सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

आती हुई हवा में
खड़क उठे पन्ने
बलात्कार के लिए
क्या हम ही मिले

तुम्हारे अन्दर भड़ास है
पर ऐसी भी क्या ख़ास है
औरों को इससे क्या वास्ता
सब चल रहे अपना अपना रास्ता

तुम मेरी जान के पीछे क्यों पड़े हो
कलम को हथियार बना मुझे चीरते हो
कागज काले करने से कुछ ना होगा
अगर हिम्मत है तो कुछ कर गुजरना होगा

हे कागज, हे कलम मुझे माफ़ करना
मेरी भी कुछ मजबूरियां हैं
ये अलफ़ाज जब जेहन में रहते हैं तो चुभते हैं
और जब बाहर निकलते हैं
तो सबको गड़ते हैं

आज कल
जब सबको अपनी-अपनी पड़ी है
तो बताओ इसमें मेरी भी क्या गलती है

- वाणभट्ट

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