रविवार, 13 नवंबर 2011

पावर हॉउस


(ये कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और इसका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है.)


शहर जहाँ से लगभग खत्म होता है, वहीँ एक छोटा सा ढाबा है. कौतुहल से दूर, शांत और गंवई हवा में पूरी तरह डूबा हुआ. ढाबा छोटा ज़रूर है, पर है बहुत ही एस्थीटीकली डिज़ाइंण्ड. आगे फूलों की क्यारियां हैं, जिसमें मौसम के हिसाब से पौधे बदल जाते हैं. पीछे लॉग-हट टाइप के पांच-छः झोंपड़े बेतरतीब से सजे खड़े हैं. खाने की टेबलें इन्हीं झोंपडेनुमा शेड्स में रक्खीं हैं. एकदम पीछे कंक्रीट की छत के नीचे चमा-चम चमकते भगोने दिन में हाइवे पर चलने वालों का ध्यान खींचने के लिए काफी हैं. रात का नज़ारा चाइनीज़ लाइटों की जगमगाहट में और भी मनोहारी हो जाता है. हल्के-हल्के बजती मेंहदी हसन की गज़लें या आबिदा परवीन के सूफियाना गीत माहौल को और खुशगवार बनाने में बची-खुची कसर पूरी कर देते. यह ढाबा इतन अलूफ और सुकून वाला है कि शहरी लोगों का एक पसंदीदा डेस्टिनेशन बन गया है. शाम होते-होते गाँव की ठंडी बयार और इस ढाबे का स्वादिष्ट खाना उथल-पुथल भरी शहरी जिंदगियों को बरबस खींच लाता. शनिवार और रविवार को तो अक्सर बुकिंग तक की नौबत आ जाती. कोई भी आने वाला ढाबे के मालिक के मधुर स्वभाव और उम्दा पसंद को एप्रिशिएट किये बिना नहीं रह पता.


उस रात जब मै डिनर के इरादे से पहुंचा तो माहौल हमेशा की तरह खुशगवार था. चूँकि मै अकेला था, मेरे लिए खुले लॉन में इंतजाम कर दिया गया. यहाँ रोशनी कुछ कम थी पर लॉग-हट में लगीं बाकी मेजें सहज विजिबल थीं, जिससे अकेलेपन के एहसास में कुछ कमी ज़रूर होती थी. खाने का आर्डर देने के बाद मैं सुकून से वातावरण में तैरती मेंहदी हसन की आवाज़ से मुतास्सिर हुआ - उनसे अलग मै रह नहीं सकता इस बेदर्द ज़माने में, मेरी ये मज़बूरी मुझको याद दिलाने आ जाते हैं....कोई जल्दी नहीं थी. जल्दी होती तो शहर से इतनी दूर आता ही क्यों. 


तभी एक तल्ख़ आवाज़ मेंहदी हसन की आवाज़ पर तारी हो गयी. एक टेबुल पर बैठा फ्रेंचकट दाढ़ी वाला शख्स अपना आपा खो बैठा. उसने दाल का पूरा कटोरा वेटर के ऊपर दे मारा था. "ये दाल है तुम्हारी. एकदम जला डाली. दाल बनाना भी नहीं आता तो चिकन क्या ख़ाक बनाओगे. पूरा मूड चौपट कर के रख दिया. अबे अब खड़ा क्या है. जा जाके अपने मालिक को भेज". बंदा बहुत गरम हो रहा था. मालिक शोर सुन कर उस मेज़ की ओर पहले ही बढ़ चुका था. बैरा बडबडाने लगा था कि कहाँ-कहाँ से रईसजादे चले आते हैं. इतने बड़े लाट साहब हो तो जाओ किसी फाइव स्टार होटल में. शहर में होटलों की कौन सी कमी है. इतना सुन कर तो वो रईसजादा हत्थे से उखड गया. और पूरी मेज़ ही पलट दी. 


