रविवार, 24 अप्रैल 2011

मीटिंग इज अ प्लेस वेयर मिनट्स आर केप्ट आवर्स आर लौस्ट 

जब मै मीटिंग में घुसा तो कुछ देर हो चुकी थी. लंगूर की शक्ल का वर्मा बॉस गुस्से में भरा बैठा था. गुस्से में वो चिम्पंजी सा लग रहा था. मुझे उसका चेहरा देख कर हंसी आ रही थी. पर वो डैम सिरियस था. लग रहा था कम्पनी का सारा दारोमदार उस एक बेचारे पर है. मै भी मनहूस सी शक्ल बना कर कोने वाली सीट पर बैठ गया. कहीं मुस्कराता देख कर पारा और न चढ़ जाये इसलिए ये मुलम्मा चढ़ाना जरूरी था. 

बॉस बोल रहा था, बोल क्या रहा था चीख रहा था कि अगर सब लोग इसी ढर्रे पर चलते रहे तो हो गया कम्पनी का बेडा पार. कम्पनी को ऊपर उठाने के लिए उसने जी जान लगा रक्खी है पर नीचे वाले हैं कि पूरे मौज मस्ती में लगे रहते हैं. कोई काम समय पर नहीं, कोई टार्गेट नहीं, जब देखो बहानेबाजी, अरे भाई मै जब तुम्हारी उम्र का था तो दिन-रात एक कर देता था. तभी कम्पनी ने मेरे काम को देख कर धडाधड प्रोमोशन दिया. मै सीनियर मैनेजर कि कुर्सी तक ऐसे ही नहीं पहुँच गया.  

मैंने फुसफुसा के अपने पडोसी से पूछा यार अजेंडा क्या है. उसने भी फुसफुसा के जवाब दिया अबे अगर कोई काम की बात निकल आये तो उसे ही अजेंडा समझ लेना. मुझे तो नींद आ रही है. रात बीवी क्लास ले रही थी अब ये. वैसे भी जब इसकी प्रोसिडिंग निकलेगी तो उसे पढ़ लेना. अभी तो ये पास्ट टेंस मोड़ में चल रहा है. पूरी कहानी दोहराने में एक-आध घंटे तो निकल ही जायेंगे. जगा देना.


शर्मा जी ने भी देर से एंट्री मारी. कर्मठ आदमी थे बॉस को लगता था की ऊपर मैनेजमेंट की नज़र में ये ना आ जायें इस लिए अपनी कृपा नहीं वक्र दृष्टि हमेशा बनाये रखता था. शर्मा जी को देखते ही उसकी आँखों में एक चमक सी आ गयी. मौका भी था और दस्तूर भी.

"क्या शर्मा इज थिस द टाइम टु रीच. आप जैसा सेनियर अगर लेट आएगा तो नये इम्प्लायिज़ पर हम क्या इम्प्रेशन डालेंगे". 

"सर जो आपने अर्जेंट रिपोर्ट मांगी थी वही तैयार कर रहा था. इसी में थोड़ी देर हो गयी". शर्मा जी ने जवाब दिया.

" एक तो देर से आते हो और बहाने बनाते हो. अपनी गलती मान लेने से कोई छोटा तो नहीं हो जाता." बॉस बात का बतंगड़ बना रहा था. "हम लोग भी इतने सालों से कम्पनी के साथ काम कर रहे हैं. पर क्या मजाल की अपने बॉस को कभी रिप्लाई दिया हो. तुम बहस कर रहे हो. डोन'ट यू नो हाउ टु टाक तो योर सेनियर्स."

शर्मा जी एक निहायत ही शरीफ और सज्जन इंसान थे. कंपनी के प्रति वफादार और अपने सेनियर्स को रोज़ कंपनी को चूना लगाते देखा करते थे. इसलिए उन्हें कंपनी के प्रति अपनी वफादारी पर कुछ गुमान भी था. लगता था जिस दिन इनका कच्चा-चिटठा बड़े मैनेजर के सामने रक्खूँगा इस वर्मा की तो ऐसी-तैसी हो जाएगी. पर सोचते थे कि नौकरी है तो किसी न किसी की चाकरी भी करनी पड़ेगी. इसलिए चुप रह जाते. 


पर उस दिन वो इस उम्मीद में थे कि शायद बॉस उन्हें रिपोर्ट टाइम पर ख़तम करने कि शाबाशी दे. इसलिए भड़क गए. " सर मै सारा-सारा दिन कंपनी के काम में खटता रहता हूं. कल आप ही ने कहा था कि रिपोर्ट आज मेरी टेबल पर होनी चाहिए. फिर मीटिंग जरूरी है या रिपोर्ट. मीटिंग में जो भी होता है प्रोसेडिंग में तो आ ही जाता है. मेरे आने या न आने से क्या फर्क पड़ जाता."


