शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

उगता सूरज


टहलने के नेक इरादे से घर के बाहर कदम रक्खा ही था कि शर्मा जी मिल गए.


"भाई वर्मा जी, क्या बात है पूरा महीना निकल गया और कोई पोस्ट नहीं चेपी. ख्याल चुक गए क्या. आपकी ब्लॉग फ्रीक्वेंसी बहुत कम है. लोग तो  रोज़-रोज़  चेप रहे हैं."


मैंने एक्सप्लेन करने कि मुद्रा में बचाव किया " शर्मा जी, मै कोई रेगुलर लेखक या कवि तो हूँ नहीं. जब भड़ास हद से गुज़र जाती है तो उड़ेल देता हूँ. मेरी इस दिशा में फिलहाल कोई कैरियर बनाने की कोई इच्छा भी नहीं है. वैसे भी ब्लॉग लिखने की प्रक्रिया बहुत उत्साहवर्धक नहीं है. पूरी जान लगा के लिखो तो खींचखांच के २५-३० पाठक ही मिलते हैं. तीन साल में फोल्लोवर लिस्ट अभी ३० के पार पहुंची है. जिसमें मै एक खुद ही हूँ. इस चक्कर में पता नहीं किस-किस की पढ़नी पड़ती है सो अलग से. कभी-कभी दिल टूट जाता है. और इच्छा होती है की बस बहुत हो गया अब ब्लॉग नहीं लिखूंगा. पर क्या करूँ जब विचार दिमाग फाड़ने लगें तो यही एक जगह है जहाँ जा के हल्का हुआ जा सकता है. अपना कोई पब्लिशर तो है नहीं. एक बार पैसा दे कर कविता संग्रह छपवा तो लिया पर अब समस्या ये है की जो कॉम्प्लीमेंट्री २५ कॉपी मिलीं थीं उनका क्या करूँ. पिछले हफ्ते तो अति हो गयी. बीवी कहती है बिग बाज़ार में सेल लगी है. कबाड़ बेचो तो २५% तक डिस्काउंट मिल रहा है. तीन-चार किलो की तो ये होंगी ही. खामखाह बच्चों की अलमारी घेर रक्खी है. मैंने शायद बहुत घूर के देखा होगा, दो-चार दिन स्वाद का तड़का खाने में नहीं लगा."


शर्मा जी मेरे उन हिमायतियों में से हैं जो नियमित रूप से मेरे ब्लॉग पर पहुँच कर अपनी उपस्थिति ज़रूर दर्ज करते थे. मेरे प्रशंसक कम आलोचक ज्यादा. वैसे भी मै जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आलोचकों के प्रति सदैव आभारी रहा हूँ, ये ही वो जीव हैं जो आदमी को आदमी बनाये रखते हैं. वर्ना जिसे सिर्फ च ढाने वाले मिले उसे खुदा बनते देर नहीं लगती. और कोई किसी को तब तक नहीं चढ़ाता जब तक उसका कोई स्वार्थ-सिद्ध न हो.


शर्मा जी ने उवाचा, "वर्मा जी ब्लॉग को पोपुलर करना भी हुनर है. आप वाणभट्ट के छद्म नाम से लिख रहे हो. अरे वाणी भट्ट के नाम से लिखो. जब नाम छद्म है तो क्या स्त्रीलिंग क्या पुल्लिंग. इन्टरनेट से किसी मॉडल की खुबसूरत फोटो ले कर चेप दो. देखो फोल्लोवर लिस्ट कैसे बढ़ती है. एक तो आपको कोई ढंग का नाम नहीं मिला. दूसरे खच्चर पे सवार किसी खणूस की फोटो लगा रक्खी है. बताओ कैसे लोगों को आकर्षित करोगे. लेखनी में भी दम  है नहीं. उथली-उथली बातें करते हो. गाम्भीर्य का सर्वथा अभाव है. लोग ब्लॉग को ले कर कितने सीरियस और संजीदा हैं और आप हैं की हें-हें, हें-हें कर रहे हैं. मेरा बताया नुस्खा आजमाइए और देखिये कामयाबी आपके कदम चूमेगी. हम वो नहीं हैं जो खामखाह फाख्ता उड़ाते हैं (अंतर्मन की आवाज़ - गोया फाख्ता उड़ाने का भी कोई परपज होता है). बात में वज़न हो तो लोग खुद बखुद खींचे आते हैं."