मालिक बैरे को चुप रहने की हिदायत और खिसक लेने का इशारा करते हुए बीच-बचाव की मुद्रा में आ गया. "क्या हो गया साहब. ये तो हमारे यहाँ की स्पेशल दाल मक्खनी है. आप नाहक बैरे से उलझ पड़े. ये तो कम पढ़े-लिखे लोग हैं. आपको मुझसे कम्प्लेंट करनी चाहिए थी". अपने सुरुचिपूर्ण टेस्ट की तरह ही मालिक मधुर और मीठा था. ढाबे की गुडविल का सवाल था, सो मालिक उसे खुश करने में लग गया. " साहब आप लोग दूसरी टेबल पर बैठ जाइये. कभी-कभी गड़बड़ी हो जाती है. मै आपको अपने यहाँ की सबसे लज़ीज़ डिश शाही मुर्गमुसल्लम खिलवाता हूं. पसंद आये तभी पेमेंट कीजियेगा. मै अश्योर करता हूँ आप बार-बार यहाँ आना चाहेंगे". ढाबा मालिक इतना शरीफ होगा मैंने कभी सोचा न था. उसने सभी को दूसरी मेज़ पर बैठा कर उनका आर्डर भी खुद ही बुक कर दिया. पूरा ग्रुप संतुष्ट होकर नई टेबल पर बैठ गया.


अब फ्रेंचकट दाढ़ी वाला शख्स ठीक मेरे सामने था. मैं उसे गौर से देखा तो शक्ल कुछ जानी पहचानी सी लगी. ये तो लालाबत्ती का लड़का लग रहा है. वही जो हमारे पुराने मोहल्ले में साथ-साथ पला बढ़ा था. आजकल कहीं विदेश में सेटेल है. लालाबत्ती का ध्यान आते ही मेरे सामने सारा सीन फ्लैश-बैक की तरह घूमने लग गया. लालबत्ती हमारे पुराने मोहल्ले में रहते थे. सारे मोहल्ले में वो इसी नाम से फेमस थे. इतना फेमस की शायद ही कोई उनका असली नाम जानता हो. इस नाम की भी एक अंतर्कथा है.


लालाबत्ती बिजली विभाग में काम करते थे. और जैसा की हर विभाग में  होता है, उसकी सुविधाएं फ्री में लेना कर्मचारियों का जन्मसिद्ध अधिकार होता है. लालाबत्ती बिजली के प्रति ऐसा ही सहज भाव रखते थे. लिहाज़ा बिजली के मीटर और वैध कनेक्शन की उन्हें कभी आवश्यकता महसूस ही नहीं हुई. बल्कि ये उनकी एकमात्र शान की तौहीन से कम न था. कटिया मार कर बिजली हरण के लिए उन्होंने हमारे मोहल्ले में अग्रज और पथप्रदर्शक होने का गौरव भी प्राप्त किया. उनकी देखा-देखी और लोगों ने भी कटिया व्यवस्था को सुदृढ़ करने में यथासंभव-यथाशक्ति योगदान दिया. हमारे मोहल्ले का नाम बिजली के नैसर्गिक उपयोग में लिम्का या गिनिस रिकॉर्ड में तो नहीं पर बिलजी विभाग की लिस्ट में शीर्ष स्थान पर आ गया. कर्टसी लालाबत्ती. लोग उनकी आड़ में जितना मज़ा तब संभव था, (उन दिनों लोगों को ए.सी., फ्रिज, हीटर, टी.वी. का ज्ञान न था) पूरा लूट रहे थे.


सामने जो हो रहा होता है उस पर किसी और का नियंत्रण होता होगा, वर्ना हमारा मोहल्ला, जो उन दिनों खुशहाल मोहल्लों में शुमार था, पर यूँ गाज न गिरती. आकाश में सितारे और ग्रह अपनी-अपनी चाल चलते रहते हैं, और यहाँ आदमी की ऐसी की तैसी हो जाती है. एक बार बिजली विभाग में कोई कड़क अफसर आ गया. जिसे वाकई रेवेन्यु की चिंता हुई. उसने सभी नामी-गिरामी मोहल्लों की फेहरिस्त दरकार की. यहाँ ये याद दिलाना ज़रूरी नहीं है कि हमारे मोहल्ले को शीर्ष स्थान पर देखना शहर के बाकी मोहल्लों को फूटी आँख न सुहाता था. सितारों ने साजिश रची और हमारे मोहल्ले पर रेड का नंबर सबसे पहले आना बदा था, सो सबसे पहले नंबर लगा भी. विभाग के सोये हुए अधिकारियों ने गज़ब की फुर्ती दिखाते हुए छापा मारा, आनन्-फानन में कटियाँ नोच डालीं और कनेक्शन रेग्युलराइज़ करने का अल्टीमेटम दे डाला.


