सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

घोड़े और गदहे

होने और लगने में है अंतर इतना
घोड़े और गदहे में है अंतर जितना
घोड़ा, घोड़ा होता है, जबकि गधा घोडा लगता है

भगवन सारे गुण एक को छांट के देते नहीं
ईमानदारी का चर्चा कार आड़ में घूस लेते नहीं
वो बनाते नहीं किसी को सर्व-गुण-संपन्न
किसी को देते हैं गुण और
किसी और को कर देते हैं संपन्न
गुण हमको दे दिया बांचने के लिए
संपन्न उनको कर दिया गुण का प्रसाद चाटने के लिए
चाटते-चाटते उन्होंने चर डाला
पूरा का पूरा देश
फिर भी खाली है उनका पेट
स्विस बैंकों में उनके हैं खाते
लिस्ट जाहिर हो गयी
पर सत्ता वाले नहीं हैं शरमाते
कहते हैं उन्हें भी मालूम है सब नाम
पर वो नहीं चाहते किसी को करना बदनाम
उन्हें कुछ और समय चाहिए
किसी और गुमनाम बैंक का पता चाहिए
ताकि पैसा जल्दी से जल्दी वहां ट्रान्सफर हो जाये
और जांच में किसी पर कोई आंच न आये
आखिर ये भी तो अपने बिरादर हैं
विदेशों में संजोये देश कि धरोहर हैं
जब देशी लोग तो देश बेच रहे थे
तब इनके जेहन में ये ख्याल आये
देश का पैसा आड़े वक्त में देश के काम आये
इसीलिए इन भाइयों ने ये काम किया
देश का पैसा विदेशी बैंकों में अपने नाम किया

इस देश का भी अजब दस्तूर है
पैसेवाला धन के नशे में चूर है
कोई नहीं पूछता पैसा कहाँ से आया
कोई नहीं पूछता पैसा कहाँ गया
जो पैसा देश के निर्माण में था लगना
वो कुछ घरों में ही रह गया
डर था कि कहीं किसी को भनक न लग जाए
और पता नहीं कब देश छोड़ना पड़ जाये
घोड़े के रूप में गधे बहुत स्मार्ट थे
पूरे देश को उल्लू बन माल ले उड़े

भला हो बाबा रामदेव का
उनके जन जागरण का
कि सरकार अब बात करने लगी है
पैसे लौटने कि उम्मीद बंधने लगी है
पर क्या पैसा लौट पायेगा
और देश के विकास में लगेगा
या फिर बचे खुचे दबे कुचले लोगों के उत्थान का कारण बनेगा
कितनों कि तमन्नाएं मचलने लगी हैं
देश के विकास के लिए भुजाएं फड़कने लगीं हैं
पैसा गर लौटा तो तो हमारे भी दरिदर दूर होंगे
गधों कि बिसात छोड़ हम भी घोड़ों में रहेंगे
भले ही ज़रुरत से ज्यादा पैसा गद्दों या दीवारों में रहेगा
पर देश का पैसा कम से कम देश में तो रहेगा

अबे गधों अब तो घोड़े बन जाओ
सुनहरा मौका है मत गवाओं
देश के नेता, पूंजीपति और अफसरों से कुछ सीखो
वो तो लूट रहे हैं तुम भी कुछ लूटो
वो दिन दूर नहीं जब स्विस बैंक में तुम्हारा भी अकाउंट होगा
और तहलका की साईट पर तुम्हारा भी नाम होगा

आप मुस्कराए लगता है कविता समझ में आ गई
अलबत्ता तो ये कविता लगती नहीं
क्योंकि जो होती है वो लगती नहीं.

- वाणभट्ट