वज़न का ज़िक्र होते ही मुझे अपने बढ़ते वज़न की याद हो आई. इसीलिए तो मैंने टहलना शुरू किया है. सरसरी तौर पर शर्मा जी की कमर पर मेरी नज़र दौड़ गयी. माशाअल्ला कमरा बनने की कगार पर पहुँच गयी थी. शर्मा जी ने मुद्दा थमा दिया था. मुझे उम्मीद जग गयी कि आज शाम तक एक ब्लॉग अवतरित हो जायेगा. मैंने फटाफट शर्मा जी को उनके नेक विचारों के लिए धन्यवाद दिया और सरपट खच्चर गति से निकटवर्ती पार्क की ओर अग्रसर हो गया.


इस देश ने आज़ादी के बाद काफी सम्पन्नता हासिल की. जो हर तरफ परिलक्षित हो रही है (गाम्भीर्य भरने का प्रयास). जिसे देखो गाड़ी-घोड़े बदल रहा है. मंहगाई के साथ ही विशाल अट्टालिकाएं बन रहीं हैं. लोग अपनी नव अर्जित संम्पत्ति को शर्मनाक स्तर तक  प्रदर्शित करने में नहीं चूक रहे हैं. अभी तक लक्ष्मी सिर्फ व्यापारियों या भ्रष्टाचारियों पर ही मेहरबान थीं पर अब तो सरकारी तनख्वाहों पर पलने वालों पर भी उनकी कृपा दृष्टि पड़ रही है. पे कमीशन और निरंतर मिल रहे डी.ए. के कारण अब सरकारी नौकरी भी उतनी  बुरी नहीं रह गयी है. प्राइवेट में तो जिसे देखो लाखों के पैकेज पर काम कर रहा है. कुछ प्रोफेशनल लोग तो अब प्राइवेट छोड़ कर सरकारी नौकरियों का रुख कर रहे है. जहाँ नियमित आय के साथ-साथ कुछ सिक्यूरिटी भी मिल जाती है. कहने का मौजूं ये है की हर तरफ समृद्धि की बहार है. समृद्धि हर जगह टपक रही है या यों कहें की फटी पड़ रही है. (गंभीरता बहुत हो गयी अब औकात पर आ जाता हूँ.)


सबसे ज्यादा फर्क पड़ा है आदमी के वज़न में. (शर्मा जी संभवतः अब खुश हो जायें क्योंकि मैंने बात-बात में वज़न डालने की कोशिश की है.) घूमने-खेलने के संसाधनों में ज्यादा वृद्धि तो नहीं हुई है पर खान-पान के आलयों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हर तरफ सहज दिख  जाती है. गली-कूचों और कस्बों में फ़ूड जोइंट खुल गए हैं और लगातार खुल रहे हैं. के ऍफ़ सी, पिज़ा हट, डोमिनो, मेक्डोनाल्ड, सबवे आदि-आदि न जाने कितने मल्टी नेशनल  रेस्टोरेंट अब बड़े शहरों में नहीं रीवा, इलाहाबाद, कानपुर जैसे शहरों में भी पोपुलर हो रहे हैं. नियोन लाइट में सजे इनके होर्डिंग्स हर जगह दिखना अब आम बात हो गयी है. लोगों को भी कम पैसे में ज्यादा कैलोरी की चीजें जितना आकर्षित करतीं हैं उतनी हाई फाइबर, लो कैलोरी वाली नहीं. जंक फ़ूड का ज़माना है. बच्चे चोकोलेट और कुरकुरे के लिए तो होम वर्क भले कर लें. पर दादी के हाथ के बने फरे देख घर छोड़ भाग जाते हैं. मटर का निमोना उन्हें बहुत शैबी लुक देता है पर मंचूरियन की गंदली करी वो बड़े स्वाद से खाते हैं. लिहाजा ऐसे फ़ूड जोइंट की बाढ़ आ गयी है. और उनपे शाम होते-होते लोग बर्र के छत्ते से टूट पड़ते हैं. अफोर्ड करने की बात है. आप के.ऍफ़.सी. से लेकर सड़क किनारे चुन्नू नूडल कार्नर तक कहीं भी मुंह मार सकते हैं. चाइनीज़, थाई, इटालियन या स्पनिश जैसा भी टेस्ट रखते हैं, हर प्राइस रेंज में चीजें उपलब्ध हैं. और लोग है कि अपनी समृद्धि का एक बड़ा हिस्सा घर के बाहर खाने में खर्च कर रहे हैं. अजीनोमोटो डाल-डाल के ये विदेशी व्यंजन आपके मुंह को लार से भर देते हैं. और आप उनके स्वाद के एडिक्ट बन जाते हैं. खैर समृद्धि आपकी है, पेट आपका है, तो खाइए दिल खोल के. घूमना-सैर-सपाटा अभी भी मंहगा है. अच्छे क्लब की मेम्बरशिप तो पैदायशी समृद्धों के लिए है.


