट पर विद्यमान था और लगभग एक घंटे की यात्रा कर के जाजमऊ पुल के ऊपर। रास्ते में शुक्ल जी ने बताया की घर में बहुत सूखे फूल इकट्ठे हो गए थे चूँकि भगवान को चढ़ाये फूल हैं इसलिए उन्हें इधर-उधर तो फेंक नहीं सकते। इसलिए यहाँ तक आना हुआ इसी बहाने गंगा मैया के दर्शन भी हो जायेंगे। एक पंथ दो काज। 

गंगा पुल पर शाम की सोंधी हवा के आनंद में मै खो सा गया था जब छपाक की आवाज़ हुई। लगा किसी ने बोरे में भर के लाश को फेंक दिया हो पानी में। मैंने चौंक के नीचे देखा तो शुक्ल जी के द्वारा लाया बैग पानी में डूबता-उतराता बहा जा रहा था। बगल में शुक्ल जी असीम श्रद्धा भाव से हाथ जोड़े गंगा मैया को प्रणाम कर रहे थे। 

लौटते समय रास्ते भर मेरा कुछ भी बोलने का मन नहीं हुआ। बहुत थकान लग रही थी। ऐसा लग रहा था मानो किसी सम्बन्धी की शव-यात्रा में कन्धा दे कर लौट रहा हूँ।   

वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम 
दगा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे   

- वाणभट्ट            

12 टिप्‍पणियां:

  1. सफ़ेद बालों और उम्र का लिहाज़ अभी भी बुजुर्गों को हमारे देश में नियम-कानून से ऊपर रखता है।...हा हा!! क्या सटीक और पैना आबजर्वेशन है जी...कायल हुए आपके!! यूँ भी थे ही...कुछ नया नहीं हुआ है तो बहुत खुश न हों :)

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  2. वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम
    दगा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे

    आह!! जैसे तीर जा लगा हो दिल पर सीधे...दगाबाज़ रे!! :)

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  3. केशव वाटिका का अर्पण गंगा जी को, केशव की जमुना तो प्रयाग में जाकर मिलती है।

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  4. आस्था के नाम पर प्रदूषण फैलाते लोग ...

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  5. गंगा मैया तक आने का ये बहाना खूब है..... :)

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  6. केशव वाटिका... इसे यूँ भी लिख सकते हैं... 'केशव' वाटिका 'के शव'...
    जिन्हें आप कंधा दे के लौटे...
    अच्छा सरोकार, अच्छी रचना
    आपका नीलेश

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  7. प्रस्तुति बहुत ठीक लगी । संयोग की फूलो के जन्म से अंतिम संस्कार तक की यात्रा में शामिल हो गए । दलहन परिसर में भी शुक्ल के भाई हैं जो सुबह जागते ही पहला वार पौधो पर ही सीधा करते है। लगता है बाजार में बेंचते है । नहीं तो एक -दो फूल ही काफी। पोधा भी कहता होगा कैसा जंगली जानवर है मानव आज का जो हबसी हो चला है ।

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  8. वर्मा जी हमें आपके लेख बहुत ही अच्छे एवं सन्देश युक्त लगते है। आपकी लग्गू और भग्गू वाली प्रेरणा युक्त कहानी भी प्यारी थी। आप दिल को छूने वाले सन्देश व्यक्त करते हो। फुर्सत में बात करेंगे।

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  9. ye pushp premi (chor) har jagah har sadak par subah mil jaate hai aur ghoomna kam inki nigaahe chori ke liye mouke ki talash me hi rahti hai . badiya observation ke sath likhi sundar katha ..

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  10. चुटीला किन्तु संवेदनशील लेख ... कई बार तो लगता है अनजाने ही लोग प्रदूषण फैलाते हैं ... इन मान्यताओं को बदलने के लिए सामाजिक अभियानों की जरूरत है ...

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  11. मैं बाणभट्ट नाम से आकृष्ट होकर आपके ब्लॉग में आई हूँ पर आपने मुझे निराश नहीं किया । प्रशंसनीय प्रस्तुति ।

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  12. Bahut hi saral, Vyavharik jeevan se judi, Dil se baat karti hui shailee mein likhi gayee kahaniyan bahut pasand aayee. Mera anurodh hai ki aap isi tarah vyavharik jeevan se sambandhit samajik vatavaran ka adyayan karke lekh likhein to vastav mein sammanniya vaigyanikon tatha anya sabhi nagrikon ki aankhein khulengee saath hi ye seekh lenge aisa mera vishvas hai.

    Lakhan Singh
    Principal Scientist
    ZPD-IV, Kanpur

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यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...