वर्मा खुश हो गया. तीर सीधे निशाने पर लगा है. "शर्मा ये तुम्हारे घर कि खेती नहीं है कि जब जी में आया मुंह उठाये चले आये. हर चीज़ का तौर-तरीका होता है. मीटिंग है तो टाइम पर आना ही पड़ेगा. रात में रिपोर्ट निपटा लेते, किसी ने रोका तो नहीं था. हम भी कभी जूनियर हुआ करते थे पर कभी बॉस को शिकायत का मौका नहीं दिया. और तुम हो कि जुबां लड़ाते हो. आई विल राइट तो माय बॉस अबाउट योर मिसबिहेव." शर्मा जी को सन्न करने के लिए इतनी डोज़ काफी थी. मीटिंग अपनी दिशा भटक चुकी थी.


शर्मा जी नौकरी का महत्व समझते थे. और ये भी समझ रहे थे कि वर्मा को आज मौका मिल गया, जिसका उसे बरसों से इंतज़ार था. प्राइवेट नौकरी थी सरकारी होती तो साले को दो कंटाप मार देते फिर लिखा-पढ़ी चलती रहती. बड़ी मुश्किल से ये जॉब मिला था. आज शाम को जेब ढीली करनी होगी. बार एंड रेस्टोरेंट में वर्मा के साथ बैठने कि बात सोच कर भी उसको उबकाई सी आने लगी. पर मरता क्या न करता, मीटिंग के बाद शाम का प्रोग्राम बना लिया. 


अगले दिन प्रोसेडिंग शर्मा जी को भी मिली. अजेंडा तो कहीं कुछ नहीं था. बस उनके डिस्कशन का ही जिक्र था. लिखा था शर्मा ने सबके सामने वर्मा को बुरा-भला कहा. क्यों न इसके विरुद्ध अनुशाश्नात्मक कार्यवाही कि जाए. शर्मा को लगा शाम कि बियर मूत में बह गयी. वर्मा साला बहुत ही हरामी निकला. बीवी का गुस्सा, बच्चों की फीस और माँ-पिता का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम गया.


मूड अपसेट हुआ पर उसके पास भी हर जोड़ का तोड़ था. अब वो बॉस के बॉस के पास जायेगा. वर्मा का कच्चा-चिटठा लेकर. और बताएगा कि वर्मा किस तरह से कंपनी को चूना लगा रहा है. साला वर्मा कल तक मेरे पास माफ़ी मांगने ना आया तो मेरा भी नाम नहीं. तभी किसी ने शर्मा को बताया कि तुम तो शाम को बियर पिला के निकल लिए. बाद में ठाकुर के घर पर बैठक थी दारु की. खाने के साथ. मै भी था. ठाकुर ने वर्मा को चढ़ाया कि मौका अच्छा है, मत चूको चौहान. ये ठाकुर वही था जिसे शर्मा के रिकमेंडेशन पर कम्पनी ने रक्खा था. खैर ये सब तो लगा रहता है. प्राइवेट में नंबर बनाने कि जुगत में तो सभी लगे रहते हैं.                


उसी शाम, दिन ढलने के बाद शर्मा पीटर स्कोच की पूरी बोतल ले कर बड़के बॉस के घर पहुँच गया. तो देखा वर्मा और ठाकुर तो पहले से मौजूद हैं. गप्पें चल रहीं हैं. शर्मा को देखते ही सब मुस्कराए. बड़का बॉस बोला "यार शर्मा तुम बहुत ही समझदार आदमी हो. मेरी मन-पसंद ब्रांड की बोतल लेके आये हो. जाओ जा के केऍफ़सी से मुर्गे की टांग भी ले आओ. ठाकुर तुम भी साथ चले जाओ. जल्दी आना."


बॉस और बॉस के बॉस के साथ जाम टकराते हुए शर्मा-वर्मा-ठाकुर के सारे गिले-शिकवे मिट चुके थे. चियर्स कहते हुए शर्मा के सर से बड़ा बोझ हट चुका था.


- वाणभट्ट    
       

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

आंसू

इतने बुरे भी नहीं आंसू
कि
उन्हें निकाल बाहर फ़ेंक दें.
अन्दर रहे
तो दर्द देंगे.
पर
बाहर आ गए
तो देंगे
दर्द 
ज़माने भर का. 

- वाणभट्ट 


मैगी बच्चे

ज़र्द हो गए पत्तों से,
इक हवा के इंतज़ार में.
जीवन से लटके,
ये वृद्ध नहीं बच्चे.
असमय ही वृद्ध और बीमार हो गए.
मौसम से पहले ही,
पतझड़ का शिकार हो गए.

- वाणभट्ट 



धरती 

मै बताता हूँ.

धरती ने इक आग का गोला
निगल लिया था 
और 
वो जलती रही
भीतर ही भीतर. 
ताकि 
तुम पर आंच ना आये. 
पर उसकी छाती को 
इतना न कोंचो 
कि
वो उगलने पर 
मजबूर हो जाये.