गुड डे बिस्कुट का एड आता है कि काजू है तो दिखना चाहिए. वैसे ही समृद्धि हो तो छलकनी चाहिए. कंज्यूमर ड्यूरेबल में तो जो लगाओगे वो तो एक दिन में ख़त्म होगा नहीं. सो लोग कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल से ही अपनी पहचान बनाने में लग गए हैं. कपडे ब्रांडेड, चश्मे ब्रांडेड, परफ्यूम ब्रांडेड, और तो और खाना भी ब्रांडेड. मिठाई की जगह चोकलेट ने ले ली है. घर में पार्टी देने के बजाय मेक्डोनाल्ड में ही गेस्ट बुला लेना लेटेस्ट फैशन है. किसी माध्यम वर्गीय परिवार में बिन बुलाये भी पहुँच जाइये तो वो आपकी खातिर रोस्टेड काजू और गरिष्ठ मिठाइयों से कर सकता है. कुल बातों का लब्बो-लबाब ये है की समृद्धि का एक बड़ा हिस्सा आदमी अपने खाने पर खर्च कर रहा है. 


और ये समृद्धि कैसे और कहाँ-कहाँ से छलकती है, सुभानल्लाह. किसी ने पैंट ३६ से ४० करा रक्खी है, तो पीछे एक विक्टरी वाला वी बनता है, मानो जग जीत लिया. कहीं बेल्ट बेचारी स्ट्रगल करती नज़र आती है. कहीं तोंद शर्ट की बटनों के बीच से बाहर के नज़ारे लेने को आतुर दिखाई देती है. ओवर वेट होना आज का स्टेटस सिम्बल है. बचपन से ही बेटा अपना नाम करना शुरू कर देता है, देखते ही लगता है किसी खाते-पीते घर का नुमाइन्दा है. महिलाओं का तो हिन्दुस्तानी पोशाक में विशेष ध्यान रक्खा है. जितना चाहो उतना बड़ा फलेंटा मार लो. फिर बढ़ते कमरे के हिसाब से कुर्ते और सलवार में दाब छोड़ दो. यहाँ तो पुरुष भी धोती ही पहनना पसंद करते थे. पर भला हो अंग्रेजों का जो पतलून इस देश में इंट्रोड्यूस कर गए. जींस ने तो रही-सही कसर भी पूरी कर दी. बढ़ने की कोई गुंजाईश नहीं छोड़ी. ये मै कहाँ आ गया. आज तो मूड वज़नदार बात करने का था पर मै वापस अपने स्टैण्डर्ड पर आ गया.


समृद्धि का सीधा असर हमारे रहन-सहन पर पड़ता है, उसका असर खान-पान पर और उसका असर वज़न पर. तो भैया समृद्धि इज डायरेकटली प्रपोशानल टु वज़न. जितने लोग दुर्भिक्ष में भूंख से नहीं मरे उतने आज खा-खा के मर रहे हैं. वज़न अपने साथ कई महान बीमारियाँ भी लाता है. पर भाई लोगों का मानना है बीमारी भी हो तो पैसे वाली. जिसके इलाज में जितना खर्च वो उतना अमीर. कुछ लोगों के तो शरीर से कोलेस्ट्राल टपकता दिखाई पड़ता है. पर भाई का कौनफिड़ेंस इतना तगड़ा है की रोटी सुखी तो गले से उतरती ही नहीं. अपने मोबाइल में शहर के हार्ट स्पेशलिस्ट का नंबर फीड कर रक्खा है. उनसे बात भी कर रक्खी है. ५०-६० हज़ार में बाइपास और डेढ़-दो लाख में मेडिकेटेड स्टंट पड़ जाता है. कानपुर में रीजेंसी में फाइव स्टार सुविधा है तो दिल्ली में अपोलो और एस्कोर्ट है ही. वज़न ज्यादा है तो लोड तो घुटनों पर ही पड़ेगा. घुटना प्रत्यरोपण के लिए तो हर ओर्थोपेडिक सर्जन का हाथ खुजला ही रहा है. 