मोहल्ले में कोई हार्डकोर क्रिमिनल तो था नहीं. सभी नौकरी-पेशा करने वाले डरपोक किस्म के लोग थे. सभी ने कनेक्शन रेग्युलराइज़ करा लिया. पर लालाबत्ती ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया. बिजली विभाग में रहते  हुए अगर बिजली मोल ली तो लानत है. विभाग के लोगों ने समझाया कि अफसर अक्खड़ है बाद में देख लिया जायेगा. पर लाला थे कि अपने बर्थ-राइट पर अड़े पड़े थे. उनकी भी कटिया नोच ली गयी. अफसर ने जवाब-तलब किया सो अलग से. क्या लाला की फाइल और क्या लाला की सी.आर. सब रंग गयी. केस बिगड़ चुका था. पर लाला कहते कि विभाग वाले न सिर्फ कटिया लौटायेंगे बल्कि माफ़ी भी मांगेंगे. न ऐसा होना था न हुआ. अब सारा मोहल्ला रोशन था पर लाला के घर पर अँधेरा छाया रहता. लाला की लड़ाई जारी थी.


पर ज़ालिम ज़माने को चैन कहाँ? और वो पडोसी भी क्या जो दूसरे के फटे में अपना आनंद न खोज लें. लोग पूछते लाला जी बत्ती कब आएगी. लाला जी यथासंभव निर्विकार भाव से बताने लगते कि लगे हुए हैं, ऊपर तक हिला रक्खा है, अफसर की भी भेद-भाव की कम्प्लेंट कर दी है, सबके कच्चे चिट्ठे हैं मेरे पास आदि-आदि. न लोगों ने पूछना छोड़ा न लाला ने बत्ती लगवाने का प्रयास किया. शनैः-शनैः लोगों को इसमें मज़ा आने लगा और लाला को गुस्सा. अब कोई बत्ती का ज़िक्र करता तो लाला भड़क जाते. किसी ने थोडा ज्यादा इंटेरेस्ट लिया तो तय था कि वार्तालाप का समापन लाला की गालियों से होगा. लोगों को लाला में और मज़ा आने लगा. 


बड़ों को तो चुटकी लेने में मज़ा आता ही था, अब तक बच्चे भी लाला की इस चिढ से वाकिफ हो चुके थे. खेलने-खालने के बाद सब बच्चे लाला के घर के सामने बने चबूतरे पर इकठ्ठा हो जाते और एक सुर में चिल्लाते - लाला बत्ती आई. और लाला जी अन्दर से लाठी-डंडा लिए गाली देते बाहर आ जाते. लडके कुछ और तड़का लगाते तो लाला उन्हें डंडा लेकर दौड़ा लेते. बच्चे तितर-बितर हो कर भाग लेते. थोड़ी देर बाद फिर एकत्र हो कर अपनी हरकतों को दोहराते. ये हर शाम का सिलसिला बन गया था. एक लड़का चिल्लाता - "लाला जी", बाकी बच्चे समवेत स्वर में चिल्लाते - "बत्ती आई". एक लड़का चिल्लाता - "लाला जी की", बाकी चिल्लाते - "बत्ती गुल". एक लड़का चिल्लाता - "लाला जी की", बाकी चिल्लाते - "बत्ती ठप्प". इस तरह उनके कई नाम पड़े - लालाबत्ती आई, लालाबत्ती गुल, लालाबत्ती ठप्प. मोहल्ले के बड़े बुज़ुर्ग लालाबत्ती से ही काम चला लेते. 