- वाणभट्ट 

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

सिस्टम के अन्दर : अन्ना हजारे

मिश्र जी ने बड़े बुझे मन से स्टाफ रूम के अन्दर कदम रखा ही था, कि एक फुसफुसाती आवाज ने उनका स्वागत किया "आ गए अन्ना हजारे". आवाज इतनी तेज थी कि उन्हें सुनाई दे जाये. और इतनी धीरे भी थी कि उन्हें लगे उनसे किसी ने कुछ नहीं कहा. कुछ लोगों के फीं-फीं कर के हँसने की आवाज भी उनके कानों तक पहुँच ही गई. ये अन्ना हजारे अनशन पर क्या बैठे. इमानदारों को चिढाने के लिए एक नया पर्यायवाची मिल गया. मिश्र जी का दम ऐसे माहौल से घबराने लगा था. मन हुआ इस रोज रोज की चिक-चिक से तो अच्छा था कि इस सरकारी नौकरी को लात मार के वाकई अन्ना के साथ हो लिया जाये. ये सिस्टम तो सुधरने से रहा, कहीं खुद को ही ब्रेन हम्रेज न हो जाये और पूरी जिंदगी बिस्तर पर घुट-घुट के काटनी पड़ जाए.

मिश्र जी ने जब नौकरी शुरू की, तो माता-पिता के अनुमान से इससे अच्छी नौकरी हो ही नहीं सकती थी. शिक्षा और शोध का पुनीत काम था. बेटे के टेम्परामेंट के अनुसार. इस नौकरी में किसी की न तो चाकरी बजानी थी न ही कोई ऊपरी कमाई थी. बस अपने काम से काम और तनख्वाह इतनी बुरी भी नहीं थी की कहीं हाथ फैलाना पड़े. बेटा इमानदारी पर प्रवचन देता था, सो उसके लिए इससे अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता था. मिश्र जी ने भी यही सोच कर इस नौकरी के लिए नेट/जेआरऍफ़ क्वालीफाई किया. जब उसके बाकी साथी नीली बत्ती के चक्कर में दिन-रात एक कर रहे थे, मिश्र जी ने अध्धयन-अध्ध्यापन-शोध  को अपना व्यवसाय बनाने का निश्चय किया.

सोचा एक-आध बच्चे भी अपनी तरह इमानदार और देश भक्त बन गए तो जीवन सफल हो जायेगा. बच्चों को आजकाल जो शिक्षा स्कूलों में नहीं मिलती, वो मिश्र जी की क्लास में बिना मांगे मिल जाती. केमिस्ट्री के साथ-साथ आदर्श, उसूल और देश भक्ति की घुट्टी फ्री मिला करती थी. बच्चे भी अभी तक पूरी तरह बड़े नहीं हुए थे सो मिश्र जी के विचारों से उद्वेलित हो जाते. मिश्र जी कहते बताओ भारत से अंग्रेजों को भगाने में इतने साल क्यों लग गए. पता नहीं कितने वर्षों से विदेशी लुटेरे भारत को ही लूटने में क्यों लगे रहे. आज भी चारों तरफ भूरे अंग्रेजों का बोलबाला है. अब ये देश को लूट रहे हैं और पूरा देश इस तमाशे को देख रहा है. कारण सिर्फ एक है, देश में देशभक्ति की कमी. भ्रष्टाचार एक महामारी की तरह फ़ैल गया है. हर कोई इससे परेशान है पर जब अपना मौका आता है इसे रोकने और इससे लड़ने का तो लोग शोर्टकट ही अपनाते हैं. बहरहाल कुछ भी हो मिश्र जी ने अपने देशप्रेम और इमानदार छवि के कारण एक अलग इमेज बना रखी थी. अधिकतर लोग उनको सनकी या झक्की समझते और उनके खैरख्वाह उन्हें बेवक़ूफ़. पर बच्चों में वो काफी लोकप्रिय थे.  

बच्चे भी देखते थे कि मिश्र जी वाकई गाँधीवादी कि तरह रहते थे. सादा जीवन. कर्त्तव्य के प्रति समर्पण. जब बाकि टीचर पान-मसाला खा-खा कर कॉलेज कि दीवारों को लाल करने में लगे रहते. मौका मिलते ही बच्चों को कुंजी या गाइड रेकमेंड कर देते. पढ़ाना न पड़े इसलिए बच्चों को बताते कि बड़े-बड़े एक्जाम के लिए सिर्फ एक अदद डिग्री कि आवश्यकता है. इसलिए विद्यार्थी को डिग्री से ज्यादा कम्पटीशन कि तैयारी में ध्यान देना चाहिए. जब वो सारा दिन कालेज में क्लास करने में समय व्यर्थ करेगा तब तैयारी कब करेगा. जब वो पास कराने की तो गारेंटी ले ही रहे हैं तो बच्चों को भी क्या कुत्ते ने काटा है कि उनसे क्लास लेने कि बात करें. जब पढ़ाने कि जरुरत नहीं तो उनके पास समय ही समय था. जिसे कुछ पोलिटिक्स करने में  बिताते कुछ कुछ कोचिंग के माध्यम से पैसा कमाने में. कुछ प्रिंसिपल के चारों ओर गणेश परिक्रमा में समय जाया करना पसंद करते. मिश्र जी से बदमाश बच्चे भी दुखी थे. एक तो अटेंडेंस कम होने पर एक्जाम में बैठने न देते और ऊपर से पास होने के लिए पढाई भी करनी पड़ती.