डॉक्टर खुद तो अपने स्वास्थ्य का ख्याल खान-पान से करते हैं पर रोगियों को सिर्फ  दवा पर निर्भर रहने की सलाह देते हैं. बहुत ही गया बिता डॉक्टर होगा जो अपने शरीर का ख्याल न रखता हो. पर वो कभी मरीज़ को प्राणायाम या योग की सलाह नहीं देगा. खुद तो जिम जा कर अपना पसीना बहा लेगा पर क्या मजाल की मोटे लाला को वर्जिश की सलाह दे. बोलता है लाला तू खाए जा, मै हूँ ना.


बहुत पहले अमिताभ की एक फिल्म आई थी जिसमें उन्होंने सुबह उठ कर कसरत करने की सलाह बहुत ही बढ़िया ढंग से दी थी. उसका आशय कुछ इस प्रकार था कि जिसने उगता सूरज नहीं देखा वो लेटे-लेटे ही तकिया पर सर रक्खे-रक्खे ही उगता सूरज देखेगा. उस समय ये बात मेरे पल्ले नहीं पड़ी थी. अब जब मेरे पास तोंद जैसी चीज़ का अविर्भाव हो चुका है मै उस गीतकार को उगते सूरज की कल्पना के लिए कोई भी रत्न देने को तैयार हूँ. ये बात अलग है की हम भारतवासी अक्सर डाक्टरी सलाह के बाद ही सूर्योदय देखने का प्रयास करते हैं.    


यहाँ ये बताना भी ज़रूरी है भारत विषमताओं का देश है. जहाँ लोग खा-खा के मर रहे हैं वहां भूख से मरने वाली खबरें भी आती रहतीं हैं. ये बात दीगर है कि सरकारें उनकी लीपा-पोती में लग जातीं हैं. जहाँ थुलथुल शरीर में मोटे नज़र आते हैं वहां कुपोषण से त्रस्त बच्चे भी भयावह भविष्य का संकेत देते हैं. मुझे लगता है जहाँ फ़ूड फॉर आल आज़ादी के साठ दशक बाद भी सपना है, वहां अति-आहार को राष्ट्रीय अपराध की श्रेणीं में डाल देना चाहिए. अमीर आदमी दिन में दाल तो खाता ही है और रात में चिकेन तोड़ने से भी बाज नहीं आता. गरीब का तो प्रोटीन दाल से ही आता है और भाई का सरप्लस प्रोटीन को ना पचा पाने के कारण यूरिक एसिड बढ़ जाता है. इसलिए देश की खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से हर व्यक्ति के बॉडी-मास  इंडेक्स के अनुसार डायट चार्ट बनना चाहिए. उसी हिसाब से खुराक तय होनी चाहिए. जैसे कोई भी आदमी ज्यादा अमीर दूसरों का हक मार के ही बन सकता है वैसे ही मोटापा दूसरे के हिस्से का खाना खाने से बढ़ता है. मेरे शरीर का जो दो इंच फैट बढ़ा है, वो निश्चय ही किसी और के काम आ जाता अगर मैंने पहले ही उसे बाँट दिया होता. अब सुबह-शाम जोग्गिंग करके भी उसे गलाना मुश्किल हो रहा है. मेरे एक मित्र जापान में कुछ वर्ष बिता के लौटे हैं. बता रहे थे की वहां हर आदमी का हेल्थ इन्सुरेंस है. उसका प्रीमियम बॉडी-मास इंडेक्स के अनुसार घट या बढ़ सकता है. हमारे देश के नियंता वैसे तो ब्लॉग पढ़ते नहीं पर उम्मीद है कुछ सरकारी आला अफसरों की निगाह इस प्लानिंग पर पड़ जाये. इस आशय से मै इसे चेप रहा हूँ. विचार मेरे और क्रेडिट उनका. 