जब तक हम उस मोहल्ले में रहे, लाला की बत्ती न आनी थी न आ सकी. बच्चे भी बड़े हो रहे थे. सो पढाई और काम-धंधे की फ़िक्र में लग गए. पर लाला का घर बिजली नहीं देख सका. पर हाँ, अब वो चिढाने-चिढाने वाली बात न रही थी. लाला ने शायद हालात से समझौता कर लिया था. पर उनकी जिद खत्म होने का नाम न लेती थी. ये जिद की पराकाष्ठा ही थी, जिसने खुद न देखा हो उसके लिए सहज विश्वास करना कठिन है. पर अगर लाला ऐसे न होते तो भला उस आम कद-काठी के मिडिल क्लास इंसान तो कौन याद रखता. बहरहाल लोगों से सुना कि लाला अपने जीते-जी बिजली बहाल न करा पाए. उनकी इस सनक ने उन्हें बीवी-बच्चों से भी दूर कर दिया. उम्मीद की रोशनी शायद पहले ही उनसे दूर हो चुकी थी इसलिए उन्हें बिजली की दरकार ही न रही हो, ऐसा भी हो सकता है. 


ये साहब उन्हीं के साहबजादे थे. मेरा खाना आ चुका था. जो हमेशा की तरह गरम और सुस्वाद था. पर लालाबत्ती के बेटे की मेज़ पर अभी भी कोहराम की अवस्था बनी हुई थी. ढाबा मालिक अभी भी अपने ग्राहक को खुश कर पाने की उम्मीद पाले हुए था. आफ्टरऑल एक एन.आर.आई. का मामला था. पर मुझे अतीत दिखाई दे रहा था. यहाँ भी फ्री खाने का जुगाड़. पतंग जब आसमान में होती है तो भूल जाती है कि वापस उसे ज़मीं पर ही आना है. और वो पतंग ही क्या जो ऊंचाई पर जा के बहके नहीं. जी में आया कि बीच-बचाव करूँ, पर डर था कि ढाबा मालिक पर अपना इम्प्रेशन ख़राब न हो जाए. मन ही मन मै पुराने दृश्यों को याद कर मुस्करा रहा था. और सोच रहा था कि किसी ने शायद ऐसे ही लोगों के लिए मुहावरा गढ़ा है कि 'बाप मरे अंधियारे में और बिटवा का नाँव पावर-हॉउस'.                      


- वाणभट्ट             

सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

मनोज जी के लिए...सादर...

कुछ न कर पायेगी इस इम्प्रेशन में है
मेरी लेखनी इन दिनों डिप्रेशन में है

एक सर पर बोझ कितना बढ़ गया 
समझती नहीं, खोपड़ी कम्प्रेशन में है

मंहगाई और भ्रष्टाचार हैं सुरसा का मुख
आम आदमी किस कदर टेंशन में है

कहती है रूमानियत लिखवा लो मुझसे
ज़िन्दगी जीने का मज़ा बस इमोशन में है 

दुनिया के दुःख भूल मज़ा चाहते हैं सब
लेखनी भी अपनी इस कैलकुलेशन में है

धड़कता था दिल कभी प्यार के नाम पर
आवाज़ भी नहीं करता, अब वाइब्रेशन में है

कलम-दावत पूज कर, मनाया इसको
देख ये हसीना, अब कितने टशन में है

- वाणभट्ट 

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

कलम जवाब देती है...

क्या-क्या लिखवाना चाहते हो तुम
मुझसे


देश और दुनिया की तुमको है 
क्या पड़ी 
अपनी-अपनी देखो, और देखो
कितनी सुखद है ज़िन्दगी

कितना घिसते हो मुझको
सिवाय मुझे बदलने के
और मिलता है 
क्या तुमको

कुछ भी तो नहीं बदला
कितना लिखा तुमने
न्याय और अन्याय पर
दरकते विश्वासों और 
समाजी सियासत पर
और हर बार थक के बैठ गए
कि अब नहीं उठाऊंगा लेखनी
फिर भी मेरा साथ नहीं छोड़ पाए
अपने ज़ज्बात नहीं छोड़ पाए

अब भी 
मुझे छाती से लगाये घूमते हो
ज़माने के गम दिल में समाये घूमते हो
दिल की धड़कन और 
बी.पी. बढ़ाये घूमते हो 

कभी मेरा भी ख्याल करो
मेरे भी कुछ ख्वाब हैं
कुछ कल्पनाएँ हो आसमानी 
लिखूं मै भी कुछ रूमानी

पर हर बार 
तुम हो कि उतर आते हो
यथार्थ के धरातल पे 
बिना मेरी परवाह किये 
डूब जाते हो दुनिया कि हलचल में 

माना
तुम्हारे दिल का गुबार है
मुझे क्या, मेरी मर्ज़ी के बिना 
मेरे साथ ये तो बलात्कार है
है ना...

