शनिवार, 22 दिसंबर 2012

एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी...

ज़िन्दगी का उसूल है कि वो कुछ नहीं तो तजुर्बा ज़रूर देती है। कुछ ऐसे ही बदलाव ज़िन्दगी में रहे गत कुछ महीनों से। आदमी अपनी चाल चलता है और ग्रह-नक्षत्र अपनी। एकदम ऊपर वाले और एकदम नीचे वाले के बीच में भी कुछ मिडिल आर्डर ऊपर वाले होते हैं। जो शतरंज की बिसात बिछाते हैं और अपने वजीर-बादशाह को बचाने के लिए प्यादों को कुर्बान कर देते हैं।

मिश्र जी का हश्र तो ऐसा होना ही था। सिस्टम में हजारों दोष हैं ये सिस्टम भी जानता है। पर भाई जड़त्व भी कोई चीज़ है। अगर सिस्टम ऐसा न होता तो जो सिस्टम के जो संभ्रांत खिलाडी हैं वो संभवतः सिस्टम से बाहर होते। उनकी ही परिभाषाएं हैं कि अकेला चना भाड़ क्या फोड़ेगा। और ये बात अवाम के जेहन में कूट-कूट के घुसेड दी गयी है। एक्का-दुक्का जो ये गलतफहमी पाल लेता है कि वो देश का भला कर के ही मानेगा, तो सारा सिस्टम उसे दुरुस्त करने में लग जाता है। उसमें लग्गू-भग्गू का रोल अहम् होता है। क्योंकि शहंशाह तो सत्ता के मद में चूर होता है ये दायें और बायें ही होते है जो खबरी का काम करते हैं। और बताते हैं कि हुजूर अमुक इलाके से बगावत की बू आ रही है। उसे निपटाना ज़रूरी है नहीं तो आपकी सत्ता हिल सकती है।

और जिन राजाओं को अपने बल, बुद्धि और विवेक पर भरोसा न हो उन्हें कन्फ्यूज़ करना कोई कठिन भी नहीं है। तो मिश्र जी कहानी "सिस्टम के अन्दर : अन्ना हज़ारे" (http://vaanbhatt.blogspot.in/2011/04/blog-post_12.html) जहाँ ख़त्म हुई वहां से एक नयी कहानी शुरू हुई। मिश्र जी की ईमानदारी को चुनौती देना तो नामुमकिन था। सो उनके ऊपर ड्यूटी का उचित निर्वाह न करने, उच्च अधिकारियों से अभद्र व्यवहार, कार्य संस्कृति बिगड़ने के अनर्गल आक्षेप लगा दिए गए। एक चेतावनी मिली सो अलग से की भविष्य में ऐसी ईमानदारी और देशभक्ति वाली हरकतें कीं तो उचित अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है। फिलहाल उन्हें स्थानांतरण से नवाज़ा जा रहा है। लेकिन ये भविष्य के संकेत मात्र हैं।

मिश्र जी का विश्वास और प्रबल हो गया है। जिस रस्ते को उन्होंने चुना है वो यक़ीनन सही है। वर्ना संस्थान और देश से गद्दारी करके जीना शायद उनका दम घोंट देता। मित्रों मिश्र जी को आपकी शुभकामनाओं और शुभेच्छा की सख्त ज़रूरत है। ईमानदारों के लिए जीने का यही एक संबल है।

सत्य पर असत्य की जीत चिर स्थाई तो नहीं दिखाई गयी है अब तक के वक्तव्यों में। और मिश्र जी का मानना है कि नीचे वालों की मंशा के पीछे भी ऊपर वाले की मंशा छिपी होती है। इस कहानी का ये अंत नहीं है। एक नयी शुरुआत कह सकते हैं। 

एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी। मुसाफिर का काम तो बस चलते जाना है।

- वाणभट्ट              

बुधवार, 19 दिसंबर 2012


प्रार्थना के शिल्प में !

(देवी प्रसाद मिश्र की रचना 'प्रार्थना के शिल्प में नहीं' से प्रेरित ...)

क्षमा
हे अग्नि !
हे वायु !
हे जल !
हे आकाश !
हे धरा !

निवेदन है
कि
आप कहीं दूर एकांत में जा
अपने कान भींच लें
आँखें मींच लें
कि
साक्षी के सम्मुख
असत कहने का साहस
नहीं है मुझमें
कि
विजय सदा सत्य की होती है.

- वाणभट्ट

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012


प्रिय मित्रों, एक पुरानी रचना साझा कर रहा हूँ...

अयोध्या

अयोध्या पर लिखना ज़रूरी हो जाता है.
जब देश का ये कोना मज़हब हो जाता है.

किसी ने पूछा,
प्रयाग में माघ मेला कब से लगता है
इलाहाबाद बनने के पहले या बाद में
जवाब तो नहीं, पर एक जिद ज़रूर है.
इतिहास के पहले शायद कुछ भी नहीं था.

माघ का मेला सदियों से लगता है,
जब आस्था का समुंदर हिलोरें लेता है,
संगम पर ये विहंगम दृश्य हर साल सजता है.

शायद मानव अस्तित्व के पहले से,
भाषा के भी पहले से, कुछ तो रहा होगा,
जिसने प्रयाग को प्रयाग और कोणार्क को कोणार्क बनाया होगा.

लेकिन अब समय पीछे जाने का नहीं है
ये विद्वानों का मत है.
इन्टरनेट और फेसबुक कि दुनिया में,
अमेरिका बन जाना इनके लिए
अंतिम वक्तव्य है

जडें तो अपनी हैं,
कहाँ तक काटियेगा
कब तक  झूठलाइयेगा इस बात को
कि
तमाम परतों के नीचे एक ही है यहाँ,
आदमी का वजूद.
ज़मीन के इस घेरे के अन्दर.

मज़हब को मानिये ज़रूर,
पर खुद को भी तो पहचानिए हुज़ूर.

- वाणभट्ट