कल सुबह हो सकता है मुझे शर्मा जी के कोप का भाजन बनना पड़े. पर समृद्ध और स्वस्थ भारत के लिए मै ये मोर्चा भी झेल लूँगा. शर्मा जी को नाराज़ भी नहीं कर सकता, उन्हीं जैसे सुधी पाठकों के लिए ही तो मै उदगार व्यक्त करता हूँ. शर्मा जी अब कम से कम ये नहीं कह सकते बात में वज़न नहीं है.                    


- वाणभट्ट 


बाद में : इस लेख का आशय स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करना है ना कि मोटापे से ग्रस्त किसी का मजाक उड़ना. आशा है पाठक इसे इसी सन्दर्भ में पढेंगे. 

23 टिप्‍पणियां:

  1. थक गए पढ़ पढ़ कर...........२ टुकड़ों में ही डाल देते तो वाकई पढ़ लेते....
    :-)
    शुरुवात रोचक................
    फिर जब लिखे कि ब्लॉग महिला का बताओ...सुन्दर फोटो लगाओ....तब गुस्सा चढ़ गयी......................खैर इसमें कसूर आपका नहीं....

    सेहत के फंडे बढ़िया.

    सादर.

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  2. वर्मा जी ब्लॉग को पोपुलर करना भी हुनर है. आप वाणभट्ट के छद्म नाम से लिख रहे हो. अरे वाणी भट्ट के नाम से लिखो. जब नाम छद्म है तो क्या स्त्रीलिंग क्या पुल्लिंग. इन्टरनेट से किसी मॉडल की खुबसूरत फोटो ले कर चेप दो. देखो फोल्लोवर लिस्ट कैसे बढ़ती है." :)

    वैसे शर्मा जी के कहने पर फिर जो आपने उडेला है वह दमदार है !

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  3. बात कहाँ से शुरू हुई और कहाँ वजनदार बात पर खत्म .... रोचक प्रस्तुति

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  4. "वर्मा जी ब्लॉग को पोपुलर करना भी हुनर है. आप वाणभट्ट के छद्म नाम से लिख रहे हो. अरे वाणी भट्ट के नाम से लिखो.

    हा हा हा हा हा ...हास्य की चासनी में लपेट कर आप ढेर सारी बातें कह गए हैं...उत्कृष्ट लेखन का जीता जागता नमूना है ये लेख...आप अपने लिए लिखें, और लिखे पर खुश हों ...पाठक अपने आप आयेंगे...

    नीरज

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  5. हा हा! अच्छा किया जो नोट लगा दिया कि किसी मोटापा ग्रसित का मजाक नहीं उड़ाया है...वैसे बात बात में सलाह तो अच्छी ही दी है....

    और ये भी कि काजू है तो दिखना चाहिए. वैसे ही समृद्धि हो तो छलकनी चाहिए. ...मस्त लेखन है भाई...वाह!!

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  6. रोचक प्रस्तुति.... सब समेट लिए आपने तो....

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  7. पहले हाफ़ में तो हंस हंस के दुहरा तिहरा जो हुआ सो दूसरे हाफ़ में समृद्ध भारत की टोली में मैं भी शामिल हो गया।

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  8. वाकई वजनदार पोस्ट है. हाँ, ब्लॉग को भी वजनदार बनाने के लिए शर्मा जी की सलाह भी मान ही ली जानी चाहिए... :- )

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  9. सार्थक और सामयिक प्रविष्टि, आभार.

    कृपया मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" की नयी पोस्ट पर भी पधारें.

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  10. विविध विषयों को जोड़ ले लिखी पोस्ट बहुत रोचक लगी ...
    जो भी कहो लेख में तो वजन आ गया ... और देश के कर्णधारों में तो वैसे भी वजन की कमी नहीं है .... मज़ा आ गया ...

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  11. आशा है यह वजनी आलेख लोगों के वजन घटाने में भी मदद करेगा.. बहुत अच्छा लगा यह लम्बा लेख :)

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  12. behtreen alekh, jabardast prastuti............bahut accha lga aapka ye lekh ....sadar

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  13. नहले पर दहला, अपनी सच्चाई बताकर अच्छा किया।

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  14. व्यंग्यात्मक शैली में रोचक आलेख |सुप्रभातम सर |

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यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...