- वाणभट्ट 

सोमवार, 15 अगस्त 2011

कुत्ते भौंक रहे हैं...

जब बौखलाते हैं, तो कुत्ते भौंकते हैं
फेंको बोटी-रोटी, तो दुम हिला कर डोलते हैं 

चौंसठ सालों से पकी-पकाई खाते खाते
ईमान और ज़मीर इनके खोखले हैं

अन्ना को देख इनको सब कानून याद आ गए
आज़ादी कैसे मिली कितनी जल्दी भूलते हैं

हक़ के लिए ही तो हुआ सविनय अवज्ञा
आज डर के इसी से गाँधी के बन्दे भागते हैं 

एक वो है जो गाँधी को अपने दिल बसाये घूमता है
सत्ता के पुजारी गाँधी को बस संसद में ही पूजते हैं

काली कारों से उतरते हैं अब मंत्रियों के काफिले 
काली करतूतें हैं, बस कपडे बदन पर ऊजले हैं

कानून की आड़ में विरोधों को दमन कर दो 
देशभक्तों को कलम करने के ये अंग्रेजी तरीके हैं 

नमक कानून को तोडा या किसी ने बम फोड़ा
तब आज़ादी की लड़ाई थी, अब दुश्मनों के चोचले हैं

देश की तरक्की की तसवीरें खींचते प्राचीर से 
भ्रष्टाचार से लड़ने के हथियार इनके भोथरे हैं


जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता की सरकार है 
सोलह अगस्त को देखना, हम आज़ाद कीतने हैं 


- वाणभट्ट 

शनिवार, 6 अगस्त 2011

ढाई आखर...

कविता लिखनी है 
एक शब्द पर 
जो
है ढाई अक्षर का 
जिसे अमूमन होना चाहिए किसी 
लड़की से 
जो हो ख़ूबसूरत बेइन्तहा

भले ही सपनों में

वैसे मुझे प्रेम विरासत में मिला है
माँ से माँ का
और बाप से बाप का
कुछ दादी और बाबा का भी
बहनों और भाइयों का भी 

बचपन में इसे
माँ के आँचल में महसूस किया
फटकारों के पीछे
बाप की 
मुस्कराती आखें 
याद है मुझे अभी भी

दादी के हाथों
खाए हर कौर में
जो खाना खाते-खाते 
सारे रिश्ते गिना जाते 
बाबा की छड़ी
डरते थे जिससे 
पर पड़ी नहीं कभी

बहनों से झगडा
फिर मान-मुनव्वल
जरा-जरा सी बातों पर 
भाइयों से दंगल
दूरी ने बताई 
इन रिश्तों की कीमत

फिर ज़िन्दगी में
एक नया प्रवेश
जिसने बिना जाने
प्रेम की परिभाषा गढ़ डाली
बिन मांगे कितना कुछ दे डाला
इस प्रेम के प्रति 
सबकुछ समर्पित

मेरे लिए है 
ये ही प्रेम 
बस

लड़कियाँ जो अमूमन खूबसूरत होतीं हैं
या लडके उन्हें ख़ूबसूरत बना देते हैं
या वे खुद को खूबसूरत ही समझतीं हैं
एक इंसान सी लगीं
त्वचा के नीचे
दिल के भीतर
और दिमाग के अन्दर
जो है
हमेशा उसे खोजता रहा

अमूमन पुरुष के लिए 
नारी एक देह से ज्यादा कुछ नहीं
उन्हें भी एतराज़ है
लोग उन्हें सिर्फ देह समझते हैं
पर जब मैंने परतों के नीचे जा के देखा
वो खुद को भी देह से ज्यादा समझ  नहीं पातीं
नहीं तो इतनी सजावट
इतनी सज-धज
इतनी फरमाइशें  
इतनी उम्मीदें, क्यों 
एक देह के बदले ही तो 