प्रिंसिपल भी उनकी खरी-खरी बातों से आजिज था. सो उनसे दूर ही रहना पसंद करता था. कुछ लग्गू-भग्गू भी थे जो प्रिंसिपल और मिश्र जी कि इस दूरी का फायदा उठा कर प्रिंसिपल का कान भरा करते थे. प्रिंसिपल भी दूध के धुले तो थे नहीं, इसलिए जो भी पैसा कालेज के उत्थान के लिए, शोध के लिए, लिब्रेरी के लिए, कंप्यूटर के लिए, फ़र्निचर के लिए, केमिकल के लिए, उपकरणों के लिए, बच्चों के लिए, आता उस पर अपनी कृपा-दृष्टि बनाये रखते. लग्गू-भग्गू भी उनके साथ शेर और सियार के भाव से जुटे रहते. शेर कि जूठन से ही कितनों के पेट भर जाते. शेर भी दलेर मेंहदी कि तर्ज पर एलान करता कि साडे नाल रहोगे तो ऐश करोगे...

मिश्र जी अपनी दुनिया में मगन थे और दुनिया अपने में. हर केमिकल के लिए प्रिंसिपल कि चिरौरी, ऑफिस में बाबुओं के चक्कर काटना मिश्र जी के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाता था. बच्चों को प्रेक्टिकल तो करने ही थे. कुछ एम्एससी और पीएचडी के भी छात्र थे. सो मिश्र जी ने धीरे-धीरे अपनी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा शोध कार्यों को समर्पित करना शुरू कर दिया. वैसे भी संतोषी आदमी के लिए पैसा कि आवश्यकता उतनी ही है जितनी उसकी आवश्यकतायें. मिश्र जी भी सादा जीवन जीने में भरोसा रखते थे. और लोगों को ये घर फूँक तमाशा लगता. शोध के लिय अपना पैसा बर्बाद करना कहाँ कि समझदारी है. शोध पत्र छापने के लिए पेपर का प्रोपर चैनल से जाना अनिवार्य है. प्रिंसिपल जो खुद भी केमिस्ट्री के क्षेत्र से था, अपना नाम घुसेडने के लिय मिश्र जी पर जोर आजमाने की कोशिश की पर मिश्र जी ने एक न सुनी. और कभी उसका नाम अपने पत्रों में शामिल नहीं किया. जंगल के शेर को ये नागवार लगता पर हाथी की सवारी करने की हिम्मत भी न पड़ती. बस वो घात का इंतज़ार करता रहता. 

उसी समय एक नेटवर्क प्रोजेक्ट सेंकशन हो गया, पूरे एक करोड़ का. मिश्र जी उसके मुख्य इन्वेस्टिगेटर बने. प्रिंसिपल ने लखनऊ तक पूरा जोर लगा लिया कि एक करोड़ रुपया किसी सनकी के हाथ में देना उचित नहीं है. क्या कमाएगा और क्या लौटाएगा. पर ये पैसा दिल्ली से आया था, और दिल्ली भी किसी अंतर्राष्ट्रीय फंड से आया था, जिसने खुद मिश्र जी को मनोनीत किया था, इसलिए ये पैसा तो मिश्र जी कि ही कलम से खर्च होना था. मिश्र जी कि कार्य करने कि अपनी ही शैली थी. फर्म वाले आते तो पूछते सर कितना कमीशन चलेगा. मिश्र जी कहते कितना कमीशन दोगे. सर १० परसेंट का दस्तूर है. तो मिश्र जी कहते, १० परसेंट में मेरे बच्चों के लिए  कम्प्यूटर गिफ्ट कर दो, या एक्स्ट्रा केमिकल्स ही दे दो. क्लास के लिए कुछ फर्नीचर बनवा दो. प्रिंसिपल और ऑफिस असहाय सा इस पैसे को लुटते हुए देख रहा था. उनके हिस्से इसकी एक पाई भी नहीं आ पा रही थी. 

वो मौके की तलाश में थे और औडिट ने उनको ये मौका भी दे दिया. परचेज प्रोसीजर में निगोशिएशन की गुंजाईश नहीं होती. मिश्र जी ने हर चीज में ये गलत काम किया है. मिश्र जी जानते थे की अगर उन्होंने निगोशिएट न किया होता तो यही पैसा प्रिसिपल और ऑफिस की जेब में जाता. औडिट भी ये मान कर चलता है कि पैसा खर्च हुआ है तो कमीशन कहीं न कहीं तो गया ही होगा. कम से कम हिन्दुस्तान में तो ऐसा ही हो रहा है. लिहाजा हर परचेज पर मिश्र जी को एक मेमो मिला और उसकी रिप्लाई से औडिट को न संतुष्ट होना था न वो संतुष्ट हुए. लखनऊ से भी जवाब तलब हो गया सो अलग से. हसीन मौका देख प्रिंसिपल ने सस्पेंशन का लेटर भी थमा दिया. मिश्र जी पर पूरा जांच आयोग बैठा दिया गया. उसमें सारे लग्गुओं और भग्गुओं को शामिल कर लिया गया. मिश्र जी सही लोगों से जांच के लिए लखनऊ - दिल्ली लिख रहे हैं. ऊपर सब अपने-अपने कामों में मसरूफ हैं. किसी के ये गुमान भी नहीं है कि कोई ऐसा आदमी भी इस देश में हो सकता है जो अपने से पहले देश कि सोचता हो. और आज के युग में भी गाँधी की नक़ल करने की गलत कोशिश करता हो. 