तभी समझा 
ब्यूटी इज जस्ट स्किन डीप

इसीलिए
मेरे लिए प्रेम वो है
जिसे मांगना न पड़े
जिसे आपके अच्छे या बुरे होने से
ख़ूबसूरत या बदसूरत होने से
कोई फर्क न हो
या यूँ कहें
आप जैसे हैं, जिस हाल में हैं
वहां मिल जाए

वो खुद बिखरा हो
आपके आस-पास 
और ज़िन्दगी उसे
संजोते-संजोते
बीते 
आप जितना बाँटें 
उतना ही बढ़ जाए वो

प्रेम कुछ ऐसा ही होना चाहिए
हैं ना

- वाणभट्ट 




















रविवार, 31 जुलाई 2011

जिंदा हूँ अभी...


कुछ हवाएं सांसें बन
भूख को
जिन्दा रखती हैं

ये भूख ही  है
जो रुकने नहीं देती
चलाये रखती है

सारा सारा दिन
कभी रातों को भी
जगाये रखती है

हर शख्स की भूख अलग है

अंतर है
भूख के लिए जीने और
जीने भर की भूख
में

कुछ सदियों की भूख
पल में मिटाना चाहते हैं
कुछ अपनी भूख बाँट कर खुश हैं

जरुरी है अपने हिस्से की भूख
और जरुरी है उसका हर दिन पूरा होना
यही तो एहसास दिलाती है
जिन्दा होने का.

- वाणभट्ट

शनिवार, 23 जुलाई 2011

इक गुज़ारिश है,
छोटी सी.

जब इन शब्दों को पढना,
इन्हें,
गुलज़ार की आवाज़ में सुनने की कोशिश करना.

चमकते वर्क के नीचे से,
कई मायने निकल आयेंगे.
कई आयामों में,
शब्दों की गहराइयाँ,
महसूस करोगे.

ये करिश्मा है शब्दों का
या
आवाज़ का जादू,
कि
गरमागरम
अल्फाज़  दिल से निकलते हैं,
धड़कन की तरह,
और बर्फ कि तरह जम जाते हैं
अन्दर, सीने के भीतर.

गर तुम कर सको तो ऐसा ज़रूर करना.
वर्ना,
हज़ारों ख्वाहिशों में,
एक ख्वाहिश,
ये भी सही.

- वाणभट्ट


गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कवि की बेबसी 

शब्द जब कागज़ पर आकार लेते हैं
सच कहता हूँ
सृजन का गहन दर्द देते हैं



ऐ कवि तू अभिशप्त है
अपना स्वर्ग छोड़ कर
दूसरों का नर्क भोगने को

और वो जीवन जीने को
जो तेरा अपना नहीं 


देश-काल की चिंता में 
हर कोई घुलता नहीं
गरीबों का देश है
मसीहा मिलता नहीं 

कलम कुछ कर सकेगी
ये वहम मत पाल
बहरे कानों को ऊंची आवाज़ की आदत है
सब खुश हैं तू कुछ मुस्करा
गाते हैं सब तू गुनगुना

अफसाने बुनना छोड़
अपने स्वर्ग से नाता जोड़
और देख
दुनिया जगमगाती है
बेबसी सिर्फ़ तेरी ही नहीं इनकी भी है

खुश रहना इनकी बेबसी है
क्योंकि 
और भी गम हैं ज़माने में

अब जब तू शब्दों को आकार दे
उसमें बेबसी नहीं
अपना प्यार दे

वाणभट्ट 

शनिवार, 25 जून 2011

एक प्रश्न

गर्द और गुबार में

दबे बसे शहर,


चंद खुली हवा को

दिन-रात तरसते हैं.

सांस-दर-सांस,


हर सांस पर किसी मिल, किसी फैक्ट्री,


किसी ट्रक, कार या टेम्पो का नाम.



गिनती की सांसें,


या


साँसों की गिनतियाँ.




एक, दो, तीन ...


और किसी भी पल


बदल जाएगी ये हवा.


तब

हमें शायद हो


समंदर में प्यास


का


एहसास.



बदल तो गया है रंग


आसमान का भी.


रंग गया है वो धुंधलके से


किसी शाम गौर से देखो डूबते सूरज को,


जो दिन से ही डूबा-डूबा सा रहता है.


महसूस करो उसके गिर्द फैली धुंध को.


महसूस करो उसकी कसमसाहट


उसकी घुटन को.



खेती-बाड़ी वाले हैं हम.


धुंआ छोड़ने वाली मिलें हमारी नहीं.


हमारी मिलों से निकलता है अनाज.


पर्यावरण बनता है बिगड़ता नहीं.



जब हर एक के हिस्से में है


बराबर की हवा


और


बराबर का आसमान.


तो क्यों छोड़ दे


चंद लोगों की अनाधिकार चेष्टा से


कोई अपना हिस्सा.

मानवीय असमानताओं का,

यहाँ भी है किस्सा.





आप ही बताएं आप कैसी तरक्की चाहते हैं


दवाइयों पर रेंगती जिंदगी


या


लहलहाती फसलों सी ख़ुशी.


दफ़न करना चाहते हैं


चिमनियों का सीना,


या


नाक पर फिल्टर


लगा के जीना?



- वाणभट्ट

शनिवार, 18 जून 2011

मेरा भारत महान

हम होंगे कामयाब?
कब होंगे कामयाब???

पुरखे हमारे थे महान,
देश की हमारे थे शान,
हम उनकी संतान,
बिना हर्र-फिटकरी के,
बन गए महान.

कर्म भला हम क्या करते,
सब उन लोगों ने कर डाला मरते-मरते,
हम भी महान बन जाते,
गर अंग्रेज अब भारत आते,
महाभारत आज होती,
रावण आज होते,
तो क्या हममें से कुछ गाँधी, कृष्ण या राम न होते.

पर सच तो ये है,
अंग्रेज अभी भी बसे हैं जेहन में,
महभारत मचा है जगहों-जगहों पे,
सीतायें कैसे निपटें रावणों से.

परिस्थितियां वहीँ हैं 
अंतर सिर्फ इतना है
गाँधी ने लंगोट आँखों पे कस लिया है 
कृष्ण का चक्र हांथों से छूट गया है
और राम का नाता हनुमान से टूट गया है.

कहने का मतलब है सिर्फ इतना 
महान बनने का स्कोप अब भी है उतना
तो मेरे भाई 
वाई डोंट यू ट्राय!
(माइंड ईट  यू ट्राय) !!!

- वाणभट्ट 

रविवार, 12 जून 2011

बुरा किया!

बुरा किया उसने
जो अंतरात्मा की आवाज़ को अनसुना कर
ज़मीर बेच दिया.

इस तरह बोझ से मुक्त हो
वो
उठता गया ऊपर और ऊपर.

इतना ऊपर की उसे आदमी चींटी लगते
कभी-कभी उनका पैरों के नीचे आ जाना
उसे उनकी नियति लगता

कभी-कभार उनकी बाँबियों पर
कुछ आटा बिखेर वो कुछ पुण्य भी कमा लेता
और अपनी नज़र में कुछ और ऊपर उठ जाता

दो जून की रोटी के लिए
दिन-रात लड़ना 
और
अपने हक के लिए
हर रोज़ मरना
उसे न था गवारा

ज़मीर न बेचता तो क्या करता

क्या बुरा किया, उसने.

- वाणभट्ट

शनिवार, 11 जून 2011

ग़ज़ल : अगर इस कह सकते हैं तो...

सोते हुए शहर को जगाने की चाह है
सोते शहर में जागना भी इक गुनाह है

पत्तों भी दरख्तों का साथ छोड़ जायेंगे 
कुचले हुए चमन के फूलों की आह है

पसरा पड़ा है घटाटोप अँधेरा हर कहीं
चिरागों को शहीद बनाने की राह है

कीचड़ निगल रहा कमल को सरेआम
सूरज पे भी दाग लगाने की चाह है

अपनों ने ही लगाई है दामन की ये आग
समझे जिसे बैठे थे कि ये ही पनाह है

अंधों को बेच आईने तू क्या करे 'प्रसून'
वो देख क्या सकेंगे जब फ़िज़ा ही स्याह है

वाह-वाह, 
(स्वनामधन्य पत्रकारिता के युग में अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना ज़रूरी है...पता नहीं कोई और तारीफ़ करे...न करे...)  

- वाणभट्ट