मिश्र जी की लिखा-पढ़ी ज़ारी है. नक्कारखाने में तूती की आवाज़ सुनाई नहीं देती. मिश्र जी ने विश्व बैंक को भी अपनी सफाई भेजी है जो प्रोपर चैनल से जानी है. मिश्र जी का विश्वास रोज डोल जाता है. पर गाँधी की फोटो जिसकी वो रोज पूजा करते हैं उन्हीं एक संबल देती है, कि जब वो अकेले फिरंगियों से लड़ सकता है तो ये तो अपनी चमड़ी के हैं. अंग्रेजों के अपने नियम और क़ानून थे इसलिए शायद उनसे लड़ना आसान था. वो गाँधी को मरवा भी सकते थे. पर सत्याग्रह कोई गुनाह तो नहीं, इसलिए बेचारे मजबूर हो जाते. भूरे अंग्रेजों का न कोई नियम है न क़ानून, न ईमान है न धरम. ये तो सप्लायर से कह कर किसी को भी ठिकाने लगा दें. जिन्दा रहेगा तो सबको परेशान करेगा. इस पर मिश्र जी ने लगता है गौर नहीं किया. वर्ना उन्हें लगता वो एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं. 

मेरे हिसाब से अब उनके पास दो ही विकल्प हैं - १. सिस्टम में रह कर हारी लड़ाई को जारी रक्खें (जिसमें उनका टर्मिनेशन पक्का दिख रहा है) या २. सिस्टम को लात मार कर अन्ना के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में जुड़ जायें. पर ये तय तो मिश्र जी को ही करना है. 

- वाणभट्ट                

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

ईमानदार का भूत

* ये कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है.

ऐसा तो होना ही था उसका हश्र. भरे चौराहे पर ठिचआँ...ठिचआँ... की आवाज़ हुई. एक चलते-फिरते आदमी को लाश में तब्दील होते भला देर लगती है क्या? हमेशा की तरह किसी ने कुछ भी नहीं देखा-सुना. कुछ देर बाद कौतूहल जागा. सोये शहर को मसाला मिला था कुछ देर के लिए ही सही. "बेचारा यंग ही तो था", "बदमाशों का दुस्साहस तो देखो", "देखने में तो शरीफ लगता था", "शहर तो शरीफों के रहने लायक ही नहीं रहा", "आजकल लोगों के लफड़ों का भी तो पता नहीं रहता", "भाई ऐसा काम ही क्यों करो की ये नौबत आये", आदि - आदि. कोई किसी का मुंह तो बंद कर नहीं सकता, लिहाज़ा जितने मुंह उतनी बातें. कल यही घटना अख़बार में भी छप सकती है. जाहिर है जब तक अगला मसाला ना तैयार कर ले ये शहर, इस खबर का फैलना ज़रूरी है. नहीं तो लोगों को बातों का टोटा पड़ सकता है. बड़े-बड़े शहरों में ऐसा  होता ही रहता है.

पुलिस को आना था, सो पुलिस आई भी. लाश कहीं खुद-बखुद चल ना दे इस आशय से कुछ लोग उसे घेरे खड़े थे. जिन्हें जल्दी थी वो अपनी साइकिल, स्कूटर, या कार पर चढ़े-चढ़े  पूरा विवरण पाने को लालायित थे. पर अब तक खाकी वर्दी में क़ानून आ चुका था. " सालों कभी मर्डर नहीं देखा, खामखाह मजमा लगा रखा है. जाओ अपना-अपना काम करो". जिन लोगों में जिज्ञासु प्रवृत्ति की जरा भी कमी थी, उन्हें यकायक जरूरी काम याद आ गए. कुछ लोग पुलिस की मदद करने को तत्पर थे, सो उन्हें तुरंत नहीं हांका जा सकता था. आखिर प्रजातंत्र भी कोई चीज़ है. पुलिसियों से ज्यादा अच्छी तरह ये बात भला कौन समझ सकता है. रोज़ ऐरे-गैरे नेताओं को झेलते रहते हैं. घंटे भर में सब सरक लेंगे फिर इत्मीनान से काम किया जायेगा. दरोगा सजीवन पांडे ने सोचा. ये तो अच्छा हुआ की दो ठुल्लों को लेते आये, वर्ना भीड़ को भागने में ही लगा रहना पड़ता. दरोगा जी तो अपनी विलक्छ्न चतुर बुद्धि पर बड़ा अभिमान था. और हो भी क्यों नहीं. उसके कई मेधावी साथी दुनियादारी में उससे कहीं पीछे थे. वो जिस काम में हाथ लगाता, लक्ष्मी जी से रहा ना जाता. पीछे-पीछे चलीं आतीं. तभी तो पैंतीस साल की कम उम्र में उसके पास वो सब कुछ था जिसे पाने में बहुतों की उम्र बीत जाती है.

दरोगा जी मोटर-साइकिल को कुर्सी बना कर उस पर विराजमान हो गए. लाश की शिनाख्त का काम जोरों पर था. एक ठुल्ला घडी और कपड़ों से उस मरे आदमी की हैसियत तौल रहा था. तो दूसरे को उसका पर्स वज़नदार लग रहा था. पर्स में पैसे कम थे और फ़ालतू के कागज़ ज्यादा. उनमें बन्दे का आई-कार्ड भी पड़ा था. कार्ड देखते ही ठुल्ला 'युरेका' अंदाज़ मैं चिल्लाया " जी जनाब! मिल गया" एक पल तो तो दरोगा को लगा कि कातिल का कोई पुख्ता सुबूत हाथ लग गया. कार्ड देखते ही उसके होंठों पर मुस्कान फैल गयी. लक्ष्मी के आने कि आहट उसे स्पष्ट सुनाई दे रही थी.

आई - कार्ड क्या था, पूरा बायोडाटा था. मरने वाले का नाम मानस हंस था. दरोगा मन ही मन हँस रहा था, कि जात छिपाने को आजकल लोग क्या-क्या सरनेम लगा लेते हैं. पर जात भी कहीं छिपती है? लोग सब पता कर लेते हैं और अपनी बिरादरी को तो सूंघ कर पहचान लेते हैं. नहीं तो भला हिंदुस्तान में शादियाँ कैसे होतीं? साला विकास प्राधिकरण में इंजिनीयर था. जरूर कमीशन के चक्कर में ठेकेदार को रगड़ रहा होगा. तभी ये गति हुई है. पता नहीं लोग कितना लालच करते हैं. संतोषम परम सुखं. अपने राम तो न आते को रोकें न जाते को टोकें. इंजिनीयर की लाश है तो कुछ दे कर ही जाएगी. वर्ना लावारिस में निपटा देते. अब तहकीकात तो करनी पड़ेगी.

सरकार मोबाइल ड्यूटी तो देती है पर मोबाइल नहीं. अपने मोबाइल से ही प्राधिकरण फ़ोन करना पड़ेगा. अपनी ज़मीन के चक्कर में प्राधिकरण के एस इ साहब का नंबर फीड है. चलो उन्हीं को फ़ोन लगता हूं. 

"एस इ साहब...!"
"हाँ, बोल रहा हूँ."
" मै सजीवन पांडे, दरोगा. आप से मिला था. साहब हमारे प्लोट्वा का क्या हुआ? कोने वाले प्लाट के लिए आपसे विनती की थी."

एस इ साहब के पास ऐसे फ़ोन आये दिन आते रहते थे. कोने का तो क्या, कोई भी प्लाट वो बिना फायदे के अपने बाप को न दिलाएं. ऐसा नहीं कि उन्हें अपने बाप से प्यार नहीं था, पर सिस्टम में और लोगों का हक मारा जाता. और ये उनके उसूल के खिलाफ था. इस लिए सिस्टम को पारदर्शी बनाते हुए अपने कार्यकाल में नीति बनाई ना बाप बड़ा न भैया. और इस नीति पर अब तक अक्षरश: पालन भी किया. कोने कि ज़मीन पर बीस प्रतिशत एक्स्ट्रा. दरोगा अपने आप को ज्यादा होशियार समझ रहा है. 

प्रत्यक्ष रूप में बोले " सजीवन जी मै अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगा. पर आजकल आप तो जानते ही हैं पूरी प्रक्रिया कंप्यूटर द्वारा की जाती है इसलिए दिक्कत है. आप तो अपने ही आदमी हैं, कोई न कोई प्लाट अवश्य दिलवाऊंगा". एस इ साहब ने मजे हुए नेता सा जवाब दिया. ऐसे ही थोड़ी न इस पद पर पहुंचे थे. बड़ों-बड़ों को चरा कर ये मुकाम हासिल किया है. फिर ये मामूली दरोगा क्या चीज़ है?

मगर सजीवन पांडे ने भी इतने साल कच्ची गोलियां तो खेली नहीं थी. ऐसे थोड़ी नहीं चरा सकते एस ई  साहब. ट्रमप पांडे के पास था ही. पांडे ने संयत आवाज़ में कहना शुरू किया "साहब आपके यहाँ कोई मानस हंस नाम का  इनजिनीयर है क्या?"

अब चौंकने की बारी एस इ साहब की थी. कहीं मानस ने विभागीय भ्रष्टाचार की एफ आई आर तो नहीं लिखा दी. हर ठेकेदार से काम की गुणवत्ता को लेकर चक-चक. जब से आया है ठेकेदार कतराने लगे हैं. कहते हैं या तो क्वालिटी ले लो या कमीशन. साला बड़ा ईमानदार बनता है. हेडक्वाटर को भी यही नमूना मिला था.

" हाँ हाँ है तो. बड़ा ही अनसोशल और इम्प्रक्टिकल आदमी है. कोई ख़ास बात?"

"साहब उसे किसी ने चौराहे पर निपटा दिया. ज्यादा खाऊ था क्या? लगता है ठेकेदारों ने काम लगा दिया."

ये वाकई बड़ी खबर थी. एस ई साहब सिहर से गए. मर्डर तक बात पहुँच जाएगी ऐसा उन्हें आभास न था. कोई हार्डकोर क्रिमिनल तो वो थे नहीं. सिर्फ वाईट कॉलर क्राइम उनकी स्पेसिअलिटी थी. पर अब जो हो गया सो हो गया. मामले को निपटाना होगा. माया में बड़ी ताक़त है, ऐसा उनका अगाध विश्वास था. वो रिहर्सल करने लगे, मानस की शोक सभा का. बड़े ही कर्मठ और ईमानदार अधिकारी थे मानस जी. कर्तव्यपरायणता तो कोई उनसे सीखे. प्राधिकरण के लाभ के लिए उन्होंने बड़े-बड़े बिल्डरों से लेकर राजनेताओं तक को नहीं छोड़ा. वो एक महान कर्मयोगी थे. पर अफ़सोस इस भ्रष्ट सिस्टम में वो फिट न हो सके और बाध्य होकर उन्हें आत्महत्या जैसा गलत निर्णय लेना पड़ गया. भ्रष्टाचार से लड़ना आत्महत्या करना ही तो है, इस देश में. अगर इस हत्या को आत्महत्या सिद्ध कर दिया जाए तो कोई बवाल नहीं होगा. ये सोच कर वो मुस्कराए. ये दरोगा साला किस दिन काम आएगा. वो और सोचते पर दरोगा को जल्दी थी. आखिर मोबाइल तो उसी ने किया था, खामखाह बिल बढ रहा है.

दरोगा ने पूछा "क्या साहब कोई ख़ास बात है?"

" नहीं ऐसा कुछ नहीं पर क्या तुम इसे आत्महत्या दिखा सकते हो. तुम्हारे काम का मै खुद ख्याल रखूंगा. साले के न आगे कोई है न पीछे. हमीं लोगों को फूंकना-तापना पड़ेगा. हत्या दिखाओगे तो खामखाह हमहीं लोगों को परेशान करोगे. फिर कोई सीआईडी की डिमांड करेगा कोई सीबीआई की."

" साहब वो कोने वाला प्लाट".

"क्या सजीवन, की ना छोटी बात. तुम हमारा ख्याल रहो मै तुम्हारा. रिपोर्ट में  सुसाइड ही आना चाहिए".

दरोगा के नथुनों में लक्ष्मी की गंध बढ़ती जा रही थी. " साहब मेरा तो ठीक है पर आजकल बलेस्टिक और पोस्टमार्टम वाले बहुत हावी हो गए हैं. जरा सी कलम हिलाने का अनाप-शनाप मांग लेते है."

" देखो पण्डे, दाम जो तुम चाहो पर काम होना चाहिए.". एस ई साहब चांदी के जूते की अहमियत से भली-भांति वाकिफ थे. ऐसे ही जूते खा-खा के वो इस ऊँचे ओहदे पर पहुंचे थे. इंजिनियर हो कर जब वो बिक सकते हैं तो इस दरोगा की क्या बिसात.

"पंद्रह लाख"

" ठीक है. दफ़न करो इस लफड़े को". सौदा पक्का हो गया था. बेफजूल बातों की अब गुंजाईश नहीं थी. एस ई साहब ने खुद ही फ़ोन काट दिया.

एस ई राम विलास वर्मा ने अपने पचीस साल की प्राधिकरण की नौकरी में मानस हंस सा इमानदार और काबिल आदमी दूसरा नहीं देखा था. लगता था अभी भी कोलेज में पढ़ रहा है. हर समय ऊँची-ऊँची आदर्शवादी बातें. मच्योरिटी नाम की तो चीज़ ही नहीं थी. जरा भी मच्योर होता तो क्या अपना अच्छा-बुरा न समझता. गाँधी का चेला बनता था, साला. न किसी को अपनी जात बताता था न किसी की पूछता था. कहता था  मेरा धर्म भारतीय है. इस देश को अच्छे लोगों की जरूरत तो है. पर इतना अच्छा नहीं चलता. पूरा का पूरा सिस्टम ही चौपट कर के रख दिया था. क्या हम विकास नहीं चाहते, सरकार ने इतना ऊँचा पद ऐसे ही तो नहीं दे दिया. जब से नौकरी शुरू की तभी से ऊपर वालों को खुश रखने के लिए क्या-क्या पापड़ नहीं बेले. कभी बॉस के सामने सर नहीं उठाया. वफादारी से काम करने का ही ये परिणाम है जो आज एस ई के पद पर बैठा हूँ. खुद सिस्टम फ़ॉलो करो और नए लड़कों को सिस्टम सिखाओ. यही तो अपनी सफलता का मंत्र रहा है. ज्यादातर लड़के समझदार होते हैं. दो-चार साल में फिट हो जाते हैं. पर मानस तो जैसे न सुधरने की कसम खा के आया था. साम-दाम-दंड किसी से भी काबू में नहीं आ पाया. शायद उसकी मिटटी को यही बदा था. हर कोई अपनी किस्मत लिखा के आता है, वर्ना प्राधिकरण की नौकरी में तो बाबू से लेकर अफसर तक सबकी मौज है. एस ई साहब की मोटी चमड़ी अभी भी खुद को जस्टिफाई करने में लगी थी.

हम सब तो सिस्टम के मोहरे हैं. उपरवाला प्यादा चलता है. प्यादे की क्या औकात की अपनी मर्जी से चले. ऊपर वाले ने मेरे लिए ये ही रोल रखा है तो मै क्या कर सकता हूँ. ठेकेदार से लेकर मंत्री तक पूरी श्रृंखला है. सबका ख्याल रखना पड़ता है. दो-चार मानस हो जायें तो विकास का जो थोडा बहुत काम हो रहा है सब ठप्प हो जाये. अब तो सभी ने इस भ्रष्ट तंत्र को स्वीकार कर लिया है. पर ठाकुर ठेकेदार भी साला पूरी उलटी खोपड़ी है. रात पार्टी के नशे में जो मजाक कर रहा था उसे कर डाला. अब झेलो भैया राम विलास. ये तो अच्छा हुआ की दरोगा की गुट्टी मेरे पास फँसी है नहीं तो मामला सुलटाने में पता नहीं कितना लग जाता है. ये पंद्रह लाख भी ठाकुर भरेगा. मेरी तो सिर्फ डील है.      


भीड़ छंट चुकी थी. सवेरे वाले चेहरे बदल चुके थे. पुलिस हरकत में आ चुकी थी. एक ठुल्ले ने बचे-खुचे तमाशबीनों को हांक दिया. दूसरे ने आनन्-फानन मैं देसी कट्टे का जुगाड़ कर दिया. सजीवन पांडे की ट्रेनिंग जारी थी. लाश के हाथ मैं कट्टा पकड़ा कर हर एंगल से फोटो उतारी जाने लगी. बलेस्टिक रिपोर्ट फ़ोन पर दी गयी पैसों की गारेंटी के हिसाब से लिखी जा चुकी थी. पोस्टमार्टम हॉउस का डॉक्टर सेट किया जा चुका था. ये मोबाईल भी कमाल की चीज़ आई है अपने देश में. साहब से लेकर चपरासी सब को सेट कर लो, वो भी डायरेक्ट. हर किसी का नंबर फीड कर लो क्या पता कब कौन काम आ जाये. पंचनामा करके लाश जितनी जल्दी से सील हो जाये उतना अच्छा. लक्ष्मी को रूठने में भला कितनी देर लगती है. अब दरोगा को सब जल्द ही निपटाना होगा. डॉक्टर की तैयारी पूरी है. चूक की कोई गुंजाईश नहीं है.

रिपोर्ट तो डॉक्टर को ही लिखनी थी. सहायकों को चीर-फाड़ के लिए बोलने से पहले डॉक्टर के मन में लाश देखने की इच्छा जोर पकड़ने लगी. उससे रहा नहीं गया. मृतक के चेहरे पर एकदम शांति थी. किसी डर या दर्द का निशान तक न था. शायद उसे समझाने का मौका ही नहीं मिला कि उसके साथ क्या होने जा रहा है. मारने वाला भी अपने फन का माहिर जान पड़ता था. मृतक कि अध्-खुली आँखें डॉक्टर को घूरती सी लगीं. डॉक्टर ने अपने हाथों से उसकी पलकें गिरा दीं. और सहायकों को पोस्ट मार्टम का आदेश देकर वो अपने कक्ष में आ गया. 

रिपोर्ट तैयार हो चुकी थी. दरोगा उसकी अंग्रेजी समझने कि कोशिश कर रहा था. पढ़ते-पढ़ते उसका रंग बदलने लगा. चेहरा तमतमा उठा. "अबे डॉक्टर तेरे को दो लाख कम पड़ रहे हैं. पैसे आत्महत्या दिखने के दे रहा हूँ, हत्या के नहीं.

डॉक्टर कि आँखें दरोगा को अन्दर तक बेध रहीं थी. डॉक्टर ने दृढ शब्दों में कहा "सॉरी, आई कांट हेल्प". मानस का भूत उस पर पूरी तरह हावी था और अभी भी वो शरीर के अंजाम से पूरी तरह बेख़ौफ़ था.

- वाणभट्ट   
  



  
   
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